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17. १७. संस्कृत के आधुनिक नाटककार

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१७. संस्कृत के आधुनिक नाटककार

(क) १२वीं शती से १७वीं शती तक

ईसा की बारहवीं शताब्दी में हमारे प्राचीन समृद्धिशाली देश भारतवर्ष में यवनों के प्रभुत्व का श्रीगणेश हुआ। परिणाम यह हुआ कि अब तक संस्कृत के पठन- पाठन को जो राजकीय प्रोत्साहन प्राप्त था, वह शनः-शनैः न्यून होने लगा। कविगण एवं साहित्यकारों की रचनाएँ प्रायः शिक्षित, सभ्य समाज तक ही सीमित रहने लगीं तथा जनसाधारण के लिए दुर्बोध होने के कारण उनका व्यापक प्रचार न हो सका। विदेशीय सम्पर्क के कारण हमारी दैनिक भाषा में उर्दू, फारसी आदि भाषाओं का प्रसार होने लगा। इससे उन भाषाओं ने धीरे-धीरे संस्कृत का स्थान लेना प्रारम्भ कर दिया और हिन्दी एवं अन्य प्रान्तीय भाषाओं का जन्म हुआ। इस विषय में एक बात उल्लेखनीय है और वह यह कि यद्यपि भारत के कुछ भागों में मुसलमानों का आधिपत्य अवश्य स्थापित हो गया था, फिर भी संस्कृत भाषा एवं साहित्य के स्वतंत्र विकास तथा प्रगति में किसी प्रकार की कमी नहीं आ पायी। भारतवर्ष में स्थान-स्थान पर अनेक समृद्धिशाली नरेश छोटी-छोटी रियासतों पर राज्य करते रहे। चाहे उनमें संग्रामशक्ति कम रही हो पर वे विद्याव्यसनी अवश्य थे। अन्य कठिनाइयों के उपस्थित रहने पर भी वे संस्कृत के विद्वानों एवं साहित्यकारों को आश्रय देते रहे। संस्कृत के विद्वानों ने भी दारिद्रय की नाना कठिनताओं का सामना करते हुए भी इस भाषा में साहित्य-रचना की परम्परा स्थिर रखी जिससे उसमें किसी प्रकार का अवरोध सम्भव न हो सका। यह सत्य है कि इस काल में रचा हुआ साहित्य इतना महत्त्वपूर्ण नहीं है जितना कि प्राचीन काल का। फिर भी संस्कृत में इस समय भी सभी प्रकार के साहित्य का सतत रूप से सर्जन होता रहा। संस्कृत नाटकसाहित्य का प्रचार भी अवरुद्ध

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गति से होता रहा, यद्यपि कालिदास के प्रकृतिचित्रण, शृंगारप्रियता, व्यंजनावृत्ति एवं भवभूति के भाव-गाम्भीर्य को देखते हुए वे ग्रन्थ बहुत ही निम्नकोटि के प्रतीत होते हैं।

यशचन्द्र-१२वीं शताब्दी ई० का पूर्वाद्ध ११२४ ई० में श्वेताम्बर मुनि देवसूरि और दिगम्बर मुनि कुमुदचन्द्र के मध्य एक विख्यात धार्मिक शास्त्रार्थ सम्पन्न हुआ। परिणामतः कुमुदचन्द्र का पक्ष विजयी घोषित किया गया। इसी घटना को लक्ष्य करके यशचन्द्र ने मुदित-कुमुदचन्द्र नामक प्रकरण ग्रंथ की रचना की है।

कविराज शंखघर-१२वीं शताब्दी ई०

ये कान्यकुब्ज-नरेश गोविन्दचन्द्र के सभापंडित थे, जिनके पुत्र जयचन्द को प्रत्येक इतिहास का विद्यार्थी जानता है। इन्होंने लटकमेलक नामक विख्यात संस्कृत प्रहसन ग्रंथ की रचना की है। यह प्रहसन संस्कृत का सबसे मनोरंजक रूपक है। लटकमेलक का शाब्दिक अर्थ धूर्त-सम्मेलन है। शाक्त ने अपने मित्र जटा- सुर का उसकी इच्छा के अनुसार एक वेश्या की दन्तुरा नामक दासी से तथा अपना स्वयं वेश्या के साथ स्वयंवर विवाह करा दिया। इस प्रधान कथा के साथ-साथ कवि ने सामाजिक दशा का बड़ा मनोरंजक दृश्य उपस्थित किया है। जन्तुकेतु वैद्य, मिथ्या- शुक्ल जैसे शुष्क वैद्य, सनकी दार्शनिक कुक्कुट मिश्र, बौद्ध भिक्षु व्यसनाकर आदि पात्रों का इतने मनोहर ढंग से निरूपण किया गया है कि प्रहसन बिलकुल यथार्थ ही प्रतीत होता है। मूर्ख ग्रामीण वैद्यों का भी यथास्थान रोचक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। उनकी ओषधि का प्रख्यात नुसखा निम्नलिखित है- यस्य कस्य तरोर्मूलं येन केनापि पेषयेत्। यस्मै कस्म प्रदातव्यं यद्वा तद्वा भविष्यति॥ चाहे जिस पेड़ की जड़ को चाहे जिस पदार्थ के साथ पीसकर इच्छानुसार किसी भी रोगी को देने पर कोई न कोई परिणाम होगा ही।

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इसी प्रकार बौद्ध धर्म के अनुयायी व्यसनाकर का एक धोबिन के साथ प्रणय- प्रसंग चित्रित कर ग्रंथ में सामयिकता का संचार किया गया है। अन्य मतों एवं तत्कालीन सामाजिक दशा का निरूपण कर प्रहसन को मनोरंजक बनाने का पूर्ण प्रयत्न दृष्टि-गोचर होता है।

विग्रहराजदेव-१२वीं शताब्दी ई० इनके पिता का नाम अण्णोराज था। इनके समय में भारतवर्ष में मुसलमानों के प्रभुत्व का श्रीगणेश हो गया था। इन्होंने हरकेलि नामक एक नाटक ग्रंथ की रचना की है, जिसमें महाभारत के आधार पर लिखे हुए भारवि-रचित किराता- र्जुनीय महाकाव्य को नाटकीय रूप प्रदान किया गया है।

रामचन्द्र-१२वीं शताब्दी ई०

ये प्रसिद्ध जैन दार्शनिक हेमचन्द्र के शिष्य थे। इनके विषय में एक किंवदन्ती प्रसिद्ध है कि हेमचन्द्र के प्रभाव से इनका एक नेत्र ज्योतिरविहीन हो गया था जिससे ये जैनमत के सिद्धान्तानुसार एक नेत्र से समस्त प्राणिमात्र पर सामान्य दृष्टि रख सकें। जनश्रुति के अनुसार रामचन्द्र ने सौ से अधिक ग्रंथों का निर्माण किया, जिनमें से अधिकांश काल की कराल गति में लुप्त हो गये। नवविलास, रघुवंश, राघवाभ्युदय, यादवाभ्युदय, निर्भयभीम, सत्य हरिश्चन्द्र, कौमुदी-मित्रानन्द उनकी प्रमुख नाटक-रचनाएँ हैं। रुद्रदेव-राज्यकाल १२६८-१३१९ ई० वारंगल प्रदेश के अन्तर्गत ये एकशिला नामक राज्य के शासक थे। ये स्वयं कवि थे। इन्होंने अनेक साहित्यकारों को आश्रय भी दिया था। इनकी साहित्यिक कृतियों में केवल उषर्गेदिय तथा ययातिचरित नामक दो नाट्यरचनाएँ ही उपलब्ध हैं। उषर्गेदिय एक नाटिका है जिसमें उषा और अनिरुद्ध की प्रणयकथा समाविष्ट है। ययातिचरित में पौराणिक आख्यान के आधार पर देवयानी, शर्मिष्ठा एवं ययाति के प्रसंग का चित्रण है। शर्मिष्ठा और ययाति का विवाह हो चुका था।

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ययाति देवयानी से प्रेम करने लगा और उसके पिता शुक्र ने इस शर्त पर कि वह कभी शर्मिष्ठा के साथ शयन न करेगा, विवाह कर दिया। ययाति का गुप्तरूप से शर्मिष्ठा के साथ भी सम्पर्क विद्यमान रहा। देवयानी से दो तथा शर्मिष्ठा से तीन पुत्रों की प्राप्ति हुई। शुक्र को जब यह वृत्तान्त विदित हुआ तो उन्होंने ययाति को वृद्ध हो जाने का शाप दिया। उनके छोटे पुत्र पुरु ने पिता का शाप स्वयं ग्रहण कर आदर्श पितृ-भक्ति का प्रमाण प्रस्तुत किया। फलतः ययाति पूर्ववत् युवा हो गये तथा पुरु यौवनकाल में ही वृद्ध के समान दुर्बल हो गया।

सुभट-१२वीं शताब्दी ई० का पूर्वार्द्ध

सुभट ने दूतांगद नामक एक छाया नाटक की रचना की है। यह नाटक अहनिलबाड में महाराज त्रिभुवनपालदेव के दरबार में सन् १२४२ ई० के लगभग सर्वप्रथम अभिनीत किया गया था। भारतवर्ष में सोमनाथ का मंदिर अपनी समृद्धि के लिए बहुत दिनों से विख्यात था और उसमें अपार धनराशि थी। प्रसिद्ध मुसलमान लुटेरे मुहम्मद गजनवी ने उसको लूटा और उसमें स्थित शिवमंदिर एवं प्रतिमा को तोड़ डाला। राजा कुमारपाल ने उस मंदिर का पुनर्निर्माण किया और शिवप्रतिमा की प्रतिष्ठा की। इसी अवसर पर सुभट ने अपने अलौकिक नाटक दूतांगद की रचना की। छायानाटकों का अभिप्राय उन नाटकों से है जिनमें पात्र स्वयं मंच पर दर्शकों के सम्मुख उपस्थित नहीं होते, अपितु परदे के पीछे इस प्रकार अभिनय करते हैं कि उनकी छाया परदे पर पड़ती है और अभिनय करती हुई सी प्रतीत होती है। इस प्रकार के नाटक प्राचीन संस्कृत साहित्य में उपलब्ध नहीं हो सके हैं। सुभट- कृत दूतांगद ही इस प्रकार का प्रथम उपलब्ध छाया नाटक है। जैसा कि नाम से ही विदित होता है, दूतांगद का कथानक रामायण के सुप्रसिद्ध आख्यान पर अवलम्बित है। समुद्र को पार करने के उपरान्त राम अपनी सेना सहित लंका पहुँचे और रावण से युद्ध छेड़ने के पूर्व उन्होंने शान्तिमार्ग अपनाकर अंगद को दूतरूप में भेजना और रावण को समझाना अधिक श्रेमस्कर समझा। राम की आज्ञा से अंगद दूत बनकर रावण के दरबार में पहुँचते हैं और उससे कहते हैं

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कि तुम सीता को उसके पति राम को लौटाकर उनसे उचित क्षमा-याचना करो, तभी तुम्हारा कल्याण सम्भव है। रावण यह नहीं मानता और दर्पयुक्त कथनोप- कथन प्रस्तुत करता है। रावण और अंगद का संवाद बड़ा ही ओजपूर्ण है, जिसमें दोनों के उत्तर और प्रत्युत्तर में वीर रस की एक अलौकिक झलक दृष्टिगोचर होती है। भाषा प्रसादपूर्ण, प्रांजल एवं सरस है जो कि पाठकों के हृदयों पर सहज प्रभाव डालती है। अन्त में अंगद रावण के कुकर्मों का वर्णन कर असफल ही प्रत्यावर्तन करता है। इसके बाद देवलोक से हेमांगद और चित्रांगद का प्रवेश होता है और वे रावण के भावी नाश की सूचना दर्शकों को देते हैं। रावण और अंगद के उत्तर एवं प्रत्युत्तर में भाषा की प्रौढ़ता के साथ-साथ तत्क्षण उचित उत्तर देने की प्रणाली का भी रोचक परिपाक प्रस्तुत किया गया है। अंगद द्वारा राम की प्रशंसा करने पर और समुद्र पार करने आदि का वर्णन करने पर रावण इस प्रकार उत्तर देता है-

पारावतः किमयमम्बुनिधिर्न तीर्णः, क्रान्ता: कथं न कपिभि: क्व च नाम शैलाः तद्वेद्मि दोबलमसौ यदि शौयरेखा- माविष्करोति करवालकपोपलेऽय्य ॥-दूता० ३४।।

क्या कबूतरों ने इस प्रकार का परात्रम करके समुद्र को पार नहीं किया है ? अथवा बन्दरों ने पर्वतों पर आघात नहीं किया है ? मैं उसी अवस्था में बाहुबल को सार्थक समझता हूँ कि यदि आज राम मेरी खड्गरूपी कसौटी पर शूरता की लकीर प्रकाशित कर दे, अर्थात् मेरे द्वारा आक्रमण करने पर यदि वह पौरुष एवं साहस दिखलाता है तब ही उसका परात्रम श्लाघनीय है। अंगद रावण की इस उक्ति का अपने अनुरूप ही इस प्रकार प्रत्युत्तर देते हैं- कि राघवस्य वशकंधर चन्द्रहासवंशेजभवन् भुवनभीतिभिदः शरास्ते। लूनानि यस्तव शिरांसि पुनः प्ररोहमेष्यन्ति मूढ !नहिं धूर्जटपर्वणीव॥-दूता०३६ हे राक्षसराज रावण ! समस्त संसार को अभयदान देने वाले राम के बाण क्या चन्द्रहास के कुल में उत्पन्न हुए हैं, जिनसे कटे हुए तुम्हारे सिर पुनः उत्पन्न

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हो जायँगे ? जैसे कि पहिले शंकर के पूजन के अवसर पर हुए थे, अर्थात् चन्द्रहास खड्ग से कटे हुए तुम्हारे सिर जैसे पहले शंकरजी के वर-प्रदान से पुनः उत्पन्न हो गये थे उस प्रकार अब राम के द्वारा काटे गये सिर पुनः उत्पन्न न हो सकेंगे। इस प्रकार सुभट ने अपने दूतांगद छायानाटक में रावण और अंगद के संवादों का समावेश कर अपने ग्रंथ को अत्यन्त रोचक एवं कौतूहलमय बना दिया है। भाषा सरस और मनोहर है। उपमा और रूपक अलंकारों का कतिपय स्थानों पर रोचक प्रयोग हुआ है। कवि छन्दों के प्रयोग में भी कुशलहस्त है और उसने स्रग्धरा, शार्दूलविकरीडित, द्रुतविलम्बित, शिखरिणी आदि रोचक छंदों का यथास्थान समावेश किया है। रामभद्र मुनि-१३वीं शताब्दी ई० ये जयप्रभ सूरि के शिष्य एवं जैनमत के प्रसिद्ध दार्शनिक थे। जैनियों के एक प्रसिद्ध आख्यान को प्रकरण रूप देकर इन्होंने प्रबुद्धरौहिणेय नाटक की रचना की।

मदन-१३वीं शताब्दी ई०

ये परमारवंशीय अर्जुन वर्मा के राजगुरु थे। इनकी रची हुई पारिजातमंजरी नाटिका के कुछ अपूर्ण अंश उपलब्ध हुए हैं। धारा में सन् १२१३ ई० का लिखा हुआ एक शिलालेख भी उपलब्ध हुआ है जिसमें इस नाटिका के कुछ भागों को उद्धृत किया गया है। इसमें राजा अर्जुन वर्मा और राजकुमारी पारिजातमंजरी की प्रणयकथा का वर्णन है। अर्जुन वर्मा ने गुजरात के चालुक्य राजा को परास्त कर उसकी पुत्री पारिजातमंजरी से परिणय किया था। जयसिंह सूरि-सन् १२२५ ई० आपका एकमात्र नाटक हम्मीरमर्दन है। उसके अनुसार गुजरात के शासक हम्मीर पर यवनों ने आक्रमण कर उसकी दुर्दशा की और धवल एवं उनके मंत्री वास्तुपाल ने इस अवसर पर अपने अलौकिक चमत्कार दिखलाये थे। १४

