Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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नहीं भावोद्र क के रूप में पड़ता है।" इस भावोद्र क की अनुभूति आनन्दमयी होती है-इस तथ्य को स्वीकार करते हुए वे लिखते हैं-"साधारणतः औदात्य के उन उदाहरणों को ही श्रेष्ठ और सच्चा मानना चाहिए जो सब व्यक्तियों को सर्वदा आनन्द दे सके।'३ साधारणीकरण एवं तादात्म्य की चर्चा भी अप्रत्यक्ष रूप में लौंजाइनस ने की है। उनके विचार से पाठक का काव्यगत पात्रों से साधारणीकरण होने से पूर्व कवि का उनके साथ तादात्म्य होता है। होमर के एक पात्र फएथोन की चर्चा करते हुए वे लिखते हैं-"क्या तुम नहीं कहोगे कि लेखक की आत्मा फएथोन के साथ ही साथ रथ में प्रवेश कर जाती है और उसके साहस तथा घोड़ों के वायु-वेग का समानुभव करने लगती है।" यहाँ 'समानुभाव' समान अनुभूति या तादात्म्य का ही द्योतक है। दूसरी ओर कवि की अनुभूति का साधारणीकरण हो जाने से वह पाठक की अनुभूति बन जाती है। लौंजाइनस महोदय के शब्दों में-"सच्चे औदात्य से हमारी आत्मा जैसे अपने आप ही उपर उठकर गर्व से उच्चाकाश में विचरण करने लगती है तथा हर्ष और उल्लास से परिपूर्ण हो उठती है मानो जो कुछ उसने सुना हो वह स्वयं उसी का अपना कार्य हो।" यहाँ उद्धृत शब्दों में 'तादात्म्य' का प्रयोग न होते हुए भी उसकी प्रक्रिया को अप्रत्यक्ष रूप में स्वीकार किया गया है। वस्तुतः लौंजाइनस के ग्रन्थ का लक्ष्य उदात्त तत्त्व के प्रतिपादन का होते हुए भी वे काव्यगत भाव की महत्ता को स्वीकार किये बिना न रह सके। इतना ही नहीं बल्कि उन्होंने अपने ग्रन्थ के अन्त में 'आवेग' पर एक स्वतन्त्र ग्रन्थ लिखने की इच्छा व्यक्त की थी। कदाचित्, इस इच्छा को वे पूरी नहीं कर पाये, किन्तु उससे यह तो सिद्ध हो ही जाता है कि अन्ततः उनका भी झुकाव आवेग तत्त्व की ओर हो गया था। अस्तु, काव्यगत आवेग या भाव का बहुत विस्तृत विवेचन न करते हुए भी उन्होंने इन पाँच बातों को स्पष्ट रूप में स्वीकार किया है-(१) काव्यगत औदात्य का आधार भावावेग है। (२) औदात्य की अनुभूति भी विचार के रूप में न होकर भावावेग के रूप में होती है। (३) काव्य-रचना का लक्ष्य श्रोता को आनन्द प्रदान करना है। (४) काव्य में मूल ऐतिहासिक पात्रों के साथ कवि का तथा कवि की

२. वही ; पृष्ठ सं० ४४ ३. वही पृष्ठ सं० ६१ ४-५. 'काव्य में उदात्त तत्त्व' ; पृष्ठ ७१

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८२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

अनुभूति के साथ पाठक का तादात्म्य अपेक्षित है। कहना न होगा के ये धारणाएँ भारतीय रस-सिद्धान्त की आधारभूत स्थापनाओं के बहुत निकट पड़ती हैं। अतः औदात्य तत्त्व की प्रतिष्ठा के साथ-साथ पाश्चात्य भाव-सिद्धान्त के भी प्रवर्त्तन का श्रेय उन्हें दिया जाय तो अनुचित न होगा। · ल बस्सु (Le Bessu) सत्रहवीं शती के काव्य-चिन्तक ल बस्सु (१६३१-१६८० ई०) कदाचित् पहले पाश्चात्य चिन्तक हैं जिन्होंने काव्य के संदर्भ में भावों का विवेचन सांगोपांग रूप में किया। उन्होंने प्रत्येक महाकाव्य के लिए भावात्मकता को अनिवार्य तत्त्व माना है। प्रसिद्ध सौन्दर्य-शास्त्री गिल्बर्ट महोदय ने ल बस्सु के विचारों का परिचय देते हुए लिखा है-"The epic narrative .... must also be moving and impa- ssioned, so that it may transport the mind of the reader, fill it with disquiet, give it joy, throw it into terror, make it feel again the violence of all the movements'"the passions are necessary than for great poems ; but they are not all necessary or suitable for all. Comedy has for its share joy and pleasant surprise. Tragedy on the other hand has terror and compassion.6 'अर्थात् 'प्रबन्धात्मक महाकाव्य .. इतना प्रभावोत्पादक एवं भावोत्तेजक होना चाहिए कि वह पाठक के मन को उद्वलन से भर सके, उसे हर्ष-विभोर कर सके, उसे भय की दुनियाँ में फेंक सके अथवा उसे सभी प्रकार के क्रिया-कलापों का साहस अनुभव करवा सके .... अतः महान काव्यों के लिए भावावेग आवश्यक है किन्तु सभी प्रकार के काव्यों लिए सभी प्रकार के भाव उपयुक्त नहीं होते-जहाँ कामदी में आश्चर्य मिश्रित हर्ष होता है वहाँ त्रासदी में भय एवं करुणा की प्रमुखता होती है।' इस प्रकार लबस्सु के विचार से महाकाव्य के लिए न केवल भावात्मकता आवश्यक है अपितु उनकी प्रकृति के अनुसार तद्नुकूल भाव की प्रमुखता भी अपेक्षित है। भाव-वैविध्य की दृष्टि से त्रासदी एवं कामदी का क्षेत्र महाकाव्य की अपेक्षा सीमित है, उनमें भावात्मकता के संचार के लिए उतना अवकाश नहीं है जितना कि महाकव्य में है, उसी तर्क के आधार पर उन्होंने महाकाव्य को अपेक्षाकृत अधिक महत्त्व प्रदान किया है। क्या सभी महाकाव्य समान भावों की अभिव्यक्ति करने में समर्थ हैं ? इस प्रश्न का उत्तर देते हुए ल बस्सु ने स्पष्ट किया है कि सभी महाकाव्यों में एक जैसे

  1. A History of Esthetics ; By K. E. Gilbert and Kuhn ; 1954; Page 223.

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भावों का प्रस्तुतीकरण नहीं किया जा सकता। जिस महाकाव्य का नायक जैसी प्रकृति का होगा, वैसा ही भाव उसमें प्रमुखता प्राप्त करेगा। यथा, 'इलियड' का नायक क्रोधी एवं पराक्रमी है अतः उसमें रौद्र एवं भय की प्रमुखता है; इसके विपरीत 'एनीड' का नायक उदार और सज्जन है, अतः उसमें कोमल भावों को प्रमुखता दी गयी है। अतः एक महाकाव्य का अन्य महाकाव्यों से पार्थक्य-सूचक तत्त्व यह भाव विशेष की प्रमुखता ही है। काव्य में भावों के प्रस्तुतीकरण के सम्बन्ध में भी उन्होंने कुछ महत्त्वपूर्ण निर्देश दिये हैं-एक तो कवि के लिए भाव-विशेष का प्रस्तुतीकरण ही पर्याप्त नहीं है अपितु पाठक या श्रोता के द्वारा उसकी स्वीकृति भी प्राप्त होनी चाहिए। दूसरे, पाठकों को उस भाव का केवल ज्ञान ही नहीं-उसकी अनुभूति भी प्राप्त होनी चाहिए। साथ ही एक ही रचना में परस्पर-विरोधी भावों की भी आयोजना नहीं की जानी चाहिए। भावों को संप्रषणीय बनाने के लिए कवि को चाहिए कि वह पाठक की मनः स्थिति के अनुरूप अपने विषय को प्रस्तुत करे। उनके शब्दों में-"एक व्यक्ति शान्त मन से बैठा हुआ है और तुम बातचीत के द्वारा उसे क्रोधित करना चाहते हो तो सबसे पहले तुम्ह भी शान्तिपूर्वक बात आरम्भ करनी चाहिऐ, फिर धीरे-धीरे जब वह तुम्हारी बातचीत में सम्मिलित हो जाय तो तुम उसे अपना अनुगामी बना सकते हो।" यहाँ ल बस्सु का तात्पर्य यही है कि काव्य में भावों का प्रस्तुतीकरण कमशः इस प्रकार होना चाहिए कि जिससे वह पाठक के मन को प्रभावित कर सके इसके अतिरिक्त उन्होंने कवि और आलोचकों के लिए भावों के शारीरिक एवं मानसिक पक्षों-अनुभावों और संचारी भावों-का ज्ञान भी आवश्यक बताया है। ल बरसु के मत की समीक्षा-ल बस्सु की उपयुक्त धारणाओं पर समीक्षात्मक दृष्टि से विचार करने पर वे पर्याप्त महत्त्वपूर्ण सिद्ध होती हैं। काव्य या महाकाव्य में पात्र के अनुरूप किसी एक भाव को प्रमुखता देना, काव्यों का वर्गीकरण इस प्रमुख भावों के आधार पर ही करना, भावों को अनुभूतिगम्य रूप में प्रस्तुत करने पर बल देना, अनुभावों एवं संचारीभावों के अध्ययन की आवश्यकता का अनुभव करना-ये सारी प्रवृत्तियाँ भारतीय रस-सिद्धान्त के अनुकूल हैं। अतः पाश्चात्य भाव-सिद्धान्त या रस-सिद्धान्त के विकास में उनका योग अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है- इसमें कोई संदेह नहीं। · हचेसन (Hutcheson) पाश्चात्य कला-समीक्षकों में भावावलम्बनवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने में हचेसन (१६९४-१७४७ ई०) महोदय का भी महत्त्वपूर्ण योगदान है। उन्होंने काव्य में भावों के प्रस्तुतीकरण का समर्थन करते हुए काव्यानुभूति या रसानुभूति

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के सम्बन्ध में दो महत्त्वपूर्ण तत्त्वों पर विशेष बल दिया-(१) स्वार्थशून्यता (Dis- interest) एवं (२) अन्तर्भावना (Inner-sense)"- स्वार्थशून्यता से उनका तात्पर्य यह है कि सामाजिक कलाओं के आस्वादन के समय किसी व्यक्तिगत हानि-लाभ के विचार से मुक्त रहता है। यह स्वार्थशून्यता ही काव्यानन्द का मूल कारण है। अन्तर्भावना को उन्होंने रुचि (taste) का पर्याय मानते हुए प्रतिपादित किया कि यह एक ऐसी शक्ति है जो कवि, काव्य और पाठक-तीनों में विभिन्न रूपों में विद्यमान रहती है। कबि में विद्यमान अन्तर्भावना को सामान्य शब्दावली में 'प्रतिभा' कहा जाता है तो काव्य में प्रतिबिम्बित अन्तर्भावना 'भावना' (sentiment) के नाम से प्रसिद्ध है। इसी 'अन्तर्भावना' को पाठक के प्रसंग में 'रुचि' (taste) कहा जाता है। वस्तुतः हचेसन महोदय के विचार से यह अन्तर्भावना ही कवि, काव्य और पाठक- तीनों में विद्यमान वह विशेष तत्त्व है जिसे काव्यानुभूति या रसानुभूति का आधार माना जा सकता है। भारतीय दृष्टि से हचेसन की अन्तर्भावना स्थायी भाव या मूल भाव की पर्याय मानी जा सकती है। कवि अपने स्थायी-भाव को काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करता हुआ पाठक के स्थायी भावों को उद्वलित करता है। काव्य के प्रसंग में हचेसन ने इसे भावना या सेंटिमेंट बताकर अप्रत्यक्ष रूप में स्थायीभाव का ही अनु- मोदन किया है क्योंकि भारतीय आचार्यों का 'स्थायी भाव' 'सेंटिमेंट' के बहुत निकट पड़ता है। · बर्क (Burke) बर्क (१७२९-१७९७ ई०) महोदय वे कविता, नाटक आदि कलाओं से प्राप्त अनुभूति को भावात्मक अनुभूति मानते हुए यह स्वीकार किया है कि इन कलाओं में विभिन्न भावों का प्रस्तुतीकरण भी आवश्यक है। उन्होंने इस दृष्टि से भावों का विवेचन एवं वर्गीकरण नूतन रूप में किया है। अब तक प्रायः अनुभूति (Feeling) और भाव (Emotion) को एक ही अर्थ में ग्रहण किया जाता था, जबकि बर्क ने दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हुए बताया कि अनुभूति का सम्बन्ध दुःख, सुख और उदासीनता की स्थिति से है जबकि भाव इनसे पृथक हैं। भावों को भी उनके विचारानुसार दो वगों में विभाजित किया जा सकता है-(१) आत्म रक्षा की प्रवृत्ति से सम्बन्धित एवं (२) सामाजिक। प्रथम वर्ग में भय और आश्चर्य को स्थान देते हुए उन्होंने प्रशंसा, श्रद्धा और सम्मान की भावना को भी आश्चर्य से ही रूपान्तरित माना। दूसरे वर्ग अर्थात् सामाजिक भावों के अन्तर्गत उन्होंने मुख्यतः छह भावों की गणना की-(१) जिज्ञासा (२) सहानु- भूति (३) अनुकरण की प्रवृत्ति (४) महत्त्वाकांक्षा (५) शोक और (६) प्रेम।

