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१२. विशाखदत्त
(चौथी या पांचवीं शताब्दी ई०)
संस्कृत नाटक-साहित्य में मुद्राराक्षस नामक नाटक अपने प्रकार का एक अनुपम एवं अपूर्व नाटक है जिसकी स्वतंत्र सत्ता की किसी प्रकार भी उपेक्षा करना संभव नहीं है। इसके रचयिता विशाखदत्त नाटकशास्त्र एवं इसके नियमों के प्रकांड विद्वान् होते हुए भी एक नवीन परंपरा के जन्मदाता सिद्ध हुए हैं। उनकी मौलि- कता का बाद में कोई भी नाटककार सफलतापूर्वक तद्वत् अनुसरण नहीं कर पाया है। किसी विख्यात वंश में उत्पन्न व्यक्ति अथवा सम्राट को प्राचीन परंपरानुसार नाटक का नायक न बना कर राजनीति में अत्यन्त कुशाग्र बुद्धि, प्रसिद्ध सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य के गुरु चाणक्य को उन्होंने अपनी रचना का नायक बना कर एक दिव्य प्रतिभा का उदाहरण प्रस्तुत किया है। संस्कृत के अधिकांश साहित्यकारों के समान विशाखदत्त का भी प्रादुर्भाव संदिग्ध ही है और उनके काल-निर्धारण करने के लिए हमें बहुत ही अल्प सामग्री प्राप्त हुई है। उनकी रचना 'मुद्राराक्षस" के अवलोकन करने से विदित होता है कि कुछ संस्करणों के अनुसार उनके पिता का नाम पृथु तथा अन्य संस्करणों के अनुसार भास्करदत्त था। उनके पितामह सामंत वटेश्वर दत्त के नाम से विख्यात थे। इस प्रकार उनके पिता तथा पितामहों के नामों में दत्त शब्द के साम्य से कतिपय विद्वानों की धारणा है कि वे किसी अज्ञात दत्त वंश में उत्पन्न हुए थे। किन्तु इस वंश के अस्तित्व के विषय में कोई ऐतिहासिक उल्लेख न होने के कारण यह धारणा हमें उनका समय निर्णय करने में उचित सहायता प्रदान नहीं करती। विशाखदत्त का समय निर्णय करने के लिए मुद्राराक्षस के भरतवाक्य पर विचार करना चाहिए जो इस प्रकार है-
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"वाराहीमात्मयोनेस्तनुमतनुबलामास्थितस्यानुरूपां यस्य प्राग्दन्तकोटि प्रलयपरिगता शिश्रिये भूतधात्री। म्लेच्छरुव्वीज्यमाना भुजयुगमधुना संशरिता राजमूर्ते: स श्रीमद्बन्धुभृत्यश्चिरमवतु महीं पार्थिवश्चन्द्रगुप्तः।।"
इस श्लोक के अनुसार नाटककार किसी चन्द्रगुप्त नामक विख्यात सम्राट् का समकालीन एवं आश्रित राज-कवि हो सकता है। मुद्राराक्षस की उपलब्ध विविध हस्तलिखित प्रतियों के अवलोकन करने से विदित होता है कि श्लोक के अंतिम पद में पर्याप्त पाठ भेद है जहां कि चन्द्रगुप्त, अवन्ति वर्मा, दन्ति वर्मा, रन्ति वर्मा चार पृथक् पाठ-भेद पाये जाते हैं जिसके कारण नाटककार के काल-निर्णय करने में बड़ी कठिनाई उत्पन्न हो गयी है। इन पाठभेदों के आधार पर भिन्न-भिन्न विद्वानों ने विभिन्न धारणाएँ प्रकट की हैं। रमा स्वामी के मतानुसार दन्ति वर्मा पाठ शुद्ध है जिसमें नाटककार ने इस आधार पर पल्लव नरेश दन्ति वर्मा की ओर संकेत किया है। ऐतिहासिक विद्वानों के कथनानुसार दन्ति वर्मा का राज्य काल सातवीं शताब्दी ई० का पूर्वार्द्ध है। अतः समकालीन होने से विशाखदत्त इसी काल के समीप हुए होंगे। इस मत के विरुद्ध प्रो० ध्रुव का कथन है कि पल्लव नरेश शैव मतावलम्बी थे जब कि कवि ने भरतवाक्य में विष्णु अवतार स्वरूप राजा का ही वर्णन किया है। अतः कवि के वैष्णव होने के कारण रमा स्वामी का यह मत युक्ति-संगत प्रतीत नहीं होता। चन्द्रगुप्त के विषय में ध्रुव का मत है कि वे नाटक के एक पात्र मात्र ही हैं। नाटय परंपरा के अनुसार भरतवाक्य में कवि का अभिप्राय किसी पात्र विशेष से न होकर तत्कालीन राजा से ही होता है। इसलिए उन्होंने अवन्ति वर्मा ही इस विषय में शुद्ध पाठ माना है। तैलंगानुसार अवन्ति वर्मा कन्नौज के राजा थे और सातवीं या आठवीं शताब्दी ई० में अन्तिम गुप्त नरेशों में से कोई एक थे, जब कि ध्रुव के अनुसार विशाखदत्त छठी शताब्दी ई० में विद्यमान थे। सन् ५२८ ई० में दशपुर के संग्राम में हूणों को परास्त कर महाराज यशो वर्मा ने उनके साम्राज्य को अनेक भागों में विभक्त कर दिया। इन हूणों ने जब
