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13. १३. भट्ट नारायण

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१३. भट्ट नारायण

(सातवीं शताब्दी ईसवी का उत्तरार्ई)

वेणीसंहार महाकवि भद्र नारायण की एकमात्र कृति है। जैसा कि हमारे देश के साहित्यकारों की परम्परा है, वे अपने जीवन के विषय में किञ्चिन्मात्र भी प्रकाश नहीं डालते। भट्ट नारायण ने भी इसी परंपरा का पूर्णतया पालन किया है, जिस कारण हमें उनके व्यक्तिगत जीवन, निवास-स्थान आदि के विषय में बहुत ही अल्प सामग्री प्राप्त हुई है। कुछ इतिहास-वेत्ताओं का मत है कि आप आरम्भ में कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज) में निवास करते थे किंतु कालांतर में विषम परिस्थिति वश बंगाल में जाकर बस गये। भट्ट एवं मृगराज आपकी दो उपाघियां थीं जिस कारण आपका वर्ण भी संदिग्ध हो गया है। भट्ट शब्द ब्राह्मणत्व का एवं मृगराज शब्द क्षत्रियत्व का द्योतक है। एक किंवदन्ती के अनुसार आप एक ब्राह्मण गौड़ परिवार के संस्थापक भी थे। कुछ विद्वानों का यह मत है कि आप आधुनिक टैगोर वंश के पूर्वजों में से थे यद्यपि इस धारणा के पक्ष में निश्चित प्रमाणों का सर्वथा अभाव ही है। आपका समय निर्धारित करने के लिए भी हमें केवल अनुमान और कल्पना का ही आश्रय लेना पड़ता है। भट्ट नारायण बंगाल के किसी राजा के आश्रित राजकवि थे जो आठवीं शताब्दी ई० के पाल वंशीय नरेशों के पूर्ववर्ती थे। इस आधार पर विद्वानों का कथन है कि वे ७०० ई० के लगभग प्रादुर्भूत हुए होंगे। इस कथन की पुष्टि कुछ अन्य अप्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा भी होती है। वेणीसंहार सदा से ही संस्कृत साहित्य में एक लोकप्रिय नाटक रहा है। यही कारण है कि परवर्ती साहित्यकारों ने इस ग्रंथ के अनेकानेक उद्धरण अपनी कृतियों में समाविष्ट किये हैं जिनमें मम्मट (सन ११०० ई०), धनंजय (सन् १००० ई०), आनंद वर्द्धन

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(सन् ८५० ई०) एवं वामन (सन् ८०० ई०) विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। महाकवि भवभूति संस्कृत साहित्य के अमर कलाकार हैं। संभवतः भट्ट नारायण भवभूति के समकालीन ही हों और संस्कृत साहित्य के चर्मोत्कर्ष के युग को सुशोभित करते रहे हों।

वेणीसंहार का कथानक

वेणी-संहार का कथानक महाभारत से उद्धृत है। कौरवों की सभा में दुःशासन ने द्रौपदी का चीर हरण करते हुए उसका घोर निरादर किया। भीम ने प्रण किया कि मैं दुर्योधन की जंघाओं को अपनी गदा द्वारा अवश्य तोड़ूँ गा। द्रौपदी भी अपमान के प्रतिकारस्वरूप यह प्रतिज्ञा करती है कि वह भीम की इस प्रतिज्ञा की पूर्ति होने के समय तक अपने केशों को उन्मुक्त ही रखेगी। प्रथम अंक में प्रस्तावना के उपरांत भीम और सहदेव में वार्त्तालाप संलापित होता है। भगवान् कृष्ण उभय पक्ष में समझौता करवाने के उद्देश्य से दुर्योधन के समीप जाते हैं जब कि वे दोनों ही उनके आगमन की प्रतीक्षा करते हुए होते हैं। भीम कौरवों द्वारा किये हुए अपकार का प्रतिकार करने का दृढ़ निश्चय कर चुके थे। यदि युधिष्ठिर इसके पूर्ण होने के पूर्व ही संधि का प्रस्ताव प्रस्तुत करेंगे तो भीम उनकी आज्ञा का उल्लंघन करने को बाध्य होंगे। सहदेव अपने ज्येष्ठ भ्राता के दुःख को शांत करने का प्रयत्न करते हैं। द्रौपदी को भी इसी अवसर पर अपनी परिचारिका से दुर्योधन-पत्नी भानुमती द्वारा अपमानजनक शब्द कहने की सूचना मिलती है जो कि भीम के उग्र क्रोध को और भी उत्तेजित कर देती है। इसी समय कृष्णागमन होता है जो कि दुर्योधन को समझाने में असमर्थ होने के उप- रान्त उसी समय लौटते हैं। इस अवस्था में युद्ध अवश्यम्भावी है और द्रौपदी अपने पतियों को युद्ध के लिए प्रोत्साहित करती है। द्वितीय अंक के प्रारम्भिक दृश्य में भानुमती एक महा भयावह स्वप्न देखती है -- एक नकुल (नेवला) सौ सपों का वध करता है जो पांडवों में वीर नकुल द्वारा सौ कौरवों के भावी नाश का सूचक हो सकता है। जागने पर भानुमती अपने स्वप्न का समस्त वृत्तांत अपने पति से प्रकट करती है। पहले तो कुरुराज इस

