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9. ९. अश्वघोष

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९. अश्वघोष

(प्रथम और द्वितीय शताब्दी ई०)

महाकवि अश्वघोष संस्कृत साहित्य में प्रथम बौद्ध नाटककार हैं जिनके समय के विषय में बहुत कुछ निश्चित प्रमाण उपलब्ध होते हैं। आप प्रसिद्ध बौद्ध सम्राट् कनिष्क के राजगुरु एवं आश्रित राजकवि थे। कनिष्क का राज्यकाल सन् ७८ से १२० ई० तक निश्चित ही है, जैसा कि प्रचलित शक संवत् से पता चलता है जो कि सम्राट के राज्यारूढ़ होने के अवसर पर प्रचलित किया गया था। हर्ष का विषय है कि हाल में ही हमारी भारत सरकार ने इस संवत् को अपना कर देश के इस प्राचीन समृद्धशाली सम्राट् के प्रति अपना समुचित आदर व्यक्त किया है। अतः अश्वघोष का समय प्रथम शताब्दी का अन्त तथा द्वितीय शताब्दी का प्रारम्भ है। अश्वघोष ने पद्यकाव्य और नाटक-साहित्य दोनों में ही सामान्य रीति से काव्य-प्रतिभा का दिग्दर्शन कराया है। उन्होंने सौन्दरनन्द तथा बुद्ध-चरित नामक दो महाकाव्य ग्रन्थों की रचना की है। सन् १६१० ई० में लूडर्स नामक एक पाश्चात्य विद्वान् को मध्य एशिया के तुरफान नामक स्थान में प्राचीन हस्त- लिखित लेखों की खोज करते हुए प्राचीन लेखों का एक वृहद् समुदाय उपलब्ध हुआ जिसमें तीन रूपक भी पाये गये हैं। उनमें से एक का नाम शारिपुत्र प्रकरण है। दो ग्रन्थ अपूर्ण दशा में उपलब्ध हुए हैं जिनके नाम एवं रचनाक्रम तक का ठीक पता नहीं चलता। अश्वघोष बौद्ध धर्म के कटर अनुयायी थे इसलिए उनकी रचनाओं पर बौद्ध धर्म एवं महात्मा गौतम बुद्ध के उपदेशों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। शारिपुत्र प्रकरण एक प्रकार का संस्कृत रूपक है जिसका पूरा नाम शारद्बपुत्र प्रकरण है। जिस हस्तलेख संग्रह में यह ग्रंथ प्राप्त हुआ है, सौभाग्यवश उसमें कर्त्ता के नाम का

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स्पष्ट उल्लेख है जो कि ग्रंथ के अंत में किया गया है। इस प्रकरण में ६ अंक उप- लब्ध होते हैं। इसमें महात्मा गौतम बुद्ध द्वारा शारिपुत्र और मौद्गलायन नामक दो युवकों की बौद्ध धर्म में दीक्षित होने की प्रथा का रोचक वर्णन है।

कथानक

इस ग्रंथ का कथानक इस प्रकार है- विदूषक के प्रश्न करने पर शारिपुत्र और अश्वजित् नामक दो युवकों में पर- स्पर विवाद होता है। प्रश्न यह है कि महात्मा गौतम बुद्ध क्षत्रियकुल-उत्पन्न हैं, क्या उनसे शारिपुत्र जैसे ब्राह्मण कुलोत्पन्न युवक के लिए शिक्षा ग्रहण करना उचित है। शारिपुत्र इस प्रश्न का अत्यन्त संतोषजनक उचित उत्तर देता हुआ कहता है, औषधि अपने गुण के अनुसार लाभ पहुंचाती है चाहे वह उच्च वर्ण के वैद्य या निम्न कोटि के चिकित्सक द्वारा दी गयी हो। इसी प्रकार बिना किसी वर्ण के भेदभाव के सदुपदेश भी समस्त मानव मात्र को लाभ पहुंचाता है। अतः उपदेष्टा के वर्ण का विचार न करते हुए प्रत्येक पुरुष से उपदेश ग्रहण करना चाहिए। यह विवाद सुन मौद्गलायन और शारिपुत्र दोनों महात्मा बुद्ध के समीप जाते हैं और दीक्षा ग्रहण करते हैं। महात्मा बुद्ध दोनों को अपना विशेष प्रकार का भिक्षु बनाते हैं। इस समय दोनों को ही महात्मा बुद्ध का दिव्य आशीर्वाद प्राप्त होता है। दोनों ही सर्वोत्तम ज्ञान प्राप्त करेंगे। यह शारिपुत्र प्रकरण अश्वघोष की विख्यात कृति बुद्धचरित से भी अधिक कलात्मक विशेषता प्रदर्शित करता है। दोनों ग्रंथों के समाप्त करने के ढंग की स्विस्तर तुलना करने पर भिन्नता स्पष्टतया द्योतित हो जाती है। बुद्धचरित में बुद्ध की वाणी भविष्यवाणी के रूप में समस्त बौद्ध अनुयायियों के लिए कल्याणकारी बतायी गयी है,जब कि शारिपुत्र प्रकरण में बुद्ध और शारिपुत्र के मध्य दार्शनिक वार्ता- लाप दिखाकर नवीन शिष्यों को आशीर्वाद देते हुए ग्रंथ की समाप्ति की गयी है।