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रविवर्मा-जन्म सन् १२६६ ई०

यादववंशीय महाराज जयसिंह वीर-केरल के पुत्र थे। प्रौढ़ अवस्था प्राप्त होने पर आपने केरल पर आधिपत्य जमा लिया था। आपकी प्रसिद्ध नाटक-रचना प्रद्युम्नाभ्युदय पाँच अंकों का एक रूपक है। इसमें वज्तपुर के शासक विराजनाभ के वध के उपरान्त प्रद्युम्न और प्रभावती के विवाह की कथा का निरूपण किया गया है।

विश्वनाथ-१४वीं शताब्दी ई० का प्रारंभ

विश्वनाथ वारंगल-नरेश प्रतापरुद्रदेव के, जिनका राज्यकाल सन् १२६४ से १३२५ ई० है, आश्रित राजकवि थे। अतः विश्वनाथ का समय निश्चित ही १४वीं शताब्दी ई० का पूर्वार्ध है। बाल्यावस्था में ही इनके माता-पिता का स्वर्गंवास हो गया और ये अनाथवत् विचरण करने लगे, तब इनके मामा अगस्त्य ने इनके पठन-पाठन आदि की उचित व्यवस्था की। उन्होंने शीघ्र ही अपने साहि- त्यिक चमत्कार दिखलाने आरम्भ कर दिये और उनकी कीर्ति वारंगल के राज- दरबार में पहुंच गयी। दरबार में उपस्थित विद्वानों के मनोरंजन के हेतु विश्वनाथ ने सौगन्धिकाहरण नामक एक विख्यात एकांकी नाटक ग्रंथ का प्रणयन किया। सौगंधिकाहरण का कथानक महाभारत से उद्धृत है। पांडवों के अज्ञातवास के समय द्रौपदी गन्धर्वों द्वारा लायी हुई कई सुगंधित पुष्पमंजरियों को देखती है और अपने वीर पति भीम से उनके ग्रहण करने की इच्छा प्रकट करती है। भीम अपनी प्रियतमा की अभिलाषा पूर्ण करने के लिए उक्त मंजरियों को, जिन्हें कि कवि ने सौगंधिका के नाम से सम्बोधित किया है, लेने के लिए प्रस्थान करते हैं। कुछ ही देर में पवनसुत हनुमान के दर्शन मार्ग में होते हैं और दोनों ही लम्बे वार्ता- लाप में संलग्न हो जाते हैं। इसी प्रसंग में भीम हनुमान से पांडवों के परात्रम का वर्णन करते हैं जो वीर रस का अनुपम उदाहरण है। इसी समय कुबेर का आगमन होता है तथा वन के रम्य प्रदेशों में भीम और कुबेर का समागम होता है। कुबेर भीम के अतिशय पराक्रम पर मुग्ध होकर

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और उसके युक्तिपूर्ण वचनों को सुनकर उक्त सौगंधिका पांडवों को उपहार- स्वरूप भेंट करते हैं। जिस समय भीम अपना निर्दिष्ट कर्म पूरा कर अपने भाइयों के समीप पहुँचते हैं उस समय उनके आनन्द की सीमा नहीं रहती। नाट्यशास्त्र के नियम के अनुसार विश्वनाथ ने ग्रंथ में वीर रस को प्रधान रस बनाया है, यद्यपि स्थान-स्थान पर शृंगार एवं करुण रस का यथायोग्य निरू- पण है। अपने मार्ग पर कुछ दूर बढ़ने पर जब भीम को हनुमान के दर्शन होते हैं तो वे उसके लिए इस प्रकार वीरतामय गर्वोक्ति प्रकट करते हैं-

अयं तु स वृकोदर: सकलवीरवर्गाग्रणी- रुदग्रबक विग्रह द्रढिमगर्वसाम्राज्यहृत्। स्वमुष्टिकुलिशेन यः सपदि राजसूयक्तो- रुरुक्रमविधौ पशुं मगधनाथमालव्धवान्।। -सौगंधिका० २८

यह वही भेड़िये के समान उदरवाला भीमसेन है जो संसार के समस्त साहसी पुरुषों का अग्रणी है, जो प्रबल योद्धाओं से युद्ध करके सरलता से उनका साम्राज्य हर लेता है और जिसने राजसूय यज्ञ के अवसर पर मगध के अधिपति को पशु के समान सरलता पूर्वक मार डाला था। इस श्लोक में भीम की वीरता के साथ-साथ उनकी प्रकृति का भी निरूपण होता है। इस प्रकार की वीरोचित उक्तियों के साथ-साथ कवि ने प्रकृति-चित्रण में भी रचना-नैपुण्य प्रकट किया है। वन के दुर्गम प्रदेशों में, जहाँ कि भीमसेन सौगंधिका को लेने के हेतु गये थे, प्रकृति अपना अद्भुत मनोरम रूप प्रकट कर रही थी। एक प्रदेश की शोभा का वर्णन करते हुए, जिसमें केसर और कदली के वृक्षों का बाहुल्य था, भीमसेन कहते हैं- एतास्ता: कदलीवनान्तरभुवो नीरन्धरनदद्गुम चछायान्त: शिशिरीभवत्तलगुहानिद्राणसिद्धाध्वगा:। यत्र क्रीउति पाकजजंरपतत्काशमीरगुच्छावली- पीडाम्रेडनिजरीकृतनिजकोडं कुरङ्रीकुरम्।।- सौंगं०९९

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ये वे केलों के वनमध्यवर्ती भाग में सटे हुए वृक्ष हैं जिनकी शीतल छाया के नीचे गुफाओं में देव-पथिक विश्राम कर रहे हैं। वहीं पीले और सूखते हुए केसर के गुच्छों के अपनी गोद में पड़ जाने से मृगियों का समूह अपने आप को पीत वर्ण का अनुभव कर रहा है। प्रकृति की शोभा का निरूपण करने के साथ-साथ कवि ने कथानक को रोचक बनाने के हेतु मध्य मध्य में आकर्षक संवाद प्रस्तुत किये हैं। भीम और हनुमान का संवाद तथा भीम और कुबेर का संवाद बहुत अधिक वर्णनात्मक होने के कारण नाटकीय ढंग से महत्त्वपूर्ण नहीं है, फिर भी उनकी काव्यनिपुणता के रोचक उदाहरण है जिस कारण हम सौगंधिकाहरण को महाभारत के आधार पर रचे हुए नाटकों में महत्त्वपूर्ण स्थान देने को बाध्य होते हैं।

मनिक-१४वीं शताब्दी ई०

ये नटेश्वर के शिष्य एवं राजवर्धन के पुत्र थे। इनका प्रादुर्भाव प्रसिद्ध सुलतान फीरोजशाह तुगलक के राज्यकाल में हुआ था। इन्होंन भैरवानन्द नामक रूपक की रचना की जिसमें भैरव और मदनवती अप्सरा की प्रणयकथा समाविष्ट है।

ज्योतिरीश्वर-१४वीं शताब्दी ई०

यह सिमराओं के शासक हरिसिंह का मित्र एवं समकालीन था। इसने धूर्त- समागम नामक एक प्रहसन ग्रन्थ की रचना की है। पूर्वोक्त मुसलमान सुलतान पर हरिसिंह द्वारा विजय प्राप्त करने के अवसर पर इस ग्रन्थ की रचना हुई थी। यशपाल-१४वीं शताब्दी ई०

ये महाराज अजयदेव के मंत्री एवं दरबारी राजकवि थे। इन्होंने कृष्ण मिश्र के प्रबोधचंद्रोदय की रूपकात्मक प्रणाली के आधार पर मोहपराजय नाटयग्रन्थ की रचना की है। राजा कुमारपाल द्वारा जैनमत का मंडन इस ग्रन्थ का मुख्य विषय है।

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व्यास रामदेव-१५वीं शताब्दी ई० का पूर्वार्द्ध

व्यास रामदेव रायपुर के कलाशुरी नरेशों के आश्रित राजकवि थे। इन नरेशों का राज्यकाल सम्भवतः सन् १४०२ से १४१५ ई० है। अतः व्यास रामदेव का स्थितिकाल भी इसी समय के लगभग रहा होगा। उन्होंने रामाभ्युदय, पांडवा- भ्युदय और सुभद्रापरिणय नामक तीन नाटकों की रचना की है। उनकी इन रचनाओं में सुभद्रापरिणय सबसे प्रमुख है तथा एक प्रकार की विशेष प्रतिभा का दिग्दर्शन उपस्थित करती है। यह छायानाटक है जिसमें पात्र स्वयं मंच पर उपस्थित नहीं होते अपितु उनकी छाया रंगमंच पर अभिनय करती हुई प्रतीत होती है। सुभट के दूतांगद के उपरान्त सुभद्रापरिणय संस्कृत का प्रधान छायानाटक है। इसका कथानक महाभारत के सुप्रसिद्ध आख्यान के आधार पर उद्धृत किया गया है। भगवान् कृष्ण की भगिनी सुभद्रा और पांडवों के वीर भ्राता अर्जुन की प्रेमकथा इस एकांकी नाटक का प्रधान विषय है। ग्रंथ के आरम्भ में पुष्कराक्ष और वसुमति का मंच पर प्रवेश होता है और वे दोनों धनंजय की वीरता और रणकुशलता के विषय में वार्तालाप करते हैं कि इतने में अर्जुन का प्रवेश होता है। वह अपने मन की संतप्त दशा को बहुत देर तक नहीं रोक पाता और सुभद्रा के प्रति अनुराग एवं उसकी अनुपम छवि का वर्णन करने लगता है। कुछ देर बाद अर्जुन के आदेशानुसार पत्रलेखा का प्रवेश होता है और वह सुभद्रा की कामातुर दशा का उल्लेख करती है। सुभद्रा बहुत देर तक अपने मनोभावों को नहीं छिपा पाती और उद्विग्न दशा में अपनी सखियों के सहित अर्जुन के सम्मुख उपस्थित होती है। सखियों से वार्तालाप में थोड़ा ही समय व्यतीत होता है और भगवान् कृष्ण उपस्थित होते हैं। वे अपनी बहिन की मनोवांछा पूर्ण करने में सहायक होते हैं। सुभद्रापरिणय में व्यास रामदेव ने कथानक के निर्माण में कुशलता प्रकट की है। उसे रोचक और पाठकों के लिए अधिक मनोरंजक बनाने के लिए प्रकृति- चित्रण में भी उन्होंने अपनी प्रवीणता दिखायी है। वीर और शृंगार दोनों ही रसों को यथास्थान चित्रित करके कवि ने अपना रचनाकौशल प्रकट किया है।

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नायक और नायिका दोनों के ही विरह को चित्रित कर कवि सरलतापूर्वक पाठकों की समवेदना उनके प्रति जाग्रत कर देता है। सुभद्रा अपनी सखी बकुलमाला से अपनी मानसिक व्यथा का निरूपण करती हुई कहती है-

उपदिशति अनङ्गः किमपि यद्यद्रहस्यं न खलु शृणोति मनस्तत् केन मन्त्रयेयं दीर्घम्। अनुदिनमनुरागो वरद्धंते कापि लज्जा गुरुजनवशगा ही कि करिष्ये हतास्मि॥-सुभ० ४३ कामदेव गुप्त रूप से मुझे सीख दे रहा है और मेरे मन को अतिशय पीड़ा पहुँचा रहा है। मैं यह नहीं जानती कि उसे कौन सी शक्ति ऐसी प्रेरणा दे रही है। नित्य ही मेरा अनुराग क्रमशः बढ़ रहा है। मैं गुरुजनों के वश में हूं और ऐसी अवस्था में यह निर्णय नहीं कर पा रही हूँ कि मुझे क्या करना चाहिए। इस श्लोक में सुभद्रा की कामसंतप्त दशा का बड़े ही सुन्दर ढंग से निरूपण किया गया है जिससे उसकी स्वाभाविक व्यथा का सरलता-पूर्वक बोध हो जाता है। इसी प्रकार एक भौंरे द्वारा सुभद्रा को सताते हुए देखकर अर्जुन कहता है, जिससे उसकी मानसिक दशा भी विदित हो जाती है- रे चञ्चरीक! भवताऽतिचरं सुतप्तं कीवृक तप: कथय केषु च काननेषु। सीत्कारकारि परिचुम्ध्य मुखाम्बुजं यद् बिम्बाधरामृतरसं धयसीदमीयम्॥-सुभ० ४७ हे भौंरे ! तू बता कि किन वनों में और कैसा तूने चिरकाल तक तप किया है जो तू सुभद्रा के अमृत के समान मनोहर रसों से संपन्न निम्न ओष्ठ- वाले मुख को चूम रहा है और व्याकुलता के कारण वह सीत्कार कर रही है।

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वामनभट्ट बाण-१५वीं शताब्दी ई० का पूर्वार्द्ध

ये दक्षिण के प्रसिद्ध संस्कृत विद्वान् थे। इनके द्वारा शिव-पार्वती की पौराणिक कथा को नाटकीय रूप देते हुए पार्वतीपरिणय नामक नाटक की रचना हुई है। नामसादृश्य से कुछ लोग इनको हर्ष के राजकवि बाण से अभिन्न समझते हैं। परन्तु यह विचार सर्वथा तथ्यहीन है। शृंगारभूषण नामक भाण भी आपकी लेखनी से प्रसूत है। वामन साहित्यचूड़ामणि की उपाधि से विभूषित थे जिससे उनकी साहित्यिक विद्वत्ता का परिचय मिलता है।

जीवराम याज्ञिक-१५वीं शताब्दी ई०

आपने श्रीमद्भागवतपुराण के दशम स्कन्ध में वणित कृष्ण की बाललीलाओं के आधार पर सन् १४८५ ई० में मुरारिविजय नामक नाटक का निर्माण किया था।

गोकुलनाथ-१६वीं शताब्दी ई०

गोकुलनाथ श्रीनगर के शासक फतेहशाह के दरबारी राजकवि एवं मिथिला के शासक महाराज रघुवंश सिंह के समकालीन थे जिनका समय सन् १६१५ ई० है। उन्होंने संस्कृत में कई नाटकों की रचना की है जिनमें विश्ववसु की पुत्री मदालसा के विवाह के अवसर पर रचित मुदितमदालसा नामक रूपक भी है। उनकी नाटक-रचनाओं में अमृतोदय नामक एक रूपकात्मक नाटक सर्वप्रधान है। इस ग्रंथ में जीवात्मा के आवागमन के सिद्धान्त का प्रति- पादन करते हुए सृष्टि के आरम्भ से प्रलय तक की घटनाओं का समावेश किया गया है। इसमें संसार में उत्पन्न होनेवाले क्लेशों के कारण एवं उनसे मुक्ति के साधनों का सुन्दर ढंग से निरूपण है। दार्शनिक सिद्धान्तों का खण्डन- मण्डन करते हुए बड़े सुन्दर नाटकीय ढंग से न्याय, वेदान्त एवं सांख्य दर्शन के विभिन्न सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इस नाटक में पाँच अंक हैं और प्रत्येक अंक में दर्शन के भिन्न-भिन्न सिद्धान्तों का मंडन है और उसी के अनुसार

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कवि ने अपनी रचना के अंकों का नामकरण भी किया है, जिनका नाम क्रमशः श्रवणसंपत्ति, मननसिद्धि, निदिध्यासनधर्मसम्पत्, तुरीयात्मदर्शन तथा अपवर्ग- प्रतिष्ठा है।

लक्ष्मण माणिक्यदेव-१६वीं शताब्दी ई०

प्रसिद्ध मुगल सम्राट् अकबर (१५५६-१६०५) के समय में यह नोआखाली का शासक था। इसने कई नाटकग्रन्थों की रचना की जिनमें केवल दो ही उपलब्ध हुए हैं। कुवलयाश्वचरित में कुवलयाश्व और मदालसा के प्रणयप्रसंग का तथा विख्यातविजय में नकुल और कौरवों के संग्राम का वर्णन समाविष्ट है।

