Books / Rasa Siddhanta Ka Punar Vivechan Ganapati Chandra Gupta

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५० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

शक्ति को ही सहजानुभूति का नाम दिया है। अभिनवगुप्त द्वारा उल्लिखित संस्कार- युक्त वासना पूर्णतः सहजप्रवृत्ति' अचेतनमन' एवं 'सहजानुभूति' की पर्याय न होती हुई भी इतनी व्यापक है कि उसमें इन तीनों का समावेश हो जाता है। वस्तुतः इस शक्ति को हम नाम जो चाहे दे, यह एक बहुमान्य विचार है कि सामाजिक के भावोद्वलन का मूल कारण केवल विभावपक्ष का प्रभाव ही नहीं है अपितु उसकी निजी अन्तर्निहित मानसिक शक्ति भी है, जिसे अभिनवगुप्त ने 'वासना' का नाम दिया है। वस्तुतः काव्यगत विभाव तो इस वासना शक्ति को उद्बोधित करने का ही कार्य करते हैं-रसास्वादन का वास्तविक कार्य उनके द्वारा नहीं अपितु स्वयं इस वासना-शक्ति की ही प्रक्रियाओं द्वारा संपादित होता है।

वासनाओं या सहज प्रवृत्तियों की अभिव्यक्ति हमें कितना तोष एवं आनन्द प्रदान करती है-यह व्यावहारिक जीवन में भी देखा जा सकता है। नर-नारी के शारीरिक मिलन में काम वासना की अभिव्यक्ति होती है; शत्र को दण्ड देने से द्वष की वृत्ति अभिव्यक्ति होकर सन्तुष्ट होती है; बच्चे को प्यार करने से हमारी संतत्ति पालन की वृत्ति व्यक्त एवं संतुष्ट होती है। इस प्रकार हम देखते हैं कि विभिन्न वासनाओं या सहज वृत्तियों की अभिव्यक्ति व्यावहारिक जीवन में भी संतोष प्रदान करती है; किन्तु कला के माध्यम से जो अभिव्यक्ति होती है वह तो और भी उच्चकोटि तथा विशिष्ट प्रकार की होती है-अतः उससे प्राप्त होने वाला आनन्द तो विलक्षण प्रकार का होता है। (ग) परिस्थितिगत आधार-रसानुभूति के पूर्वोक्त दो आधारों-कलात्मक सौन्दर्य एवं सामाजिक की वासना-को संयुक्त करने वाली स्थिति ही परिस्थिति है। काव्यास्वादन या रसानुभूति की प्रक्रिया में इस परिस्थिति की अनुकूलता या प्रतिकूलता का भी कम योग नहीं है। सामान्यतः यदि परिस्थिति अनुकूल हो तो सामाजिक को काव्य-सौन्दर्य के आस्वादन से रसानुभूति प्राप्त होगी ही, पर यदि परिस्थिति प्रतिकूल हुई तो उसमें विघ्न या अवरोध उत्पन्न हो सकता है इसी परिस्थितिजन्य अवरोध को आचार्य अभिनवगुप्त ने सात प्रकार के विध्नों के रूप में चर्चित किया है जो ये हैं-

(१) अर्थ-बोध की असमर्थता-जब पाठक या दर्शक निजी अयोग्यता के कारण प्रस्तुत विषय के अर्थ-बोध में ही अक्षम रहे तो उस स्थिति में सामाजिक को रसानुभूति प्राप्त नहीं हो सकती। (२-३) देश-काल से प्रमाता की अविच्छिन्नता"-यदि सामाजिक कला

१०. प्रतिपत्तावयोग्यता सम्भावनाविरहः (अभिनव-भारती ६/३१); पृ० ४७४) ११. स्वगत-परगतत्व-नियमेन देशकाल विशेषावेशः (वही)

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स्वादन के समय निजी देश-काल अर्थात् परिस्थितियों के प्रभाव से मुक्त नहीं हो पाता है तो इससे भी रसानुभूति में विघ्न उत्पन्न हो जाना स्वाभाविक है। (४) वैयक्तिक सुख-दुःख का प्रभाव१२-यदि पाठक या दर्शक अपने सुख-दुःख से अत्यधिक अभिभूत हो तो उसकी भी प्रतिपाद्य वस्तु में प्रवृत्ति एवं तल्लीनता नहीं हो पाती जिसके अभाव में रसानुभूति सम्भव नहीं। (५) प्रतीति साधन की दुर्बलता या अस्पष्टता"-जिस माध्यम से वस्तु प्रदशित की जा रही हो, वहो यदि अशक्त या अस्पष्ट हो तो रसानुभूति में विघ्न उपस्थित हो जाना स्वाभाविक है। (६) प्रधान की अप्रधानता-काव्य या नाटक में प्रधान पात्र, प्रधानभाव या प्रधान समस्या के स्थान पर यदि अप्रधान को प्रमुखता दे दी जाय तो उससे भी उसका प्रभाव न्यून हो जाता है। (७) प्रदर्शन को संशयात्मकता"-नाट्य-प्रदर्शन में विभावादिक तत्त्वों का प्रदर्शन संशयात्मक अर्थात् निश्चित रूप में न हो तो वहाँ भी रस-विध्न उपस्थित हो जाता है। उपयुक्त विघ्नों या बाधाओं को हम मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-(१) पाठक या सामाजिक से सम्बन्धित विघ्न या दोष-जैसे अर्थबोध की अक्षमता, देशकाल के प्रभाव से आबद्ध होना तथा निजी सुख-दुःख से अभिभूत होना। (२) विषयवस्तुगत विघ्न या दोष, जैसे-प्रस्तुतीकरण की अशक्तता, अप्रधान की प्रधानता तथा वस्तु की संशयात्मकता। इंस प्रकार संक्षेप में कहा जा सकता है कि आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार यदि पाठक या दर्शक विषय-वस्तु के बोध में असमर्थ रहे या निजी परिस्थितियों या मनः स्थितियों के प्रभाव से अभिभूत हो अथवा काव्य वस्तु का प्रस्तुतीकरण प्रभाव शून्य, असंतुलित, अस्पष्ट या अस्वाभा- विक रूप में हो तो रसानुभूति की प्रक्रिया में अवरोध उपस्थित हो जाता है। अस्तु, रसानुभूति के लिए सामाजिक एवं कलाकृत्ति का उपयुक्त्त दोषों से मुक्त होना आवश्यक है। • रसानुभूति की प्रक्रिया आचार्य अभिनव गुप्त ने रसान्भूति की प्रक्रिया का भी सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए उसके अनेक सोपानों का उद्घाटन किया है जो मुख्यतः ये हैं-(१) अर्थ का

१२. निज सुख-दुःखादि विवशी भाबः (वही) १३. प्रतीत्युपाय-वैकल्य-स्फुटत्वाभाव : (वही) १४. अप्रधानता (वही) १५. संशय योग: (वही)

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प्रकाशन (२) सौन्दर्यान्भूति (३) साधारणीकरण व तादात्म्य (४) अभिव्यक्ति। इनका परिचय संक्षेप में दिया जाता है। (क) अर्थ का प्रकाशन-काव्य या नाटक के आस्वादन की सर्वप्रथम प्रक्रिया अर्थ का प्रकाशन है" क्योंकि आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार मूलतः काव्यार्थों का भावन ही रस है। इस भावन के पूर्व अर्थ का प्रकाशन अपेक्षित है। काव्य एवं नाटक में अर्थ-प्रकाशन व्यावहारिक क्षेत्रों में होने वाले अर्थ-प्रकाशन से भिन्न प्रकार का होता है। यह भिन्नता दो प्रकार की बताई गई है-(१) साक्षात्कारात्मक प्रतीति (२) मन की एकाग्रताजन्य अनुभूति ।१ यद्यपि काव्य या नाटक की वस्तु हमारे नेत्रों के सम्मुख उपस्थित नहीं होती किन्तु फिर भी काव्य की अभिव्यंजना शैली या नाटक के अभिनय में ऐसी क्षमता होती है जिससे हम अप्रत्यक्ष घटनाओं का भी प्रत्यक्षीकरण कर पाते हैं। यह ठीक है कि यह प्रत्यक्षीकरण वास्तविक ऐतिहासिक घटनाओं का नहीं होता फिर भी वह उसके अनुरूप ही होता है। इसीलिए काव्य या नाटक के माध्यम से प्राप्त अर्थ-बोध को साक्षात्कारात्मक प्रतीति कहा गया है। इसी प्रक्रिया को आधुनिक मनोविज्ञान की शब्दावली में प्रत्यक्षीकरण (Perception) की प्रक्रिया कह सकते हैं। अप्रत्यक्षीकरण के प्रभाव से विषय वस्तु में जिज्ञासा, रुचि एवं तल्लीनता उत्पन्न होने लगती है जिसके कारण पाठक को विषयवस्तु का केवल ज्ञान या बोध ही नहीं अपितु अनुभूति भी प्राप्त होने लगती-है यह अर्थ-प्रकाशन की दूसरी स्थिति है। (ख) सौन्दर्यात्मक अनुभूति-काव्य और नाटक में प्रत्यक्षीकरण एवं तल्लीनता जन्य अर्थ-बोध के अनन्तर पाठक या दर्शक की विषयवस्तु में रुचि उत्पन्न हो जाती है जो क्रमशः अधिकाधिक गंभीर होती चलती है। काव्य के विभिन्न शलीगत साधनों के कारण तथा नाटक में अभिनय की चारुता व नृत्यगीत आदि के कारण वस्तु के सौन्दर्य एवं आकर्षण में उत्तरोत्तर अभिवृद्धि होती रहती है।" इसी को सौन्दर्यात्मक अनुभूति की प्रक्रिया कह सकते है। (ग) साधारणीकरण एवं तादात्म्य-रसास्वाद की अगली स्थिति साधारणी- करण एवं तादात्म्य की है। इस स्थिति में काव्य या नाटक के नायक की प्रमुख भावना या चित्तवृत्ति (स्थायीभाव) के साथ पाठक या सामाजिक की अनुभूति का ऐकीकरण होने लगता है; जिससे काव्यगत विभाव आलम्बन, उद्दीपन आदि का

१६. अभिनव भारती ६/१५; पृ० ४२८ १७. वही १८. " .... गुणालंकार गीतातोद्यादि सम्यक् सुन्दरीभूत" अ०भा० ६/१६, पृ० ४२८