  1. Western Aesthetics : K. C. Pandey ; Page 233-4

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काव्यानुभूति में क्रमशः जिज्ञासा, सहानुभूति एवं अनुकरण की प्रवृत्ति का गहरा योग रहता है-इनके कारण ही हमें आनन्द की अनुभूति होती है। प्रेम को उन्होंने अत्यन्त व्यापक रूप में ग्रहण करते हुए उसके अन्तर्गत सम-लैंगिक एवं भिन्न लैंगिक व्यक्तियों तथा अन्य जीवों व पदार्थों के प्रति उत्पन्न होने वाले सभी प्रकार के रागात्मक सम्बन्धों को समाविष्ट कर लिया। भावोद्दीपन में भाषा का योग-काव्यजन्य भावोद्दीपन में भाषा किस प्रकार योग देती है-इसे स्पष्ट करते हुए बर्क ने शब्दों को तीन वर्गों में विभक्त किया-(१) पूर्णवाची शब्द-इनके द्वारा विभिन्न सरल विचारों का प्रस्तुतीकरण होता है; जैसे, घोड़ा, मनुष्य आदि। (२) सरल भाववाचक-जैसे लाल, गोल आदि। (३) मिश्रित भाववाचक शब्द-जैसे, प्रेम, गुण, भय आदि। प्रथम दो प्रकार के शब्दों से श्रीता को शब्द की ध्वनि, उनके द्वारा सांके- तित वस्तु एवं तज्जन्य अनुभूति का क्रमशः बोध होता है। किन्तु तीसरे प्रकार के शब्दों से उनके ध्वनि-बोध के अनन्तर सीधे भावों की अनुभूति हो जाती है अर्थात् बीच की एक प्रक्रिया-वस्तु-बोध-की अपेक्षा वहाँ नहीं रहती। मिश्रित भाव- वाचक शब्द किसी वस्तु को सूचित न करके भाव को सूचित करते हैं, अतः उनसे आत्मा को सीधे भावों की अनुभूति हो जाती है। इस प्रकार बर्क के दृष्टिकोण से काव्य में भाव-वाचक शब्दों का प्रयोग भावोद्दीप्ति में अधिक सहायक सिद्ध होता है। साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि वस्तुओं की प्रत्यक्ष अनुभुति की अपेक्षा शब्दों के माध्यम से होने वाली अप्रत्यक्ष अनुभूति अधिक गंभीर होती है- यही कारण है कि दैनिक जीवन की घटनाओं की अपेक्षा हम काव्य में वणित घटनाओं से अधिक प्रभावित होते हैं। रसानुभूति की प्रक्रिया-काव्यानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया का विश्ले- षण करते हुए बर्क ने तीन माध्यमों की चर्चा की जिनके द्वारा पाठक काव्य-वस्तु का बोध प्राप्त करता है-(१) इन्द्रियाँ (२) कल्पना और (३) तर्क या बुद्धि। बर्क के विचारानुसार रसानुभूति में इनमें से किसी एक माध्यम का ही नहीं अपितु तीनों का ही समन्वित योग रहता है। इन तीनों की समन्वित शक्ति को ही रुचि (taste) या 'आस्वादन-क्षमता' का नाम दिया गया है। अस्तु, उनके विचार से यह क्षमता ही काव्यास्वाद की आधारभूत शक्ति है। करुण रस और आनन्दानुभूति-करुण और भयानक में अपेक्षाकृत अधिक प्रबल भावों की उत्पत्ति होती है, इसीलिए काव्य में भी इनकी अनुभूति अधिक गम्भीर एवं उदात्त होती है। करुण से आनन्द की अनुभूति क्यों होती है ? इस सम्बन्ध में बर्क ने पूर्ववर्ती विद्वानों के अनेक मतों का खण्डन करते हुए प्रतिपादित 8. Western Aesthetics ; Pandey; Page 260-61

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किया कि कलाजन्य आनन्द अनुकृति का आनन्द है। जब हमें इस तथ्य का बोध होता है कि कला में प्रस्तुत विषय न वास्तविक है न मिथ्या अपितु अनुकृति मात्र है तो इससे हमें आनन्द की अनुभूति होती है।

कवि के साथ तादात्म्य-काव्यानुभूति के सम्बन्ध में बर्क ने इस तथ्य का भी उद्घाटन किया कि काव्यास्वादन के समय पाठक का कवि की आत्मानुभूति के साथ तादात्म्य स्थापित हो जाता है; जैसी अनुभूति कवि की होती है, वैसी ही अनु- भूति पाठक प्राप्त करता है।

बर्क के मत की समीक्षा-पाश्चात्य कला-समीक्षा के क्षेत्र में बर्क के विचारों का महत्त्वपूर्ण स्थान है। भाव-सिद्धान्त के क्षेत्र में उनकी महत्त्वपूर्ण देन यह है कि एक तो उन्होंने अनुभूति और भाव का अन्तर स्पष्ट करते हुये भावों का वर्गीकरण नये ढंग से करने का प्रयास किया। यह ठीक है कि महत्त्वाकांक्षा, अनुकरण की प्रवृत्ति एवं जिज्ञासा को भी भावों में स्थान देना यह प्रमाणित करता है कि उन्हें इस क्षेत्र में पूर्ण सफलता नहीं मिली क्योंकि महत्त्वाकांक्षादि भावावेग न होकर मानसिक प्रवृत्तियाँ हैं-पर फिर भी उनका प्रयास नूतन दिशा में अवश्य है। काव्यानुभूति में जिज्ञासा और सहानुभूति के योग पर अत्यधिक बल देना भी समीचीन प्रतीत होता है। दूसरे, भावोद्दीपन की दृष्टि से काव्य-भाषा का विश्लेषण करते हुये शब्दों के वर्गीकरण का प्रयास भी महत्त्वपूर्ण है। यहाँ वे भाव वाचक शब्दों में भावोत्पादन की अधिक क्षमता स्वीकार कर लेते हैं जबकि भारतीय आचार्यों की धारणा इसके प्रतिकूल है। क्या 'प्रम' कहने से प्रेम की अनुभूति प्राप्त हो सकेगी ? इसका उत्तर निषेधात्मक ही दिया जा सकता है क्योंकि भाववाचक शब्दों से वस्तु का बिम्ब ग्रहण नहीं होता, अतः वे काव्य में त्याज्य माने गये हैं। रसानुभूति की प्रक्रिया में इन्द्रियों, कल्पना और बुद्धि-तीनों का योग स्वीकार करना तथा कवि के साथ पाठक के तादात्म्य को मानना-बर्क की महत्त्वपूर्ण उपलब्धियाँ हैं किन्तु करुण रस में आनन्दानुभूति का आधार एक मात्र अनुकृतिजन्य अनुभूति को मान लेना उचित प्रतीत नहीं होता। अस्तु, हमारे विचार में बर्क का महत्त्व नयी दिशाओं की ओर अग्रसर होने व नूतन प्रयास करने की दृष्टि से ही अधिक है; स्थापनाओं की प्रामाणिकता की दृष्टि से कम। फिर भी पाश्चात्य रस-सिद्धान्त को गति देने में उनका न्यूनाधिक योग अवश्य है। · हरमन लात्ज (Hermann Lotze) जर्मन विद्वान हरमन लात्ज (१८१७-१८८१ ई०) ने भावावलम्बनवादी दृष्टि से कला की मीमांसा करते हुए स्पष्ट रूप में घोषणा की कि कला का वास्तविक

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सौन्दर्य आत्मा को आनन्द प्रदान करने वाले भाव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।9 प्रश्न है, वह भाव क्या है ? इसके उत्तर में उन्होंने बताया कि बाह्य वस्तुओं या घटनाओं के प्रभाव से हमारे मन में जो प्रतिक्रिया होती है उसी को सूचित करने वाले चिह्न भाव हैं। कला से आनन्दानुभूति का आधार यह भाव तत्त्व ही है। संक्षेप में, लात्ज महोदय के अनुसार कला का सर्व प्रमुख तत्त्व भाव है जिसे भारतीय शब्दावली से 'रस' भी कहा जा सकता है क्योंकि उन्होंने कला में भाव के रसात्मक या आनन्द दायक रूप पर ही विशेष बल दिया है। रसानुभूति की प्रक्रिया-कलानुभूति या रसानुभूति की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए उन्होंने उसकी तीन अवस्थाएँ निर्धारित की हैं-(१) इन्द्रिय-बोधानुकूलता (२) प्रसन्नतादायक बौद्धिक उत्कर्ष और (३) सौन्दर्यानुभूति। सर्वप्रथम हम कला का बोध इन्द्रियों के माध्यम से प्राप्त करते हैं। जिससे हमारा मन उनकी ओर आकर्षित होता है। यदि हमारी इन्द्रियाँ ही उसके प्रति आकर्षित नहीं हुई तो उस स्थिति में हमारे मन में उसके प्रति विकर्षण उत्पन्न हो जायगा जिससे कलानुभूति की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जायगी। इन्द्रिय बोधानुकूलता के अनन्तर द्वितीय स्थिति में हमारी बुद्धि इन्द्रियों के द्वारा प्राप्त संवेदनाओं को हमारे संस्कारों, स्मृतियों एवं अनुभूतियों से समन्वित करती हुई प्रसन्नतादायक प्रभाव उत्पन्न करती है। तीसरी अवस्था में हमारी आत्मा कला के समस्त सौन्दर्य का समन्वयात्मक रूप में आस्वादन करती हुई आनन्द प्राप्त करती है। लात्ज महोदय ने यह भी स्पष्ट किया है कि रसानुभूति के उपयुक्त्त तीनों स्तर यद्यपि भिन्न-भिन्न हैं, जो क्रमशः शारीरिक स्तर, आत्मिक स्तर एवं चेतना के स्तर की प्रसन्नतादायक अनुभूति को सूचित करते हैं। किन्तु समग्र रूप में तीनों एक ही सौन्दर्यात्मक भाव (Aesthetic Emotion) की अनुभूति के सूचक हैं। रसानुभूति में संस्कारों एवं नैतिक आस्थाओं का योग-लात्ज महोदय ने कलानुभूति या रसानुभूति में कला की भावोत्पादिनी शक्ति के साथ-साथ सामाजिक की नैतिक आस्थाओं, उसके पूर्व संस्कारों, उसकी स्मृतियों और वैयक्तिक अनुभूतियों का भी पर्याप्त योग स्वीकार किया है। किसी भी कला का मूल्यांकन चाहे हम सोच समझ कर करें या अप्रत्यक्ष रूप में-हमारा आस्वादन एवं मूल्यांकन हमारी नैतिक आस्थाओं, संस्कारों, अनुभवों आदि से अप्रभावित नहीं रह सकता। इस प्रकार लात्ज महोदय रसानुभूति में कला-कृति के वैशिष्टय एवं सामाजिक की वैयक्तिकता -इन दोनों को ही उचित महत्त्व प्रदान करते हैं। लात्ज के मत की समीक्षा-लात्ज महोदय का रस-विवेचन अनेक दृष्टियों से महत्त्वपूर्ण सिद्ध होता है। उन्होंने कलानुभूति का मूल आधार भावानुभूति को 9. A History of Esthetics : K. E. Gilbert and Kuhn; 1954 Page 508-512.

