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२० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
से भावों की। पूर्व विवेचित दृष्टान्त के अनुसार भाव ही रस-रूप में परिणत होते हैं न कि रस भाव-रूप में। फिर भी वे इस विवाद को बहुत महत्त्वपूर्ण न मानते हुए दोनों को एक-दूसरे का पूरक या घटक मान लेते हैं-"रस कभी भाव से शून्य नहीं होता और न ही भाव रस से सर्वथा शून्य होता है। अभिनय में एक-दूसरे के आश्रय से ही इनकी सिद्धि होती है।" वस्तुतः रस में भी भाव की सत्ता किसी न किसी रूप में रहती ही है तथा भाव (स्थायी भाव) में भी रस-निष्पत्ति की क्षमता किसी न किसी मात्रा में सदा रहती है-अतः इन दोनों के सम्बन्ध की घनिष्ठता को स्वीकार किया जा सकता है। • रस के भेद स्थायीभाव विभिन्न तत्त्वों के संयोग से रस-रूप में परिणत हो जाने पर भी अपनी मूल प्रकृति को पूर्णतः नहीं त्याग पाता ; जिस प्रकार नींबू, संतरे या चंदन के शर्बत में सभी शर्बत स्वादिष्ट पेय हैं फिर भी उनके आधारभूत पदार्थ-नीम्बू, संतरा, चन्दन आदि,-के अनुसार उनके स्वाद एवं गुणों में परस्पर सूक्ष्म अन्तर रहता है, वसे ही विभिन्न स्थायीभावों के अनुसार उनके रसों में परस्पर अन्तर रहता है। प्रत्येक रस का किसी विशिष्ट स्थायी भाव से सम्बन्ध होता है-इस योजना के अनुसार पूर्वोक्त आठ स्थायी भावों के आधार पर नाट्य रसों के भी आठ भेद किये गये हैं-
स्थायी भाव रस १. रति १. शृ गार २. हास २. हास्य ३. शोक ३. करुण ४. कोध ४. रौद्र ५. उत्साह ५. वीर ६. भय ६. भयानक ७. जुगुप्सा ७. वीभत्स ८. विस्मय ८. अद्भुत 'नाट्य-शास्त्र' में अन्यत्र नवम् रस-शान्त रस की भी चर्चामिलती है पर यह अंश प्रक्षिप्त माना जाता है। परवर्ती आचार्यों ने रस-भेदों की संख्या में पर्याप्त परिवर्तन-परिवद्धन किया है जिसकी चर्चा अन्यत्र की जायगी। आचार्य भरत ने आठों रसों की विस्तृत विवेचना करते हुए उनके उपभेदों एवं उनसे सम्बद्ध विभावों अनुभावों, संचारी भावों आदि का भी निर्देश किया है।
८. हिन्दी अभिनव भारती; पृष्ठ ५११ (नाट्यशास्त्र, ६/३३-३६)
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आचार्य भरत का रस-विवेचन २१
· रस का महत्त्व आचार्य भरत ने रस को नाटक का सर्वोपरि एवं सर्व प्रमुख तत्त्व स्वीकार करते हुए उसे ही साध्य वोषित किया है। उनकी तद्विषयक धारणा की अभि- व्यक्ति नाट्यशास्त्र में अनेक स्थलों पर हुई है ; यथा- "रस के बिना किसी भी अर्थ में प्रवृति नहीं होती।"१ " .... इस प्रकार सूत्रधार आदि को नाटक में रसों और भावों की व्यवस्था करनी चाहिए। जो इन्हें जानता है वह उत्तम सिद्धि प्राप्त करता है।"१ "प्रक्षक-समाज की दृष्टि से सिद्धि दो प्रकार की होती है-मानवीय और दिव्य। यह सिद्धि वाणी, मन और शरीर से संभूत एवं नाना भावों तथा रसों पर आश्रित होती है।"११ इस प्रकार आचार्य भरत के मतानुसार नाट्यकला की सिद्धि रस-निष्पत्ति में है, इसी सिद्धि के निमित्त नाटक के समस्त अंगों एवं तत्त्वों की संयोजना की जाती है। डॉ० नगेन्द्र के शब्दों में 'संपूर्ण नाट्यशास्त्र में उसके अन्तर्गत समस्त नाट्य प्रसंगों के विधान एवं विवेचन में रस प्राणधारा के समान परिव्याप्त है।' कदाचित् यही कारण है कि रससिद्धान्त के साथ भरतमुनि का नाम सदा के लिए सुसम्बद्ध हो गया है।
९. हिन्दी अभिनव भारती; पृष्ठ ४४१ १०. नाट्यशास्त्र ७/१२९ ११. नाट्यशास्त्र २७/२
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४ भट्ट लोल्लट का उत्पत्तिवाद
रस-सिद्धान्त के भरत-परवर्ती आचार्यों में काल-क्र्मानुसार सर्व प्रथम भट्ट लोल्लट का नाम आता है जिन्होंने अपनी नूतन दृष्टि से भरत के रस-सूत्र की व्याख्या प्रस्तुत करते हुए इस सिद्धान्त के विकास में योग दिया है। दुर्भाग्य से लोल्लट का न तो ग्रन्थ ही उपलब्ध है और न ही उनका जीवन-वृत्त। डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने अपने अनुसंधान के द्वारा उन्हें काश्मीर के दार्शनिक कल्लट (नवीं शताब्दी) का समसामयिक सिद्ध किया है। परम्परा से यह भी ज्ञात होता है कि उन्होंने भरतमुनि के 'नाट्य-शास्त्र' पर किसी व्याख्यात्मक ग्रन्थ की रचना की थी जो अनु- पलब्ध है। फिर भी उनके मत का उल्लेख राजशेखर (काव्य-मीमांसा), अभिनवगुप्त (अभिनव भारती), मम्मट (काव्य-दर्पण) ने अपने-अपने ग्रन्थों में अत्यन्त संक्षेप में किया है, जिससे उनके विचारों का आंशिक ज्ञान प्राप्त होता है। आगे हम इन्हीं विद्वानों के उल्लेखों के आधार पर भट्ट लोल्लट की रस सम्बन्धी धारणाओं का अनुशीलन प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे। • अभिनवगुप्त द्वारा उद्धृत मत आचार्य अभिनवगुप्त (१० वीं शती) ने अपने दो ग्रन्थों-'अभिनव भारती' एवं 'ध्वन्यालोक लोचन'-में रस-सूत्र के प्रसंग में भट्ट लोल्लट के मत की चर्चा की है जो इस प्रकार है। (क) 'अभिनव भारती'-'भट्ट लोल्लट आदि ने इस प्रकार व्याख्या की है कि विभावादि का जो संयोग अर्थात् स्थायिभाव के साथ [विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारि भावों का संयोग] उससे रस की निष्पत्ति (अर्थात् उत्पत्ति) होती है। उन [विभाव, अनुभाव तथा व्यभिचारि भावों] में से विभाव स्थायिभाव रूप चित्त-
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भट्टलोल्लट का उत्पत्तिवाद २३
वृत्ति की उत्पत्ति में कारण होते हैं। अनुभाव शब्द से यहाँ रसजन्य (कटाक्षादि रूप) अनुभाव विवक्षित नहीं हैं क्योंकि उन [रसजन्य अनुभावों] की गणना रस के कारणों में नहीं की जा सकती है। [वे तो रस के कार्यभूत होते हैं] अपितु [यहाँ रस के कारणभूत अनुभावों में रत्यादि स्थायी] भावों के ही जो [पीछे उत्पन्न होने के कारण] अनुभाव हैं [उनका ग्रहण विवक्षित है]। और [निर्वेद आदि] व्यभिचारि भाव चित्तवृत्ति-स्वरूप होने से .... यद्यपि स्थायिभाव के साथ नहीं रह सकते किन्तु यहां उस [स्थायिभाव] के संस्कार रूप में विवक्षित हैं। [इसलिए रसरूप से स्थित इत्यादि स्थायिभाव के साथ संस्कार रूप में निर्वेदादि व्यभिचार भाव रह सकते हैं।]-[रस के उपादान के लिए आगे दिये जानेवाले व्यंजनादि रूप] दृष्टान्त में भी व्यंजनादि के बीच में किसी (रस) की स्थायि- भाव के समान अनुदभुत (वासनात्मक) रूप में स्थिति होती है, और दूसरे की व्यभि- चारि भाव के समान उद्भूत रूप में। इसलिए विभाव, अनुभाव आदि से परिपुष्ट किया हुआ स्थायिभाव ही रस है।' और अपरिपुष्ट स्थायिभाव है। वह दोनों में रहता है मुख्य रूप से अनुकार्य रामादि में रहता है तथा रामादिरूपता की प्रतीति (मूल-रामादिरूपतानुसंधान) होने के कारण नट में भी (रस की प्रतीति होती है)।"१ (ख) ध्वन्यालोक-लोचन-"पूर्वावस्था में जो स्थायी है, वही व्यभिचारी के सम्पात इत्यादि के द्वारा परिपोष को प्राप्त होकर अनुकार्य में ही रस हो जाता है।"२ उपर्युक्त उद्धरणों का विश्लेषण करने पर भट्टलोल्लट की निम्नांकित धारणाओं का ज्ञान होता है- १. विभाव, अनुभाव और संचारी का संयोग स्थायीभाव से होने पर ही रस-निष्पत्ति होती है। २. विभाव स्थायीभाव की उत्पत्ति के कारण हैं। ३. अनुभावों का सम्बन्ध रस से नहीं अपितु भावों से है। ४. संचारी भाव या व्यभिचारी भाव स्थायीभाव के साथ संस्काररूप में स्थित रहते हैं। ५. दृष्टान्त के आधार पर यह स्पष्ट किया गया है कि स्थायीभाव अनुद्भूत (या अव्यक्त) रूप में रहते हैं जबकि संचारी उद्भूत (या व्यक्त) रूप में रहते हैं। ६. विभाव-अनुभाव आदि से परिपुष्ट होने पर ही स्थायी भाव रसरूप में परिणत होता है, अपरिपुष्ट रूप में वह स्थायी भाव ही रहता है। १. हिन्दी अभिनव भारती; पृष्ठ ४४२-४३ (कोष्ठक में दिये हुये अंश अभिनवगुप्त के नहीं हैं अपितु आचाय विश्वेश्वर द्वारा जोड़े हुए हैं।) २. 'ध्वन्यालोक लोचन' से डॉ० नगेन्द्र द्वारा उद्धृत-'रस सिद्धान्त', पृष्ठ १४०
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२४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन ७. वह (?) अनुकार्य एवं अनुकर्त्ता दोनों में ही रहता है पर मुख्यतः अनु- कार्यों में। ८. अनुकर्त्ता (अभिनेताओं) में अनुकार्यों की तद्र पता के अनुसंधान-बल के कारण वह होता है। उपर्युक्त धारणाओं की प्रामाणिकता एवं स्पष्टता के लिए मम्मट का उद्धरण भी देख लेना आवश्यक है। • मम्मट द्वारा उद्धृत मत मम्मट ने भी रस-सूत्र के प्रसंग में लोल्लट के मत को इस प्रकार प्रस्तुत किया है-'विभावों-ललना आदि आलम्बन और उद्यान आदि उद्दीपन कारणों से रति आदि (स्थायी) भाव उत्पन्न हुआ; कटाक्ष, भुजाक्षेप आदि कार्यों के रूप में प्रस्तुत अनुभावों से प्रतीति-योग्य किया गया; सहकारी रूप निर्वेद आदि व्यभिचारी भावों से उपचित (पुष्ट) किया गया; मुख्य रूप में रामादि अनुकार्यों में और तद्र पतानुसंधान (उनके स्वरूप अनुसंधान) से नट में प्रतीयमान रत्यादि स्थायीभाव ही रस (हो जाता) है। यह भट्टलोल्लटादि का मत है।" (काव्य-प्रकाशः चतुर्थ उल्लास) मम्मट द्वारा प्रस्तुत धारणाएँ भी अभिनवगुप्त द्वारा उद्धृत मत के अनुकूल ही हैं, संभव है कि मम्मट ने अभिनव के आधार पर ही उपयुक्त चर्चा की हो। • भट्टलोल्लट की स्थापनाए उपयुक्त दोनों उद्धरणों के आधार पर भट्टलोल्लट की स्थापनाओं का स्पष्टी- करण इस प्रकार किया जा सकता है- (क) विभावादि का संयोग स्थायी भाव से-आचार्य भरत ने अपने सूत्र (विभावानुभाव व्यभिचारि संयोगाद्रस निष्पति) में केवल विभाव, अनुभाव एवं संचारी भाव का ही उल्लेख किया था-स्थायी भाव का उल्लेख नहीं। इससे यह स्पष्ट नहीं होता था कि रस-निष्पत्ति इन तीनों अवयवों के पारस्परिक संयोग से ही होती है या इनका संयोग किसी अन्य तत्त्व-स्थायी भाव -से होने पर होती है ? उन्होंने अन्यत्र स्थायी भाव को मान्यता देते हुए उसी की रस-रूप में परिणति मानी है, पर सूत्र में उसका उल्लेख नहीं किया जिससे स्थायी भाव की स्थिति अस्पष्ट हो गई थी। भट्ट लोल्लट ने इस अस्पष्टता को दूर करते हुए यह स्पष्ट कर दिया कि विभावादि का संयोग स्थायी भाव से अपेक्षित है। (ख) रस-निष्पत्ति की प्रत्रियाए-आचार्य भरत ने विभावादि अवयवों का उल्लेख सामान्य रूप में ही किया था, प्रत्येक अवयव के क्रम, महत्त्व एवं योग- दान का स्पष्टीकरण उन्होंने नहीं किया जबकि भट्ट लोल्लट ने इस सम्बन्ध में ३. रससिद्धान्त-डॉ० नगेन्द्र, पृष्ठ १४०