बालकवि-१६वीं शताब्दी ई०

यह कोचीन के शासक रविवर्मा का आश्रित राजकवि था। रविवर्मा के शासनकाल में कुछ विषम परिस्थिति उत्पन्न हो गयी जिस कारण उसे १५३७ ई० में सिंहासन त्यागना पड़ा। उसके उपरान्त उसका भाई गोदावर्मन गद्दी पर बैठा। बालकवि ने रन्तुकेतूदय में रविवर्मा की राज्यत्याग तक की घटनाओं का तथा रविवर्माविलास में राज्यत्याग तथा वाराणसी तक की उसकी तीर्थयात्रा का समावेश किया है।

विलिनाथ-१६वीं शताब्दी ई०

यह तंजौर जिले के अन्तर्गत विष्णुपुरम् नामक स्थान का निवासी था। इसकी नाटकरचना मदनमंजरी-महोत्सव का राजा अच्युत के दरबार में सर्वप्रथम अभिनय हुआ था। इस ग्रन्थ में अपने भक्त, पंचाल के अधिपति पराक्रमभास्कर की सहायता के लिए रुद्र मानवीय रूप धारण कर पाटलिपुत्र के शासक चन्द्रवर्मा का विध्वंस करते हैं।

भूदेव शुक्ल-१७वीं शताब्दी ई० का आरम्भ ये शुकदेव के पुत्र तथा श्रीकंठ दीक्षित के शिष्य थे तथा कश्मीर में जम्बू सरस्

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नामक स्थान में निवास करते थे। धर्मविजय नामक पांच अंकों के रूपक में इन्होंने आध्यात्मिक एवं नियमित जीवन के लाभों का चित्रण किया है। औरंगजेब के शासन से खिन्न होने पर ही कवि को इस प्रकार के कथानक का निर्माण करने की प्रेरणा मिली होगी।

सठकोप-१७वीं शताब्दी ई०

ये दक्षिण के अहोविल मठ के ७ वें अधीश्वर थे। इनका आरंभिक नाम तिरुमल था। इन्होंने वसन्तिकापरिणय नामक नाटक में अहोविल नरसिंह तथा बसन्तिका नामक वन की अप्सरा की प्रणय-कथा का अंकन किया है।

कुमार ताताचार्य-१७वीं शताब्दी ई०

ये रामानुज सम्प्रदाय के अनुयायी एवं तंजौर के शासक रघुनाथ नायक तथा विजयराघव नायक की राजसभा में प्रधान पंडित थे। उनका शासनकाल सन् १६१४ ई० से प्रारम्भ होता है। पारिजातहरण की कथा के आधार पर पांच अंकों में पारिजातनाटक की रचना कर कवि ने अपना रचनाकौशल प्रकट किया है।

रामानुज-१७वीं शताब्दी ई० ये बाधूलगोत्र में उत्पन्न हुए थे और दक्षिण के निवासी थे। रंगनाथ और वसु- लक्ष्मी के परिणय के आधार पर इन्होंने वसुलक्ष्मीकल्याण नाटकग्रन्थ की रचना की है।

रामभद्र दीक्षित-१७वीं शताब्दी ई०

रामायण की कथा को कल्पना शक्ति के आधार पर परिवर्तित करते हुए रामभद्र दीक्षित ने जानकीपरिणय नामक लोकप्रिय नाटक-ग्रन्थ की रचना की है।

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सम्राज दीक्षित-१७वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध

ये मथुरा के निवासी एवं बुन्देलखण्ड के शासक आनन्दार्य के आश्रित राज- कवि थे। इन्होंने सन् १६८१ ई० में श्रीदामचरित नामक एक रूपकात्मक नाटक की रचना की है। इसमें श्रीदामा नामक एक व्यक्ति की जीवन-कथा समाविष्ट है। वह एक विद्वान् दरिद्र व्यक्ति है तथा लक्ष्मी की अपेक्षा सरस्वती की उपासना को ही श्रेयस्कर समझता है। भाग्य उसे सताता है, जिससे उसे कष्टमय जीवन यापन करना पड़ता है। कृष्ण उससे प्रसन्न होते हैं और सरस्वती की भांति लक्ष्मी भी उसका आश्रय ग्रहण कर लेती है। इस प्रकार भावमय पात्रों का मानवीकरण इस ग्रन्थ में अंकित है।

भूमिनाथ-१७वीं शताब्दी ई० भूमिनाथ कौशिक गोत्र में उत्पन्न हुए थे और उनके पिता का नाम बालचन्द्र था। वह नल्लाकवि के नाम से भी विख्यात हैं। उन्होंने रामभद्र दीक्षित से विद्योपार्जन किया था। उन्होंने तंजौरनरेश शाहजी के जीवन के आधार पर धर्मविजयचम्पू ग्रंथ की रचना की है। शाहजी का राज्यकाल सन् १६८४ से १७१० ई० है। अतः नल्लाकवि इसके पश्चाद्वर्ती समय १८वीं शताब्दी ई० में हुए होंगे। उनकी नाटकरचनाओं में चित्तवृत्तिकल्याण और जीवमुक्तिकल्याण रूपकात्मक हैं। शृंगारसर्वस्व भाण उनकी सर्वोत्तम नाटकरचना है जो भाण प्रकार का संस्कृत रूपक है। इस भाणका कथानक किसी विशेष घटना पर आधारित न होकर एक भाव- विशेष पर ही है। प्रस्तावना के अनन्तर समस्त ग्रंथ में वक्ता केवल अनंगशेखर है। जैसा कि भाण के नाम से ही विदित हो जाता है, शृंगार रस का विशेष रूप से प्रतिपादन करना ग्रंथकार का मुख्य उद्देश्य है। अनंगशेखर आरम्भ से ही कामुक के रूप में चित्रित किया गया है। वह इधर-उधर विचरण करता है और रमणियों के लावण्य की प्रशंसा करता है। उसकी सम्मति के अनुसार इस दैवी सुन्दरता के आगे प्रकृति में अन्य कोई उत्तम पदार्थ नहीं है।

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यही नहीं, रमणी के शरीर के विभिन्न अंग कितने प्रभावशाली हैं और क्या- क्या चमत्कार प्रकट करते हैं, यह भाव प्रकट करते हुए कवि की उक्ति है-

कुचाम्यामाधत्ते कुलशिखरिकूटस्य विभवं मुखेनोद्गृह्हाति श्रियमपि शरत्पर्वशशिनः। अपांगैरब्जानामपहरति सर्वस्वमबला, बलाद्यूनामन्त:करणमियमास्कन्दयति च॥-शृंगार० ३७

रमणी अपने मनोरम स्तनों के द्वारा सुमेरु पर्वत के वैभव को धारण करती है तथा मुख से शरत्कालीन सुन्दर चन्द्रमा की शोभा को छीन लेती है। अपने नेत्रों के प्रान्त भाग से वह कमलों की कान्ति को भी हर लेती है। इस प्रकार

लेती है। दुर्बल होती हुई भी वह बलपूर्वक युवकों के अन्तःकरणों को सरलतया जीत

(ख) सत्रहवीं शती के बाद

अभी तक हमने भारतवर्ष देश के अर्वाचीन युग अर्थात् सन् १००० और १७०० के मध्य में रचे हुए संस्कृत नाटकग्रन्थों का संक्षेप में अध्ययन किया। मुसलमानों के समय में उर्दू और फारसी राजकीय भाषाएँ रहीं तथा संस्कृत भाषा को उतनी सहायता न मिल सकी जितनी मिलनी चाहिए थी। वे शासक यद्यपि अरब, तातार आदि से आये थे, फिर भी उन्होंने हमारी सभ्यता और संस्कृति को बहुत कुछ सीमा तक अंगीकार कर लिया था। कुछ मुसलमानों ने संस्कृत का सम्यक् अध्ययन भी किया। इस विषय में प्रसिद्ध मुगल सम्राट् औरंगजेब के बड़े भाई दाराशिकोह का नाम उल्लेखनीय है। उन्होंने संस्कृत ग्रन्थों का अच्छा अभ्यास किया और अन्त में अनुभव किया कि जितनी शान्ति उन्हें उपनिषदों के अध्ययन से प्राप्त हुई उतनी पहले किसी भाँति नहीं हुई थी। इस प्रकार उक्त शासन में संस्कृत के पठन-पाठन व साहित्य-रचना में किसी प्रकार का अवरोध सम्भव न हो सका। १८वीं शताब्दी के अन्त में संस्कृत का

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कितना प्रचार था इस विषय का वर्णन करते हुए "भारत में अंग्रेजी राज" के यशस्वी लेखक सुन्दरलाल ने अपने ग्रन्थ में मैक्समूलर का उद्धरण उपस्थित किया है। उसका भाव इस प्रकार है- अंग्रेजों का आधिपत्य आरम्भ होने के पूर्व भारत में शिक्षाव्यवस्था बहुत ही सु-व्यवस्थित थी। केवल बंगाल में ८०,००० देशी पाठशालाएँ थीं जिनमें प्राचीन प्रणाली से अध्ययन एवं अध्यापन संपन्न होता था। यह केवल बंगाल का विवरण है। इससे समस्त भारत में तत्कालीन विद्याप्रचार की दशा पर स्वयम् विचार किया जा सकता है। इस समस्त विवरण के उपरान्त हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि संस्कृत में ग्रन्थ-निर्माण की परम्परा उस काल में निरन्तर वर्तमान रही। उसके उपरान्त आधुनिक युग में सन् १७०० से अब तक भी संस्कृत नाटकों तथा अन्य ग्रन्थों का निर्माण होता रहा है जिससे प्रतीत होता है कि संस्कृत जीवित-जाग्रत भाषा रही है और रहेगी। इस अध्याय में हम उसका सम्यक् विवेचन करेंगे।

जगन्नाथ-१८वीं शताब्दी ई०

ये नाना फड़नवीस के समय में काठियाबाड़ के प्रसिद्ध कवि एवं नाटककार थे। इन्होंने अलंकार एवम् आभूषणों को भावनगर के शासक बख्तसिंहजी का दरबारी पात्र बनाकर सौभाग्यमहोदय नाटक की रचना की है।

आनन्दराय मखी-१८वीं शताब्दी ई०

इन्होंने विद्यापरिणय नामक एक नाटक की रचना की है। इस ग्रन्थ का मूल रचयिता वेदकवि था जो तंजौर के शासक आनन्दराय मखी या आनन्द- राव पेशवा, तुक्कोजी एवं सरभोजी का दरबारी राजकवि था। उसने पेशवा के नाम से अपने ग्रन्थ को प्रकाशित करना अपनी कीत्ति एवं यश का साधन समझा। इन सबका समय १८वीं शताब्दी ई० है। अतः हम इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि ग्रंथ की रचना १८वीं शताब्दी ई० में हो चुकी थी। इस ग्रन्थ में भावात्मक पात्रों के मानवीकरण का रोचक उदाहरण प्रस्तुत

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किया गया है। नाटक में जीवात्मा एवं विद्या जैसे गूढ़ तत्त्वों का नायक-नायिका रूप में पात्रीकरण किया गया है और उनके परिणय को लक्ष्य करके ग्रंथ की रचना. हुई है। कृष्णमिश्र ने प्रबोधचन्द्रोदय ग्रंथ की रचना कर इस भावात्मक प्रणाली को जन्म दिया है। अतः इस ग्रन्थ पर उसका प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। ग्रन्थकार ने आरम्भ में ही इस प्रणाली के जन्मदाता कृष्णमिश्र का सादर उल्लेख किया है। विद्या, अविद्या, निवृत्ति, प्रवृत्ति, विषयवासना आदि भावमय पात्रों का परस्पर इस प्रकार अभिनय एवं संवाद प्रस्तुत किया गया है जिससे अध्यात्म- विद्या, मानव जीवन की निःसारता, संसार की परिवर्तनशीलता जाप्रत हो जाती हैं। ऐसे गूढ़ विषयों का निरूपण करने के लिए कवि ने जीवात्मा, जिसको इस ग्रन्थ में जीवराज कहकर सम्बोधित किया गया है, और विद्या की प्रणय- कथा का रूप देते हुए उसमें शृंगारिकता का समावेश किया है। इस प्रसंग में शृंगार रस के समाश्रय से पाठकों के हृदय पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। मनुष्यजीवन की निस्सारता और क्षणभंगुरता का कवि ने बड़ा ही मार्मिक चित्र प्रस्तुत किया है। इस प्रसंग का वर्णन करते हुए वह कहता है-

"क्षणादूर्ध्वं न तिष्ठन्ति शरीरेन्द्रियबुद्धयः। दीपाचिरिव वर्तन्ते स्कन्धाः क्षणविलम्बिनः॥ प्रत्यक्षं जायते विश्वं जातं जातं प्रणश्यति। नष्टं नावतंते किं तु जायते च पुनः पुनः॥"-विद्या० ४।१८-१९ इस जीवात्मा में शरीर, इन्द्रिय एवं बुद्धि क्षण भर में ही दीपक की शिखा के समान प्रादुर्भूत हो जाती हैं और क्षण भर में ही विलीन हो जाती हैं। प्रत्यक्ष ही समस्त संसार उत्पन्न होकर नष्ट हो जाता है तथा नष्ट होकर पुनः-पुनः उत्पन्न होता है।

मलारी आराध्य-१८वीं शताब्दी ई०

ये शैव मत के अनुयायी एवम् दक्षिण के कृष्णा जिले के निवासी थे। अपने मत

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का प्रचार एवम् सर्वोत्तमता सिद्ध करने के लिए इन्होंने शिवलिंगसूर्योदय नामक नाटकग्रन्थ का प्रणयन किया है।

शंकर दीक्षित-१८वीं शताब्दी ई० का आरम्भ

ये बालकृष्ण के पुत्र थे जो व्यासजीवन के नाम से भी प्रसिद्ध थे। इन्होंने प्रद्युम्नविजय नामक नाटक की रचना की जो पन्ना के राजा सभासुन्दर के राज्याभिषेक के अवसर पर प्रथम बार अभिनीत किया गया था।

जगन्नाथ-१८वीं शताब्दी ई० का आरम्भ

तंजौर के शासक सरभोजी के दरबार में ये राजकवि थे तथा बैंकटेश्वर के समकालीन थे। इन्होंने रति और मन्मथ के प्रेम को लक्ष्य करके रतिमन्मथ तथा वसुमती के परिणय के आधार पर वसुमतीपरिणय ग्रन्थ की रचना की। यह सौभाग्यमहोदय के कर्ता, नाना फड़नवीस के समकालीन जगन्नाथ से सर्वथा भिन्न हैं।

कृष्णदत्त-१८वीं शताब्दी ई०

ये एक मैथिल ब्राह्मण तथा मिथिला के अन्तर्गत त्रमातीय ग्राम के निवासी थे। इन्होने पाँच अंकों में भागवतपुराण के आधार पर पुरंजन की कथा को नाटकीय रूप प्रदान किया है। इनका कुवलयाश्वीय नामक एक सात अंकों का नाटक भी है। इसमें मदालसा तथा एक विद्यार्थी का प्रणयप्रसंग समाविष्ट है।

विश्वनाथ-१८वीं शताब्दी ई०

इन्होंने मृगांकलेखा नामक नाटिका की रचना की है। यह चार अंकों की एक नाटिका है। इसमें आसाम की राजकुमारी मृगांकलेखा तथा कलिंग के अधिपति कर्पूरतिलक की प्रणयकथा समाविष्ट है। देवराज-१८वीं शताब्दी ई०

ट्रावनकोर के अन्तर्गत ये आश्रम ग्राम के निवासी थे तथा वहाँ के राजा

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मार्तण्डवर्मन (सन् १७२६ से १७५८ ई०) के सभापण्डित थे। इन्होंने पाँच अंकों के बालमार्तण्डविजयम् नाटकग्रन्थ में अपने आश्रयदाता मार्तण्डवर्मन की विजययात्रा एवम् समृद्धि का वर्णन किया है।