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स्वप्न की भावी आशंका को नहीं समझ पाता किंतु तनिक चिन्तन के अनन्तर ही भयभीत एवं उद्विग्न हो जाता है। तत्पश्चात् पति-पत्नी में शृंगारिक कथनो- पकथन होता है और दुर्योधन भानुमती को सांत्वना प्रदान करता है। इसी अवसर पर उन लोगों के मध्य में जयद्रथ की माता का भीत दशा में प्रवेश होता है जो कि पांडवों के आतंक से घबरायी हुई है। तत्काल ही दुर्योधन द्रौपदी के प्रति किये गये अपमान का स्मरण कर प्रसन्नता प्रकट करता है और पांडवों की सामरिक शक्ति की विडंबना करता है। प्रस्तुत अंक के अंत में युद्ध के लिए तत्पर हो रथारूढ़ भी हो जाता है। तृतीय अंक के आरंभ में एक राक्षस एवं राक्षसी का परस्पर भयातुर दशा में संवाद दिखाया गया है। युद्ध में हताहत योद्धाओं के मांस तथा मज्जा से ही इस दम्पति की उदर-पूर्ति होती है। घटोत्कच का रणभूमि में प्राणान्त हो जाता है जिसके कारण उसकी माता हिडंबा शोकाकुल हो जाती है। उसी समय द्रोणा- चार्य के वध की सूचना भी मिलती है। गुरु तेज की सजीव प्रतिमा थे तथा बिना छल किये उन पर विजय प्राप्त करना असंभव था। युधिष्ठिर द्वारा अपने पुत्र अश्वत्थामा की मृत्यु का मिथ्या समाचार अवगत कर वह शस्त्र त्याग देते हैं और घृष्टद्युम्न इस नृशंस कृत्य में सफल होते हैं। अपने पिता की छलपूर्वक मृत्यु की सूचना पाकर अश्वत्थामा शोक-जनित कोध के वेग से उद्दीप्त हो जाता है। कृपा- चार्य अश्वत्थामा को सान्त्वना प्रदान करते हुए परामर्श देते हैं कि वह दुर्योधन से अपने आप को युद्ध में चमत्कार दिखलाने के हेतु किसी उचित पद पर आसीन होने के लिए प्रार्थना करे। तभी कर्ण का आनयन होता है। कर्ण दुर्योधन को द्रोणाचार्य की मृत्यु की सूचना देते है और कहते हैं कि पुत्र के निधन का मिथ्या समाचार सुनकर द्रोण ने अपना जीवन निष्प्रयोजन समझ रण में अस्त्र त्याग कर दिया। कृपाचार्य और अश्वत्थामा भी कर्ण और दुर्योधन के समीप पहुंचते हैं और अश्व- त्थामा के उचित पद पर अभिषिक्त होने की चर्चा होने लगती है। दुर्योधन ने कर्ण को पहले ही वचन दे रखा था। अतः अश्वत्थामा को वह पद प्रदान करने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं हुआ। फल यह हुआ कि कर्ण और दुर्योधन के मध्य में वाक् कलह उत्पन्न हो गया। यह कलह अपना प्रचंड रूप धारण करने वाला ही था कि

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अकस्मात् भीम तथा दुःशासन के संग्राम की उन्हें सूचना मिली जिसमें भीम दुःशासन का वध करने के 'उपरांत उसके वक्षस्थल से रक्त पान करने के लिए दृढ़प्रतिज्ञ हैं। दुर्योधन, कर्ण और अश्वत्थामा तीनों ही संग्राम में दुःशासन के सहायतार्थ जाने को उद्यत होते हैं। उनके रण-संग्राम में अवतरित होने के पूर्व ही भीम दुःशासन का वव कर अपनी एक प्रतिज्ञा पूर्ण करते हैं। इस प्रकार कौरव शोक करते ही रह जाते हैं, यद्यपि इस अंक में दुर्योधन को इस वध की सूचना नहीं मिली। चतुर्थ अंक में दुर्योधन विक्षिप्त दशा में चित्रित किया गया है। कौरवों के लिए महती विपत्ति स्वरूप दुःशासन की हत्या एवं भीम की प्रतिज्ञा-पूर्ति की उसे सूचना मिलती है और वह शोक एवं क्रोध से व्याकुल हो उठता है। कुछ समयो- परान्त एक दूत का प्रवेश होता है जो दुर्योधन को कर्ण के पुत्र वृषसेन की रणस्थल में हत्या की हृदय-विदारक सूचना देता है। कर्ण के रक्त से लिखा हुआ एक पत्र भी प्रस्तुत किया जाता है जिसमें कर्ण दुर्योधन की सहायता के लिए प्रार्थना करता है। वीरों की भांति दुर्योधन भी रण-क्षेत्र में प्रस्थान करने के लिए उद्यत होता है। तत्काल ही उसके पिता धृतराष्ट्र, माता गांधारी एवं संजय का आगमन होता है जिस कारण दुर्योधन का युद्ध-क्षेत्र के लिए प्रस्थान रुक जाता है। पांचवें अंक में धृतराष्ट्र और गांधारी अपने पुत्र दुर्योधन को युद्ध शान्त कर पांडवों से संधि करने का परामर्श देते हैं। कारण स्पष्ट है। कौरव सेना के समस्त उच्च कोटि के वीर योद्धा वीर गति को प्राप्त कर चुके हैं तथा एकमात्र दुर्योधन के जीवित रहने से शत्रु की प्रतिज्ञा अपूर्ण है। दुर्योधन ऐसा करना कायरता सम- झता है और अपने माता-पिता की आज्ञा न मानने के लिए बाध्य होता है। इसी अवसर पर भीम और अर्जुन का प्रवेश होता है तथा वे दुर्योधन को संग्राम के लिए ललकारते हैं। अश्वत्थामा भी तभी उपस्थित हो जाता है तथा पांडवों द्वारा कौरवों के विनाश का स्मरण कर करोधयुक्त वीरतापूर्ण उक्ति करता है। षष्ठ अंक में कथानक अत्यन्त रोचक है। अपने समस्त कुटुम्बियों के रण- क्षेत्र में वध किये जाने के अनंतर दुर्योधन भय एवं कार्पण्य के वशीभूत होकर प्राण- रक्षार्थ एक सरोवर में डुबकी लगा कर छिप जाता है। महाराज युघिष्ठिर आज्ञा