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प्रत्येक अवयव के योगदान पर प्रकाश डालते हुए रस-निष्पत्ति की तीन प्रक्रियाए निश्चित कीं। उनके विचार से विभाव स्थायीभाव को उत्पन्न करते हैं, अनुभाव उसकी प्रतीति करवाते हैं तथा संचारी भाव उसकी पुष्टि करते हैं-इस प्रकार उत्पत्ति, प्रतीति एवं पुष्टि-इन तीनों प्रक्रियाओं के माध्यम से रस की निष्पत्ति होती है। (ग) अनुभावों का स्पष्टीकरण-काव्य या नाटक में दो प्रकार की चेष्टाए होती हैं-एक भाव की प्ररणा से होने वाली चेष्टाए जिनका सम्बन्ध अभिनेता से है, दूसरी रस-भोक्ता की चेष्टाए जो कि रसानुभूति की प्रतिक्रिया से होती है; जैसे-दर्शकों द्वारा 'ताली बजाना' 'वाह ! वाह! करना'। अतः यहाँ प्रश्न उठता है कि अनुभावों के अन्तर्गत कौन सी चेष्टाएँ आती हैं -भाव से सम्बन्धित या रस-सम्बन्धी ? भट्टलोल्लट ने भाव से सम्बन्धित चेष्टाओं को ही अनुभाव माना है। 'अनुभाव' का शाब्दिक अर्थ भी यही है कि जो भाव का अनुवर्ती हो। इसके अतिरिक्त अनुभाव रस के कारणों में से है, अतः उसकी सत्ता कार्य से पूर्व ही अपेक्षित है। (घ) संचारी भावों का स्पष्टीकरण-आचार्य भरत ने संचारी भावों का स्थायी भाव से संयोग मानते हुए दोनों की सह-स्थिति स्वीकार की है, पर इसके विरुद्ध तर्क दिया जा सकता है कि एक ही साथ मन में दो प्रकार की चित्तवृत्तियाँ कैसे रह सकती हैं ? भट्ट लोल्लट ने इस सम्बन्ध में बताया कि संचारी भाव संस्कार रूप में स्थायी भाव के साथ रहते हैं। दूसरे शब्दों में-स्थायी भाव के विभिन्न संस्कार ही संचारी भाव हैं। संस्कार सामान्यतः व्यक्तियों के संपर्क एवं परिस्थि- तियों के प्रभाव से प्राप्त होते हैं। अतः कहा जा सकता है कि एक ही स्थायी भाव व्यक्तियों एवं परिस्थितियों के प्रभाव या संस्कार से विभिन्न संचारी भावों में परि- वर्तित होता रहता है; यथा-एक प्रमी विभिन्न परिस्थितियों में-प्रयसी के संयोग वियोगादि में-हर्ष, उल्लास, चिन्ता, स्मृति, विषाद आदि संचारियों से ग्रस्त हो सकता है जो स्थायी भाव के परिस्थितिजन्य रूपों के द्योतक हैं। ऐसी स्थिति में संचारी भावों को स्थायी भावों के ही विभिन्न संस्कारों (बाह्य प्रभावों) के रूप में ग्रहण करते हुए दोनों की सह-स्थिति स्वीकार करना अनुचित नहीं कहा जा सकता। संचारी भावों के सम्बन्ध में भट्टलोल्लट ने एक और नये तथ्य की ओर संकेत किया; वह यह कि संचारी भाव वस्तुतः स्थायी भाव के ही उद्भूत रूप हैं। स्थायी भाव वह मूल भाव है जो अनुद्भूत रूप में भी अचेतन मन में स्थिर रहता है, जबकि उसके उद्भूत होने से विभिन्न संचारी भावों की उद्दीप्ति होती है। उदा- हरण के लिए, रति भाव अनुदभूत भाव है, जब वह विभिन्न परिस्थितियों में उद्भूत या उद्दीप्त होता है तो हर्ष, संताप, रोष आदि किसी न किसी संचारी का रूप
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धारण कर लेता है। अस्तु, लोल्लट की यह धारणा पूर्वोक्त धारणा के अनुकूल ही है; संचारी स्थायी भाव का ही संस्कारित, व्यक्त या प्रस्फुटित रूप है। विभिन्न संचारी भावों की उद्दीप्ति उनके आधारभूत स्थायीभाव के प्रस्फुटन की ही अनेक आवृतियों की सूचक हैं जिससे स्थायी भाव और अधिक गम्भीर होता जाता है। कदाचित् इसीलिए उन्होंने संचारी भावों से स्थायी भाव की उपचिति या पुष्टि का होना स्वीकार किया है जो उचित ही है। (ङ) स्थायी भाव और रस का अन्तर-स्थायी भाव का उल्लेख सामान्य शब्दों में भी किया जा सकता है किन्तु उस स्थिति में वह रस-रूप में परिणत नहीं होगा। रस-निष्पत्ति के लिए तो उसकी विभावों के माध्यम से उत्पत्ति, अनुभावों के माध्यम से प्रतीति एवं संचारी भावों के द्वारा पुष्टि अपेक्षित है। इस प्रकार भट्ट लोल्लट ने विभावादि से परिपुष्ट स्थायी भाव की ही रस-रूप में परिणति मानी है। इस दृष्टि से स्थायी भाव और रस में केवल अपुष्टि एवं परिपुष्टि का ही अन्तर है-अन्यथा दोनों एक हैं। पर हमारे विचार में लोल्लट की यह धारणा असंगत है। लौकिक क्षेत्र में भी स्थायी भाव के सभी अवयवों-विभाव, अनुभाव, संचारी-के रहते हुए भी घृणा, भय, क्रोध आदि रस-रूप में परिणत नहीं होते। वस्तुतः दैनिक जीवन में भी स्थायी भावों की उद्दीप्ति विभावादि के संयोग से ही होती है, फिर भी वे रस-रूप में परिणत नहीं होते। अतः विभावादि के संयोग को ही रस-निष्पत्ति का कारण मानना उचित नहीं-वह केवल स्थायी भाव की उदीप्ति एवं अभिव्यक्ति का कारण है ; रस-रूप में परिणति का कारण नहीं। वस्तुतः स्थायी भाव की रस-रूप में पतरिणति का वास्तविक कारण भट्टलोल्लट नहीं खोज पाये-यह खोज परवर्ती युग में भट्ट नायक एवं अभिनव गुप्त द्वारा ही हो पायी। अतः इस दृष्टि से भट्ट लोल्लट का मत अविकसित कहा जा सकता है। (च) रस की स्थिति किसमें ?- रस की स्थिति मूल अनुकार्यो-ऐतिहासिक पात्रों जैसे राम, सीता आदि-में होती है या अनुकर्त्ताओं (अभिनेताओं) में ? अभिनवगुप्त ने भट्टलोल्लट के मत को उद्घृत करते हुए लिखा है-वह दोनों में रहता है, मुख्यतः अनुकार्यों में'। यहाँ यदि 'वह' का तात्पर्य रस है तो यह मत ठीक नहों क्योंकि अनुकार्यों अथवा लौकिक पात्रों में रस की सत्ता मान लेने पर रस काव्यजन्य अनुभूति न होकर लौकिक भावों की देन सिद्ध हो जायगा। वस्तुतः राम-सीता आदि मूल ऐतिहासिक पात्रों में रस नहीं, स्थायी भाव ही रहता है जिसे अभिनेता अभिनय के माध्यम से या कवि काव्य के माध्यम से प्रस्तुत करके रस-रूप में परिणत करता है। अतः हमारी दृष्टि में यहाँ 'वह' का तात्पर्य स्थायी भाव लेना ही उचित होगा। (छ) तद्र पतानुसंधान से प्रतीति-यद्यपि स्थायी भाव मूलतः लौकिक पात्रों में ही होते हैं पर अभिनेताओं के द्वारा अभिनीत किये जाने पर रंगमंच पर भी
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उनकी प्रतीति होती है। कदाचित् इसी तथ्य का सकेत करते हुए भट्टलोल्लट ने 'तद्र पतानुसंधान' का प्रयोग किया है, जिसे अभिनवगुप्त एवं मम्मट ने उल्लिखित किया है। पर 'तद्र पतानुसंधान' के अर्थ के सम्बन्ध में विद्वानों में गहरा मतभेद है। 'तद्र पता' का आशय तो स्पष्ट है कि मूल पात्रों या अनुकार्यों के अनुरूप अभिनय, पर 'अनुसंधान' के अनेक अर्थ किये जाते है, जैसे आरोप, अभिमान, योजना आदि। इन्हीं अर्थों के आधार पर भट्टलोल्लट की धारणा को विभिन्न रूपों में ग्रहण किया गया है। कुछ विद्वान् 'आरोप' अर्थ ग्रहण करते हुए अनुमान करते हैं कि लोल्लट का आशय सामाजिक या दर्शकों के द्वारा अभिनेताओं पर मूल पात्रों -- राम-सीतादि-के आरोपण से था, पर यह अनुमान संगत प्रतीत नहीं होता। नाटक में आरोपण अभिनेता करता है न कि सामाजिक-अतः आरोपण की क्रिया का सम्बन्ध सामाजिक से नहीं हो सकता। दूसरी ओर 'तद्र पतानुसंधान' से स्थायी भाव की प्रतीति का होना भी उल्लिखित है-यह तथ्य इस बात का प्रमाण है कि अनुसंधान की प्रक्रिया का सम्बन्ध नट से नहीं सामाजिक से है क्योंकि नट तो भावों का प्रदर्शन करता है न कि प्रतीति। 'अनुसंधान' का दूसरा अर्थ अभिमान तो प्रसंग से सर्वथा असंबद्ध है अतः इसे यहाँ ग्रहण करना ठीक नहीं। डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने तीसरे अर्थ-योजना-का समर्थन किया है, पर नाटक में योजना भी नट के द्वारा ही होती है, सामाजिक के द्वारा नहीं जबकि यहाँ अनुसंधान का सम्बन्ध सामाजिक से है। अतः ये तीनों ही अर्थ मूल प्रसंग से सुसम्बद्ध नहीं है-आरोपित हैं। हमारे विचार में 'अनुसंधान' का एक अन्य अर्थ 'अन्वीक्षण' यहाँ अधिक संगत है। नाटक में अभिनेता मूल पात्रों के क्रिया-व्यापारों का अनुकरण करते हुए उनके भावों को तद्र प में प्रदर्शित करते हैं जिनके अन्वीक्षण से दर्शकों को भी उन भावों की प्रतीति या उनका बोध होता है तथा यह प्रतीति या बोध ही रसानुभूति का आधार है। अस्तु, तद्र पतानुसंधान का अर्थ है-मूल पात्रों के अनुरूप अभिनय का अन्वीक्षण। • आचार्य शंकुक के आक्षेप भट्टलोल्लट के मत का खण्डन करते हुए आचार्य शंकुक ने आठ आक्षेप किये हैं, जिनका उल्लेख 'अभिनव-भारती' में किया गया है, वे ये हैं"-(१) विभावादि के योग के बिना अनुमापक हेतु के अभाव में स्थायी भाव की प्रतीति सम्भव नहीं। (२) भावों को पहले से ही अभिधेयात्मक माना गया है। (३) जब वह (स्थायी भाव या रस) पहले से ही स्थित है तो परवर्ती लक्षणों या तत्त्वों के संयोग की क्या आवश्यकता है? (४) (स्थायी भावों को ही रस मान लेने पर स्थायी भाव की स्थिति के अनुसार) रस के मंद, मंदतर, मंदतम आदि अनन्त भेद मानने ४. हिन्दी अभिनव भारती; आचार्य विश्वेश्वर; पृ० ४४३-४४
