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14. १४. मुरारि

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१४. मुरारि

(८वीं शताब्दी ई०)

रामायण के आधार पर लिखे हुए नाटकों में अनर्घराघव का स्थान बहुत ही महत्त्वपूर्ण एवं उल्लेखनीय है जो मौद्गल्य गोत्र में उत्पन्न मुरारि की एकमात्र उपलब्ध रचना है। मुरारि के पिता का नाम वर्धमानक एवं माता का नाम तन्तु- मती देवी था। उनके समय के विषय में निश्चित प्रमाण नहीं मिलते। परोक्ष प्रमाणों एवं उद्धरणों के आधार पर ही हमें उनके समय का निर्णय करना पड़ता है। महाकवि भवभूति के प्रसिद्ध उत्तररामचरित नाटक के दो श्लोक कवि ने उद्धृत किये हैं। अतः वे भवभूति के निश्चय ही पश्चाद्वर्ती थे। भवंभूति का समय, जैसा कि पहिले बताया जा चुका है, सन् ७०० ई० के आसपास है। महाकवि रत्नाकर ने अपने हरि-विजय नामक ग्रंथ में मुरारि का स्पष्ट निर्देश किया है। रत्नाकर का समय लगभग सन् ८५० ई० है। अतः आप इससे पूर्व अवश्य हुए। प्रो० कोनो के विचारानुसार मुरारि राजशेखर के पूर्ववर्ती थे। यह धारणा सन् ११३५ ई० में रचे गये मंख कृत श्रीकण्ठचरित के आधार पर अवलम्बित है। उपर्युक्त तर्क के आधार पर विद्वानोंने मुरारि का समय सन् ८०० ई० के लगभग माना है।

अनर्घराघव का कथानक उनके नाटक अनर्घराघव में सात अंक पाये जाते हैं। इसमें महर्षि विश्वा- मित्र द्वारा यज्ञरक्षार्थ राम-लक्ष्मण की दशरथ से याचना से राम-राज्याभिषेक पर्यन्त रामायण की कथा अत्यन्त रोचक ढंग से प्रस्तुत की गयी है। अपनी अनु- पम काव्य-कला के आधार पर मुरारि ने यत्र-तत्र मूल कथा में कुछ परिवर्त्तन कर अपनी कृति को रोचक नाटकीय रूप प्रदान किया है।

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प्रथम अंक में मुनि विश्वामित्र महाराज दशरथ से यज्ञ-रक्षणार्थ राक्षसों के वध के हेतु राम और लक्ष्मण दोनों पुत्रों की याचना करते हैं। महाराज पुत्र-वियोग में दुःख अनुभव करते हैं परन्तु कर्त्तव्य समझ पुत्रों को मुनि के साथ भेज देते हैं। द्वितीय अंक में राक्षस एवं उनके भयावह कृत्यों का वर्णन है। आश्रम में पहुंचकर राम और लक्ष्मण को ताड़का तथा अन्य राक्षसों के आतंक की सूचना प्राप्त होती है। ताड़का के भय से समस्त आश्रम संत्रस्त हो जाता है। पहले तो राम स्त्री-वध में कुछ संकोच अनुभव करते हैं परन्तु इस अवसर पर दुष्टों का वध करना आवश्यक धर्म समझ कर ही उसे संपादित करते हैं। तृतीय अंक में वे जनक के नगर मिथिलापुरी में प्रवेश करते हैं, जहां पर उन्हें राजकुमारी सीता के स्वयंवर की सूचना मिलती है। मिथिला-नरेश की प्रतिज्ञा के अनुसार रामचन्द्र शिवधनुष का विध्वंस कर सीता के साथ परिणय के अधिकारी हो जाते हैं। दशरथ के अन्य पुत्रों के संबंध भी इस अवसर पर ही निश्चित हो जाते हैं। चतुर्थ अंक में सीता को न प्राप्त कर सकने के कारण रावण अपनी असफलता पर विलाप करता है। शूर्पणखा से राम और सीता के अटूट प्रेम की सूचना प्राप्त कर रावण उन दोनों को वियुक्त करवाने के हेतु नाना प्रकार के प्रयत्न करना आरंभ करता है। इसी कारण वह परशुराम को भी उकसाता है। राम उनसे युद्ध करने के लिए उद्यत हो जाते हैं। इस अवसर पर धनुष की टंकार भीषण ध्वनि करती है जिसे सीता दूसरी स्त्री को प्राप्त करने के लिए राम द्वारा पुनः धनुष-भंग होने की संभावना समझती है। इस घटना का मूल कथा से परिवर्तित रूप में अंकन किया गया है। रावण मंथरा के रूप में शूर्पणखा को कैकेयी के भड़- काने के लिए प्रेरित करता है। महाराज दशरथ अपने पुत्र राम को अत्यंत विलाप करते हुए वन में प्रेषित करने को बाध्य होते हैं। पंचम अंक का आरम्भ जाम्बवान् एवं श्रवण का वन-वासिनी वनिताओं के साथ परस्पर वार्त्तालाप से होता है। राम तथा लक्ष्मण द्वारा वन में किये गये विभिन्न कर्मों का वर्णन उनके परस्पर विचार-विनिमय का विषय होता है। जटायु द्वारा रावण तथा मारीच के कृत्य एवं सीता-हरण की हृदय-विदारक घटनाओं की भी सूचना मिलती है। लक्ष्मण कबन्ध नामक राक्षस का वध, उसके गुह