वेंकट सुब्रह्मण्य-१८वीं शताब्दी ई० द्रावनकोर के शासक रामवर्मन का यह राजकवि था जिसका समय १७५८ से १७६६ ई० है। इसने वसुलक्ष्मीकल्याणम् नामक नाटक का प्रणयन किया है।

पेरुसूरि-१८वीं शताब्दी ई०

इन्होने वसुमंगल नाटक की रचना की है। मीनाक्षी और मदुर के महोत्सव पर सर्वप्रथम इसका अभिनय किया गया था तथा इसमें उपरिचित वसु तथा गिरीका की प्रणय-कथा का समावेश है।

रामदेव-१८वीं शताब्दी ई०

ये बंगाल के निवासी तथा वहाँ के प्रसिद्ध ज्योतिषी काशीनाथ के पौत्र एवम् ढाका के शासक यशवन्तसिंह के आश्रित कवि थे, जिसका समय सन् १७३१ ई० है। विद्यामोदतरंगिणी इनका रूपकात्मक नाटकग्रन्थ है। इसमें विविध दार्शनिक विचारों के मण्डकों को पात्र बनाकर दार्शनिक समस्याओं को सुलझाने का प्रयत्न किया गया है।

विट्ठल-१८वीं शताब्दी ई० ये दक्षिण में उत्पन्न प्रमुख नाटककार हैं। बीजापुर में सन् १४८६ से १६६० पर्यन्त आदिलशाही वंश का आधिपत्य था। कवि ने उस वंश के इतिहास को नाटकीय रूप प्रदान कर एक छाया नाटक का निर्माण किया है।

पद्मनाभ-१९वीं शताब्दी ईं०

ये गोदावरी जिले के अन्तर्गत कोटिपल्ली ग्राम के निवासी थे तथा भारद्वाज

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गोत्र में उत्पन्न हुए थे। पौराणिक गाथाओं के अनुसार शिव द्वारा त्रिपुरासुर को विजय करने की कथा के आधार पर इन्होंने त्रिपुरविजय-व्यायोग नाटक की रचना की है।

बल्लिशाय कवि-१९वीं शताब्दी ई० का मध्य

आपके रचे हुए ग्रन्थों में ययातितरुणनन्दनम् नाटक है, जिसमें रुद्रदेव-रचित ययातिचरित के समान महाभारत के ययाति, शर्मिष्ठा और पुरु के प्रसिद्ध आख्यान को नाटकीय रूप प्रदान किया गया है। ययाति यौवनोपभोग की तृष्णा पूर्ण न होने के कारण अपने आज्ञाकारी पुत्र पुरु को वृद्धावस्था देकर स्वयम् यौवन के आनन्द का उपभोग करने लगा। ययाति अपनी इच्छा तृप्त होने पर पुरु को राज्यभार सौंप देता है। कवि ने पाँच अंकों के नाटक रोशनानन्दन में अनिरुद्ध और रोशना की प्रणयकथा को भी नाटकीय रूप प्रदान किया है।

विरारराघव-१९वीं शताब्दी ई० का मध्य

ये तंजौर के निवासी तथा उस प्रदेश के राजा शिवेन्द्र के दरबारी राजकवि थे, जिसका राज्यकाल १८३५ ई० है। रामराज्याभिषेक उनका सात अंकों का एक नाटक है जिसमें रामायण की कथा को नाटकीय रूप प्रदान किया गया है। वालिपरिणय में विरारराघव ने बालि की प्रणयकथा समाविष्ट की है।

रामचन्द्र-१९वीं शताब्दी ई०

ये कुण्डिनीय गोत्र में उत्पन्न हुए थे तथा नौवल कालेज मसुलीपट्टम में संस्कृत के प्राध्यापक थे। इन्होंने शृंगारसुधार्णव नामक एक भाण की रचना की है।

महामहोपाध्याय शंकरलाल-सन् १८४४ से १९१६ ई०

आप काठियावाड़ के परशुमारा नगर के निवासी थे। बाल्यकाल से ही आपने प्रतिभा प्रदर्शित करना आरम्भ कर दिया। अपनी योग्यता के कारण २१ वर्ष की अवस्था में ही आप मोरवी संस्कृत कॉलेज के प्रिंसिपल के गौरवमय पद

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पर आसीन हुए। आपने संस्कृत में गद्य, पद्य, कथा, नाटक आदि साहित्य के विभिन्न अंगों में अपनी काव्यप्रतिभा का दिग्दर्शन कराया है। आपके रचे हुए नाटक- ग्रन्थों में सावित्रीचरित, ध्रुवाभ्युदय, भद्रयुवराज, वामनविजय, पार्वतीपरिणय आदि प्रसिद्ध हैं।

ईचम्वदी श्रीनिवासाचारी-१८४८ से १९१४ ई०

ये दक्षिण में स्थित अर्काट जिले के निवासी थे। इन्होंने कालिदास के ग्रन्थों एवम् उनके नाटकसाहित्य का गम्भीर अध्ययन किया था। ये गवर्नमेन्ट कालेज कुम्भकोणम् में संस्कृत के प्राध्यापक थे। इन्होंने शृंगारतरंगिणी और उषा- परिणय नामक नाटकों की रचना करके संस्कृत नाटकसाहित्य की वृद्धि की। इसके अतिरिक्त इन्होंने संस्कृत में गद्य, पद्य एवम् गीत-काव्यों की भी रचना की है जिनका उल्लेख करना यहाँ अप्रासंगिक होगा।

सोंठी भद्रादि रामशास्त्री-१८५६-१९१५ ये गोदावरी जिले के निवासी तथा संस्कृत के प्रकाण्ड विद्वान् थे। इन्हें उरलाभ तथा लक्कावरम् के जमींदारों के दरबारों में आश्रय प्राप्त था जिससे इनको साहित्य-रचना में सुगमता प्राप्त हुई। मुक्तावल नामक नाटक इनकी सर्वप्रसिद्ध रचना है।

वैद्यनाथ वाचस्पति भट्टाचार्य-१९वीं शताब्दी ई० का मध्य

वैद्यनाथ नदिया के राजा ईश्वरसेन के दरबारी राजकवि थे तथा उनके आज्ञानुसार इन्होंने पाँच अंकों में चैत्रयज्ञ नाटक की रचना की। इसमें दक्ष के मज्ञ के अवसर पर देवताओं के भव्य स्वागत का वर्णन समाविष्ट है। पेरी काशीनाथ शास्त्री-सन् १८५७ से १९१८ ई०

आप विजयानगरम् के महाराज आनन्द गजपति (सन् १८५१-६७ ई०) के आश्रित राजकवि एवं महाराज संस्कृत कालेज विजयानगरम् में व्याकरण एवं १५

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अलंकार शास्त्र के प्राध्यापक भी थे। आपके रचे हुए ग्रन्थों में पांचालिकारक्षणम् और यामिनीपूर्णतिलक नाटक हैं। श्रीनिवासाचारी-सन् १८६३ से १९३२ ई० ये तंजौर जिले के अन्तर्गत तिरुवदी नामक स्थान में उत्पन्न हुए थे। ये राजा- मदम के एक प्रमुख विद्यालय में संस्कृत के प्राध्यापक भी थे। इन्होंने ध्रुव चरित तथा क्षीराब्धिशयनम् नामक दो नाटकग्रन्थों का प्रणयन किया है। पंचानन-१९वीं शताब्दी का उत्तरार्द्ध ये बंगाल में उत्पन्न संस्कृत नाटककारों में उल्लेखनीय हैं। इन्होंने महाराणा प्रतापसिंह के पुत्र अमरसिंह के जीवन को लक्ष्यकर अमरमंगल नाटक की रचना की है। मूलशंकर माणिकलाल याज्ञिक-१८८६ ई० से आपका जन्म नडियाद नगर के प्रसिद्ध ब्राह्मण परिवार में ३१ जनवरी सन् १८८६ ई० को हुआ था। बड़ोदा कालेज में अध्ययन करने के उपरान्त आपने सन् १६०७ में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अपनी असाधारण योग्यता के कारण आप शीघ्र ही राजकीय संस्कृत महाविद्यालय बड़ोदा के आचार्य नियुक्त हुए। आपने तीन रूपकों की रचना की है, जिनके आधार इतिहास के सुप्रसिद्ध आख्यान हैं। छत्रपतिसाम्राज्य नामक रचना में महाराष्ट्रकेसरी शिवाजी के शासन को दस अंकों में नाटकीय रूप प्रदान किया गया है। प्रतापविजय के & अंकों में मुगल काल में भारतीय मर्यादा की अपने अटल पराक्रम से रक्षा करनेवाले राजस्थान- विभूति महाराणा प्रतापसिंह के जीवन को नाटक का लक्ष्य बनाया गया है। संयोगितास्वयंवर में भारत के वीर सम्राट् पृथ्वीराज चौहान के जीवन की कतिपय घटनाओं का समावेश किया गया है। पं० अम्बिकादत्त व्यास-सन् १८५८-१९०० ई० पं० अम्बिकादत्त व्यास के पूर्वज जयपुर राज्य के निवासी थे। कार्यवश उनके

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पितामह वाराणसी में आकर बस गये। व्यासजी बचपन से ही कुशाग्रबुद्धि थे। प्रौढ़ावस्था प्राप्त होने पर वे राजकीय संस्कृत महाविद्यालय पटना में संस्कृत के प्राध्यापक नियुक्त हुए और जीवन के अन्त तक इसी पद पर विभूषित रहे। व्यासजी हिन्दी और संस्कृत दोनों ही भाषाओं के उत्कट विद्वान् थे और उन्होंने सब मिलाकर दोनों भाषाओं में ७५ से अधिक ग्रन्थों की रचना की है। महाराष्ट्रकेसरी छत्रपति शिवाजी के जीवन को संस्कृत में उपन्यास का रूप प्रदान करके उन्होंने शिवराजविजय नामक गद्यकाव्य की रचना की है। उनकी अन्य रचनाओं में सामवतम् एक मनोहर नाटक है जो साहित्य-रसज्ञों के हृदय में अनुपम रोचकता का संचार करता है। नाटक का कथानक अत्यन्त मनोरंजक ढंग पर निरूपित किया गया है। सारस्वत और वेदमित्र घनिष्ठ मित्र हैं और यह इच्छा करते हैं कि उनके समान ही उनके पुत्र सामवत और सुमेधा की मैत्री भी सौहार्द्रपूर्ण एवं चिरन्तन हो। दोनों ही अपने पुत्रों के वयस्क हो जाने पर विवाह की चिन्ता करते हैं और उनको अर्थोपार्जन के हेतु विदर्भराज के समीप जाने का आदेश देते हैं। मार्ग में सामवत को मदालसा नामक रूपवर्ती रमणी के दर्शन होते हैं जिस पर ध्यान आकृष्ट होने के कारण वह दुर्वासा मुनि का उचित आतिथ्य सत्कार करने में असमर्थ रहता है। कोपमूर्ति दुर्वासा उसको "तुम कालान्तर में स्त्रीत्व को प्राप्त होगे"-यह शाप देकर अन्तर्धान हो जाते हैं। इसके बाद कवि ने मार्ग में पड़नेवाले वन, सरोवर एवं प्रकृति के मनोरम चित्रों का निरूपण किया है। उस समय वसन्त ऋतु अवतरित हो चुकी थी जिसकी छवि का कवि ने बड़े मनोरंजक शब्दों में वर्णन किया है। सुमेधा और सामवत के मैत्रीपूर्ण व्यवहार को भी खूब पुष्ट किया गया है। अकस्मात् सामवत अप्सराओं के मध्य में पहुँचता है और स्त्रीत्व को प्राप्त हो जाता है। कुछ समय बाद सामवत और सुमेधा का साक्षात्कार होता है और सुमेधा अपने मित्र के परिवर्तित रूप को देखकर आश्चर्यान्वित हो जाता है। सामवत कहता है कि वह पुरुष नहीं, अपितु सामवती नामक एक महिला है। इस अवसर पर दोनों एक-दूसरे पर अनुरक्त हो जाते हैं। तदुपरान्त सामवती को किसी कारण-

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वश अन्यत्र जाना पड़ता है और सुमेधा अपनी प्रेयसी के विरह में व्याकुल हो करुण विलाप करता है। अन्त में विदर्भराज के दरबार में पुनः उनका समागम होता है और दोनों का एक-दूसरे पर अनुराग प्रकट हो जाता है। राजाज्ञा के अनु- सार उनका पावन परिणय पर्व सम्पन्न होता है और वे दोनों अपना शेष जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत करते हैं। अम्बिकादत्त व्यास ने नाटक के कथानक के साथ-साथ प्रकृति-वर्णन, भिक्षुकों की दशा और दरिद्रता से उत्पन्न अनेक बाधाओं का चित्रण किया है। वसन्त ऋतु में प्रकृति की छवि तथा होलिकोत्सव के अवसर पर जन-साधारण का आनन्दो- ल्लास ग्रन्थ में दर्शनीय है। पशुओं की स्वाभाविक दशा एवं संगीत कला के अतिशय प्रभाव का भी कवि ने मनोरम चित्र खींचा है। एक वनवासी मुनि के आश्रम में खरगोशों की स्वाभाविक दशा का वर्णन करते हुए कवि की उक्ति है-

कृस्वा गच्छत्ययं तु शशकः शशभुत्कलेव। मन्ये महर्षितनुजाकरलालितोऽस्ति लोल: कल: पुलकितो ललितः सुलोमा॥-साम० १।५२ श्यामाक नामक धान्यविशेष की शोभा के समान कान्तिवाले दाँतों से कुछ खाता हुआ यह खरगोश सरलतया जा रहा है। महर्षि की पुत्री के हाथों से पोषित होने के कारण ही मानो यह मधुर ध्वनि करता हुआ विचरण कर रहा है। वसन्त ऋतु के अवसर पर प्रकृति की छवि और विरहीजनों की ब्याकुलता का वर्णन करते हुए कवि कहता है-

मधुकरशङकृतमधुरः कृतविरहितजनविधुरः। प्रसरितवक्षिणपवन: मवनमहोत्सवभवनम्। कोकिलकूजितसहित: शोभनमण्डलमहितः। हृवयं कुसुमलतावत कस्य न हरति वसन्तः॥-साम० १।६२

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इस ऋतु में भौंरों की मनोहर झंकार से विरही जनों की विरहवेदना तीव्रता को प्राप्त होती है। दक्षिण दिशा की ओर से चलता हुआ वायु का वेग कामदेव के महोत्सव की शोभा को बढ़ाता है। कोयल की मधुर ध्वनि से सुशोभित यह वसन्त ऋतु सभी के मन को लुभायमान कर लेती है। कथानक के निर्माण में भी कवि को आश्चर्यजनक सफलता प्राप्त हुई है। दुर्वासा मुनि के अक्षम्य शाप के कारण सामवत का स्त्रीत्व को प्राप्त होना नाटक की सर्वप्रधान घटना है। इस अमानुषिक घटना का पाठकों को बोध कराने का कवि का ढंग भी निराला है। एक दरिद्र भिक्षुक दैव से व्याकुल हो एक ब्रह्मचारी द्वारा भिक्षा एवं धैर्य को साथ-साथ ही प्राप्त करता है। वही ब्रह्मचारी को इस देवी घटना की सूचना इस प्रकार देता है-

विप्रस्त्रीर्णां मण्डलीमध्यसंस्थो, दुर्गाबुख्या सीमन्तिन्या पूजितः पूज्यरीत्या। भक्तिभावप्रभावात. चित्रं चित्रं सामवान् स्त्रीत्वमाप।।-साम० ४।१२

