15. १५. राजशेखर
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१५. राजशेखर
(दसवीं शताब्दी ई० का आरम्भ)
महाराष्ट्र देश में जो भारत की साहित्य-विभूतियां उत्पन्न हुई है उनमें राज- शेखर का नाम प्रसिद्ध है। वे एक सफल नाटककार एवं कवि थे। उनके पिता दर्दुक तथा माता शीलावती नाम से विख्यात थीं। उनका जन्म क्षत्रियों में प्रख्यात यायावर नामक जाति में हुआ था। उनके पूज्य पिता एक लब्ध-प्रतिष्ठ व्यक्ति थे तथा समाज ने उन्हें महाराष्ट्रचूड़ामणि एवं अकालजलद जैसी उपाधियों से विभूषित एवं सम्मानित किया था। उनके पूर्वजों में सुरानन्द, तरल एवं कवि- राज जैसे उच्च कोटि के कवि उत्पन्न हो चुके थे। उनकी धर्मपत्नी चौहान वंश में उत्पन्न अवन्तिसुन्दरी नामक एक सुशिक्षित महिला थीं। धन एवं यश-प्राप्ति के उद्देश्य से उन्होंने महाराष्ट्र देश को त्याग कर कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज) को अपना निवास-स्थान बनाया। उनका समय-निर्धारण करने के लिए उनके नाटकों की कतिपय उक्तियों पर विचार करना आवश्यक है। उन्होंने अपने आश्रयदाता महेन्द्रपाल अथवा निर्भय- राज नामक नरेशों का उल्लेख किया है जो कि उन्हें राजगुरु के रूप में सम्मानित किया करते थे। औफ्रेक्ट नामक विद्वान् के मत से यह दोनों नरेश अभिन्न थे। सियादोनी के समीप एक शिलालेख प्राप्त हुआ है, जिसमें महेन्द्रपाल के समय के विषय में दो घटनाओं का उल्लेख किया गया है। इनकी तिथियां सन् ६०३-४ ई० तथा सन् ६०७-८ ई० निर्दिष्ट की गयी हैं। इस प्रकार उनका समय ६०० ई० के लगभग सिद्ध होता है। इस मत की पुष्टि अन्य प्रमाणों द्वारा भी होती है। उन्होंने उद्भट (८०० ई०) एवं आनन्दवर्धन (८५० ई०) का स्पष्ट उल्लेख किया है। यशस्तिलकचम्पू (९५९ ई०) एवं तिलकमन्जरी (१००० ई०) में उनके
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विख्यात यश एवं रचनाओं का निर्देश किया गया है। उपर्युक्त आधार पर भी राजशेखर का समय दसवीं शताब्दी ई० का आरम्भ प्रमाणित होता है। उन्होंने बाल-रामायण एवं बाल-भारत की रचना क्रमशः लोक-विख्यात महाकाव्य ग्रन्थ रामायण तथा महाभारत के कथानक के आधार पर की है। उन्होंने विद्धशालभंजिका तथा कर्पूरमंजरी को अपनी कल्पना-शक्ति का रोचक पुट प्रदान कर अपनी अनुपम नाटय-कुशलता प्रकट की है। इस प्रकार उन्होंने सब मिलाकर चार रूपकों की रचना की है। बालरामायण दस अंकों का एक महानाटक है। इस ग्रंथ में रामायण के आधार पर रोचक कल्पना करते हुए कथानक को नवीन रूप प्रदान किया गया है। इस ग्रंथ में पूर्व काव्य-परम्परा के प्रतिकूल पाठकों की सहानुभूति राम से न कराकर रावण से करायी गयी है।
बालरामायण
बाल-रामायण महानाटक के प्रथम तीन अंकों में रावण का व्यक्तित्व तथा जनक के धनुषयज्ञ का वर्णन है। रावण मिथिला के लिए प्रस्थान करता है तथा सीता की प्राप्ति के लिए परशुराम से प्रार्थना करता है। परशुराम उसकी प्रार्थना को अस्वीकृत कर देते हैं। असफल होकर रावण सीता-राम का परिणय देखकर बहुत ही खिन्न होता है। चतुर्थ अंक में राम तथा परशुराम का परस्पर संवाद दिखाया गया है। पंचम तथा छठे अंक में रावण अपनी बहिन शूर्पणखा की सहायता से सीता का हरण कर उसे राम से वियुक्त करने में सफल होता है। सातवें अंक में अपनी वानर-सेना की सहायता से भगवान् राम समुद्र पर पुल बनाकर तथा