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देते हैं कि दुर्योधन की खोज सावधानी से की जाये तथा प्रत्येक संभव उपाय को कार्य में लाया जावे। कुछ ही देर के अनंतर पांचालक नामक एक चर दुर्योधन की मृत्यु की सूचना इस प्रकार देता है- अर्जुन और भीम द्वारा दुर्योधन के खोजने का बहुत प्रयत्न करने पर भी वह न मिला। एक सरोवर के समीप किसी व्यक्ति के जाने के पद-चिह्न अंकित थे किन्तु वापस होने के न थे। अतः उसमें दुर्योधन के होने की आशंका से भीम ने उसे ललकारा और जल को कल्लोलित किया। तभी दुर्योधन जल के बाहर निकला और उसको भीम ने पकड़ कर अपनी प्रतिज्ञा पूर्ण की। यह वृत्तांत ज्ञात होने के थोड़ी ही देर अनंतर एक चार्वाक का आगमन होता है जो संग्राम का वृत्तांत अन्यथा ही बतलाता है। उसके कथनानुसार दुर्योधन भीम का वध कर चुका है। यह हृदयविदारक सूचना पाकर दोनों द्रौपदी व युधिष्ठिर प्राणान्त करने का निश्चय करते हैं। वे ऐसा करने ही वाले थे कि सहसा बाहर से एक ध्वनि आती है। द्रौपदी दुर्योधन की आशंका से भयभीत हो जाती है। अकस्मात् भीम आकर उसको पकड़ लेते है और अपनी प्रतिज्ञानुसार दुर्योधन का विनाश करने के उपरान्त उसके निकलते हुए उष्ण रक्त से द्रौपदी की वेणी का संहार करते हैं। तदुपरान्त उन सब का शेष जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है। वेणीसंहार नाटक के उपर्युक्त कथानक पर विचार करने से स्पष्ट विदित होता है कि भट्ट नारायण ने अपनी रचना को लोकप्रिय बनाने के हेतु महाभारत की कथा में अनेकानेक मौलिक परिवर्तन किये जिससे उनकी काव्य-चातुरी और नाट्यकुशलता व्यक्त होती है। वेणीसंहार एक अद्भुद् नाटक है जिसके नायक का प्रश्न भी विवादास्पद एवं संदिग्ध है। विभिन्न विद्वान् अपनी योग्यतानुसार युधिष्ठिर, दुर्योधन और भीम को इस रचना का नायक मानते हैं और अपना पृथक् तर्क उपस्थित करते हैं। युधिष्ठिर को नायक मानने वाला विचार उचित प्रतीत नहीं होता क्योंकि उनका कार्य-क्षेत्र बहुत ही सीमित है, यद्यपि वह पांडवों के ज्येष्ठ भ्राता के रूप में उनकी समस्त शक्तियों के केन्द्र हैं।