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सम्बन्ध केवल काव्यगत नायक से ही नहीं रहता अपितु सर्वसाधारण से हो जाता है, नायक द्वारा व्यक्तभाव किसी एक व्यक्ति का भाव नहीं रहता अपितु वह सभी पाठकों या सामाजिकों की अनुभूति का विषय हो जाता है, उसके साथ सबकी सहानु- भूति स्थापित हो जाती है। नायक के भावों एवं विचारों का सामाजीकरण ही दूसरे शब्दों में साधारणीकरण की प्रक्रिया है तो साथ ही वह पाठक या सामाजिक की दृष्टि से तादात्म्य की प्रक्रिया है। वस्तुतः साधारणीकरण एवं तादात्म्य-दो भिन्न क्रिया व्यापार नहीं हैं अपितु एक ही कार्य के दो पक्ष हैं। जहाँ वस्तु की दृष्टि से वह साधारणीकरण है वहाँ पाठक या सामाजिक की दृष्टि से वह तादात्म्य की प्रक्रिया है। उदाहरण के लिए-'शकुन्तला' नाटक में यह अनुभूति की शकुन्तला दुष्यन्त की प्रेयसी है (वह हमारी प्रेयसी नहीं है)-यह साधारणीकरण से पूर्व की-व्यक्तिगत सीमाओं के बन्धन से युक्त-स्थिति है। जब पाठक या दर्शक यह अनुभव करने लगते हैं कि शकुन्तला केवल दुष्यन्त की ही प्रेयसी नहीं है वह सामान्यतः सभी के प्रणय भाव की सामान्य आलम्बन है, तो यह आलम्बन एवं तत्सम्बन्धी भाव के साधारणीकरण का सूचक है ; दूसरी ओर यह स्थिति इस तथ्य की भी सूचक है कि सामाजिक का नायक के साथ तादात्म्य हो गया है। संक्षेप में, काव्यगत भाव एवं उसके विचारों का साधारणीकरण तथा उसके आश्रय के साथ तादात्म्य-ये दोनों स्थितियाँ एक ही स्थिति के दो पक्ष हैं। साधारणीकरण एवं तादात्म्य की स्थिति में हम पूर्णतः काव्य-वस्तु में लीन हो जाते हैं, उस समय हम व्यक्तिगत परिस्थितियों (देश-काल सीमाओं) के बन्धन से तथा काव्यवस्तु की अयथार्थता एवं परकीयता के विचार से सर्वथा मुक्त हो जाते हैं। (घ) अभिव्यक्ति-रसास्वादन की अगली स्थिति अभिव्यक्ति की है। काव्य- वस्तु के संपर्क एवं संप्रेषण के कारण पाठक की अपनी वासनायें या सहज वृत्तियाँ जागृत या उद्बुद्ध हो जाती हैं। साधारणीकरण एवं तादात्म्य की स्थिति में पाठक की उद्दीप्त वासनाएं भावात्मक रूप में परिणत होकर काव्य-वस्तु के साथ सुसम्बद्ध हो जाती है। वस्तुतः साधारणीकरण की स्थिति में काव्यगत विभाव के सम्बन्ध से हमारी अपनी ही वासनाएं' भावरूप में प्रस्फुटित होती हैं। लौकिक जीवन में हम अपने-पराये के भाव से इस तरह बँधे रहते हैं कि किसी आलम्बन को प्रत्यक्ष रूप में पाकर भी हम उद्वलित नहीं होते और यदि उद्वलित होते हैं भी तो वहाँ निजी हानि-लाभ की चिन्ताओं व विचारों के कारण वह निर्विघ्न स्थिति प्राप्त नहीं कर पाते जो कि काव्यास्वादन के समय प्राप्त होती है। वस्तुतः वासनाओं के उद्वलन एवं अभिव्यक्ति के लौकिक अनुभव एवं काव्यजन्य अनुभव में परिस्थितियों एवं प्रक्रियाओं का सूक्ष्म अन्तर रहता है जिसके कारण दोनों के स्वाद में भी अन्तर होना स्वाभाविक है।

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रसास्वादन की चरम स्थिति में हम (पाठक) काव्य-वस्तु के माध्यम से- काव्यगत नायक की अनुभूतियों की अभिव्यक्ति के रूप में हम वस्तुतः अपनी ही तत्सम्बन्धी वासना का भावात्मक उद्वलन एवं अभिव्यंजन करते हैं। यही अभि- व्यक्ति रसानुभूति की चरम स्थिति हैं। इस प्रकार आचार्य अभिनव गुप्त ने रसानुभूति की विभिन्न प्रक्रियाओं व स्थितियों का सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए इस नये तत्त्व का अनुसंधान किया कि काव्यानुभूत्ति (रसानुभूति) की मूलाधार तो पाठक की अपनी वासनाएँ ही हैं, काव्यसामग्री तो उसके उद्दीपन, उद्वलन, एवं अभिव्यंजन की साधन या माध्यम मात्र है। हाँ, इतना अवश्य है कि काव्य, नाटक या कला के माध्यम से ही वह निर्विघ्न प्रतीति, एवं पूर्ण विश्रान्तिपूर्ण अनुभूति प्राप्त हो सकती है जिसे रसनीय या चम त्कारपूर्ण कहा जाता है ; अन्य क्षेत्रों में उसकी संभावना नहीं है।

• आचार्य अभिनवगुप्त का योगदान

रस-सिद्धान्त के स्पष्टीकरण एवं विकास में आचार्य अभिनवगुप्त का योग- दान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। उन्होंने एक ओर तो रस को 'काव्यार्थ का भावन' बता- कर काव्य के अर्थ पक्ष या बौद्धिक पक्ष को भी सम्यक् महत्त्व प्रदान किया तो दूसरी ओर रस को काव्य या नाटक का एक अंग न मानकर उसे सम्पूर्ण रचना में व्याप्त सर्वोपरि तत्त्व सिद्ध किया। स्थायीभाव और रस के अन्तर को भी जितनी सूक्ष्मता से आचार्य अभिनवगुप्त ने स्पष्ट किया, उतना उससे पूर्व नहीं हो पाया था। रसा- नुभूति में काव्य के शैली पक्ष-गुण अलंकार आदि के भी महत्त्व को स्वीकार करके उन्होंने काव्य-वस्तु एव शैली में समन्वय स्थापित करने का प्रयास किया। रसानुभूति के मूल आधार के रूप में उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण खोज है-सहृदय की वासनाओं के उद्वलन एवं अभिव्यंजन सम्बन्धी विचार। साथ ही रसानुभूति के बाधक तत्त्वों के रूप में उसके सात प्रकार के विघ्नों की स्थापना भी अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।

इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य अभिनव गुप्त ने रस।सिद्धान्त के विभिन्न उपेक्षित पक्षों, अंगों व तत्त्वों का उद्घाटन करके उसे एक अत्यन्त व्यापक स्वरूप प्रदान किया और साथ ही रसास्वादन की प्रक्रिया के साधक एवं बाधक तत्त्वों की गवेषणा करते हुए उसे मनोवैज्ञानिक आधार प्रदान किया। यह दुर्भाग्य की बात है कि आचार्य अभिनवगुप्त के द्वारा उद्घाटित अनेक नये तत्त्वों को परवर्ती आचार्यों ने अपेक्षित महत्त्व नहीं दिया। अभिनवगुप्त द्वारा विवेचित साधारणीकरण एवं अभि- व्यक्तिवाद की ही चर्चा परवर्ती आचार्यों ने अधिक की-उनके द्वारा निरूपित अन्य

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पक्ष जैसे रसास्वाद के विघ्न, रसानुभूति में अलंकारादि का योगदान, आदि की उन्होंने उपेक्षा करदी। वस्तुतः रससिद्धान्त को जो व्यापकता एवं गंम्भीरता आचार्य अभि- नवगुप्त ने प्रदान की थी वह परवर्ती युग के आचार्यो द्वारा ग्राह्य नहीं हो सकी। कदाचित् इसका कारण यही है कि परवर्ती आचार्यों में उस व्यापक दृष्टि एवं सूक्ष्म चिन्तना का अभाव था जो कि आचार्य अभिनवगुप्त की नूतन स्थापनाओं को ग्रहण करने के लिए अपेक्षित थी। पर इसके लिए अभिनवगुप्त को दोष नहीं दिया जा सकता।

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प्रभिनव गुप्त-परवर्ती युग में रस- सिद्धान्त का विकास

आचार्य अभिनव गुप्त-परवर्ती युग (११ वीं-शती के उत्तराद्ध से अब तक) को रस-सिद्धान्त के विकास-क्रम की दृष्टि से दो काल-खंडों में विभक्त किया जा सकता है-(१) मध्यवर्ती युग (११ वीं शती के उत्तराद्ध' से १८५७ ई० तक) और (२) आधुनिक युग (१८५८ ई० से अब तक)। भारतीय संस्कृति एवं साहित्य के इतिहास में भी हम आधुनिक युग का प्रवत्तंन सन् १८५७ ई० की राष्ट्रीयक्रान्ति एवं कम्पनी के शासन की समाप्ति से मानते हैं - अतः यहाँ भी उसे इसी समय से स्वोकार किया जाय तो अनुचित न होगा। दोनों काल-खंडों के रस-सैद्धान्तिक चिन्तन का विवरण यहाँ क्रमशः प्रस्तुत किया जाता है।

· मध्यवर्ती युग (११ वीं शती मध्य से १८५७ ई० तक)- ग्यारहवों शती से लेकर उन्नीसवीं शती के मध्य तक का युग भारतीय इति- हास में मुस्लिम आक्रमणकारियों के आगमन, मुस्लिम साम्राज्य की स्थापना एवं उस के पतन का युग था। मुस्लिम आक्रमणकारियों एवं मुस्लिम शासकों ने न केवल हिन्दू राज्य की परंपराओं को समाप्त किया अपितु प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष हिन्दू धर्म, हिन्दू संस्कृति एवं हिन्दू शिक्षा-केन्द्रों को भी क्षति पहुँचाने का प्रयास किया। परिणाम- स्वरूप संस्कृत के अध्ययन-अध्यापन की परम्परागत व्यवस्था, काव्य-शास्त्रीय चिन्तन की परम्परा एवं मौलिक चिन्तन-मनन की परिपाटी को गहरा धक्का लगा। पूर्ववर्ती युग में संस्कृत के आचार्य हिन्दू नरेशों के आश्रय में निश्चिन्तता पूर्वक अध्ययन- अध्यापन एवं चिन्तन-मनन में लगे रहते थे जबकि मुस्लिम साम्राज्य में संस्कृत का स्थान अरब-फारसी ने ग्रहण कर लिया। इसके अतिरिक्त अनेक मुस्लिम शासकों की कट्टर सांप्रदायिकता के कारण हिन्दू धर्म के लिए बड़ा संकट उपस्थित हो गया।

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ऐसी स्थिति में हमारे चिन्तकों की चिन्तना का केन्द्र काव्य-शास्त्र के स्थान पर धर्म और दर्शन हो गया। यही कारण हैं कि जहाँ ग्यारहयों शती से लेकर सत्रहवीं शती तक काव्य-शास्त्र के क्षेत्र में नये सिद्धान्तों एवं नूतन संप्रदायों की स्थापना का कोई प्रयास नहीं मिलता, वहाँ धर्म और दर्शन के क्षेत्र में इसी युग में अनेक नूतन संप्रदायों एवं सिद्धान्तों का स्थापना हुई। अस्तु, इस युग में काव्य-शास्त्रकारों का लक्ष्य सामान्यतः परम्परागत सिद्धान्तों के ही अध्ययन, स्पष्टीकरण एवं समन्वय का ही रहा, नव चिन्तन की ओर उनका ध्यान नहीं गया। फिर भी अपवाद-स्वरूप कुछ आचार्य अवश्य ऐसे हैं जिन्होंने रस-सिद्धान्त के किसी-पक्ष या अंग के सम्बन्ध में नये दृष्टिकोण का परिचय दिया है। इनमें भोजराज (११वीं शती), मम्मट (११वीं शती), रामचन्द्र गुणचन्द्र, (१२वीं शती), शारदातनय (१३ वीं शती) विश्वनाथ (१४वीं शती), रूपगोस्वामी (१६वीं शती) प्रभृत्ति के नाम उल्लेखनीय हैं। यहाँ इनकी स्थापनाओं का परिचय संक्षेप में प्रस्तुत किया जारहा है। भोजराज-भोजराज (११वीं शती) द्वारा रचित ग्रन्थों की संख्या ८४ तक मानी जाती है, जिनमें से काव्य-शास्त्र सम्बन्धी ग्रन्थ मुख्यतः दो ही हैं-(१) सर- स्वतीकंठाभरण एवं (२) शृंगार-प्रकाश। 'सरस्वती कंठाभरण' में पाँच परिच्छेद हैं जिनमें से अन्तिम में रस-सिद्धान्त का विवेचन किया गया है। 'शृंगार-प्रकाश' के ३६ अध्यायों में से अन्तिम २५ का सम्बन्ध रस-सिद्धान्त से ही है। इन दोनों ग्रन्थों में रस-सिद्धान्त का निरूपण अत्यन्त सूक्ष्मता से किया गया है। डा० नगेन्द्र के शब्दों में 'रस के प्रत्येक अवयव का जितना सांग और परिपूर्ण वर्णन शृंगार-प्रकाश में किया गया है उतना संस्कृत काव्य-शास्त्र में और कहीं नहीं मिलता'।' वस्तुतः भोजराज संस्कृत की काव्य-शास्त्रीय परम्परा की चरम प्रौढ़ता के सूचक हैं। भोजराज के दृष्टिकोण में सर्वत्र मौलिकता-प्रदर्शन, भेदोंपेदों के विस्तार एवं समन्वय स्थापना का लक्ष्य दृष्टिगोचर होता है। काव्य की परिभाषा करते हुए उन्होंने कहा-'दोष से मुक्त, गुण से युक्त, अलंकार से अलंकृत एवं रस से अन्वित काव्य की रचना करने वाला कवि ही कीर्ति एवं प्रीति का भागी होता है।' यहाँ दोष, गुण, अलंकार का उल्लेख उनके समन्वयवादी दृष्टिकोण का सूचक है। काव्य-प्रकारों में भी उन्होंने वक्रोक्ति, रसोक्ति एवं स्वभावोक्ति का निरूपण किया, पर इनमें सर्वाधिक महत्व रसोक्ति को ही देना, उनके रसवादी दृष्टिकोण का सूचक है। रस के क्षेत्र में उनकी सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण मान्यता रस को अभिमान, अहंकार या शृंगार का पर्याय मानते हुए शृंगार रस को ही एक मात्र रस मानना है। अन्य, रसों को उन्होंने शृंगार के ही अन्तर्गत समन्वित कर दिया है। रस या शृंगार रस का मूल उन्होंने अहंकार को मानते हुए उसकी तीन अवस्थाएं निर्धारित की हैं।