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पुनः उपद्रव मचाया उस समय कान्यकुब्ज के यशस्वी सम्राट् प्रभाकर वर्द्धन ने उनको अवन्ति वर्मा की सहायता से परास्त किया था। इस प्रकार अवन्ति वर्मा प्रभाकर वर्द्धन के संबंधी एवं समकालीन राजा थे और उनका समय छठी शताब्दी ई० का अंत है। ऐसी स्थिति में विशाखदत्त का भी यही समय अनुमानित किया जा सकता है। काशीप्रसाद जायसवाल ने मुद्राराक्षस के चन्द्रगुप्त पाठ को ही ठीक माना है और उनका मत है कि भरतवाक्य में कवि का अभिप्राय नाटक के प्रमुख नियंता एवं विधायक मौर्य सम्राट् चन्द्रगुप्त से न होकर गुप्त वंशीय सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय अथवा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य से है, जिनका राज्यकाल सन् ३७५ से ४१३ ई० तक था। इस प्रकार यह नाटककार के समय को चतुर्थ शताब्दी ई० में प्रमाणित करने का प्रयास है। इस मत के विरुद्ध कुछ ऐतिहासिक विद्वानों का कथन है कि कवि का इस स्थान पर अभिप्राय हूणों के आक्रमण से है जो कि कथित सम्राट् के राज्यकाल के शताब्दियों उपरांत सम्पन्न हुआ और इस प्रकार जायसवाल का मत भी माननीय नहीं हो सकता। इन भिन्न-भिन्न विपरीत मतों की विद्यमानता के कारण हम केवल यही निष्कर्ष निकाल सकते है कि विशाखदत्त एक अति प्राचीन नाटककार थे। भरत- वाक्य में राजा के अनुसार भविष्यवर्ती अभिनय के समय परिवर्तन किया गया होगा और चन्द्रगुप्त ही इनमें प्राचीनतम होने से युक्तिसंगत प्रतीत होते हैं। उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध होता है कि मनीषियों ने यह प्रयास किया है कि विशाखदत्त का समय सातवीं या आठवीं शताब्दी के लगभग सिद्ध हो सके। इस मत के विरुद्ध निम्नलिखित आपत्तियां विद्यमान हैं- (१) मुद्राराक्षस में जो शैली अपनायी गयी है उसके अवलोकन करने से विदित होता है कि वह सातवीं या आठवीं शताब्दी की शैली से बहुत भिन्न है और इससे पूर्ववर्ती समय की ओर संकेत करती है। (२) कुछ विद्वानों के मतानुसार मुद्राराक्षस का भरतवाक्य अवन्ति वर्मा का प्रशस्ति-गान है। यदि यह मत ठीक हो तो महाकवि बाण विशाखदत्त के पूर्व- वर्ती सिद्ध हो जाते हैं। प्रभाकर वर्द्धन तथा हर्ष की यशोगाथा का जो कि बाण की
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लेखनी के अमर चमत्कार हैं, विशाखदत्त पर प्रभाव नहीं पड़ सका। अतः यह मत भी उचित प्रतीत नहीं होता। (३) मुद्राराक्षस में विशाखदत्त ने चन्दनदास के शील एवं सौजन्य का जो चित्र खींचा है उससे प्रतीत होता है कि वह बोधिसत्वों से कहीं अधिक श्रेष्ठ है जैसा कि सातवें अंक के छठे श्लोक के अवलोकन से प्रमाणित होता है। यह भावना भारत की परिस्थिति को देखते हुए छठी से आठवीं शताब्दी ई० के मध्य में प्रचलित प्रतीत नहीं होती। चौथी अथवा पांचवीं शताब्दी में गुप्त वंश के वैष्णव नरेश इस मत के अनुगामी थे जिन्होंने सम्भवतः इस प्रकार की भावना का प्रसार किया होगा। इसी कारण कवि ने भरतवाक्य में वैष्णव आश्रयदाता गुप्त वंशीय सम्राट् समुद्रगुप्त या चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य की ओर संकेत किया है। (४) इसके अतिरिक्त कवि ने जिस साम्राज्य एवं सामाजिक दशा का चित्र खींचा है उसकी भौगोलिक दशा पर विचार करने से वह देश की चौथी या पांचवीं शताब्दी ई० की दशा प्रतीत होती है। इतने विचार-विनिमय के पश्चात् भी हम मुद्राराक्षस के रचयिता विशाखदत्त के समय को प्रामाणिक रूप से निश्चित नहीं कर सके हैं। ग्रंथ में जिस सामाजिक दशा का चित्रण हुआ है उससे प्रतीत होता है कि वह चौथी या पांचवीं शताब्दी ई० में रचा गया था। भरतवाक्य के अनेक पाठभेदों के कारण उनमें उल्लिखित राजाओं के आधार पर यह समय सातवीं या आठवीं शताब्दी ई० भी माना जा सकता है। किन्तु इस पाठ-भेद के कारण वह पूर्ण रूप से प्रामाणिक नहीं कहा जा सकता। अतएव हमारे विचार से नाटक की शैली व सामाजिक दशा के आधार पर कवि का समय चौथी या पांचवीं शताब्दी ई० मानना ही अधिक श्रेयस्कर है।
मुद्राराक्षस का कथानक