इस सूचना का भी असाधारण प्रभाव पाठकों के हृदय पर बिना पड़े नहीं रह सकता। मातृपूजन की विधि से पूजित होने के उपरान्त सीमन्तिनी के असाधारण प्रभाव से सामवात अकस्मात् ही स्त्रीत्व को प्राप्त होकर रूपवती सामवती के आकार में प्रकट हुआ। क्या ही आश्चर्य की बात है। अलंकारों के यथावत् निरूपण में भी कवि ने अपनी अलौकिक रचनाशक्ति का परिचय दिया है। श्लेष एवं यमक अलंकारों का यथावत् प्रयोग हुआ है। कवि अर्थालंकारों की अपेक्षा शब्दालंकारों पर ही अधिक ध्यान देता है। नाटय- शास्त्र के आदि आचार्य भरत मुनि के सिद्धान्तानुसार शृंगार रस को नाटक का प्रधान रस बनाने का प्रयत्न किया गया है, यद्यपि इस रस का नाटक में पूर्ण परिपाक नहीं कहा जा सकता। ग्रन्थ के अन्त में सामवती की विरहवेदना के सम्बन्ध में कही गयी सुमेधा की उक्ति इस रस का सुन्दर उदाहरण है। उस समय सुमेधा कहता है-

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कदाऽहं कान्ताया नलिननयनायाः करतलं गृहीत्वा सानन्वं निजकरतलेनातिरुचिरम्। सुधापारावाराप्लुतमिव मनः स्वं विरचयन् शचीयुक्तं जिष्णुं चिरमुपहसिष्यामि मुदितः॥-साम० ७।७

किस समय मै कमलों के समान मनोज्ञ नेत्रोंवाली प्रियतमा सामवती की हथेलियों को अपनी हथेलियों से पकड़कर आनन्द मनाऊँगा और इस प्रकार कब प्रिया इन्द्राणी से युक्त इन्द्र के सुख से भी अधिक आनन्द-पहासागर में मनोरंजन करूँगा। इस प्रकार हमने देखा कि सामवत एक अनुपम नाटक है। वर्तमान काल में रचे हुए नाटकों में इसका विशिष्ट स्थान है। संस्कृत की प्राचीन नाटयपरम्परा का पालन करते हुए भी इसमें एक मौलिकता का दिग्दर्शन होता है। वाई० महालिंग शास्त्री

आप आधुनिक काल के विशिष्ट संस्कृत विद्वान् हैं। आपकी जन्मतिथि ३१ जुलाई १८९७ ई० है। इस समय आप वकालत से अवकाश प्राप्त कर तंजौर में साहित्य-सेवा के कार्य में संलग्न हैं। आपने संस्कृत में गद्य, पद्य, नाटक आदि साहित्य के विभिन्न अंगों में रचना कर इसको समृद्ध किया है। कलिप्रादुर्भाव इनका विख्यात नाटक है जो इन्होंने सन् १६५६ ई० में स्वयं प्रकाशित किया था। ग्रंथ का कथानक बहुत ही मनोरंजक ढंग से महाभारत के आधार पर उद्धृत है। द्वापर के अन्त में कलियुग का किस प्रकार प्रादुर्भाव हुआ, यह इस ग्रन्थ का प्रमुख विषय है। कात्यायन नामक ब्राह्मण ऋणों से मुक्त होने की अभिलाषा से एक वैश्य महाजन को अपनी समस्त भूमि बेच देता है। कालान्तर में वैश्य को भूमि से कुछ गुप्त धन की प्राप्ति होती है और वह ब्राह्मण को धन लौटाने की इच्छा प्रकट करता है। कात्यायन बेचे हुए धन पर कुछ अधिकार न समझ ऐसा करने के लिए राजी नहीं होता। मामला मनीषी विद्वानों के निर्णय के हेतु दूसरे दिन के लिए स्थगित हो जाता है। रात्रि में प्रबल झंझावात एवं अग्नि

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के दृश्यों के उपरान्त युगपरिवर्तन होता है और कलि स्वयं अपने संदेश की घोषणा करता है। इस महान् परिवर्तन से ब्राह्मण और वैश्य दोनों ही असाधारण लोभ का अनु- भव करने लगते हैं और धन को ग्रहण करने का अकथ प्रयत्न करते हैं। मामला विद्वानों एवं राज्य के अधिकारियों के विचाराधीन हो जाता है। न्यायालय में वैश्य से प्रश्न पूछा जाता है कि धन उसके पास है या नहीं ? उसके निषेधात्मक उत्तर पर उसके घर की तलाशी ली जाती है और धन मिलता है। वैश्य के रहने का घर छोड़कर शेष सम्पत्ति राज्याधीन कर ली जाती है तथा कात्यायन की भूमि उसे लौटा दी जाती है। इस नाटक की भाषा सरल, स्वाभाविक एवं चित्ताकर्षक है। यद्यपि प्राचीन नाटकग्रन्थों की अपेक्षा इसमें कथानक का निर्माण, भाषा, भाव एवं शैली महत्त्वपूर्ण एवं ओजपूर्ण नहीं है, फिर भी आधुनिक नाटकग्रन्थों में कलिप्रादुर्भाव का स्थान उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता। युगपरिवर्तन के अवसर पर भविष्य में होनेवाली सामाजिक दशा का वर्णन करते हुए स्वयं कलि इस प्रकार घोषणा करता है-

अर्था निश्वसितं भवन्तु भविनां लुभ्यन्तु चेभ्या: परं, सन्तापं समुपाश्रितेषु ददतः कौटिल्यकुल्यायिताः। संघेष्वाप्तबलोदयाः प्रकृतयो द्रुह्यन्तु वृद्धयँ मिथः प्रत्येकं मतिविभ्नमरगणितैर्धर्मो न निर्णोयताम्।। -कलि० २।३

इस समय धनोपार्जन ही श्वास के समान लोगों का मुख्य कार्य रहेगा। लोग स्वार्थ के वशीभूत होकर परस्पर एक-दूसरे को लोभवश कुटिलचक्र में फेंसाने का कोई प्रयत्न बाकी न छोड़ेंगे। सहयोग की शक्ति का पूर्ण रूपेण अनुभव करते हुए भी लोग स्वार्थवश परस्पर एक-दूसरे से कलह करने में तनिक भी न झिझकेंगे। लोगों में असंख्यों मतवैपरीत्य होने के कारण धर्म को किसी प्रकार मान्यता नहीं मिलेगी।

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नीर्पाजे भीम भट्ट

साहित्यशिरोमणि नीर्पाजे भीम भट्ट आधुनिक शताब्दी के विशिष्ट दाक्षिणात्य संस्कृत विद्वान् हैं। आपका जन्म १० अप्रैल सन् १६०३ ई० को हुआ था। आज- कल आप कल्यान की संस्कृत पाठशाला में अध्यापक हैं। आपके पिता नीर्पाजे शंकर भट्ट भी संस्कृत के प्रगाढ़ विद्वान् थे और बाल्यकाल से ही उन्होंने अपने पुत्र को संस्कृत पढ़ने की प्रेरणा दी। आपने सन् १६५४ ई० में काश्मीरसन्धानसमुद्यम नामक एक एकांकी नाटक स्वयं प्रकाशित किया है। भारतवर्ष में स्वतंत्रता-प्राप्ति के उपरान्त कश्मीर की समस्या उत्पन्न हो गयी और उसने बड़ा विकराल रूप धारण कर लिया है। समस्त जगत में चिर- काल से यह समस्या राजनीतिज्ञों के विचाराधीन है और अभी तक इसका कोई सुलभ समाधान नहीं प्राप्त हुआ है। इसी समस्या को लक्ष्य करके उक्त नाटक की रचना की गयी है। इस प्रकार एक राजनीतिक समस्या को नाटकीय रूप प्रदान कर आधुनिक संस्कृत में एक नवीन परिपाटी को जन्म दिया गयां है। नाटक के कथानक के अनुसार डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी और उनके साथी आरंभ में वार्तालाप करते हैं और कश्मीर की दैवी छवि का वर्णन करने के बाद उसे भारत का अविभाज्य अंग घोषित करते हैं। पाकिस्तान के प्रथम प्रधानमंत्री नवाबजादा लियाकत अली खां और संयुक्त राष्ट्र संघ के प्रतिनिधि ग्राहम महोदय का वार्तालाप होता है और पाकिस्तान के पक्ष का प्रतिपादन किया जाता है। नाटक में ही भारतीय लोकसभा का चित्र खींचा गया है जिसमें श्री चक्र्वर्ती राजगोपालाचार्य, प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू, डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी आदि का इस समस्या पर विचार-विनिमय हुआ है। राष्ट्रसंघ की नीति को देख कर वे ग्राहम के आगमन को वृथा ही समझते हैं। इस अवसर पर डा० श्यामाप्रसाद मुखर्जी राष्ट्रसंघ की नीति को समझ जाते हैं और भारतवर्ष के कार्यों में संघ द्वारा हस्तक्षेप करने को अनधिकार चेष्टा बताते हुए इस प्रकार घोषणा करते हैं-

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संयुक्तराष्ट्रसमितेरिह नाधिकार:, कार्योद्यमोऽत्र सुतरामधिकप्रसङ्ग:। अन्धोऽप्यमुं न सहते, किमु पण्डितानां वृन्दं सहेत ? धिगिवं कुटिलत्वमस्याः॥-काश्मीर० ३१०

इस कश्मीर-प्रसंग में संयुक्त राष्ट्र समिति का कुछ अधिकार नहीं है। उसके कार्य करने की प्रणाली इस प्रकार निन्दित है कि एक मन्दबुद्धि पुरुष भी उसके कुचक्र को समझ सकता है, फिर ज्ञानियों के समुदाय का तो कहना ही क्या। पंडित जवाहरलाल नेहरू और शेख अब्दुल्ला के परस्पर विचार-विनिमय के उपरान्त नाटक समाप्त होता है। इस नाटक की भाषा सरल, सजीव एवं चित्ताकर्षक है जो पाठकों के हृदय पर सहज प्रभाव डालती है। नाटक में प्राकृत भाषाओं का किंचिन्मात्र भी प्रयोग नहीं हुआ है तथा स्त्री-पात्रों का नितान्त अभाव है। यद्यपि नाटक अभिनय की दृष्टि से बहुत अधिक मनोरंजक नहीं कहा जा सकता, तथापि संस्कृत नाटकों में इसका स्थान उपेक्षणीय नहीं समझा जाना चाहिए।

एस० एन० ताड़पत्रीकर

एस० एन० ताड़पत्रीकर महोदय पूना के प्रसिद्ध शोधसंस्थान भाण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इन्स्टीट्यूट के महाभारत-विभाग के अध्यक्ष रूप में बहुत प्रवीण सिद्ध हुए हैं। आधुनिक समय के संस्कृत नाटककारों में उनका प्रमुख स्थान है। १६ नवम्बर १६५४ ई० को उनकी मृत्यु हुई। सन् १६५१ ई० में उन्होंने विश्वमोहन नामक एक विख्यात नाटक प्रकाशित किया। अंग्रेजी में गोएथेज पोस्ट एक प्रसिद्ध ग्रंथ है। मध्यकालीन यूरोपीय साहित्य पर उसका आश्चर्यजनक प्रभाव पड़ा है। उसके कथानक के अनुसार डा० फास्ट एक समृद्धिशाली व्यक्ति हैं। किन्तु उन्हें किसी राक्षस के सम्पर्क से समस्त सांमारिकमें से वंचित ोना पडता है। इस प्रकार इस ग्रन्थ में मानव-

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जीवन की क्षणभंगुरता का सहज परिचय मिलता है। इसी गोएथेज पोस्ट नामक ग्रन्थ के आधार पर ताड़पत्रीकर महोदय ने विश्वमोहन नामक संस्कृत नाटक की रचना की है। मूल ग्रंथ के नायक डा० फास्ट, नायिका मार्गरेट, मध्यस्था मरथन तथा नायिका का भाई वेलेनटाइन है जो कि नायक-नायिका के प्रेम-प्रसंग में बाधक है। इन्हीं चारों पात्रों को विश्वमोहन में सुयोग्य नाटककार ने प्रभाकर, हरिणी, राधा तथा तारक का नाम दिया है। मोहन नायक का मित्र एवं कथानक का प्रमुख संचालक है। इस नाटक का कथानक बड़े मनोरंजक ढंग पर अंकित किया गया है। आरम्भ में प्रभाकर एक अत्यन्त स्वाध्याय-परायण व्यक्ति के रूप में चित्रित किया गया है जो शिष्य के साथ विद्याभ्यास एवं धर्मशास्त्रों के पारायण की महिमा का वर्णन करता है। इस समय वह समस्त सांसारिक सुखों से पृथक् रहकर केवल विद्यो- पार्जन को ही अपने जीवन का चरम लक्ष्य समझता है। इतने में ही उसके अभिन्न मित्र मोहन का प्रवेश होता है जो उसे समीप में होनेवाले किसी उत्सव में ले जाने का प्रयत्न करता है। बहुत अनुरोध के उपरान्त प्रभाकर जाने को राजी होता है। मार्ग में प्रभाकर का असाधारण सुन्दरी रमणी हरिणी से साक्षात्कार होता है और प्रथम दर्शन के अवसर पर ही उसे असाधारण आनन्द की अनुभूति होती है। कुछ ही देर में प्रभाकर की विद्वत्ता और असाधारण गाम्भीर्य जनसाधारण की प्रणयचेष्टाओं के रूप में व्यक्त होता है जब कि प्रभाकर और हरिणी का प्रेम लोक में प्रकट हो जाता है। प्रभाकर अपनी इस मनोव्यथा को अपने अभिन्न मित्र मोहन से व्यक्त करता है जो इस प्रकार प्रयत्न करने को कहता है जिससे हरिणी स्वतः ही प्रभाकर की ओर आकृष्ट हो जाय। जब यह प्रसंग हरिणी के भाई तारक को विदित होता है तब वह अपनी बहिन पर अत्यन्त ऋुद्ध हो जाता है और इस सम्पर्क में किसी से परामर्श न लेने के कारण उसको बहुत कोसता है। इस लोकापवाद से बचने के लिए हरिणी एक बावड़ी में कूदकर प्राणोत्सर्ग करना ही श्रेयस्कर समझती है। उसके बावड़ी में कूदने पर तरल नामक एक मुनि का शिष्य उसके प्राणों की रक्षा करता है।

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यह वृत्तान्त जानकर प्रभाकर करुण ऋन्दन करता है। परन्तु अन्त में प्रभाकर, मोहन और हरिणी का मिलन दिखाकर नाटक का सुखान्त पर्यवसान किया गया है। इस प्रकार एक पाश्चात्य कथा के आधार पर इस ग्रन्थ में जीवन की क्षण- भंगुरता का परिचय दिया गया है। विदेशी ग्रन्थ से प्रभावित होने पर भी ताड़- पत्रीकर महोदय ने कथा का अपने रचना-चातुर्य से इस प्रकार भारतीयकरण किया है कि पाठकों को इसका तनिक भी आभास नहीं हो पाता। भाषा सरल, स्वाभाविक और चित्ताकर्षक है। समास और अलंकारों के प्रयोग में कवि ने अपनी किसी विशेष प्रतिभा का परिचय नहीं दिया है। नाटकशास्त्र की प्राचीन परम्परा के अनुसार कवि ने शृंगार रस को ग्रन्थ का प्रधान रस बनाया है और स्थान-स्थान पर उसका यथावत् निरूपण किया है। हरिणी के प्रथम साक्षात्कार के अवसर पर ही उसके लावण्य पर मुग्ध होकर प्रभाकर कहता है --

प्रफुल्लं कासारे सरसिजमिवास्या मुखमिदं, • प्रसन्नं यद्वेन्दोवियति विलसन्मण्डलमिव। शरीरं सुस्पर्शं पृथुकुचनितम्बे त्वतितरं, स्वयं मुग्धाप्येषा प्रसभमिव हा! मादयति माम् ॥-विश्व० २।११

हरिणी का मुख सरोवर में विकसित कमल के समान सुन्दर है अथवा आकाश में लीला करते हुए चन्द्रमण्डल के समान प्रफुल्ल है। जिसके स्तन और नितम्ब भागों का स्पर्श अत्यन्त आनन्ददायक है, ऐसी मुग्ध हरिणी बलपूर्वक मेरे चित्त को अपनी ओर आकृष्ट करती है। इस ग्रन्थ के अन्त में मानवजीवन की क्षणभंगुरता के विषय में मोहन की यह उक्ति है जिसमें मनुष्य के कर्मों के फलों का निरूपण किया गया है। मोहन कहता है- स्वर्गे सौख्यततिस्तथा च नरके क्लेशा अनन्ता: किल, सौख्यं पुण्यकृतां, पतन्ति नरके पापा: स्वकर्मानुगाः।