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मानते हुये समग्र रूप में उसके प्रभाव को 'सौन्दर्यात्मक भाव' (Aesthetic Emotion) की संज्ञा दी है, जिसे भारतीय शब्दावली में 'रस' कहा जा सकता है। कलानुभूति या रसानुभूति की तीन स्थितियों ऐन्द्रियक, बौद्धिक एवं आत्मिक की कल्पना एक ओर आचार्य अभिनवगुप्त की धारणाओं तथा दूसरी ओर आधुनिक मनोविज्ञान के भी बहुत कुछ अनुकूल है। रसानुभूति में संस्कारों, स्मृतियों, अनुभवों व नैतिक आस्थाओं का योग स्वीकार करना भी सर्वथा समीचीन है। भारतीय आचार्यों ने ऐसी कलानुभूति को जो कि सामाजिक के संस्कारों एवं नैतिक आस्थाओं के प्रतिकूल पड़ती हो 'रसाभास' की संज्ञा देते हुये अप्रत्यक्ष में वही बात कही है जिसका प्रतिपादन यहाँ लात्ज महोदय ने किया है। अस्तु हमारे विचार में लात्ज महोदय की रसानुभूति सम्बन्धी धारणाएँ भारतीय रस-सिद्धान्त के भी सर्वथा अनुकूल मानी जा सकती हैं। · जार्ज सैंतायना (George Santayana) सुप्रसिद्ध अमरीकन विद्वान् जार्ज-सैंतायना की कला सम्बन्धी पुस्तक "दी सेन्स आफ ब्यूटी" (The sense of Beauty) सन् १८९६ ई० में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कलागत सौन्दर्य की भावपरक व्याख्या प्रस्तुत की है। सौन्दर्य क्या है ? इसका उन्होंने जो उत्तर दिया, वह भारतीय रस-सिद्धान्त के सर्वथा अनुकूल है। उनके शब्दों में 'सौन्दर्य' एक भावात्मक तत्त्व है जिसका स्वरूप प्रसन्नतादायक है किन्तु उसे हम वस्तुओं का गुण समभते हैं। "१0 यदि इसे और अधिक स्पष्ट किया जाय तो कहा जा सकता है कि सौन्दर्य वस्तु का वह गुण है जो आनंददायक भाव उत्पन्न करता है। रस-सिद्धान्त की शब्दावली में सौन्दर्य आलम्बन का वह गुण है जो प्रमाता के मन में आनन्द उत्पन्न करता है। इस प्रकार सैंतायना महोदय ने सौन्दर्य को रस- निष्पत्ति का आधार मानते हुए उसकी भाव-परक व्याख्या प्रस्तुत की है। रसानुभूति के विभिन्न स्तर सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति के विभिन्न स्तरों की मीमांसा करते हुए उन्होंने सर्वप्रथम ऐन्द्रियता का विवेचन किया है। कोई वस्तु सुन्दर है या नहीं-इसका निर्णय सर्वप्रथम हम ऐन्द्रियानुभूति के आधार पर ही करते हैं। इन्द्रियों को सुखद अनुभूति प्रदान करने वाला गुण ही प्रायः सौन्दर्य माना जाता है। किन्तु सृष्टि का समस्त सौन्दर्य केवल इन्द्रियों पर ही आधारित नहीं है। करुण रस की कविता श्रवणेन्द्रिय को मधुर प्रतीत न होती हुई भी हमारी भावनाओं को उद्दीप्त कर सकती है-अतः सौन्दर्य का दूसरा स्तर भाव-सौन्दर्य कहा जा सकता है। ऐन्द्रियक सौन्दर्य और भाव-सौन्दर्य के अतिरिक्त एक तीसरा स्तर बौद्धिक सौन्दर्य का माना जा सकता है।

  1. The Sense of Beauty : George Santayana; Page 35

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यद्यपि सैंतायना महोदय ने इस प्रकार सौन्दर्यानुभूति के कई स्तर माने हैं तथा भाव-सौन्दर्य एवं बौद्धिक सौन्दर्य को ऐन्द्रिय सौन्दर्य से अधिक उच्च कोटि का बताया है फिर भी वे ऐन्द्रियक सौन्दर्य की उपेक्षा नहीं करते। उनके विचार से कला के प्रभाव की अभिवृद्धि में ऐन्द्रियानुभूति का गहरा योग रहता है। ऐन्द्रियता के कारण सौन्दर्यानुभूति में सघनता और विशदता आती है। रति भाव का विवेचन-कला सम्बन्धी भावों की विवेचना करते हुए सैतायना महोदय ने सर्वाधिक महत्त्व रति भाव को प्रदान किया है। उनके शब्दों में- "यदि किसी भी विषय-वस्तु को निश्चित रूप से सुन्दर बनाना है तो उसके लिए रति भाव से बढ़कर और कोई अच्छा साधन प्राप्त नहीं होगा।"११ शृंगार रस की महत्ता के सम्बन्ध में जिन शब्दों का प्रयोग भारतीय आचार्यों ने किया है, लगभग उन्हीं शब्दों में जार्ज सैतायाना कहते हैं-"संसार को गंभीरतम भाव और सर्वोत्कृष्ट सौन्दर्य प्रदान करने के लिए इससे (रतिभाव) बढ़कर साधन और क्या हो सकता है ! इसका प्रभाव अत्यन्त शान्तिपूर्ण और व्यापक होता है। रतिभाव से हृदय और कल्पना के स्रोत एकाएक खुलकर बह पड़ते हैं। उसका प्रभाव आत्मा की गहराई तक पहुँच जाता है और उसकी गुप्त निधियाँ बाहर फूँंट पड़ती हैं"।१२ रति भाव को सैंतायना ने अत्यन्त व्यापक रूप में ग्रहण किया है। वे इसका प्रमुख लक्ष्य यौन-सम्बन्धों की अभिव्यक्ति को मानते हैं, किन्तु यौन-सम्बन्धों के अभाव में इसे अन्य सम्बन्धों की ओर भी अभिमुख किया जा सकता है। धर्म के क्षेत्र में भक्ति-भावना, विश्व-बन्धुत्व एवं मानव-प्रेम, पशुओं के प्रति करुणा, तथा प्रकृति-प्रम आदि सब रति भाव के ही विभिन्न परिवर्तित रूप हैं। जब हम घर की रानी से वियुक्त हो जाते हैं तो प्रकृति रानी का साहचर्य ढूढ़ते हैं-अतः कहना चाहिए कि प्रकृति हमारी दूसरी प्रयसी है। प्रकृति-प्रेम का वास्तविक रहस्य इस रति-भाव में ही निहित है। सामाजिक भाव-रति भाव की महत्ता सिद्ध करने के अनन्तर सैंतायना ने अन्य भावों की भी उपयोगिता पर प्रकाश डाला है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सामान्यतः वात्सल्य, देश-प्रेम सामाजिकता आदि कलाओं की दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतीत नहीं होते, किन्तु काव्य के क्षेत्र में ये पर्याप्त उपयोगी सिद्ध होते हैं। आज का मनुष्य भले ही उन्नति के शिखर पर पहुँच गया हो, किन्तु उसकी मूलभूत प्ररणाओं की स्रोत अब भी उसकी वे ही सामाजिक आवश्यकताएँ-मित्रता, धन, यश, शक्ति, प्रभाव, पारिवारिक जीवन आदि-हैं, जो सभ्यता के प्राचीन युग में रही होंगी। किन्तु ये बातें ऐसी हैं, जिनका मूर्त्तरूप कला में प्रस्तुत करना बहुत कठिन है। इनकी प्राप्ति की इच्छा को कला में विचार, भाव, आकांक्षा आदि के 11-12. The Sense of Beauty : Santayana ; Page 47.

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९० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

रूप में ही प्रस्तुत किया जा सकता है। अतः इनके चित्रण में आँशिक रूप में ही सफलता मिलती है। हाँ, यदि कलाकार उनके चित्रण में सफलता प्राप्त करले तो अवश्य ही ये भाव सौन्दर्यात्मक बन सकते हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सैंतायना काव्य में सामाजिक भावों की उपयोगिता के सम्बन्ध में कोई स्पष्ट निर्णय नहीं कर पाये थे। इसी से वे आगे चलकर अपनी पहली बात के ही विरुद्ध लिखते हैं-"अतः सामाजिक विषय अधिक सौन्दर्यात्मक नहीं है, क्योंकि उनकी निश्चित रूप से कल्पना नहीं की जा सकती। ....... वे बिखरे हुए से और शून्य से होते हैं तथा उनका रूप शाब्दिक ही होता है, स्थूल नहीं। वे इन्द्रिय-गोचर नहीं हो पाते। इसी से वे महान् भाव जो कि सामाजिक विषयों पर आधारित होते हैं अधिक शीघ्रता से सौन्दर्य के रूप में परिणत नहीं किये जा सकते।" करुण-भाव का विश्लेषण-त्रासदी का विश्लेषण करते हुए सैंतायना ने बताया है कि आशा, प्रेम, आकांक्षा आदि भावों के समन्वय से ही त्रासदी का निर्माण होता है। त्रासदी का प्रमुख आकर्षण ही यह भावों का चित्रण ही है। उसमें चित्रित भावों के कारण हमारी कल्पना-शक्ति जाग्रत होती है और उनके प्रति हमारी सहानुभूति उत्पन्न होती है जिससे हम स्वेच्छापूर्वक नायक के दुःख में भाग लेने लगते हैं और उनके दुःख की अनुभूति प्राप्त करते हैं।१२ करुण रस के सम्बन्ध में एक प्रश्न उपस्थित होता है-करुण से आनन्द की अनुभूति किस प्रकार होती है ? इसका उत्तर देते हुए सैंतायाना ने बौद्धिकता की चर्चा की है। मनुष्य की बौद्धिकता सदा सत्य की प्राप्ति के लिए सचेष्ट रहती है। सत्य भले ही कितना ही कटु क्यों न हो-उसे जानने की इच्छा हमारे मन में सदव बनी रहती है। सत्य की प्यास के कारण ही हम दुःखद धटनाओं को देखना पसन्द करते हैं। ज्ञान या सत्य की उपलब्धि से हमें अमित संतोष प्राप्त होता है। चाहे हम किसी दुर्घटना का या जीवन के किसी कटु अनुभव का विवरण किसी व्यक्ति के मुह से सुन रहे हों या काव्य में पढ़ रहे हों-हमारी ज्ञान की उत्सुकता ही हमें उसमें प्रवृत्त करती है। इस प्रकार जार्ज सैतायना के विचार से करुण-रस से आनन्द उपलब्धि का कारण हमारी जिज्ञासा की ही तुष्टि है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जिज्ञासा का सम्बन्ध बौद्धिकता से है, किन्तु कलाओं के माध्यम के कारण बौद्धिक उपलब्धियाँ भी सौन्दर्यात्मक मूल्यों में परिणत हो जाती हैं। उदात्तभाव या निर्वेद-त्रासदी से आनन्दभूति के कारणों में सैंतायना ने उदात्त की भी चर्चा की है, किन्तु आगे चलकर उन्होंने उदात्त भाव की करुण से पृथक स्वतन्त्र सत्ता सिद्ध की है। प्रायः लोग समभते हैं कि बड़ी-बड़ी. विपत्तियों का

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सामना करते समय महापुरुष जिस आत्मशक्ति का परिचय देते हैं, वही उदात्त भाव है, किन्तु सैंतायना महोदय इस धारणा का खंडन करते हुए बताते हैं कि करुण और भयानक से उदात्त का अबिच्छेद्य सम्बन्ध नहीं है। सही बात तो यह है कि भयानक को उदात्त में परिणत करने के लिए उसे इस भाँति नियन्त्रित या दमित करना होगा कि जिससे उसमें भयानकता न रहे। वस्तुतः उदात्त का सम्बन्ध भय से नहीं अपितु निर्वेद और मुक्तावस्था से है।१४ उदात्त का आलम्बन वस्तु-विशेष न होकर कर्म-विशेष होता है। कोई ऐसी शोकपूर्ण दुर्घटना या कोई ऐसा कार्य जो निर्वेद उत्पन्न कर सके, उदात्त का आलम्बन है। जहाँ अन्य प्रकार की कला प्रवृत्तिमूलक भावों को उपस्थित करती है वहाँ उदात्त से युक्त कला निवृति मूलक भावों को पोषित करती है। प्रवृतिमूलक कलाओं में हम बाह्य सौंदर्य और प्रेम की धाराओं के आस्वादन में तल्लीन हो जाते हैं- और सामान्यतः कलाओं का यही लक्ष्य माना जाता है। पर जीवन-तथा उसके अनुरूप कला में एक ऐसी परिस्थिति का भी प्रादुर्भाव होता है, जबकि हमें अपनी समस्त रागात्मक प्रवृतियों को कुठित करना पड़ता है। उस परिस्थिति में हमें बाह्य जगत् के सौंदर्य से उदासीन हो जाना पड़ता है। संसार के प्रति राग का नहीं-विराग का ; मिलन का नहीं-पृथकता का अनुभव होने लगता है। वस्तुतः यही परिस्थिति है जबकि 'उदात्त' की उपलब्धि होती है। इस प्रकार उदात्त का स्थायीभाव- निर्वेद को मानते हुए सैंतायना ने इसका और अधिक स्पष्टीकरण किया है। यद्यपि सामान्यतः लौकिक सुखों से निराशा को ही निर्वेद का उत्पादक माना जाता है, किन्तु कुछ अन्य कारणों से भी इसकी उत्पत्ति हो सकती है। अनन्तता और तुच्छता का बोध भी निर्वेद का जनक हो सकता है। किसी वस्तु की अनन्तता का बोध यदि हमें अन्य वस्तुओं से विरक्त करता है तो उसकी तुच्छता का बोध स्वयं उसी से दूर ले जाता है। पर इसका यह तात्पर्य नहीं है कि उदात्त का स्थायी भाव घृणा है और उसका आलम्बन कुरूपता है। वस्तुतः निर्वेद और घृणा की अनुभूति में सूक्ष्म अन्तर है, जिसे ध्यान में रखकर ही दोनों को पृथक किया जा सकता है। निर्वेद एक चिन्तन-जन्य आनन्द है जो गंभीर होने पर हमें आम्बन के आलम्बनत्व से सवथा पृथक करता है। सौंदर्य और उदात्त में यह अन्तर है कि जहाँ सौंदर्य हमें वस्तुओं की ओर आकर्षित करके उनमें तल्लीन करता है वहाँ उदात्त हमें उन वस्तुओं के अभाव में भी पूर्णता का बोध कराता है।" वस्तुतः उदात्त एक ऐसी अनुभूति है जिसमें हमारी दृष्टि एकाएक विकसित हो जाती है, जीवन के सामान्य स्वार्थों से हम एकाएक छुटकारा पा जाते हैं, क्षणभर के लिए हमारा तादात्म्य एक लोकातीत चिरन्तन सत्ता से हो जाता है

