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11. ११. महाकवि भवभूति

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११. महाकवि भवभूति

(सातवीं शताब्दी ई० का उत्तरार्द्ध)

संस्कृत रूपक साहित्य में महाकवि कालिदास के पश्चात् महाकवि भवभूति ही एक अमर नाटककार हैं। उनके रचना-काल के सम्बन्ध में नाना प्रकार के निश्चित प्रमाण उपलब्ध हुए हैं। राजशेखर ने (सन् ६०० ई०) अपने आप को भवभूति का अवतार बताया है। वामन (८०० ई०) ने अपने ग्रन्थ काव्यालंकार सूत्र वृत्ति में भवभूति-कृत उत्तर रामचरित का एक श्लोक उद्धृत किया है जिससे विदित होता है कि वह वामन के समय के पूर्व अवश्य विद्यमान थे। हर्ष के राज- कवि बाण ने अपनी रचना हर्षचरित में कालिदास, भास, आदि साहित्यकारों का उल्लेख किया है परन्तु भवभूति की काव्य-कौमुदी के विषय में लेश मात्र भी उल्लेख नहीं किया। अतः प्रतीत होता है कि उनके समय तक भवभूति का प्रादुर्भाव नहीं हुआ था। कल्हण ने राजतरंगिणी में भवभूति को यशोवर्मा का राजकवि बताया है। उनके कथनानुसार कश्मीर-नरेश ललितादित्य ने यशोवर्मा को परास्त किया था। डाक्टर स्टीन के मतानुसार यह घटना सन् ७३६ ई० के पूर्व की नहीं जान पड़ती। जनरल कनिंघम के मतानुसार ललितादित्य का राज्य-काल सन् ६६३ से ७२६ ई० तक है। इस प्रकार सिद्ध होता है कि भवभूति का स्थिति-काल सन ७०० ई० के समीपवर्ती ही है। भवभूति के ग्रन्थों में उनके जीवन सम्बन्धी कुछ सामग्री उपलब्ध होती है। परन्तु वह बहुत ही अपूर्ण दशा में हमें प्राप्त हुई है। उसके अनुसार वे विदर्भ प्रान्तान्तर्गत पद्मपुर नगर के निवासी थे। उनका जन्म कृष्ण यजुर्वेद की तैत्तरीय शाखा को माननेवाले सोमयज्ञ से पवित्र प्रसिद्ध उदुम्बर वंशीय ब्राह्मण परिवार में हुआ था। उनके पितामह का नाम भट्ट गोपाल, पिता का नाम नीलकंठ तथा माता का नाम जातुकर्णी था। वह प्रारंभिक काल में श्रीकंठ

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नाम से विख्यात थे। नाट्य-प्रतिभा प्रदशित करने के उपरान्त ही उनका उपनाम भवभूति पड़ा। उन्होंने तीन नाटक-ग्रन्थों की रचना की है जो आज भी विद्वत् समाज में समुचित आदर प्राप्त कर रहे हैं। उनका नाम रचना-क्र्म के अनुसार महावीर- चरित, मालती-माधव और उत्तर-रामचरित है। इन नाटकों की प्रस्तावना के अवलोकन करने पर विदित होता है कि यह नाटक सर्वप्रथम महाराज काल- प्रियनाथ के राज दरबार उज्जयिनी में अभिनीत किये गये थे। उनका संक्षिप्त कथानक इस प्रकार है-

महावीर-चरित

इसमें सात अंक हैं और रामायण के पूर्वार्द्ध की कथा रामविवाह से राज्या- भिषेक पर्यन्त व्णित है। आरंभ से अन्त तक रावण राम के विनाश के लिए अनेक प्रकार के कुचक्रों का सर्जन करता है। शिव-धनुष भंग होने के उपरान्त रावण परशुराम को राम के विरुद्ध उकसाता है और शूर्पणखा को मंथरा और स्वयं अपने रूप में राम को विघ्न पहुंचाता है तथा इसके कारण ही राम बालि से युद्ध भी करते हैं। रावण के विनाश के उपरान्त राम सीता सहित अयोध्या पधारते हैं और समारोहपूर्वक उनका राज्याभिषेक सम्पन्न होता है। महावीर-चरित पर भास के अभिषेक नाटक व बालचरित का पर्याप्त प्रभाव लक्षित होता है। भवभूति का प्राचीन नाटक कला के प्रमुख आचार्य भास के ग्रन्थों से कथानक लेना उनके प्रति समुचित समादर प्रदर्शित करना है। इस प्रकार कवि ने रामायण की प्राचीन लोकविख्यात कथा को नाटकीय रूप प्रदान करने का स्तुत्य प्रयास किया है किन्तु प्रथम रचना होने के कारण इसमें नाटक-कला का पूर्ण परिपाक नहीं हो पाया है। दीर्घ वर्णनात्मक प्रसंगों के कारण इस नाटक में घटनाओं की गति में विरोध दृष्टिगोचर होता है। जैसा कि उनके अन्य दो रूपकों में मानव-हृदय का सूक्ष्म निरीक्षण और भाव तथा भाषा का सामंजस्य दृष्टिगोचर होता है, वैसा इस नाटक में नहीं हुआ है। उन्होंने अपने आलोचकों के प्रति बहुत कठोर शब्दों का प्रयोग किया है जिनसे

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प्रतीत होता है कि उनके जीवन-काल में इस ग्रन्थ का विद्वानों द्वारा समुचित सत्कार नहीं हो पाया।