१. रस-सिद्धान्त ; पृष्ठ ४७

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'पहली अवस्था पराकोटि है जिसमें अहंकार तत्व रहता है। इस अवस्था में एक ही रस रहता है। दूसरी मध्यमावस्था है जिसमें अहंकार रस विभिन्न बाह्य पदार्थों के संपर्क में आकर अनेक भावों के रूप में प्रकट हो जाता है। यही भाव प्रकर्ष प्राप्त करके विभिन्न रस-रशाओं को प्राप्त होते हैं। तीसरी अवस्था उत्तराकोटि है जिसमें सभी भाव प्रकर्ष प्राप्त कर एकात्मक रस के रूप में अभिव्यक्त हो जाते हैं जिसे प्रमन् कहते हैं। उनके कहने का तात्पर्य है कि सभी भावों का प्रकर्ष प्रेमन् है अर्थात् सभी भावों में प्रमन् विद्यमान रहता है जो अहम् का ही रूप है।१ इस प्रकार भोजराज के अनुसार रस का आधार मूलतः एक ही मानवीय चेतना है जिसे उन्होंने अहंकार का नाम दिया है। यही अहंकार विभिन्न प्रकार के आलम्बनों एवं परिस्थितियों के संपर्क से विभिन्न रूपों में उद्दीप्त होता है जिसे अन्य आचार्यों ने उनचास स्थायी एवं संचारी भावों में परिगणित किया है। अन्ततः सभी भावों की रसानुभूति प्रममयी या आनन्दमयी ही होती हैं-क्योंकि सभी से हमारे अहं का पोषण, विस्तार एवं अभिव्यंजन होता है; अतः भोजराज के अनुसार रस के विभिन्न भेदोपभेद नगण्य हैं। यद्यपि भोजराज की इस नूतन स्थापना को परवर्ती आचार्यों द्वारा सम्यक् मान प्राप्त नहीं हुआ, किन्तु आधुनिक मनोविश्लेषण की दृष्टि से यह पर्याप्त महत्व- पूर्ण है। फ्रायड ने जीवन और साहित्य में अहं और काम के जिस व्यापक रूप की प्रतिष्ठा की है, वह कुछ अंशों में भोजराज के अनुरूप ही हैं। इस दृष्टि से दोनों का तुलनात्मक अध्ययन स्वतंत्र शोध का विषय है। मम्मट-'काव्य-प्रकाश' के रचयिता मम्मट (११ वीं शती) का संस्कृत काव्य-शास्त्र में महत्वपूर्ण स्थान है। उनका यह ग्रन्थ इतना अधिक लोकप्रिय हुआ कि इसकी अनेक टीकाए लिखी गयीं। पर हमारे विचार में मम्मट का महत्ब पूर्व- वर्ती सिद्धान्तों के संग्रह एवं समन्वय की दृष्टि से ही है, मौलिकता का प्रायः उनमें अभाव है। आचार्य अभिनवगुप्त का अनुसरण करते हुए उन्होंने भी रस और ध्वनि के प्रगाढ़ सम्बन्ध को स्वीकार किया है, यद्यपि ध्वनि की ओर उनका झुकाव अपेक्षाकृत अधिक प्रतीत होता है। रामचन्द्र गुणचन्द्र-इन्होंने 'नाट्य दर्पण' नामक ग्रन्थ की रचना बारहवीं शती के उत्तरार्ध में की जिसमें नाटक के प्रसंग में रस की विवेचना प्रस्तुत की गयी है। वैसे तो इनका रस-विवेचन परम्परा के अनुसार ही है किन्तु रसानुभूति के सम्बन्ध में इन्होंने दो महत्वपूर्ण व नूतन स्थापनाएँ प्रस्तुत की हैं। एक तो यह है कि रस की अनुभूति सर्वत्र सुखात्मक ही नहीं होती, करुण, रौद्र, वीभत्स, भयानक आदि में दुःखात्मक भी होती है। दूसरी स्थापना यह है कि रसानुभूति में चमत्कार २. साधारणीकरण-ले० डॉ० रामलखन शुक्ल; पृष्ठ १११

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जन्य आनन्द का मिश्रण रहता है। अभिनेताओं के अभिनय-कौशल के कारण दर्शक विस्मय या चमत्कार की अनुभूति प्राप्त करते हैं, इसी के कारण दुःखात्मक भाव भी आनन्दमय प्रतीत होते हैं। इनके मत को स्पष्ट करते हुए डा० नगेन्द्र ने लिखा है-"प्रेक्षक या श्रोता करुण रस में आनन्दानुभू ति नहीं करता वरन् उसकी अभि- व्यंजना करने वाले कवि तथा अभिनेता के कला-नपुण्य से चमत्कृत होता है। इस चमत्कार से ही करुण रस में आनन्द की भ्रान्ति अथवा आभास हो जाता है।"३ अस्तु, नाट्य दर्पण' कार के अनुसार रस चमत्कार का पर्याय है तथा कलाजन्य आनन्द चमत्कार रूप है। शारदातनय-इनके द्वारा रचित ग्रन्थ 'भाव-प्रकाशन' (१३वीं शती) का प्रतिपाद्य विषय रस और भाव है। इसमें रस के विभिन्न पक्षों का विवेचन अत्यन्त व्यवस्थित रूप में किया गया है। इनके मत का परिचय देते हुए राममूर्ति त्रिपाठी ने लिखा है-'भोज की भांति ये अहंकार और शृंगार को पर्याप्त नहीं मानते। विपरीत इसके वे अग्नि पुराण की भाँति 'रति शृंगार' सिद्धान्त को मानते हैं। ये मानते हैं कि 'या चेयमिच्छा जगतां सिसृक्षोः परमात्मनः, विषयाक्ता रतिः सैव शृङ्गार इति गीयते।' मूल 'काम' या 'इच्छा' जगत्-स्रष्टा परमात्मा की है। पर- मात्मा की जो इच्छा सृष्टि-निर्माण के मूल में रहती है-वह उस समय विषय का अभाव होने से निर्विषय या सर्वविषय रहती है। वही 'इच्छा' सृष्टि का निर्माण हो जाने पर विभिन्न सांसरिक विषयों से उपरोक्त होकर 'रति' कही जा सकती है- यही 'रति' अन्ततः 'शृंगार' कही जाती है'।' पर साथ ही इन्होंने अहंकार या उससे उत्पन्न रजोगुण को रस मात्र में विद्यमान तत्त्व भी माना है क्योंकि उसके बिना बाह्य वस्तुओं में प्रवृत्ति या भावों की उद्दीप्ति ही संभव नहीं। हमारे विचार में उन्होंने भोजराज की अनेक कल्पनाओं को व्यवस्थित रूप देने का प्रयत्न किया था, जो स्तुत्य है। विश्वनाथ-इन्होंने अपने ग्रन्थ 'साहित्य-दर्पण' (१४ वीं शती) में रस, अलंकार, रीति आदि सिद्धान्तों में परस्पर समन्वय स्थापित करते हुए काव्य का नया लक्षण-'वाक्यं रसात्मकं काव्यम्'-प्रस्तुत किया जिसके अनुसार रसात्मकता काव्य के लिए अनिवार्य है। उनके विचारानुसार गुण, अलंकार, रीति आदि काव्य की उत्कृष्टता के तो कारण हैं पर उन्हें काव्य की आत्मा के रूप में स्वीकार नहीं किया जा सकता ; इस पद का अधिकारी तो रस ही है। रस-सिद्धान्त के क्षेत्र में उनकी नूतन देन यह है कि उन्होंने चमत्कार या चित्तविद्र ति को रस का सार

३. रस-सिद्धान्त ; पृष्ठ सं० १२७ ४. राममूर्ति त्रिपाठी-रसविमर्श पृ० ६६-६७

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६० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

मानते हुए एक मात्र अद्भुत रस को प्रमुख रस एवं अन्य सभी रसों को इसके अंग रूप में प्रस्तुत किया है। रूप गोस्वामी-यह बंगाल की वैष्णव-परंपरा के प्रसिद्ध आचार्य थे जिनका आविर्भाव १६वीं शती में हुआ था। इनके द्वारा रचित 'भक्ति रसामृत सिन्धु' एवं 'उज्ज्वल नील मणि' में क्रमशः भक्तिरस एवं उज्ज्वलरस की स्थापना सांगोपांग रूप में की गयी है। भक्तिरस के भी पाँच भेद किये गये हैं-शान्त, दास्य, सख्य वात्सल्य और माधुर्य। भगवद्रति या ईश्वर-प्रेम को ही उज्जवल रस का स्थायी भाव माना गया है। आगे चलकर मधुसूदन सरस्वती ने भी 'भगवद्भक्ति रसायन' में भक्ति रस को हो परम रस सिद्ध किया है। वस्तुतः इन आचार्यों ने तद्युगीन भक्ति आन्दोलन की प्ररणा से भक्ति साहित्य को प्रोत्साहित करने के लिए ही भक्ति रस की स्थापना का प्रयास किया है। सत्रहवीं शती से लेकर उन्नीसवीं शती के मध्य तक रस सिद्धान्त के क्षेत्र में कोई उल्लेखनीय नूतन कार्य नहीं हुआ। संस्कृत और हिन्दी के कवि एवं आचार्य पराम्परागत धारणाओं की ही व्याख्या एवं अनुवाद में संलग्न रहे। इस प्रकार हम देखते हैं कि मध्यवर्ती युग (११-१९वीं शती) में मौलकिता की दृष्टि से रस सिद्धान्त के क्षेत्र में बहुत थोड़ा कार्य हुआ। उपयुक्त विवरण के आधार पर इस काल में स्थापित नूतन धारणाओं को संक्षेप में इस प्रकार परिगणित किया जा जा सकता है- · शृंगार ही एक मात्र रस हैं तथा शृंगार का मूलाधार अहंकार है। (भोजराज) • कटु भावों पर आश्रित रसों की अनुभूति दुःखात्मक होती है। (रामचंद्र गुणचंद्र) • रसानुभूति का मूल अधार कला-कौशल जन्य चमत्कार है, उसी से कटु भाव भी रसानुभुति में परिणत हो जाते है। (रामचन्द्र गुणचन्द्र) · रसानुभूति का सार चमत्कार है, इसलिए अद्भुत रस ही प्रमुख रस है। (विश्वनाथ) · भक्तिरस या उज्ज्वल रस ही परम रस है। (रूप गोस्वामी) ये धारणाएँ भी कहाँ तक तर्क-संगत हैं, इस पर अन्यत्र प्रसंगानुसार विचार किया जायगा। यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इनमें से कोई भी बहुमान्य एवं प्रचलित नहीं हो पाई-यह तथ्य एक सीमा तक इनकी अशक्तता को प्रमाणित करता। पर इसका एक अन्य कारण भी है ; यह रूढिवादिता का युग था, अतः उपयुक्त नूतन धारणाओं पर बिशेष विचार किये बिना ही उन्हें ठुकरा दिया गया, अन्यथा ये इतनी उपेक्षणीय नहीं हैं।