भरतवाक्य की आकृति में भेद शारद्वत प्रकरण तथा संस्कृत साहित्य के अन्य नाटक ग्रंथों में भरतवाक्य

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की आकृति में भी पर्याप्त भेद है। भरतवाक्य के पूर्व "अतः परमपि प्रियमस्ति" अर्थात् इससे भी अधिक प्रिय है वाक्य अन्य नाटकों में पाया जाता है जिसका उत्तर नायक भरतवाक्य के रूप में देता है जो कि राष्ट्रीय कल्याण के हेतु परमेश्वर से प्रार्थना होती है। शारद्वत प्रकरण में इस प्रथा के विरुद्ध उपर्युक्त उल्लिखित वाक्य का प्रयोग नहीं है। भरतवाक्य भी नायक द्वारा प्रार्थना न होकर वन्दनीय महात्मा गौतम बुद्ध द्वारा दोनों नवदीक्षित शिष्यों के प्रति आशीर्वाद है। भरत- वाक्य की इस आकृति के कारण लूडर्स का अनुमान है कि अश्वघोष के समय तक रूपक को समाप्त करने की प्रचलित प्रथा का श्रीगणेश नहीं हुआ था। कीथ का मत है कि महात्मा बुद्ध के उपस्थित रहते हुए नायक द्वारा भरतवाक्य का प्रयोग करवाना कवि ने उचित नहीं समझा। इस प्रकार नायक से उच्चकोटि के पात्र द्वारा भरत- वाक्य के प्रयोग करने की परम्परा बाद में भी प्रचलित रही जिसके आधार पर भट्ट नारायण ने वेणीसंहार में नायक भीम से यह वाक्य न कहलवा कर धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा कहलवाया है। इस मत का मुख्य आधार कालिदास को गुप्त- कालीन पांचवीं शताब्दी ई० में मानना है। भारतीय विद्वानों ने अकाटय उक्तियों से कालिदास का समय प्रथम शताब्दी ई० पू० निर्णय कर दिया है। इस प्रकार अश्वघोष कालिदास के पश्चाद्वर्ती सिद्ध होते हैं, और लूडर्स का मत केवल एक कोरी कल्पना मात्र रह जाता है। नाट्य शास्त्र के प्रणेता आचार्य भरत मुनि के बताये हुए लक्षणों के अनुसार यह ग्रंथ एक विकसित प्रकरण है। इसमें ६ अंक हैं, यद्यपि शूद्रक-कृत मृच्छकटिक एवं महाकवि भवभूति-कृत मालती-माधव नामक प्रकरणों में दश अंक पाये जाते हैं। नायक शारिपुत्र भी शास्त्रानुसार ब्राह्मण ही है। रूपक के भिन्न- भिन्न पात्र अपनी योग्यतानुसार संस्कृत तथा प्राकृत का प्रयोग करते हैं। बुद्ध, श्रमनक एवं शारिपुत्र संस्कृत बोलते हैं जब कि विदूषक प्राकृत। विदूषक एवं अश्वजित को बुद्ध की शरण में लाकर शारिपुत्र ने उनके प्रति महान् परोपकार किया है। इस उदाहरण से भी बौद्धमतावलम्बियों को अपने- अपने सिद्धान्तों के प्रचार में प्रेरणा मिलती है जो कि अश्वघोष का सर्वोपरि लक्ष्य था।