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पड़ेगें। (५) हास्यरस के छह भेदों का भी लोप हो जायगा। (६) काम की दस अवस्थाओं में असंख्य रस, भाव आदि मानने होंगे। (७) शोक प्रारम्भ में तीव्र तथा बाद में मंद होता है अतः उसकी उपचय या पुष्टि के द्वारा करुणरस में परिणति कैसे सम्भव है ? (८) इसी प्रकार क्रोध, उत्साह, रति, आदि में भी क्रमशः अमर्ष, स्थिरता एवं सेवा (संयोग) के अभाव में उपचय के स्थान पर अपचय (ह्रास) होता हैं, अत; वे भी रस-रूप में परिणत नहीं होंगे। शंकुक के उपयुक्त आक्षेपों को स्पष्ट करते हुए उन्हें मुख्यतः तीन वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-(१) विभावादि के स्थायी भाव से संयोग से सम्बन्धित। (२) स्थायी भाव और रस की एकता से सम्बन्धित। (३) स्थायी भावों की उपचिति से सम्बन्धित। यहाँ तीनों वर्गों का आख्यान क्रमशः किया जाता है- (क) स्थायी भाव से संयोग के विरुद्ध आक्षेप-भट्टलोल्लट ने रस-निष्पत्ति के लिए विभाव, अनुभाव और संचारी भाव का संयोग स्थायी भाव से अपेक्षित माना था, पर प्रश्न यह है कि क्या विभाव, अनुभाव आदि से पृथक स्थायी भाव की सत्ता सम्भव है ? सम्भव है कि वह वासना रूप में पहले से स्थित हो पर फिर भी विभावादि के बिना उसकी उद्दीप्ति एवं प्रतीति कैसे सम्भव है-अस्तु, शंकुक का पहला आक्षेप इस तथ्य की ओर संकेत करता है कि विभावादि से पृथक स्थायी भाव की स्वतन्त्र सत्ता या उसकी पृथक प्रतीति सम्भव नहीं। यदि, इन तत्त्वों के अभाव में ही स्थायी भाव का बोध करवाया जायगा तो वह केवल शाब्दिक या अभिधेयात्मक होगा, उसकी व्यंजना सम्भव नहीं। दूसरा आक्षेप इसी तथ्य पर आधारित है। साथ ही यह भी कहा जा सकता है कि यदि विभावादि के पूर्व ही स्थायीभाव की सत्ता एवं उसकी प्रतीति हो सकती है तो फिर इनके संयोग की क्या आवश्यकता है ? तीसरे आक्षेप में यही युक्ति दी गयी है। इस प्रकार ये तीनों आक्षेप भट्टलोल्लट की इस धारणा का खण्डन करते हैं कि विभावादि से पृथक स्थायीभाव का स्वतन्त्र अस्तित्व एवं बोध सम्भव है। (ख) स्थायीभाव एवं रस की एकता-चौथे, पाँचवें एवं छठे आपेक्ष में स्थायीभाव एवं रस की एकता के विरुद्ध आपेक्ष किया गया है। भट्ट लोल्लट ने केवल विभावादि से परिपुष्टि के द्वारा ही स्थायीभाव की रस में परिणति मानते हुए दोनों को मूलतः एक माना था जब कि शंकुक इस धारणा का विरोध करते हुए तर्क देते हैं कि यदि स्थायीभाव ही रस है तो फिर स्थायीभाव की तीव्रता, शिथिलता, गम्भीरता आदि विभिन्न स्थितियों के अनुसार रस की भी विभिन्न अवस्थाएँ या उसके विभिन्न भेद स्वीकार करने होंगे ? उस स्थिति में काम की दस दशाओं के अनुसार शृंगार के भी दस भेद मानने होंगे या फिर स्थायी भावों के विभिन्न अवान्तर भेदों को त्याग देना पड़ेगा, जैसे कि हास्य के छह भेद माने गये हैं जो इस स्थिति में त्याज्य हो जायेंगे !
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वस्तुतः शंकुक के ये तर्क केवल खण्डन के निमित्त ही हैं अन्यथा इनमें विशेष सार नहीं है। स्थायीभाव की विभिन्न स्थितियों, परिस्थितियों एवं अवस्थाओं के ही द्योतक संचारी भाव हैं जिन्हें आचार्य भरत से लेकर अभिनवगुप्त तक सबने मान्यता दी है। स्थायीभाव की ये विभिन्न अवस्थाएँ संचरणशील या परिवर्तनशील हैं जिनसे रस-प्रक्रिया विच्छिन्न नहीं होती। रस-प्रक्रिया तो दूर की बात है, स्वयं स्थायीभाव भी विरोधी-अविरोधी संचारियों से विच्छिन्न नहीं होता-संचारी और स्थायी का प्रमुख भेद ही यही है-ऐसी स्थिति में संचारियों के अनुसार स्थायी भाव और रस के भेद-प्रभेद मानने का प्रश्न ही नहीं उठता। फिर भी यदि संचारियों के कारण स्थायी भाव की विभिन्न अवस्थाओं में कोई महत्त्वपूर्ण अन्तर आ जाता है तो उनके अनुसार एक रस के अवान्तर भेद भी किये जा सकते हैं जैसे कि शृंगार के दो प्रमुख भेद-संयोग और वियोग किये जाते हैं। वस्तुतः भेद-प्रभेद तो विवेचन-सुविधा की दृष्टि से घटाये-बढ़ाये जा सकते हैं, उनसे मूल स्थापना में विशेष अन्तर नहीं पड़ता। अतः हमारी दृष्टि में शंकुक के ये तर्क निस्सार हैं।
(ग) स्थायी भावों की उपचिति-आचार्य शंकुक ने विभावादि से स्थायी भावों की उपचिति एवं उससे रस-निष्पत्ति की सम्भावना का भी विरोध किया है; पूर्वोक्त आक्षेपों में से अन्तिम दो इसी विरोध के सूचक हैं। उपचिति या पुरिपुष्टि का आशय शंकुक ने अत्यन्त स्थूल रूप में ग्रहण किया है-कदाचित उनके विचार से स्थायी भाव का तीव्र या गंभीर होना ही उपचिति का सूचक है; पर भट्टलोल्लट का मूल आशय यह नहीं था। भट्टलोल्लट ने मुख्यतः संचारी भावों से उपचिति मानी है तथा संचारी भावों में स्थायी भाव की सभी स्वाभाविक अवस्थाएँ आ जाती हैं ; प्रसंगानुसार कुछ संचारी भाव स्थायी की तीव्रता के द्योतक हो सकते हैं तो कुछ उसकी शान्ति के सूचक हो सकते हैं। उदाहरण के लिए 'साकेत' में उर्मिला-लक्ष्मण के पुन- मिलन के अवसर पर उनकी वियोग-जन्य व्याकुलता शांत हो जाती है, पर इससे स्थायीभाव की पुष्टि में कोई अन्तर नहीं पड़ता। अतः शंकुक का यह तर्क भी निस्सार है। हाँ, इतना अवश्य माना जा सकता है कि केवल उपचिति या परिपुष्टि से ही स्थायीभाव रस-रूप में परिणत नहीं हो सकता अन्यथा लौकिक क्षेत्र में भी शोक गम्भीर या परिपुष्ट होकर रस रूप में परिणत हो जाता। अतः हम शंकुक के तर्क को युक्तिसंगत न मानते हुए भी उनके इस आशय का अवश्य समर्थन कर सकते हैं कि केवल उपचिति से रसनिष्पत्ति संभव नहीं।
इस प्रकार हम देखते हैं कि आचार्य शंकुक के सभी आक्षेप निस्सार या अन- पेक्षित नहीं है। डॉ० नगेन्द्र ने इन आक्षेपों को सर्वथा अमान्य बताया है किन्तु हमारे विचार से ऐसा नहीं है। जैसा कि उपयुक्त विवेचन से स्पष्ट है, क एवं ग वर्ग के आक्षेप निश्चय ही महत्त्वपूर्ण हैं, भले ही उनके समर्थन में समुचित युक्तियाँ न दी जा
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३० रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
सकी हों या स्वयं शंकुक भी उनका समाधान न कर पाये हों। ख वर्ग के आक्षेप अवश्य ही अमान्य हैं। • भट्टलोल्लट की उपलब्धियाँ भट्ट लोल्लट की धारणाए एवं स्थापनाएँ केवल निष्कर्ष रूप में ही उपलब्ध हैं, और वे भी उनके प्रतिद्वन्द्वियों द्वारा प्रस्तुत रूप में। ऐसी स्थिति में भट्टलोल्लट की चिन्तन-प्रणाली, युक्तियों एवं उपलब्धियों का मूल्यांकन सम्यक् रूप में संभव नहीं। फिर भी अब तक के विवेचन के आधार पर कहा जा सकता है कि रस- परम्परा के विकास में उनका योगदान महत्त्वपूर्ण है। कदाचित् वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने भरत की धारणाओं को अपेक्षाकृत स्पष्ट, सुसंगत एवं वैज्ञानिक रूप देने का प्रयास किया। एक तो उन्होंने विभाव, अनुभाव एवं संचारी की प्रक्रियाओं को स्पष्ट करते हुए तीनों तत्त्वों के क्रम एवं स्वरूप का निर्धारण किया। भरत के 'संयोग' या संयोजन-व्यापार को उत्पत्ति, प्रतीति एवं उपचिति जसी तीन प्रक्रियाओं में विश्ले- षित करना भट्टलोल्लट की सूक्ष्म दृष्टि एवं गम्भीर विवेचना का प्रमाण है। दूसरे, अनुभवों के स्वरूप का स्पष्टीकरण करते हुए उन्हें स्थायीभावों से सम्बद्ध करना भी उनकी मौलिक उपलब्धि है भरत ने इनके पारस्परिक सम्बन्ध को स्पष्ट नहीं किया था जिससे अनुभावों को रस की प्रक्रिया मानने की भ्रान्ति सम्भव थी। तीसरे, संचारी भावों को स्थायी भाव के ही संस्कारों के रूप में स्वीकार करना भी उनकी सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचायक है। चौथे, रसानुभूति की प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए तद्र पतानुसंधान के द्वारा भावों की प्रतीति का निर्देश करना भी उनकी नूतन स्थापना थी। इस प्रकार ये चारों धारणाएँ व स्थापनाएँ न केवल भरत के विचारों को स्पष्ट करतीं हैं अपितु उन्हें आगे भी बढ़ाती हैं। स्थायी भाव और रस के अन्तर, रस की स्थिति, एवं सामाजिक की दृष्टि से रसानुभूति की प्रक्रिया-आदि विषयों को उन्होंने उठाया किन्तु उनके सम्यक् विश्ले- षण में वे सफल नहीं हो पाये। जिन विषयों, समस्याओं एवं प्रश्नों को उन्होंने उठाया था, उनका समाधान एक सीमा तक परवर्ती आचार्यों द्वारा हुआ-इस दृष्टि से भी उनका महत्त्व कम नहीं है क्योंकि नूतन अनुसंधान एवं मौलिक चिन्तन के क्षेत्र में केवल समाधान और उत्तरों का ही नहीं-नयी समस्याओं और नये प्रश्नों के प्रस्तुती- -करण का भी महत्त्व होता है।
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५ तप्राचार्य शंकुक का त्र्प्रनुकृतिवाद
भारतीय रस परम्परा में भट्टलोल्लट के अनन्तर आचार्य शंकुक का नाम आता है जिन्होंने भट्टलोल्लट के मत का खण्डन करते हुए अपना मत प्रस्तुत किया। इनका जीवन-काल डा० कान्तिचन्द्र पाण्डेय के अनुसार लगभग नवीं शती का उत्तराद्ध है। दुर्भाग्य से भट्टलोल्लट की भाँति इनका ग्रन्थ भी अनुपलब्ध है, केवल 'अभिनव- भारती' एवं 'काव्य-प्रकाश' में इनके मत की चर्चा संक्षप में की गयी है जिससे इनके विचारों की आंशिक जानकारी प्राप्त होती है। • अभिनव गुप्त द्वारा उल्लिखित मत आचार्य अभिनवगुप्त ने 'अभिनव-भारती' में इनके मत का परिचय दिया है, जिसका हिन्दी-अनुवाद इस प्रकार है-"इसलिये कारणरूप विभावों, कार्य रूप अनुभावों तथा सहचारी रूप व्यभिचारी भावों (नट के) प्रयत्नजन्य होने के कारण कृत्रिम होने पर भी उस प्रकार का (कृत्रिम) प्रतीत न होने वाले लिंग की सामर्थ्य से अनुकर्त्ता में स्थिति रूप से प्रतीत होने वाला राम आदि में रहने वाले मुख्य स्थायी भाव का अनुकरण रूप होता है तथा अनुकरण रूप होने के कारण ही उससे (स्थायी भाव से) भिन्न 'रस' नाम से व्यवहृत होता है। विभाव काव्य के द्वारा उपस्थित होते हैं। अनुभाव शिक्षा या अभ्यास से तथा व्यभिचारी भाव अपने कृत्रिम अनुभावों के अर्जन द्वारा प्रस्तुत होते हैं। स्थायीभाव काव्यबल से भी प्रतीत नहीं होता, रति, शोक आदि शब्द अभिधा शक्ति से रत्यादि को बोधित करते हैं। वाचिक अभिनय के रूप में बोधित नहीं करते हैं ............ अभिनय शब्द की वाचिक शक्ति से भिन्न बोध कराने वाली दूसरी शक्ति है। ............ इसीलिए अनुक्रियमाण (अभिनय द्वारा अनुकरण किया जाने वाला)