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· आधुनिक युग (१८५० ई० से अब तक) हिन्दी-साहित्य में आधुनिक युग के प्रवर्तक भारतेन्दु हरिश्चन्द्र (१८५०- १८८४ ई०) माने जाते हैं जिन्होंने कविता, निबन्ध और नाटक की ही भाँति काव्य शास्त्र के क्षेत्र में भी नूतन दृष्टि का परिचय देते हुए, अपने 'नाटक' शीर्षक समीक्षा शास्त्रीय ग्रन्थ में प्रतिपादित किया कि आधुनिक युग के साहित्यकारों को न तो सभी परम्परागत रीतियों व रूढ़ियों का अन्धानुसरण करना चाहिए और न ही कट्टरतापूर्वक सभी प्राचीन रीतियों का परित्याग करना चाहिए।' उन्होंने अपने इसी दृष्टिकोण के अनुसार रस-सिद्धान्त का विवेचन करते हुए परम्परागत रसों के अतिरिक्त माधुर्य, सख्य, वात्सल्य, प्रमोद या आनन्द आदि नूतन रसों की स्थापना की।4 इसी प्रकार नाटक के उद्दश्यों में उन्होंने शृगार, हास्य, कौतुक, समाज- संस्कार एवं देश वत्सलता को भी स्थान देते हुए प्रतिपादित किया कि स्वदेशा- नुराग की अभिव्यक्ति करुण एवं वीररस के रूप में की जा सकती है। अस्तु, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने रस सिद्धान्त के विकास के लिए अनेक नूतन एवं महत्त्वपूर्ण संकेत दिये हैं-यह दूसरी बात है कि दुर्भाग्य से अकालमृत्यु के कारण वे स्वयं इन संकेतों के अनुसार रस सिद्धान्त को पल्लवित करने का अवसर प्राप्त नहीं कर पाये। हिन्दी आलोचना के शास्त्रीय पक्ष के नवोत्थान का श्री गणेश भारतेन्दु युग के अनन्तर बीसवीं शती के आरम्भ में ही हुआ। अयोध्यासिंह उपाध्याय, डा० श्यामसुन्दरदास, रामदहिन मिश्र, डा० गुलाब राय, लक्ष्मी नारायण सुधांशु प्रभृति ने अपनी सैद्धान्तिक विवेचनाओं में परम्परागत काव्य-शास्त्र को नूतन दृष्टि से देखने का प्रयास किया। यद्यपि परम्परागत काव्य-सिद्धान्तों में से रस-सिद्धान्त को ही आधुनिक युग में सर्वाधिक मान्यता प्राप्त हुई तथा सैद्धान्तिक समीक्षा पर लेखनी चलाने वाले प्रायः सभी हिन्दी आलोचकों ने (कुछ प्रगतिवादी एवं प्रयोग- वादियों को छोड़कर) रस-विवेचन प्रमुख या गौण रूप में किया है पर फिर भी इस सिद्धान्त को नूतन दृष्टि से देखते हुए नयी धारणाओं से मंडित करने का श्रय कुछ आलोचकों को ही प्राप्त है-जिनमें आचार्य रामचन्द्र शुक्ल, और डॉ० नगेन्द्र का विशेष रूप में उल्लेखनीय है। आगे हम इन्हीं विद्वानों की रस सम्बन्धी मौलिक धारणाओं का परिचय संक्षेप में प्रस्तुत करेंगे। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल (१८८४-१९४१ ई०) ने रस सिद्धान्त को परम्परागत रूढ़िबद्ध शब्दावली से मुक्त करके उसे आधुनिक दृष्टि से व्यापक रूप में प्रस्तुत करने का यत्न किया। विभाव अनुभाव, व्यभिचारी वाली

४. भारतेन्दु ग्रन्थावली (नाटक) ; पृष्ठ ७२१ ५. वही ; पृ० ७३४

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६२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन परिभाषा को छोड़कर उन्होंने रसानुभूति के सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण पक्ष पर बल देते हुए लिखा-'जिस प्रकार आत्मा की मुक्तावस्था ज्ञान-दशा कहलाती है उसी प्रकार हृदय की यह मुक्तावस्था रसदशा कहलाती है। यह हदय की मुक्तावस्था क्या है ? इसके उत्तर में उनके शब्दों में कहा जा सकता है 'जब तक कोई अपनी पृथक सत्ता की भावना को ऊपर किए इस क्षेत्र के नाना रूपों ओर व्यापारों को अपने योग-क्षेम, हानि-लाभ, सुख-दुःख आदि से संबद्ध करके देखता रहता है तब तक उसका हृदय एक प्रकार से बद्ध रहता है। इन रूपों और व्यापारों के सामने जब कभी वह अपनी पृथक सत्ता की धारणा से छूटकर-अपने आपको बिल्कुल भूलकर-विशुद्ध अनुभूति मात्र रह जाता है तब वह मुक्त हृदय हो जाता है।5 इस प्रकार आचार्य शुक्ल ने एक मात्र हृदय की मुक्तावस्था को ही रस-दशा या रसानुभूति का अनिवार्य लक्षण मानते हुए उसके विभिन्न काव्यगत साधनों-विभावादि-के महत्त्व को न्यून कर दिया है। रस के प्रसंग में मध्यकालीन आचार्यो ने 'ब्रह्मानन्द-सहोदरत्व' एवं लोको- त्तरता' की भी चर्चा की थी, जिससे प्रायः यह भ्रान्ति हो जाती है कि रस कोई अलौकिक या लोकोतर अनुभूति है। आचार्य शुक्ल ने इसका निराकरण करते हुए रस को लौकिक अनुभूति का ही एक प्रकार सिद्ध किया। इतना ही नहीं उनके विचार से न तो केवल काव्य में अपितु व्यावहारिक जीवन में भी यदि हम वैयक्तिकता या 'स्व' के बन्धन से मुक्त होकर आलम्बन को साधारणीकृत या सामान्य रूप में देख सकें तो वहाँ भी रसानुभूति संभव है। यद्यपि प्रत्यक्ष जीवन में इस प्रकार की स्थिति की संभावना बहुत कम हैं, पर वह असंभव नहीं। सामान्य मनोरंजन, कौतुहल एवं चमत्कार से रस की भिन्नता का प्रतिपादन करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इनमें हमारी मानसिक वृत्तियाँ रमण तो करती हैं किन्तु विषय-वस्तु का साधारणीकरण न हो पाने के कारण हमारा हृदय उस मुक्तावस्था को प्राप्त नहीं होता जो कि रसानुभूति का अनिवार्य लक्षण है। इसलिए ऐसे काव्य को जिसमें आलम्बन के व्यक्ति-वैचित्र्य के कारण पाठक का आश्चर्यपूर्ण प्रसादन या अवसादन मात्र होता है ; वहाँ वे शुद्ध रसानुभूति की संभावना स्वीकार नहीं करते ; अधिक से अधिक उसे वे मध्यम कोटि की रसानुभूति के रूप में मान्यता देने को प्रस्तुत हैं। रस का अर्थ आनन्द किया गया है-ऐसी स्थिति में रस-सिद्धान्त पर यह आक्षेप लगाया जा सकता है कि यह सिद्धान्त जीवन की विषमताओं, कटुताओं

६, रस-मीमांसा पृ० सं० ५ ७. वही, पृ० सं० ६

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एवं कष्टपूर्ण स्थितियों की उपेक्षा करता है। दूसरे शब्दों में, यह कलाकार को लोकमंगल के स्थान पर लोक-रंजन की ओर अग्रसर करता है। आचार्य शुक्ल ने अपने लेख-'लोक मंगल की साधनावस्था एवं सिद्धावस्था' में प्रतिपादित किया है कि रसानुभूति का आधार मूल भाव की व्यापकता में निहित है तथा जो मूल भाव जितने बड़े व्यापक लोक-हित पर आधारित है वह उतना ही अधिक प्रभावोत्पादक सिद्ध होता है। कटु भावों पर आधारित काव्य आनन्द की साधनावस्था की श्रेणी में आता है तथा ऐसा काव्य आनन्द की सिद्धावस्था से भी अधिक मार्मिक एवं प्रभावोत्पादक सिद्ध हो सकता है, यदि उनके मूल में निहित स्थायीभाव अत्यधिक व्यापक हो। वस्तुतः इस स्थापना के द्वारा उन्होंने रस सिद्धान्त को लोक-मंगल एवं लोकहित की भावना से समन्वित करने का यत्न किया है। आचार्य शुक्ल काव्य में लोकमंगल के साधक तत्त्वों का पर्याप्त महत्त्व मानते थे-कदाचित् इसलिए उन्होंने रस-सिद्धान्त की लोक-मंगल वादी व्याख्या प्रस्तुत की। अस्तु, आचार्य शुक्ल ने परमम्परागत रस-सिद्धान्त के महत्त्व की पुनप्र तिष्ठा करते हुए उसे अपनी धारणाओं के अनुसार पुष्ट एवं विकसित करने का सफल प्रयास किया है। संक्षेप में रस-सिद्धान्त के क्षेत्र में उनकी मौलिक उद्भावनाएँ ये हैं- · हृदय की मुक्तावस्था=रसदशा या रसानुभूति • रसानुभूति के दो आधार हैं-(१) निवैयक्तिकता एवं (२) साधार- णीकरण। • साधारणीकरण के अभाव में साहित्य से केवल मनोरंजन (आश्चर्यपूर्ण अवसादन, प्रसादन या कौतूहल ) हो सकता है जिसे 'मध्यम कोटि की रसानुभुति' कह सकते हैं। · काव्य का मूल भाव जितना व्यापक या लोकहित का साधक होगा उतना ही वह रसानुभूति' की दृष्टि से गंभीर होगा। · रसानुभूति प्रत्यक्ष जीवन में भी संभव है। डॉ० नगेन्द्र-आधुनिक युग में रस-सिद्धान्त की सर्वांगीण एवं सुव्यवस्थित विवेचना करने का श्रेय डा० नगेन्द्र (१९१५ ई०) को प्राप्त है। इन्होंने अपने ग्रन्थ 'रस-सिद्धान्त' (१९६४) में रस सम्बन्धी सम्पूर्ण भारतीय परम्परा का अवगाहन करते हुए उसके विभिन्न पक्षों, अंगों एवं तत्त्वों की व्याख्या अत्यन्त गम्भीर किन्तु सुस्पष्ट रूप में प्रस्तुत की है। आचार्य अभिनवगुप्त की भाँति डा० नगेन्द्र का लक्ष्य भी स्वतन्त्र नूतन सिद्धान्तों की स्थापना की अपेक्षा परम्परागत सिद्धान्तों का ही स्पष्टी- करण एवं संशोधन करते हुए उन्हें तर्क-संगत रूप प्रदान कर देने का रहा है, इस लिए उन्होंने खंडन-मंडन की अपेक्षा परम्परागत धारणाओं को सहानुभूतिपूर्वक

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६४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