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९२ रस-सिद्धान्त का पुर्नाववेचन

और हम भौतिक पदार्थों के आकर्षण से मुक्त हो जाते हैं। यह अनुभूति हमें एक विशेष प्रकार का आनन्द प्रदान करती है। इस प्रकार भौतिक बन्धनों एवं सांसारिक कष्टों से ऊपर उठकर प्राप्त की गई यह स्वतन्त्र जीवन की अनुभूति ही उदात्त की अनुभूति है। उदात्त का सम्बन्ध इन्द्रिय-गोचर वस्तुओं से नहीं ; अपितु चिन्तन सम्बन्धी वस्तुओं से है। दूसरे शब्दों में उदात्त का सम्बन्ध ऐन्द्रियानुभूतियों से न होकर बौद्धिक चिन्तन से है। यही कारण है कि उसमें हम सांसारिक दुखों की अपेक्षा उन्हें जन्म देनेवाली कटु परिस्थितियों का अधिक भावन कर पाते हैं। उदात्त की स्थिति में हम लहरों से संघर्ष करते हुए नाविक की अपेक्षा स्वयं लहरों के प्रति ही अधिक सहानुभूतिशील हो उठते हैं। इसे शायद निर्दयता कहा जाय-किन्तु वह निर्दयता किसी अन्य के प्रति नहीं अपितु स्वयं अपने प्रति ही होती है। हम दूसरे के दुःखों का नहीं अपितु अपने दुःखों का स्वागत करने लगते हैं। अतः उदात्त दुःखों से मुक्ति की नहीं अपितु उनका सहर्ष आलिंगन करने की प्ररणा प्रदान करता है। वस्तुतः इस अवस्था में दुःख दुःख नहीं रह जाते वे कुछ और बन जाते हैं। उदात्त का काव्यगत उदाहरण देते हुए जार्ज सैंतायाना ने 'ओथेलो' के नायक की आत्म-ग्लानि पूर्ण उक्तियाँ उद्धृत की हैं। वह आत्म हत्या करने से पूर्व ये उक्तियाँ व्यक्त करता है। इनकी व्याख्या करते हुए सैंतायना ने बताया है कि इस स्थिति में व्यक्ति व्यक्ति न रहकर विश्वात्मा का रूप बन जाता है। वह अपनी ही भूलों की सार्वजनिक दृष्टि से भर्त्सना करने लगता है जिससे उसे आत्म-तोष की अनुभूति होती है। इस प्रकार सतायना ने उदात्त के संचारी भावों में आत्म- ग्लानि को भी स्थान दिया है। हास्य एवं व्यंग्य-सैतायाना महोदय ने उपयुक्त भावों के अतिरिक्त हास्य और व्यंग्य का भी पृथक रूप में विवेचन किया है। इन भावों का सम्बन्ध कामदी से है जिसमें सर्वत्र प्रसन्नता का ही वातावरण होता है जिसके सामान्यतः तीन रूप माने जाते हैं-(१) स्नायविक उत्तेजना, (२) भावों का उत्तजन और (३) बुद्धि का उत्त जना इस प्रकार का मनोरंजन उत्तेजक ही सिद्ध होता है। हास्य एवं व्यंग्य सृष्टि के लिए आवश्यक परिस्थितियों की व्याख्या करते हुए सैंतायाना महोदय ने स्पष्ट किया है कि जिस प्रकार त्रासदी में सहानुभूति अनुकूल तत्त्व है, ठीक वैसे ही वह हास्य-व्यंग्य में प्रतिकूल सिद्ध होता है। साथ ही हास्य के आलम्बन के प्रति किंचित् मैत्री भाव भी अपेक्षित है। साथ में यह भी ध्यान देने की बात है कि यदि व्यंग्य अधिक तीखा हो गया तो वह हास्य के

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भाववलम्बनवादी मत ९३

स्थान पर शोक या करुणा का जनक हो जायगा। अतः सहानुभूति और शत्र ता दोनों का ही अभाव हास्य-व्यंग्य के लिए अपेक्षित है।

· समीक्षा जाज सैंतायना के विचारों में भारतीय रस-सिद्धान्त से गहरा साम्य दृष्टि- गोचर होता है। वस्तुतः उनकी सौन्दर्य सम्बन्धी धारणा इसके ही विभिन्न अंगों पर प्रकाश डालती है। जिस प्रकार रस-सिद्धान्ती कलाओं का लक्ष्य भावनाभूति के द्वारा आनन्दानुभूति प्रदान करना मानता है, ठीक वही बात सैंतायना कलागत सौन्दर्य के सम्बन्ध में कहते हैं। सौन्दर्यानुभूति के जिन तीन स्तरों-ऐन्द्रियक, भावात्मक एवं बौद्धिक की चर्चा उन्होंने की है, वे भी अभिनव गुप्त के द्वारा विवेचित रसानु- भूति के विभिन्न स्तरों के अनुकूल हैं। रस-सिद्धान्त के आचार्य यदि शृंगार रस को रसराज मानते हैं तो दूसरी ओर सैंतायना भी रति भाव को कला की दृष्टि से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मानते हैं। सैंतायना का उदात्त-भाव रस-शास्त्र की शब्दावली में शान्त-रस का पर्यायवाची है। उन्होंने उदात्त भाव की निम्नांकित विशेषताए बताई हैं-(१) उसका आलम्बन कोई व्यक्ति-विशेष न होकर परिस्थिति या दुर्घटना के रूप में होता है। (२) वह निवृत्तिमूलक भाव है तथा उसका प्रमुख भाव निर्वेद है। (३) उसमें बाह्य जगत् के प्रति उदासीनता आ जाती है तथा व्यक्ति संसार के भौतिक आकर्षणों से ऊपर उठ जाता है। (४) उदात्त या निर्वेद चिन्तन जन्य आनन्द है। (५) उसके संचारियों में ग्लानि पश्चाताप आदि का समावेश होता है। निस्सन्देह ये सारी विशेषताएँ शान्त-रस के अनुकूल हैं जिन्हें देखते हुए दोनों को एक दूसरे का पर्यायवाची मान लिया जाय तो अनुचित न होगा। करुण-रस के विवेचन में जिज्ञासा को ही रसानुभूति का मूल कारण माना गया है। किन्तु साथ ही उन्होंने सहानुभूति और नायक के साथ तादात्म्य की बात भी स्वीकार की है। सामाजिक भावों के विवेचन में वात्सल्य आदि के महत्त्व की उन्होंने उपेक्षा की है। पर रतिभाव को उन्होंने इतने व्यापक रूप में ग्रहण किया है कि स्नेह, वात्सल्य आदि का समावेश उसी में हो जाता है। उनका हास्य सम्बन्धी विवे- चन भी रस-सिद्धान्त के प्रतिकूल नहीं है। जहाँ सैंतायना की अधिकांश मान्यताएँ रस-सिद्धान्त से मिलती-जुलती हैं तथा अप्रत्यक्ष रूप से उसे और अधिक स्पष्टता प्रदान करती हैं-जैसे कि शान्त रस के स्पष्टीकरण में सतायना का विवेचन सहायक सिद्ध होता है-वहाँ उनके मत में कुछ न्यूनताए भी हैं। एक तो वे वीभत्स, भयानक, वीर आदि रसों के स्वरूप को ग्रहण नहीं कर सके। दूसरे, वे सभी रसों के लिए किसी सामान्य नियम की खोज नहीं कर सके-जैसा कि भारतीय विद्वानों ने विभाव, अनुभाव, संचारी आदि का निर्धारण किया है-अतः वे एक रस की व्याख्या करते समय दूसरे रस का खंडन

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९४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

कर देते हैं। उदाहरण के लिए वे करुण-रस में रसानुभूति का मूलाधार जिज्ञासा को घोषित करते हैं तो हास्य में सहानुभूति के अभाव को ही उसका मूल कारण मानते हैं। अस्तु, उनका विवेचन पूर्णतः स्पष्ट एवं निर्भ्रान्त नहीं है, फिर भी भाव-सिद्धान्त के विकास की दिशा में उनका प्रयास प्रगति का सूचक है। वस्तुतः उदात्त भाव या शान्त रस सम्बन्धी विवेचन उनकी सर्वोत्तम उपलब्धि है, जो कि न केवल पाश्चात्य दृष्टि से अपितु भारतीय दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है। • भावालम्बनवाद को उपलब्धियाँ भावालम्बनवाद के प्रमुख चिन्तकों की धारणाओं का परिचय पीछे दिया जा चुका है। यहाँ उनकी महत्त्वपूर्ण उपलब्धियों का निर्देश संक्षिप्त एवं समन्वित रूप में प्रस्तुत किया जाता है- • कला की कसौटी उसका भावावेगपूर्ण चित्रण है। (लौंजाइनस) • काव्य का सौन्दर्य उसकी भावात्मकता में निहित है। (सैतायना) · काव्य का मूलाधार तत्व उसमें चित्रित 'भावना' (Sentiment) है।

• काव्य का आस्वादन भावानुभूति की शक्ति के द्वारा होता है। (हचेसन)

(हरमन लात्ज) · काव्य में भावों का प्रस्तुतीकरण इस प्रकार होना चाहिए कि पाठकों को ग्राह्य हो सकें। (लबस्सु) · महाकाव्य में नायक की प्रकृति के अनुसार रौद्र, करुण या कोमल भावों को प्रमुखता दी जानी चाहिए। (लबस्सु) · एक महाकाव्य एवं दूसरे महाकाव्य का प्रमुख अन्तर उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमुख भाव की विशिष्टता का अन्तर है। (लबस्सु) · काव्यानुभूति या रसानुभूति के आधारभूत तत्व ये हैं- हक्सन-(१) स्वार्थ शून्यता (२) अन्तर्भावना। बर्क-(१) जिज्ञासा (२) सहानुभूति। (३) रुचि · करुण रस की अनुभूति आनन्दमयी होती है; इसके कारण ये हैं- बर्क-अनुकृति जन्य आनन्द। संतायना-सहानुभूति, सत्य की प्यास या बौद्धिक तुष्टि, समन्विति, आत्मा की मुक्ति। · रसानुभूति की प्रक्रियाए ये हैं- हरमन लात्ज-(१) इन्द्रिय बोधानुकूलता (२) बौद्धिक उत्कर्ष (३) चेतना द्वारा सौन्दर्यानुभूति।

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भाववलम्बनवादी मत ९५

बर्क-इन्द्रिय, कल्पना और बुद्धि का समन्वित व्यापार। सैंतायना-एन्द्रिय बोध, भावानुभूति, बौद्धिक आनन्द। · रसानुभूति के सहायक तत्व- बर्क-(१) भावोद्दीपन के अनुकूल भाषा-शैली (२) सामाजिक की रुचि। हरमन लात्ज-सामाजिक के संस्कार, स्मृतियाँ, अनुभव एवं उसकी नैतिक आस्थाएं। · काव्य के प्रमुख भाव या रस ये हैं- लबस्सु-करुण, रौद्र, वीर, प्रेम। सैंतायना-प्रेम, करुण, औदात्य (शान्त), हास्य · रसानुभूति सम्बन्धी अन्य तथ्य- लौंजाइन्स-काव्यानुभूति में कवि के साथ पाठक का तादात्म्य। बर्क-कवि के साथ पाठक का तादात्म्य । सैंतायना-चिरन्तन सत्ता से पाठक का तादात्म्य। उपयुक्त निष्कर्षों को और भी संक्षेप में प्रस्तुत करते हुए कहा जा सकता है कि भावावलम्बनवादी विचारकों के अनुसार कला या काव्य के सौन्दर्य का मूल आधार उसकी भावात्मकता में निहित है, काव्य में चित्रित भाव की प्रमुखता के अनुसार ही पाठक काव्यानुभूति या रसानुभूति प्राप्त करता है तथा इस रसानुभूति में काव्यगत भावना, उसकी अभिव्यंजना-शैली के अतिरिक्त सामाजिक की रुचि, जिज्ञासा, सहानुभूति, स्वार्थशून्यता, उसके संस्कारों, स्मृतियों, अनुभवों, नैतिक आस्थाओं का भी न्यूनाधिक योग रहता है। रसानुभूति की मुख्यतः तीन प्रक्रियाएँ ये हैं-एन्द्रियबोध, भावानु- भूति एवं आत्मिक आनन्द की अनुभूति। करुण रस में से भी आनन्दानुभूति होती है तथा काव्य के प्रमुख भाव प्रेम, करुणा, रौद्र, औदात्य आदि हैं। ये निष्कर्ष भारतीय रस-सिद्धान्त एवं आधुनिक मनोविज्ञान की स्थापनाओं के भी बहुत निकट पड़ते हैं।

