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10. १०. सम्राट् हर्षवर्धन

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१०. सम्राट् हर्षवर्धन

(राज्यकाल ६०६ से ६४८ ई०)

भारत में हर्षवर्घन स्थाणीश्वर एवं कान्यकुब्ज (आधुनिक कन्नौज) में राज्य करते थे। उनकी कीति तथा काव्य-कौमुदी जगद्विख्यात् है और आज भी विद्वद्- समाज में समुचित आदर प्राप्त कर रही है। उनका राज्यकाल सन् ६०६ से ६४८ ई० तक निर्विवाद ही है जो कि शिला और ताम्रपत्र लेखों की साक्षी से सिद्ध होता है। चीन का प्रसिद्ध यात्री ह्वेनसांग उनके दरबार में आया था और सन् ६३० से ६४५ ई० तक पन्द्रह वर्ष भारत में रहा। उसने हर्षकालीन राज्यव्यवस्था एवं उसके जीवन सम्बन्धी उपकरणों पर सविस्तार प्रकाश डाला है। हर्ष के राज- कवि बाण ने भी हर्षचरित नामक ग्रन्थ में सम्राट् की जीवन सम्बन्धी अनेक घट- नाओं का समावेश किया है। हर्ष एक देदीप्यमान सम्राट् और कुशल शासक होने के साथ ही साथ अद्वितीय साहित्यकार भी थे और उन्होंने स्वरचित नाटक- साहित्य में पर्याप्त काव्यकौशल प्रदशित किया है। उनकी तीन रचनाएं उपलब्ध होती हैं। लक्षण के अनुसार उनमें नागानन्द नाटक है तथा प्रियदर्शिका और रत्नावली नाटिकाएं हैं। इस प्रकरण में हम हर्ष की शासन सम्बन्धी व्यवस्था पर प्रकाश न डालते हुए उनकी नाटक-रचना सम्बन्धी प्रतिभा का विवेचन करने तक ही अपने को सीमित रखेंगे।

रचयिता के सम्बन्ध में मतभेद

इन रूपकों के रचयिता के विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है। पाश्चात्य विद्वानों का अनुमान है कि यह संभव प्रतीत नहीं होता कि हर्ष जैसा प्रतिभासम्पन्न सम्राट् अतुलित राज्य-कार्यों में व्यस्त रहता हुआ भी इतने उच्चकोटि के रूपकों

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का निर्माण करने में समर्थ हुआ हो। विद्वानों ने इस तीनों ग्रन्थों की भाषा, शैली एवं आकृति की तुलना करके यह प्रमाणित कर दिया है कि ये तीनों ही ग्रंथ एक लेखनी द्वारा प्रसूत हुए हैं। नागानंद तथा प्रियद्शिका में दो छन्द समान रूप से पाये जाते हैं जिनमें से एक रत्नावली में भी समाविष्ट है। तीनों ही ग्रन्थों की प्रस्तावना में नाट्यशास्त्र के नियम नुसार ग्रन्थकर्ता के रूप में हर्ष के नाम का स्पष्ट निर्देश है। मम्मट ने अपने विख्यात ग्रन्थ काव्यप्रकाश में धन-लाभ को भी काव्य का एक प्रयोजन माना है। उनकी उक्ति "श्रीहर्षादेर्धावकानामिव धनम्" पंक्ति पर विवेचना करते हुए कतिपय आलोचकों का मत है कि धावक ही उक्त रचनाओं के कर्ता होंगे। बाण ने अपने हर्षचरित में अपने आश्रयदाता की काव्य- प्रतिभा की बड़ी प्रशंसा की है। इत्सिंग ने हर्ष को नागानन्द का रचयिता स्वीकार किया है। जयदेव ने उन्हें कविता-कामिनी का हर्ष एवं सोड्ढल ने गीर्हर्ष की उपाधि से विभूषित किया है। कीथ का इन नाटक ग्रन्थों के विषय में मत है कि इनमें कहीं भी हर्ष के राज्य में घटित किसी घटना का उल्लेख नहीं है। अतः इनका कर्त्तृत्व सम्राट् के नाम से सम्बद्ध करना सर्वथा अनुचित है। उसकी धारणा है कि हर्ष के राजकवि बाण ने ही सम्भवतः इन ग्रन्थों की रचना की हो परन्तु जब हम बाण की अमर कृति हर्षचरित और कादम्बरी की शैलियों से इन ग्रन्थों की तुलना करते हैं तो भिन्नता स्पष्ट दिखाई पड़ जाती है। इस आधार पर बाण को इन रूपकों का कर्त्ता मानना सर्वथा निराधार एवं अनुचित ही प्रतीत होता है। कुछ विद्वानों की यह भी धारणा है कि ये ग्रन्थ सम्राट् ने अपने दरबार के विद्वानों की सहायता से निर्मित किये होंगे अथवा किसी अज्ञात कवि ने इन्हें रचा होगा जिसने अपनी कृति को सम्राट के नाम से प्रकाशित करने में अपने गौरव एवं यश का साधन समझा होगा। भारत का वर्चस्वी सम्राट् राजकीय शासन का आदर्श उपस्थित करते हुए साहित्य-क्षेत्र में भी अलौकिक चमत्कार दिखला सकता है। भारतवर्ष के महीपतियों की विलास- प्रियता पर दृष्टिपात करते हुए केवल कोरी कल्पना के आधार पर इस सत्य का पश्चिमीय विद्वानों द्वारा अस्वीकार किया जाना किसी भी प्रकार से उचित नहीं है।