मालती-माधव

यह दश अंकों का एक प्रकरण है। इसमें मालती और माधव की प्रणय-कथा का सविस्तार वर्णन किया गया है। पद्मावती नरेश के मंत्री भूरिवसु अपनी पुत्री मालती का विवाह अपने बाल्यकाल के अभिन्न मित्र देवरात के पुत्र माधव के साथ करने के इच्छुक हैं। इधर राजा का साला नर्मसुहृद या नन्दन भी इस प्रेम में प्रति- द्वंद्वी है और उसको पूर्ण राजकीय सहायता प्राप्त है। इस प्रणय-प्रसंग में माधव का मित्र मकरन्द है और मालती की सखी नन्दन की भगिनी मदयन्तिका है। एक दिन मालती और माधव परस्पर एक शिव-मंदिर में मिलते हैं जहां पर मकरन्द मदयन्तिका की एक बाघ से रक्षा करता है और इसी घटना के कारण वे दोनों एक दूसरे पर अनुरक्त हो जाते हैं। राजा नंदन और मालती के विवाह के लिए पूर्ण प्रयत्नशील हैं। अतः इसे सफल करने के लिए माधव र्मशान में जाकर तंत्र की आराधना करता है। उसी समय अघोरघंट मालती को बलि चढ़ाने के लिए उस स्थान पर आता है जहां पर माधव उसका वध कर मालती की रक्षा करता है और दोनों भाग जाते हैं। राजा के समीप मकरन्द मालती का स्थान ले नन्दन से विवाह करने को प्रस्तुत होता है और नन्दन को दुत्कार देता है। इस प्रकार अवसर पाकर मदयन्तिका मकरन्द के समीप आकर उसके साथ चली जाती है। इस भगदड़ में कपालकुंडला मालती को चुरा लेती है और सौदामिनी की सहायता से माधव उसको ढूंढने में समर्थ हो जाता है। इसके उपरान्त राजा की अनुमति से माधव और मालती का परस्पर विवाह हो जाता है और उनका शेष जीवन सुखपूर्वक व्यतीत होता है। इस प्रकरण पर महाकवि भास के अविमारक नामक नाटक का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है जिसमें महाराज कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी और अविमारक नामक राज- कुमार की प्रणय-कथा का वर्णन किया गया है। इसका कथानक रोचक है। इसमें कवि की कल्पनाशक्ति के चमत्कार का अपेक्षाकृत विकसित रूप दृष्टिगोचर होता है क्योंकि अन्य दो नाटकों का कथानक रामायण के आधार पर अवलम्बित है।

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महावीर-चरित की अपेक्षा इसमें कवि की प्रतिभा का अधिक रोचक रूप प्रस्तुत किया गया है।

उत्तर-रामचरित

यह नाटक महाकवि भवभूति की अन्तिम तथा सर्वोत्कृष्ट रचना है। यह महा- वीर-चरित का उत्तरार्द्ध है जिसमें राम के राज्याभिषेक के अनंतर उनके अवशिष्ट जीवन का वर्णन है। यह सात अंकों का एक नाटक है जिसका कथानक इस प्रकार है- प्रथम अंक में राम के राज्याभिषेक के उपरान्त जब जनक लौट जाते हैं तब उनकी पुत्री सीता उद्विग्न हो जाती है। राम उन्हें सान्त्वना देने एवं उनका मनोविनोद करने के लिए अपने पूर्व जीवन के चित्र दिखलाते हैं। सीता गंगा- स्नान करने की इच्छा प्रकट करती हैं तथा विश्राम पाकर सो जाती हैं। दुर्मुख नामक गुप्तचर सीता के विषय में प्रचलित लोकापवाद के विषय में राम को सूचित करता है। असह्य वेदना होने पर भी वह कर्त्तव्यपालन के वशीभूत हो पत्नी का परित्याग करने को भी उद्यत हो जाते हैं। गंगा-स्नान की इच्छा-पूर्ति के बहाने वह वन में निर्वासित कर दी जाती हैं। द्वितीय अंक में बारह वर्ष के उपरान्त की घटना का समावेश हुआ है। आत्रेयी और वासन्ती राम के अश्वमेध यज्ञ के विषय में वार्तालाप करती हैं और कहती हैं कि इस अवसर पर महर्षि वाल्मीकि दो कुशाग्र बुद्धिवाले बालकों का लालन-पालन कर रहे हैं। राम द्वारा शूद्र तपस्वी शम्बूक का भी वध इसी अंक में होता है। तृतीय अंक में तमसा और मुरला नामक नदियाँ सीता के निर्वासन के उपरान्त उनके भविष्य के विषय में वार्तालाप करती हैं। उनके वार्तालाप के अनुसार सीता अत्यन्त दुखी हो अपने जीवन का अन्त करने के लिए गंगा में कूद पड़ती हैं जहां कि जल में ही लव और कुश का जन्म होता है। गंगा ने दोनों पुत्रों सहित सीता को वाल्मीकि के संरक्षण में सौंप दिया। कुछ कालोपरान्त राम भी वन-गमन करते हैं और अपने पुरातन क्रीड़ास्थलों का अवलोकन कर एवं सीता का स्मरण कर मूच्छित हो जाते हैं। सीता छायारूप में प्रकट होती हैं और अपने स्पर्श द्वारा राम को सचेत