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३२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
रति भाव शृंगार रस होता है। अतः (भट्टलोल्लट ने जो) रस को स्थायी भाव रूपी अथवा स्थायी भाव जन्य माना है सो युक्ति संगत नहीं है। ............ और यहाँ नट ही सुखी है, यह प्रतीति नहीं होती है और न यही राम है-इस प्रकार की प्रतीति होती है। न यह 'सुखी नहीं है' अथवा 'राम नहीं है' की प्रतीति होती है। किन्तु चित्र-तुरंगादि न्याय से सम्यक् मिथ्या, संशय तथा सादृश्य रूप समस्त प्रतीतियों से भिन्न प्रकार की प्रतीति होती है। ............ इसलिए विरुद्ध प्रकार की बुद्धियों के सम्मिश्रण के कारण पृथक रूप से भ्रम आदि का निश्चय न हो सकने के कारण उस प्रत्यक्षात्मक अनुभव को किन शब्दों में बताया जाय-इसका निर्णय नहीं किया जा सकता।"१ •'काव्य-प्रकाश' में प्रस्तुत मत मम्मट के काव्य प्रकाश' में प्रस्तुत शंकुक के मत का हिन्दी अनुवाद इस प्रकार है-"काव्य-रचनाओं के अनुसंधान (अनुशीलन या अन्वीक्षण)-बल से तथा शिक्षा और अभ्यास से सिद्ध अपने कार्य (अनुभवादि) से नट या अभिनेता के द्वारा ही प्रकाशित किये जाने वाले, कृत्रिम होने पर भी कृत्रिम न प्रतीत होने वाले, विभाव आदि शब्दों से व्यवहृत होने वाले कारण, कार्य और सहकारियों के संयोग अर्थात् गम्य-गमक भाव रूप सम्बन्ध से अनुमीयमान होने पर भी वस्तु के सौन्दर्य के कारण तथा आस्वाद का विषय होने से अन्य अनुमीयमान अर्थों से विलक्षण स्थायी रूप से सम्भाव्यमान रति आदि भाव वहाँ (अभिनेतादि में वास्तविक रूप में) न रहते हुए भी सामाजिक के संस्कारों से आस्वाद किया जाता हुआ 'रस' कहलाता है।"२ • श्री शंकुक की प्रमुख धारणाएँ उपयुक्त उद्धरणों का विश्लेषण करने पर श्री शंकुक की निम्नाँकित धारणाएँ प्रकाश में आती हैं- (क) स्थायीभाव का विभावादि से सम्बन्ध-स्थायीभाव से विभावादि के सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए उन्होंने बताया कि विभाव स्थायीभाव के कारण हैं, अनुभाव कार्य हैं तथा संचारीभाव उसके सहचारी हैं। (ख) स्थायीभाव की प्रत्यक्ष प्रतीति असंभव-हम स्थायीभाव की स्थिति एवं उदीप्ति का बोध उसके कारण, कार्य एवं सहचारियों के माध्यम से ही प्राप्त करते हैं, उसका प्रत्यक्ष बोध कारण (विभाव), कार्य (अनुभाव) सहचारी (संचारी भाव) के अतिरिक्त स्वतन्त्र रूप में कभी नहीं करते। वस्तुतः स्थायी भाव के रूप में
१. 'हिन्दी-अभिनव भारती' पृष्ठ ४४६-४५० के आधार पर किंचित् संशोधन सहित। २. 'रस-सिंद्धान्त' डॉ० नगेन्द्र, पृष्ठ १५३ के आधार पर।
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आचार्य शंकुक का अनुकृतिवाद ३३
रति, जुगुप्सा आदि ऐसी भाववाचक संज्ञाए हैं जिनका अर्थ-बोध हम अभिधा-शक्ति के कारण ग्रहण करते हैं, अन्यथा वे प्रत्यक्ष रूप में उपस्थित होने वाले पदार्थ नहीं हैं। विभाव, अनुभाव और संचारी भाव से पृथक रूप में स्थायी भाव की प्रतीति न होने के कारण ही भरत मुनि ने रस-सूत्र में स्थायीभाव का उल्लेख नहीं किया था। भट्ट लोल्लट ने इसे रस-सूत्र की न्यूनता समभकर विभावादि से स्थायीभाव के संयोग की बात कही, जबकि शंकुक ने इस प्रयास को अनुचित घोषित करते हुए स्थायीभाव की पृथक एवं स्वतन्त्र सत्ता को अमान्य सिद्ध किया। (ग) स्थायीभाव की अनुकृतिः रस-स्थायीभाव मूलतः लौकिक भाव है जो कि अनुकार्यों अथवा लौकिक भावों में ही रहता है जिसे अभिनेता अनुकरण द्वारा प्रस्तुत करते हैं। अभिनेताओं में स्थायीभाव का उद्बोधन नहीं होता, वे केवल कवि द्वारा व्णित विभावादि के अनुसार अपनी अभिनय-कला के ज्ञान एवं अभ्यास के बल पर कृत्रिम चेष्टाओं (अभिनय) के द्वारा स्थायीभाव की अनुकृति रंग-मंच पर प्रस्तुत करते हैं। यह अनुकृति ही रस है। पूर्ववर्ती व्याख्याताओं ने रस को या तो स्थायी भाव से व्युत्पन्न या उससे अभिन्न माना था, पर शंकुक ने इन दोनों ही मान्यताओं का खंडन करते हुए उसे स्थायीभाव का अनुकृत (=अभिनीत या कला के माध्यम से प्रस्तुत) रूप सिद्ध किया। (घ) रस की प्रतीति-जिस प्रकार विभाव, अनुभाव और संचारी भाव की अनुकृति प्रस्तुत करके अभिनेता स्थायीभाव के अनुकृत रूप (=रस) को प्रस्तुत कर देते हैं उसी प्रकार इन्हीं अवयवों की अनुकृति को देखकर सामाजिक भी स्थायीभाव के अनुकृत रूप का आस्वाद प्राप्त करते हैं। इसी क्रिया को अभिनव द्वारा उल्लिखित मत में 'प्रतीति' का नाम दिया गया है। अभिनेताओं को देखकर दर्शकों की प्रक्रिया किस प्रकार की होती है ? उनकी प्रतीति का स्वरूप क्या है ? क्या अभिनेताओं को देखकर दर्शक उन्हें अनुकार्य या मूल पात्र (जैसे-ऐतिहासिक राम, सीता आदि) ही समझ लेते हैं या उनसे भिन्न? ऐसी स्थिति में उनका ज्ञान या बोध वास्तविक होता है या संशयात्मक अथवा भ्रमात्मक ? आदि प्रश्नों का उत्तर देते हुए शंकुक ने बताया है कि कलाजन्य प्रतीति को सम्यक् ज्ञान, मिथ्या ज्ञान, संशय, सादृश्य आदि में से किसी की भी श्रेणी में नहीं रखा जा सकता-वह प्रतीति तो विलक्षण प्रकार की ही है। उसे शब्दों में बताने की अपेक्षा चित्र-तुरंग के उदाहरण से समझाना अधिक सरल है। जिस प्रकार चित्र में घोड़े को देखकर उसे न तो हम वास्तविक घोड़ा कह सकते हैं और न ही यह कह सकते हैं कि यह घोड़ा नहीं है-उसी प्रकार नाटक में भी अभिनेताओं को न तो मूल ऐतिहासिक पात्रों के रूप में ग्रहण किया जा सकता है और न ही उनसे स्वथा भिन्न
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३४ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
रूप में। वस्तुतः कलात्मक अनुभूति में दो भिन्न प्रकार की स्थितियों का सम्मिश्रण रहता है-वास्तविकता और अवास्तविकता का। इस तथ्य को स्वीकार करते हुए शंकुक ने कहा है-'न संदेह की प्रतीति होती है न यथार्थता या भ्रान्ति की। वह राम है इस प्रकार की बुद्धि भी होती है और वह राम नहीं है यह भी। इस प्रकार परस्पर विरोधी बुद्धियों के सम्मिश्रण से एक ऐमा प्रत्यक्षात्मक अनुभव होता है जिसे बताना कठिन है।' इस प्रकार 'अभिनव-भारती' के उल्लेखानुसार शंकुक ने सामाजिक की रस- प्रतीति को कोई विशिष्ट नाम न देकर परस्पर-विरोधी बुद्धियों के सम्मिश्रण से उप- लब्ध एक विलक्षण अनुभव-मात्र कहा है पर 'काव्य-प्रकाश' में उद्धृत मत के अनुसार शंकुक ने रस-प्रतीति के लिए 'अनुमिति' का प्रयोग किया था। यद्यपि यह उल्लेख अभिनव के तत्सम्बन्धी उल्लेख के प्रतिकूल पड़ता है पर फिर भी विभिन्न व्याख्याताओं ने इसे इतना अधिक महत्त्व दिया है कि शंकुक के मत को 'अनुमितिवाद' तक की संज्ञा दी जाती है। (ड) अनुमितिवाद-डॉ० कान्तिचन्द्र पाण्डेय ने भारतीय न्याय-दर्शन के आधार पर शंकुक के मत की अनुमितिवादी व्याख्या प्रस्तुत करने का सफल प्रयास किया है। न्याय-दर्शन के अनुसार ज्ञान प्राप्ति के चार साधन-प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द-माने गये हैं जिनमें अनुमान भी एक है। अनुमान में वस्तु का अप्रत्यक्ष रूप में ज्ञान प्राप्त किया जाता है, जैसे-धुआँ को देखकर अग्नि की सत्ता का ज्ञान प्राप्त करना। अनुमान के भी तीन भेद माने गये हैं-(१) पूर्ववत् (२) शेषवत् और (३) सामान्यतोद्ृष्ट। पूर्ववत् के अन्तर्गत वे साधन आते हैं जो वस्तु की पूर्व-स्थिति का बोध करवाते हैं, जैसे कि बादलों को देखकर वर्षा के आगमन का अनुमान कर लेना। शेषवत् का सम्बन्ध वस्तु की परवर्ती स्थिति से होता है, जैसे कि नदी में बाढ़ को देखकर पूर्ववर्ती भारी वर्षा का अनुमान करना। सामान्यतोद्ृष्ट में सहचारी कारणों से वस्तु का अनुमान किया जाता है जैसेकि धुँआ को देखकर आग की सत्ता का अनुमान कर लेना। इस दृष्टि से काव्य या नाटक में स्थायीभाव का प्रस्तुतीकरण या ज्ञान अप्रत्यक्ष रूप में होता है; स्थायीभाव एवं उसका अनुकृत रूप रस अनुमेय है, विभाव पूर्ववत् अनुमान है। अनुभाव शेषवत् तथा संचारीभाव सामान्यतोदृष्ट अनुमान है। इस प्रकार सामाजिक अनुमिति या अनुमान की प्रक्रिया द्वारा-पूर्ववत्, शेषवत् एवं सामान्योदृष्ट अनुमानों के द्वारा-स्थायीभाव एवं रस की प्रतीति करता है। इस दृष्टि से प्रतीति का अर्थ होगा-अनुमिति।
३. इण्डियन ईस्थेटिक्स, पृष्ठ सं० ५३
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आचार्य शंकुक का अनुकृतिवाद ३५
इस अनुमितिवादी मत के विरुद्ध भी कई आरोप प्रस्तुत किये जा सकते हैं- जसे कि अनुमान बुद्धि की प्रक्रिया है जबकि रसानुभूति में भावना का व्यापार चलता है तथा अनुमान की प्रक्रिया से ज्ञान-प्राप्ति तो हो सकती है पर उससे आह लादक अनुभूति या रस की प्रतीति कैसे सम्भव है ? फिर लौकिक क्षेत्र में अनुमान से रस की उपलब्धि क्यों नहीं होती ?
