16. १६. संस्कृत के अन्य अर्वाचीन नाटककार
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१६. संस्कृत के अन्य अर्वाचीन नाटककार
ईसा की आठवीं शताब्दी के आरंभ में मुसलमानों का भारत में प्रवेश हुआ। उनके आगमन का हमारे देश के साहित्य एवं संस्कृति पर पर्याप्त प्रभाव पड़ना स्वाभाविक था। वेणीसंहार नाटक के रचयिता भट्ट नारायण के उपरान्त संस्कृत नाटकसाहित्य में कोई महत्त्वपूर्ण रचना नहीं हुई। इस काल के उपरांत मुरारि तथा राजशेखर ही सबसे विख्यात नाटककार हुए हैं जिनका विवरण पिछले अध्यायों में दिया जा चुका है।
शक्तिभद्र
शक्तिभद्र-रचित आश्चर्यंचूड़ामणि नामक नाटक सन् १६२६ ई० में मद्रास प्रान्त से प्रकाशित हुआ है। कीथ महोदय भ्रमवश इसका नाम आश्चर्यमंजरी समझ गये। शक्तिभद्र के समय के विषय में निश्चित प्रमाण नहीं मिलते। कुछ विद्वानों का अनुमान है कि ये शंकराचार्य के शिष्य थे, जिनका समय सन् ७८८ से ८२० ई० तक है। अतः इनका समय सन् ८०० ई० के लगभग हो सकता है। आश्चर्यचूड़ामणि का कथानक रामायण के आधार पर रचा गया है। नाटक को रोचक रूप प्रदान करने के लिए कवि ने मूल कथा में यत्र-तत्र कतिपय परिवर्तन किये हैं। इसमें शूर्पणखा-प्रसंग से सीता की अग्निपरीक्षा पर्यन्त कथा का समावेश है। रामायण के कथानक के प्रतिकूल इसमें मारीच राम-लक्ष्मण को बाध्य करता है कि वे सीता को एकाकी छोड़ दें। रावण और उसका सारथि करमशः राम और लक्ष्मण का रूप धारण कर सीता के समीप पहुँचते हैं। सारयिरूपी लक्ष्मण रावण- रूपी राम और सीता से कहता है कि भरत विपत्ति में फॅस गये हैं और आप दोनों का उनके सहायतार्थ चलना आवश्यक है। इस प्रकार रावण अपने छल में सफल
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होता है। शूर्पणखा सीता का रूप धारण कर पर्णकुटी में बैठ जाती है परन्तु शीघ्र ही उसकी पोल खुल जाती है। आश्चर्यचूड़ामणि में अद्भुत रस का भी परिपाक हुआ है। शक्तिभद्र की शैली वैदर्भी है जिसको कि महाकवि कालिदास ने भी अपनाया है। भाषा सरल, स्वाभाविक, आडम्बरशून्य एवं सारगर्भित है। पद्यों में प्रसाद और माधुर्य का रोचक समावेश भी है। "न समाधिः स्त्रीषु" "लोकज्ञः आर्यः" "किं स्नेहस्तुलयति गुणदोषान्" उनके अर्थ-गाम्भीर्य के कतिपय उदाहरण हैं। महामहोपाध्याय कुप्पू स्वामी शास्त्री के मतानुसार आश्चर्यंचूड़ामणि उत्तर- रामचरित की रचना के उपरांत सर्वोत्कृष्ट रामायणीय नाटक है। संस्कृत साहित्य के प्रथम उपलब्ध नाटककार भास के नाटकों की प्रस्तावना से आश्चर्यचूड़ामणि की प्रस्तावना में समता दृष्टिगोचर होती है। नान्दी या मंगलाचरण के श्लोक के पूर्व ही "नान्दन्ते ततः प्रविशति सूत्रधारः" यह प्रयोग मिलता है। जनश्रुति के अनुसार शक्तिभद्र मलावार के समीपवर्ती प्रदेश में निवास करते थे जहाँ कि इस प्रकार नान्दी लिखने की प्रथा प्रचलित थी। यद्यपि शक्तिभद्र एक सफल नाटक- कार के पद पर आसीन नहीं किये जा सकते, तो भी राम के जीवन को लक्ष्य करके लिखे गये नाटकों में आश्चर्यचूड़ामणि का स्थान उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता।