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कर देती हैं। इस समय सीता की विरह-वेदना राम को अत्यधिक व्याकुल कर देती है। राम के करुण कंदन के कारण ही यह अंक करुणरस की प्रतिमूर्ति हो गया है। चतुर्थ अंक में कौशल्या और जनक का स्नेहसिक्त वार्तालाप होता है जिसमें वे परस्पर सान्त्वना प्रदान करते हैं। वाल्मीकि आश्रम के निरीह एवं चपल बालक कीड़ा करते हुए संयोगवश उनके समीप पहुंच जाते हैं जिनमें लव विशेष रूप से कान्तिमान है। वह राम के अश्वमेध के घोड़े को बलपूर्वक पकड़ लेता है। पंचम अंक में यज्ञीय अश्व के रक्षक लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतु और लव का दर्पयुक्त कथनोपकथन होता है। साथ ही साथ दोनों ही एक अलौकिक आनन्द एवं अनुराग का अनुभव करते हैं। षष्ठांक में एक विद्याधर अपनी पत्नी से लव और चन्द्रकेतु के संग्राम का वर्णन करता है। कुछ समयोपरान्त महाराज रामचन्द्र जी का भी रणक्षेत्र में आगमन होता है और अपने पुत्रों को न पहिचानते हुए वे दिव्य वात्सल्यरस का आस्वादन करते हैं। सप्तम अंक में राम के दरबार में एक दिव्य नाटक का अभिनय होता है जिसमें सीता प्राणान्त करने के हेतु गंगा में कूद पड़ती हैं। तदुपरान्त गंगा एक शिशु को गोद में लेकर सीता सहित जल के बाहर दशित होती हैं। धरा राम की कठोरता की निन्दा करती हैं जिसका कि गंगा उचित कारण भी बताती हैं। वे दोनों सीता को वाल्मीकि के संरक्षण में बालकों का उचित लालन-पालन करने का आदेश देती हैं। राम इस दृश्य को देखकर मूच्छित हो जाते हैं। तत्क्षण अरुन्धती सीता को लेकर प्रकट होती हैं। सीता उचित परिचर्या द्वारा राम को सचेत करती हैं। तभी वाल्मीकि मुनि का आगमन होता है और वे पुत्रों सहित सीता को राम की भेंट कर देते हैं। तदुपरान्त सभी का जीवन सुखपूर्वक यापित होता है। भवभूति ने अपना नाटक-रचना-कौशल दिखलाने के लिए रामायण की मूल कथा में अनेक परिवर्तन किये हैं जिससे उनकी प्रतिभा की प्रखरता का आभास होता है। उन्होंने मूल कथा में निम्नलिखित परिवर्तन किये और अपनी कृति को अधिक रोचक एवं सरस बनाने में सफल हुए- (१) रामायण में कथा का अन्त दुःखपूर्ण है। वाल्मीकि के कहने पर सीता

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को स्वीकार करने के लिए राम उनकी चरित्र-शुद्धि का कोई प्रमाण उपस्थित करने का पुनः प्रस्ताव करते हैं। सीता अग्नि को साक्षी कर अपने पातिव्रत धर्म के प्रताप का पुनः प्रमाण देती हैं। परन्तु इस घटना से वह अपना बहुत अपमान अनुभव करती हैं और माता पृथ्वी से शरण देने की प्रार्थना करती हैं। इसी अवसर पर भूमि विदीर्ण हो जाती है और सीता उसमें समाविष्ट हो जाती हैं। इस अत्यन्त हृदय- विदारक घटना का भवभूति ने अपने ग्रन्थ में समावेश नहीं किया है। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र के नियमानुसार प्रत्येक रूपक सुखान्त होना चाहिए। इसीलिए भवभूति ने सीता और राम का पुनर्मिलन अंकित कर अपने ग्रन्थ का सुखान्त पर्यवसान किया है। (२) मूल कथा में अश्वमेधीय अश्व के रक्षक और मुनि-कुमार लव या कुश के मध्य में युद्ध नहीं दिखाया गया है परन्तु भवभूति ने लक्ष्मण के पुत्र चन्द्रकेतु और उनके चचेरे भाई लव के बीच अस्वाभाविक युद्ध दिखाकर ग्रन्थ को अधिक मनो- रंजक तथा घटनामय बना दिया है। (३) इस नाटक में करुण रस की बड़ी सुन्दर एवं मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। रामायण की कथा के अनुसार सीता के गर्भवती होने के चिह्न प्रकट होते ही उनका निर्वासन कर दिया जाता है और लक्ष्मण उन्हें वाल्मीकि के आश्रम के निकट छोड़ आते हैं जहां कि लव और कुश का जन्म होता है। उत्तर रामचरित में करुणरस को अधिक प्रभावोत्पादक बनाने के हेतु सीता को वनवास उस समय दिया गया है जब कि उनका गर्भ पूर्णतया विकसित हो गया था। लक्ष्मण के जाने के उपरान्त सीता असह्य वेदना को न सह सकने के कारण गंगा में कूद पड़ीं और अधोलोक में पहुंच गयीं जहां उनके जुड़वा पुत्र लव और कुश का जन्म तथा आरम्भिक लालन-पालन हुआ। बच्चों के कुछ बड़े होने पर वे महषि वाल्मीकि को सौंप दिये गये, जिन्होंने उनकी शिक्षा आदि का उचित प्रबन्ध किया। इस प्रकार सीता को गंगा में कुदवाकर भवभूति ने हमारी करुणा एवं समवेदना उनके प्रति अधिक बढ़ा दी है। (४) रामायण के अनुसार शत्रुघ्न द्वारा लवण के वध किये जाने के पश्चात् एक ब्राह्मण राम से अपने पुत्र की अकाल मृत्यु का प्रतिकार करने की प्रार्थना करता