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नायक के सम्बन्ध में मतभेद

भीम और दुर्योधन को ही नायक मानने के विषय में मुख्य मतभेद है। हमें विचार करना है कि इन दोनों पुरुषों में से हम किसे नायक मानें। इस विवाद में पड़ने के पूर्व वेणीसंहार शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार करना आवश्यक है जो कि टीकाकारों ने दो प्रकार से की है जिसका रूप निम्नलिखित है- "वेण्या लम्बमान-जटीभूतद्रौपदीकेश-विशेषेण संहारो दुर्योधनादीनां कौर- वाणाम् विनाशो यत्र तत्।" अर्थात् लम्बे और घने द्रौपदी के केशों के खींचने रूप अपमान के प्रतिकार स्वरूप दुर्योधन आदि कौरवों के विनाश का वर्णन है जिस नाटक में वह वेणीसंहार है। द्वितीय विग्रह इस प्रकार है "वेण्या असंस्कारजड़ीभूतानां द्रौपद्याः केशाणां संहार: मोक्षणं यत्र तत् वेणीसंहारम्।" अर्थात् अपमानित द्रौपदी के जटिल केशों का संहार, मोक्ष या उचित रीति से संवारना, बांधना आदि क्रिया के उद्देश्य से नाटक की रचना की गयी है। प्रथम विग्रह के अनुसार दुर्योधन व अन्य कौरवों का विनाश नाटक की मुख्य घटना है। द्वितीय विग्रह का तात्पर्य यह है कि द्रौपदी द्वारा कौरवों के विनाश पर्यन्त अपने केशों को खुला रखने तथा दुर्योधन के रक्त से उन केशों को संस्कृत करके भीम द्वारा उनके बंधवाने की घटना को लक्ष्य में रखकर नाटक की रचना की गयी है। इस प्रकार वेणीसंहार शब्द की व्युत्पत्ति पर विचार-पूर्वक ध्यान देने से प्रकट होता है कि दुर्योधन का वध एवं द्रौपदी के केशों का बांधना नाटक की मुख्य घटना है। उन दोनों घटनाओं का ही भीम प्रधान अधिष्ठाता है। इस आधार पर भीम को ही नाटक के नायक-पद पर आसीन करना अधिक युक्ति-संगत प्रतीत होता है। नाम में उद्दिष्ट व्यक्ति को ही यह पद क्यों दिया जाय ? दुर्योधन भी इस रचना में निरंतर पाठकों के हृदय में उपस्थित रहता है। भीम और दुर्योधन का जैसा चित्र नाटककार ने खींचा है उसकी तुलना करने पर उपर्युक्त कथन की सत्यता प्रकट हो जाती है।

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प्रथम अंक में भीमसेन को दासी से भानुमती द्वारा द्रौपदी का निरादर करने की सूचना मिली जिस पर भीम ने ऋुद्ध होकर दुर्योधन के विनाश का प्रण किया-

"चञ्चद्भु जभ्रमितचण्डगदाभिघात- सञ्चूणितोरुयुगलस्य सुयोघनस्य। स्त्यानापविद्धघनशोणितशोणपाणि- रत्तंसयिष्यति कचांस्तव देवि भीम:॥।" -- वेणी० १।२१

यह भीम की द्रौपदी के प्रति उक्ति है। वे कहते हैं- शीघ्र ही मैं भीमसेन फड़कती हुई भुजाओं से घुमा कर फेंकी हुई गदा के आघात से दुर्योधन की जंघाओं को चूर्ण करके उसके खूब दृढ़ता से चिपके हुए गाढ़े-गाढ़े रुधिर से अपने हाथ लाल करके तुम्हारे इन खुले हुए बालों को सवारूँगा। यह श्लोक समस्त नाटक का बीजमंत्र है। आगामी समस्त घटनाएं भीम की उपर्युक्त प्रतिज्ञा-पूर्ति के लिए ही लिखी गयी हैं। भीम की इस प्रतिज्ञा से उनमें क्षत्रियोचित गुणों की पराकाष्ठा दृष्टिगोचर होती है। भानुमती द्वारा द्रौपदी का अपमान चेटी द्वारा ज्ञात कर भीमसेन ने उपर्युक्त प्रण किया है तथा वीरों की भांति अंत में इस प्रण को पूर्ण भी किया है। अब तनिक दुर्योधन की गति पर भी विचार कीजिए। नाटक के अन्तर्गत ही उसे गुरु द्रोण, भ्राता दुःशासन एवं वृषसेन की रण-स्थल में हत्या के दुःखद समाचार प्राप्त होते हैं। ऐसे विषादपूर्ण समाचारों को सुन कर दुर्योधन करोध एवं वीरतापूर्ण उक्ति अवश्य करता है एवं रणक्षेत्र में जाने के लिए तत्पर होता है पर ऐसी विनाशकारी सूचनाओं को प्राप्त कर भी वह पांडवों के संहार के लिए न कुछ प्रण करता है और न उसे पूर्ण करता है, यद्यपि इसमें कोई संदेह नहीं कि उसकी अनेक उक्तियां वीर रस से पूर्ण हैं जो कि वेणीसंहार जैसे वीर-रस-प्रधान नाटक के लिए सर्वथा उपयुक्त हो सकती हैं। भीमसेन का चरित्र आदि से अन्त तक उज्ज्वल व वीरतापूर्ण प्रद्शित किया