इस नाटक में एक प्राचीन ऐतिहासिक एवं राजनीतिक घटनाचक्र को बड़े ही मार्मिक रूप में नाटकीय आकार प्रदान किया गया है। यह नाटक ईसा से लगभग ३०० वर्ष पूर्व के इतिहास के कुछ अंशों को हमारे समक्ष प्रस्तुत करता है। नन्दवंश के विनाशोपरान्त पाटलिपुत्र में चन्द्रगुप्त मौर्य का आधिपत्य स्थापित हुआ।
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नन्दों के स्वामिभक्त मंत्री राक्षस ने चन्द्रगुप्त के गुरु एवं मंत्री चाणक्य से बदला लेने का दढ़ निश्चय किया। चाणक्य पहले से ही उसे छकाने के लिए तत्पर थे। दोनों ही अपनी विभिन्न प्रकार की राजनीतिक चालें चलते रहते हैं और अंत में राक्षस असफल होता है। विशाखदत्त ने इसी घटना को बड़े ही रोचक ढंग से सात अंकों में नाटकीय रूप प्रदान किया है। चन्द्रगुप्त का आरंभ से ही नन्द वंश से स्वाभाविक वैर चला आता था। प्रथम अंक के आरम्भ होते ही एकाकी चाणक्य अपनी यह प्रतिज्ञा व्यक्त करता है कि वह नन्द वंश का समूल विनाश कर राक्षस को अपने अधिकार में कर लेगा। राक्षस की स्वामिभक्ति और कार्यकुशलता से उसका आरम्भ से ही परिचय था। अतः वह राक्षस को अपने अधीन चन्द्रगुप्त का मंत्री अभिषिक्त करने का प्रबल इच्छुक था। राक्षस अपनी पत्नी और बच्चों को सुरक्षा की दृष्टि से अपने अभिन्न मित्र चन्दनदास के घर पर कुछ काल के लिए छोड़ देता है। चन्दनदास एक जौहरी है और शकट दास उसका सहायक है। एक बच्चे ने संयोगवश चन्दनदास के घर के दरवाजे पर राक्षस की मुद्रा या अंगूठी गिरा दी थी जो कि चाणक्य को निपुणक की सहायता से सहज ही में मिल गयी। इस वियोग से राक्षस की शक्ति कम होने लगी और चाणक्य की बढ़ने लगी। जब यह विदित हुआ कि राक्षस का परिवार चन्दनदास के घर पर छिपा हुआ है, उस जौहरी को इस अपराध में पकड़ कर कारा- गार का दंड दे दिया जाता है और उसके प्रेमी जीवसिद्धि और सिद्धार्थक भी भीषण विपत्ति में पड़ जाते हैं। यह सूचना पाकर चाणक्य के हर्ष की सीमा नहीं रहती। द्वितीय अंक में राक्षस की भयावह चालें आरम्भ होती हैं। आरम्भ में ही उसे एक अपशकुन की सूचना मिलती है। संपेरे के भेष में आता हुआ विराधक उसे सूचित करता है कि चन्द्रगुप्त की हत्या का षड्यन्त्र असफल हुआ। उसके स्थान पर त्रुटिवश राजसिंहासन के समीप ही मलयकेतु के चाचा का वध हो गया। अभय- दत्त जो कि सम्राट् चन्द्रगुप्त को विष का घूंट पिलाने का इच्छक था पकड़ा गया और उसे स्वयम् बाध्य होकर विषपान करना पड़ा। प्रमोदक ने सब धन व्यय कर दिया। जो जीव गुप्तमार्ग से सम्राट् के शयनागार में प्रविष्ट होना चाहते थे,
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वे पकड़ लिये गये और अग्नि द्वारा भस्मसात् कर दिये गये। शकटदास और जीव- सिद्धि पहले से ही विपत्ति में पड़े हुए हैं। इस प्रकार राक्षस और विराधक का वार्ता- लाप चल ही रहा हैं कि अकस्मात् शकटदास और चंदनदास का प्रवेश होता है और सहसा ही इस प्रकार उनका वार्तालाप अवरुद्ध हो जाता है। सिद्धार्थक इस अवसर पर सहसा उपलब्ध हुई राक्षस की मोहर को उसके सम्मुख प्रस्तुत करता है। कुछ देर पश्चात् यह सूचना मिलती है चन्द्रगुप्त चाणक्य से रुष्ट हो गया है। यह समाचार पाकर समस्त उपस्थित मंडली में एक अनुपम हर्ष और विस्मय की लहर फैल जाती है। तृतीय अंक में राजनीति-कुशल चाणक्य अपनी एक अद्भुद् चाल दिखाता है। चन्द्रगुप्त ने यह राजाज्ञा निकाली कि बिना उसकी आज्ञा के राज्य में किसी प्रकार कोई भोज नहीं किया जा सकता। यह आज्ञा चाणक्य को उद्विग्न कर देती है और वह मिथ्या क्रोध का अभिनय करता है। यह दिखलाने के लिए वह मंत्री-पद से त्यागपत्र भी दे देता है। राक्षस यह जानकर बड़ा प्रसन्न होता है और समझता है कि अब वह आसानी से चन्द्रगुप्त को अपने वश में कर लेगा। चतुर्थ अंक में राक्षस की कूटनीति प्रायः असफल सी हो जाती है और वह पतनोन्मुख हो जाता है। राक्षस का विश्वस्त सेवक भागुरायण चन्द्रगुप्त के समीप आता है और यह कहता है कि हम राक्षस पक्ष के लोग आप से किञ्चिन्मात्र भी द्रेष नहीं करते। हमारी शत्रुता तो चाणक्य ही से है। यह संवाद सुन कर चन्द्रगुप्त चक्कर में पड़ जाता है। कुछ देर बाद सम्राट, राक्षस