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है। नारद मुनि के कथनानुसार शम्बूक नामक शूद्र तपस्वी के वध के कारण ही यह उपद्रव हुआ है। राम वन में शम्बूक का वध करते हैं। यह घटना रामायण में सीता के पुत्र उत्पन्न होने के समय की है। परन्तु भवभूति ने इस घटना को बारह वर्ष बाद में वर्णन किया है। नारद मुनि के स्थान पर भवभूति ने यह वध का आदेश आकाशवाणी द्वारा राम को दिलवाया है। इस प्रकार नाटक अधिक मनोरंजक और मनोरम हो गया है। संक्षेप में यह कहने की आवश्यकता नहीं कि उत्तर रामचरित महाकवि भवभूति की सर्वोत्कृष्ट एवं अन्तिम रचना है जिसमें उनकी प्रतिभा का पूर्ण परिपाक मिलता है।

भाषा और शैली

भवभूति के समय में संस्कृत काव्य में तीन प्रकार की शैलियां प्रचलित थीं जो काव्य-मनीषियों के मध्य में वैदर्भी, गौड़ी और पांचाली के नाम से विख्यात हैं। उस समय के कविगण प्रायः उन प्रचलित शैलियों में से किसी एक में ही अपना काव्य-कौशल दिखाया करते थे। परन्तु भवभूति ने वैदर्भी और गौड़ी दो सर्वथा ही भिन्न प्रकार की शैलियों को अपना कर अपना अनुपम चातुर्य प्रदर्शित किया है। वैदर्भी रीति के लक्षण निम्नलिखित हैं-

माधुर्यव्यञ्जकैर्व णेर्रचना ललितात्मिका। अवृत्तिरल्पवृत्तिर्वा वैदर्भीरीतिरिष्यते॥ -- साहि० ९।२

इसमें ललित पदों में मधुर शब्दों से रचना की जाती है जिसमें छोटे-छोटे समास होते हैं अथवा उनका अभाव ही होता है। यह शैली महाकवि कालिदास ने भी अपनायी है। गौड़ी रीति के लक्षण निम्नलिखित हैं-

ओज: प्रकाशकर्वणेर्वन्धाडम्बरा पुनः। समास-बहुला गौड़ी॥-साहि० ६।३

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ओज को प्रकट करनेवाले लम्बे-लम्बे समासों सहित जटिल और कृत्रिम भाषा से विभूषित यह शैली होती है। इसमें प्रयुक्त अक्षरों द्वारा घटना का बहुत विस्तृत वर्णन होता है और लम्बे-लम्बे समास भी अधिक संख्या में विद्यमान होते हैं। इस प्रकार हम देखते है कि इन दोनों प्रकार की शैलियों में बड़ा अंतर पाया जाता है परन्तु भवभूति की रचनाओं में दोनों का ही समुचित प्रयोग है। युद्ध के भयंकर और रमशान के वीभत्स दृश्य उपस्थित करते समय भवभूति ने एक ओर जहां दीर्घकाय समासवाले ओजोगुण-विशिष्ट क्लिष्ट पद्य रचे हैं, वहीं दूसरी ओर सुकुमार भावों की अभिव्यंजना करनेवाली समास-रहित ललित पदावली का प्रयोग किया है। कवि कभी-कभी तीव्र मनोरम भावों की व्यंजना करने में सुभग शैली का प्रयोग करता है। सीता के परित्याग करने के उपरांत वासन्ती राम को उलाहना देती हुई कहती है-

त्वं जीवितं त्वमसि मे हृदयं द्वितीयं त्वं कौमुदी नयनयोरमृतं त्वमङ्गे। इत्यादिभिः प्रियशतरनुरुध्य मुग्धां तामेव शान्तमथवा किमतः परेण॥-उत्तर ३।२६

'तुम मेरा जीवन हो, तुम मेरा दूसरा हृदय हो, तुम मेरे शरीर में नेत्रों के लिए चाँदनी के समान शीतल अमृत हो।' इस प्रकार आपने उस अबोध बालिका सीता के प्रति शतशः मधुर शब्दों का प्रयोग करके अब उसका क्या किया है अर्थात् त्याग दिया है। इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ। वासन्ती द्वारा राम को यह शोकपूर्ण उपालंभ देने का बड़ा ही तीव्र दर्शन है। पदावली प्रांजल और चित्ताकर्षक है एवं वैदर्भी रीति का अनुपम उदाहरण है। गौड़ी और वैदर्भी दोनों ही शैलियों को अपनाते हुए भवभूति ने कहीं एक ही पद में दोनों प्रकार की शैलियों का रोचक प्रयोग किया है। एक श्लोक के पूर्वार्द्ध में कोमल भावों के प्रकट करने के लिए वैदर्भी रीति की सुकुमार पदावली प्रयुक्त हुई है और उत्तरार्द्ध में वीरोल्लासव्यंजक गौड़ी का सम्यक दिग्दर्शन हुआ है। कवि ने भाषा का प्रभुत्व, व्यंजना-प्रणाली और अर्थ-गौरव ही अपनी शैली का आदर्श बताया

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है। इस कसौटी के अनुसार उनकी कृति पूर्णतः सफल हुई है। उनकी रचनाओं में काव्यकला का भाव-पक्ष प्रधान है और विभाव-पक्ष गौण। मनोविकारों का निरूपण करते समय वे कालिदास की शैली से भिन्न उपमा इत्यादि अलंकारों का प्रयोग न कर प्रभावशाली शब्दों में उनका व्योरेवार वर्णन करते हैं। भवभूति किसी स्थान पर एक अवस्था-विशेष का पूर्ण चित्र अंकित कर देते हैं। यद्यपि उनकी भाषा में काव्यालंकारों का अभाव है, फिर भी वह अत्यन्त प्रभावोत्पादक है। भावों की गहराई तक पहुंचना एवं एक स्थान पर अनेक भावों का पंचामृत उपस्थित कर देना उनकी शैली की विशेषता है। सीता द्वादश वर्षीय दीर्घ वियोगोपरान्त दंडकारण्य में अपने पति राम का साक्षात्कार करती हैं। उस समय उनके मन की क्या दशा है, इसका वर्णन करते हुए तमसा उनसे कहती है-