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के विवाह का अभिनय किया जाता है। नाटक में वत्सराज स्वयम् अपना भाग लेते हैं परन्तु वासवदत्ता का भाग आरण्यका द्वारा अभिनीत किया जाता है। यह नाटक का पात्र-विभाजन केवल अभिनय की दृष्टि से दर्शकों का मनोरंजन मात्र न रहकर वास्तविक हो जाता है तथा उन दोनों का प्रेम प्रत्यक्ष होकर सर्वविदित हो जाता है। यह दृश्य देखकर वासवदत्ता के हाथों से तोते उड़ जाते हैं और उसका महाविकराल क्रोधानल उद्दीप्त हो जाता है। चतुर्थ अंक में ईर्ष्या के वशीभूत हो वासवदत्ता के आदेशानुसार आरण्यका बंदी बनाकर कारावास में भेज दी जाती है। इस अवसर पर आरण्यका के पिता महाराज दृढ़वर्मा द्वारा वत्सराज की सहायता से कलिंग नरेश के परास्त किये जाने का शुभ समाचार मिलता है। वासवदत्ता की दासी आरण्यका के विषय में भी सत्यता प्रकट होती है कि वह राजकुमारी प्रियदर्शिका से भिन्न नहीं है। वासवदत्ता अपने कृत्य पर पाश्चात्ताप करती है। राजकुमारी प्रियदर्शिका और उदयन का परिणय इसी अवसर पर समारोह-पूर्वक सम्पन्न होता है।

रत्नावली

चार अंकों की इस नाटिका में महाराज उदयन और सिंहल देश की राज- कुमारी रत्नावली की प्रेमकथा का वर्णन है। उदयन के मंत्री यौगन्धरायण का ज्योतिषियों की वाणी के आधार पर यह विश्वास था कि राज्य की समृद्धि के लिए राजकुमारी रत्नावली का उदयन के साथ परिणय होना आवश्यक है। वासव- दत्ता की विद्यमानता में यह कार्य अत्यन्त कठिन समझ यह मिथ्या वृत्तांत प्रकाशित कर दिया गया कि वासवदत्ता का अग्नि से जलने के कारण प्राणान्त हो गया है। सिंहल-नरेश यह समाचार अवगत कर अपनी पुत्री रत्नावली को मंत्री वसुमति और कंचुकी के साथ वत्स-नरेश उदयन के समीप प्रणयार्थ प्रेषित करते हैं। समुद्र में जहाज के टूट जाने के कारण एक भीषण दुर्घटना हो जाती है तथा कोशम्बी नामक एक व्यापारी की सहायता से राजकुमारी की रक्षा की जाती है। एक आपत्तिग्रस्त अबला के रूप में रत्नावली वासवदत्ता की शरण में आश्रय प्राप्त करती है तथा परिस्थितिवश सागरिका के नाम से उनके वहां परिचारिका का कार्य स्वीकार