उसके पार जाकर लंका में प्रवेश करते हैं। आठवें अंक में राम-लक्ष्मण तथा रावण के सहायकों के मध्य में युद्ध होने का वर्णन है। कुम्भकर्ण एवं मेघनाद का युद्ध इस अंक की मुख्य घटनाएँ हैं। इसके बाद के अंक में राम-रावण के चित्ताकर्षक युद्ध का वर्णन है। यह वर्णन इंद्र द्वारा कराकर कवि ने ग्रन्थ की रोचकता को और भी बढ़ा दिया है। अंतिम अंक में राम, लक्ष्मण, सीता तथा उनके साथी वायुयान द्वारा वायुलोक का भ्रमण कर अयोध्या पहुँचते हैं। सकल नगरवासी उनका हृदय से स्वागत करते हैं तथा भगवान् रामचन्द्र का उनके अनुरूप राजतिलक करते हैं।
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बालरामायण में कथानक का अनावश्यक विस्तार किया गया है। राम से संबंधित घटनाओं को छोड़कर रावण से संबंधित अधिक घटनाओं का समावेश किया गया है। समस्त ग्रंथ में स्रग्धरा तथा शार्दूलविक्रीड़ित जैसे विशालकाय छंद बहुलता से प्रयुक्त किये गये हैं। बालरामायण के समान ही नाटककार ने महाभारत के आधार पर बाल- भारत नामक एक रूपक की रचना की है। दुर्भाग्यवश इस अपूर्व ग्रंथ की सम्पूर्ण प्रति हमें उपलब्ध नहीं हुई है। विद्वानों के कठिन परिश्रम के उपरान्त इसके केवल दो अंक ही सुरक्षित रह सके हैं। ग्रंथ के इस भाग में द्रौपदी-स्वयंवर, द्यूत क्रीड़ा एवं द्रौपदी-अपहरण का प्रकरण व्णित है।
विद्धशालभंजिका
विद्धशालभंजिका भी चार अंकों की एक नाटिका है। इसमें कवि की कल्पना- शक्ति का रोचक चमत्कार प्रस्फुटित हुआ है। इसमें लाट के महाराज चंद्रवर्मा की पुत्री राजकुमारी मृगांकवली तथा सम्राट् विद्याधर मल्ल की प्रणय-कथा का समा- वेश है। प्रथम अंक में चंद्रवर्मा मृगांकवली को मृगांकवर्मन नामक पुत्र घोषित कर विद्याधरमल्ल की रानी के समीप भेजता है। विद्याधर ने स्वप्न में एक रूपवती कामिनी को देखकर उसे पकड़ना चाहा। उसके मंत्री को मृगांकवली के लिंग की सत्यता विदित थी। अतः उससे राजा का प्रेम उत्पन्न कराने के उद्देश्य से उसे उसने राजा के समीप भेजा था। मंत्री भृगुनारायण को ज्योतिषियों की भविष्यवाणी के अनुसार यह विदित था कि मृगांकवली का भावी पति चक्रवर्ती सम्राट् होगा। जिस समय मृगांकवली महाराज के समीप पहुंची वह संयोगवश अपनी चित्रशाला में खुदी हुई अपनी प्रेयसी की मूर्ति को देख रहा था। राजा उसके कण्ठ में एक मुक्तामाला डाल देता है। इस प्रकार वह उससे बहुत प्रभावित होता है परन्तु मृगांकवली पर तनिक भी आकृष्ट नहीं होता। द्वितीय अंक में महारानी मृगांकवली के परिवर्तित रूप से धोखे में पड़कर कुन्तलराजकुमारी कुवलयमाला का विवाह उसके साथ करने का प्रयत्न करती हैं। एक दिन विद्याधर उद्यान में मृगांकवली को उसके मूल रूप में क्रीड़ा
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करते व प्रणयलेख पढ़ते हुए देखकर वह सहसा उस पर अनुरक्त हो जाता है। तृतीय अंक में राजा और विदूषक मृगांकवली से मिलते हैं तथा नायक-नायिका में प्रेममय एवं गोपनीय वार्त्तालाप सम्पन्न होता है। चतुर्थ अंक में महारानी का अपने प्रेम में प्रतिद्वन्द्वी होने की आशंका से द्वेष दिखाया गया है। वह मृगांकवर्मन को स्त्रीवेश में सुसज्जित कर विद्याधर से विवाह रचती है। परंतु वस्तुतः उसके स्त्री होने से राजा की मनोकामना पूर्ण हो जाती है। महारानी को इस असफलता से भीषण धक्का लगता है। वह विवश होकर कुवलयमाला का विवाह भी राजा विद्याधरमल्ल के साथ करने को बाघ्य होती है।