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावा- भिव्यक्तिवादी मत OC

भावाभिव्यक्तिवादी वर्ग के अन्तर्गत हम उन चिन्तकों को स्थान दे सकते हैं जिन्होंने कला एवं काव्य का लक्ष्य मूलतः भावों की अभिव्यक्ति माना है। इस वर्ग के प्रतिनिधि चिन्तकों के रूप में यहाँ आर० जी० कॉलिंगवुड एवं ई० एफ० कैरिट्ट के विचारों को क्रमशः प्रस्तुत किया जाता है। • आर० जी० कॉलिंगवुड आर० जी० कालिंगवुड (R.G. Collingwood) की महत्त्वपूर्ण कृति "दी प्रिंसिप्लस ऑफ आर्ट" सन् १९३६ ई० में प्रकाशित हुई थी, जिसमें उन्होंने कला के सच्चे स्वरूप का उद्घाटन करते हुए भाव-सिद्धान्त को नई गति प्रदान की। सामान्यतः कारलिंगवुड को करोचे का अनुयायी बताया जाता है, किन्तु यह सत्य नहीं है। यह ठीक है कि कालिंगवुड ने क्रोचे के मत को विकसित करते हुए अपने विचारों का प्रतिपादन किया है, किन्तु उनका विचार-क्षेत्र कोचे के मत की अपेक्षा बहुत व्यापक है। उनमें क्रोचे की सी अस्पष्टता, तर्कशून्यता एवं अव्यावहारिकता के दर्शन नहीं होते। वस्तुतः उन्होंने कोचे के अभिव्यंजना-सिद्धान्त को अपनी चिन्तना के बल पर एक अत्यन्त स्पष्ट, व्यापक एवं नूतन रूप प्रदान किया है, अतः उन्हें कोचे का अनुयायी या व्याख्याता मात्र बताना उचित नहीं है। कला और शिल्प में अन्तर-कालिंगवुड ने अपने कला सम्बन्धी सिद्धान्तों का प्रतिपादन करते समय सर्व प्रथम कला और शिल्प का अन्तर स्पष्ट किया है।' उनके विचारानुसार एक तो शिल्प में किसी पूर्व नियोजित उद्दश्य एवं निश्चित

  1. The Principles of Art ; Page 15-16

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावाभिव्यक्तिवादी मत ९७

सामग्री को लेकर कार्य आरम्भ किया जाता है जबकि कला में ऐसा नहीं होता। कलाकार के सम्मुख रचना से पूर्व कोई निश्चित उद्दश्य एवं साधन नहीं रहते। दूसरे, शिल्प में उसका अंतिम रूप या उसकी अंतिम परिणति की कल्पना पहले से ही शिल्पकार के मन में विद्यमान रहती है जबकि कलाकार कला-सर्जन के अनन्तर ही उसके रूप से अवगत हो पाता है। तीसरे, शिल्पकार की एक कृति का दूसरा शिल्पकार ज्यों का त्यों अनुकरण या उपयोग कर सकता है जबकि कला में ऐसा नहीं हो पाता। चौथे, शिल्पकार जिस सामग्री का प्रयोग करता है वह अलग २ स्थानों या अलग-अलग व्यक्तियों के द्वारा प्रस्तुत होती है, जसे मकान के निर्माण में ईंट कोई पकाता है, चूना कोई तैयार करता है, सीमेंट कोई बनाता है और लोहा कोई तैयार करता है ; इसके विपरीत कलाकार अपनी सारी सामग्री स्वयं ही तैयार करता है, वह इधर-उधर से सामग्री का संचयन नहीं करता। यदि उपयुक्त बातों को ध्यान में रखते हुए हम किसी कला की परीक्षा करें तो यह भली-भाँति ज्ञात हो हो जायगा कि वह शिल्प है या कला। रीति सिद्धान्त का खंडन-कला एवं शिल्प के उपयुक्त भेदक लक्षणों के आधार पर परीक्षा करने पर वे सारी कृतियाँ जो कि शास्त्रीय नियमों या अजित विधि-विधानों के आधार पर निर्मित होती हैं, 'कला' संज्ञा से वंचित हो जाती हैं।२ कालिंगवुड ने रीति-सिद्धान्तों के आधार पर निर्मित सभी कलाओं को 'शिल्प' घोषित करते हुए उनकी घोर भर्त्सना की है। उनकी मान्यता के अनुसार कला सर्जन के लिए शास्त्रीय लक्षणों का ज्ञान एवं विधि-विधानों का अभ्यास अनावश्यक है तथा जो रचना इनके आधार पर निरमित होती है, वह वस्तुतः 'शिल्प से अधिक कुछ नहीं है। पाठशालाओं में अभ्यास के द्वारा शिल्पकार ही गढ़े जा सकते हैं, कलाकारों की उत्पत्ति वहाँ संभव नहीं। अस्तु, रीति-शिक्षा कला के विकास में योग देने की अपेक्षा उसे विकृत अधिक करती है। भाव-सिद्धान्त के प्रचलित रूपों का खंडन-रीति-सिद्धान्त के स्थान पर कालिंगवुड ने भाव-सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की है किन्तु उनका यह सिद्धांत परम्परागत भाव सिद्धान्त से बहुत भिन्न है। उन्होंने परम्परागत भाव सिद्धांत के तीन दूषित रूपों पर प्रकाश डालते हुए बताया कि उसका पहला दूषित रूप वह है जिसके अनुसार कलाकार अपनी रचना को एक ऐसा भावोद्दीपक रूप प्रदान कर देता है जिससे सामाजिक का मनोरंजन मात्र होता है। इस रूप में भावों का उद्दीपन किसी विशेष लक्ष्य से न होकर मात्र उद्दीपन के लिए होता है किन्तु उसका दूसरा रूप वह है जिसमें इस उद्दीपन का लक्ष्य किसी विशिष्ट बौद्धिक प्रवृत्ति को उकसाना

  1. The Principles of Art : Page 26 ३. वही ; पृष्ठ ३२

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९८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

होता है। तीसरा दूषित रूप इससे भी आगे जाता है जो कि सामाजिक का भावात्मक एवं बौद्धिक उद्दीपन करके ही नहीं रह जाता अपितु उसे किसी कार्य- विशेष की ओर भी प्ररित एवं प्रवृत्त करता है। इन तीनों दूषित रूपों के परिणाम स्वरूप मिथ्या-कलाओं का प्रादुर्भाव होता है जिन्हें कार्लिगवुड महोदय छह वर्गों में विभक्त करते हैं -- (१) जहाँ भावोद्दीपन शुद्ध भावोद्दीप्ति के लक्ष्य से होता है, उसे 'मनोरंजन' की संज्ञा दी जा सकती है। (२) जहाँ कला से व्यवहारोपयोगी भावों का उद्दीपन करना लक्ष्य होता है, वहाँ कलात्मकता के स्थान पर 'जादू' (Magic) का अस्तित्व होता है। (३) जो कलाएँ बौद्धिक व्यायाम का साधन प्रस्तुत करती हैं, उन्हें 'पहेली-बुभौवल' कहना चाहिए। (४) ज्ञान-वृद्धि के निमित्त रचित भावो- द्दीपक कलाओं को 'उपदेश' की संज्ञा देना ठीक होगा। (५) कार्य-विशेष की प्रेरणा देने वाली कलाएँ 'प्रचार' कही जा सकती हैं। (६) इसी प्रकार पवित्र आचरण की शिक्षा देने वाली कलाए भी शुद्ध कला न होकर 'संस्कार' मात्र होती हैं। अस्तु, उनके मतानुसार मनोरंजन, जादू, पहेली, उपदेश, प्रचार संस्कार आदि लक्ष्यों के निमित्त रचित रचनाएं भावोद्दीपक होती हुईं भी शुद्ध कला के अन्तर्गत नहीं आतीं। मिथ्या कलाओं की मीमांसा-उपयुक्त्त मिथ्या-कलाओं की मीमांसा करने पर उनमें सर्व प्रथम तो यह दोष अवगत होता है कि वे प्रकृति की प्रतिकृति मात्र होती हैं। प्रतिकृति का तात्पर्य स्थूल रूप में मूल वस्तु का प्रतिबिम्ब प्रस्तुत करना मात्र ही नहीं है अपितु मूल वस्तु से उत्पन्न होने वाले भाव का आभास उत्पन्न करना भी है। उदाहरण के लिए भावों की प्रतिकृति प्रस्तुत करने के लिए ऐसी परिस्थितियों की आयोजना की जाती है जिससे वांछित भाव उत्पन्न हो सकें। इस प्रतिकृति के भी तीन स्तर हैं-(१) बिल्कुल यथा-तथ्य चित्रण (२) किसी विशिष्ट भाव की उत्तेजना के अनुकूल चुने हुए दश्यों का चित्रण और (३) स्थूल प्रतिकृति का सर्वथा प्रभाव, किन्तु फिर भी उत्पत्ति ; जैसे-संगीत में युद्ध का कोई दृश्य न होते हुए भी ऐसी लय का संचार किया जाता है जिससे युद्ध के वातावरण की सी अनुभूति होती है। इस प्रकार यथा तथ्य चित्रण, चुने हुए दृश्यों का चित्रण या अनुरूप-प्रभाव की उत्पत्ति-ये तीनों प्रकार की ही प्रतिकृतियाँ सच्ची कला के प्रतिकूल हैं। मिथ्या कला के पूर्वोक्त रूपों में से प्रथम को छोड़कर शेष सब में दूसरा दोष यह है कि वे किसी पूर्व नियोजित उद्दश्य को सामने रखकर चलती हैं किसी का उद्दश्य इच्छित विचारों का प्रचार करना होता है तो किसी का किसी निश्चित कर्म या आचरण की प्रेरणा देना। जैसा कि प्रारम्भ में बताया गया था, उद्दश्य की पूर्व नियोजना शिल्प की विशेषता है न कि कला की-अतः यह विशेषता भी इन्हें शिल्प-कोटि में रखने योग्य प्रमाणित करती है। तीसरा दोष, यह

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है कि वे कलाएं जो कुछ करने की प्ररणा देती हैं, एक प्रकार से पाठक के भावों को उत्तेजित करके ही रह जाती हैं जबकि सच्ची कला में भावों की उत्तेजना के अनन्तर उनका शमन भी होता है। जिस कला को पीछे 'जादू' की संज्ञा दी गई है वह कला की अपेक्षा विज्ञान अधिक है, यह दूसरी बात यह है कि विज्ञान जिस कार्य को सच्चे ज्ञान से करना चाहता है उसी को जादूगर अज्ञान के द्वारा संपादित करता है। अतः कारलिंगवुड के विचार से भावोद्दीपन पर आधारित उपयुक्त कलाएँ जादू, उपदेश प्रचार, संस्कार आदि की श्रणी में ही रखी जा सकती हैं, सच्ची कला की श्रेणी में उन्हें स्थान देना उचित नहीं। कला और मनोरंजन-मिथ्या कलाओं पर आरोपित यह आक्षेप कि वे किसी निश्चित उद्दश्य को सामने रखकर चलती हैं, उन कलाओं पर आरोपित नहीं होता जो मनोरंजन के लिए रची जाती हैं, क्योंकि उनमें भावों का उत्तेजन भावो- तेजन के लिए ही होता है, कोई अपर उद्दश्य वहाँ नहीं होता। क्या ऐसी स्थिति में उन्हें भी 'मिथ्या-कला' की श्रणी में रखा जायगा ? इसका उत्तर स्वीकारात्मक ही देना होगा क्योंकि कालिंगवुड की मान्यता के अनुसार मनोरंजन और आनन्द में गहरा अन्तर है।" जहाँ सच्ची कला आनन्द प्रदान करती है वहाँ इस प्रकार की कला मनोरंजन मात्र प्रस्तुत करती है। आनन्द नई शक्ति और स्फूर्ति प्रदान करता है जबकि इसके विपरीत मनोरंजन हमारी शक्ति का ह्रास करता है। कोरे मनोरंजन से हमारे जीवन में आलस्य, थकावट, कार्य के प्रति अरुचि, दैनिक समस्याओं के प्रति उदासीनता का संचार होता है जो कि जीवन के लिए घातक है। सच्ची कला से प्राप्त आनन्द में ऐसा नहीं होता। विशुद्ध मनोरंजन को लेकर चलने वाली कलाओं से केवल भावनाओं को ही उद्व लित या उद्दीप्त किया जाता है ; उसमें ऐसे कौशल का प्रयोग किया जाता है कि जिससे सामाजिक उत्तेजित हो जाय। इस प्रकार की कला में ऐसे ही भावों को लक्ष्य बनाया जाता है जो सहज ही स्फुरित हो सकें।4 इस प्रकार के भाव- कामुकता, भय, ईर्ष्या-द्वष आदि ही हैं। यही कारण है कि सस्ती एवं हलकी मनोरंजक कलाओं में इन्हीं भावों को भड़काने का प्रयत्न किया जाता है। सस्ते मनोरंजन की चाह की पूर्ति के लिए हमारे उपन्यासों, नाटकों और फिल्मों में एक और अश्लीलता, नग्नता एवं यौन-व्यापारों का प्रत्यक्ष प्रदर्शन होता है तो दूसरी ओर भय के भाव को उत्तेजित करने के लिऐ भूतों और डाकुओं की कहानियाँ लिखी जा रही हैं। चोरी, डाका, मार-काट आदि का चित्रण भी भय, साहस, ईर्ष्या द्वूष सम्बन्धी भावनाओं को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है। आधुनिक