दामोदर मिश्र
आपने "हनुमन्नाटक" नामक महानाटक की रचना की है। आनंदवर्द्धन ने, जिसका समय सन् ८५० ई० है, अपने ध्वन्यालोक ग्रंथ में इस महानाटक के कतिपय उदाहरण प्रस्तुत किये हैं। इस प्रकार हमें दामोदर मिश्र का समय हवीं शताब्दी ई० का आरंभ मानने में कोई आपत्ति नहीं होती। हनुमन्नाटक का कथानक भी रामायण के आधार पर लिखा गया है, इसकी सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि इसमें किंचिन्मात्र भी प्राकृत का प्रयोग उपलब्ध नहीं होता। इस महानाटक के प्राचीन और नवीन दो संस्करण मिलते हैं। प्राचीन के रचयिता दामोदर मिश्र तथा नवीन के मधुसूदनदास हैं। दोनों में क्रमशः १४ और ६ अंक पाये जाते हैं। इस ग्रंथ में
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अन्य रूपकों की अपेक्षा अनेक विशेषताएँ दष्टिगोचर होती हैं जिनमें गद्य की न्यूनता, पद्य की प्रचुरता, विदूषक का अभाव एवं पात्रों की बहु संख्या विशेषतः उल्लेखनीय है।
क्षेमीश्वर आपने नैषधानन्द और चण्डकौशिक नामक दो रूपकों की रचना की है। आप महाराज महेन्द्रपाल के आश्रित दरबारी राजकवि थे जिनका आश्रय राज- शेखर को भी प्राप्त था। इस प्रकार आपका समय सन् ६०० ई० के समीप का है। नैषधानन्द सात अंकों का एक नाटक है। इसमें महाभारत के आधार पर नल- दमयन्ती के प्राचीन आख्यान को नाटकीय रूप प्रदान किया गया है। हरिश्चन्द्र की प्रसिद्ध सत्यपरीक्षा की कथा के आधार पर चण्डकौशिक नामक नाटक की रचना हुई है। क्षेमीश्वर के दोनों ही ग्रंथों की भाषा सरल है पर वे साहित्यिक दृष्टि से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं हैं।
दिञनाग
आपका "कुन्दमाला" नामक नाटक प्राप्त हुआ है जो सन् १६२३ ई० में मद्रास प्रांत से प्रकाशित हुआ है। आपके समय के विषय में विद्वानों में मतभेद है। दिङ्नाग नाम के दो विद्वान् साहित्यकार हुए हैं। मेघदूत के चौदहवें पद्य में प्रथम का उल्लेख है, जिसे मल्लिनाथ ने महाकवि कालिदास का समकालीन एवं प्रतिस्पर्धी बौद्ध दार्शनिक माना है। दूसरे दिङनाग सन् १००० ई० के लगभग प्रादुर्भूत हुए। कुन्दमाला का कथानक रामायण के आधार पर लिखा गया है तथा उसमें रामभक्ति का विस्तृत रूपेण उल्लेख है। कालिदास के समकालीन बौद्ध दार्शनिक को, जो किसी प्रकार भी रामभक्त नहीं हो सकता, इस रचना का कर्त्ता मानना सर्वथा अनुपयुक्त ही प्रतीत होता है। रामचन्द्र तथा गुणचन्द्र कृत नाट्य दर्पण में सर्वप्रथम कुन्दमाला का उल्लेख है। इस आधार पर विद्वानों ने उसका रचनाकाल सन् १००० ई० के समीपवर्ती युग में माना है। कुन्दमाला के कथानक पर भवभूति के उत्तररामचरित नाटक के कथानक