और उसके सहयोगी का यह वार्तालाप श्रवण करते हैं कि चन्द्रगुप्त और चाणक्य में फूट हो गयी है जिससे हम अवश्य सफल हो सकेंगे। यह सुन कर चन्द्रगुप्त और भी चक्कर में पड़ जाता है। अंक के अंत में जीवसिद्धि का आगमन होता है और वह राक्षस को अगला पद उठाने के लिए प्रेरित करता है। पंचम अंक में ये घटनाएं बढ़ती हैं। जीवसिद्धि और भागुरायण का प्रवेश होता है और वे राक्षस के कार्य यथावत् पूर्ण न कर सकने के कारण अत्यन्त भयभीत चित्रित किये गये हैं। राक्षस की योजना के अमुसार वे लोग चन्द्रगुप्त को पूर्णतया हानि पहुंचाने में असमर्थ रहे। चन्द्रगुप्त को राक्षस के इन सब कृत्यों की सूचना
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यथासमय मिल गयी और वह भी उनके प्रतिकार के लिए उपाय सोचने लगा। बन्दी के रूप में सिद्धार्थक सम्राट् के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है और बहुत कठोर बर्ताव करने के उपरान्त वह कठिनता से राक्षस के विरुद्ध अपना वक्तव्य देता है। इसा अवसर पर वह राक्षस का एक बहुमूल्य रत्न उपस्थित करता है। राक्षस द्वारा चाणक्य को चन्द्रगुप्त से पृथक करने की विस्तृत योजना पर प्रकाश भी डालता है। इस प्रकार चन्द्रगुप्त को राक्षस की योजना का पूर्ण ज्ञान हो जाता है। राक्षस को जब यह बोध होता है कि उसका समस्त षड्यन्त्र चन्द्रगुप्त को विदित हो गया है यहां तक कि उसका मुद्रांकित पत्र भी चन्द्रगुप्त के हाथ लग गया है-तो उसे अपनी रक्षा का कोई उपाय नहीं सूझ पड़ता। चन्द्रगुप्त ने इस अवसर पर एक मुद्रित आज्ञा निकाली जिसके अनुसार प्रत्येक संभव उपाय से उसके समस्त राक्षस पक्षी विरोधियों का अन्त कर दिया जावे। राक्षस का अभिन्न मित्र चन्दनदास भी इस चंगुल में फंस जाता है और अनेक उपाय करने पर भी राक्षस उसकी रक्षा करने में असमर्थ ही होता है। पष्ठ अंक में राक्षस अपने मित्र की रक्षा न कर पाने के कारण अति विलाप करता है। इतने में ही चन्द्रगुप्त का एक गुप्तचर उसके समीप आता है और उसको इस प्रकार से धमकी देता है कि वह चन्दनदास के प्राणों की रक्षा के लिए तनिक भी प्रयत्न न करे, अन्यथा संभव है कि उसको भी अपने प्राणों से हाथ धोने पड़ जावें। सप्तम अंक का आरम्भ बड़े ही करुणामय दृश्य से होता है। चंदनदास मृत्यु- शैया पर पड़ा हुआ करोध कर रहा है। उसकी धर्मपत्नी और पुत्र यह दृश्य देख कर एक असाधारण अनिवर्चनीय पीड़ा का अनुभव करते हुए अंकित किये गये हैं। इतने में ही सहसा राक्षस का प्रवेश होता है जिसके कुछ ही कालोपरान्त चन्द्रगुप्त और उसके अनन्य भक्त चाणक्य भी रंग-मंच पर दृष्टिगोचर होते हैं। नाटक में इन तीनों राजनीतिज्ञ महारथियों का एक साथ यह प्रथम मिलन है। इस अवसर पर चाणक्य और चन्द्रगुप्त दोनों ही राक्षस को साम्राज्य का मंत्रित्व स्वीकार करने के लिए आमंत्रित करते हैं। यह पद स्वीकार करने पर न केवल राक्षस को अपिनु चन्दनदास, शकटदास तथा उसके अन्य मित्रों को भी अभयदान एवं उचित पुरस्कार मिलता है। अंत में नियमानुसार भरतवाक्य द्वारा नाटक की समाप्ति की गयी है।
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हम जब नाटक के नामकरण और व्युत्पत्ति पर विचार करते हैं तब हमें नाटक- कार के विशेष ज्ञान का परिचय मिलता है। 'मुद्राराक्षस' शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार है "मुद्रया गृहीतं राक्षसमधिकृत्य कृतो ग्रंथः मुद्राराक्षसम्" अर्थात् मुद्रा या अंगुलीयक मुद्रा से राक्षस के निग्रह के सम्बन्ध में एक रूपक ग्रंथ। यहां पाणिनि मुनि के सूत्र 'अधिकृत्य कृते ग्रन्थे' के अनुसार अन् प्रत्यय और नपुंसक लिंग है। इस प्रकार विदित होता है कि इस नामकरण पर महाकवि शृद्रक के मृच्छ- कटिक व कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तलम् ग्रन्थ का विशेष प्रभाव पड़ा है। चाणक्य को प्रथम अंक में राक्षस की मुद्रा मिल गयी और इसी घटना मे दोनों का वैर प्रदर्शित करना नाटक में आरम्भ किया गया है।
विशाखदत्त की रचनाशैली