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गया है। किसी भी स्थान में उन्होंने संग्राम से भय नहीं दिखाया। नाटक के आरम्भ से पांचवें अंक के अन्त पर्यन्त दुर्योधन की समस्त उक्तियां व कार्य उसके अनुरूप हो सकते हैं। छठे अंक के प्रारंभ में ही हमें ज्ञात हो जाता है कि दुर्योधन अपने समस्त सहायक व बांधवों के युद्ध में मारे जाने के पश्चात् एक सरोवर में छिप कर अपने प्राणों की रक्षा कर रहा है। इस विषय में अब हमें तनिक विचार करना चाहिए कि उस जैसे वीर क्षत्रिय के लिए ऐसा करना कहां तक उचित है। भीम- सेन को अपने समीप संग्रामार्थ उपस्थित देख कर भी वह सरोवर से निकल उसके सम्मुख उपस्थित नहीं होता। जब भीम गर्वोक्ति करता है तभी वह उससे गदा- युद्ध करने के लिए बाध्य होता है। ऐसा कायरता-युक्त कार्य करनेवाला कदापि श्लाघनीय नहीं कहा जा सकता। कुछ विद्वानों का मत है कि वेणीसंहार के नायक का पद ग्रहण करने के लिए भीमसेन की अपेक्षा दुर्योधन अधिक उपयुक्त प्रतीत होता है। उनका कथन है कि दुर्योधन वीरता एवं आत्मसम्मान की जाग्रत मू्त्ति है। वह एक स्नेही भ्राता, विश्वस्त मित्र एवं कटटर योद्धा है। हम कहेंगे कि भीमसेन की वीरता संग्राम के स्थल में एवं ओजस्वी वाणी दोनों में ही प्रस्फुटित होती है, जब कि दुर्योधन केवल बातों से ही अपनी वीरता प्रकट करता है। संग्राम में अपना कोई विशेष कौशल प्रदर्शित करने में वह सर्वथा असमर्थ ही रहता है। द्वितीय अंक में दुर्योधन तथा उसकी पत्नी भानुमती के साथ परस्पर शृंगारिक कथनोपकथन प्रदशित किया गया है। दुर्योधन का दुःखान्त विनाश चित्रित करना ही नाटककार का मुख्य उद्देश्य है। ऐसे समृद्धिशाली व्यक्ति का विनाश चित्रित कर कवि ने दैव की परिवर्तनशील गति को प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया है। अधःपतन की ओर जाता हुआ दुर्योधन वीररस की उक्तियों में यद्यपि किसी प्रकार भी कम नहीं है, पर जीवन के अंतिम दिनों में किंचिदपि चमत्कार एवं पुरुषत्व न दिखाने से उसे आत्मसम्मान एवं वीरता की जाग्रत मूर्त्ति समझना उचित प्रतीत नहीं होता। नाटक के अन्त में हम अनुभव करते हैं कि महाराज युघिष्ठिर भीमसेन के संग्राम में मिथ्या वध की सूचना मात्र पाकर प्राणोत्सर्ग के लिए उद्यत हो जाते हैं। वह सूचना की सत्यता का निर्णय करने का भी प्रयत्न नहीं करते। दूसरी ओर

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दुर्योधन के स्नेही भ्रातृत्व पर भी तनिक विचार कीजिए। वह अपने प्राणों से भी प्रिय भ्राता दुःशासन के निधन पर उद्विग्न होता है और भीम के विनाश की इच्छा मात्र करता है। इस प्रकार हम युधिष्ठिर एवं दुर्योधन के भ्रातृप्रेम की तुलना करते हुए कह सकते हैं कि धर्मराज युधिष्ठिर तथा कौरवराज दुर्योधन के भ्रातृप्रेम में भूमि-आकाश का अन्तर था। उपर्युक्त तथ्य पर विचार करने के पश्चात् पाठक स्वयं निर्णय कर सकते है कि दुर्योधन को स्नेही भ्राता तथा वीरता एवं आत्मसम्मान की जाग्रत मूत्ति समझना कहां तक उचित है? उपर्युक्त पंक्तियों में वेणीसंहार के नायक के विवादास्पद प्रश्न को सुलझाने का प्रयत्न किया गया है। भीम की शूरवीरता, ओज एवं प्रतिज्ञापालन की दृढ़ शक्ति को देखते हुए हम दुर्योधन की अपेक्षा उन्हें ही नायक मानने के लिए बाध्य होते हैं। हां, यदि भीमसेन नायक हैं तो दुर्योधन भी अपने अद्वितीय गुणों के कारण प्रतिनायक अवश्य कहा जा सकता है।

काव्य का अद्वितीय चमत्कार वेणी-संहार एक वीर-रस-प्रधान नाटक है जिसमें स्थान-स्थान पर नायक तथा प्रतिनायक भीमसेन और दुर्योधन की वीरतायुक्त उक्तियों का समावेश किया गया है। प्रधान वीर रस के साथ कवि ने उपयुक्त स्थानों पर करुण, शृंगार एवं शान्त रस का उचित प्रयोग कर नाटक की शोभा को द्विगुणित कर दिया है। प्रथम अंक में जिस समय भीमसेन ने सुना कि उनके ज्येष्ठ भ्राता महाराज युधिष्ठिर पांच गांव लेकर संधि का प्रस्ताव कर रहे हैं उस समय उन्होंने वीर रस मय बड़े ही ओजस्वी शब्दों में इस प्रकार गर्वोक्ति की-

"मथ्नामि कौरवशतं समरे न कोपाद् दुःशासनस्य रुषिरं न पिबाम्युरस्तः। सऊचूर्णयामि गदया न सुयोधनोरुम् संधि करोतु भवतां नृपतिः पणेन ॥।"-वेणी० १।१५ क्या मैं दुर्दम्य करोध के कारण धृतराष्ट्र के सौ कौरव पुत्रों का रणक्षेत्र में १२