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का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। इसमें राम के राज्याभिषेक के उपरांत सीता के निर्वासन से पृथ्वी द्वारा उसकी पवित्रता घोषित करने एवं राम के पुनर्मिलन तक की कथा का वर्णन है। यह छः अंक का नाटक है। प्रथम अंक में लोकापवाद की सूचना पाकर राम अपनी गर्भवती पत्नी को गंगातट पर छोड़ आने का आदेश लक्ष्मण को देते हैं। लक्ष्मण के ऐसा करने पर महर्षि वाल्मीकि सीता को अपने आश्रम में शरण देते हैं। द्वितीय अंक में लव-कुश के जन्म तथा वाल्मीकि द्वारा उन्हें रामायण की शिक्षा प्राप्त होने का वर्णन है। राम के अश्वमेध यज्ञ में आमंत्रित होने पर महर्षि वाल्मीकि के अन्य आश्रमवासी शिष्यों के साथ सीता नैमिषारण्य प्रस्थान करने के लिए उद्यत होती है। तृतीय अंक में सीता अपने पुत्रों सहित गन्तव्य स्थान पर पहुँचती है। उसी स्थल पर राम तथा लक्ष्मण दोनों गोमती के रमणीय तट पर टहलते हुए कुन्दपुष्पों की बहती हुई एक माला देखते हैं। राम उसको सीता-निर्मित समझकर उसके वियोग में अतिशय विलाप करते हैं। सीता छिपी हुई खड़ी रहकर कुंज की ओट से यह करुणोत्पादक दृश्य देखती है। इसी घटना के आधार पर नाटक का नाम- करण किया गया है। चतुर्थ अंक में तिलोत्तमा नामक एक अप्सरा राम के समक्ष सीता का रूप धारण कर उन्हें अत्यधिक संतप्त करने में सफल होती है। पंचम अंक में लव-कुश राम के दरबार में रामायण का पारायण करते हैं। छठे अंक में पृथ्वी दृश्यमान होती है तथा सीता की पावनता एवं उसके आदर्श पातिव्रत धर्म को राम के समक्ष प्रकाशित करती है। तदुपरान्त राम अपना अवशिष्ट जीवन अपनी भार्या सीता एवं लव-कुश के साथ सानंद यापन करते हैं। उत्तररामचरित तथा कुन्दमाला दोनों ही का कथानक वाल्मीकि-रामायण के उत्तर कांड से प्रेरित है। दोनों ही नाट्यशास्त्र के नियमानुसार मूल कथा में परिवर्तन कर ग्रन्थ का सुखान्त पर्यवसान करते हैं। यद्यपि इसमें कोई संदेह नहीं कि भवभूति दिङनाग से कहीं अधिक श्रेष्ठ तथा महत्त्वपूर्ण नाटककार थे, करुण रस के चित्रण एवं मनोभावों के सूक्ष्म निरूपण में उनको भी पर्याप्त सफलता मिली
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है। उत्तररामचरित में भावों का अति प्रभावोत्पादक वर्णन है, जब कि कुन्द- माला में राम की शालीनता का रोचक उदाहरण प्रस्तुत किया गया है। कालिदास के समान ही इस कवि ने भी पशु-पक्षियों द्वारा संतप्त मानव के प्रति समवेदना प्रकट करवाकर प्रकृति के मानवीकरण का अनुपम उदाहरण प्रस्तुत किया है। राम द्वारा सीता के परित्याग का स्मरण कर वन के पशु इस प्रकार कारु- णिक विलाप करते हैं-