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करती है। उसकी सुन्दरता पर मुग्ध होकर वासवदत्ता उस महाराज से सर्वथा पृथक् ही रखने का निश्चय करती है। एक बार वसन्त ऋतु के सुहावने अवसर पर वासवदत्ता अपने पति वत्सराज के साथ मदन महोत्सव मनाने को उद्यत होती है। संयोगवश सागरिका वहां पहुंच जाती है और उसका महाराज से प्रथम साक्षा- त्कार होता है। सागरिका उदयन को कामदेव की प्रत्यक्ष मूर्ति समझती है। संध्या हो जाने के कारण उन दोनों के मिलन का अधिक अवसर नहीं मिल पाता। द्वितीय अंक में सागरिका का अपनी सखी सुसंगता के साथ ही प्रवेश होता है। सागरिका अपनी सखी से उदयन के प्रति अपनी प्रेमविषयक मनःकामना व्यक्त करती है। दोनों सखियां स्वच्छन्दतापूर्वक संलाप कर ही रही थीं कि अकस्मात् सागरिका के संरक्षण में राजदरबार का एक बन्दर कपिशाला से मुक्त हो जाता है और भाग जाता है। उसके भागने में पिंजड़ा भी टूट जाता है और इस प्रकार उसमें बन्द तोता भी उड़ जाता है। यह कोलाहल सुनकर राजा और विदूषक दोनों ही घटनास्थल पर उपस्थित होते हैं। सुसंगता इसे सुअवसर समझ कर तत्काल ही उन दोनो प्रेमियों के स्वच्छन्दतापूर्वक मिलन की व्यवस्था कर देती है। उनको परस्पर समय बिताते अधिक देर नहीं हो पाती कि अकस्मात् वासवदत्ता आ पहुंचती है और अपना उग्र कोप प्रकट किये बिना ही प्रस्थान कर देती है। तृतीय अंक में विदूषक दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं के मिलन हेतु एक रोचक षड्यन्त्र रचता है, वह यह कि सागरिका वासवदत्ता के तथा सुसंगिता सागरिका के वस्त्र धारण कर महाराज से मिले। यह षड्यन्त्र वासवदत्ता सुन लेती है और सतर्क रहती है। अपने को छोड़ कर अन्य कामिनी पर पति की अभिलाषा जान कर कुद्ध भी होती है। कुछ देर के उपरान्त सागरिका का प्रवेश होता है। उदयन उसे सहसा देखकर वासवदत्ता समझता है और कुछ क्षणों के लिए भयभीत सा हो जाता है परन्तु जब उसे इस त्रुटि का बोध होता है तो दोनों को ही एक अलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। पति को प्रसन्न करने के हेतु वासवदत्ता का इस अवसर पर प्रवेश होता है परन्तु उन दोनों प्रेमी-प्रेमिकाओं को देखकर उसके क्रोध का पारावार नहीं रहता। चतुर्थ अंक में वासवदत्ता का क्रोध अपना विकरालतम रूप धारण कर लेता

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है जिसके वशीभूत हो वह सागरिका को कारावास का दंड देती है और राजा की प्रेमिका तक को साधारण बन्दियों की भांति बंदीगृह की यातनाएँ सहन करनी पड़ती हैं। इतने में एक शुभ सूचना प्राप्त होती है कि मंत्री रूमणवान् ने कौशल नरेश का वध करके विजय प्राप्त कर ली है। इसी समय एक इन्द्रजालिक या जादू- गर का प्रवेश होता है जिसे राजदरबार में अपने चमत्कारों को दिखाने का पर्याप्त अवसर प्रदान किया जाता है। समुद्र की दुर्घटना से बच कर वसुभूति आदि मंत्रियों के आगमन से उस इन्द्रजालिक की क्रियाओं में विघ्न पड़ता है। इस समय सागरिका उसके अन्दर ही विद्यमान है। भयभीत होकर वासवदत्ता इसकी सूचना उदयन को देती है और वह उसकी ओर भागता है। उसके ऐसा करते ही अग्नि समाप्त हो जाती है और यह विदित होता है कि यह ऐन्द्रजालिक चमत्कार के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। इसी अवसर पर वसुभूति का सागरिका से साक्षा- त्कार होता है और वह उसे सिंहल नरेश की राजकुमारी रत्नावली घोषित करता है। यौगन्धरायण का प्रवेश होता है और वह षड्यन्त्र का महत्त्व बताता है। वासवदत्ता प्रसन्नतापूर्वक रत्नावली को भी अपनी सपत्नी स्वीकार करती है और उन तीनों का शेष जीवन प्रसन्नतापूर्वक व्यतीत होता है।