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वध नहीं करूंगा? अवश्य करूंगा। दुःशासन की हत्या के उपरान्त क्या मैं उसके वक्ष:स्थल से निकलते हुए उसके उष्ण रक्त का पान नहीं करूंगा ? अवश्य करूंगा। दुर्योधन की जंघाओं को क्या मैं अपनी गदा से चूर्ण-चूर्ण नहीं करूंगा? अवश्य करूंगा। आप लोगों के स्वामी महाराज युधिष्ठिर अपनी इच्छा के अनुसार किसी भी शर्त पर कौरवों से सन्धि करें, किन्तु मैं ऐसा करने को किसी भांति उद्यत नहीं हो सकता। इस श्लोक के प्रत्येक शब्द से भीमसेन की वीरता टपकती है। वे अपने आत्म-सम्मान एवं पौरुष के कारण अपने ज्येष्ठ भ्राता तक की अवज्ञा करने को तत्पर हो जाते हैं। जीवन के अंतिम भाग में दुर्योधन पांडवों से भयभीत हो एक सरोवर में जा छिपा। भीमसेन को युक्तिपूर्वक दुर्योधन की गति विदित हो गयी। वे उस छिपे हुए कायर के समीप पहुंचे तथा उसे ललकारते हुए सर्वथा अपने ही अनुरूप वाणी में बोले-

"जन्मेन्दोरमले कुले व्यपदिशस्यद्यापि धत्से गदां मां वुःशासनकोष्णशोणितसुराक्षीवं रिपुं भाषसे। दर्पान्धो मधुकैटभद्विषि हरावप्युद्धतं चेष्टसे मत्त्रासान्नृपशो विहाय समरं पङ्केधुना लीयसे॥" -- वेणी० ६।७ हे मनुष्यों में पशु के समान दुष्ट दुर्योधन! आज तू पतन की अधोगति की चरम सीमा पर पहुंच कर भी पवित्र चंद्रवंश में अपना जन्म हुआ बताता है। तू अब तक गदा भी धारण किये हुये है। दुःशासन के उष्ण रक्त के समान मदिरापान के कारण मदमस्त भीमसेन को तू अब भी शत्रु ही समझता है। मधु एवं कैटभ जैसे भयंकर राक्षसों का वध करनेवाले योगिराज भगवान् श्रीकृष्ण के प्रति उद्दण्ड भाव से आचरण करता है। हे दुर्योधन! तू मेरे भय से इस सरोवर में आकर क्यों छिपा है ? यदि तेरी भुजाओं में किंचित् मात्र भी बल एवं पौरुष हो तो संग्राम के लिए उद्यत हो जा। दुर्योधन के अतीत का उसे स्मरण कराने का तथा अंत समय में क्षत्रियों के विरुद्ध आचरण करने पर भीमसेन का उसको धिक्कारने का सच मुच ही यह अनुपम

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ढंग है। दुर्योधन यद्यपि संग्राम में किंचिदपि चमत्कार नहीं दिखाता, उसकी वाणी में वीर रस की अनुपम झलक दृष्टिगोचर होती है। वह अपने को अतुल बल की राशि समझता है और अपनी माता गांधारी से अपने बल की पांडवों के बल से तुलना करता हुआ कहता है-

"धर्मात्मजं प्रति यमौ च कर्थव नास्ति मध्ये वृकोदरकिरीटभृतोबलेन। एकोऽपि विस्फुरितमण्डलचापचकं कः सिन्धुराजमभिषेणयितुं समर्थ:॥"वेणी० २।२६

हे परम पूजनीया माता जी! महा परात्रमी जयद्रथ के बल के समक्ष धर्म- पुत्र युधिष्ठिर एवं नकुल व सहदेव का तो कहना ही क्या है। अत्यधिक भोजन करने के कारण भेड़िये के समान उदर वाले भीमसेन तथा पराक्रमी अर्जुन भी अकेला मुझ जैसे तुम्हारे वीरपुत्र के समान बलशाली और युद्ध में सतत चमकते हुए तीक्ष्ण बाण चलाने के कारण गोल धनुष वाले जयद्रथ के विरुद्ध संग्राम नहीं कर सकता। इस श्लोक में भट्ट नारायण ने जयद्रथ का महत्त्व बताते हुए दुर्योधन के स्वाभि- मान का भी अद्भुत् चित्रण किया है। इस ग्रंथ में भीम, दुर्योधन तथा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा की वीरतामय उक्तियां संस्कृत साहित्य के अमूल्य रत्न हैं। अपने पूज्य पिता गुरु द्रोणाचार्य के निधन का समाचार सुन अश्वत्थामा शोकविह्वल हो गया। शोक के साथ-साथ उसमें वीरता का भी अदम्य उत्साह उमड़ आया जैसा कि पिता के हत्यारे धृष्टद्युम्न के प्रति उसकी उक्ति से पता चलता है। भीष्म और द्रोण के निधन के उपरांत धृतराष्ट्र अपने प्रिय पुत्र दुर्योधन को संग्राम त्यागने के लिए इस प्रकार समझा रहे हैं- "दायादा न ययोबलेन गणितास्तौ भीष्मद्रोणौ हतौ कर्णस्यात्मजमग्रतः शमयतो भीतं जगत्फाल्गुनात्। वत्सानां निधनेन मे त्वयि रिपुः शेषप्रतिज्ञोऽुना मानं वैरिषु मुञ्च तात पितरावन्धाविमौ पालय।।"-वेणी० ५।५