४. दी प्रिन्सिपल्स आफ् आर्ट ; पृष्ठ ९६ ५. वही पृष्ठ ७९

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१०० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

सभ्यता-पर इस सस्ते मनोरंजन का रंग कितना गहरा चढ़ गया है और उसके परिणाम-स्वरूप हमारी संस्कृति कितनी विकृत हो गई है, इस पर दृष्टिपात करते हुए कालिंगवुड ने आज के समाज को चेतावनी दी है कि यदि वह अपने भावी विनाश से बचना चाहता है तो इस मनोरंजन के खूनी भूत से अपना पिंड छुड़ा ले। संसार के इतिहास में हम देखते हैं कि जब भी कोई जाति इस सस्ते मनोरंजन के फेर में पड़ी है तो उसका पतन हो गया है। यूनान और रोम की सभ्यताओं का पतन उदाहरण स्वरूप देखा जा सकता है। सच्ची कला और भावाभिव्यक्ति-सच्ची कला के स्वरूप पर प्रकाश डालते हुए कालिंगवुड ने बताया है कि उसका लक्ष्य भावों की उद्दीप्ति नहीं अपितु भावों की अभिव्यक्ति होता है। जब कलाकार किसी भाव को व्यक्त करना चाहता है तो वह उस स्थिति में यह नहीं बता सकता कि वह कौनसे भाव को व्यक्त करेगा। वह केवल यही कह पाता है-"मुझे कुछ हो रहा है-पता नहीं क्या !" अपनी इस भावाकुल स्थिति में वह जो कुछ करता है वही उसकी अभिव्यक्ति है-निश्चित ही वह अभिव्यक्ति भाषा के माध्यम से होती है उसके अनन्तर उसका मन हलका हो जाता है। कलाकार की यह भावाव्यक्ति सामाजिक में भी किसी भाव को जगा सकती है, किन्तु कलाकार का यह उद्दश्य नहीं होता अन्यथा उसे सामाजिक की चिन्ता करनी पड़ेगी, उसे ऐसी शिल्प-विधि दूढनी पड़ेगी जो सामाजिक के लिए अनुकूल रहे। उस स्थिति में कलाकार अपनी अभिव्यक्ति के साथ न्याय नहीं कर पायेगा। अतः यही कहना ठीक है कि कलाकार सामाजिक की ओर से निश्चिन्त रह कर ही भावाव्यक्ति करता है। अभिव्यक्ति एक ऐसी क्रिया है जिसकी कोई शिल्प-विधि नहीं होती। अतः सच्ची कला का न तो कोई विशिष्ट उद्दश्य होता है और न ही उसकी कोई खास शिल्प-विधि।

६. वही पृष्ठ ८५ 7. 'Since the artist proper has some-thing to do with emotion, and what he does with it is not to arouse it, what is it that he does ? Nothing could be more entirely common place than to say he expresses them.' -The Principles of Art ; Collingwood ; Page 109 8. "It follows from this that the expression of emotion, simply as expression is not addressed to any particular audience. It is addressed primarily to the speaker himself." -Same ; Page 111 9. ... 'The act of expressing it is therefore an exploration of his own emotions ... expression is an activity of which there can be no technique.' -Same Page 111

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावा भिव्यक्तिवादी मत १०१

भावाभिव्यक्ति और भाव वर्णन में अन्तर-यह तो निश्चित है कि सच्ची कला का सम्बन्ध भी मिथ्या कला की भाँति भावों से होता है किन्तु दोनों में अन्तर यह है कि जहाँ एक में भावों की अभिव्यक्ति होती है वहाँ दूसरी में भावों का वर्णन मात्र होता है। इन दोनों का अन्तर स्पष्ट करते हुए कार्लिंगवुड ने एक उदाहरण दिया है-जब एक व्यक्ति कहता है कि "मैं गुस्से में हूँ" तो अवश्य ही वह भाव की अभिव्यक्ति नहीं, उसका वर्णन कर रहा है। गुस्से की व्यंजना करने वाला व्यक्ति इसके स्थान पर कहेगा-"मैं उसे मार डालूगा, .... " आदि।

बौद्धिक भाव-यह नहीं समझना चाहिए कि कलागत सारे भाव केवल हृदय सम्बन्धी ही होते हैं। बुद्धि से सम्बन्धित भी बहुत से भाव हैं जिनकी व्यंजना कला में सफलतापूर्वक की जा सकती है। बौद्धिक भावों की सत्ता का प्रमाण देते हुए कालिंगवुड ने एक वैज्ञानिक का उदाहरण दिया है जिसने कि स्नान करते समय एकाएक एक नया सिद्धान्त ढूढ़ लिया था तथा जिसके आनन्द में विह्वल होकर यह नग्नावस्था में ही, "मैंने खोज लिया ! मैंने खोज लिया !! " कहता हुआ बाहर निकल भागा। दूसरे, जिस प्रकार भावों की अभिव्यक्ति होती है, वसे ही हमार चिन्तन-प्रक्रिया की भी अभिव्यक्ति होती है जिसमें बौद्धिक भाव मिश्रित होते हैं। बौद्धिक भावों की अभिव्यक्ति के समय हमारी भाषा में प्रतीकात्मकता आ जाती है। इसके अतिरिक्त हमें यह भी न भूलना चाहिए कि कला के कारण जिन भावों की उद्दीप्ति होती है उनमें बौद्धिकता का भी योग रहता है। सच्ची कला में भावों की अभिव्यक्ति केवल आलम्बन को प्रस्तुत करके ही नहीं की जाती, वहाँ आलम्बन को विशेष परिस्थितियों (उद्दीपन) में प्रस्तुत किया जाता है जिनके अभाव में भाव की अभिव्यक्ति सम्भव नहीं। इस परिस्थिति का बोध बुद्धि की सहायता से ही होता है। हमारी अनुभूतियाँ विचारों से सर्वथा मुक्त नहीं रहतीं। अतः विचारवान् कलाकार की अनुभूति में भी कुछ विचार मिश्रित रहते हैं, जो उसकी अभिव्यक्ति के माध्यम से पाठक के हृदय तक संक्रमित हो जाते हैं। दॉते, शैले, इलियट आदि की कविताओं को प्रमाण-स्वरूप देखा जा सकता है। कार्लिंगवुड के विचार से यह बौद्धिकता काव्य से लिए महत्वपूर्ण तत्त्व है। इसके अभाव में काव्य खोखला रहता है। इसीलिए वे एक ओर वैज्ञानिकों ओर इतिहासकारों को परामर्श देते हैं कि वे साहित्यकारों के शिष्य वन कर लेखनी चलाना सीखें तो दूसरी ओर वे कलाकारों से भी अनुरोध करते हैं कि वे विज्ञान की पाठशालाओं में जाकर विषय-वस्तु का विकास करना सीखें अन्यथा वे कोरी शैली के चमत्कार में ही उलभे रहेंगे।" जिस

१०. दी प्रिन्सिपल्स आफ आर्ट ; पृष्ठ २६८ ११. वही पृष्ठ २९९

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१०२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन प्रकार शैली के अभाव में विषय अपरिष्कृत रहता है, वसे ही विषय के अभाव में शैली खोखली रहती है, अतः बिषय और शैली के समन्वय में ही सच्ची कला का अधिवास है। प्रत्यक्षानुभूति और रसानुभूति-लौकिक जीवन की सामान्य भावानुभूति में एवं कलाजन्य भावानुभूति (सौदर्यानुभूति) में क्या अन्तर है-इसका उत्तर देते हुए कोलिंगवुड महोदय ने बताया है कि जहाँ प्रत्यक्षानुभूति वास्तविकता पर आधारित होती है जबकि काव्यानुभूति कल्पना पर आश्रित होती है।१२ इसीलिये जहाँ प्रत्यक्षा- नुभूति ऐन्द्रियकता के स्तर पर होने के कारण अपरिष्कृत होती है वहाँ काव्यानुभूति में संवेदनाओं का संस्कार हो जाता है। इसके अतिरिक्त लौकिक भाव काव्य के माध्यम से अनुभूत होने पर उदात्त एवं सौन्दर्यात्मक बन जाते हैं। ऐसी स्थिति में यदि काव्यात्मक भावों को सामान्य भावों से पृथक करते हुए 'सौन्दर्यत्मिक भाव'

नहीं है। (Aesthetic emotion) के नाम से भी अभिहित किया जाय तो उन्हें कोई आपत्ति प्रत्यक्षानुभूति एवं काव्यानुभूति में दूसरा अन्तर यह है कि जहाँ प्रथम में में हमारी चेतना का संवेदनाओं पर नियन्त्रण नहीं रहता वहाँ दूसरी में ऐसा होता है। तीसरा अन्तर यह है कि काव्यानुभूति में न केवल भावों का उद्दीपन होता है अपितु उनकी अभिव्यक्ति भी होती है। जिस प्रकार काव्य-रचना के समय कवि अपने भावों की अभिव्यक्ति करता है, ठीक उसी प्रकार रंग-मंच पर अभिनय के समय अभिनेता और कला का आस्वादन करते समय पाठक या सामाजिक भी अपने- अपने भावों की अभिव्यक्ति करते हैं। इसी धारणा के आधार पर कारलिंगवुड ने कवि, कलाकार, अभिनेता, पाठक या सामाजिक-इन सभी को काव्यास्वादन एवं भावा- भिव्यक्ति की प्रक्रिया का समान रूप से भागीदार माना है; हाँ, कवि और पाठक में में इतना अन्तर अवश्य है कि जहाँ कवि अपनी भावाभिव्यक्ति में स्वयं समर्थ है वहाँ पाठक ऐसा नहीं है।१ • कालिंगवुड के मत की समीक्षा भारतीय रस सिद्धान्त की दृष्टि से कालिंगवुड की स्थापनाओं पर विचार करने से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि अनेक प्रकार की अतिवादिता के होते हुए भी 12. The Principles of Art ; Page 274 13. "Thus if art is the activity of expressing emotions, the reader is an artist as well as the writer ...... the poet's difference from his audience lies in the fact that, though both do exactly the same thing, namely express the particular emotion in these particular words, the poet is a man who can solve for himself the problem of expressing it, where as the audience can express it only when the poet has shown them how." -same : Page 119.

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावाभिव्यक्तिवादी मत १०३

वे भारतीय धारणाओं के बहुत निकट हैं। यद्यपि उन्होंने प्रारम्भ में भाव-सिद्धान्त के दूषित रूपों का प्रतिपादन करते हुए भावोद्दीपनवाद, भावावलम्बनवाद एवं भाव- संप्रषणवाद का भी खण्डन कर दिया है किन्तु अन्ततः उन्होंने भावाभिव्यक्तिवाद का समर्थन करते हुए भावों की अभिव्यक्ति को ही सच्ची कला माना है। इस दृष्टि से वे भारतीय आचार्यों में से भट्ट लोल्लट के उत्पत्तिवाद, व शंकुक के अनुमितिवाद के विरोधी तथा अभिनवगुप्त के सहयोगी सिद्ध होते हैं। अभिनवगुप्त ने भी भावों की अभिव्यक्ति को ही रसानिष्पत्ति का वास्तविक रूप स्वीकार किया है। अभिनवगुप्त से कालिगवुड की दूसरी समानता यह है कि दोनों ही काव्य में केवल राग-द्वष पर आधारित लौकिक भावों की ही नहीं अपितु 'काव्यार्थों' (अभिनव गुप्त के शब्दों में) या बौद्धिक तत्त्वों (कालिंगवुड के अनुसार) की भी भावात्मक अभिव्यक्ति स्वीकार करते हैं। तीसरे, दोनों ही कवि, कलाकार एवं सामाजिक में भावात्मक तादात्म्य की स्थिति स्वीकार करते हैं। लौकिक भावों एवं काव्यात्मक भावों का अन्तर भी दोनों को ही मान्य है; कालिंगवुड ने उस अन्तर को बताते हुए कल्पना पर अधिक बल दिया है, जबकि अभिनवगुप्त ने साधारणीकरण या निवैयक्तिकता को अधिक महत्त्व दिया। इस दृष्टि से अभिनवगुप्त का मत अधिक स्पष्ट है किन्तु कालिंगवुड ने आधुनिक मनोविज्ञान की शब्दावली में भावाभिव्यक्ति वादक को प्रस्तुत करके उसे अधिक ग्राह्य बना दिया है। अस्तु, उपयुक्त तुलना से स्पष्ट है कि अभिनवगुप्त एवं कारलिंगवुड की आधा- रभूत धारणाए लगभग समान हैं-यहाँ तक कि दोनों को ही 'भावाभिव्यक्तिवादी कह दिया जाय तो अनुचित नहीं होगा; किन्तु दोनों ने उनका विकास भिन्न-भिन्न दिशाओं में किया है-अतः हम उन्हें एक-दूसरे का अनुमोदक एवं पूरक कह दें तो अनुचित न होगा। · ई० एफ० करिट्ट बीसवीं शती के सौन्दर्य-शास्त्रीय विद्वानों में ई० एफ० कैरिट्ट का स्थान महत्त्वपूर्ण हैं। उन्होंने सौंदर्य-शास्त्र सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों की रचना की है जिनमें 'एन इन्ट्रोडक्शन टू 'ईस्थेटिक्स' यहाँ विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इसमें उन्होंने न केवल भाव सिद्धान्त का विभिन्न दृष्टिकोणों से विवेचन एवं विश्लेषण किया है अपितु परिशिष्ट रूप में प्लेटो से लेकर आधुनिक युग तक के लगभग पचास प्रमुख कला-समीक्षकों की भी ऐसी उक्तियाँ उद्धृत की हैं जिनसे प्रमाणित होता है कि सभी युगों के समीक्षक जाने या अनजाने कला और काव्य में भाव तत्त्व की प्रमुखता स्वीकार करते रहे हैं। इसलिए कैरिट्ट महोदय ने कविता में ही नहीं, साहित्य के अन्य अंगों में-जैसे, कहानी, उपन्यास, निबन्ध आदि में- भी भावाभिव्यक्ति के सिद्धान्त को लागू करने की आवश्यकता पर बल दिया है।