विशाखदत्त ने मुद्राराक्षस में अपने भाव और विचारों को गम्भीरता पूर्वक व्यक्त कर अपनी काव्य-कला के अनुसार इस कृति को रोचक नाटकीय रूप प्रदान किया है। अलंकार के प्रयोगों में कवि ने अपनी विशेष अभिरुचि प्रकट नहीं की है। काव्य में रस भावाभिव्यञ्जन उसका विशेष गुण है जो कि ग्रन्थ में सर्वत्र सामान्य रूप से पाया जाता है। गद्य और पद्य दोनों में ही उन्होंने समास एवं आडम्बर युक्त कोमल, सरस एवं औचित्यपूर्ण पदावली का प्रयोग किया है। विराधगुप्त के सम्भाषण में जो समस्त पदावली दृष्टिगोचर होती है उसमें अपनी ही अलौकिकता है। उनका शब्द-विन्यास ओजमय और कौतूहलपूर्ण है। भावुकता के स्थान पर प्रभविष्णुता अपेक्षाकृत अधिक है। यद्यपि कवि ने अलंकारों का बहुत कम प्रयोग किया है, फिर भी श्लेष अलंकार के प्रयोग कतिपय स्थानों पर दर्शनीय हैं। इस ग्रंथ की रचना भरत मुनि के नाटय शास्त्रीय नियमों के सर्वथा अनुरूप नहीं हुई। तब भी यह अपने प्रकार का एक अलौकिक ग्रंथ है। इसकी सब से प्रमुख विशेषता यह है कि यह संस्कृत के इतर नाटकों से भिन्न रस-प्रधान न होकर शुद्ध घटना-प्रधान ही है। कूटनीति एवं राजनीति की कुटिल चालों का इसमें सर्वांगपूर्ण सुन्दर एवं सफल चित्रण हुआ है। विशाखदत्त की भाषा में ओजोमय गद्य का विशेषरूप से समावेश किया गया
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है, फिर भी कतिपय स्थानों पर उनकी भाषा में काव्य का लालित्यमय प्रवाह दृष्टिगोचर होता है। निम्नलिखित उदाहरण से इस कथन की पुष्टि होती है-
"आस्वादितद्विरवशोणितशोणशोभां संध्यारुणामिव कलां शशलाञ्छनस्य। जुम्भाविदारितमुखस्य मुखात् स्फुरन्तीं को हर्तुमिच्छति हरे : परिभय दंष्ट्राम्॥" -- मुद्रा० १।८ प्रथम अंक में प्रवेश करने के उपरान्त चाणक्य की यह उक्ति है। वह कहता है,- "ऐसा कौन वीर है जो पशुराज सिंह के अनुशासन का तिरस्कार कर जमुहाई लेते समय उसके खुले हुए मुख से उसकी दाढ़ उखाड़ लेने का साहस करेगा जो तत्काल ही हाथी के वध करने से उसके रक्त से लाल-लाल शोभावाली और सायंकाल में अरुण वर्ण के चन्द्रमा की कला के समान देदीप्यमान हो रही है।" चाणक्य की राजनीतिक कुशलता का भी एक दूसरा उदाहरण प्रस्तुत किया जाता है-
"मुहुर्लक्ष्योद्भेदा, मुहुरधिगमाभावगहना, मुहुः सम्पूर्णाङ्गो, मुहुर्भ्रश्यद्वीजा, मुहुरतिकृशा कार्यवशतः। मुहुरपि बहुप्रापितफले -- त्यहो चित्राकारा नियतिरिव नीतिर्नयविदः॥।" -मुद्राराक्षस ५।३
पंचम अंक में क्षपणक और सिद्धार्थक के चले जाने के पश्चात् भागुरायण का प्रवेश होता है। और वह स्वतः अपने मन में चाणक्य के विषय में यह उक्ति करता है कि "भाग्यचकर के समान ही एक राजनीतिक पुरुष की नीति एवं गति भी बड़ी विचित्र तथा अगम्य होती है। कार्यानुकूल वह किसी समय अपने लक्ष्य को स्पष्ट कर देती है और कभी-कभी परिस्थिति वश इसके विपरीत हो उसे अत्यन्त गहन व जटिल भी बना देती है। इसी प्रकार किसी समय वह अपने पूर्ण विकास को प्राप्त हो
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जाती है और किसी समय ऐसी अदृश्य एवं अगम्य हो जाती है कि उसका कारण भी समाप्तप्राय ही प्रतीत होता है। इस प्रकार की चाणक्य की राजनीति किसी समय पर्याप्त इष्टफल की प्रदात्री होती है।" चाणक्य की राजनीति के विषय में कवि ने इस स्थल पर निश्चय ही बड़ी मार्मिक एवं यथार्थ उक्ति की है। मुद्राराक्षस में नाटकीय औचित्य की दृष्टि से प्रायः काव्य-कल्पनाओं का अभाव ही है। यदि कहीं प्रयोग भी हुआ है तो उसको इस प्रकार का घटना-प्रधान शुद्ध नाटकीय रूप प्रदान किया गया है जिसमें उपमा की अपेक्षा चरित्र-चित्रण की अभिव्यक्ति अधिक प्रकट होती है। एक उदाहरण इस प्रकार है-
"दृष्ट्वा मौर्यमिव प्रतिष्ठितपदं शूलं धरित्र्यास्तले तल्लक्ष्मीमिव चेतस: प्रम्थिनीमुन्मुच्य वध्यत्रजम्। भुत्वा स्वाम्युपरोधरौद्रविषमानाध्माततूर्यस्वनान् न ध्वस्तं प्रथमाभिघातकठिनं मन्ये मदीयं मनः॥" -- मुद्रा० २।२१
