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8. ८. महाकवि कालिदास

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८. महाकवि कालिदास

(प्रथम शताब्दी ईसवी पूर्व)

महाकवि कालिदास ही संस्कृत साहित्य के क्षेत्र में ऐसे विख्यात कलाकार हैं जिन्होंने श्रव्य और दृश्य दोनों ही प्रकार के काव्यों को रचकर अपनी अनुपम प्रतिभा प्रदर्शित की है। कालिदास की इस प्रतिभा-सम्पन्न शैली का अनुभव करते हुए आधुनिक विद्वान् हैरान हैं परन्तु उनके समय की संदिग्धता के कारण उदासीन हैं। हमारे लिए यह परम दुर्भाग्य का विषय है कि हमारे देश के ऐसे प्राचीन मनीषी साहित्यकारों ने काव्य के सर्वोत्कृष्ट ग्रंथों का निर्माण करने पर भी अपने जीवन के विषय में अधिक प्रकाश नहीं डाला है और न उनके विषय में साक्षात् रूप से जीवन सम्बन्धी कुछ ज्ञान ही प्राप्त हो सका है। जीवन-चरित्र के विषय में तो कहना ही क्या, उनका कालनिर्णय करना भी अधिकांशतः अप्रत्यक्ष प्रमाणों पर ही अवलम्बित है। यही गति महाकवि कालिदास की भी है जिनका समय निर्णय करने में विद्वानों में बड़ा मतभेद हो गया है और परस्पर निर्णीत कालों में ७०० वर्ष के दीर्घ समय का अन्तर विद्यमान है।

महाकवि का समय

कालिदास ने वर्णन किया है कि वह महाराज विक्रमादित्य के आश्रित राज- कवि थे। इसलिए यदि विक्रमादित्य के समय का निर्धारण हो जाय तो कालिदास का समय भी निश्चित हो सकता है। फर्ग्युसन के कथनानुसार उनका समय ६ठी शताब्दी ई० है। कीथ और मेकडौनेल ने यह समय ५वीं शताब्दी ई० का आरम्भ बताया है जब कि भारतीय विद्वानों ने इस काल को प्रथम शताब्दी ई० पू० निश्चित

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किया है। अब आइये हम इन मतों की सत्यासत्यता पर विचार कर महाकवि का समय निर्णय करने का प्रयास करें।

छठी शताब्दी ई० का मत

फर्ग्युसन का मत है कि उज्जयिनी के राजा महाराज हर्ष विक्रमादित्य ने ५४४ ई० में शकों को परास्त कर अपनी विजय के उपलक्ष्य में विक्रम संवत् आरम्भ किया जिसे प्राचीन और चिरस्मरणीय बनाने के उद्देश्य से ५७ ई० पू० से आरम्भ माना। ५०० ई० के लगभग हूणों ने हमारे देश पर आक्रमण किया जिनका कालिदास ने शक, यवन, पहलव आदि विदेशी जातियों के रूप में उल्लेख किया है। अतः उनका समय ५०० ई० के अनन्तर ही होना चाहिए। इस मत के विरुद्ध प्रमुख आपत्तियां ये हैं- (१) महाराज हर्षविक्रमादित्य द्वारा चलाये गये इस विक्रम संवत् का ६०० वर्ष पूर्व से क्यों आरम्भ हुआ माना जाय जब कि मालव संवत् ५२६ तथा विक्रम संवत् ४३० के प्रयोग मिलते हैं ? इस प्रकार यह मत पूर्णतः धराशायी हो जाता है। (२) कालिदास ने रघुवंश में हूणों का उल्लेख विदेशी विजेताओं के रूप में न करके भारत की सीमा के बाहर का किया है जहां कि महाराजा रघु ने उन्हें पराजित किया था। चीन तथा मध्य एशिया के इतिहास से सिद्ध होता है कि प्रथम या द्वितीय शताब्दी ई० पू० में हूण पामीर के पूर्वोत्तर में आ चुके थे। (३) ४७३ ई० में वत्सभट्ट द्वारा रचित मंदसौर वाली प्रशस्ति में ऋतु- संहार और मेघदूत की झलक स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। इस प्रकार भी कालि- दास का समय छठी शताब्दी ई० मानना किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है।