समझने का प्रयास अधिक किया है। दूसरे, उनका दृष्टिकोण आचार्य शुक्ल के दृष्टिकोण की भाँति आत्मपरक (Subjective) न होकर विषयपरक (Objective) रहा है ; जहाँ आचार्य शुक्ल ने निजी मान्यताओं के संदर्भ में रस-सिद्धान्त को अप्रस्तुत रूप में प्रस्तुत किया है वहाँ डा० नगेन्द्र ने इस सिद्धान्त को अपने चिन्तन का केन्द्र बनाते हुए उसकी विवेचना के संदर्भ में आवश्यकतानुसार अपनी नूतन दृष्टि का उपयोग किया है, इसीलिए उनके द्वारा किया गया विवेचन-विश्लेषण अपेक्षाकृत अधिक प्रामाणिक, विश्वसनीय एवं प्रौढ रूप को प्राप्त कर सका है। यहाँ हम रस के संबंध में उनके द्वारा उपलब्ध एवं स्थापित कतिपय निष्कर्षों व स्थापनाओं का उल्लेख संकेत-रूप में प्रस्तुत करते हैं-

· डा० नगेन्द्र के मतानुसार काव्य के प्रसंग में 'रस' शब्द का प्रयोग तीन अर्थों में हुआ है-(१) भावमूलक काव्य-सौन्दर्य के अर्थ में। (२) भावमूलक काव्य- सौन्दर्य की अनुभूति के अर्थ में और (३) सामान्य काव्य-सौन्दर्य के अर्थ में।' • मनोवैज्ञानिक दृष्टि से रसानुभूति प्रत्यक्ष अनुभूति पर आधारित संवेदनों या स्मृतियों पर आधारित संवेदनों अथवा स्मृति के बौद्धिक विश्लेषण से भिन्न स्मृतिगत संवेदनों के भावन के अनुरूप है। इसे ही क्रोचे ने सहजानुभूति कहा है।' · रसास्वाद अनिवार्यतः आनन्दरूपी है। · करुणरस के आस्वादन के मूल में कल्पनात्मक अनुभव, साधारणीकरण चेतना के वशद्य, औदात्यजन्य आत्मोत्कर्ष, एवं सामंजस्य की प्रक्रिया का सम्मिलित प्रभाव निहित है।" · रस की स्थिति एक ओर तो कवि या कलाकार के हृदय में तथा दूसरी ओर पाठक के हृदय में होती है। कवि अपनी अनुभूति को रस-रूप में प्रस्तुत करता है, इसलिए पाठक भी उससे रसास्वादन कर पाता है।१२

• साधारणीकरण आश्रय का होता है या आलम्बन का अथवा स्थायीभाव का ?- इस परम्परागत समस्या का समाधान प्रस्तुत करते हुए डा० नगेन्द्र ने प्रति- पादित किया है कि साधारणीकरण कवि की अनुभूति का ही होता है। कवि की सफलता भी इसी तथ्य पर निर्भर है कि वह अपनी अनुभूति को किस सीमा तक

८. रस-सिद्धान्त ; पृष्ठ सं० ८४ ९. वही, पृष्ठ सं० १२० १०. वही। ११. वही, पृ० १२३ १२. रस-सिद्धान्त ; पृ० १९१

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साधारणीकृत रूप में प्रस्तुत कर पाता है। सामान्य व्यक्ति में और कवि में मौलिक अन्तर इसी बात का है।१ • काव्य में साधारणीकरण के दो आधार हैं-(१) भाषा का भावमय प्रयोग और (२) मानव सुलभ-सहानुभूति ।१४ उपर्युक्त स्थापनाओं का विस्तृत विवेचन हम आगे विभिन्न प्रसंगों में करेंगे, अतः यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि आज के युग में जबकि अति बौद्धिकता, शुष्कता, नीरसता एवं अनास्था के वातावरण के कारण न केवल काव्य-शास्त्र में अपितु स्वयं काव्य-क्षेत्र से भी रस का तिरस्कार होने लगा था, डॉ० नगेन्द्र ने अपनी सबल लेखनी के बल पर उसे नूतन गौरव प्रदान किया है। उन्होंने एक ओर तो आधुनिक ज्ञान-विज्ञान के आलोक में उसकी नूतन एवं स्पष्ट व्याख्या प्रस्तुत की है तो दूसरी ओर विरोधियों के आक्षेप-प्रहारों का भी निराकरण सफलतापूर्वक किया है। अतः निश्चय ही रस-सैद्धान्तिक परम्परा के विकास में डॉ० नगेन्द्र का योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है। अन्य हिन्दी व्याख्याता-आचार्य रामचन्द्र शुक्ल एवं डॉ० नगेन्द्र के अति- रिक्त हिन्दी के अन्य कई विद्वानों ने भी रस-सिद्धान्त के विवेचन विश्लेषण का सुन्दर प्रयास किया है, जिनमें डॉ० श्यामसुन्दरदास (साहित्यालोचन), डॉ० गुलाब- राय (सिद्धान्त और अध्ययन) पं० रामदहिन मिश्र (काव्य-दर्पण), आचार्य बलदेव उपाध्याय (भारतीय साहित्य शास्त्र), पं० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र (वाङ्गमय-विमर्श), डॉ० आनन्दप्रसाद दीक्षित (रससिद्धान्त : स्वरूप विश्लेषण), डॉ० प्रेमस्वरूप गुप्त (रस-गंगाधर का काव्य शास्त्रीय अध्ययन), डॉ० कृष्ण देव भारी (बीभत्सरस और हिन्द साहित्य, रस-शास्त्र और साहित्य-समीक्षा), डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी (रस-विमर्श) डॉ० तारकनाथ बाली (रस-सिद्धान्त की दार्शनिक एवं नैतिक व्याख्या), डॉ० निर्मला जैन (रस-सिद्धान्त और सौन्दर्य-शास्त्र), डा० रामलखन शुक्ल (साधारणीकरण : एक शास्त्रीय अध्ययन) प्रभृति के नाम तथा कोष्ठक में उदघृत रचनाएँ उल्लेखनीय हैं। वैसे तो इन विद्वानों ने अपने अपने दृष्टिकोण से रस सिद्धान्त को समझने का प्रयास किया है, किन्तु अनेक ने उस पर नूतन दृष्टि से भी विचार किया है। डॉ० गुलाबराय एवं पं० रामदहिन मिश्र ने आधुनिक मनोविज्ञान के प्रकाश में रस की नूतन व्याख्या की चेष्टा की है। आचार्य बलदेवप्रसाद उपाध्याय ने रस की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि को स्पष्ट किया है तो पं० विश्वनाथ प्रसाद मिश्र एवं डॉ० आनन्दप्रकाश दीक्षित ने उसके अनेक विवादस्पद पक्षों पर नूतन आलोक विकीर्ण किया है। डॉ० कृष्णदेव झारी ने अपने शोध-प्रबन्ध में रस सम्बन्धी

१३-१४. वही ; पृ० २११

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६६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन

परम्परागत धारणाओं एवं मान्यताओं में संशोधन करते हुए अनेक नये निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं, जिनमें से कतिपय ये हैं-१. उदात्त भावानुभूति ही रसानुभूति हैं। २. पाश्चात्य सेंटिमेंट भी हमारे स्थायी भाव नहीं हैं, केवल उदात्त स्पृहणीय भाव या सेंटिमेंट ही स्थायी भाव हैं। ३. उदात्त रस ही काव्य की श्रेष्ठता का मानदंड है। डॉ० भारी ने नयी कविता एवं आधुनिक कथा-साहित्य के संदर्भ में भी रस-सिद्धान्त पर विचार करते हुए प्रतिपादित किया है कि मानदंड के रूप में रस का उपयोग इन क्षेत्रों में भी सफलतापूर्वक किया जा सकता है। डॉ० राममूर्ति त्रिपाठी ने समस्त रस-परम्परा का गंभीरतापूर्वक अवगाहन करते हुए उसके अनेक उपेक्षित पक्षों की ओर विद्वानों का ध्यान आकर्षित किया है। डॉ० तारकनाथ बाली ने रस के दार्शनिक एवं नैतिक आधार को स्पष्ट करने का स्तुत्य प्रयास किया है तो डॉ० निर्मला जैन ने अत्यन्त परिश्रमपूर्वक आधुनिक सौन्दर्य-शास्त्र के परिप्रक्ष्य में रस-सिद्धान्त का अध्ययन प्रस्तुत करते हुए उसे नयी दिशा दी है। 'साधारणीकरण : एक शास्त्रीय अध्ययन, में डॉ० रामलखन शुक्ल ने रस-निष्पत्ति एवं साधारणीकरण की प्रक्रिया पर न केवल परम्परागत दृष्टि अपितु पाश्चात्य काव्य-शास्त्र एवं आधुनिक मनोविज्ञान की दृष्टि से पुनर्विचार करते हुए अनेक मौलिक एवं प्रमाणिक निष्कर्ष प्रस्तुत किये हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दी में रस सैद्धान्तिक अध्ययन को नयी गति एवं नयी दिशा प्राप्त हुई है। उपयुक्त प्रयासों के अतिरिक्त भी शृंगाररस (डॉ० राजेश्वर चतुर्वेदी, डॉ० रामपाल सिंह) हास्यरस (डॉ० बरसानेलाल चतुर्वेदी), करुण वात्सल्य, शान्त आदि रसों पर भी पृथक-पृथक रूप से शोध-कार्य हुआ है जो कम महत्त्वपूर्ण नहीं है। वस्तुतः सौन्दर्य-शास्त्र, मनोविज्ञान, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र, आदि विभिन्न विषयों के संदर्भ में रस का पुनर्विवेचन हिन्दी के आचार्यों की नूतन उपलब्धि है। दूसरी ओर मराठी, बंगला, गुजराती अंग्रेजी आदि भाषाओं में भी रस के सम्बन्ध में बहुत कुछ लिखा गया है-जिसका विवरण देना यहाँ संभव नहीं। फिर भी आज इस बात की आवश्यकता है कि रससिद्धान्त के सम्बन्ध में विभिन्न दृष्टियों से प्रस्तुत परस्पर-विरोधी निष्कर्षों पर पुनर्विचार करते हुए उन्हें एक संश्लिष्ट, व्यापक एवं प्रमाणिक रूप प्रदान किया जाय-इसी लक्ष्य की पूर्ति का प्रयास प्रस्तुत ग्रन्थ में किया जा रहा है; किन्तु इसकी सफलता का निर्णय विद्वान् पाठक ही करेंगे।

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द्वितीय खंड रस-सिद्धान्त की पाश्चात्य परम्परा

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१ पाश्चात्य रस-सिद्धान्त : सामान्य परिचय

रस-सिद्धान्त भारतीय आचार्यों की महान् उपलब्धि है तथा इस दृष्टि से यह एक विशुद्ध भारतीय सिद्धान्त हैं पर यह विचित्र संयोग है कि पाश्चात्य कला- चिन्तन के क्षेत्र में भी सत्रहवीं-अठारहवीं शती में डेकार्टे; लबस्सु एडिसन, हचेसन ह्य म, बर्क, हरमन लात्ज प्रभृति विद्वानों द्वारा कुछ ऐसे सिद्धान्तों का विकास हुआ जिन्हें वहाँ अनुभव वादी (Empirical), भाववादी (Emotional) अभिव्यक्ति वादी (Expressionalist) आदि विभिन्न विशेषणों से भूषित किया गया किन्तु इन सिद्धान्तों के प्रवर्त्तकों ने सामान्यत. कला एवं साहित्य में भावों के चित्रण, उद्टीपन एवं अभिव्यंजन को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हुए उनका लक्ष्य सामा- जिक को भावोद्व लनजन्य आनन्द प्रदान करना स्वीकार किया है। साथ ही उन्होंने कला-वस्तु का वर्गीकरण भी प्रणय, करुणा, निर्वेद आदि भावों के आधार पर किया है। भारतीय आचार्यों की भाँति कला के माध्यम से साधारणीकरण एवं तादात्म्य की प्रक्रिया को भी उन्होंने प्रायः स्वीकार किया है तथा करुण रस की अनुभूति का भी विश्लेषण विशेष रूप में किया है। कहना न होगा कि ये सभी मान्यताएँ रस-सिद्धान्त की प्रमुख स्थापनाओं के अनुकूल हैं अतः यदि इन्हें समन्वित रूप में 'पाश्चात्य रस सिद्धान्त' का नाम दे दिया जाय तो अनुचित न होगा। इसका यह भी तात्पर्य नहीं है कि भारतीय एवं पाश्चात्य सिद्धान्त में कोई अन्तर नहीं है-अवश्य ही उनमें अनेक बातों का अन्तर है पर वह अन्तर चिन्तन की दिशा एवं पद्धति का ही है ; दोनों की आधारभूत स्थापनाए बहुत कुछ समान हैं। फिर स्वयं भारतीय आचार्यों में भी व्यक्ति-भेद से रस सम्बन्धी विभिन्न धारणाओं में परस्पर सूक्ष्म अन्तर मिलता है ; यथा-भट्ट लोल्लट एवं अभिनव गुप्त की या आचार्य रामचन्द्र