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सौन्दर्य की भावपरक व्याख्या-कैरिट्ट मूलतः सौदर्य-शास्त्री रहे हैं, अतः उन्होंने सर्वप्रथम कला-सौंदर्य की भावपरक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए प्रतिपादित किया है कि कलाओं का मूल्य सौन्दर्य उनकी भावाभिव्यक्ति की ही विशेषताओं में है तथा सौन्दर्यानुभूति किसी कृर्ति के माध्यम से प्राप्त होने वाली भावाभिव्यक्ति की अनुभृति है।१ यह बात केवल काव्य पर ही नहीं, मूर्ति, चित्र, संगीत आदि कलाओं पर भी लागू होती है। जब हम किसी संगीत की प्रशंसा करते हैं तो उस समय हम 'करुण रागिनी', 'आहलादक गीत जैसे वाक्यांशों का प्रयोग करते हुए अप्रत्यक्ष में उक्त संगीत में निहित भावतत्त्व की ही सत्ता स्वीकार करते हैं। इतना ही नहीं स्वयं प्रकृति में भी हम जिस सौन्दर्य का साक्षात्कार करते हैं वह भी एक प्रकार से भावाभिव्यंक होता है। गुलाब की अधिखिली कली में हम यौवन के विकास, वसंत की रंगीनी में सहज उल्लास, गरजते हुए तूफान में भय के ही अट्टहास का अनुभव होता है जो उन्हें कला का आकर्षण प्रदान करता है। प्रश्न किया जा सकता है कि प्रकृति में इन भावों की अभिव्यक्ति कौन करता है ? अवश्य ही वहाँ प्राणी-विशेष के भाव नहीं होते, हम अपनी ही प्रकृति, अनुभुति एवं संस्कारों के कारण उनमें भावव्यंजकता का अनुभव करते हैं किन्तु शुष्क हृदय ऐसा नहीं कर पाते उन्हें प्रकृति भी सौन्दर्य- हीन प्रतीत होगी। अतः करिट्ट महोदय के विचार से जीवन-के प्रत्येक क्षेत्र में सौन्दर्य की मूलाधार शक्ति भावाभिव्यंजकता ही है।

भावाभिव्यक्ति सिद्धान्त कुछ आक्षेप-भावाभिव्यक्ति-सिद्धान्त पर आरोपित विभिन्न आक्षेपों का निराकरण करते हुए कैरिट्ट महोदय ने उन्हें मूलतः तीन वर्गों में विभाजित किया है। प्रथम वर्ग में वे आक्षेप आते हैं जिनका आधार नैतिक होता है। इन आक्षेपों को आरोपित करने वाले विद्वानों की मान्यता है कि हमारे अनेक भाव कुत्सित एवं पाशविक होते हैं जिनकी अभिव्यक्ति से कला में निष्कृष्टता आ जाती है। इसके उत्तर में कैरिट्ट महोदय ने कहा है कि यदि वे भाव कुत्सित एवं पाशविक होते हुए भी मानवीय संवेदनाओं से युक्त हैं तो उनका महत्त्व कम नहीं हो सकता। कुत्सित से कुत्सित भाव भी परिस्थिति-विशेष में इतना उचित हो सकता है कि उसके प्रति पाठकों की सहानुभूति जागृत हो जाय। अतः अवश्य ही ऐसी स्थिति में वह भाव सौन्दर्यात्मक माना जायगा ; किन्तु यदि कलाकार ने ऐसे भाव का इस ढंग से चित्रण किया हो कि जहाँ वह अमानवीय एवं अनुचित प्रतीत होता है तो अवश्य ही पाठक का साधारणीकरण उससे नहीं हो सकेगा। अवश्य ही ऐसी परिस्थिति

  1. 'The beauty we ascribe to sensible objects is really their expre- ssiveness of some feeling-of fear, of confidence, of joy in life, of longing for death .... -An introduction to Aesthetics' Page 50 ; By E. F. caritt 2. An introduction to Aesthetics, Page 64.

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में वह अग्राह्य होगा। केवल कुत्सित एवं घृणित भावों की ही बात नहीं है, यदि उत्कृष्ट एवं पवित्र भाव भी अमानवीय एवं अनुचित ढंग से प्रस्तुत किये जाएँ तो वे भी कला की दृष्टि से अस्वीकार्य सिद्ध होंगे। अतः कला-कृति में कोई भी भाव अपने आप में निकृष्ट नहीं है, उसका कलागत औचित्य एवं अनौचित्य ही उसकी उत्कृष्टता या निकृष्टता का आधार होता है। भावाभिव्यक्ति-सिद्धान्त के विपक्ष में दूसरा तर्क यह दिया जाता है कि सभी भावों की अभिव्यक्ति सुन्दर नहीं होती। यह तर्क भी खोखला है। वस्तुतः यह बात वे ही लोग कहते हैं जो सामान्य ऐन्द्रियक अनुभूति या मानसिक उद्वलन मात्र को ही 'भाव' मान लेते हैं ; जबकि कैरिट्ट महोदय ने भाव की स्पष्ट परिभाषा करते हुए बताया है कि 'उतजना भाव मात्र नहीं है, अपितु आलम्बन विशेष के प्रति प्रेरित (उद्बुद्ध) भावना ही भाव है। उदाहरण के लिए, जब कोई हमें पिन चुभाता है तो पिन चुभने से जो पीड़ा होती है वह उत्त जना मात्र है, जबकि पिन चुभाने वाले के प्रति जो रोष उत्पन्न होता है-वह भाव है। अतः हमें भाव सिद्धान्त की विवेचना करते समय उत्तजनाओं और भावों के इस अन्तर को ध्यान में रखकर ही कोई निष्कर्ष प्रस्तुत करना चाहिए। विरोधियों का तीसरा तर्क यह है कि भावों के अतिरिक्त अन्य क्रिया- कलापों या अवस्थाओं की अभिव्यक्ति भी सुन्दर हो सकती है ; अतः भावों पर ही इतना बल देने की क्या आवश्यकता है ? इसके उत्तर में यही कहा जा सकता है कि किसी भी अन्य क्रिया-कलाप के मूल में या तो किसी न किसी भाव की प्रेरणा परिलक्षित होगी अन्यथा उसमें कलात्मक सौंदर्य की प्रतिष्ठा संभव नहीं। कई बार जिन्हें हम बौद्धिक तत्त्व कहते हैं उनके मूल में भी जिज्ञासा, निर्वेद, उत्सुकता आदि की भावात्मक प्रवृतियाँ विद्यमान रहती हैं। भावाभिव्यक्ति का स्पष्टीकरण-भावाभिव्यक्ति का स्पष्टीकरण करते हुए कैरिट्ट महोदय ने बताया है कि सामान्यतः लोग भावों के वर्णन, भावों के चित्रण, भावों के उत्तजन, आदि को भावाभिव्यक्ति से अभिन्न समझने की भूल कर बैठते हैं जबकि इनमें परस्पर सूक्ष्म अन्तर है। उदाहरण के लिए 'आँसूओं' को हम दुःख का चिह्न तो कह सकते हैं किन्तु कोरे आँसुओं के उल्लेख से शोक की अभिव्यक्ति हो गई, ऐसा नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार 'काले कपड़े धारण करना' या 'झंडे को आधा भुका देना' शोक का प्रतीक समझा जाता है, किन्तु यह प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति से भिन्न तत्त्व है। इन प्रतीकों को देखकर, इन्हें जानने वाले बौद्धिक संकेत मात्र ग्रहण कर पाते हैं, अभिव्यक्ति जन्य अनुभूति उन्हें प्राप्त नहीं हो सकती

  1. 'Emotion is not sensation but sentiment directed to an object .. ' -An Introduction to Aesthetics ; same, Page 66

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इसी प्रकार भावोत्त जना और भावाभिव्यक्ति में भी स्पष्ट अन्तर है। किसी व्यक्ति को अस्पताल में लेजाकर उसकी करुणा जाग्रत की जा सकती है या अश्लील चेष्टाओं से उसकी काम-वासना को उद्दीप्त किया जा सकता है। किन्तु क्या इन्हें भावाभिव्यक्ति का नाम दिया जा सकता है ? अतः कैरिट्ट महोदय के विचार से कला का वास्तविक लक्ष्य विशुद्ध भावा- व्यक्ति है-किसी इतर उद्दश्य से वांछित भावों का उत्तजन सच्ची कला का गुण नहीं है। कुछ लोग अपने किसी राजनीतिक, धार्मिक, नैतिक मत के प्रचार के लिए पाठकों की बुद्धि को उत्त जित करने का प्रयास करते हैं। ऐसे लोगों की भर्त्सना करते हुए कैरिट्ट ने लिखा है-यदि कला में प्रतीकों का प्रयोग सौन्दर्य की अल्पता का सूचक है तो अपनी धारणाओं और नीतियों का मिश्रण सौन्दर्य-भावना के साथ दुराचार है-पाप है।" कला के साथ इससे बढ़कर अन्याय कोई और नहीं कि उसे अपने प्रचार का साधन बनाया जाय। भाव-सिद्धान्त और बौद्धिकता-भाव-सिद्धान्त की दृष्टि से कला में बौद्धिकता का क्या स्थान है-इस पर प्रकाश डालते हुए कैरिट्ट महोदय ने कहा है कि वैसे तो बौद्धिकता और भावात्मकता को सवथा एक दूसरी से पृथक नहीं किया जा सकता- अतः काव्य में विचारों की भी अभिव्यक्ति किसी न किसी मात्रा में होती ही है। इतना ही नहीं प्रत्येक साहित्य में अनेक दार्शनिक कवि हुए हैं, जिनकी कविता में विचारों की अभिव्यक्ति प्रमुख रूप में मिलती है। यहाँ यह ध्यान देने की बात है कि हम परस्पर विरोधी विचारों को प्रस्तुत करने वाली दो रचनाओं का भी आस्वादन समान रूप में कर पाते हैं ; प्रश्न है-ऐसा क्यों? इसका स्पष्ट उत्तर यह है कि हमारे काव्यास्वादन के मूलाधार उनमें व्यक्त विचार-विशेष नहीं हैं- अन्यथा हम परस्पर विरोधी विचारों वाली रचनाओं का आस्वादन नहीं कर पाते -अपितु वे भाव हैं जो विचारों के साथ व्यक्त होते हैं। अतः कविता में अच्छे और बुरे-या किसी भी प्रकार के विचारों का समावेश हो सकता है बशर्ते कि वे कवि की अनुभूति से संवलित हों। फिर भी यदि कुछ लोग काव्य का अध्ययन केवल विचारों की उपलब्धि के लिए ही करते हैं, तो समभना चाहिए कि ऐसे लोगों का लक्ष्य सौन्दर्यानुभूति न होकर कुछ और होता है।4 संभवतः प्रचारवादी इस पर आक्षप करेंगे कि कोरे भावों का चित्रण पलायनवाद है किन्तु कैरिट्ट के विचार से एक क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए दूसरे क्षेत्र से पलायन करना ही पड़ता है। जो अपने घर से पलायन करने की क्षमता रखता है वही राष्ट्र की वेदी पर आत्मोत्सर्ग का आदर्श प्रस्तुत कर सकता है-अतः ऐसा पलायन भी कर्तव्य-परायणता का सूचक होगा।