"तटस्थं नैराश्यादपि च कलषं विप्रियवशा द्वियोगे दीघेऽस्मिऊशटिति घटनात्स्तम्भितमिव। प्रसन्नं सौजन्याद्दयितकरुणर्गाढ करुणं द्रवीभूतं प्रेम्णा इव हृदयमस्मिन् क्षण इव ।"-उत्तर ३।१३ हे पुत्री सीता, इस समय तुम्हारा मन अपने पति से मिलने की पुनः आशा न रह जाने के कारण उपेक्षामय होते हुए भी, अकारण ही निर्वासित होने से महा दुखदायी दीर्घ वियोग के उपरान्त अकस्मात् पति से भेंट हो जाने के कारण नितान्त स्तब्ध है, राम के सहज सौजन्य से प्रसन्न और प्रियतम के विरह-विलाप के कारण अत्यन्त शोकाकुल हो रहा है। यहां पर इस पद्य में कवि ने एक भाव का उदय और दूसरे का लय दिखाने में अपना मनोहर काव्य-चातुर्य प्रकट किया है। व्यंग का चित्रण करने में भी कवि बहुत निपुण हैं। प्रथम अंक में महाराज रामचन्द्र के लिए 'नूतन राजा' शब्द का प्रयोग यह सिद्ध करता है कि वह कुछ भी आदेश दे सकते हैं जिसके पालन में किसी को अवज्ञा करने की तनिक भी आवश्यकता नहीं। लव राम के विषय में जो व्यंग उपस्थित करते हैं वह निस्संदेह ही बड़ा मार्मिक है। राम के सम्बन्ध में उनकी सम्मति निम्नलिखित है-

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वृद्धास्ते न विचारणीयचरितास्तिष्ठन्तु हुं वर्तते सुन्दस्त्रीमथनेऽप्यकुण्ठयशसो लोके महान्तो हि ते। यानि त्रीणि कुतोमुखान्यपि पदान्यासन्खरयोधने यद्वा कौशलमिन्द्रसूनुनिधने तत्राप्यभिज्ञो जनः ॥-उत्तर ५।३४

श्रद्धास्पद महाराज रामचन्द्र जी वयोवृद्ध हैं। इस कारण उनके जीवन के संबंध में अधिक समालोचना करना अनुचित ही प्रतीत होता है। उनके गौरव का जितना ही वर्णन किया जाय कम है। सुंद की भार्या ताड़का का वध करने पर भी उनका विमल यश धवलित हो रहा है। खरदूषण जैसे राक्षस से युद्ध करते समय वह तीन पग पीछे हटे थे तथा बालि का वध करने पर भी उन्होंने जो अपार पुरुषार्थ दिखाया था उससे समस्त संसार परिचित ही है। राम के जीवन में पायी जानेवाली सभी न्यूनताओं का यहां निर्देश कर दिया गया है और तदनुसार सुन्दर व्यंग उपस्थित किया गया है। अर्थानुकूल ध्वनि उत्पन्न करने में भी वे कुशलहस्त थे। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, वे विदर्भ प्रदेश के निवासी थे। अतः वहां के समीपवर्ती कान्तारमय प्रदेशों का भवभूति के जीवन पर विशेष प्रभाव पड़ा जिस कारण उनको प्रकृति के रमणीय स्थलों का वर्णन करने में आशातीत सफलता मिली। झंझावात के दृश्यों का, रण-क्षेत्र के भयावह चित्रों का, शमशान के वीभत्स रूप का निरूपण करते समय उनकी पदावली अपनी भावात्मक प्रतिघ्वनि से पात्रों के हृदय पर वर्ण्य वस्तु का यथार्थ चित्रण प्रस्तुत कर देती है। भवभूति रसों का निरूपण करने में भी अतिशय चतुर थे। उनके तीनों ही नाटकों में तीन विभिन्न रसों की अद्भुद् अभिव्यक्ति हुई है। मालतीमाधव में शृंगार का, महावीर चरित में वीर रस का और उत्तर रामचरित में करुण रस का पूर्ण परिपाक मिलता है। नाट्य-शास्त्र के आचार्य भरत मुनि ने अपने नाट्य शास्त्र में यह नियम बनाया था कि नाटक का प्रधान रस शृंगार अथवा वीर ही होना चाहिए। भवभूति के पूर्ववर्ती प्रायः समस्त नाट्यकारों ने इस नाट्य-परंपरा का पूर्णंतः पालन किया है। परन्तु इस नियम के विपरीत भवभूति ने अपने सर्वोत्कृष्ट

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नाटक उत्तर-रामचरित में करुण रस को प्रधान रस के रूप में स्थापित कर अपनी काव्य-कीति को सदा के लिए अमर बना दिया है। रसों की इस प्राचीन परंपरा को माननेवाले कुछ आलोचक उत्तर-रामचरित को विप्रलंभ शृंगार के अन्तर्गत सिद्ध करने का असफल प्रयास करते हैं। परन्तु जब हम भवभूति के इस कथन पर विचार करते हैं कि करुण रस ही सब रसों में व्यापक है तथा अन्य आठ रस उसी के रूपान्तर हैं तो आलोचकों की यह धारणा सर्वथा निर्मूल हो जाती है। कवि ने करुण रस के विषय में स्वयं अपना मत इस प्रकार व्यक्त किया है-

एको रसः करुण एव निमित्तभेदाद् भिन्नः पृथकपृथगिवाश्रयते विवर्तान्। आवर्त बुदबुद्तरङ्गमयान्विकारान् अम्भो यथा सलिलमेव हि तत्समस्तम्॥-उत्तर० ३।४७