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इत्यं लौकिककल्पना बहुविधा मत्येषु सम्मानिता- स्ताः सर्वा अधिकृत्य जीवनपरो लोक: सदा वर्तते॥-विश्व० ७।४

जिस प्रकार स्वर्ग में सुख है उसी प्रकार नरक में दुःखदायिनी सामग्री एकत्र संचित रहती है। अपने कर्मों के अनुसार पुण्य कर्म करनेवाले स्वर्ग तथा अधम कर्म करनेवाले नरक के भागी होते हैं। इस प्रकार यदि इस मर्त्य लोक संसार में विचार करके सब लोग कर्म करें तभी संसार का कल्याण सम्भव है।

महामहोपाध्याय पं० मथुराप्रसाद दीक्षित-सन् १८७८ पं० मथुराप्रसाद दीक्षित संस्कृत के उन आधुनिक विद्वानों में से हैं जिनकी प्रतिभा सर्वतोमुखी है। विदेशियों के सहस्र वर्ष के सतत संपर्क के कारण आधुनिक काल तक संस्कृत का प्रचार पर्याप्त कुण्ठित होता गया, फिर भी इस भाषा की स्वतन्त्र प्रगति को रोकने में कोई भी पूर्णरूपेण समर्थ न हो सका। मुसलिम आक्रमण के अनंतर संस्कृत साहित्य का निर्माण कुछ अवरुद्ध हो गया। उच्च- कोटि के विद्वान् भी मौलिक ग्रंथों की रचना न करके टीकाओं की रचना तक ही सीमित रहने लगे। ऐसे युग में बहुलता से संस्कृत ग्रंथों का सर्जन करना कल्पना मात्र ही प्रतीत होता है। फिर भी पंडित जी ने कुल लगभग २४ संस्कृत ग्रंथों की रचना की है जो कि आधुनिक संस्कृत साहित्य के महत्त्वपूर्ण रत्न हैं। उन्होंने पाणिनीय व्याकरण की सिद्धान्तकौमुदी, दर्शन, काव्य, पाली, प्राकृत व्याकरण, वैद्यक, नाटक आदि सभी अंगों में अपनी प्रतिभा प्रद्शित की है। उनकी काव्य और नाटय-प्रतिभा का विवे- चन करने के पूर्व हमें उनके जीवन का भी संक्षिप्त परिचय कर लेना चाहिए। आपके पितामह पं० हरिहर दीक्षित अवध प्रान्त के गण्यमान्य वैद्य थे और जनसाधारण में पीयूषपाणि के नाम से विख्यात थे। उनके द्वितीय सुपुत्र पं० बद्रीनाथ दीक्षित की धर्मपत्नी कुन्ती देवी के गर्भ से पं० मथुराप्रसाद दीक्षित का जन्म मार्गशीर्ष शुक्ल ६ सं० १६३५ वि० (सन् १८७८ ई०) में हरदोई जिले के अन्तर्गत भगवन्तनगर नामक ग्राम में हुआ। तेरह वर्ष की अवस्था में आपका

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विवाह पं० शिवनारायण पाण्डेय की पुत्री गौरी देवी के साथ सानंद सम्पन्न हुआ। आरंभ से ही अध्ययन के प्रति आपकी प्रगाढ़ अभिरुचि थी और बाल्यकाल से ही आपने अपने साहित्यिक चमत्कार प्रदशित करना आरंभ कर दिया था। शास्त्रार्थ करने की आपकी अद्भुत प्रणाली का अवलोकन कर आपके सहपाठी एवं अध्यापक गण दंग रह जाते थे। रीतिकाल के प्रसिद्ध हिन्दीकवि चन्द्रवरदाई ने ऐतिहासिक पृथ्वीराजरासो नामक एक वीर-रसप्रधान काव्य की रचना की है। उस ग्रंथ में भाषा की दुरूहता के साथ-साथ प्रक्षेप भी बहुत अधिक मात्रा में समाविष्ट हो गया है। पंडितजी ने इसका मनन एवं अर्थानुसन्धान करते हुए प्रक्षेपरहित रासो का संपादन किया है और अपनी प्रतिभा के अनुसार उसके वास्तविक अर्थ की व्याख्या करके जनता के समक्ष एक नवीन प्रणाली प्रस्तुत की है। दीक्षितजी के इस प्रतिभासंपन्न कार्य से ही प्रसन्न होकर सन् १६३६ ई० में तत्कालीन भारत सरकार ने उन्हें महामहो- पाध्याय की उपाधि प्रदान कर उनके प्रति उचित गौरव एवं सम्मान का परिचय दिया है। पं० मथुराप्रसादजी ने छः नाटकग्रंथों के अतिरिक्त जिन ग्रंथों की रचना की है उनमें मुख्य निम्नलिखित हैं- (१.) कुण्डगोलनिर्णय (२) अभिधान राजेन्द्र-कोष (३) पालीप्राकृत व्याकरण (४) प्राकृतप्रदीप (५) मातृदर्शन (६) पाणिनीय सिद्धान्तकौमुदी (७) कवितारहस्य (८) केलिकुतूहल (e) रोगी-मृत्युदर्पण। इन सब ग्रन्थों का नाटकों से भिन्न विषयान्तर होने के कारण नामोल्लेख कर देना मात्र ही अलम् है। दीक्षित जी ने जिन नाटक ग्रन्थों की रचना की है वे निम्नलिखित हैं-

वोरप्रताप

मुगल सम्राट् अकबर की कुटिल नीति के कारण राजस्थान के समस्त भार- तीय नरेशों ने उसकी सत्ता को स्वीकार कर लिया था। उस समय चित्तोड़ के वर्चस्वी शासक प्रातःस्मरणीय महाराणा प्रतापसिंह ही एक ऐसे नरेश थे जिन्होंने अकबर की प्रभुता को चुनौती देते हुए भारतवर्ष की प्राचीन वीर-परंपरा की

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रक्षा की। महाराणा प्रताप में शौर्य, धैर्य, साहस तथा स्वतन्त्रता के प्रति अनुपम पावन प्रेम दृष्टिगोचर होता है। मथुराप्रसाद जी ने वीर-प्रताप नाटक में इन्हीं राणा प्रताप के जीवन को अपने वर्णन का विषय बनाया है। आलोचनात्मक दृष्टि से सम्पूर्ण ग्रन्थ का अध्ययन करने पर भी इस नाटक में हिन्दू-मुलसिम विद्वेष की तनिक भी गंध नहीं आने पायी है। भारतीय इति- हास में अकबर और प्रताप दोनों ही विख्यात महापुरुष हैं। परंतु कवि ने दोनों के व्यक्तित्व एवं चरित्रों में महान् अंतर अंकित किया है। दोनों का नारी जाति के प्रति कितना सम्मान था, इसका कवि ने बड़े ही स्पष्ट शब्दों में निरूपण किया है। अकबर तो प्रताप की पत्नी को हरण करने के लिए सेनापति को आदेश देता है परन्तु प्रताप अपने अधिकार में प्राप्त हुई अकबर की धर्मभगिनी एवं उसके सेनापति की धर्मपत्नी को सम्मानपूर्वक उसके सम्बन्धियों के पास भेजने का अपनी मर्यादानुसार आदेश देता है। इस नाटक में वीर रस प्रधान है जो कि पाठकों के अन्तःकरण में एक अद्भुत शक्ति का संचार करता है। इसके नायक महाराणा प्रतापसिंह तथा प्रतिनायक अकबर हैं। हल्दीघाटी का इतिहास-प्रसिद्ध संग्राम, भामाशाह की अलौकिक स्वामिभक्ति एवं आर्थिक सहायता तथा राज्य की पुनः प्राप्ति इस नाटक की प्रमुख कथावस्तु हैं। हम आशा करते हैं कि यह ग्रन्थ स्वतन्त्र भारत के भावी नागरिकों में देशभक्ति का संचार करने में अनुपम सहायता प्रदान करेगा।

शंकरविजय

यह एक दार्शनिक नाटक है। दर्शन शास्त्र में पाये जानेवाले सभी मतों का इसमें यथास्थान निरूपण किया गया है और बड़े ही सुन्दर नाटकीय ढंग से उन सब का विवेचन भी समाविष्ट है। ग्रन्थ में वीर रस प्रधान है और अन्य रसों का भी प्रपाणक-रसन्याय से समावेश कर दिया गया है। दर्शन शास्त्र में शब्द के प्रमाणों की उपादेयता कितनी है यह सभी को विदित है। पंडितजी ने इस प्रकरण को इस प्रकार अंकित किया है कि पाठकों के हृदय में सहज ही गुदगुदी उत्पन्न हो

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कुछ कालोपरान्त सूचना मिली कि काशीनरेश ने अपनी पुत्री शशिकला के लिए उचित वर खोजने के हेतु स्वयंवर रचा है। उसमें देश-विदेश के अनेक नरेश आते हैं और सुदर्शन भी दुर्गा की प्रेरणा से स्वतः पहुँच जाता है। शशिकला स्वयंवर में नाना प्रकार के दोषों का अनुभव करती हुई खिन्न होती है। अकस्मात् सुदर्शन की ओर दृष्टिपात कर उसकी प्रसन्नता का पारावार नहीं रह जाता और उसे ही वह अपना भावी पति चुन लेती है। इस परिणय से ऋद्ध होकर शत्रुजित् अपने चचेरे भाई पर आक्रमण कर देता है। दोनों ही दलों में घमासान संग्राम होता है और अन्त में भगवती चंडिका स्वयं अवतीर्ण होकर शत्रुजित् एवं उसके पक्षपातियों का विनाश सम्पन्न करती है। सुदर्शन इसके उपरांत महर्षि भारद्वाज के आश्रम में जाकर उनकी सपत्नीक चरण- वन्दना करते हुए आशीर्वाद प्राप्त करता है। इसके उपरांत वह अपनी विमाता लीलावती की भी वन्दना करता है। इन समस्त घटनाओं के उपरांत सुदर्शन का राज्याभिषेक समारोह-पूर्वक सम्पन्न होता है। फिर भरतवाक्य के बाद नियमा- नुसार नाटक की समाप्ति होती है। इस नाटक में सुदर्शन के चरित्र के विषय में कुछ कहना आवश्यक है। यह वीर- रसप्रधान ग्रन्थ है और सुदर्शन की उक्तियों के प्रत्येक शब्द में वीर रस की स्पष्ट झलक दृष्टिगोचर होती है। भारद्वाज मुनि के प्रति इसका अनुराग भी अनुकर- णीय है। इस नाटक में स्थान-स्थान पर संस्कृत गीतों का भी विशेष रूप से समा- वेश किया गया है।

गांधोविजय-नाटकम्

इस नाटक का कथानक भी अत्यन्त विस्तृत है। इस ग्रंथ में पं० मथुराप्रसाद दीक्षित ने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के जीवन की कतिपय घटनाओं को नाटकीय रूप प्रदान किया है। महात्मा गांधी द्वारा अफ्रीका में सत्याग्रह आरंभ करने से लेकर भारत की स्वतन्त्रता-प्राप्ति पर्यन्त घटनाओं का इसमें समावेश है। यह दो अंकों का नाटक है। अफ्रीका में गांधीजी ने विदेशियों के अत्याचारों से वहाँ के प्रवासी भारतीयों की किस प्रकार रक्षा की और किस योग्यता से न्यायालय में उनकी

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उचित पैरवी की, आदि घटनाओं का इस ग्रंथ में समावेश है। भारत में स्वतन्त्रता- आन्दोलन छिड़ने पर विदेशियों ने हमारे ऊपर जिस प्रकार के अत्याचार किये, उनका भी इसमें संक्षिप्त परिचय कराया गया है। दरिद्र किसानों की दशा का भी रोचक चित्रण प्रस्तुत किया गया है। यह एक बहुत छोटा सा नाटक है। तब भी इसमें २४ पुरुष एवं ४ स्त्रीपात्र हैं। संस्कृत नाटकसाहित्य में सदा से ही यह परम्परा चली आयी है कि राजा, विद्वान्, नायक आदि प्रधान पात्र संस्कृत तथा अन्य निम्न पात्र प्रकृत भाषा का प्रयोग करते हैं। दीक्षितजी ने प्राकृत-भाषा योग्य पात्रों से प्राकृत का प्रयोग न करवाकर हिन्दी का ही प्रयोग करवाया है। इस प्रकार उन्होंने प्राकृत का मान हिन्दी को दिया है और वे एक नवीन परम्परा के जन्मदाता सिद्ध हुए हैं।

भारतविजय-नाटकम्

वर्तमान शताब्दी में लिखा हुआ यह संस्कृत का एक सर्वोत्तम नाटक है। महामहोपाध्याय पं० मथुराप्रसाद दीक्षित की सर्वोत्कृष्ट रचना के रूप में इस ग्रन्थ के अन्तर्गत उनकी काव्य एवं नाट्यप्रतिभा का पूर्ण परिपाक मिलता है। यह एक ऐतिहासिक नाटक है, जिसमें सिराज के समय में उनसे अंग्रेजों को बिना कर दिये व्यापार करने की अनुज्ञा प्राप्त करने से लेकर भारत की काल्पनिक स्वाधीनता- प्राप्ति पर्यन्त कथा का समावेश है। पराधीन भारत में विदेशियों से मुक्त कराने की घटना का समावेश करना कवि की अनुपम दूरदर्शिता का परिचायक है। कथा- नक को देखने से विदित होता है कि इसमें तीन सौ वर्ष के दीर्घ घटनाचक को नाट- कीय रूप प्रदान किया गया है। प्राचीन संस्कृत नाटकों का अवलोकन करते हुए कथानक की इतनी असाधारण विस्तीर्णता सर्वथा नवीन ही है और कवि की अलौ- किक प्रतिभा का परिचय देती है। दीक्षितजी ने सन् १६३७ ई० में बघाट के अन्तर्गत सोलन में इस नाटक की रचना की। उस समय बघाट वर्तमान हिमांचल प्रदेश के अन्तर्गत एक देशी रिया- सत थी। जिस समय ग्रंथ की रचना हुई, भारत अंग्रेज़ों द्वारा निर्मम रूप से पीड़ित हो रहा था। इस ग्रन्थ में अंग्रेजी राज्य में भारत की दयनीय दशा का रोचक चित्रण १६

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किया गया है और अंग्रेजों के चरित्र की भी तीव्र आलोचना की गयी है। नाटक की रचना के थोड़े ही कालोपरान्त इस प्रकार के राष्ट्रीय विचारों का अनुभव कर तत्कालीन विदेशी सत्ता के कान खड़े हो गये और उसने मथुराप्रसादजी की इस भविष्यवाणी को कोरी कल्पनामात्र समझकर पुस्तक की पांडुलिपि ही जब्त कर ली। सन् १६४६ ई० में देश और कांग्रेस का अभ्युदय देखकर पांडुलिपि कवि को वापस दे दी गयी। सन् १६४७ ई० में देश की स्वतन्त्रता-प्राप्ति से कुछ समय पूर्व ही इस ग्रन्थ का प्रथम संस्करण मुद्रित हुआ। इस नाटक में सात अंक हैं जिनका कथानक इस प्रकार है- प्रथम अंक में प्रस्तावना के उपरान्त एक विदेशी भारत-माता को उसके कष्ट दूर करने का आश्वासन देता है। इधर एक अंग्रेज डाक्टर नवाब की पुत्री की चिकित्सा कर समस्त अंग्रेज जाति को बिना कर दिये बंगाल में वस्त्र-व्यवसाय का एकाघिकार दिलाता है। इस पर प्रसन्न होकर वे हमारे देश के इस व्यवसाय को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं जिसके फलस्वरूप तीन जुलाहों के अंगूठे तक कटवा लिये जाते हैं। यह दुर्दशा देख भारत-माता कारुणिक विलाप करती है और नेपाली सखी उसे सान्त्वना प्रदान करती है। द्वितीय अंक में अंग्रेज सिराजुद्दौला के समूल विनाश के लिए एक सन्धिपत्र लिखते हैं जिसके पूर्ण होने पर अमीचन्द को तीस लाख रुपये देने का वचन दिया जाता है। इन्द्रिजालिक के रूप में शिवराम सिराजुद्दौला के समीप पहुँचता है तथा अंग्रेजों के सत्तारूढ़ होने का विस्तृत ऐतिहासिक वर्णन प्रस्तुत कर उनके बंगाल पर आक्रमण करने के लिए प्रस्थान की सूचना भी देता है। क्लाइव के दूत के कथना- नुसार सिराज फ्रान्सीसियों को सहायता देना बन्द कर देता है। फिर भी युद्ध छिड़ जाता है और मीर जाफर सिराज की सहायता की मिथ्या प्रतिज्ञा करता है। सिराज परास्त होता है और मीर जाफर नवाब बनाया जाता है। इस प्रकार अमीचन्द मुँह ताकता ही रह जाता है। सिराज को प्राणदण्ड मिलता है। कुछ काल बाद मीर जाफर को दोषयुक्त बता कर मीर कासिम को नवाब बनाया जाता है। तृतीय अंक में कम्पनी के अधिकारी मीर कासिम से यथेष्ट धन ग्रहण करते