इन आरोपों के उत्तर में कहा जा सकता है कि एक तो काव्य-प्रकाशकार के उल्लेख में भी रस-प्रतीति को सामान्य कोटि का अनुमान न मानकर विलक्षण प्रकार का अनुमान कहा गया है अतः उस पर अनुमान की सामान्य बातें लागू नहीं होती; दूसरे न्याय-दर्शन में 'ज्ञान' शब्द इतना व्यापक है कि उसमें अनुभव और अनुभूति का भाव भी सम्मिलित है-उदाहरण के लिए, प्रत्यक्ष-ज्ञान को हम लोक प्रचलित शब्दावली में 'ज्ञान' न कहकर 'अनुभव' या 'अनुभूति' कहना अधिक उपयुक्त समझेंगे जबकि न्याय-दर्शन में इसकी अपेक्षा नहीं है। इसी प्रकार उसमें अनुमिति और अनुमान भी व्यापक अर्थ में प्रयुक्त हैं जिनके अन्तर्गत न केवल ज्ञान के अपितु अनुभव के अप्रत्यक्ष साधन भी आ जाते हैं; यथा-चित्र में तुरंग को देखकर तुरंग का ज्ञान प्राप्त करना तुरंग सम्बन्धी अनुभूति का ही एक विशिष्ट रूप है। अतः 'अनुमिति' के व्यापक अर्थ को ध्यान में रखते हुए उसे व्यावहारिक शब्दावली में 'अनुभव' या 'अनुभूति' भी कह दिया जाय तो कदाचित् अनुचित् न होगा।
अस्तु, पूर्वोक्त आक्षेपों का निराकरण किया जा सकता है किन्तु जब तक यही संदिग्ध है कि शंकुक अनुमितिवादी थे या नहीं-तब तक इस प्रकार की व्याख्याओं एवं तत्सम्बन्धी आक्षेपों पर बहुत गम्भीरता से विचार करना अनावश्यक है। हाँ, इतना अवश्य है कि शंकुक चाहे अनुमानवादी रहे हों या नहीं, किन्तु डॉ० पाण्डे की उपयुक्त व्याख्या स्थायीभाव एवं उससे सम्बद्ध विभावादि के पारस्परिक सम्बन्धों को स्पष्ट करने में पर्याप्त सहायक होती है।
· भट्ट लोल्लट से तुलना
शंकुक के मत की नूतनता एवं मौलिकता को हृदयंगम करने के लिए उसकी तुलना भट्ट लोल्लट के मत से की जा सकती है। यहाँ दोनों के मत संक्षेप में, तालिका-रूप में प्रस्तुत किये जाते हैं।
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३६ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
भट्ट लोल्लट एवं शंकुक के मत
विषय भट्ट लोल्लट का मत शंकुक का मत
१. स्थायीभाव =विभाव से उत्पन्न । =विभाव कारण है। =अनुभावों से प्रतीयमान =संचारीभाव से पुष्ट। =अनुभाव कार्य है। =संचारीभाव सहचारी है। =अनुकार्यों में स्थित =अनुकार्यों में स्थित
२. रस =स्थायीभाव का विभा- =स्थायीभाव का अनु- वादि के माध्यम से कृत रूप । परिपुष्ट रूप
३. सामाजिक की रस =अभिनेताओं में अनुकार्यों =अभिनेताओं द्वारा अनु- प्रतीति का आधार से तद्रू पता का अनुसंधान कृति तथा सामाजिक द्वारा अनुमिति।
४. रस और स्थायी- =मूलतः दोनों में विशेष =स्थायीभाव लौकिक भाव का सम्बन्ध अन्तर नहीं। अनुभूति है जबकि रस विलक्षण अनुभूति है।
५. स्थायीभाव की =विभावदि से पृथक सत्ता =विभावादि से पृथक सत्ता सत्ता सम्भव। सम्भव नहीं।
• तालिका की व्याख्या : समानताएँ (क) भट्टलोल्लट ने स्थायी भावों को विभावों से उत्पन्न, अनुभावों से प्रतीयमान एवं संचारी भावों से पुष्ट बताया वहाँ शंकुक ने इन्हें क्रमशः स्थायीभाव के कारण, कार्य एवं सहचारी के रूप में उल्लिखित किया। वस्तुतः यहाँ शब्दावली का ही अन्तर मुख्य है ; अर्थ की दृष्टि से तथा इन तत्त्वों के पारस्परिक सम्बन्धों की दृष्टि से लोल्लट एवं शंकुक की धारणाओं में विशेष अन्तर नहीं है। एक ने यदि विभाव को स्थायीभाव का जनक बताया है तो दूसरे ने उसे उसका कारण बताया है; इसी प्रकार अनुभावों को लोल्लट ने भावों के अनुवर्ती या परवर्ती स्वीकार किया है तो शंकुक ने उनको कार्य के रूप में मान्यता दी है। संचारियों को लोल्लट ने संस्कार रूप में स्थायी के सहचारी रूप में स्वीकार किया है तथा, यही बात शंकुक ने कही
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आचार्य शंक का अनुकृतिवाद ३७ है। अतः स्थायीभाव एवं उसके घटक तत्त्वों की दृष्टि दोनों लगभग एकमत हैं। दोनों का समन्वित मत है : स्थायीभाव=विभाव अनुभाव+संचारीभाव। (ख) स्थायी भाव को दोनों ने ही मुख्यतः अनुकार्यों (ऐतिहासिक पात्रों) में स्थित मानते हुए लौकिक अनुभूति माना है। (ग) स्थायी भाव और रस के पारस्परिक सम्बन्ध की व्याख्या करते हुए भट्टलोल्लट ने रस को स्थायीभाव का विभावादि के माध्यम से परिपुष्ट रूप माना है जिसका अर्थ है-विभाव, अनुभाव और संचारी के माध्यम से ही स्थायी भाव का प्रस्तुतीकरण रस-निष्पत्ति के लिए अपेक्षित है तो शंकुक ने स्थायीभाव के अनुकृत रूप अर्थात् विभाव, अनुभाव, संचारी की अनुकृति को रस माना है। यहाँ भी परि- पुष्टि एवं अनुकृति में शाब्दिक अन्तर है अन्यथा दोनों का ही अभिप्राय स्थायीभाव के कलात्मक माध्यम से प्रस्तुतीकरण से ही है। यदि स्थायीभाव को शब्द के माध्यम से उल्लिखित न करके उसके विभिन्न अंगों (विभाव, अनुभाव एवं संचारी) को अभिनय द्वारा प्रस्तुत किया जाय तो वही रस में परिणित हो जायगा। अतः संक्षेप में दोनों की धारणाओं का समन्वित रूप है : स्थायीभाव+कलात्मक माध्यम= रस। (घ) सामाजिक को रस-प्रतीति अभिनेताओं के अभिनय के द्वारा होती है : इसी प्रक्रिया को भट्टलोल्लट ने सामाजिक द्वारा 'तद्र पतानुसंधान' (अनुकार्यों के अनुरूप अभिनय का अन्वीक्षण) कहा है तो शंकुक ने इसे अनुकृति के माध्यम से अनुमित्ति माना है : संक्षेप में, तद्र पता=अनुकृति ; अनुसंधान=अनुमति। • भट्टलोलट एवं शंकुक में मतभेद उपयुक्त प्रसंगों में शंकुक की धारणाएँ मूलतः भट्टलोल्लट के अनुरूप ही हैं दोनों में अन्तर केवल शब्दावली का है, व्यावहारिक दृष्टि से दोनों में विशेष अन्तर नहीं है। पर शंकुक की कुछ धारणाएँ ऐसी भी हैं जो लोल्लट के मत के प्रतिकूल पड़ती हैं। एक तो शंकुक ने यह स्पष्ट किया कि स्थायीभाव की विभावादि से पृथक स्वतंत्र सत्ता नहीं है, दूसरे उन्होंने स्थायीभाव की अनुभूति से रस की अनुभूति को सर्वथा भिन्न एवं विलक्षण प्रकार की सिद्ध करते हुए दोनों के सूक्ष्म अंतर की ओर संकेत किया। तीसरे, उन्होंने कलात्मक अनुभूति में कृत्रिमता और स्वाभाविकता, वास्तविकता और अवास्तविकता के मिश्रित ज्ञान-दो परस्पर-विरोधी बुद्धियों के सम्मिश्रण या योग के रूप में माना है। वस्तुतः ये तीनों ही धारणाए भट्टलोल्लट की धारणाओं से अधिक सूक्ष्म, विकसित एवं संगत है ; अतः शंकुक को न केवल भट्टलोल्लट की अनेक धारणाओं को नयी शब्दावली में प्रस्तुत करने का श्रेय है अपितु उन्होंने पूर्ववर्ती मत को और अधिक विकसित करते हुए रस-निष्पत्ति सम्बन्धी चिन्तन को आगे बढ़ाया है-इसमें कोई संदेह नहीं।
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३८ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
आक्षेप-भट्टतोल तथा अन्य कतिपय विद्वानों ने शंकुक के मत पर आक्षेप करते हुए कहा है कि रस को स्थायीभाव का अनुकृत रूप कहना अनुचित है क्योंकि अभिनेता और सामाजिक-दोनों की ही दृष्टि से स्थायी भाव की अनुकृति एवं उससे रस-निष्पत्ति संभव नहीं। वस्तुतः यह आक्षेप 'अनुकृति' के अत्यन्त संकीर्ण अर्थ पर आधारित है। हमारे विचार से नाटक के प्रसंग में अनुकृति का अभिप्राय अभिनय- कला से है तथा इसे और भी व्यापक अर्थ में ग्रहण करते हुए इसका अर्थ कलात्मक माध्यम किया जा सकता। इस प्रकार स्थायीभाव की अनुभूति का अर्थ है स्थायी भाव को अभिनय अथवा किसी अन्य कलात्मक माध्यम से प्रस्तुत करना। इस दृष्टि से विचार करने से उप युक्त आक्षेप निरर्थक सिद्ध हो जाता है। अनुकृति की ही भाँति अनुमिति या अनुमान की प्रक्रिया पर भी आक्षेप किया गया है जो 'ज्ञान' और 'अनुमान' के सँकीण अर्थों पर आश्रित है। इस आक्षेप का भी निराकरण करते हुए अन्यत्र कहा जा चुका है कि इस प्रसंग में ज्ञान का अभिप्राय अनुभव एवं अनुमिति का तात्पर्य अनुभूति या प्रतोति है-अतः यह आक्षेप भी निराधार है। अस्तु, रस-चिन्तन की परम्परा को आगे बढ़ाने तथा उसे विकसित करने में निश्चय ही शंकुक का योगदान है-यह निःसकोच कहा जा सकता है।
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भट्ट नायक का भुक्तिवाद
रस-सिद्धान्त के इतिहास में भट्टनायक (अनुमानतः नवीं शताब्दी) का स्थान युग-प्रवर्त्तक का है-अब तक रस-प्रक्रिया की मीमांसा बहुत स्थूल दृष्टि से होती रही थी; आचार्य भरत से लेकर शंकुक तक सभी ने रस-प्रक्रिया और लौकिक भावाभूति की प्रक्रिया को प्रायः समान स्तर पर रख कर ही विचार किया जब कि भट्टनायक कदाचित् पहले विचारक हैं जिन्होंने सामान्य अनभूति और कलाजन्य अनुभूति के तात्त्विक एवं आधारभूत अन्तर को स्पष्ट करने का सफल प्रयास किया। उनके द्वारा रचित मूल ग्रन्य हृदय-दर्पण अनुपलब्ध है, अतः उनके विचारों की जानकारी केवल 'अभिनव-भारती' एवं 'ध्वन्यालोक लोचन' एवं 'काव्यप्रकाश' के तत्सम्बन्धी विवरण से ही उपलब्ध होती है। अभिनवगुप्त ने इनके मत की चर्चा मुख्यतः खंडन के उद्दश्य से की है, अतः यह कहना कठिन है कि उन्होंने भट्टनायक के विचारों एवं उनके आशय को कहाँ तक शुद्ध एवं मूल रूप में प्रस्तुत किया है, 'काव्य-प्रकाश' के रचयिता ने तो इन्हें अत्यन्त संक्षिप्त रूप में प्रस्तुत किया है। ऐसी स्थिति में भटनायक के मत की प्रामाणिक एवं स्पष्ट जानकारी संभव नहीं। फिर भी प्राप्त सामग्री से जितना परिचय मिलता है उसी के आधार पर इनकी प्रमुख धारणाओं का विवेचन यहाँ प्रस्तुत किया जाता है। •काव्यास्वादन की तीन प्रत्रियाएँ जहाँ शास्त्रीय एवं वैज्ञानिक ग्रन्थों के अध्ययन एवं बोध के लिए शब्दों के सामान्य एवं प्रचलित अर्थ का ज्ञान ही पर्याप्त होता है, वहाँ काव्य या साहित्य के आस्वादन में कुछ अन्य प्रक्रियाओं की अपेक्षा रहती है-इस तथ्य को हृदयंगम करते हुए भट्टनायक ने काव्य-भाषा की तीन प्रक्रियाओं या कार्य-व्यापारों की कल्पना की -(१) अभिधा की प्रक्रिया (२) भावकत्व की प्रक्रिया (३) भोजकत्व की प्रक्रिया।