एक करुण रस ही प्रधान रस है तथा शृंगार, वीर आदि अन्य आठ रसों को वही जन्म देता है। ये रस करुण के ही पृथक्-पृथक रूप हैं। जिस प्रकार एक ही रूप वाला स्थिर जल बुलबुले और तरंगों के रूप में परिवर्तित होता रहता है उसी प्रकार एक करुण रस ही अन्य रसों का रूप धारण कर जल के समान ही अपनी नाना प्रकार की आकृतियों को प्रकट किया करता है। यह श्लोक समस्त उत्तर रामचरित नाटक का बीजमंत्र है जिसके आधार पर करुण रस की कवि द्वारा अद्भुद व्यञ्जना का दर्शन कराया गया है। नाटक का प्रत्येक अंक करुण रस की मार्मिक अभिव्यक्ति का प्रत्यक्ष उदाहरण है। प्रथम अंक में राम सीता को चित्र दर्शन करवाते हैं और उनको अपने अतीत दुःखों का स्मरण होता है। पंचवटी की ओर ध्यान आकृष्ट होते ही सीता और राम दोनों व्याकुल हो जाते हैं। इस चित्र-दर्शन के साथ पति-पत्नी के प्रगाढ़ अनुराग का प्रमाण भी मिलता है और भावी भीषण विरह की भी सूचना प्राप्त होती है। इस प्रकार निकट भविष्य में होनेवाले महा भयावह दृश्य के चिह्नों को प्रकट करने में कवि ने सचमुच ही अपनी मौलिकता का परिचय दिया है। दूसरे अंक में राम का पंचवटी में प्रवेश होता है तथा सीता के साथ अतीत कालीन घटनाओं का स्मरण

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कर उनकी व्याकुलता एवं विरह-वेदना द्विगुणित हो जाती है। उस समय राम कहते हैं-

चिराद्वेगारम्भी प्रसृत इव तीव्रो विषरसः कुतश्चित्संवेगात्प्रचल इव शल्यस्य शकलः। व्रणो रूढग्रन्थि: स्फुटित इव हृन्मर्मणि पुनः पुराभूतः शोको विकलयति मां नूतन इव ॥-उत्तर० २।२६ इस समय दीर्घ कालोपरान्त मेरी विरह वेदना अविलम्ब उत्पन्न हो रही है और सर्वत्र विष के समान तीव्र वेग से संधानित बाण के अग्र भाग के समान हृदय के मर्म स्थल में फोड़े की विकराल वेदना की भांति मुझे कष्ट पहुंचा रही है। मैं दारुण शोक के कारण मूच्छित-सा हुआ जा रहा हूँ। तृतीय अंक में करुण रस का अगाध सागर ही परिपूर्ण कर दिया गया है। इस अंक में भवभूति के करुण रस ने अपने विकास की चरम सीमा को स्पर्श कर लिया है। इसी अंक में राम और सीता का अल्पकालीन साक्षात्कार भी होता है और राम अपनी तत्कालीन मानसिक व्यथा का इस प्रकार वर्णन करते हैं-

आश्च्योतनं नु हरिचन्दनपल्लवानां निष्पीडितेन्दुकरकन्दलजो नु सेक:। आतप्तजीवितमनः परितर्पणोऽयं सञ्जीवनौषघिरसो हृदि नु प्रसक्तः ॥-उत्तर० ३।११

सीता के सहसा दर्शन से मेरे हृदय पर हरिचन्दन के पत्तों के रस का स्राव सा प्रतीत होता है। निचोड़ी हुई चन्द्रकिरण रूपी नवांकुरों का सिंचन सा किया गया है अथवा संतप्त जीवन और मन को प्रफुल्ल करनेवाली संजीवन औषधि के रस की मेरे ऊपर वर्षा की गयी हो। इस श्लोक में सीता के दर्शन के समय अकस्मात् राम की मानसिक दशा का बड़ा ही सुन्दर चित्र मिलता है। वासन्ती राम को वन में अतीत काल का स्मरण कराती हुई इस प्रकार कहती है-

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अस्मिश्नेव लतागृहे त्वमभवस्तन्मा्गदत्तेक्षणः सा हंसे: कृतकौतुका चिरमभूद् गोदावरी-सैकते। आयान्त्या परिदुर्मनायितमिव त्वां वीक्ष्य बद्धस्तया कातर्यादरविन्दकुड्मलनिभो मुग्धः प्रणामाञ्जलि:॥ -उत्तर० ३।३७

हे देव! यह वही लतागृह है जिसके द्वार पर स्थित होकर आप सीता की प्रतीक्षा कर रहे थे और सीता गोदावरी के तट पर खड़ी होकर हंसों के साथ मनोविनोद कर रही थी। कुछ कालोपरांत जब आपको उसने देखा तो कमल-कलियों के समान अपने हाथों को युक्त करके आपको सादर प्रणाम किया। इस उक्ति से करुण रस के सुकुमार प्रसंग की स्मृति में राम और सीता दोनों का ही शोक सहजतया उद्दीप्त हो जाता है। राम सीता के वियोग में अत्यधिक व्याकुल और शोक-संतप्त हो गये थे। सीता की निरवधि विरह-वेदना की कल्पना करते हुए उनका विचार स्मरणीय है-

उपायानां भावादविरलविनोदव्यतिकरे जनिता विमर्दे वीराणां जगति जमवीत्यदभुतरसः। वियोगो मुग्धाक्ष्या: स खलु रिपुघातावधिरभूत् कटुस्तूष्णीं सह्यो निरवधिरयं तु प्रविलयः।। -- उत्तर० ३।४४