गुप्तकालीन मत कीथ तथा मैकडौनेल प्रभृति यूरोपीय विद्वानों का विचार है कि गुप्तवंशीय प्रसिद्ध सम्राट चंद्रगुप्त द्वितीय ने सर्वप्रथम विक्रमादित्य की उपाधि धारण की जिसके पूर्व इस नाम का कोई नरेश ही नहीं हुआ था अतः यही विक्रमादित्य

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कालिदास का आश्रयदाता था। साथ ही साथ भारतीय इतिहास के स्वर्णयुग गुप्तकाल में ही इस महाकवि को अपनी काव्य-कौमुदी के विकास करने का पर्याप्त अवसर भी मिला होगा। कुमारसम्भव की रचना भी कवि ने कुमारगुप्त के जन्म को लक्ष्य करके की होगी। शकों की पराजय के उपलक्ष्य में चंद्रगुप्त ने विक्रम संवत् नामक संवत् चलाया और उसे चिरस्मरणीय बनाने के हेतु ५७ ई० पू० से आरम्भ माना। यह संवत् इन विद्वानों की धारणानुसार उक्त तिथि के पूर्व से मालव संवत् के नाम से प्रचलित था। इस मत के विरुद्ध प्रमुख आपत्तियां निम्न- लिखित हैं- (१) चन्द्रगुप्त द्वितीय एक महापराक्रमी नरेश था। अपने नाम से कोई नवीन संवत् न चलाकर ६०० वर्ष पूर्व से प्रचलित मालव संवत् को अपने नाम से परिवर्तित करना उसके व्यक्तित्व के प्रतिकूल है। इस विषय में यह भी उल्लेख- नीय है कि उसके पितामह चन्द्रगुप्त प्रथम ने गुप्त संवत् प्रचलित किया था। पौत्र के लिए पितामह का संवत् अस्वीकार कर नवीन संवत् चलाना महान धृष्टता होगी। स्कन्दगुप्त ने विक्रम संवत् का उल्लेख न करते हुए गुप्त संवत् का ही प्रयोग किया है। इस प्रकार चन्द्रगुप्त द्वितीय द्वारा प्राचीन विक्रम संवत् को अपने नाम से पुनः प्रचलित करने की धारणा सर्वथा निराधार ही प्रतीत होती है। (२) कुमार-सम्भव की रचना से भी पाश्चात्य विद्वानों ने यह अनुमान लगाया है कि यह ग्रंथ चन्द्रगुप्त के पुत्र कुमारगुप्त के जन्म को लक्ष्य करके लिखा गया होगा। यह धारणा भी सर्वथा भ्रान्तिरहित नहीं कही जा सकती क्योंकि महाकवि ने अपनी कृति में कुमार शब्द का प्रयोग साधारण अर्थ में ही किया है। इसी प्रकार कुछ लोगों का यह भी अनुमान है कि महाराज समुद्रगुप्त की विजय- यात्राओं का विवरण ज्ञात कर रघुवंश में कवि ने रघु की दिग्विजय यात्रा का प्रत्यक्ष वर्णन किया होगा। रघु की यात्रा का यह वर्णन काव्य का एक अनूठा उदाहरण है और बहुत कुछ पुराणों के आधार पर लिखा गया है। (३) मालविकाग्निमित्र में अश्वमेध की रोचक कथा का वर्णन है। परा- कमी गुप्त सम्राट् समुद्रगुप्त ने अपनी विजय के उपरान्त यह महायज्ञ सम्पन्न किया था। इससे विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि कालिदास ने सम्राट् के