एते रुवन्ति हरिणा हरितं विमुच्य हंसाश्च शोकविधुराः करुणं रुवन्ति। नृत्तं त्यजन्ति शिखिनोऽ्पि विलोक्य देवीं तिर्यग्गता वरममी न परं मनुष्याः। -कुन्द० १।१८ देवी सीता की कारुणिक दशा का अवलोकन कर हरिण भी हरी घास का भक्षण त्याग कर रुदन कर रहे हैं। शोक से आकुल होकर हंस भी करुणापूर्वक अश्रु- प्रवाह में प्रवृत्त हो रहे हैं। सीता की इस असाधारण मनोव्यथा का अनुभव कर मयूर अपने स्वभावजन्य नृत्य का परित्याग कर देते हैं। इस प्रकार तिर्यंक् योनि में उत्पन्न पशु-पक्षी मनुष्यों से कहीं अधिक श्रेष्ठ हैं। प्रकृति के रमणीय दृश्य एवं कान्तार के वर्णन में भी कवि ने अपनी कुशल प्रतिभा प्रदर्शित की है। समुद्र का वर्णन भी उसकी कल्पनाशक्ति का एक सुंदर उदाहरण प्रस्तुत करता है। इस नाटक के कतिपय स्थलों पर कुछ अपूर्ण प्राकृतिक वाक्य मिलते हैं, विद्वानों के सतत प्रयास के उपरांत भी इनका ठीक संस्कृत रूपांतर नहीं हो पाया है। अतः इसके अषिक अध्ययन एवं मनन की आवश्यकता है जिससे इसका ठीक-ठीक रूपान्तर किया जा सके।
कृष्ण मिश्र
आपका रचा हुआ प्रबोधचन्द्रोदय नामक केवल एक ही नाटक उपलब्ध हुआ है। आप जैजाकभुक्ति के राजा कीति वर्मा के शासन-काल में विद्यमान थे। सन
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१०६८ ई० में लिखा हुआ कीर्तिवर्मा का शिलालेख भी प्राप्त हुआ है। अतः कृष्ण मिश्र का समय निश्चय ही सन् ११०० ई० के लगभग का है। प्रबोधचन्द्रोदय शान्त रसप्रधान एक एकांकी नाटक है। वेदान्त मत के अद्वैत- वाद सिद्धान्त का प्रतिपादन करना नाटककार का मुख्य उद्देश्य था। कवि ने श्रद्धा, भक्ति, विद्या, ज्ञान, मोह, विवेक, दंभ, बुद्धि इत्यादि अमूर्त्त भावमय पदार्थों को विभिन्न स्त्री और पुरुष पात्रों में विभक्त कर अध्यात्म विद्या का सुन्दर एवं रोचक उपदेश प्रस्तुत किया है। संस्कृत साहित्य के प्रथम उपलब्ध नाटककार भास के बालचरित में सर्वप्रथम ऐसे अमूर्त भावमय पदार्थों का पात्रीकरण दृष्टि- गोचर होता है। अश्वघोष ने भी इस प्रणाली को अपनाने का प्रयत्न किया है। जैसा कि उनके प्रसंग में बताया जा चुका है, उनके एक नाटक में यह शैली दृष्टि- गोचर होती है, उस ग्रंथ के नाम का पता नहीं चलता और वह हमें अपूर्ण रूप में ही प्राप्त हुआ है। अध्यात्म तत्व की दृष्टि से यह नाटक अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। इसके दार्शनिक पद्यों में श्रद्धा, भक्ति एवं ज्ञान का अपूर्व समन्वय प्रस्तुत किया गया है। अन्य वृक्षों की भांति शोकरूपी वृक्ष किस प्रकार पल्लवित हो फल प्रदान करता है, इस विषय का रूपक अलंकार द्वारा वर्णन करते हुए कवि कहता है-
उप्यन्ते विषवल्लिबीजविषमा: क्लेशाः प्रियाख्याः नरः तभ्यः स्नेहमया भवन्ति नचिराद् वज्ाग्निगर्भाङ्कुराः। येभ्योऽमी शतशः कुकूलहुतभुग्दाहं वहन्तः शन- देंहं वीप्तशिखासहस्त्रशिखरा रोहन्ति शोकब्रुमाः॥-प्रबोष० ५।१६