सीता का पूर्व शोक जो कि रावण के हरण करने के उपरान्त उत्पन्न हुआ था, उपायों के प्रतिकार की विद्यमानता के कारण सतत मन लुभानेवाले सुग्रीव, हनुमान आदि वीरों की सहायता से युद्ध पर्यन्त ही सीमित था तथा जगत में अद्भुद् रस को उत्पन्न करके रावण रूपी शत्रु के विनाश से समाप्त हो गया परन्तु आधुनिक विरह- वेदना कठिन और प्रतिकार के अभाव में अनन्त है। आगे चल कर हनुमान और सुग्रीव जैसे वीरों की मित्रता को भी इसमें निरर्थक ही बताते हैं। इस प्रकार इस श्लोक में शोक और करुणा दोनों की ही मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है।

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१४८ संस्कृत नाटककार

चौथे अंक में भूतकाल के सुखदायी दिनों का स्मरण कर कौशल्या सीता के गतप्राण होने की कल्पना कर अतिशय करुण कन्दन करने लगती हैं। जनक जैसे ब्रह्मज्ञानी और कौशल्या जैसी विदुषी महिला को शोकाकुल देखकर प्रेक्षकों के हृदय में स्वाभाविक संवेदना जाग्रत हो जाती है। पांचवें अंक में चन्द्रकेतु और उनके सारथी सुमंत लव को रघुवंश के किसी अज्ञात कुलोत्पन्न वीर होने की कल्पना करते हैं। यह विचार आते ही सीता के अभाव के कारण वह दारुण शोक के वशीभूत हो अत्यधिक संतप्त हो जाते हैं। चंद्रकेतु और लव जैसे चचेरे भाइयों का बिना एक दूसरे को पहिचाने हुए युद्ध करना ही पर्याप्त करुणोत्पादक है। छठे अंक में राम का उनके पुत्र लव और कुश से प्रथम साक्षात्कार सहसा ही हो जाता है। पिता पुत्रों को न पहिचानते हुए भी एक विचित्र वात्सल्य रस का अनुभव करता है तथा उनकी आकृति में सीता के सौन्दर्य की छाप का अनुभव करके अति-शोकाकुल हो उठता है। इसी समय जब वह गर्भ-भार से व्याकुल सीता की पूर्वावस्था का स्मरण करता है तो उसकी वेदना और भी बढ़ जाती है। सातवां अंक भवभूति की इस रचना में रामायण के कथानक-परिवर्तन का प्रमुख रूप है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि इसी अंक में मूल कथा के दुःखांत होने के विरुद्ध नाटक का सुखांत पर्यवसान किया गया है। सीताराम का पुनर्मिलन इसी अंक में होता है जिसके मूल में सीता-निर्वासन का करुण अभिनय समाविष्ट है। इस चित्र को देख कर राम क्षुब्ध एवं वाष्पोत्पीडनिर्भर होकर मुहुर्मुहुः मूच्छित हो जाते हैं। यह अंक तीसरे अंक का नैसगिक चरमोत्कर्ष मात्र प्रतीत होता है एवं एक अपूर्व भाव-गाम्भीर्य के साथ-साथ करुण रस की सुखद मधुर परिणति में परि- वत्तित हो जाता है। भवभूति द्वारा उत्तर रामचरित में करुण रस को प्रधान बनाना संस्कृत नाटक साहित्य के इतिहास में एक अपूर्व घटना है। इस नूतन परिपाटी के जन्मदाता के रूप में भवभूति की बाद में बहुत ही प्रशंसा हुई है। गोवर्द्धनाचार्य ने भवभूति के करुण रस के संबंध में जो निम्न गर्वोक्ति की है वह निःसंदेह ही स्वर्णाक्षरों में लिखने योग्य है-

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भवभूति १४९

भवभूते: सम्बन्धाद भूधरभूरेव भारती भाति। एतत्कृतकारुण्ये किमन्यथा रोविति यावा॥-आ० स० १।३६

यह आर्या सप्तशती का श्लोक है जिसका तात्पर्य यह है कि भवभूति (कवि भवभूति या भगवान महादेव) के संबंध से सरस्वती पर्वतराज कन्या पार्वती के समान सुशोभित हो रही है क्योंकि जब भवभूति की वाणी अथवा पार्वती करुण भाव की व्यञ्जना या विलाप करती है तो चेतन प्राणियों की बात ही क्या, पाषाण जैसे जड़ पदार्थ भी करुण कंदन करने लगते ह। गोवर्द्धनाचार्य की इस उक्ति से उत्तर रामचरित की लोक प्रसिद्ध पंक्ति "अपि ग्रावा रोदित्यपि दलयति वज्त्रस्य हृदयम्।" १।२८ की ओर संकेत हुआ है।

भवभूति और कालिदास ये दोनों ही कलाकार संस्कृत साहित्य-क्षेत्र में अत्यन्त देदीप्यमान रत्न हैं, जिनकी किसी प्रकार भी उपेक्षा करना सरल नहीं है। भवभूति और कालिदास की श्रेष्ठता विषयक प्रश्न बड़ा ही विवादास्पद एवं जटिल हो गया है जिसका रूप निम्नलिखित श्लोक से विदित होता है-