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हैं और भारत-माता की दयनीय दुर्दशा के लिए प्रयत्नशील होते हैं। मीर कासिम माता की सहायता का वचन देता है। अंग्रेजों की नीति के कारण मीर कासिम को उनसे युद्ध करने के लिए बाघ्य होना पड़ता है। मीर कासिम के सैनिक पर्याप्त कौशल प्रकट करते हैं परन्तु परस्पर फूट के कारणं उन्हें मुंह की खानी पड़ती है और मीर कासिम अवध में जाकर प्राणों की रक्षा करता है। चतुर्थ अंक में मिथ्या अभियोग से विवश होकर नन्दकुमार न्यायालय में उपस्थित होता है और उचित प्रमाणाभाव में भी उसका प्राणदण्ड कम्पनी के अधिकारियों के विचाराधीन हो जाता है। एक जासूस भारत-माता की दुर्दशा का वर्णन करता है जिसके उपरान्त हेस्टिंग्ज नन्दकुमार के प्राणदण्ड की पुष्टि करता है। धन के लालच में गंगासिंह के परामर्श के अनुसार वह रुहेलखण्ड पर आक्र् मण कर देता है तथा वहाँ के नवाब शुजाउद्दौला और बेगमों को लूटकर यथेष्ट धन ग्रहण करता है। पंचम अंक में आदर्श वीरांगना भारतविभूति लक्ष्मीबाई, उसकी सखी, पाण्डेय और वाजपेयी भारतीय जनता को विदेशियों के विरुद्ध संग्राम के लिए प्रोत्साहित करते हैं और भिन्न-भिन्न प्रान्तों के निवासियों को अपना ओजोमय संदेश देते हैं। भारत-माता और लम्क््मीबाई का वार्तालाप होता है जब कि महा- रानी ग्वालियर विजय करने का विचार प्रकट करती है। एक अनुचर अंग्रेजों की विजय का समाचार देता है और सम्राट् बहादुरशाह की दयनीय दुर्दशा की जाती है। लक्ष्मीबाई असह्य वेदना का अनुभव करती हुई अग्नि में प्रवेश करती हैं और भारत-माता कारुणिक विलाप करती है। सम्राज्ञी विक्टोरिया की घोषणा के उप- रान्त अंक की समाप्ति की गयी है। षष्ठ अंक के आरम्भ में कांग्रेस की स्थापना के उपरांत लोकमान्य बालगंगाधर तिलक और भारत माता के बीच देश की दु्दशा और वंग-भंग के कारण उत्पन्न विषम परिस्थिति के विषय में वार्तालाप होता है और तिलक माता को मुक्त करने के लिए पूर्णतया प्रयत्नशील हो जाते हैं। खुदीराम को एक यूरोपीय व्यक्ति की और कन्हैयादत्त को नरेन्द्र की हत्या के अभियोग में प्राणदण्ड दिया जाता है। यूरो- पीय महायुद्ध के उपरान्त महात्मा गांधी अंग्रेजों से उनकी पूर्व-प्रतिज्ञात स्वतंत्रता

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की याचना करते हैं जब कि तत्कालीन सरकार प्रत्येक सम्भव उपाय से देश की इस भावना के दमन के लिए प्रयत्नशील होती है। स्वतंत्रता-संग्राम की कुछ घटनाएँ भी इस अंक में समाविष्ट हैं। सप्तम अंक में अंग्रेज हिन्दू और मुसलमानों में परस्पर-विरुद्ध धार्मिक भावना जाग्रत कर फूट उत्पन्न करने के प्रबल इच्छुक हैं। भारत माता उनके अनेक कुकर्मों का उल्लेख करती है। नेताजी सुभाषचन्द्र, पं० जवाहरलाल नेहरू तथा महात्मा गांधी के विशेष प्रयत्नों से भारत माता विदेशी आतंक से मुक्त हो जाती है। महात्मा गांधी यूरोपियन का आ्लिंगन करते है और सब नेतागण मिलकर भारत माता का प्रशस्तिगान करते हैं। स्वर्ग से तिलक जी मृगचर्म और कमंडलु धारण करते हुए अवतरित होते हैं और इस हर्षोत्सव में सम्मिलित हो जाते हैं। इस प्रकार एक काल्पनिक दृश्य के उपरान्त नाटक की समाप्ति की गयी है। भारतविजय नाटक में एक अद्भुत नाट्यप्रणाली का समावेश किया गया है जिसके कारण यह समस्त प्राचीन संस्कृत नाटकसाहित्य की अपेक्षा अपनी अलौकिक प्रतिभा प्रकट करता है। ३०० वर्ष के असाधारण दीर्घ घटनाचक्र का समावेश होने के कारण इस नाटक में नायक-नायिका का सवथा अभाव है। प्रत्येक अंक के पात्र भिन्न-भिन्न हैं और प्रायः एक अंक में जो पात्र अभिनय करते हैं वे अन्य अंकों में नहीं पाये जाते। ठीक ही है क्योंकि वे ही पात्र दो ढाई सौ वर्ष नहीं रह सकते। अतएव सब मिलाकर इस नाटक में लगभग १०० पात्र हैं। पात्रों की इतनी बड़ी संख्या किसी अन्य प्राचीन नाटक में नहीं पायी जाती। परन्तु यही भिन्न समयों में जन्मान्तरापन्न हैं, अन्यथा ढाई सौ वर्ष की घटना कैसे अभिनेय हो सकती है। अस्तु, दीर्घ काल का प्रसंग होने के कारण थोड़े पात्रों का समावेश करने से कवि का अभिप्राय सिद्ध नहीं हो पाता। इसी कारण एक मौलिकता का आविर्भाव करते हुए ग्रंथ में पात्र-बहुलता का समावेश किया गया है। प्राचीन संस्कृत नाटक-साहित्य के अवलोकन करने पर विदित होता है कि महाकवि भास कृत ऊरुभंग ही एक मात्र उपलब्ध दुःखान्त रूपक है जिसमें रंग-मंच पर दुर्योधन की जंघाएँ विदीर्ण की जाती हैं। अन्य ग्रन्थों में पात्रों द्वारा मृत्य की सूचना दी गयी है। इस नाटक में दो स्थानों पर रंग-मंच पर हत्या का अभि-

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नय उपस्थित किया गया है। पंचम अंक में वाजपेयी एक गौरांग की हत्या करता है और छठे अंक में कन्हैया नरेन्द्र का वध करता है। यह दोनों हत्या की घटनाएँ पाठकों के सम्मुख ही प्रस्तुत की जाती हैं। इस प्रकार मृत्यु को रंग-मंच पर उपस्थित कर दीक्षितजी ने प्राचीन परंपरा का उल्लंघन नहीं किया है, क्योंकि प्रतिनायक के वध का निषेध है अन्य का नहीं, स्वतंत्रता-संग्राम के इन विपक्षियों का वध दुःख का सूचक भी नहीं। भरत मुनि के नियमों के अनुसार नाटक में शृंगार अथवा वीर रस प्रधान होना चाहिए। अत संवादों के परस्पर वार्तालाप में इतिहास के दीर्घ प्रसंगों का वीरतापूर्ण वर्णन किया गया है। घटना प्रधान होने पर भी स्थान-स्थान पर करुण और वीर रस का अत्यन्त मार्मिक, रोचक एवं सुन्दर वर्णन प्रस्तुत किया गया है। चतुर्थ अंक में जासूस द्वारा बंगाल में जनता पर कर बढ़ाने की सूचना मिलने पर भारत माता अपने पुत्रों की दुर्दशा पर विलाप करती हुई कहती हैं-

तन्वा शान्त इति प्रमुह्य करुणाकन्तात्मनाऽसौ मया, भस्मच्छन्न इवानलस्तृणचये देशे सुखं स्थापितः । किं कुयां परितो ममापि तनयानयोन्यतो भेदयन्, प्राणर्हन्ति नियोजयत्यविनये सर्वात्मना बाधते।। -भारत० ४।३

मैंने इन विदेशियों की प्रशान्त एवं सौम्य मूर्ति को देखकर दया और प्रेम के वशीभूत हो इनको सुखपूर्वक शरण दी और अपने समीप इस प्रकार भस्म से ढकी हुई अग्नि को घास के ढेर में रख दिया। मैं इस समय किंकर्तव्य हो रही हूँ। मेरे पुत्रों में परस्पर द्वेष उत्पन्न कर एवं फूट डाल उनके प्राणों का अपहरण करना इनका स्वाभाविक कार्य हो गया है। इस प्रकार यह सर्वतोभावेन मुझे नाना प्रकार के कष्ट पहुँचा रहे हैं। इसी प्रकार भारतविभूति वीराग्रणी आदर्श देशोद्धारिका महारानी लक्ष्मीबाई के अग्निप्रवेश का अवलोकन करती हुई भारत-माता का कथन भी अत्यन्त करुणोत्पादक है। वह कहती है-

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२४६ संस्कृत नाटककार

पश्येयं घनसारवन्निजतन्ं बालात्मजेकाकिनी, शौर्येणाशु निपात्य वैरिनिचयं वह्नौ जुहोति स्वयं। एतेऽनार्यभवा: स्पृशन्तु मम न च्छायामपीत्यात्मनः, सुनुं साधुपदे निधाय तपनं भित्त्वा प्रलीनात्मनि॥ -- भारत० ५।१३

यह मेरी एकाकिनी सुपुत्री लक्ष्मी जिसके एक पुत्र भी है वीरता से शत्रुओं का विनाश कर प्रचण्ड अग्नि में कपूर के समान अपनी कोमल अंगावलि की आहुति चढ़ाने जा रही है। अनार्य अंग्रेज उसकी छाया का भी स्पर्श न कर सकें, इस मनो- कामना से अपने पुत्र को साधु के चरणों में समापपत कर सूर्यमंडल को भेदती हुई वह आत्मा में विलीन हो रही है। उपर्युक्त श्लोकों में करुण रस का बड़ा ही मर्मस्पर्शी एवं चित्ताकर्षक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। भारत-माता की दुर्दशा एवं लक्ष्मीबाई के अग्निप्रवेश का यह वर्णन पढ़ कर कोई भी सहृदय व्यक्ति अश्रु प्रवाहित किये बिना नहीं रहता। करुण रस के साथ-साथ वीर रस का भी पर्याप्त परिपाक भारतविजय नाटक में प्राप्त होता है। पंचम अंक के प्रथम ८ श्लोकों में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई, उसकी सखी, वाजपेयी, ताँत्यां भील आदि सैनिक १८५७ के प्रथम स्वाधीनता संग्राम के हेतु समस्त देशवासियों एवं पृथक्-पृथक् प्रान्त निवासियों को युद्ध में उद्यत होन के लिए आह्वान करते हैं। ये सभी श्लोक वीर रस के अनुपम उदाहरण हैं। यह पुनः कहने की आवश्यकता नहीं कि इस नाटक का कथानक बहुत ही विस्तृत है। पात्रों की असाधारण बहुलता होने पर भी इसमें स्त्री-पात्रों का अपेक्षा- कृत बहुत ही कम समावेश किया गया है। स्त्रियों के अभाव के कारण शृंगार रस की व्यंजना भी नाटक में नहीं हुई है। भारत माता, नेपाली सखी, लक्ष्मीबाई और उसकी सखी ही इस नाटक के प्रमुख स्त्री पात्र हैं। नेपाली सखी और भारत-माता ये दो ही ऐसे पात्र हैं जिनके आभास हमें पूरे नाटक में मिलते हैं। शेष पात्रों में अधिकांश ऐसे ही हैं जिनका कार्यक्षेत्र एक या दो अंकों के अन्तर्गत सीमित है। इस नाटक के विद्वान् कर्त्ता की यह एक मौलिकता है जो किसी भी प्राचीन संस्कृत नाटक में उपलब्ध नहीं होती।

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इस नाटक की भाषा और शैली बड़ी सरल एवं स्वाभाविक है। अलंकारों के प्रयोग में कवि ने कोई विशेष प्रतिभा का दिग्दर्शन नहीं कराया है। प्राकृत भाषा का अपेक्षाकृत बहुत ही कम प्रयोग हुआ है। इसमें भारत माता की अभिन्न सहेली नेपाली सखी की भाषा उसकी मातृभाषा नेपाली ही है। दीक्षितजी पर इस नाटक के निर्माण करने में भवभूति के उत्तर-रामचरित और विशाखदत्त के मुद्राराक्षस नाटक की रचना-शैलियों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। उत्तररामचरित के समान ही इस नाटक में विदूषक का अभाव है। इस अभाव में भी कथानक के निर्माण में कवि ने पर्याप्त कुशलता प्रकट की है। घटना- प्रधान और असाधारण विस्तृत कथानक का समावेश करने में मुद्राराक्षस की शैली को ही अपनाया गया है। यद्यपि दोनों नाटकों में बहुत ही भेद है. कथानक को अति विस्तीर्ण करने की अभिलाषा कवि को उसी नाटक से प्राप्त हुई प्रतीत होती है। कतिपय आलोचकों का मत है कि इस नाटक में एक दोष भी पाया जाता है। पात्रों की असाधारण बहुलता एवं कथानक की विस्तीर्णंता के कारण यह नाटक अभिनय की दृष्टि से अधिक उपयोगी नहीं है। नाटक का अभिनय अवश्य किया जा सकता है,यद्यपि ऐसा करने में हमें पर्याप्त कठिनाई का अनुभव करना पड़ेगा। परन्तु यदि हम इस विषय में कवि के दृष्टिकोण को अध्ययन करने का प्रयास करें तो यह न्यूनता नगण्य ही प्रतीत होती है। यह ग्रंथ जिस समय रचा गया, हमारा देश विदेशियों द्वारा पदाक्रान्त हो रहा था और उसकी दुर्दशा अपनी चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी। कवि भारत में अंग्रेज जाति का प्रवेश तथा उसके अत्याचारों का सम्यक् चित्रण कर पाठकों की सहानुभूति भारत माता की ओर प्रेरित करने का प्रबल इच्छुक है। भारत माता की दीन दशा का बड़ा ही सुन्दर निरूपण हुआ है। उस समय जब कि विदेशी सरकार के विरुद्ध एक अक्षर भी कहना अपने को विपत्ति-महासागर में डालना था, इस नाटक के सुयोग्य कवि द्वारा निर्भीकता- पूर्वक इस ग्रंथ की रचना करना एक अलौकिक साहस एवं अपूर्व निर्भयता का परिचायक है। गद्य-पद्य आदि में अपनी रचना न करके काव्य के सर्वोत्तम साधन रूपक को अपने विचार-माध्यम का साधन बनाना ही विद्वान् कवि ने श्रेय- स्कर समझा। संस्कृत नाटक-साहित्य के इतिहास में इस नाटक का स्थान सदा ही