द्वितीय अंक में जिस समय विराधगुप्त और राक्षस का वार्तालाप हो रहा था शकटदास और सिद्धार्थक का प्रवेश होता है। उस समय अपने अतीत का स्वगत वर्णन करता हुआ शकटदास कहता है- अरे! मैं सचेत हूं और क्यों न रहूँ? मैं उस समय भी चेतना-रहित न हो सका जब कि मेरी आँखों के सम्मुख पृथ्वी के हृदय में चुभनेवाले चन्द्रगुप्त के समान ठुका हुआ शूल-दंड यथास्थान खड़ा ही रहा। मेरे गले के चारों ओर हृदय-विदारक चन्द्रगुप्त की राज-लक्ष्मी की तरह मेरे वध की सूचक माला लटक रही है। और कानों में हमारे महाराज के असह्य और भयंकर विनाश के समान असह्य और भयंकर वध की कर्कश एवं कठोर ध्वनियां सुनाई पड़ रही हैं। विपत्ति सहन करते-करते हम यह सब सहने को उद्यत हो गये हैं। शकटदास का चाणक्य से भयभीत होकर कहने का यह ढंग बड़े ही स्पष्ट रूप से उसकी भावाभिव्यक्ति एवं चाणक्य के प्रति भय का निरूपण करता है। एक उदाहरण निम्नलिखित है-
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"कामं नन्दमिव प्रमथ्य जरया चाणक्य-नीत्या यथा, धर्मो मौर्य इव क्रमेण नगरे नीतः प्रतिष्ठां मयि। तं सम्प्रत्युपचीयमानमपि मे लब्धान्तर: सेवया लोभो राक्षस-वञ्चनाय यतते जेतुं न शक्नोति घ।"-मुद्रा० २।९
द्वितीय अंक में संतप्त राक्षस की दशा का अवलोकन कर प्रवेश करने के उपरान्त कंचुकी कहता है- सतत राज-सेवा करते हुए राक्षस की स्वामिभक्ति से मेरा लोभ इस प्रकार का प्रतीत होता है मानो वृद्धावस्था द्वारा काम के वेग-रहित होने पर हृदय में प्रतिष्ठित मेरे धर्मभाव को उसी प्रकार दबाना चाहते हुए भी नहीं दबाने में समर्थ हो पाता जिस प्रकार कि चाणक्य की नीति द्वारा नष्ट कर दिये जाने पर पाटलिपुत्र में प्रतिष्ठित होते हुए चन्द्रगुप्त मौर्य को राक्षस तथा उसके साथी नन्द वंश से प्रेरित होते हुए एवं बढ़ावा पाते हुए दमन करने में समर्थ नहीं हो पाते। चन्द्रगुप्त के विषय में मलयकेतु के प्रति कंचुकी की यह उक्ति विशेष महत्त्व रखती है और सम्राट के चरित्र के अनुरूप ही प्रमाणित होती है। उक्त दोनों श्लोक यद्यपि काव्य-कल्पना एवं भाव-गाम्भीर्य के उचित उदाहरण नहीं कहे जा सकते, फिर भी उनमें मानवीय भावों की बड़ी ही सुन्दर अभिव्यञ्जना की गयी है तथा यह नाटकीय औचित्य के सजीव दृष्टांत कहे जा सकते हैं। विशाखदत्त की नाटकीय कला की भवभूति और कालिदास की कला के साथ तुलना करते हुए प्रोफेसर विल्सन का मत है कि मुद्राराक्षस का रचयिता उन दोनों से ही निम्नकोटि का है। मुद्राराक्षस में कालिदास और भवभूति की कल्पना का लेशमात्र भी परिचय नहीं मिलता। इस नाटक में न तो कोई चमत्कारपूर्ण उक्ति है और न कोई विशेष काव्यमय भावाभिव्यञ्जन ही पाया जाता है। चरित्र-चित्रण ही मुद्राराक्षस में विशाखदत्त की एक मात्र ऐसी अनुपम शक्ति है जो कि नाटक को किसी प्रकार भी हमारी उपेक्षणीय दृष्टि से नहीं बचा पाती। इस विषय में हमारा विचार है कि विशाखदत्त की तुलना इन कवियों के साथ करना उचित नहीं है, क्योंकि विशाखदत्त का काव्यक्षेत्र इन कवियों से सर्वथा भिन्न ही है।
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जितनी भी क्रियाएं दिखायी गयी हैं वे सभी निस्स्वार्थभाव से राज्याधिपति चन्द्र- गुप्त मौर्य के हित में दृष्टिगोचर होती हैं। मौर्य साम्राज्य की समृद्धि व उसकी उन्नति के लिए वह प्रत्येक संभव उपाय को कार्य रूप में परिणत करने के लिए प्रयत्न- शील है। इसी कारण हम उसे नाटक के घटनाचक्रों का एकमात्र नियंता एवं नायक मानने को बाध्य होते हैं। अर्थशास्त्र के प्रणेता तथा मुद्राराक्षस के नायक एवं सर्वे-सर्वा, दो रूपों में चाणक्य के चरित्र-चित्रण की तुलना करते हुए एक आश्चर्यजनक भिन्नता का दर्शन होता है। अर्थशास्त्र का नायक जब महा क्रोधी ब्राह्मण है, मुद्राराक्षस में उसको निःस्वार्थ, निरीह एवं लोक-भावना के प्रतीक रूप में चित्रित किया गया है। उसकी यह भावना उसके साधारण जीवन से भी व्यक्त होती है। मौर्य जैसे शक्तिशाली साम्राज्य के सूत्रधार के रूप में भी वह सांसारिक सुखों से अनासक्त हो किस प्रकार का जीवन यापन करता है, निम्नलिखित श्लोक से विदित होता है-