"कवयः कालिवासाद्या भवभूतिर्महाकविः। तरवः पारिजाताद्याः स्नुहीवृक्षो महातरुः॥" भवभूति के समर्थकों का कथन है कि कालिदास आदि तो केवल कवि ही हैं परन्तु भवभूति महाकवि हैं। इसके विरुद्ध कालिदास के पक्षपाती यह मुँहतोड़ उत्तर देते हैं कि स्वर्ग लोक के प्रसिद्ध पारिजात कल्पवृक्षादि भी तो वृक्ष ही हैं पर स्नुही वृक्ष या सेहुंड़ अवश्य महा वृक्ष है। इस उक्ति से प्रतीत होता है कि इन कवियों की महानता विषयक विवाद अति प्राचीन है जिसका निर्णय करना अति दुष्कर है। इसमें कोई संदेह नहीं कि जन-साधारण में कालिदास की अपेक्षा भवभूति का बहुत कम प्रचार हुआ परन्तु केवल ख्याति ही महानता की द्योतक नहीं हो सकती। दोनों साहित्यकारों ने

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अपने-अपने क्षेत्रों में अद्भुद् चमत्कार दिखलाये हैं। कालिदास भवभूति के पूर्व- वर्ती थे अतः निःसंदेह ही भवभूति की रचनाओं पर कालिदास का प्रभाव होना स्वाभाविक था। अभिज्ञान शाकुन्तल में दुष्यन्त और भरत के अज्ञात मिलन के आधार पर भवभूति ने उत्तर-रामचरित में राम और लवकुश का अज्ञात मिलन अंकित किया है। भवभूति की शैली वर्णनात्मक है। उनका वर्णन पूर्ण एवं विस्तृत होता है। अतः पाठकों को कल्पना का किंचित् भी अवसर नहीं मिलता। कालिदास एक घटना का सूक्ष्म वर्णन करने के उपरांत शेष पाठकों की कल्पना के लिए छोड़ देते हैं जबकि भवभूति ने कहीं भी ऐसा अवसर प्रदान नहीं किया है। कालिदास की शैली वैदर्भी है, जबकि भवभूति की शैली गौड़ी और वैदर्भी का सम्मिश्रण है। इस प्रकार जब कालिदास एक ही शैली के आचार्य हैं भवभूति ने दो सर्वथा भिन्न प्रकार की शैलियों में अपना दिव्य पांडित्य प्रदर्शित किया है। यही कारण है कि अपेक्षाकृत ओज और शब्दाडंबर भवभूति की रचनाओं में अधिक मिलता हैं। उपमा की दृष्टि से भी इन दोनों महाकवियों ने सर्वथा भिन्न प्रकार की शैलियां अपनायी हैं। कालिदास किसी मूर्त पदार्थ की उपमा किसी मूर्त पदार्थ से ही देते हैं जिसका कि पाठकों के हृदय पर सहजता से ही प्रभाव पड़ जाता है। परन्तु भवभूति इसके प्रतिकूल मूर्त पदार्थो की उपमा भावात्मक विचारों एवं अमूर्त तत्त्वों से देते हैं जिसका समझना ही पाठकों के लिए कठिन हो जाता है। उत्तर-रामचरित के छठे अंक में वायु की उपमा विद्या से दी गयी है परन्तु कालिदास ने कहीं भी इस प्रकार की शैली नहीं अपनायी है। कालिदास ने अपनी रचना में विदूषक का समावेश कर उसे अधिक रोचक बनाने में सफलता प्राप्त की है। परन्तु भवभूति के रूपकों में उसका सर्वथा ही अभाव है। यह शैली भी कवि की मौलिक ही है! विदूषक के अभाव में ही भवभूति पर्याप्त नाट्य चातुरी प्रद्शित करने में सफल हुए, यह भी उनके लिए एक विशेष गौरव का लक्षेण है। इसमें कोई संदेह नहीं कि महाकवि कालिदास सुकुमार एवं कोमल भावों की अभिव्यञ्जना करने में भवभूति से कहीं अधिक श्रेष्ठ एवं महान् कवि हैं। इसी प्रकार यह कहना भी अनुपयक्त न होगा कि युद्ध की भयंकरता,

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भवभूति १५१

रमशान का वीभत्स चित्र उपस्थित करने में भवभूति ने मानवी मनोभावों के चित्रण में जैसा विशद अंकन प्रस्तुत किया है उस प्रकार करने में कालिदास सर्वथा असमर्थ रहे। शृंगार रस के क्षेत्र में कालिदास तथा करुण रस के क्षेत्र में भवभूति संस्कृत साहित्य में श्रेष्ठतम साहित्यकार हैं। इस प्रकार कालिदास और भवभूति संस्कृत साहित्य के दो महाकवियों की रचनाशैली की तुलना करने पर विदित होता है कि दोनों ही साहित्यकारों का कार्य-क्षेत्र सर्वथा अभिन्न नहीं है और दोनों ने ही अपने-अपने रचना-क्षेत्र में अलौकिक चमत्कार प्रकट किये हैं। इस विषय में हमारे लिए यह उल्लेख कर देना आवश्यक है कि कालिदास ने खंडकाव्य, महाकाव्य, गीतकाव्य, नाटक इत्यादि की रचना कर अपना काव्य-कौशल प्रकट किया है। परन्तु अभी तक भवभूति के रूपकों के अतिरिक्त अन्य साहित्य उपलब्ध न होने के कारण इस विषय में मत प्रदान करना सम्भव नहीं है कि सर्वतोमुखी प्रतिभा में दोनों में से कौन अद्वितीय है। 1 यह कहना टोकनहो को का उेदास मझान आह श्रौनो कर्िन नही मरस कते है। "उन को आ वह इस य का असर ही जाम का एसा माग जा नडीं ने बात है। का विदास समस मे शामाजिकन

और कपक नात, पाटका फो स कम स ाड

रोतं संदभे का कुशसो । शिष्यत इसे। कर प्रथाओं को प्राप्त को है। मुझे टेेक तरहसे मा इम है। के श्रंगत को पुसा को परदरतारररान