  1. An introduction to Aesthetics ; Page 59 5. Same Page 69

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भावाभिव्यक्ति और कला का सर्जन-पक्ष-कलाकार का लक्ष्य भावाभिव्यक्ति होता है किन्तु इसका यह अर्थ नहीं कि वह आर्थिक लिप्सा, राजनीतिक चेतना, यश-कामना आदि से सर्वथा शून्य होता है। ये सारी प्ररणाए उसके पीछे हो सकती है किन्तु हमें देखना यह है कि काव्य-सर्जन के समय उसकी कलम अतीत के सुख दुःख, विषाद, घृणा आदि की अनुभूतियों से परिचालित हो रही है या नहीं ? यदि उसकी रचना से लगता है कि सचमुच ऐसा है, तो अवश्य ही उसे अपने लक्ष्य में सफल माना जा सकता है।4 'भावाभिव्यक्ति' का यह भी तात्पर्य नहीं है कि कला-सर्जन के समय कलाकार भावों की प्रत्यक्ष अनुभूति से आन्दोलित होता है। ऐसी स्थिति में तो कला का सर्जन संभव ही नहीं है। वस्तुतः प्रत्यक्ष अनुभूति के शान्त हो जाने पर पुनः कल्पना के बल पर उस अनुभूति के साक्षात्कार के आधार पर ही सच्ची कला का सर्जन होता है। इस सम्बन्ध में कैरिट्ट महोदय ने वर्डसवर्थ की उस परिभाषा का समर्थन किया है जिसके अनुसार 'शान्तक्षणों में स्मृत भावनाओं से कविता का जन्म होता है।' अस्तु, कला-सर्जन के लिए कवि में भावों की अनुभूति तो अपेक्षित ही है। साथ में दो गुण और भी चाहिए-एक तो उसकी कल्पना शक्ति पर्याप्त सशक्त होनी चाहिए जिससे कि वह अतीत एवं अप्रत्यक्ष की गहराईयों में उतर कर अपरोक्ष का साक्षात्कार कर सके। दूसरे, उसके पास अरजित शिल्प-विधि होनी चाहिए। कोचे की भाँति कैरिट्टने अजित शिल्प-ज्ञान को उपेक्षणीय नहीं माना है। वस्तुतः कैरिट्ट की मान्यता के अनुसार कल्पना और शिल्प दोनों का ही महत्त्व है; उसके शब्दों में-'शिल्प या माध्यम के अभाव में महान् कल्पना-शील को भी चुप हो जाना पड़ता है तो दूसरी ओर प्रतिभा के अभाव में शिल्पी शुद्ध अनुकृतियाँ-या इससे भी बुरी-भावहीन मौलिक रचनाएँ-प्रस्तुत कर देगा'।" अतः दोनों का सामंजस्य अपेक्षित है। कला का आस्वादन-पक्ष : इम्पैथी (समानुभूति )-जिस प्रकार कला के माध्यम से कलाकार अपनी अनुभूतियों को व्यक्त करता है, वैसे ही सामाजिक कलाकार के भावों को ग्रहण करता हुआ अनुभूति को व्यक्त करता है। इस प्रकार कलाकार की अनुभूति कला के माध्यम से पाठक तक प्रेषित होती है। प्रेषण की इस प्रक्रिया को अधिक स्पष्ट करने के लिए जर्मनी के समानुभूति-संप्रदाय की भी चर्चा की गई है। इस संप्रदाय के अनुसंधान-कर्त्ताओं ने सिद्ध किया है कि इम्पैथी (empathy) या समानुभूति ही वह तत्त्व है जिसके कारण हम कलागत विषय के साथ तादात्म्य

  1. Same Page 60 7. An introduction to Aesthetics, page 60.

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१०८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन स्थापित करते हैं। कला का आस्वादन करते समय कलागत पात्रों के भावों एवं क्रिया-कलापों में हम अपने ही भावों एवं क्रिया-कलापों का प्रतिबिम्ब देखने लगते हैं जिससे हम अपनी पृथक सत्ता के अस्तित्व को भूल जाते हैं। किसी अन्य के क्रिया- कलापों के साथ हमारा तादात्म्य कैसे सम्भव है ? इस शंका का निराकरण करते हुए कहा गया है कि कई बार हम अपने अतीत के क्रिया-कलापों की अनुभूति वर्तमान में प्राप्त करने लगते हैं-अतीत कालीन दृश्यों के चिन्तन या स्मरण में इस तरह लीन हो जाते हैं कि प्रत्यक्ष वर्तमान को भूल जाते हैं। अतः यदि हम वर्तमान में रहते हुए भी अतीत से तादात्म्य स्थापित कर सकते हैं तो पर-प्रत्यक्ष को स्व-प्रत्यक्ष करना भी कोई कठिन नहीं है।" इम्पैथी या समानुभूति का एक दूसरा रूप और भी है, जिसे हम अपने भावों का आरोपण (projection) कह सकते हैं। दौड़ते हुए हरिण के क्रिया-कलापों पर हम अपने बचपन की चंचलता का आरोपण करके उनका आस्वादन कर सकते हैं। प्रकृति के सौन्दर्य का आस्वादन करते समय हम प्रायः ऐसा ही करते हैं। इस प्रकार तादात्म्य और भावारोपण दोनों ही किसी सीमा तक सौन्दर्यानुभूति की प्रत्रिया पर प्रकाश डालते हैं किन्तु इनसे समस्या का अन्तिम समाधान नहीं हो पाता। सुखानुभूतियों में तो ये दोनों बातें ठीक हैं किन्तु शोकानुभूतियों की मीमांसा में इनसे काम नहीं चलता। तादात्म्य एवं भावारोपण सिद्धान्त के अनुसार तो त्रासदी में भी शोक की ही अनुभूति होनी चाहिए जबकि वास्तव में उससे आनन्द की अनुभूति स्वीकार की जाती है। इस प्रश्न का उत्तर देते समय इम्पथी संप्रदाय के प्रवर्त्तक लिप्पस महोदय भी बौखला गये हैं। कैरिट्ट महोदय ने त्रासदी को ध्यान में रखते हुए तादात्म्य की अपेक्षा भावाभिव्यक्ति सिद्धान्त को अधिक महत्त्वपूर्ण बताया है। अरस्तू, क्रोचे, फ्रायड आदि ने-विभिन्न विचार-धाराओं के अनुयायी होते हुए भी काव्य जन्य आनन्द का मूल भावाभिव्यक्ति को ही स्वीकार किया है-यह दूसरी बात है कि उनकी भावाभिव्यक्ति की व्याख्या में परस्पर अन्तर है। अरस्तू ने भावाभिव्यक्ति को विरेचन के तुल्य मानते हुए शोक, भय आदि की ही अभिव्यक्ति पर अधिक बल दिया था तो कोचे ने सहजानुभूति (intuition) की अभिव्यक्ति को ही सर्वाधिक महत्त्व दिया। इसके विपरीत फ्रायड के अनुयायी केवल अवचेतन में दबी हुए कुठित वासनाओं की अभिव्यक्ति को ही सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। इन सब मतों के सार रूप में कहा जा सकता है कि कला के द्वारा हम अपनी मूल प्रकृति का साक्षात्कार करते हुए उसके अधिक निकट आते हैं। उसके माध्यम से हमारी वैयक्तिकता-जिसमें व्यक्ति की अनुभूतियाँ, उसकी शिक्षा, उसके सामाजिक एवं सांस्कृतिक संस्कार आदि समन्वित होते हैं-की अभिव्यक्ति होती है।

  1. An Introduction to Aesthetics'; page 79-80

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पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावाभिव्यक्तिवादी मत १०९

भावाभिव्यक्ति की स्वतन्त्र रूप से विवेचना करते हुए कैरिट्ट ने 'सहानुभूति' की भी व्याख्या की है। 'सहानुभूति' शब्द का प्रचलन सामान्यतः दो अर्थों में होता है-एक अपने भावों को किसी अन्य पर आरोपित करना तथा दूसरे, किसी अन्य के भावों को स्वयं अनुभव करना। दूसरे के भावों को स्वयं अनुभव करने की प्रक्रिया कल्पना-शक्ति के सहयोग से ही सम्पन्न होती है; अतः इस दृष्टि से सहानुभूति का दूसरा रूप कल्पना का ही पर्याय सिद्ध होता है तथा यही रूप सौन्दर्यानुभूति का मूलाधार है। सहानुभूति के पूर्वोक्त पहले रूप को कैरिट्ट महोदय सौन्दर्यानुभूति के अनुकूल नहीं मानते जबकि उनके विचारानुसार सहानुभूति के दूसरे रूप (कल्पना) की आवश्यकता कलाकार और सामाजिक-दोनों को रहती है। वैसे तो सामान्यतः कोई भी व्यक्ति कल्पना-शक्ति से पूर्णतः वंचित नहीं होता किन्तु प्रत्येक व्यक्ति में उसकी मात्रा समान नहीं होती। कलाकार के लिए कल्पना की अधिक मात्रा अपेक्षित है जिससे कि वह अतीत एवं परोक्ष का बिम्ब-ग्रहण करने में सफल हो सके। दूसरी ओर पाठक के लिए भी कल्पना आवश्यक है। अस्तु, कला के सर्जन एवं आस्वादन-दोनों में ही सहानुभूति एवं कल्पना का योग अपेक्षित है। • कैरिट्ट के सिद्धान्तों की समीक्षा कला में भावाभिव्यक्ति को सर्वोपरि महत्त्व प्रदान करते हुए कैरिट्ट महोदय ने अप्रत्यक्ष में अभिनवगुप्त के भावाभिव्यक्ति सिद्धान्त को स्वतन्त्र एवं नूतन रूप में प्रस्तुत किया है। कला में अन्य तत्त्वों का भी अस्तित्त्व उन्होंने स्वीकार किया है किन्तु भावाभिव्यक्ति को उन्होंने कला का आधार सिद्ध किया है। उनका यह दृष्टिकोण भारतीय रस सिद्धान्त के सर्वथा अनुकूल है। कला के आस्वादन-पक्ष की मीमांसा करते हुए उन्होंने 'इम्पैथी' (समानुभूति) की प्रक्रिया को स्वीकार किया है, जिसे रस सिद्धान्त की शब्दावली में साधारणीकरण के द्वारा स्थापित होने वाले 'तादात्म्य' का पर्याय कहा जा सकता है। वस्तुतः कैरिट्ट ने साधारणीकरण के व्यापार को दार्शनिकता एवं आध्यात्मिकता के स्थान पर मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रतिष्ठित किया है। इस प्रकार कैरिट्ट की आधारभूत धारणाएँ भारतीय रस सिद्धान्त के अनुकूल हैं, साथ ही उन्होंने कुछ ऐसे विषयों की भी विवेचना की है जिनके आधार पर रससिद्धान्त को व्यापक रूप प्रदान किया जा सकता है। उदाहरण के लिए काव्य में भावों के अतिरिक्त बौद्धिक तत्त्वों का क्या स्थान है, काव्य के शिल्पपक्ष का उसके भाव पक्ष से क्या सम्बन्ध है, काव्य की सर्जन-प्रक्रिया में रसानुभूति का क्या योग है-आदि प्रश्नों के सम्बन्ध में परम्परागत रस सिद्धान्त मौन है। कैरिट्ट ने इन प्रश्नों का उत्तर देकर रस-प्रक्रिया के विभिन्न अंगों एवं पक्षों को स्पष्ट किया है, जिसके प्रकाश में भारतीय रस सिद्धान्त की भी अनेक ग्रन्थियों को सुलझाया जा सकता है।

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११० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

निष्कर्ष-अन्त में हम कार्लिंगवुड एवं कैरिट्ट के आधार पर भावाभिव्यक्ति वाद की प्रमुख स्थापनाओं को यहाँ संक्षेप में प्रस्तुत करते हैं- (क) कला का मूलाधार भावाभिव्यक्ति है; जिस कृति में कृतिकार के द्वारा भावों की अभिव्यक्ति नहीं होती, वह कृति 'कला' न होकर 'शिल्प' या और कुछ होती है। (ख) कला में भाव के अतिरिक्त बुद्धि तत्त्व (बौद्धिकता) के लिए भी स्थान है, पर उसमें बौद्धिक तत्त्व भी भावनाओं के अंग बन कर ही व्यक्त हो पाते हैं। (ग) 'भावाभिव्यक्ति' 'भावोद्दीपन' एवं 'भावों के वर्णन' इनमें परस्पर सूक्ष्म अन्तर है। वह रचना जो केवल भावों का वर्णन या उद्दीपन ही करती है-भावाभिव्यक्ति नहीं, वह भी सच्ची कला की कोटि में नहीं आती। (घ) भावाभिव्यक्तिवाद शैली का बहिष्कार नहीं करता किन्तु उसमें सहजता अपेक्षित है। (ड) प्रत्यक्षानुभूति एवं कलानुभूति (रसानुभूति) में वास्तविकता और कल्पना का अन्तर है। (च) कला के माध्यम से कलाकार एवं सामाजिक दोनों की ही भावाभि- व्यक्ति होती है। (छ) कला का चरम लक्ष्य भी भवाभिव्यक्तिजन्य आनन्द है, ; नीति, शिक्षा, प्रचार आदि नहीं। (ज) रसानुभूति (कलानुभूति) की प्रक्रिया 'इम्पथी' (समानुभूति), सहानुभूति एवं कल्पना शक्ति के द्वारा सम्पन्न होती है। यह 'इम्पथी' भारतीय दृष्टि से साधारणीकरण एवं तादात्म्य स्थापित करने वाली शक्ति कही जा सकती है।