नागानंद

प्रियदर्शिका और रत्नावली नाटिकाओं से भिन्न नागानंद पांच अंकों का एक नाटक है और उसका कथानक भी दोनों से भिन्न है। यह बेतालपंचविशति और बृहत्कथा में पायी जानेवाली एक बौद्ध कथा के आधार पर लिखा गया है। इस ग्रन्थ के पूर्वार्ध में विद्याधर कुमार जीमूतवाहन और सिद्ध कन्या मलयवती की प्रेमकथा का रोचक वर्णन समाविष्ट है। उत्तरार्द्ध में जीमूतवाहन द्वारा गरुड़ के सर्प-भक्षण-त्याग की रोचक ढंग से शिक्षा दी गयी है। प्रथम अंक में विद्याधर कुमार जीमूतवाहन और सिद्धकुमार मित्रवसु में मित्रता होती है। मित्रवस की भगिनी का नाम मलयवती है। एक रात्रि को सोते समय मलयवती स्वप्न देखती है जिसमें गौरी जीमूतवाहन को ही उसका भावी पति घोषित करती है। रात्रि के स्वप्न का हाल अपनी सखी को बताते

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समय मलयवती की गुप्त वार्ता को जीमूतवाहन एक समीपवर्ती झाड़ी में छिपा हुआ सुन लेता है और सहसा उसके प्रति आसक्त हो जाता है। विदूषक उनके मिलन की व्यवस्था करता है। परन्तु अकस्मात् ही एक संन्यासी के आ जाने से उनकी वार्ता अवरुद्ध हो जाती है। द्वितीय अंक में मलयवती कामाकुल दशा में चित्रित की गयी है। इधर जीमूत- वाहन की दशा उससे भी अधिक चिन्तनीय है। मित्रवसु का आगमन होता है और उसे अपनी बहिन मलयवती की मानसिक व्यथा का बोध होता है। मित्रवसु बहिन का विवाह अन्य किसी राजा के साथ करना चाहता है परन्तु वह ऐसा करने को प्रस्तुत नहीं है। यह सूचना पाकर वह प्राणान्त करने का निश्चय करती है परन्तु सखियों द्वारा ऐसा नृशंस कृत्य करने से रोक दी जाती है। जीमूतवाहन का प्रवेश होता है और वह अपनी प्रेमिका से मिलता है। इसी समय मित्रवसु को यह विदित होता है कि उसकी बहिन का प्रेमी उसका अभिन्न मित्र जीमूतवाहन ही है। यह जानकर वह प्रसंन्नतापूर्वक उन दोनों का विवाह सम्पन्न कर देता है। तृतीय और चतुर्थ अंक में नाटक का कथानक परिवर्तित होता है। जीमूत- वाहन और मित्रवसु एक दिन साथ-साथ भ्रमण करने को निकलते हैं और मार्ग में सहसा ही तत्काल वध किये हुए सर्पों की हड्डियों का ढेर देखते हैं। एक दिव्य पक्षी गरुड़ को नित्य सर्पों की भेंट चढ़ायी जाती है और उन्हीं की हड्डियों का यह ढेर है। यह वृत्तांत अवगत कर जीमूतवाहन को बहुत दुःख होता है। वह मित्र- वसु को एकाकी छोड़कर बलिदान के स्थान पर पहुंचता है। उस दिन शंखचूड की बारी है। अतः उसकी माता अतिशय करुण ऋन्दन करती हुई विलाप कर रही है। जीमूतवाहन निश्चय करता है कि मैं स्वयं अपने प्राणों का बलिदान करके भी इस हत्याकांड को रोकूंगा। पंचम अंक में जीमूतवाहन मन्दिर में प्रवेश करने के उपरान्त बाहर आता है और पूर्व निश्चयानुसार बलिदान के स्थान पर पहुंच जाता है। उसके माता-पिता और पत्नी मलयवती यह निश्चय ज्ञात कर उद्विग्न हो जाते हैं। वह बलिदान के स्थान पर पहुंचता है और अपने प्राण गरुड़ की भेंट कर देता है। गौरी और जीमूत-

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वाहन विलाप करते हुए माता-पिता को देखते हैं। वह अपने तपोबल के प्रभाव से उसे पुनः जीवित कर देती हैं। अन्य सर्प भी इस प्रकार पुनर्जीवित हो जाते हैं। इस अवसर पर महात्मा गौतम बुद्ध के आदेशानुसार गरुड़ भविष्य में किसी सर्प का वध न कर अहिंसात्मक जीवन व्यतीत करने का प्रण करता है और इस प्रकार ग्रन्थ की समाप्ति होती है। रचनाकौशल