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२४८ संस्कृत नाटककार

स्वर्णाक्षरों में लिखा जायगा। हमें आशा है कि यह अपूर्व ग्रन्थ भारत के भावी नागरिकों को वीरता, साहस एवं निर्भयता का सन्देश शाश्वत रूप से देता रहेगा। पंडित सदाशिव दीक्षित पंडित मथुराप्रसाद दीक्षित के ज्येष्ठ पुत्र पंडित सदाशिव दीक्षित भी नाटककार, सुकवि एवं प्रौढ़ समालोचक हैं। आपने भी कई ग्रंथों की रचना कर काव्यक्षेत्र में अपनी कीर्तिकौमुदी प्रकट की है। आपका जन्म कार्तिक कृष्ण ३, सं० १६५५ वि० को हुआ था। इस समय आप सरकारी नौकरी से अवकाश प्राप्त कर साहित्य-रचना के क्षेत्र में दत्तचित हो रहे हैं। आपकी रचना सरस्वती एकांकी नाटिका प्रकाशित हुई है। इस प्रकार संस्कृत में एकांकी नाटिका का निर्माण कर आप एक नवीन परम्परा के जन्मदाता सिद्ध हुए हैं। इस ग्रंथ में भारत के सुदूरवर्ती देशों में भारतीय संस्कृति के भग्नावशेष चिह्नों का बड़े ही रोचक ढंग से समावेश किया गया है। स्वतंत्रताप्राप्ति के उपरान्त संस्कृत को भारत की राष्ट्रभाषा बनाने के पक्ष में कवि ने युक्तिपूर्वक अपना विशेष तर्क उपस्थित किया है। नाटककार का मत है कि आधुनिक काल में भी भारत की यह प्राचीन समृद्धिशालिनी भाषा राष्ट्रभाषा के गौरवान्वित पर्दे पर आसीन हो सकती है। पाणिनि और कुसंगति आपकी अन्य नाटकरचनाएँ हैं। उक्त महापुरुषों के अतिरिक्त वर्तमान काल में अन्य संस्कृत कवियों ने भी कतिपय नाटकग्रंथों की रचना की है जिससे प्रकट होता है कि इस भाषा की स्वतंत्र प्रगति अभी तक किसी भाति अवरुद्ध नहीं हुई है। उनका नामोल्लेख मात्र ही यहाँ अलम् है। महामहोपाध्याय श्री हरिदास सिद्धान्तवागीश (सन् १८७६-) ने मेवाडप्रताप, बंगीयप्रताप, विराजसरोजिनी, कंसवध, जानकीविक्रम, शिवाजीचरित की, पिलाई ने भीमपराक्रम की तथा के० एस० रामस्वामी ने रतिविजय की रचना की है।

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अनुकमणी प्रधान स्थल एवं पदों का निर्देश

अ अशोक के स्तम्भ २४, १२० अगस्त और लोपामुद्रा ३६ अश्वघोष की भाषा एवं शैली ११६ अनर्घराघव १८४-८६ आ

अपभ्रंश ११ आनन्दराय मखि २२०

अभिज्ञान शाकुन्तल २, ६३, ११४ आनन्दवर्धन १६६, १६०. १६६ अभिज्ञान शाकुन्तल में भाषा एवं आरभटी १६ शैली १०६-१४ आश्चर्य चूड़ामणि १६५ अभिज्ञान शाकुन्तल में सामाजिक इ

चित्रण १०५ इन्द्र, अदिति, वामदेव, वरुण आदि ३६ अभिधान राजेन्द्र कोष २३७ ई अभिषेक नाटक ईचम्वदी श्रीनिवासाचारी २२५ अभीरी ११ अमरमंगल नाटक २२६ उ, ऊ

अमृतोदय २१५ उत्तररामचरित १०, १३८-४०

अम्बिकादत्त व्यास २२६ उत्सृष्टांक ५७

अर्धमागधी १२०-२२१ उषगेदिय २०६

अल्लराज उषापरिणय २२५

अवन्ति वर्मा १५३ ऊरुभंग २, ४, ५७ X W

अवन्ती ११, ७६ ए

अविमारक ५६ एलिजाबेथ ११

अशोक काल के समाज २४, २५ एस० एन० ताड़पत्रीकर २३३

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२५० संस्कृत नाटककार

क क्षेमीश्वर १६७ कर्णपूर २०१ क्षीराब्ध शयनम् २२६ कर्णभार २,५७ कंसवध २४, ४५, ४८ (अन्य) २४८ कर्पूर चरित २०२ ग कर्पूर मंजरी १६३-६४ गणपति शास्त्री ५१ कलि प्रादुर्भाव २३० गांधी विजय नाटकम् २४० कवितारहस्य २३७ गेटे ११३ कविपुत्र ५१ गोकुलनाथ २१५ कविराज शंखधर २०५ गांधार कला २८ कान्यकुब्ज १२३,१५४, १६६ गोवर्धनाचार्य १४८

काव्यप्रकाश १०, १२४ गौड़ी १४१, १५० काश्मीर संधान समुद्यम २३२ किरातार्जुनीय २०२ चन्दवरदाई २३७ कीर्तिवर्मा १६६, २०० चंड कौशिक १९७ कुन्दमाला १६७-६६ चन्द्रगुप्त द्वितीय ८१, ८२ कुप्पू स्वामी शास्त्री १६६ चन्द्रगुप्त मौर्य १६६-६७ कुमार ताताचार्य २१७ चाणक्य १६३-६५ कुवलयारवीय २२२ चारुदत्त ७१ कुवलयाश्व चरित २१६ चित्तवृत्तिकल्याण २१८ कुसंगति २४८ चैतन्य चन्द्रोदय २०१

कृष्ण दत्त २२२ चंत्रयज्ञ २२५ कृष्ण भक्ति ४६ छ

कृष्णमिश्र ११८, १६६, २२१ छत्रपति साम्राज्य २२६ के० एस० रामस्वामी १५३, २४८ छाया नाटक २३, २४, २०७, २१३ केलिकुतूहल २३७ ज कौमुदी मित्रानन्द २०६ जगन्नाथ २२० कैशिकी १६ जगन्नाथ द्वितीय २२२

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अनुकमणी २५१

जयदेव (४०,४६) १२४, २०१ ध जयसिंह सूरि २०६ धर्मविजय २१७ जवाहर लाल नेहरू २५, २३२ धर्मविजय चम्पू २१८ जानकीपरिणय २१७ धावक १२४ जानकी वि्रम २४८ ध्रुवचरित २२६ जीवमुक्तिकल्याण २१८ ध्रुवाभ्युदय २२५ जीवराम याज्ञिक २१५ धूर्तसमागम २११ जेजाक भुक्ति १६६ न

ज्योतिरीश्वर २११ नवविलास २०६

नागानन्द १२१, १२४, १२८ त

तांडव लास्य ४६, ४७ नाय्यदर्णण १६७

तुरफान ११५ नान्दी १३

त्रिपुरदाह २०२ निर्भय भीम २०६

त्रिपुर विजय व्यायोग २२४ नीर्पाजे भीमभट्ट २३२

त्रोटक 58,58 नेपथ्य २० नैषधानन्द १६७ द न्यू ऐटिक कोमेडी दरिद्रचारुदत्त प

दामोदर मिश्र १६६ पंचरात्र ५७

दिङनाग १६७ पंचानन २२६ दूतघटोत्कच ५६ पंचालिका रक्षणम् २२६

दूतवाक्य ५७ पद्मनाभ २२३

दूतांगद २०७,२१३ पाणिनीय सिद्धान्त कौमुदी २३७ देवराज २२२ पांडवाभ्युदय २१३ देवी चन्द्रगुप्त १६७ पारिजात मंजरी २०६ देवताओं द्वारा अग्निस्त्रुति ४० पारिजात २१७

दण्ड १८ पार्वती परिणय २१५ (अन्य) २२५

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२५२ संस्कृत. नाटककार

पिलाई २४८ ब

पुतली का नाच २२ बल्लिशायकवि २२४ पुरंजन २२२ बाण (बामन भट्ट) १२४ पुरुवस् और उर्वशी ४० बालकवि २१६ पृथ्वीराज (दुःखांत) २३६ बाल मार्तण्ड विजयम् २२३ पृथ्वीराज रासो २३७ बाल भारत १६१ पेरी काशीनाथ शास्त्री २२५ बाल रामायण १६१ पेरुसूरि २२३ बाल चरित ५८, २०० पैन्टोमाइम २८ बालि परिणय २२४ पैशाची ११ बालि वध २४ प्रतापविजय २२६ बुद्धचरित ११५-१६ प्रतिज्ञायौगंधरायण ६० बंगीय प्रताप २४८ प्रतिमानाटक भ

प्रद्युम्नविजय २२२ भट्ट नारायण का करुण रस १८०

प्रद्युम्नाभ्युदय २१० भट्ट नारायण का वीर रसं १७७-६७ प्रबुद्ध रौहिणेय २०६ भट्ट नारायण का शान्त रस १८० प्रवेशक १५ भद्र युवराज २२५ प्रवोध चंद्रोदय ११८, १६६ भरत वाक्य १५, ५३, ११६, १५३-५४ प्रसन्नराघव २०१ भवभूति का करुण रस १४५-४७

प्रस्तावना १३ भवभूति और कालिदास १४६-५१

प्रहसन : ०२,२०५ भवभूति का रस निरूपण १४४-४८ प्राकृत प्रदीप २३७ भवभूति की भाषा और शैली १४१-४४ प्राश्य १२१ भक्त सुदर्शन २३६ प्रियदर्शिका १२४-२५, १३० भारत की खोज (डिसकवरी आफ प्रेक्षागृह १७-२० इंडिया) २५

फ भारत में अंग्रेजी राज २२० फर्ग्युसन का मत ८१ भारतविजय ४, २४१

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अनुकमणी २५३

भारती १६ मालवगणस्थिति संवत् ८३ भास का समय २४, ३०, ५५ मालविकाग्निमित्र ८६ भीटा का पदक ८४ मुक्तावल २२५ भीम परात्रम १७५-७६, २४८ २०५ २१६ मुदित कुमुद चन्द्र भूदेव शुक्ल मुदितमदालसा २१५ भूमिनाथ २१८ मुद्राराक्षस का कथानक १५५-५६ भैरवानन्द २११ मुद्राराक्षस में चरित्र चित्रण १६२-६८ म मुरारि विजय २१५ मंख १८४ मूलशंकर माणिक० २२६ मत्तविलास ५३ मृगराज १६६ मथुराप्रसाद दीक्षित ४,२३६ मृगांकलेखा २२२ मदन २०६ मृच्छकटिक का कथानक ६५ मदन मंजरी महोत्सव २१६ मृच्छकटिक का चरित्र चित्रण ७१-७६ मघुसूदन दास १६६ मृच्छकटिक का सामाजिक चित्रण ६६ मध्यम व्यायोंग ५६ मेवाड़ प्रताप २४८ मनिक २११ मोहपराजय २०१,२११ मम्मट १०, १२४,१६६ मलारी अराध्य २२१ य

महानाटक १६१,१६६ यम और यमी ३६ महावीर चरित १३६ ययाति चरित २०६ महाराष्ट्री ११ ययाति तरुण नन्दनम् २२४ महार्लिंग शास्त्री २३० यशचन्द्र २०५ महेन्द्रपाल १६०,१६७ यशपाल २०१,२११ महेन्द्र विक्रम वर्मा ५३ यशोवर्मा १३५,१५३ माइम २४,२५,२७ यादवाभ्युदय २०६ मातृ दर्शन २३७ यामिनी पूर्णतिलक २२६ मालतीमाधव १३७ यूनान की युवतियां भारत में ३१

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२५४ संस्कृत नाटककार

र लक्ष्मी स्वयंबर १७ रघुवंश २०६ लटकमेलक २०५ रतिमन्मथ २२२ लूडर्स ११५,११७,११८ रत्नाकर १८४ व रत्नावली १२४,१२६,१३० वत्सभट्ट की मन्दसौर की प्रशस्ति ८१ रन्तु केतूदय २१६ वत्सराज २०२ रविवर्मा २१०,२१६ वशिष्ठ और सुदास ३६ ' विलास २१६ वसन्त सेना ७५ रस रत्न प्रदीपिका वसन्तिकापरिणय X २१७ राक्षस १६५-६६ वसुमंगल नाटक २२३

राघवाभ्युदय २०६ वसुलक्ष्मीकल्याणम् २१७, (अन्य) २२३ राजतरंगिणी १३५ वसुमती परिणय २२२ रामचन्द्र २०६, (अन्य) २२४ वामन भट्टबाण २१५ रामदेव २२३ वामन विजय २२५ रामभद्र दीक्षित २१७ विक्रमादित्य '८०-८१-८३ रामभद्र मुनि २०६ विक्रमोर्वशी राम राज्याभिषेक २२४ विख्यातविजय २१६ रामानुज २१७ विग्रहराज देव २०६ रामाम्युदय २१३ विठ्ठल २२३ राष्ट्रीय (पुलिस अधिकारी) ६४ विद्धशालभंजिका १६२ रीतिविजय २४८ विद्यापरिणय २२० रुकिमिणी हरण २०१ विद्यामोद तरंगिणी २२३ रुद्रदेव २०६ बिम्बसार ४७ रोशनानंद २२४ विराज सरोजिनी २४८ रंगपीठ, रंगमंच, रंगशीर्ष २०-२१ विरार राघव २२४ ल विलिनाथ २१६ लक्षमण मणिक्यदेव २१६ विशाखदत्त का समय १५२-५५

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अनुकमणी २५५

विशाखदत्त की रचना शैली १५६-६२ शृंगार भूषण २१५ विश्वनाथ २१०, (दूसरे) २२२ शृंगार सर्वस्व २१८ विश्वमोहन २३३ शृंगार सुधार्णव २२४ विश्वामित्र, विपाशा एवं शतद्रु ३६ श्रीकण्ठचरित १८४

विष्कंभक १४ श्रीदामचरित २१८

वीरप्रताप २३७ श्रीनिवसाचारी २२६ वेंकट नाथ वेदान्ताचार्य २०१ स

वेंकट सुब्रह्मण्य २२३ संकल्प सूर्योदय २०१ वेणीसंहार ४,१६६-७३-८३ संयोगितास्वयंवर २२६ वैदर्भी १४१-४२,१५० सट्टक १६४ वैद्यनाथ वाचस्पति भट्टाचार्य २२५ सठकोप २१७

व्यास रामदेव २१३ सत्य हरिश्चन्द्र २०६ सदाशिव दीक्षित २४८

शकारी 색 ७६ समवकार ५७

शकुन्तलोपाख्यान ६७ समुद्र मंथन २०३

शक्तिभद्र १६५ सम्राज दीक्षित २१८ शारिपुत्र ११५ सरमा और पणि ४०

शिवराज विजय २२७ सरस्वती २४८ शिवलिंग सूर्योदय २२२ सात्त्वती १६ शिवाजी चरित २४८ सामवतम् २२७

शूद्रक का रचनाकाल ६४ सावित्री चरित २२५ शेक्सपीयर ११,३४ सुन्दर लाल २२० शोरसेनी ११, ४६, ७६, १२१ सुभट २०७

शंकर दीक्षित २२२ सुभद्रापरिणय २१३ शंकरलाल (म०महो०) २२४ सोंठी भद्राद्रि राम शास्त्री २२५ शंकर विजय २३८ सौगंधिका हरण २१० शृंगार तरंगिणी २२५ सौन्दरनन्द ११५

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२५६ संस्कृत नाटककार

सौभाग्य महोदय २२० हम्मीर मर्दन २०६ सौमिल्ल ५१ हरकेलि २०६ स्थाणीश्वर १२३ हरिदास सिद्धान्तवागीश २४८ स्वगत भाषण १४ हरिविजय १८४ स्वप्नवासवदत्त ६०, १३० हरिवंश ४६

ह हर्ष विक्रमादित्य ८१ हनुमन्नाटक १६६ हास्य चूड़ामणि २०२