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दो अन्य नाटक

लूडर्स द्वारा हस्तलिखित लेखों की खोज करते समय शारिपुत्र प्रकरण के साथ दो अन्य नाटक ग्रंथ भी मिले हैं। उनके कर्त्ता के विषय में अभी तक कुछ निश्चित रूप से ज्ञात नहीं हो सका है। एक साथ मिलने से विद्वानों ने उनको भी अश्वघोष की कृति होने का अनुमान लगाया है। शारिपुत्र प्रकरण तथा इन दोनों ग्रन्थों की आकृति एवं भाषा में भी कुछ साम्य अवश्य प्रतीत होता है। इसके अति- रिक्त इस मत की पुष्टि में अन्य कोई दूसरा प्रमाण नहीं दिया जा सका है। उन दोनों में से एक रूपक का कथानक कृष्ण मिश्र कृत प्रबोध चन्द्रोदय के समान है। इस ग्रंथ में धृति, कीर्ति, बुद्धि, ज्ञान, यश इत्यादि अमूर्त भावमय पदार्थों का, स्त्री एवं पुरुष पात्रों के रूप में चित्रित कर परस्पर वार्तालाप प्रदर्शित किया गया है। इन सब काल्पनिक पात्रों के मध्य बुद्ध पधारते हैं एवं धर्मोंपदेश करते हैं। ग्यारहवीं शताब्दी ई० में कृष्ण मिश्र द्वारा प्रबोध चन्द्रोदय नामक नाटक की रचना की गयी है। इसमें उपर्युक्त अमूर्त्तमय भावों को भिन्न-भिन्न स्त्री-पुरुष पात्रों में चित्रित कर वेदान्त का उपदेश किया गया है। यह निश्चित रूप से कहा नहीं जा सकता कि कृष्ण मिश्र ने स्वतः अपनी कल्पना वा मौलिकता के आधार पर इस ग्रंथ की रचना की अथवा अश्वघोष की कृति से कथानक का आधार लिया है। कल्पना के अति- रिक्त इस विषय में अन्य कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता। प्राचीन होने से अनुमान किया जा सकता है कि सम्भवतः कृष्ण मिश्र ने अपने कथानक का आधार अश्वघोष की कृति के अनुसार किया हो। इस ग्रन्थ के समस्त पात्र संस्कृत में ही वार्तालाप करते हैं। अत्यधिक अपूर्ण अवस्था में प्राप्त होने के कारण हम इस ग्रंथ की सामान्य रूप-रेखा चित्रित करने में भी असमर्थ हैं। दूसरे रूपक का कथानक अधिक रोचक है। इस रूपक की नायिका मगधवती है। कौमुद-गंध, विदूषक, सोमदत्त व दुष्ट अन्य पात्र हैं। नायक का कोई अन्य नाम से प्रयोग न करके नायक के नाम से ही उल्लेख किया गया है। धनञ्जय, दासी, भर्तृदारक या राजकुमार शारिपुत्र तथा मौद्गलायन भी इस ग्रंथ की शोभा बढ़ाते हैं। रूपक का बहुत ही अपूर्ण रूप हमें प्राप्त हुआ है जिस कारण हम यही निर्णय

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कर पाये हैं कि इस ग्रंथ में एक अद्भुत हास्य का पुट पाया जाता है, विदूषक जिसका प्रत्यक्ष उदाहरण है। शूद्रक-कृत मृच्छकटिक के समान ही नायिका का निवास- स्थान तथा एक जीर्ण उद्यान इस रूपक का मुख्य कार्यक्षेत्र है। विभिन्न पात्र बार- बार यानों पर चढ़ते उतरते हुए प्रदशित किये गये हैं। भरत नाट्यशास्त्र के अनुसार तीनों ही रूपकों में विदूषक ब्राह्मण और हास्यप्रिय है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि हर्षवर्द्धन-कृत नागानन्द पर अश्वघोष की कृति की पर्याप्त छाप लगी है, जिसमें बौद्ध धर्म के सिद्धांतों का सुन्दर प्रतिपादन किया गया है। इन रूपकों में प्रारम्भिक नान्दी व प्रस्तावना का पता नहीं चलता। अन्य रूपकों की भांति शारिपुत्र प्रकरण का आरम्भ सूत्रधार द्वारा अवश्य होता है। अश्वघोष की भाषा एवं शैली