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४० रस-सिद्धान्त का पुरनवववेचन
किसी भी साहित्यक रचना के आस्वादन के लिए सर्व प्रथम उसमें प्रयुक्त भाषा के अर्थ- बोध की अपेक्षा रहती है या यों कहिए कि सर्व प्रथम हमें उससे अभिधात्मक अर्थ का ज्ञान प्राप्त करना पड़ता है। इसी को अभिधा-व्यापार कहा गया है। काव्य- भाषा के अर्थ-बोध की प्रक्रिया के अनन्तर विषय-वस्तु का बोध भावना या अनभूति के स्तर पर होने लगता है या यों कहिए कि विषय-वरतु का बौद्धिक ज्ञान भावात्मक अनुभुति में परिणत होने लगता है ; यही प्रक्रिया भट्टनायक के अनुसार भावकत्व व्यापार है जिससे काव्य-वस्तु भाव्यमान (भावित) होने लगती है। काव्यास्वादन की तीसरी स्थिति वह है जब कि पाठक की काव्यजन्य भावानुभुति आनन्दानुभूति या रसानुभूति में परिणत होने लगती है-इसी को भोजकत्व व्यापार की संज्ञा दी गयी है। भोजकत्व या भोग का नाम इसे कदाचित् इसलिए दिया गया है कि इस प्रक्रिया के कारण पाठक काव्यजन्य अनुभूतियों का उपभोग करने लगता है, उनमें आस्वाद या आनन्दपूर्ण स्वाद का अनुभव करने लगता है। अस्तु, संक्षेप में भट्टनायक काव्यास्वादन की तीन प्रक्रियाएँ या अनुभूति के तीन स्तर स्वीकार करते हैं-
व्यापार प्रक्रिया अनुभूति का स्तर १. अभिधा-व्यापार काव्य-भाषा का अर्थ-बोध बौद्धिक २. भावकत्व व्यापार काव्य-वस्तु का भावन भावात्मक ३. भोजकत्व व्यापार काव्यानुभूति का आस्वादन अन्तश्चेनात्मक उपयुक्त क्िया-व्यापारों से यह भी स्पष्ट है कि भट्टनायक ने काव्यानुभूति के लिए हमारी बौद्धिक, भावात्मक एवं अन्तश्चेतनात्मक तीनों वर्गों की प्रवृत्तियों के सहयोग एवं समन्वय की ओर संकेत किया है।
• काव्यानुभूति या रसानुभूति का स्वरूप काव्यानुभूति की प्रक्रिया के साथ-साथ भट्टनायक ने काव्यानुभूति के स्वरूप का भी सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत किया है। इस सम्बन्ध में उन्होंने दो प्रकार के प्रयास किये हैं एक तो काव्यानुभूति के स्वरूप के सम्बन्ध में प्रचलित भ्रान्तियों का निराक- रण किया तथा दूसरे उन्होंने साधारणीकरण की प्रक्रिया एवं सत्त्वगुण के प्राधान्य की स्थिति का अनुसंधान करते हुए सामाजिक की अनुभूति का विश्लेषण मनोवैज्ञानिक आधार पर प्रस्तुत किया। यहाँ हम दोनों प्रयासों पर क्रमशः विचार करते हैं- (१) काव्यानुभूति सम्बन्धी भ्रान्तियाँ इनसे पूर्व आचार्यों ने काव्यानुभूति को प्रायः मूल ऐतिहासिक पात्रों की ही अनुभूति से सम्बन्धित माना था। उदाहरण के लिए, भट्टलोल्लट ने ही काव्य में भावों की तीन प्रक्रियाएँ उल्लिखित की थीं-विभावों से स्थायीभाव की उत्पत्ति, अनुभावों से प्रतीति एवं संचारीभावों से पुष्टि या अभिव्यक्ति; इसका तात्पर्य यह हुआ
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भट्टनायक का भुक्तिवाद ४१
कि जिस प्रकार व्यावहारिक जीवन में भावों की उत्पत्ति, प्रतीति एवं पुष्टि या अभिव्यक्ति होती है, उसी प्रकार काव्य से भी ये तीनों प्रक्रियाएँ संपादित होती हैं। भट्टनायक ने इन तीनों प्रक्रियाओं के विरुद्ध अलग-अलग आक्षेप प्रस्तुत करते हुए इन्हें अमान्य सिद्ध किया है। उत्पत्ति की प्रक्रिया के विरुद्ध उनका सबसे बड़ा आक्षेप यह है कि यदि काव्यानुभूति से भी हमारे हृदय में स्थायीभाव की उत्पति ठीक उसी प्रकार होती है जिस प्रकार लौकिक जीवन में अथवा ऐतिहासिक पात्रों के जीवन में होती है तो फिर जुगुप्सा, भय, शोक आदि कटु भावों की भी अनुभूति प्रत्यक्ष जीवन और काव्य -दोनों में एक जैसी ही होनी चाहिए। उस स्थिति में वीभत्स, भयानक, करुण आदि की काव्यात्मक अनुभूति रसात्मक या आनन्दमय नहीं होनी चाहिए। यदि इसके उत्तर में कहा जाता है कि काव्य में वीभत्स, भयानक, करुण आदि की अनु- भूति पाठक की अपनी अनुभूति नहीं होती, अपितु दूसरों की होती है-अतः दुःख नहीं होता, तो उस स्थिति में भट्टनायक का तर्क है कि दूसरों की अनुभूति पाठक की अनुभूति कैसे बन सकती है ? इसी प्रकार स्थायीभाव की प्रतीति की बात भी भट्टनायक स्वीकार नहीं करते। किसी भी वस्तु या भाव की प्रतीति के साधन स्मृति, अनुमान, प्रमाण, प्रत्यक्षबोध आदि बताये जाते हैं। काव्य से हमें जिस स्थायीभाव की प्रतीति होती है वह इन चारों प्रकार के आधारों में से किसी की भी कोटि में नही आता; यथा -'गोदान' के होरी का दुःख न तो हमारी अपनी स्मृति पर आधारित है, न उसमें बौद्धिक अनुमान रहता है, न वह प्रमाण या तर्क से बोधित है और न ही हम उसका प्रत्यक्ष-बोध प्राप्त करते हैं ? ऐसी स्थिति में होरी के शोक की प्रतीति हमें किस प्रकार होती है ? और यदि यह मान भी लिया जाय कि हमें प्रतीति हो जाती है तो भी दूसरों के सुखात्मक या दुःखात्मक भावों की प्रतीति से हमें ईर्ष्या, उपेक्षा या करुणा की ही अनुभूति होनी चाहिए ; उसमें रसात्मकता का संचार संभव नहीं। रही बात अभिव्यक्ति की। अभिव्यक्त होने का अर्थ है-पहले से उपस्थिति या अनुभूति। जब हम कभी किसान बने ही नहीं, खेत में काम ही नहीं किया और होरी की वेदनाओं को जीवन में कभी अनुभव ही नहीं किया तो फिर उनकी अभि- व्यक्ति कैसे संभव है ? अस्तु, दूसरों की भावानुभूति से अपने भावों की अभिव्यक्ति संभव नहीं-यह भट्टनायक का अभिव्यक्ति के विरुद्ध तर्क है। इस प्रकार भट्टनायक ने अत्यन्त सशक्त तर्कों के आधार पर भावान्भूति की तीनों ही प्रक्रियाओं-उत्पत्ति, प्रतीति एवं अभिव्यक्ति-से रसानुभूति की उपलब्धि की बात अस्वीकार की है। ऐसी स्थिति में रस-प्रक्रिया की पूर्ववर्ती सभी व्या- ख्याएँ जो कि उपयुक्त तीनों क्रिया-व्यापारों में से किसी एक को या सबको आधार बनाकर प्रस्तुत की गयी थी, अप्रमाणिक सिद्ध हो जाती हैं।
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४२ रस-सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
(२) भावानुभूति एवं काव्यानुभूति का मौलिक अन्तर : साधारणीकरण- काव्य में चित्रित पात्रों की अनुभूतियाँ मूलतः लौकिक होती हुईं भी काव्या- स्वादन की प्रक्रिया की वेला में साधारणीकृत हो जाती हैं ; अतः लौकिक अनुभूतियों से काव्यानुभूति का पहला अन्तर इस साधारणीकरण का ही है। यह साधारणी- करण भट्टनायक के अनुसार काव्य की भावकत्व प्रक्रिया के कारण होता है। सामान्य जीवन की भावनाएँ और अनुभूतियाँ व्यक्ति-विशेष से सम्बद्ध रहती हैं जबकि काव्य में वे सर्व साधारण की, प्रत्येक सहृदय पाठक की अनुभूतियाँ बन जाती हैं। एक व्यक्ति की अनुभूति का सर्वसाधारण की अनभूति बन जाना ही साधारणीकरण है। प्रश्न है, काव्य में ऐसी क्या बात है जिसके कारण वैयक्तिक अनुभूतियाँ साधारणीकृत हो जाती हैं ? इसके उत्तर में कहा गया है-'काव्य में दोषों के अभाव गुणों एवं अलंकारों के संयोजन से तथा नाटक में चारों प्रकार के अभिनय के द्वारा साधारणीकरण होता है। इसका अर्थ यह है कि भट्टनायक काव्य के काव्यत्व (=दोषाभाव+गुण+अलंकार) एवं नाटक के अभिनय में ही एक ऐसी प्रभावो- त्पादक शक्ति मानते हैं जिससे काव्यगत विभावों का साधारणीकरण हो जाता है। यदि हम काव्यत्व एवं अभिनय-इन दोनों को सामान्यीकृत रूप में देखें तो इनके स्थान पर 'कलात्मकता' का प्रयोग किया जा सकता है। यद्यपि उपलब्ध उल्लेखों में यह स्पष्ट नहीं है कि काव्यात्मकता या कलात्मकता के कारण काव्य- वस्तु का साधारणीकरण किस प्रकार होता है, पर इतना स्पष्ट है कि भट्ट- नायक के मतानुसार काव्यात्मकता या कलात्मकता के कारण ही भावकत्व व्यापार संपादित होता है जिसका परिणाम साधारणीकरण है। संक्षेप में-
कलात्मकता भावकत्व साधारणीकरण। भावकत्व व्यापार की यह प्रक्रिया जहाँ काव्य-वस्तु की दृष्टि से साधारणी- करण का कार्य करती है वहाँ व्यक्ति या पाठक की दृष्टि से वह 'निजमोह संकटता निवारण' का कार्य भी संपादित करती है। 'निज मोह संकटता' क्या है ? व्यक्ति का अपनी वैयक्तिकता के मोह से ग्रस्त रहना या अपने अहंकार की सीमाओं में आबद्ध रहना ही 'निजमोह संकटता' है जिसके कारण हम व्यावहारिक जीवन में अपने से असम्बद्ध व्यक्तियों की भावानुभूतियों को प्रायः हृदयंगम नहीं कर पाते। अतः भावकत्व व्यापार की एक ही साथ दो प्रक्रियाए स्वीकार करनी होगी- वस्तु के पक्ष में साधारणीकरण एवं व्यक्ति के पक्ष में वैयक्तिकता की सीमाओं से मुक्ति अतः पूर्व उपलब्ध निष्कर्ष को विकसित रूप में इस प्रकार प्रस्तुत किया जा सकता है-