कर्पूरमंजरी कर्पूरमंजरी कवि की सर्वोत्कृष्ट रचना है। इसमें सबसे प्रमुख विशेषता यह है कि यह संस्कृत में उपलब्ध एकमात्र ऐसा रूपक है जिसमें केवल प्राकृत छंदों का प्रयोग हुआ है। यह सट्टक प्रकार का रूपक है। इसमें कुन्तल-राजकुमारी कर्पूरमंजरी तथा महाराज चण्डपाल की रोचक प्रणयकथा का समावेश है। कथा- नक महाराज हर्षवर्धन कृत रत्नावली नामक नाटिका के समान ही है। इसका कथानक संक्षेप में इस प्रकार है- प्रथम अंक में भैरवानन्द नामक एक जादूगर महाराज चण्डपाल के दरबार में कुन्तल-राजकुमारी कर्पूरमंजरी को उपस्थित करता है। राजमहिषी उससे प्रभा- वित होकर उसे अपने सेवाकार्य में लगा देती हैं। अकस्मात् चण्डपाल उससे मिलता है और उस पर अनुरक्त हो जाता है। द्वितीय अंक में राजा अपनी अभिलाषा विदूषक से प्रकट करता है। विदूषक तथा कर्पूरमंजरी की सखी विचक्षणा उन दोनों की भेंट का प्रबंध करते हैं। उद्यान में दोनों प्रेमी मिलते हैं तथा एक असा- धारण आनन्द का अनुभव करते हैं। तृतीय अंक में रानी एकान्त में उन दोनों को परस्पर कीड़ा करते हुए देखकर सहज ही कुद्ध हो जाती है। चतुर्थ अंक में कर्पूरमंजरी के राजकुमारी होने की सत्यता प्रकट होते ही सबकी अनुमति से उसका विवाह महाराज चण्डपाल के साथ कर दिया जाता है। १३
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कर्पूरमंजरी के अध्ययन से पता चलता है कि राजशेखर के समय में स्त्रियाँ अपने नाटकीय भाग का अभिनय करने के हेतु स्वयं रंगमंच पर उपस्थित हुआ करती थीं। इस सट्टक में अन्य रूपकों से भिन्न, प्रस्तावना में नान्दी के उपरान्त सूत्रधार किसी पात्र से वार्त्तालाप नहीं करता परन्तु उसके बदले स्थापक श्लोक बोलता है। इस ग्रंथ में प्रत्येक अंक के लिए जवनिकान्तर शब्द प्रयुक्त हुआ है तथा जवनिका रंगमंच के परदे का द्योतक है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि इस ग्रंथ के रचनाकाल तक यवनों का हमारे साहित्य पर पर्याप्त प्रभाव पड़ चुका था। चर्चरी नामक नृत्यविशेष का भी इसमें यत्र-तत्र उल्लेख प्राप्त होता है। इसमें हाव-भाव का प्रधान स्थान है। कर्पूरमंजरी का पद-लालित्य उल्लेखनीय है। प्राकृत छंदों का प्रयोग कर उन्होंने काव्य में एक नवीन शैली को जन्म दिया। रस का परिपाक, अनुप्रास माधुर्य, गीत सौन्दर्य चित्रित करने में कवि विशेष प्रतिभासम्पन्न है। महाराष्ट्रीय पद्य तथा शौरसेनी गद्य इस सट्टक में विशेष प्रकार से प्रयुक्त हुआ है। कर्पूरमंजरी में ऐसे कई शब्द प्रयुक्त हुए हैं जो हिंदी भाषा में अपना लिये गये हैं। इस प्रकार भाषा के विकास में भी इस ग्रंथ का स्थान विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। राजशेखर की नाटकीय कला का विवेचन करने पर पता चलता है कि प्रवाह की शिथिलता तथा हास्य रस का अभाव उनकी शैली की न्यूनताएँ हैं। भवभूति की भांति नाटकों में वे पद्यों को दुहराते हैं। स्रग्धरा तथा शार्दूलविकरीड़ित जैसे दीर्घ शब्दावलीवाले छंदों के प्रयोग में वे कुशलहस्त हैं। भाषा पर उनका असा- धारण अधिकार था। संस्कृत के पश्चाद्वर्ती नाटककारों में उनका स्थान महत्त्व- पूर्ण है। भाषामनीषियों ने सर्वथा उनको उनके अनुरूप ही सर्व-भाषा-विचक्षण उपाभि से विभूषित किया है।