इस संसार में मनुष्य विष-लता के समान कलत्र-पुत्र रूपी महा अनर्थकारी क्लेश बीजों को बोते हैं। उनसे कुछ ही काल के अनन्तर वज्नाग्नि के समान संताप- दायक स्नेहासक्तिरूपी अंकुर उत्पन्न हो जाते हैं। इनसे शोकरूपी वृक्षों का प्रादुर्भाव होता है जो सहस्रों ज्वालाओं के समेत तुषाग्नि के समान सदा देह को दग्ध करते रहते हैं। इस श्लोक में निश्चय ही कवि ने अध्यात्म विद्या का बड़ा सुन्दर उपदेश दिया है।
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करते हैं। रावण अपने प्रणय-प्रस्ताव को ठुकराने के अपराध में सीता का वध करने तक को उद्यत हो जाता है परन्तु पुत्र के कटे हुए सिर को देखकर शान्त हो जाता है। इस प्रकार कवि ने मूल कथा में कतिपय परिवर्तन कर रोचकता का संचार किया है। जयदेव ने परिष्कृत भाषा एवं शैली का प्रयोग किया है। भाषा माधुर्य एवं लालित्य से परिपूर्ण है। भाषा पर कवि का असाधारण प्रभाव था, जिसके कारण उसे सूक्तियों के सुन्दर प्रयोग में सफलता मिली। तुलसीदास ने जयदेव की शैली से प्रभावान्वित होकर मानस में प्रसन्नराघव के अनेक पद्यों का अनुसरण किया है। तर्कशास्त्र के कर्कश और वक्र प्रयोगों में तथा काव्य की कोमल-कांत पदावली की रचना में कवि को आश्चर्यजनक सफलता मिली है। उसकी नाट्य-चातुरी तथा काव्यप्रतिभा से प्रभावित होकर उत्तरकालीन आलोचकों ने कवि को सर्वथा उसके अनुरूप ही पीयूषवर्ष की उपाधि प्रदान की है।
वत्सराज
कवि वत्सराज कालिंजर-नरेश परमर्दिदेव के मंत्री थे जिनका समय सन् ११६३ से १२०३ ई० तक है। अतः वत्सराज का समय सन् १२०० ई० के लगभग का है। आपने छः नाटक ग्रंथों की रचना की। भास के समान ही आपने विविध रूपकों की रचना की। आपके रूपक तथा उनके कथानक निम्नलिखित हैं- (१) कर्पूरचरित-यह एकांकी भाण है। इसमें द्यूत का खिलाड़ी कर्पूर अपने रोचक अनुभवों का वर्णन करता है। (२) किरातार्जुनीय-यह भारवि कवि के प्रसिद्ध किरातार्जुनीय महाकाव्य के आधार पर रचा हुआ एकांकी व्यायोग है। (३) हास्यचूड़ामणि-एकांकी प्रहसन है। (४) रुक्मिणीहरण-यह महाभारत के आधार पर चार अंकों का एक ईहामृग है। (५) त्रिपुरदाह-यह चार अंकों का एक डिम है। इसमें भगवान् शंकर द्वारा त्रिपुरासुर की नगरी के विध्वंस होने का वर्णन किया गया है।
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(६) समुद्रमंथन-यह तीन अंकों का समवकार है। इसमें सर्वप्रथम देवता और राक्षसों द्वारा समुद्र-मंथन की रोचक कथा का नाटकीय चित्रण है। अन्त में चौदह रत्नों की प्राप्ति के उपरांत विष्णु तथा लक्ष्मी के मंगलमय परिणय का वर्णन किया गया है। त्रिपुरदाह और समुद्रमंथन दोनों ही ग्रंथों में पौराणिक आधार पर कवि ने रमणीय रूपकों की रचना की है। उनकी शैली सरस, मधुर, ललित एवं प्रभावो- त्पादक है। दीर्घ समास एवं दुरूह वाक्य-विन्यास का प्रयोग कवि ने स्थान-स्थान पर किया है। इनके रूपकों में क्रियाशीलता, रोचकता तथा घटनाओं की प्रधानता स्पष्टतः दृष्टिगोचर होती है।