उपलशकलमेतव् भेवकं गोमयानां वटुभिरुपहृतानां वािषां स्तोम एष:। शरणपि समिद्भि: शुष्यमाणाभिराभिविनमितपटलान्त दृश्यते जीणंकुड्यम्। -मुब्रा० ३।१५ इस श्लोक में भ्रमण करने के पश्चात् कञन्चुकी सहसा इधर-उधर देखकर चाणक्य के गृह-वैभव की प्रशंसा करता हुआ कहता है- "एक ओर सूखे कन्डे तोड़ने के लिए पत्थर का टुकड़ा पड़ा हुआ है तथा दूसरी ओर ब्रह्मचारियों ने कुशों को एकत्र करके ढेर लगा दिया है। छप्पर पर चारों ओर इतनी समिधाएँ सुखायी जा रही है कि जीर्ण कुटिया झुकी सी जा रही है और भग्नावशेष दीवारें अपनी जीर्ण-शीर्ण दशा को व्यक्त करती हैं। यह मौर्य साम्राज्य के विधायक अमात्य चाणक्य के घर की दशा है।" ऐसा प्रतिभा-सम्पन्न व्यक्ति भी उस समय कितना साधारण जीवन व्यतीत करता था, यह इस श्लोक से विदित होता है। साथ ही यह घटना वर्त्तमान स्वाधीनता के नवराष्ट्र-निर्माण के युग में प्रत्येक शासनाधिकारी को भी अपना जीवन साधारण बनाने के लिए महती प्रेरणा देती है।
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आरम्भ से ही चाणक्य रंगमंच पर उपस्थित हो जाता है और अपने आत्म- विश्वास की अद्भुद् व्यञ्जना करता है। वह इतना आत्मविश्वासी है कि दैव की गति पर भी विश्वास नहीं करता और यह उसकी दृढ़ धारणा है कि नन्द वंश का विनाशक दैव नहीं अपितु वह स्वयं ही है। चाणक्य अपनी महती आत्मशक्ति एवं अदम्य उत्साहशीलता तथा प्रतिस्पर्द्धा में संसार की महान्तम शक्ति को भी नगण्य ही समझता है। वह राक्षस को भी अपना प्रतिद्वंदी स्वीकार नहीं करता क्योंकि वह समझता है कि उसकी समस्त चेष्टाएं मौर्य साम्राज्य के हित में ही विहित हैं। नाटक का नायक चाणक्य मनोविज्ञान का भी अद्वितीय वेत्ता है। राक्षस के गुणों को जितना वह समझता और सम्मान करता है उतना सम्भवतः राक्षस स्वयम् भी अपने गुणों को नहीं समझता। चाणक्य की चेष्टाएं राक्षस के विनाश के लिए नहीं होतीं किन्तु उसकी त्रटियों के संहार एवं उसके चरित्र के सुधार के लिए ही होती हैं। मुद्राराक्षस में चाणक्य के सहायक उसकी महत्त्वाकांक्षा पूर्ण करते हैं। कौटिल्य अर्थशास्त्र में जो गुप्तचर और गूढ़ प्रतिनिधि बताये हैं उनकी भी नाटक में चाणक्य के सहायक के रूप में सुंदर व्यञ्जना हुई है। शासन-संचालन को व्यावहारिक रूप प्रदान करने में भी चाणक्य का स्थान उल्लेखनीय है।
राक्षस
यदि चाणक्य इस नाटक का नायक है तो राक्षस प्रतिनायक के रूप में अवश्य विभूषित है। विशाखदत्त ने उसे प्रतिनायक के रूप में नाटक में समाविष्ट कर एक अपूर्व रोचकता का संचार किया है। राक्षस के चरित्र में जो मनुष्य की आशा- निराशा, घात-प्रतिघात आदि द्वंद्वों का चित्र खींचा गया है उससे मानव जीवन की अस्थिरता का सहज ही ज्ञान हो जाता है। चाणक्य भी उसे नन्द-साम्राज्य-संचा- लिका महती-शक्ति से संपन्न समझता है जिसका विशेष कारण उसकी मुद्रा ही है। यही कारण है कि मुद्रा के अधिकार में आते ही चाणक्य समझता है कि मैंने राक्षस को अपने वशीभूत कर लिया है। यद्यपि वास्तव में चाणक्य के षड्यन्त्रों से राक्षस वशीभूत कर लिया गया था परन्तु नाटक के अन्तर्गत इस घटना का विशेष कारण मुद्रा ही दिखाकर एक अद्भुद् मौलिकता को जन्म प्रदान किया गया है। राक्षस
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की पराजय एक आकस्मिक घटना है किन्तु इससे उसके महत्त्व में न्यूनता न आकर महत्ता का ही समावेश होता है। राक्षस की सतत उक्तियों पर ध्यान देने से पता लगता है कि वह समय की परिवर्त्तनशील गति के कारण ही विषम परिस्थिति में पड़ गया। नन्द साम्राज्य के अमात्य जैसे उच्च पद से पृथक् हो जाने से वह साधारण कोटि का व्यक्ति मात्र ही रह गया। चाणक्य जैसे व्यक्ति की प्रतिस्पर्द्धा का पात्र होकर वह संकट-ग्रस्त हो गया। इस विषम परिस्थिति में भी वह तनिक भी उद्विग्न नहीं हुआ और अपने जीवन को गौरवपूर्ण बनाने का सतत प्रयत्न करता रहा। राक्षस एक महत्त्वाकांक्षी व्यक्ति था और उसकी राजनीतिक महत्त्वाकांक्षा स्वार्थमय न होकर अपने स्वामी नन्दों के प्रति अनन्य भक्ति की द्योतक हैं। चाणक्य और राक्षस के व्यक्तित्व की तुलना करने पर विदित होता है कि दोनों