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या निषादराज पर आक्रमण करने के प्रतिकार स्वरूप, करते हैं। एक वृक्ष पर दुंदुभि का कंकाल लटक रहा है। लक्ष्मण-कबन्ध युद्ध में वह वृक्ष टूट जाता है फलतः कंकाल भूमि पर गिर पड़ता है। इस घटना के प्रतिकार-स्वरूप बालि उत्तेजित हो जाता है तथा राम को युद्ध के लिए ललकारता है। संग्राम के दौरान में बालि का काम तमाम करने के उपरान्त राम उसके कनिष्ठ भ्राता सुग्रीव को राज्याभिषिक्त करते हैं। सुग्रीव भी इस अवसर पर राम को सीता के ढूंढ़ने में सहायता करने के लिए कटिबद्ध हो जाता है। षष्ठांक में रावण के आश्रित शरण और शुक नामक दो गुप्तचर मलयवंत को सूचित करते हैं कि राम ने सफलतापूर्वक सेतुबंध कर लिया है और उसकी सहायता से उनकी सेना सागर पार आ चुकी है। यह सूचना मिलने पर लंका में हलचल मच गयी और सहसा ही रावण-सेना को समर में कूदना पड़ा। कुंभ- कर्ण एवं मेघनाद युद्ध के लिए प्रस्थान करते हैं। नाटक में उनकी हत्या नाट्य- शास्त्र के नियमानुकूल प्रद्शित नहीं की गयी है। रण-संग्राम में मृत्यु के भय के कारण चिल्लाते हुए योद्धाओं की गर्जना दर्शकों को अवश्य सुनाई पड़ती है। मेघनाद और कुंभकर्ण जैसे महारथियों को रावण खोकर शोक-संतप्त हो जाता है। अंततः रावण भी रणस्थली में आ धमकता है। विद्याधर रत्नचूड़ एवं हेमांगद के परस्पर वार्त्तालाप द्वारा राम-रावण का अंतिम संघर्ष एवं रावण-विनाश का वर्णन करने के उपरांत अंक की समाप्ति होती है। सप्तम अंक में रावण के वध के उपरान्त सीता-राम का पुनर्मिलन संपन्न होता है। तदुपरान्त राम, लक्ष्मण, सीता एवं विभीषण आकाश-मार्ग द्वारा कुबेर के विमान पर अयोध्या के लिए प्रस्थान करते हैं। मार्ग में सुमेरु पर्वत एवं चन्द्रलोक के रमणीय स्थलों का अवलोकन करते हुए अयोध्या पहुंचते हैं। मार्ग में उन्हें मलयवंत एवं प्रश्रवण पर्वत, गोदावरी, गंगा एवं यमुना नदियां, कुण्डिनीपुर, कान्सी, उज्जयिनी, माहिषमती, मिथिला एवं वाराणसी आदि नगर मिलते हैं। अयोध्या पहुँचने पर राम की माताएं और भाई हृदय से उनका स्वागत करते हैं। वशिष्ठ मुनि उनका राज्याभिषेक संपन्न करते हैं। तदुपरान्त ग्रंथ पर्यवसित होता है।

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अपनी नाटक-रचना-चातुरी प्रदर्शित करने के हेतु मुरारि ने मूल कथानक में कतिपय परिवर्तन किये जिनमें से तीन प्रमुख हैं- (१) रामायण के अनुसार छिप कर बालि का वध करने से राम का यश कलंक को प्राप्त करता है। नाटक में बालि ही उत्तेजित हो उनसे संग्राम करता है। इस प्रकार बालि-सुग्रीव संग्राम न होकर नाटक में राम-बालि युद्ध ही प्रकाशरूप में सम्पन्न होता है। (२) परशुराम से संग्राम करने के लिए उद्यत राम के धनुष की टंकार सुनकर सीता एक विचित्र कल्पना करती हैं। (३) कबंध-लक्ष्मण युद्ध एवं गुह की रक्षा के विषय में भी नवीन कल्पना की गयी है। इन तीनों ही घटनाओं का वाल्मीकि रामायण में स्थान नहीं है। प्रथम का उद्देश्य नायक के चरित्र को निष्कलंकित बनाना तथा अन्तिम दो का नाटक के कथानक को रोचक बनाना है। सप्तम अंक में मार्ग का विशद उल्लेख करते हुए नगर, नदी तथा तीर्थादि का वर्णन किया गया है। इस चित्रण से तत्कालीन भौगोलिक ज्ञान पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है।