नाटकशास्त्र के प्रचलित नियमों के अनुसार इन उपलब्ध रूपकों के विभिन्न पात्र स्वयोग्यतानुसार संस्कृत अथवा प्राकृत का प्रयोग करते हैं। बुद्ध, उनके शिष्य धनंजय एवं नायक संस्कृत का प्रयोग करते हैं जबकि स्त्री-पात्र श्रमनक, विदूषक एवं आजीवक प्राकृत-भाषी हैं। भावमय पात्रों वाले रूपक में भावों का बड़ी कुशलता से स्त्री और पुरुष पात्रों में विभाजन किया गया है। अश्वघोष ने अपनी कृति में जिस संस्कृत का प्रयोग किया है उसमें कतिपय शब्द तथा मुहावरे प्रचलित भाषा से भिन्न हैं। अर्थ के स्थान पर अर्त्थ का प्रयोग अधिक किया गया है जो चीज ब्रज तथा मथुरा के समीपवर्ती प्रदेशों की तत्कालीन भाषा से कुछ अभिन्नता द्योतित करती है। छन्द की लय पर विशेष ध्यान रखा है, जिसके कारण व्याकरणानुसार शुद्ध 'कृमि' के स्थान पर क्रीमि' का प्रयोग है। प्रद्वेशम के स्थान पर प्रदोषम् का प्रयोग है। उपर्युक्त सभी शब्द पाली के हैं जिनका कि अश्वघोष ने अपनी कृति में यथास्थान समावेश किया है। बुद्ध इसी पाली भाषा में उपदेश दिया करते थे। अश्वघोष जैसे बौद्ध मत के कट्टर अनुयायी पर उसके प्रवर्तक की भाषा का प्रभाव पड़ना स्वाभाविक ही था। अश्वघोष की संस्कृत भाषा के विषय में कुछ कहने के उपरांत उसके प्रंथों में पायी जानेवाली प्राकृत का भी संक्षेप में अवलोकन करना अनुचित न होगा।

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रंग-मंच पर अभिनय किये जानेवाले दृश्यों का वर्णन भी वार्तालाप द्वारा न दिखला कर विभिन्न पात्रानुकल संस्कृत तथा प्राकृत भाषाओं द्वारा दिखाया है। कवि की रचनाओं में तीन प्रकार की प्राकृत का अस्तित्व स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है जो कि कमशः दुष्ट, विदूषक व गोवाम द्वारा प्रयुक्त हुई है। दुष्ट द्वारा प्रयुक्त प्राकृत व्याकरणकारों की मागधी प्राकृत से समता प्रकट करती है। इसमें संस्कृत 'र' के स्थान में 'ल' हो जाता है। प्रथमा में अकारान्त एकवचन का एकारान्त बहुवचन हो जाता है। न का ण हो जाता है। कालिदास की रचनाओं में पायी जानेवाली भाषा से यह कुछ भिन्न है। संस्कृत के र्ज के स्थान पर य्य न होकर ज्ज होता है। क्षहक या स्कन हो क्ख होता है। ष्ट अथवा स्थ का रूप त्थ हो जाता है। रामगिरि पर्वत तथा जोगीमारा के समीप गुहा में लिख हुए अशोक-लेखों की भाषा से यह प्राकृत बहुत मिलती-जुलती है। नायक व मगधवती की कथावाले रूपक में गोवाम नामक एक काल्पनिक पात्र का भाग है जो अपनी अनुपम प्रकार की प्राकृत का उपयोग करता है। इसमें संस्कृत र के स्थान में ल हो जाता है। व्याकरण के अनुसार यह प्राकृत अर्द्धमागघी भाषा से बहुत मिलती है। इसके समान ही अश्वघोष के गोवाम की भाषा में मूर्धन्य वर्ण दन्त्य वर्ण हो जाते है अर्थात् संस्कृत टवर्ग का प्राकृत में उसी क्रमानुसार प्राकृत तवर्ग हो जाता है। न का प्राकृत ण नहीं किया जाता जो कि पश्चाद्वर्ती भाषा में प्रचलित है। अतः विद्वानों ने अश्वघोष की प्राकृत को विकास की प्राथ- मिक अवस्था का रूप बताया है। 'न' का परिवर्तित न होना पश्चाद्वर्ती मागधी प्राकृत से भिन्न है। इसलिए विद्वानों ने इस भाषा को प्राचीन मागधी का ही रूप माना है। अशोक के शिला-स्तम्भों में पायी जानेवाली भाषा से यह भिन्नता, समता दोनों ही प्रकट करती है। ल, स, ए तथा लम्बे स्वरों का प्रयोग करना दोनों ही भाषाओं में समान है। पायी जानेवाली भिन्नताओं में अकारान्त नपुंसक लिंग शब्दों के प्रथमांत व द्वितीयान्त बहुवचनों के रूप हैं। अशोकीय स्तम्भ-लेखों में संस्कृत के समान ही अनि जोड़कर यह रूप बनाया गया है, जब कि कवि ने प्राकृत में अमि जोड़कर यह प्रत्रिया पूर्ण की है। अशोक के समय में अर्द्धमागधी राजभाषा थी। जैन मत के उद्धारक महाबीर