प्रियदर्शिका सम्राट् की प्रथम कृति है। रत्नावली यद्यपि उनकी अंतिम कृति नहीं है, उसमें उनके नाटक-रचना-कौशल का पूर्ण परिपाक मिलता है। प्रियद्शिका और रत्नावली दोनों ही नाटिकाओं के नायक वत्सराज उदयन हैं जो कि दशरूपक- कार धनंजय के मतानुसार धीरललित हैं। दोनों ही ग्रंथों में शृंगाररस प्रधान है और नायक व नायिका क्रमशः महाराज उदयन और वासवदत्ता हैं। इनके समावेश करने से पता चलता है कि प्राचीन महाकवि भास की रचनाओं का सम्राट् पर विशेष प्रभाव पड़ा था। भास ने वासवदत्ता का प्रेम केवल पति के हित में ही खींचा है। वह अनेकों विपत्तियां सहन करके भी पति को समृद्धशाली बनाती है, जब कि हर्ष की वासवदत्ता स्वार्थ और लोभ की जाग्रत मूर्ति है। वह अपने पति का किसी अन्य कामिनी पर दृष्टिपात तक करना अपना घोर अनादर एवं अपमान समझती है। दोनों ही नाटिकाओं में नायिका डाह एवं ईर्ष्या का प्रत्यक्ष उदाहरण है। कन्याओं के विवाह उस समय पिता द्वारा ही निश्चित कर दिये जाते थे। ऐसा इन नाटिकाओं के अध्ययन से पता चलता है। महाराज दृढ़वर्मा के आज्ञानुसार प्रियदर्शिका का और सिंहल-नरेश के निश्चयानुसार रत्नावली का परिणय दोनों ही ग्रंथों में उदयन के साथ सम्पन्न होता है। इससे विदित होता है कि उस काल में विवाह के निश्चय करने में माता-पिता का विशेष भाग रहता था। दोनों ही नाटिकाओं में शृंगाररस की मार्मिक अभिव्यक्ति हुई है। कवि की सर्वोत्कृष्ट रचना के रूप में रत्नावली में इस रस के उदाहरण उल्लेखनीय हैं, यथा स्रस्त: स्रग्दामशोभां त्यजति विरचितामाकुल: केशपाश: क्षीवाया नूपुरौ व द्विगुणतरमिमौ कन्वतः पावलग्नौ।

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व्यस्तः कम्पानुबन्धावनवरतमुरो हन्ति हारोऽयमस्या: कीडन्स्या पीडयव स्तनभरविनमन्मध्यमङ्गानपेक्षम्।। -रत्ना० १।१६

यह श्लोक प्रथम अंक में मदन महोत्सव के अवसर पर महाराज वत्सराज द्वारा स्त्रियों की करीड़ा का वर्णन करते हुए विदूषक के प्रति कहा गया है। करीड़ा करते समय कामिनी के खुले हुए केश-कलापों में पुष्पों की माला केशों से भी अधिक सुशोभित है। वसन्त ऋतु के इस महोत्सव में मधुर रस पान से मस्त स्त्री के चरणों में सुशोभित पायजेबें दूनी झंकार कर मन को प्रफुल्ल कर रही हैं। नृत्य में रत इस दूसरी युवती के गले का हार सतत कांपने के कारण वक्षस्थल पर लगता रहता है। यह भार मानों स्तनों के भार से झुके हुए कटि भाग की अपेक्षा न करनेवाले वक्षस्थल के लिए दंड-रूप है। एक और उदाहरण देखिए-

"परिम्लानं पीनस्तनजघनसङ्गादुभयत ... स्तनोर्न्मध्यस्यान्त: परिमलमनुप्राप्य हरितम्। इदं व्यस्तन्यासं इलथभुजलताक्षेपवलनैः कृशाङग्या: सन्तापं वदत नलिनीपत्रशयनम्॥" -- रत्ना० २।११