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हे प्रिय पुत्र दुर्योधन ! जिन महापरात्रमी भीष्म और गुरु द्रोणाचार्य के समक्ष पांडवों की शक्ति की हम किंचिन्मात्र भी चिन्ता नहीं किया करते थे वे दोनों ही संग्राम में मारे जा चुके हैं। कर्ण के देखते-देखते ही उसके सामने ही अर्जुन ने उसके प्रिय पुत्र वृषसेन की मार्मिक हत्या कर डाली है। इस प्रकार समस्त संसार उसके आतंक से भयभीत हो रहा है। मेरे अन्य पुत्रों का वध हो चुका है। केवल तेरे मात्र ही जीवित रहने से शत्रु की प्रतिज्ञा अपूर्ण है। अतः शत्रु के प्रति गर्व का त्याग कर संधि कर लो और अपने इन अंधे माता-पिता का विधिपूर्वक पालन करो। धृतराष्ट्र की दुर्योधन के प्रति यह उक्ति सचमुच करुण रस का एक अमूल्य उदाहरण है तथा वृद्धावस्था में आपत्तिग्रस्त माता-पिता की स्वाभाविक मनोकामना व्यक्त करती है। शृंगार रस के एक रोचक उदाहरण का निरीक्षण करें। द्वितीय अंक में अपनी करुद्ध एवं संतप्त पत्नी भानुमती को लक्ष्य कर दुर्योधन कहता है-

किं कण्ठे शिथिलीकृतो भुजलतापाशः प्रमादान्मया ? निद्राच्छेदविवर्त्तनेष्वभिमुखी नाद्यासि सम्भाविता ? अन्यस्त्रीजनसङ्गथालघुरहं स्वप्ने त्वया लक्षितो? दोषं पश्यसि कं? प्रिये, परिजनोपालम्भयोग्ये मयि। -- वेणी० २।९

हे प्रिये भानुमति ! क्या मैंने भूल कर भी कभी आलस्यवश तुम्हारे गले में अपना भुजलता-पाश ढीला किया है? निद्रा के उपरान्त जागने पर क्या आज मैंने करवट लेने पर तुमको अपने सम्मुख नहीं किया? क्या स्वप्न में भी तुमने अन्य स्त्री के साथ मुझे अनुचित वार्तालाप करते देखा है? तुमने मेरा कौन सा दोष देखा है जिसके कारण अपनी अप्रसन्नता व्यक्त कर रही हो। यह शृंगार रस का सुन्दर उदाहरण है जिसमें पति-पत्नी के प्रेम का बहुत ही स्पष्ट शब्दों में निरूपण किया गया है। एक ओर जहां श्लोक में शरृंगार रस की पराकाष्ठा विद्यमान है, वहाँ दूसरी ओर शान्त रस का भी अनुपम चित्र खींचा गया है, जिसका उदाहरण निम्नलिखित है-

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"आत्मारामाऽडविहितरतयो निर्विकल्पे समाधौ ज्ञानोद्रेकाद्विघटिततमोग्रन्थयः सत्त्वनिष्ठाः। यं वीक्षन्ते कमपि तमसां ज्योतिषां वा परस्तात् ... तं मोहान्धः कथमयममुं वेत्तु देवं पुराणम्।।" -- वेणी० १।२३

योगिराज भगवान् श्रीकृष्ण के दुर्योधन को समझाने के उपरान्त असफल लौटने पर भीमसेन की दुर्योधन के चरित्र के विषय में यह उक्ति है। सात्विक भाव से युक्त अपनी आत्मा में ही सदा रत रहनेवाले, निर्विकल्पक समाधि में सदा प्रीति लगानेवाले तथा ज्ञान-प्रकाश के बाहुल्य से अज्ञानांधकार को समूल नष्ट करनेवाले सिद्ध योगी एवं मुनिजन जिस परम शक्ति को प्रकाश तथा अंधकार से परे कोई अनिर्वचनीय तत्त्व समझते हैं उस पुरातन परब्रह्म भगवान् कृष्ण को अज्ञान और मोह के वशीभूत दुर्योधन क्या पहिचाने। यह श्लोक शांतरस का एक अमूल्य उदाहरण है। इस प्रकार हमने देखा कि वेणीसंहार संस्कृत नाटक-साहित्य में एक गौरवमय पद को सुशोभित करता है। इसमें प्रयुक्त वीर, करुण, शृंगार एवं शान्त रस द्वारा काव्य का अद्वितीय चमत्कार प्रकट होता है। इस ग्रंथ की रचना सर्वथा नाट्य शास्त्र के नियमों के अनुकूल हुई है जिस कारण दशरूपककार धनंजय को रूपक के विभिन्न अंगों को प्रदर्शित करने में इस ग्रंथ में प्रयुक्त पद्यों से अत्यधिक सहायता मिली है। द्वितीय अंक में दुर्योधन तथा उसकी पत्नी भानुमती में परस्पर शृंगारिक कथनोपकथन का समावेश है जिसे कतिपय आलोचक नाट्य दृष्टि से अनुपयुक्त बताते हैं। काव्य-प्रकाश के रचयिता मम्मट ने इसे "अकाण्डे प्रथनम्" अर्थात् अनुचित स्थान में रस-विस्तार बताया है। साहित्य-दर्पणकार भी इस प्रणय- दृश्य को उचित नहीं समझते। जैसा बताया जा चुका है, नाटक के कथानक पर विचार करने से विदित हो जाता है कि दुर्योधन के जीवन की दुःखान्त समाप्ति द्योतित करना नाटककार का मुख्य उद्देश्य है। द्वितीय अंक में उसके दाम्पत्य जीवन के पराभव को प्रद्शित कर अंत में उसके कारुणिक वध का समावेश किया