ही अपनी-अपनी जगहों में परस्पर एक दूसरे से बढ़कर हैं। चाणक्य में बुद्धि अधिक है तो राक्षस का परात्रम उससे किसी भांति कम नहीं है। चाणक्य राजनीति-कुशल होते हुए भी राक्षस की दांडायन शक्ति से सर्वथा शून्य है। राक्षस की संग्राम एवं सैन्य-संचालन-शक्ति इतनी प्रबल है कि चाणक्य उसे संग्राम की अपेक्षा कूटनीति द्वारा ही पराजित करना अधिक श्रेयस्कर समझता है। राक्षस का अपने मित्रों एवं सहयोगी जनों पर अटूट विश्वास है जबकि चाणक्य की समस्त शक्तियां उसी के आत्म-विश्वास व एकाकी उसी पर अवलम्बित हैं। इस प्रकार जबकि राक्षस भाग्यवादी है, चाणक्य कट्टर पुरुषार्थवादी है। यही कारण है कि राक्षस को मुँह की खानी पड़ती है और चाणक्य सफल होता है। अपेक्षाकृत चाणक्य के अनुचर व साथी उसके अधिक सहायक हैं। उसके सहायकों में चंदनदास मित्रता निभाने के लिए अपने प्राणों का भी संकट झेलता है। अन्य अनुचरों की फूट एवं संदेह के साथ-साथ चन्दनदास का स्नेह- बंधन-निर्वाह भी उसके पतन का कारण है। इन सब घटनाओं के होने पर भी हमें मानना पड़ेगा कि राक्षस नाटक का एक महान् पात्र है और अपनी अलौकिक विशेषता रखता है। सम्राट् चन्द्रगुप्त सम्राट् चन्द्रगुप्त मौर्य इस नाटक के नायक नहीं कहे जा सकते। नाटककार ने
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अपने नाटक की समस्त घटनाओं का केन्द्र उनको अवश्य बनाया है। कौटिल्य अर्थशास्त्र में जिस आदर्श राज राजेश्वर की कल्पना की गयी है उसी को मुद्राराक्षस में यथार्थ रूप से प्रकट करने का प्रयास किया है। मुद्राराक्षस में चन्द्रगुप्त के लिए वृषल शब्द का प्रयोग हुआ है जिसके आधार पर कतिपय विद्वानों ने उन्हें शूद्र कुलो- त्पन्न मान लिया है। परन्तु हम इस विवाद में न पड़ते हुए नाटककार का तात्पर्य समझने का प्रयत्न करें तो विदित होगा कि उसका अभिप्राय यहां "राज्ञां वृषः वृषल: राजराजेश्वरः" से है। उसी के पराक्रम एवं निरीक्षण में चाणक्य अपनी नीति एवं पराक्रम को सफल वनाने का प्रयत्न करता है। कतिपय आलोचकों का मत है कि विशाखदत्त ने जिस चन्द्रगुप्त का चित्र अपने नाटक में अंकित किया है उसका व्यक्तित्व मौर्य सम्राट् के अनुरूप नहीं है। परन्तु हम यदि चन्द्रगुप्त को नाटककार के दृष्टिकोण से देखें तो हमें उसकी कुछ ऐसी अलौकिक विशेषताएं विदित होंगी जो कि इतिहास जानना या समझना नहीं चाहता। यद्यपि नाटक में उसके विजयी मौर्य सम्राट् के रूप में दर्शन नहीं होते, मौर्य साम्राज्य के सफल संचालक, नियंता एवं आदर्श राज्य-व्यवस्था के प्रचारक के रूप में उसका पर्याप्त सफलता के साथ चित्रण किया गया है। मुद्राराक्षस नाटक की मौलिकता पर ध्यान देने से विदित होता है कि नाटक में राजनीतिक घटनाचक के समावेश करने में उस पर संस्कृत के प्राचीन नाटककार महाकवि भास के प्रतिज्ञायौगन्धरायण ग्रंथ का विशेष प्रभाव पड़ा। सम्राट् महा- कवि शूद्रक की रचना मृच्छकटिक की सामाजिक व्यवस्था के चित्रण करने की प्रणाली ने भी नाटक पर यथेष्ट प्रभाव डाला। उसमें घटनाओं की एकाग्रता दर्शनीय है। अंकों को दृश्यों में विभक्त कर एक नवीन मौलिकता का श्रीगणेश हुआ है। पूर्व- वर्ती रूपकों में अंक के आदि से अंत तक मुख्य पात्र के अस्तित्व की विद्यमानता रहती है परन्तु विशाखदत्त ने यह विभाजन कर अपूर्व रोचकता का संचार किया है। नाटक में स्त्री-पात्रों का नितांत अभाव है। केवल एक स्थान पर सप्तम अंक में चंदनदास की पत्नी का रंगमंच पर आनयन होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि मुद्राराक्षस के अतिरिक्त विशाखदत्त ने देवी चन्द्रगुप्त और राघवानंद दो और नाटकों की रचना की है। देवी चन्द्रगुप्त में वर्णन है कि
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उत्तर कालीन गुप्त वंशज रामगुप्त ने अपने बड़े भाई चन्द्रगुप्त का वध कर अपनी भाभी ध्रुव देवी से विवाह किया और स्वयं राज्य का अधिपति बन गया। इस प्रकार की कथा विशाखदत्त द्वारा रचित प्रतीत नहीं होती। राघवानंद अब अप्राप्य है, अतः उसके विषय में निर्णय करना संभव नहीं है।