द्वितीय अंक में कमलपत्र के बिछौने पर लेटी हुई सागरिका को देखकर विदूषक की सम्मति, कि यह कामातुर है, की पुष्टि करते हुए उदयन का कथन है कि हे विदूषक! ऊंचे स्तनों व जंघाओं की रगड़ से दोनों ओर कुम्हलायी हुई और पतली कमर के मध्य भाग में नहीं छू जाने से हरी, विरह के संताप के कारण शिथिल, लतारूपी भुजाओं के फेंकने से चारों ओर उलटी-पुलटी यह कमलिनी के पत्तों की शैया कोमलांगी सागरिका की मानसिक व्यथा को सहज रूप से ही व्यक्त करती है। इन दोनों ही श्लोकों में वत्सराज उदयन ने अपनी दोनों प्रेमिकाओं का कितना

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मार्मिक शृंगारिक चित्रण किया है। वसन्त के अवसर पर मदन महोत्सव मनाया जा रहा है। उस समय कामिनी की चाल और अंगों की छबि दर्शनीय है। सागरिका की मनोव्यथा को पहिचानने में भी कवि शृंगार रस में अपनी आश्चर्यजनक प्रवीणता प्रकट करता है। प्रकृति की अपूर्व छटा का वर्णन करने में सम्राट् कुशल हैं। एक रमणीय उद्यान में विदूषक के साथ भ्रमण करते हुए महाराज उदयन बकुल वृक्ष की मनो- हर छवि का वर्णन करते हुए कहते हैं-

"मूले गण्डरषसेकासव इव बकुलर्वास्यते पुष्पवृष्टया मध्वाताम्े तरुणया मुखशशिनि चिराच्चम्पकान्यद्य भान्ति। आकर्ण्याशोकपादाहतिषु रसता निर्भरं नूपुराणां ... झंकारस्यानुगीतेरनुकरणभिवारम्यते भृंगसार्थे:।।" -- रत्ना० १।१८ सुमनोहर बकुलवृक्ष की जड़ में जो पुष्पों की मनोहर वृष्टि हो रही है जो रमणियों के मध्य के कुल्ले के समान सुशोभित है वह तरुणी के मुखचन्द्र के समान चम्पा के पुष्प की सी शोभा प्रदान कर रही है। भ्रमरों के झुंड अशोक के तरुओं के पदाघात से अत्यन्त शब्दायमान पायजेबों का शब्द सुन कर मानों झंकारने की सुमनोहर ध्वनि की नकल कर रहे हैं। वृक्ष के वर्णन में कवि ने एक विशेष प्रयोजन सिद्ध किया है। प्रकृति के विभिन्न पदार्थों की कामिनी के अंगों से तुलना करके प्रकृति की स्वतः भूत अनुभव छबि में रोचक शृंगारिकता प्रदान की गयी है। युद्ध के भयावह वर्णन में भी कवि ने अपनी विशेष कुशलता का प्रदर्शन किया है। कौशल-विजय के अनन्तर विजयवर्मा राजा को युद्ध का वृत्तांत सुनाता हुआ कहता है- "अस्तव्यस्तशिरस्त्रशस्त्रकषणे कृत्तोत्तमांगेक्षणं व्यूढासकसरिति स्वनत्प्रहरणे वमोईवमइवह्निनि। आहूयाजिमुखे स कोशलपतिर्भग्ने प्रधाने बले ... एकनेव रूमण्वता शरशतर्मत्तडिवपस्थो हतः॥" -- रत्ना० ४६

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रूमण्वान् द्वारा युद्ध में कौशल देश की सेना को चारों ओर से घेरने के उप- रान्त शस्त्रों के प्रहार एवं कवचों के आघात से कटाकट शिर कटने लगे। अतः उस स्थान पर प्रबल वेग से रक्तरंजित लाल-लाल सरिताएँ प्रवाहित होने लगीं और उसमें बहुत ही शीघ्र, शस्त्र शब्दायमान होने लगे एवं कवचों से अग्नि प्रज्व- लित होने लगी। इस प्रकार की परम भीषणता से युक्त संग्राम के आरंभ होते ही उस कौशलाधिपति की प्रधान सेना मारी गयी। इस श्लोक में हर्ष की लेखनी की अलौकिक वर्णन करने की शक्ति स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होती है। युद्ध-वर्णन में प्रवीणता दिखाने के अतिरिक्त उन्होंने प्रकृति के अनुपम दृश्य यथा वन, मलयाचल, प्रातः, संध्या, आश्रम, उद्यान, नदी, पर्वत, अग्नि इत्यादि प्राकृतिक उपकरणों का मनोरम स्वाभाविक वर्णन पाठकों के समक्ष निरूपित किया है। चतुर्थ अंक में इन्द्रजालिक द्वारा सागरिका को दग्ध होते हुए देखकर उदयन कहते हैं-