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है। इस प्रकार दैव की परिवर्त्तनशीलता एवं मानव-जीवन की अस्थिरता का बड़ा सुन्दर निरूपण हुआ है। इसी प्रकार कतिपय विद्वानों का यह मत है कि वेणीसंहार में द्वितीय, चतुर्थ एवं पंचम अंक अनावश्यक हैं। तृतीय अंक में वणित कर्ण तथा अश्वत्थामा की वाक् कलह दुर्योधन को नायक माननेवाले आलोचकों के लिए महत्त्वपूर्ण है। यद्यपि वह नायक नहीं कहा जा सकता, प्रतिनायक के रूप में हमारी संवेदना सदा उसके साथ विद्यमान रहती है तथा इस दृश्य का अपना विशेष महत्त्व है। इन तीनों ही अंकों में दुर्योधन पर पड़नेवाली विपत्तियों का विशद वर्णन है। इन अंकों में हमें करमशः द्रोण, दुःशासन एवं वृषसेन की हत्या की सूचना मिलती है। ये सभी घटनाएं कौरवों के लिए अनिष्टकारिणी एवं महाविपत्तिसूचक हैं। इनके समावेश करने से कवि को करुण रस के सजीव चित्रण में आशातीत सफलता प्राप्त हुई है। भवभूति ने अपनी अमर कृति उत्तररामचरित में एक नवीन परंपरा प्रदान की है। भट्ट नारायण पर उसकी पर्याप्त छाप लगी जिस कारण वे भी इस रस के प्रयोग में कुशलहस्त सिद्ध हुए। कथानक में घटना की बहुलता एक दूसरी विशेषता है। कवि समस्त घटना- समूह को नाटकीय ढंग पर प्रस्तुत करने में सफल नहीं हुआ। छोटे से नाटक में अनेक विषयों का समावेश होने से नाटक जटिल अवश्य हो गया है। चतुर्थ अंक में सुन्दरक द्वारा युद्धभूमि का वर्णन कवित्वपूर्ण होने पर भी नाटकीय दृष्टि से उपयोगी नहीं है। द्रौपदी तथा दुर्योधन जैसे मुख्य पात्रों का विशद चरित्र-चित्रण नहीं हो पाया है। प्राकृत एवं संस्कृत में प्रयुक्त दीर्घकाय समास नाटक की कथा- वस्तु के लिए अनुपयुक्त प्रतीत होते हैं। वेणीसंहार नाटक के अंत में दुर्योधन की मृत्यु का वर्णन है। अतः कतिपय आलोचक इसे संस्कृत नाटकों के सुखान्त होने की परम्परा के प्रतिकूल बताते हैं। भीम को नायक मानने से यही घटना सुखान्त हो जाती है। इस घटना को मंच पर उपस्थित न कर कवि ने कंचुकी द्वारा सूचित किया है। इसी प्रकार अन्य कौरव योद्धाओं की मृत्यु रंग-मंच से पृथक् ही होती है जिसकी नाटक में सूचना मात्र मिलती है। इस प्रकार दुर्योधन की मृत्यु का अंत में वर्णन

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होने पर भी नाटक के सुखान्त होने का मनोवैज्ञानिक प्रभाव ज्यों का त्यों बना रहता है। इस प्रकार मृत्यु को रंगमंच पर न दिखाते हुए भट्ट नारायण ने संस्कृत की इस नाट्य-परम्परा का पालन किया है कि दर्शकों को वीभत्स चित्र न दिखाये जायें जिससे उनके मन में कुत्सित विचार उत्पन्न न हो। भट्ट नारायण की एकमात्र कृति वेणीसंहार ही उपलब्ध हुई है। एक ही कृति के कारण उनकी प्रतिष्ठा स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है। वेणीसंहार में विभिन्न रसों का निरूपण हुआ है और यह ओजोगुण विशिष्ट नाटक है। महाभारत के एक रोचक प्रसंग को नाटकीय रूप प्रदान करने में कवि को पर्या त सफलता मिली है।