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७० रस-सिद्धान्त का पुनर्वववेचन

शुक्ल एवं डॉ० नगेन्द्र की व्याख्याए परस्पर एक रूप नहीं है, पर इससे इन सबको रसवादी मानने में कोई बाधा उपस्थित नहीं होती। वस्तुतः एक ही सिद्धान्त के विभिन्न व्याख्याताओं में वैयक्तिक दृष्टि एवं देश-काल के अनुसार परस्पर सूक्ष्म अन्तर का मिलना स्वाभाविक है; अतः इस अन्तर के होते हुए भी यदि हम पाश्चात्य भाववादी चिन्तकों की धारणाओं को रस-सिद्धान्त के पाश्चात्य रूप के अन्तर्गत सम्मिलित करलें तो अनुचित न होगा। वस्तुतः जिसे पाश्चात्य क्षेत्र में 'कला का भाव सिद्धान्त' (Emotional theory of Art) कहा गया है, उसे ही हम भारतीय शब्दावली में 'रस-सिद्धान्त' की संज्ञा देते हुए दोनों का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करना चाहते हैं। यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना आवश्यक है कि उपयुक्त्त पाश्चात्त्य चिन्तकों को रस-सिद्धान्त की परम्परा में स्थान देने का अभिप्राय यह भी नहीं है कि हम उन्हें भारतीय रस सिद्धान्त से प्रभावित मानते हैं। वस्तुतः हमारे विचार में भारतीय एवं पाश्चात्य चिन्तकों ने स्वतन्त्र रूप में चिन्तन करते हुए अपने-अपने सिद्धान्तों की स्थापना की है किन्तु जब कोई सिद्धान्त किसी सार्वभौमिक या सार्वकालिक तथ्य पर आधारित होता है तो भिन्न देशों और भिन्न कालों के विभिन्न विचारक, एक-दूसरे के विचारों से अपरिचित रहते हुए भी उस तथ्य एवं तत्सम्बन्धी सत्य का बोध समान रूप में प्राप्त कर लेते हैं। यह बात रस सिद्धान्त पर भी लागू होती है। स्वतन्त्र रूप से विचार करते हुए भी भारतीय एवं पाश्चात्य चिन्तकों का रसानुभूति के सम्बन्ध में समान निष्कर्षों तक पहुँचना, इस सिद्धान्त की सार्व भौमिकता को प्रमाणित करता है। पर यदि रस सम्बन्धी भारतीय एवं पाश्चात्य चिन्तन का तुलनात्मक अध्ययन करते हुए उनकी आधारभूत स्थापनाओं में संशोधन-समन्वय की प्रक्रिया के द्वारा उनका सामान्यीकरण (generalisation) कर लिया जाय तो इससे रस-सिद्धान्त को और भी अधिक व्यापक, स्पष्ट, संगत एवं सुनिश्चित रूप प्राप्त हो सकता है। वस्तुतः रस-प्रक्रिया के कुछ पक्ष ऐसे हैं जिन पर भारतीय आचार्यों ने अधिक विचार किया है जब कि कुछ अन्य पक्षों पर पाश्चात्य चिन्तकों का ध्यान अधिक केन्द्रित रहा है-अतः दोनों पक्षों का चिन्तन एक-दूसरे का पूरक सिद्ध होता है। यथा, भारतीय आचार्यो ने जितना अधिक विवेचन वस्तु-पक्ष एवं भोक्ता का किया है उतना उसके सर्जन-पक्ष एवं अभि- व्यंजना-व्यापार का नही किया। एक का लक्ष्य समाजपरक अधिक रहा है तो दूसरे का व्यक्तिपरक अधिक रहा। अतः दोनों का चिन्तन निश्चय ही एक दूसरे का पूरक है। इसी धारणा के आधार पर हम आगे रस सिद्धान्त की पाश्चात्य परम्परा का तुलनात्मक अध्ययन प्रस्तुत करते हुए उसके आधार पर रस सिद्धान्त को अपेक्षाकृत व्यापक एवं परिष्कृत रूप देने का प्रयास करेंगे।

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पाश्चात्य रस-सिद्धान्त : सामान्य परिचय ७१

पाश्चात्य रस-वादियों को उनकी धारणाओं के आधार पर पाँच वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-(१) भावोद्दीप्तिवादी, जो कला का लक्ष्य भावों का उद्दीपन मानते हैं। (२) भावावलम्बनवादी, जो कला-कृति में भावों का चित्रण आवश्यक मानते हैं। (३) भावाभिव्यक्तिवादी जो कला के माध्यम से भावानुभूतियों की अभिव्यक्ति को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हैं। (४) भाव-संप्र षणवादी जो कला के माध्यम से भावों के संप्रेषण पर विशेष बल देते हैं। वस्तुतः जिस प्रकार भारतीय क्षेत्र में उत्पत्तिवाद, अनुकृतिवाद, भुक्तिवाद एवं अभिव्यक्तिवाद क्रमश; भारतीय चिन्तना के क्रमिक विकास को सूचित करते हैं उसी प्रकार ये पाश्चात्य वाद भी रस सम्बन्धी पाश्चात्य चिन्तना के विकास-क्र्म के सूचक हैं। अतः आगे हम इनका विवेचन अलग-अलग अध्यायों में प्रस्तुत करते हुए उन पर भारतीय दृष्टि से भी विचार करेंगे।

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२ पाश्चात्य रस-सिद्धान्त : भावोद्दीप्ति- वादी मत

पाश्चात्य कला-चिन्तन के क्षत्र में जिन विद्वानों ने कला एवं काव्य का लक्ष्य भावोद्दीपन मानते हुए अप्रत्यक्ष रूप में रस-सिद्धान्त का अनुमोदन किया है, उन्हें भावोद्दीप्तिवादी वर्ग के अन्तर्गत स्थान दिया जा सकता है। इस वर्ग में मुख्यतः डेकार्टे (१५९६-१६५०), एडिसन (१६७२-१७१९), ह्यम (१७११-१७७६) प्रभृति विचारक आते हैं। यहाँ क्रमशः उनके विचारों का परिचय प्रस्तुत किया जाता है। · डेकार्टे (Descartes) सत्रहवीं शती के सौन्दर्भ-चिन्तकों में डेकार्टे (१५९६-१६५० ई०) का महत्त्वपूर्ण स्थान माना जाता है। दर्शन-शास्त्र के क्षत्र में भी इनकी देन इतनी महत्त्व- पूर्ण है कि इन्हें नवीन दर्शन का जनक तक कहा गया है। ये परम्परागत धारणाओं व विचारों को अनुभव एवं विवेक की कसौटी पर ही कसकर स्वीकार करने के पक्षपाती थी-इसीलिए इन्हें अनुभववादी (Empirical) भी कहा गया है। ये बुद्धि या ज्ञान-शक्ति के चार कार्य मानते थे-समझना, कल्पना करना, स्मरण रखना और अनुभूति प्राप्त करना। भावों को भी इन्होंने ज्ञान या बोध से ही सम्बन्धित स्वीकार किया। कला के क्षेत्र में इन्होंने भावों को सर्वाधिक महत्त्व प्रदान करते हुए कलानुभूति या रसानुभूति को एक ऐसे बौद्धिक आनन्द के रूप में स्वीकार किया जो कला द्वारा उद्दीप्त भाव से समन्वित होता है।'

  1. "Aesthetic experience, according to him, is intellectual joy, accompanied by a 'passion' or emotion that may be aroused by reading a strange adventure, a creation of free imagination or by presentation of it on the stage. -Western Aesthetics : By K. C. Pandey ; page 177

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पाश्चात्य रस-सिद्धान्त : भावोद्दीप्तिवादी मत ७३

भाव-विवेचन-कलात्मक भावों की विवेचना करते हुए डेकार्टे ने भाव के तीन सामान्य लक्षण निर्धारित किये-(१) एक ही प्रकार की वस्तु के प्रभाव से विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न प्रकार के भाव उत्पन्न हो सकते हैं; अर्थात् भावों की उत्पत्ति का कोई निश्चित कारण नहीं होता। (२) भाव स्वेच्छा से उत्पन्न नहीं किये जा सकते, किन्ही बाह्य वस्तुओं के प्रभाव से ही भाव उत्पन्न हो सकते हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि भावोद्दीप्ति के लिए किसी न किसी आलम्बन का होना अनिवार्य है। (३) भावों के उत्तजित होने पर उन्हें एकाएक नियन्त्रित नहीं किया जा सकता। डेकार्टे ने भावों के मुख्यतः दो वर्ग किये हैं-(१) मौलिक भाव (Primary emotions) और (२) परतन्त्र भाव (Dependent emotions) । मौलिक भाव छह बताये गये हैं-(१) आश्चर्य (२) प्रम (३) घृणा (४) इच्छा (५) आनन्द और (६) शोक। इन मूल भावों के ही आधार पर तथा इनके मिश्रण के द्वारा अन्य भाव या परतन्त्र भाव उत्पन्न और विकसित होते हैं। ये मौलिक भाव भी दो श्रणियों के हैं-एक जो सीधे मस्तिष्क से या बुद्धि की प्ररणा से उत्पन्न होते हैं तथा दूसरे वे जो हृदय या भावानुभूति से सम्बद्ध हैं। प्रथम वर्ग में केवल आश्चर्य को स्थान दिया गया है जबकि दूसरे में शेष पाँच भाव रखे गये हैं। परतन्त्र भावों की संख्या निश्चित नहीं की गयी किन्तु उनमें से प्रमुख ये बताये गये हैं-श्रद्धा, उपेक्षा, उदा- रता, अभिमान, आशा, विनम्रता, भय, ईर्ष्या आदि। प्रत्येक भाव से सम्बद्ध अनुभावों (External signs of emotions) की व्याख्या करते हुए उन्हें दो वर्गों में विभाजित किया गया है-(१) नियन्त्रित अनु- भाव-जिन्हें हम स्वेच्छा से रोक सकते हैं, जैसे-ओठों का फड़कना, आहें भरना आदि। (२) अनियन्त्रित-जिन्हें नियन्त्रित नहीं किया जा सकता; जैसे-चेहरे का रंग बदल जाना, काँपना, हँसी, अश्रुपात, रुदन, मूर्च्छा, जड़ता आदि।१ रसानुभूति की व्याख्या-डेकार्टे के मत से काव्यानुभूति या रसानुभूति एक ऐसा बौद्धिक आनन्द है जो कि कला और साहित्य के आस्वादन से उद्दीप्त भाव से समन्वित होता है। आनन्द का स्वरूप स्पष्ट करते हुए उन्होंने बताया कि यह एक प्रकार का मनोनुकूल भाव है; जब हमारी आत्मा अनुकूल वस्तु का आस्वादन करती है तो आनन्द का उद्रक होता है। आनन्द को भी उन्होंने व्यापक अर्थ में ग्रहण करते हुए उसके तीन भेद निश्चित किये-(१) ऐन्द्रियक आनन्द (२) काल्पनिक आनन्द और (३) बौद्धिक आनन्द। काल्पनिक आनन्द के भी दो भेद किये गये हैं-एक, पाश- विक वृत्तियों से प्रेरित तथा दूसरा-साहित्यक आधार से प्रेरित।