"विरम विरम ! वह्ने मुञ्च धूमानुबन्घम् प्रकटयसि किमुच्चेरच्चिषां चक्रवालम्। विरह हुतभुजाहं यो न दग्धः प्रियायाः प्रलयदहनभासा तस्य किं त्वं करोषि॥" -- रत्ना० ४।१६

हे अग्नि ! तुम बुझ जाओ और धुएं का निकालना त्याग दो। तुम किस कारण ज्वालाओं के समूह को प्रकट कर रहे हो। तुम्हारे इस कार्य से मुझे तनिक भी हानि होने की संभावना नहीं है। जब मुझे प्रिय सागरिका के विरह की अग्नि दग्ध करने में समर्थ न हो सकी तो प्रलय के समान प्रचण्ड तेज तुम मेरा क्या कर सकते हो। अर्थात् इस विषय में तुम बिल्कुल सामर्थ्यंहीन हो और कुछ नहीं कर सकते। अग्नि के संबोधन में उदयन की यह उक्ति उसके प्राकृतिक वर्णन के साथ- साथ उनकी मानसिक व्यथा का भी स्पष्ट निरूपण करती है। यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि नागानंद दोनों ही नाटिकाओं से भिन्न एक बौद्ध आख्यान के आधार पर रचा हुआ नाटक है। प्रथम दो अंकों में जीमूत-

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वाहन और मलयवती की प्रणय-कथा का समावेश होने से कथानक बहुत भिन्न नहीं कहा जा सकता। अन्तिम तीन अंकों में जीमूतवाहन की प्रेरणा द्वारा गरुड़ के सर्प-भक्षण-त्याग की कथा का वर्णन है। यद्यपि एक प्रणय-कथा का नाटक में समावेश है पर उसका स्थान गौण ही है। बौद्ध आख्यान व जीमूतवाहन का आत्म- त्याग ही ग्रन्थ का प्रधान विषय है। इसमें हर्ष ने दया, दान, धर्म, आत्मत्याग आदि भावों का यथावत् निरूपण किया है। नाटकीय दृष्टि से कवि को इस ग्रन्थ की रचना में पर्याप्त सफलता नहीं मिली। दोनों नाटिकाओं के समान ही इसमें मनोहर और प्रसादपूर्ण भाषा का समावेश है। प्रथम दो अंकों में प्रणय-प्रसंग में शृंगार रस का यथावत् निरूपण हुआ है। उसके साथ-साथ कतिपय स्थानों पर करुण रस की सुन्दर व्यञ्जना की गयी है। जीमूतवाहन की मृत्यु के अवसर पर उसके वृद्ध पिता करुणाजनक विलाप करते हुए कहते हैं- "निराधारं धैयं कमिव शरणं यातु विनयः क्षमः क्षान्ति वोढूं क इह ? विरता दानपरता। इवं सत्यं नूनं व्रजतु कृपणा क्वाद्य करुणा जगज्जातं शून्यं त्वयि तनय लोकान्तर गते॥" -- नागा० ५।३१ हे पुत्र ! तुम्हारे स्वर्गवासी होने पर धर्यं बिना आधार का हो गया है। विनय अब किसकी शरण ग्रहण करे ? क्षमा को अब कौन धारण करेगा? दानशीलता उठ गयी। वह सत्य भी चल बसा। निःसहाय करुणा अब किस स्थान का आश्रय ग्रहण करे ? तुम्हारे बिना तो समस्त संसार सूना हो गया। मौलिकता की दृष्टि से इन कथानकों पर विचार करने से विदित होता है कि हर्ष पर कालिदास की नाट्यकला का पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। कवि ने अपनी रचनाओं को ऐसा रूप दिया है कि वे मौलिक ही प्रतीत होती हैं। रत्नावली में तोते और बन्दर के छुट जाने वाली घटना पर मालविकाग्निमित्र का प्रभाव स्पष्ट लक्षित होता है। हर्ष ने अपने ग्रन्थों में इतने विविध प्रकार के नाट्यशास्त्रीय नियमों का पालन किया है कि दशरूपककार धनंजय ने अपने अमर ग्रन्थ दशरूपक में साधारणतः हर्ष की समस्त रचनाओं से एवं मुख्यतः रत्नावली से अनेकों श्लोक उदाहरणरूप में उब्धृत किये हैं।