काव्यात्मकता (कलात्मकता)-भावकत्व- / साधारणीकरण वैयक्तिकता से मुक्ति
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(३) काव्यानुभूति में सत्त्व गुण की प्रधानता यह ठीक है कि साधारणीकरण के कारण पाठक काव्यगत पात्रों की अनु- भूतियाँ का अनुभव प्राप्त कर लेता है, पर फिर एक समस्या रह जाती है-काव्य- गत पात्र की दुःखात्मक अनुभूतियाँ रसात्मकता में किस प्रकार परिणत होजाती है ? इसके उत्तर में भट्टनायक ने सत्त्वगुण की प्रधानता की बात कही है। सत्त्वगुण की धारणा परम्परागत भारतीय दर्शन पर आधारित है, जिसका विस्तृत एवं स्पष्ट विवेचन गीता के चौदहवें अध्याय में उपलब्ध होता है-अतः भट्टनायक के तत्स- म्बन्धी विचारों पर अवलोकन करने से पूर्व उक्त धारणा को दार्शनिक दृष्टि से समझ लेना आवश्यक है। सांख्य दर्शन एवं गीता के अनुसार समस्त सृष्टि या प्रकृति त्रिगुणात्मक है- इसके तीन गुण हैं ; सत्त्व, रज और तम। इन्हीं गुणों के मेल से विभिन्न भौतिक पदार्थों एवं मानसिक स्थितियों का संघटन व विकास होता है। जहाँ तक मानसिक पक्ष का सम्बन्ध है-सत्त्व ज्ञान, बुद्धि एवं निर्मलता का सूचक है, रज इच्छा एवं भावना पर आश्रित है तथा तम अज्ञान, प्रमाद आलस्य और निष्क्रियता का सूचक है। आधुनिक शब्दावली में स्पष्ट करते हुए कहा जा सकता है कि ये तीनों गुण कमशः बौद्धिक, भावात्मक एवं अचेतनात्मक प्रवृत्तियों के सूचक हैं। विभिन्न परि- स्थितियों में इनमें से कोई एक प्रवृत्ति प्रमुख होकर शेष दो को अपने प्रभाव के अन्तर्गत ले लेती हैं। इन्हीं की प्रमुखता को क्रमशः सत्त्व, रज या तम के गुणों की प्रमुखता बताया गया है। भट्टनायक ने भी काव्यानुभूति की गंभीरतम एवं उच्चतम अवस्था में पाठक या सामाजिक के मन में सत्त्व गुण की प्रधानता एवं रजोगुण और तमोगुण की गौणता की बात कही है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि इन दोनों गुणों का सर्वथा लोप हो जाता है अपितु यह है कि ये दोनों गुण भी सत्त्वगुण में सम्मिश्रित एवं समन्वित होकर अपनी विशिष्टता को या प्रमुखता को त्याग देते हैं। इस स्थिति को, यदि दार्शनिकता से बचकर सामान्य शब्दावली में स्पष्ट किया जाय तो इस प्रकार कहा जा सकता है- सत्त्व की प्रधानता=बौद्धिकता की प्रमुखता रज का मिश्रण =रागात्मकता का अहं से मुक्त होकर बुद्धि के नियंत्रण में चला जाना तम का मिश्रण =अज्ञान या भ्रान्ति अथवा मिथ्या प्रतीति (=कल्पना- त्मक अनुभूति) का भी बौद्धिकता से मेल हो जाना। उपर्युक्त स्थिति के विश्लेषण के आधार पर कहा जा सकता है कि भट्टनायक रसानुभूति को ऐन्द्रियक एवं भावात्मक (निजी संवेदनात्मक) अनुभूति से ऊपर के स्तर की अर्थात् बौद्धिक स्तर की अनुभूति मानते हैं। उसमें हम सत्य का ज्ञान ही
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४४ रस-सिद्धान्त का पुनर्वविवेचन नहीं साक्षात्कार या प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करते हैं। बौद्धिक प्रवृत्तियों का चरम लक्ष्य एवं उनकी परम संतुष्टि सत्य के साक्षात्कार में निहित है-शास्त्र और विज्ञान से भी सत्य की प्रतीति होती है, पर वह पर-प्रत्यक्ष होती है, उनसे सत्य का केवल शाब्दिक ज्ञान मात्र होता है, भावात्मक अनुभव नहीं, जबकि काव्यानुभूति के क्षणों में हम भावों के सच्चे, शुद्ध (वैयक्तिक सीमाओं से मुक्त) एवं पूर्ण रूप की अनुभूति प्राप्त करते हैं। संक्षेप में यह भावों की सत्यता (राग-द्वष से मुक्त रूप) का बोध ही सत्य के भावात्मक रूप का बोध हैं, जिसे भट्टनायक ने सत्त्व का उद्रक कहा है। सत्य की अनुभूति के लिए भावात्मकता तो अपेक्षित है पर वह वैयक्तिकता या निजी अहं के दूषित प्रभाव से मुक्त रहनी चाहिए। काव्यानुभूति में रजोगुण के सत्त्व के अधीन रहने के कारण यही स्थिति उत्पन्न हो जाती है। कला में वास्तविकता और अवास्तविकता का मेल रहता है जिसे कल्पना कहा जा सकता है। यह कल्पना ही यहाँ तमोगुण की सूचक है। काव्यानुभूति में इसका भी मिश्रण रहता है। इस प्रकार भट्टनायक के अनुसार काव्यास्वादन में बुद्धि के नेतृत्व में भावना एवं कल्पना का संयोग रहता है ; सत्त्व की प्रधानता का यही अर्थ है। • भट्टनायक की उपलब्धियाँ भट्ठनायक की उपयुक्त्त धारणाओं के अध्ययन से स्पष्ट है कि रसास्वादन की प्रक्रिया के विश्लेषण में उन्होंने सूक्ष्म मनोवज्ञानिकता एवं मौलिकता का परिचय दिया है। वस्तुतः रस परम्परा में वे पहले व्यक्ति हैं जिन्होंने काव्य के संदर्भ में रस- प्रक्रिया का विश्लेषण करते हुए उसकी तीन प्रक्रियाओं-अर्थबोध, भावना एवं आस्वा- दन-का क्रम निर्धारित किया जो आधुनिक दृष्टि से भी मान्य कहा जा सकता है। इसके अतिरिक्त लौकिक भावानुभूति एवं काव्यानुभूति के अन्तर को स्पष्ट करते हुए उन्होंने साधारणीकरण सिद्धान्त का आविष्कार किया जो कि परवर्ती युग में उनके विरोधियों द्वारा भी मान्य हुआ। काव्यानुभूति में कलात्मकता एवं बौद्धिकता के योग को भी उन्होंने सम्यक् रूप में स्पष्ट किया। अस्तु, इसमें कोई संदेह नहीं कि उनकी रस सम्बन्धी अनेक धारणाएँ मौलिक, गम्भीर एवं सन्तुलित हैं तथा रस- सिद्धान्त की प्रक्रिया (काव्यास्वाद की प्रक्रिया) को स्पष्ट एवं सुसंगत रूप प्रदान करने की दृष्टि से उनका योगदान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है।
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७ अभिनव गुप्त का तप्रभिव्यक्तिवाद
भारतीय काव्य-चिन्तन की परम्परा में आचार्य अभिनवगुप्त का स्थान अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है जिन्होंने रस-सिद्धान्त की अभिव्यक्तिवादी व्याख्या प्रस्तुत करते हुए उसे एक अत्यन्त व्यापक रूप प्रदान किया। इन्होंने अपना परिचय स्वरचित ग्रन्थों में दिया है जिससे ज्ञात होता है कि वे कश्मीर के राजा ललितादित्य के आश्रित थे तथा इनका जीवन-काल ईसा की दसवीं शती उत्तर्राद्ध से लेकर ग्यारहवीं शती पूर्वाद्ध तक था। इनके द्वारा रचित अनेक ग्रन्थ उपलब्ध हैं जिनमें से काव्य-शास्त्रीय वर्ग में 'अभिनव भारती' एवं 'ध्वन्यालोक-लोचन' आते हैं। इनमें क्रमशः 'नाट्य शास्त्र' (भरत मुनि द्वारा रचित) एवं 'ध्वन्यालोक' की व्याख्या नूतन दृष्टि से की गयी है तथा रस-सूत्र के प्रसंग में रस सम्बन्धी निजी विचारों का प्रतिपादन किया गया है। अतः आगे इन्हीं ग्रन्थों के आधार पर अभिनवगुप्त के रस सम्बन्धी विचारों का अध्य- यन प्रस्तुत किया जाता है।
• अभिनवगुप्त के दृष्टिकोण की वैज्ञानिकता
आचार्य अभिनवगुप्त की काव्य-शास्त्रीय मीमांसा में सर्वप्रथम लक्ष्य करने की बात उनके दृष्टिकोण की वैज्ञानिकता है। जहाँ संस्कृत के अनेक पूर्ववर्ती आचार्यों की काव्य-चिन्तना का लक्ष्य केवल अन्य मतों का खण्डन करके स्वमत की स्थापना करने का ही रहा है-अतः ऐसी स्थिति में वे पूर्वाग्रह से मुक्त नहीं हो पाते थे-वहाँ आचार्य अभिनवगुप्त ने पूर्ववर्ती मतों के प्रति खण्डन-मण्डन के लक्ष्य से दूर रहकर तटस्थ दृष्टि से पूर्ववर्ती मतों के संशोधन का लक्ष्य अपनाया है, जिसकी घोषणा उन्होंने इस प्रकार की है-
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४६ रस सिद्धान्त का पुनर्विवेचन
तस्मात् सतामत्र न दूषितानि मतानि तान्येव तु शोधितानि। पूर्व प्रतिष्ठापित योजनासु मूल प्रतिष्ठाफल मामनन्ति॥ -अभिनव भारती, अर्थात् 'इसलिए हमने प्राचीन सज्जन आचार्यों के मतों का (पूर्व आलोचना में दूषण) खण्डन नहीं किया है अपितु (उन्हीं का विशेष परीक्षा द्वारा) संशोधन किया है क्योंकि पूर्व आचार्यों द्वारा स्थापित सिद्धान्तों की भली प्रकार संगति लगा देने में मौलिक सिद्धान्तों की स्थापना का सा ही फल मिलता है।' (हिन्दी अभिनव भारती; पृ० ४६९) अस्तु, उपयुक्त उद्धरण के आधार पर यह निःसंकोच कहा जा सकता है कि आचार्य अभिनवगुप्त ने वैयक्तिक आग्रहों से मुक्त रहकर परम्परागत रस सिद्धान्त पर तटस्थ दृष्टि से विचार करते हुए उसे सुसंगत रूप देने का प्रयास किया है। उनके दृष्टिकोण को आज की शब्दावली में 'वैज्ञानिक दृष्टिकोण' कहा जाय तो अनुचित न होगा।
· रस का स्वरूप 'अभिनव भारती' में रस के स्वरूप की विवेचना करते हुए अभिनवगुप्त ने अनेक नयी बातें कही हैं जो संक्षेप में इस प्रकार हैं- (क) रस ही नाट्य है अर्थात् रस नाटक का केवल एक अंग या एक तत्त्व नहीं है अपितु समस्त नाटक या काव्य में व्याप्त सर्वांगीण तत्त्व है। इसी रस की अनुभूति ही नाटक का फल है। दूसरे शब्दों में रस का सम्बन्ध नाटक या काव्य के सम्पूर्ण प्रभाव से है।