  1. Western Aesthetics, By K. C. Pandey, Page 190-210 ३. वही ; पृष्ठ २११-२१२

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इनमें से बौद्धिक आनन्द को विशुद्ध आत्म-चैतन्य से प्रेरित माना गया है, किन्तु जब कलाओं के माध्यम से बौद्धिक आनन्द की अनुभूति होती है तो उसे सौन्दर्यात्मक आनन्द (रस ?) कह सकते हैं। करुण-रस की अनुभूति-साहित्य में करुण रस से आनन्द की अनुभूति किस प्रकार होती है-इस प्रश्न पर विचार करते हुए डेकार्टे ने स्पष्ट किया है कि दुष्ट एवं क्रर पात्रों को दुःखी देखकर हमें करुणा की अपेक्षा हर्ष की ही अनुभूति अधिक होती है पर जब हम ऐसे पात्रों को दुःखी देखते हैं जो वस्तुतः दुःख के पात्र नहीं होते तो हमारी करुणा जागृत होती है। करुणा का मूल तत्त्व शोक है जिसमें प्रेम और सद्- भावना का मिश्रण रहता है। करुणा के दो प्ररक भाव प्रेम और उदारता हैं। जब हम किसी के प्रति प्रेम और उदारता का भाव प्रदर्शित करते हैं तो उससे सहज ही आत्म-तोष की अनुभूति होती है। किसी असहाय के प्रति उदारता दिखा- कर हम जिस संतोष का अनुभव करते हैं वही काव्यगत करुणा को आनन्द में परि- वर्तित कर देने का कारण है। काव्य में चित्रित सज्जन पात्र के दुःख के प्रति मन ही मन करुणा प्रकट करके हम एक संतोषदायक कत्तव्य का पालन करते हैं। अस्तु, यह संतोष ही करुण-रस से आनन्दानुभूति का कारण है। साथ ही डेकार्टे ने यह भी कहा है कि काव्य में प्रस्तुत शोक या रंगमंच पर प्रस्तुत शोकपूर्ण दृश्य वास्तविक दृश्य नहीं होता। ऐसे दृश्यों का आस्वादन करते समय हमारे अन्तर्मन में उनकी अयथार्थता का ज्ञान भी बना रहता है जिससे उनकी कटुता या तीव्रता बहुत-कुछ कम हो जाती है। इस प्रकार काव्यगत शोक से आनन्दानुभूति के दो मूल कारण सिद्ध होते हैं-(१) उदारता एवं सहानुभूति के प्रदर्शन से प्राप्त संतोष एवं (२) शोकपूर्ण दृश्यों की अवास्तविकता का ज्ञान। ये कारण भारतीय दृष्टि से कहाँ तक उचित हैं-इस पर आगे विचार किया जायगा, यहाँ इतना ही उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि करुण-रस की समस्या पर भारतीय आचार्यों की भाँति डेकार्टे ने भी गम्भीरतापूर्वक विचार किया है। • डेकार्टे के मत की समीक्षा-

विशेषताएं-डेकार्टे की धारणाओं पर समीक्षात्मक दृष्टि से विचार करते हुए उनकी निम्नांकित विशेषताएँ स्वीकार की जा सकती हैं- (क) डेकार्टे की यह स्थापना कि भावों का पाशविक वृत्तियों से घनिष्ठ सम्बन्ध है-भारतीय रस सिद्धान्त एवं आधुनिक मनोविज्ञान के अनुकूल है। भार- तीय आचार्य अभिनव गुप्त ने भावों को वासनाओं पर आधारित माना है तो आधु- निक मनोविज्ञान के अनुसार वे सहज प्रवृत्तियों (Instincts) पर आधारित माने जाते हैं। इस दृष्टि से पाशविक वृत्तियों, वासनाओं एवं सहज प्रवृत्तियों को परस्पर पर्याय के रूप में स्वीकार किया जा सकता है।

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(ख) भावों के तीन सामान्य लक्षण-आलम्बन की अनिश्चितता भाव का स्वेच्छा से उत्पन्न न हो सकना और भावों का नियन्त्रण एकाएक अशक्य होना भी डेकार्टे की महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है। (ग) भावों को दो वर्गों में-मौलिक और परतन्त्र-में विभाजित करना भी डेकार्टे की नूतन स्थापना है। इन्हें भारतीय दृष्टि से क्रमशः स्थायी भाव एवं संचारी भाव कहा जा सकता है। (घ) करुण रस में आनन्दानुभूति स्वीकार करना भारतीय दृष्टि के अनुकूल है। न्यूनताएँ -भारतीय दृष्टि से डेकार्टे के मत में निम्नांकित न्यूनताएँ दृष्टि- गोचर होती हैं- (क) भाव के सामान्य लक्षणों के अन्तर्गत डेकार्टे ने बताया कि एक ही आलम्बन से विभिन्न व्यक्तियों के मन में विभिन्न भाव उत्पन्न हो सकते हैं- उनकी यह धारणा भारतीय दृष्टि के अनुकूल है पर उन्होंने यह स्पष्ट नहीं किया कि इस भिन्नता का मूल कारण क्या है ? भारतीय रस सिद्धान्त के अनुसार स्थायी भाव ही इसका मूल कारण है। एक सुन्दरी को देखकर रति स्थायी भाव से अनुप्राणित व्यक्ति प्रणय से उद्वलित हो सकता है जबकि निर्वेद से ग्रस्त उसके प्रति विरक्ति प्रदशित कर सकता है। किन्तु डेकार्टे स्थायी भाव की इस विशेषता का अनुसन्धान नहीं कर पाये। (ख) डेकार्टे का मूल भावों (स्थायी भावों) में इच्छा और आनन्द को भी स्थान देना उचित नहीं था। इसके अतिरिक्त उत्साह और भय जैसे महत्त्वपूर्ण भावों की ओर भी उनका ध्यान नहीं गया जो कि मूल भाव के रूप में स्वीकार किये जा सकते थे। (ग) परतन्त्र भावों के सम्बन्ध में भी डेकार्टे का दृष्टिकोण स्पष्ट प्रतीत नहीं होता। उदारता, अभिमान, विनम्रता जैसी स्थायी चारित्रिक प्रवृत्तियों एवं आशा, उपेक्षा जैसी मनोवृत्तियों को इनके अन्तर्गत स्थान देना समीचीन नहीं है। (घ) काव्य अन्य आनन्द को कहीं उन्होंने भाव समन्वित बौद्धिक आनन्द माना है तो कहीं उसे कल्पनाजन्य आनन्द के रूप में स्वीकार किया है-वस्तुतः इस सम्बन्ध में वे कोई स्पष्ट निर्णय नहीं कर पाये। (ङ) करुण रस से प्राप्त होने वाली आनन्दानुभूति का जो कारण डेकार्टे ने बताया है वह भी सर्वांश में सत्य नहीं है। केवल उदारता या सहानुभूति के प्रदर्शन से प्राप्त संतोष या काव्यगत शोक की अवास्तविकता का ज्ञान ही इस आनन्द का कारण नहीं माना जा सकता। लौकिक जीवन से भी हम दुःखी व्यक्ति के प्रति सहानुभूति व्यक्त करते हैं पर वहाँ हमें वह आनन्दानुभूति प्राप्त नहीं होती जो कि

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काव्यगत करुणा से प्राप्य है। दूसरे, यदि काव्यगत शोक के प्रति सदा अवास्तविकता का विचार ही रहेगा तो उस स्थिति में हमारी अनुभूति गम्भीर नहीं हो सकेगी। अतः ये दोनों कारण बहुत ही गौण हैं। वस्तुतः डेकार्टे इस समस्या के समाधान में पूर्णतः सफल नहीं हो पाये। अस्तु, डेकार्टे की धारणाए आंशिक रूप में ही महत्त्वपूर्ण हैं। फिर भी उनका महत्त्व इस दृष्टि से है कि उन्होंने पाश्चात्य कला-चिन्तन के क्षेत्र में सर्वप्रथम भाव तत्त्व को सर्वोपरि महत्त्व प्रदान करते हुए काव्यगत भावों के विवेचन-विश्लेषण का प्रयास किया। वस्तुतः उनकी उपलब्धि इस बात में है कि उन्होंने पाश्चात्य चिन्तन को एक नयी दिशा और नूतन पथ की ओर अग्रसर कर दिया, वे स्वयं इस ओर भले ही बहुत आगे तक न बढ़ पाये हों-इससे इनका महत्त्व कम नहीं होता।

• एडिसन (Addison) एडिसन (१६७२-१७१९ ई०) महोदय ने कला-कृति का लक्ष्य भावोद्दीपन स्वीकार करते हुए कहा कि जो कृति हमारे भावों को उत्तेजित करने में जितनी अधिक समर्थ होगी वह उतनी ही अधिक प्रसन्नता प्रदान कर सकेगी। जो भाव सामान्य जीवन में प्रसन्नतादायक होते हैं वे ही कला-कृति के माध्यम से उद्दीप्त होने पर और भी अधिक प्रसन्नता प्रदान करते हैं किन्तु कला का जादू तो यह है कि दैनिक जीवन के कटु एवं तिक्त भाव भी कलाओं के माध्यम से कोमल और मधुर बन जाते हैं। करुण और भयानक रसों में भी सामाजिक को प्रसन्नता की अनुभूति क्यों होती है-इसका समाधान करते हुए एडिसन ने बताया कि जब हम इस प्रकार की कृतियों को देखते हैं तो हम मन ही मन कलागत पात्रों की स्थिति से अपनी स्थिति की तुलना करते रहते हैं और जब हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि जिस दुख या भय से कलागत पात्र पीड़ित हैं उससे हम स्वयँ मुक्त हैं तो यह निष्कर्ष हमें अमित तोष प्रदान करता है।4 अस्तु, एडिसन के विचार से पात्रों की अपेक्षा पाठकों की अच्छी स्थिति ही करुणजन्य आनन्द का मूल कारण है। रसास्वादान की प्रक्रिया-काव्यास्वादन या रसास्वादन की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए एडिसन महोदय ने स्पष्ट किया कि इसमें स्वयं काव्य-कृति के अतिरिक्त पाठक की व्यक्तिगत स्थितियाँ एवं परिस्थितियाँ भी पर्याप्त योग देती हैं। इस सम्बन्ध में चार बातें अपेक्षित हैं-एक तो पाठक में अच्छी बिम्बग्राहक कल्पना-शक्ति का होना अपेक्षित है। दूसरे, उसे भाषा की शक्ति का पूरा ज्ञान होना चाहिए। तीसरे, उसमें भावाभिव्यक्ति के उपयुक्त साधनों को समझने की भी

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क्षमता होनी चाहिए। चौथे, उसमें आत्म-विस्मृति का भी गुण होना चाहिए। इन चारों अपेक्षाओं के अभाव में पाठक रसास्वादन में पूर्णतः सफल न हो सकेगा। रस की प्रकृति-काव्यानन्द या रस को एडिसन ने कल्पनाजन्य आनन्द मानते हुए बताया कि जब हमारी कल्पना काव्यगत सौन्दर्य, औदात्य एवं अन्य तत्त्वों के बोध में निमग्न हो जाती है तो हम एक सुखद आत्म-विस्मृति की अवस्था में पहुँच जाते हैं-थोड़ी देर के लिए हमारी आत्मा कल्पना के एक नूतन लोक में विचरण करती हुई आनन्दानुभूति में लीन हो जाती है। इस प्रकार उनके विचार से रस-निष्पत्ति में कल्पना की सक्रियता, भावों के उद्दीपन एवं आत्म-विस्मृति के सुखद अनुभव आदि का मिश्रित योग रहता है।