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स्वामी तथा गौतम बुद्ध के समय में यही भाषा जनसाधारण के मध्य में प्रचलित थी. यद्यपि यह निर्णय करना कठिन है कि तत्कालीन प्रचलित भाषा व्याकरण के प्रचलित नियमों के अनुसार मागधी थी अथवा उससे कुछ भिन्न। भरत मुनि ने अनेक प्रकार की प्राकृत भिन्न-भिन्न पात्रों के द्वारा प्रयोग करने का विधान किया है। राजपूत, राजकुमार श्रेष्ठी, धनी एवं व्यापारी वर्ग अर्द्ध- मागधी (मागधी?) बोलते हैं जब कि राजभवन में निरंतर महिलाओं के समीप रहने वाले कर्मचारी, मद्य के दूकानदार खोदनेवाले व तहखाने में रहनेवाले व्यक्ति एवं संकटापन्न नायक के लिए अर्द्धमागधी का विधान है। दशरूपककार धनंजय के मतानुसार अर्द्धमागधी का प्रयोग निम्नकोटि के जन बिना किसी भेद- भाव के कर सकते हैं। भरत नाट्यशास्त्र के नियमानुसार नायिका शौरसेनी बोलती है। प्राश्य शौरसेनी का ही एक रूप है जिसका कि विदूषक के लिए विधान है। यह शौरसेनी से कुछ भिन्न है। अश्वघोष के रूपकों में इन दोनों प्राकृत भाषाओं में किंचिद- मात्र भी अन्तर न दिखाते हुए नायिका मगधवती एवं विदूषक सामान्य रीति से प्रयोग करते हैं। शौरसेनी से भी इसमें समता दृष्टिगोचर होती है। विदूषक द्वारा इस शौरसेनी प्राकृत के प्रमुख प्रयोग इस प्रकार हैं -- संस्कृत क्ष प्राकृत में छ न होकर क्ख हो जाता है,र द द्द हो जाता है। ज्ञ णण न होकर जूज हो जाता है। कतिपय संस्कृत शब्द इस प्राकृत में अपना अनूठा रूप धारण कर लेते हैं यथा भर्ता भट्टा, इव विअ, इयम् इयाम हो जाता है। इन विभिन्न प्राकृत भाषाओं में ऐतिहासिक एवं साहित्यिक दृष्टि से काव्य का रूप निर्धारण करने में अनुपम सहायता मिलती है। द्वितीय शताब्दी ईसवी के नासिक तथा कलिंग के शिलालेखों से यह भाषा पर्याप्त भिन्नता द्योतित करती है, इससे विदित होता है कि इस काल में प्रचलित लोकभाषा निरंतर परिवर्तनशील रही है। अश्वघोष बौद्ध दर्शन-साहित्य के प्रकाण्ड पंडित थे और पश्चाद्वर्ती बौद्ध साहित्य पर उनका आशातीत प्रभाव पड़ा। दुर्भाग्यवश बौद्ध मत के अन्य नाटक ग्रंथ काल की गति में समाप्त हो गये। हर्षवर्द्धन कृत नागानन्द ही एक मात्र अश्व-

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घोष की कृतियों के अतिरिक्त बौद्ध नाटक है जिस पर कि उसकी कृतियों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। बौद्धमत संसार में अपना विशिष्ट महत्त्व रखता है और हम आशा करते हैं कि साहित्य की सर्वांगीण उन्नति के साथ अश्वघोष के प्रलुप्त साहित्य के पुनरुद्धार के लिए पूर्ण प्रयत्न किये जायेंगे।