(ख) काव्य का अर्थ ही रस है अर्थात् रस का सम्बन्ध काव्य के सम्पूर्ण अर्थ से है। रस का सम्बन्ध नाटक या काव्य के भाव-विशेष से नहीं अपितु, उसके सम्पूर्ण अर्थ से है। इस दृष्टि से काव्य के भावात्मक तत्त्वों के अतिरिक्त बौद्धिक तत्त्वों का भी रस से सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। यहाँ यह उल्लेखनीय है कि अभिनवगुप्त शान्त रस को ही सर्वोपरि रस मानते थे तथा शान्त रस में तत्त्व-बोध या विचार की प्रमुखता रहती है, अतः 'अर्थ' शब्द पर विशेष बल देकर उन्होंने अप्रत्यक्ष में काव्यगत बौद्धिकता या शान्त रस का अनुमोदन किया है। (ग) रस नायक की स्थायिभावात्मक चित्तवृत्ति-स्वरूप होता है-एक रचना
१. 'तेन रस एव नाट्यम्'; ६/१५, हि० अ० पृ० ४२८ २. 'तत्काव्यार्थो रस: ६/३१ ३. 'नायकामिधान भोक्तृ विशेष स्थायि चित्तवृत्ति स्वभावः' ६/१५, ४२७
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अभिनव गुप्त का अभिव्यक्तिवाद ४७
में विभिन्न पात्र होते हैं जो विभिन्न स्थायी भावों की अभिव्यक्ति करते हैं; यथा- 'रामचरित मानस' में परशुराम क्रोध की, दशरथ वात्सल्य की, सीता प्रणय की, अभिव्यक्ति करती हैं। ऐसी स्थिति में यह प्रश्न उठता है कि इस ग्रन्थ में व्याप्त रस या प्रमुख रस का निर्णय किस स्थायी भाव के आधार पर किया जाय? आचार्य अभिनवगुप्त के मतानुसार काव्य या नाटक में प्रधान भोक्ता-नायक के स्थायीभाव से सम्बन्धित रस ही उस रचना का रस (या अंगीरस) माना जाना चाहिए। (घ) स्थायी भाव और रस में अन्तर-यद्यपि रस नायक के स्थायी भाव के अनुरूप ही होता है फिर भी दोनों एक ही नहीं है; आचार्य अभिनवगुप्त के अनु- सार स्थायी भाव जहाँ सामान्य लौकिक अनुभूति है वहाँ रस की अनुभूति नाटक, काव्य आदि से ही होती है।5 दूसरे, रस में स्थायी भाव नाट्यांग, गुण, अलंकार आदि तत्त्वों से युक्त होने के कारण सौन्दर्य युक्त हो जाता है जब कि सामान्य स्थायी भाव इन तत्त्वों से शून्य हो जाता है।4 तीसरे, रस में स्थायी भाव साधार- णीकृत रूप में होता है तथा उसकी अनुभूति निर्विघ्न रूप में होती है, इसलिए उसका आस्वाद भी रसनीय या आनन्दमय हो जाता है।0 इस प्रकार स्थायी भाव की लौकिक अनुभूति एवं रसात्मक अनुभूति में क्र्मशः कलात्मकता, सौन्दर्यात्मकता, साधारणीकरण, निर्विध्नता एवं रसनीयता-इन पाँच विशेषताओं का अन्तर है। (ङ) रसानुभूति का स्वरूप-सामान्यतः लौकिक जीवन में हम विभिन्न वस्तुओं एवं परिस्थितियों के बोध के समय तीन प्रकार की दृष्टियाँ अपना सकते हैं-(१) योगी की भाँति तटस्थ दृष्टि (२) परायेपन की भावना के कारण उपेक्षा- पूर्ण दृष्टि या (३) अपनत्व की भावना के कारण स्वार्थपूर्ण दृष्टि। रसानुभूति के समय हम इन तीनों ही दृष्टियों से भिन्न प्रकार की दृष्टि अपनाते हैं। हम विषय वस्तु से तटस्थ रहते हुए भी उसके प्रभाव से मुक्त नहीं रहते; हम यह जानते हुए भी कि वह हमारी अपनी कहानी नहीं है हम उसकी उपेक्षा नहीं कर पाते, उसमें आत्मीयता का बोध करते हुए भी व्यक्तिगत स्वार्थ, अहं और हानि-लाभ के विचार से मुक्त रहते हैं। इस अनुभूति को विलक्षण प्रकार की अनुभूति ही कहा जा सकता है। रसानुभूति को 'साक्षात्कारात्मिका प्रतीति' 'निर्विघ्न प्रतीति' एवं विश्रान्तिरूप या चमत्कारपूर्ण प्रतीति भी कहा जा सकता है। 'साक्षात्कारात्मिका प्रतीति' से
४. हिन्दी अभिनय भारती; पृष्ठ ५०४ ५. 'अन्ये तु काव्येऽपि गुणालंकार सौन्दर्यातिशयकृतं रसचर्वणमाहुः । (हिन्दी अभि- नव भारती; अध्याय ६/पृष्ठ ५०५) ६. हिन्दी अभिनव भारती; पृष्ठ ४८६ ७. हिन्दी अभिनव भारती; पृष्ठ ४८३
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४८ रस-सिद्धान्त का पुनर्बिवेचन
आशय यह है कि रसानुभूति के समय हमारे मानसिक चक्षुओं के सम्मुख मूल ऐतिहासिक पात्र या उनके क्रिया-कलाप वास्तविक रूप में न होते हुए भी नाटक में अभिनय के कारण तथा काव्य में बिम्ब-विधान के कारण हमें प्रत्यक्ष से ही दिखाई पड़ते हैं। डॉ० नगेन्द्र ने इसे कल्पना से भी सम्बन्धित किया है जो ठीक है। वस्तुतः कला के क्षेत्र में विषय वस्तु का बोध न सर्वथा वास्तविक रूप में होता है न अवास्तविक रूप में, और न उसे हम पूर्णतः प्रत्यक्ष कह सकते हैं और न ही परोक्ष-अपितु वह इन सबसे भिन्न काल्पनिक या कल्पनात्मक बोध होता है। लौकिक अनुभूति में हम देश-काल के बन्धनों एवं वैयक्तिक सीमाओं के कारण किसी भी दृश्य की अनुभूति पूर्ण निश्चिन्तता एवं निर्विघ्नता से नहीं कर पाते। चल-चित्र पर जब हम आग लगने का दृश्य देखते हैं तो न तो हम अपने घर को बचाने के लिए दौड़ते हैं, और न ही सामनेवालों की सहायता के विचार से प्रेरित होते हैं। जबकि व्यावहारिक जीवन में ऐसा नहीं होता। दैनिक जीवन में सुन्दर दृश्यों को देखकर भी पूर्णतः निर्विघ्न नहीं रह पाते-उसे स्थायी रूप से पाने की लालसा या दूसरों की बाधा अथवा अपनी अन्य चिन्ताओं के कारण उस अनुभूति में कोई न कोई वैचारिक या व्यावहारिक विघ्न उपस्थित हो जाता है, अतः उसका आस्वादन पूर्णतः नहीं कर पाते। ये विघ्न और भी कई प्रकार के हैं जिनकी चर्चा अन्यत्र की जायगी। रसानुभूति के समय एक ओर तो हम प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष, वास्तविक एवं अवास्तविक, अपने और पराये की भावना से भिन्न एक विलक्षण चमत्कार पूर्ण अनुभूति प्राप्त करते हैं, दूसरी ओर हमारी चेतना सभी प्रकार की वैयक्तिक चिन्ताओं से मुक्ति पाकर पूर्ण विश्रान्ति (शान्ति) की अनुभूति प्राप्त करती है जो आनन्दमय होती है। इसीलिए उसे चमत्कार, विश्रान्ति, रसनीयता आदि से उपमित किया गया है। इस प्रकार आचार्य अभिनवगुप्त ने रस के स्वरूप को अत्यन्त व्यापक रूप में प्रस्तुत करते हुए उसकी अनुभूति के विभिन्न पक्षों, तत्त्वों एवं रूपों का विश्लेषण सूक्ष्मातिसूक्ष्म रूप में किया है। उनके विचार से लौकिक भावानुभूति एवं रसानुभूति में मुख्यतः कलात्मकता, सौन्दर्यात्मकता, साधारणीकरण, निर्विघ्नता एवं रसनीयता का अन्तर है।
• रसानुभूति के आधार आचार्य अभिनवगुप्त ने रसानुभूति के विभिन्न आधारों की चर्चा की है जिन्हें हम तीन वर्गों में विभक्त कर सकते हैं-(१) काव्यगत आधार (२) सामाजिकगत आधार और (३) परिस्थितिगत आधार। इनकी विवेचना आगे क्रमशः की जाती है-
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अभिनव गुप्त का अभिव्यक्तिवाद ४९
(क) काव्यगत आधार-आचार्य भरतमुनि ने तथा अन्य पूर्ववर्ती आचार्यों ने रसानुभूति के मूलाधार के रूप में केवल स्थायीभाव तथा उसके विभिन्न अवयवों ही चर्चा की थी इससे काव्य या नाटक के भावपक्ष को ही रसानुभूति का सारा श्रेय मिल जाता था-काव्यगत बौद्धिक तत्त्वों एवं शैलीगत सौन्दर्य की सर्वथा उपेक्षा हो जाती थी। आचार्य अभिनवगुप्त ने यद्यपि भावपक्ष का महत्त्व न्यून नहीं किया किन्तु उन्होंने काव्य या नाटक के अभिव्यक्ति पक्ष या प्रस्तुतीकरण के सौन्दर्य पर भी बल देते हुए उसे रसानुभूति का प्रमुख आधार घोषित किया। उनके मतानुसार गीत, नृत्य आदि नाट्यांगों से युक्त तथा स्वीकृत लक्षणों, गुणों, अलंकारों, संगीत वाद्यों आदि के संयोग से 'सम्यक् सुन्दरीभूत' अर्थात् अत्यन्त सौन्दर्य युक्त चित्तवृत्ति या स्थायीभाव ही रस कहा जाता है।इस प्रकार उन्होंने पूर्व प्रचलित वस्तुवादी दृष्टिकोण का समन्वय करते हुए कला-वस्तु के साथ-साथ उसके अभिव्यक्ति पक्ष के महत्त्व को स्वीकार किया। उपयुक्त मान्यता को व्यापक रूप देते हुए कहा जा सकता है कि रसानुभूति का मूलाधार केवल स्थायी भाव नहीं अपितु उसकी कलात्मक अभिव्यक्ति हैं। दूसरे शब्दों में कलात्मक सौन्दर्य रसानुभूति का एक प्रमुख आधार है। (ख) व्यक्तिगत आधार-नाटक या काव्य में जिस विषय-वस्तु का चित्रण या प्रस्तुतीकरण किया जाता है वह प्रायः सामाजिक से असम्बद्ध होती है; उसमें व्यक्त भाव भी किन्ही ऐतिहासिक या काल्पनिक पात्रों से सम्बद्ध होते हैं; ऐसी स्थिति में हम उनसे क्यों प्रभावित होते हैं ? कला में व्यक्त भावनाओं से हमारा क्या सम्बन्ध है ? इन प्रश्नों का सम्यक् उत्तर अभिनवगुप्त से पूर्व नहीं दिया जा सका था। आचार्य अभिनवगुप्त ने इस प्रसंग में सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दृष्टि का परिचय देते हुए प्रतिपादित किया कि सभी सामाजिकों के मन में सामान्यतः एक जैसी वासना होती है जो अनादिकाल से प्राप्त संस्कारों से चित्रित या प्रभावित होती हैं। इसी के कारण हम काव्यगत भावों का आस्वादन करते हैं। यदि हम वासना शून्य होते तो काव्यास्वादन सम्भव नहीं था। आधुनिक मनोविज्ञान की शब्दावली में इस 'वासना' को सहज प्रवृत्ति (Instinct) कहा जा सकता है। मनोविश्लेषण-संप्रदाय के अनुसार यह हमारे अचेतन मन की शक्ति है। अभिव्यक्तिवादी करोचे ने कला सम्बन्धी विशेष प्रवृत्ति या
८. " ........ गीत गेय पदादिलास्याङ्ग दशकोपजीवन स्वीकृत लक्षण गुणालंकार गीतातोदयादि सम्य क सुन्दरी भूत, काव्य-महिम प्रयोगमालाभ्यासविशेषा- श्रयत्वात् ............ रस शब्देनामिधीयते।" अभिनव भारती ६।१५, पृ० ४२८ ९. "सर्वेषामनादिवासना चित्रीकृत चेतसां वासनासंवादात्" वही ६।३१; पृ० ४७१