• एडिसन के मत की समीक्षा-

काव्यानुभूति के सम्बन्ध में एडिसन की कुछ धारणाएँ बहुत महत्वपूर्ण हैं। एक तो उन्होंने भावों की लौकिक अनुभूति की अपेक्षा कलाजन्य अनुभूति को अधिक मधुर माना है, जो भारतीय दृष्टिकोण के अनुकूल है। दूसरे, उन्होंने डेकार्टे की भाँति काव्यानन्द को बौद्धिक आनन्द मानने की भूल नहीं की अपितु उसे काल्पनिक आनन्द बताकर उसकी भ्रान्ति का निराकरण किया। तीसरे, उन्होंने काव्यास्वादन के प्रसंग में सामाजिक की योग्यता पर भी विचार किया है। इस सम्बन्ध में एडिसन ने जिन चार योग्यताओं का निर्देश किया है, वे आचार्य भरत के द्वारा उल्लिखित योग्यताओं से मिलती-जुलती हैं?आचार्य भरत ने प्रेक्षक के लिए ये दस योग्यताए बताई थीं- (१) बौद्धिक पृष्ठ भूमि (२) सौन्दर्य वर्धक साधनों का ज्ञान (३) मानस तथा शारीरिक अवस्थाओं का परिचय (४) विभिन्न भाषाओं और बोलियों का ज्ञान (५) एकाग्रता-शक्ति (६) तीव्रग्राहिका शक्ति (७) निरपेक्षबुद्धि (८) चरित्र तथा संस्कार (९) रुचि (१०) तन्मयता की शक्ति। स्पष्ट ही आचार्य भरत के द्वारा उल्लिखित योग्यताओं में से प्रथम, चतुर्थ, षष्ठ, एवं दशम में एडिसन महोदय की योग्यताओं का समन्वय हो जाता है।

एडिसन के मत में कुछ महत्त्वपूर्ण न्यूनताए एवं त्र टियाँ भी हैं। एक तो करुण रस से आनन्दानुभूति के विषय में उनके द्वारा की गई व्याख्या असंगत है। एक ओर तो वे पाठक के लिए आत्म-विस्मृति की योग्यता आवश्यक मानते हैं तो दूसरी ओर करुण-रस के आस्वादान के समय पाठक के व्यक्तित्व की पृथक चेतना के आधार पर वे करुण से आनन्द की निष्पत्ति सिद्ध करने का प्रयास करते हैं। यदि करुण रस में हम काव्य-गत पात्रों से अपनी अच्छी स्थिति के कारण आनन्दानु- भूति प्राप्त करते हैं तो अन्य सुखात्मक रसों में अपनी हेय स्थिति के कारण हमें ईर्ष्या या शोक की अनुभूति होनी चाहिए। वस्तुतः उन्होंने परस्पर-विरोधी बातें कहकर अपने ही मत का खंडन कर दिया है।

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इस प्रकार एडिसन की सभी धारणाएँ महत्त्वपूर्ण नहीं हैं किन्तु काव्या- नुभूति या रसानुभूति के स्वरूप-विश्लेषण एवं सामाजिक की तत्सम्बन्धी अपेक्षाओं के उद्घाटन में उन्होंने संतोषजनक सफलता प्राप्त की है। काव्यानन्द को कल्पना- जन्य आनन्द घोषित करना उनकी सबसे बड़ी देन है। • ह्यू म (Hume) ह्य म (१७११-१७७६ ई०) महोदय ने कला का सर्वोच्च लक्ष्य प्रसन्नता या आनन्द को ही स्वीकार करते हुए स्पष्ट किया कि कला-सौन्दर्य के आस्वादन में तीन तत्त्वों का योग रहता है-(१) मानव-प्रकृति (२) संस्कार एवं प्रथाएँ (३) मानसिक परिवर्तन। अर्थात् किसी कला के सौन्दर्य के आस्वादन में हम अपनी मानवी-प्रकृति, संस्कारों, एवं मानसिक परिवर्तनों से प्रभावित होते हैं। वस्तुतः भारतीय शब्दावली में ये सामाजिक की विशेषताएँ बताई जा सकती हैं। रसानुभूति का मूलाधार-कलाओं के आस्वादन या रसानुभूति का मूलाधार क्या है ? इस प्रश्न पर विचार करते हुए ह्य म महोदय ने प्रतिपादित किया है कि यह आस्वादन तर्क-बुद्धि की देन न होकर शुद्ध भावात्मक होता है। इसके अतिरिक्त हम स्वार्थ भाव से मुक्त होकर ही रसास्वादन (कला का आस्वादन) कर पाते हैं, वस्तु की उपयोगिता या हानि-लाभ के विचार से उस समय शून्य रहते हैं। साथ ही कलागत पात्रों के प्रति हम सर्वथा उदासीन भी नहीं रह पाते। उनके प्रति हमारी सहानुभूति जागृत हो जाती है और यह सहानुभूति हमारी प्रसन्नता का एक कारण है। कलागत पात्रों से सहानुभूति इतनी गहरी होती है कि हम प्रायः उनके सुख-दुःख को अपना सुख-दुख समझने लगते हैं।4 समीक्षा-ह्यम महोदय ने यद्यपि बहुत विस्तार से कलानुभूति के विविध पक्षों पर विचार नहीं किया किन्तु जिन-पक्षों को उन्होंने अपनी चिन्तना का केन्द्र बनाया है, उनके समाधान में उन्होंने निश्चित ही मौलिक प्रतिभा एवं सूक्ष्म बुद्धि का परिचय दिया है। सौन्दर्यानुभूति या रसानुभूति मानवेतर प्राणियों को बहुत कम हो पाती है, अतः इसे मानव-प्रकृति की विशिष्टता मानना तर्क-संगत है। संस्कार एवं प्रथाओं का भी उल्लेख करके उन्होंने चिन्तन-परंपरा को आगे बढ़ाया है। पर उनकी सर्वोपरि उपलब्धि है-रसानुभूति में स्वार्थभाव से मुक्ति या निवैयक्तिकता एवं सहानुभूतिजन्य तादात्म्य सम्बन्धी विचारों की स्थापना। उनकी ये धारणाएँ भारतीय साधारणीकरण सिद्धान्त के बहुत निकट पड़ती हैं। इतना अवश्य है कि वे साधारणीकरण का आधार केवल सहानुभूति को मानते हैं जबकि भारतीय दृष्टि से यह प्रक्रिया काव्यार्थ-भावन से सम्बन्धित है। सहानुभूति का सम्बन्ध मुख्यतः करुणरस के ही आलम्बन से होता है-अन्य रसों के आलम्बन से नहीं। अतः इस

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पाश्चात्य रस-सिद्धान्त : भावोद्दीप्तिवादी मत ७९ प्रसंग में सहानुभूति की अपेक्षा अधिक व्यापक शब्द के प्रयोग की अपेक्षा थी। आगे चलकर 'सहानुभूति' के स्थान पर 'समानुभूति' (Empathy) का प्रयोग होने लगा जो अधिक उपयुक्त है। फिर भी इससे ह्यम महोदय की उपलब्धियों का महत्त्व कम नहीं हो जाता-उन्होंने निश्चित ही पाश्चात्य रस-सिद्धान्त के विकास में महत्त्वपूर्ण योग दिया है। • निष्कर्ष- भावोह्ीप्तिवाद के तीन प्रमुख चिन्तकों की पूर्वोल्लिखित महत्त्वपूर्ण धार- णाओं का निष्कर्ष यहाँ संक्षेप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है- · कला या काव्य का लक्ष्य आनन्दानुभूति प्रदान करना है। · काव्यजन्य आनन्द कल्पनाजन्य आनन्द होता है। कला या काव्य का आनन्द उसकी भावोत्तजन की क्षमता पर निर्भर है। · सामान्य जीवन के भाव कलाकृति में आनन्ददायक बन जाते हैं। · भावों को मुख्यतः दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-मौलिक भाव एवं परतंत्र भाव। ये भाव व्यक्ति की वासनाओं या सहजप्रवृत्तियों पर आधारित होते हैं। · करुण, भयानक आदि कटु भावों से रसानुभूति के अनेक कारण हैं- (१) सहानुभूति प्रदर्शन जन्य संतोष (२) काव्य वस्तु की यथार्थता का ज्ञान (३) काव्यगत पात्रों की दुःखद स्थिति की तुलना में सामाजिक की निजी स्थिति की सुखदता। (४) सहानुभूति-जन्य तादात्म्य। (५) निवैयक्तिकता। · रसानुभूति के लिए पाठक या सामाजिक में ये योग्यताएँ अपेक्षित हैं- (१) बिम्ब-ग्राहक कल्पना-शक्ति (२) भाषा-शाक्ति का सम्यक् ज्ञान (३) भावा- भिव्यक्ति के माध्यमों का ज्ञान (४) आत्म-विस्मृति का गुण (५) अनुकूल संस्कार। उपयुक्त निष्कर्षों का उपयोग अन्यत्र प्रसंगानुसार किया जायगा, यहाँ इतना ही कहना पर्याप्त होगा कि इनमें से अधिकाँश भारतीय आचार्यों की धारणाओं के अनुकूल हैं।

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३ पाश्चात्य रस सिद्धान्त : भावावल- म्बनवादी मत

जिन कला-मीमांसकों व साहित्याचार्यों ने कला के लिए केवल भावों के उद्दीपन को ही पर्याप्त न मानकर उसमें भावों का चित्रण भी आवश्यक माना है, उन्हें हम 'भावावलम्बन वादी वर्ग' के अन्तर्गत स्थान दे सकते हैं। सत्रहवीं शती से लेकर बीसवीं शती के अनेक पाश्चात्य विचारकों को इस वर्ग में स्थान दिया जा सकता है-इनमें ल-बस्सु, हचेसन, बर्क, हरमन लात्ज, सैंतायना प्रभृति का नाम उल्लेखनीय है। किन्तु इनसे बहुत पूर्व ग्रीक आचार्य लौंजाइनस (प्रथम शती ईस्वी) भी भावावलम्बनवादी विचारों का उन्मेष अपने उदात्ततत्त्व सम्बन्धी ग्रन्थ में कर चुके थे। अतः पूर्वोक्त आचार्यों के विचारों का परिचय देने से पूर्व लौंजाइनस की भावावलम्बनवादी धारणाओं पर थोड़ा प्रकाश डाल देना उचित होगा। · लौंजाइनस (Longinus) यद्यपि लौंजाइनस महोदय ने काव्य के सर्व प्रमुख तत्त्व के रूप में 'औदात्य' को मान्यता दी है किन्तु साथ ही उन्होंने औदात्य के प्रमुख स्रोतों में उद्दाम भावावेग को भी स्थान दिया है। सच्ची कला की सर्वोत्कृष्ट कसौटी क्या है ? कला का पूर्ण उत्कर्ष कहाँ प्रकट होता है ? इन प्रश्नों का उत्तर देते हुए उन्होंने स्पष्ट रूप में भावावेगपूर्ण चित्रण को ही प्रमुखता दी है। वे लिखते हैं-"जिस कौशल से वह (कवि) आवेग की अधिक से अधिक प्रबल एवं प्रभावोत्पादक परिस्थितियों का चयन और निबन्धन करता है, वही उसकी (कला की) उत्कृष्टता का मूल है।"१ इसी प्रकार काव्यगत औदात्य का लक्ष्य भी उन्होंने भावोद्रक को स्वीकार करते हुए लिखा है-'उदात्त भाषा का प्रभाव श्रोता के मन पर प्रत्यय के रूप में १. काव्य में उदात्त तत्त्व ; पृष्ठ संख्या ६१