रचना-वैशिष्ट्य

जैसा कि कवि ने नाटक की प्रस्तावना में बताया है, उसका उद्देश्य भयानक एवं वीभत्स रस से ऊबे हुए दर्शकों में अद्भुत एवं वीर रस का संचार करना है। भगवान् राम का जीवन कवि ने उपर्युक्त उद्देश्य की पूर्ति के लिए आवश्यक समझा। नाटक के कथानक पर विचार करने से विदित होता है कि कवि ने उसका अनावश्यक विस्तार किया जिस कारण उसे उपर्युक्त उद्देश्य में सफलता प्राप्त न हुई। भावों के व्यञ्जित करने एवं पौराणिक ज्ञान के निरूपण करने में कवि ने अपनी असाधारण प्रतिभा का दिग्दर्शन करवाया है। उनकी रचना में नाद-सौन्दर्य एवं भाव-प्रकाशन की समता दर्शनीय है। उनकी उपमाएं मौलिक एवं सरस होती हैं। भाषा पर उनका असाधारण अधिकार था

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जिस कारण उन्हें व्याकरण विषयक पाण्डित्य प्रदर्शन करने का पर्याप्त अवसर मिला। नाटयकला की अपेक्षा कवि ने शब्दों का चमत्कार दिखाना अधिक श्रेयस्कर समझा। व्याकरण विषयक इतने प्रयोग एक स्थान पर, जितने कि अनर्घराघव में मिलते हैं, अन्यत्र मिलना कठिन है। यही कारण है कि भट्टो जी दीक्षित ने अपने विख्यात सिद्धान्त कौमुदी व्याकरण ग्रंथ में अनर्घराघव के अनेक उदाहरण उप- स्थित किये हैं। उनकी शैली का एक उदाहरण निम्नलिखित है-

"वृश्यन्ते मधुमत्तकोकिलवधूनिर्धूतचूताङकुर- प्राग्भारप्रसरत्परागसिकतादुर्गास्तटीभूमयः । या: कृच्छादतिलङ्ध्य लुब्धकभयात तैरेवरेणूत्करं- र्धारावाहिभिरस्ति लप्तपदवी निःशंकमेणीकुलम्।।" -- अनर्घ० ५/६

गोदावरी के रमणीय तट का वर्णन करते हुए कवि कहता है- "मद-मस्त कोयलों ने आम के सुन्दर बौरों को नदी के तट पर गिराकर एक बहुत बड़ी राशि में पराग एकत्र किया है। उनके छोटे-छोटे टीले से बन गये हैं। हरिणियां व्याघ्रों के आतंक से भयभीत हैं। इस कारण वे इन टीलों को पार करने में कुछ कठिनाई अनुभव करती हैं। किन्तु जिस समय यह पराग-राशि पदचिह्नों का स्पर्श करती है उनके आनंद की सीमा नहीं रहती। इस पद में मुरारि ने प्रकृति का बड़ा ही मनोरम चित्रण किया है। इसके अतिरिक्त मुरारि ने उपमा एवं अतिशयोक्ति अलंकारों के प्रयोग में विशेष कुशलता व्यक्त की है। कुछ आलोचकों ने उन्हें बाल-वाल्मीकि का पद भी प्रदान किया है तथा कुछ अन्य उन्हें भवभूति से भी श्रेष्ठतर मानते हैं। उनके विषय में एक गर्वोक्ति बहुत ही प्रसिद्ध है जो यह है - "देवों वाचमुपासते हि बहवः सारं तु सारस्वतं जानीते नितरामसौ गुरुकुलक्लिष्टो मुरारि: कविः। अब्धिलंङघित एव वानरभटैः कित्वस्य गम्भीरताम् आपातालनिमग्न-पीवरतनुर्जानाति मन्था चल: ।"

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सरस्वती की उपासना में अनेक कवि नाना प्रकार से रत रहते हैं पर विद्या के मूल तत्व के वेत्ता तो मुरारि कवि ही हैं। उन्होंने गुरुकुल में दीर्घकाल तक निवास कर यथाविधि विद्योपार्जन एवं घोर परिश्रम किया है। बन्दरों ने अतुल महासागर को पार अवश्य किया था परन्तु उसकी अथाह गहराई का पता तो केवल पाताल तक डुबकी लगानेवाले विपुलकाय मन्दराचल को ही है।