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इस महान सुकार्य का आँखों-देखा विवरण अपने ग्रंथ में प्रस्तुत किया है। हमें इस धारणा में भी संदेह है। शुङ्गवंश के प्रवर्तक ने भी यह विख्यात यज्ञ सम्पादित किया था। सम्भवतः कालिदास ने यह सामग्री वहीं से उपलब्ध की हो अथवा अपनी कल्पना के आधार पर रची हो। (४) इस मत के विरुद्ध सबसे उल्लेखनीय प्रमाण यह है कि किसी गुप्त सम्राट् का नाम विक्रमादित्य न था। चन्द्रगुप्त द्वितीय ने इसे केवल उपाधिरूप में ही धारण किया था। अतः यह आवश्यक प्रतीत होता है कि उपाधि को प्रचलित करने के लिए इस नाम का कोई लोक प्रसिद्ध नरेश पहले हो चुका हो। रोम का इतिहास अवलोकन करने से भी विदित होता है कि सीजर उपाधिधारी राजाओं के पूर्व इस नाम का दूसरा सम्राट् अवश्य हो चुका था। इस प्रकार सिद्ध होता है कि विक्रमादित्य उपाधि धारण करनेवाले सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय के पूर्व इस नाम का कोई लोकविश्रुत नरेश अवश्य हुआ होगा। उसी विक्रमादित्य का हमारे महाकवि के आश्रयदाता होने की अधिक सम्भावना है।

प्रथम शताब्दी ई० पू० का मत

हमारे देश में चिरकाल से यह लोकोक्ति प्रचलित चली आयी है कि उज्जयिनी के वर्चस्वी सम्राट् महाराज विक्रमादित्य ने शकों को परास्त कर अपनी विजय के उपलक्ष्य में ईसा से ५७ वर्ष पूर्व 'मालवगणस्थिति' नामक संवत् आरम्भ किया जो कि बाद में विक्रम संवत् के नाम से विख्यात हुआ। यह संवत् भारत में अब तक प्रचलित है तथा समस्त धार्मिक कार्यों में भी अपनाया जाता है। कथा सरि- त्सागर में विक्रमादित्य का उल्लेख है जो प्रथम शताब्दी ई० में गुणाढ्य कृत बृहत्कथा के आधार पर लिखी गयी है जो कि अब अप्राप्य है। कालिदास का समय निर्धारण करने के पूर्व उस ग्रंथ के आधार पर लिखी हुई अन्य रचनाओं पर भी पर्याप्त रूप से विचार करना होगा। इन परमार वंशीय विक्रमादित्य के विषय में अनेक लोक-कथाएँ विख्यात हैं। अतः उनके अस्तित्व की ही उपेक्षा करना अनुचित प्रतीत होता है। यह सम्राट बड़े ही काव्य-ममज्ञ थे तथा कवियों और कलाकारों का समुचित सम्मान करते थे। कालिदास ने अपने ग्रन्थों में अनेक

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शैव सिद्धान्त प्रतिपादित किये हैं। इस कारण उनका निवास पाटलिपुत्र-वासी वैष्णव गुप्त नरेशों की अपेक्षा मालवावासी शैव सम्राट् विकमादित्य के ही अधिक समीपवर्ती प्रतीत होता है। इस मत की पुष्टि अन्य अनेकों अन्तरंग प्रमाणों द्वारा भी होती है। विक्रमो- र्वशी नामक रचना करने से कवि का अभिप्राय अपने आश्रयदाता के नाम को अमर कर देना ही है। इस त्रोटक में कवि ने इंद्र के पर्यायवाची शब्दों में महेन्द्र शब्द का पुनः-पुनः प्रयोग किया है जो कि संभवतः उसके आश्रयदाता महाराज विक्रमादित्य के पूज्य पिता महेंद्रादित्य की ओर संकेत है। अनुमान है कि यह त्रोटक ग्रंथ वृद्ध नरेश के अवकाश ग्रहण और राजकुमार के राज्यारोहण के अवसर पर अभिनीत किया गया होगा। प्रयाग के निकट भीटा नामक स्थान पर एक पदक प्राप्त हुआ है जिस पर एक सुन्दर चित्र अंकित है। उसमें एक मुनि हाथ उठा कर राजा को मृग पर प्रहार न करने के लिए रोक रहा है। दो पुरुषों के समीप खड़ी हुई एक बालिका पौधों को सींच रही है। यह पदक ईसा से पूर्व प्रथम शताब्दी में रचा गया था। यह चित्र महाकवि की अमर कृति अभिज्ञान शाकुन्तल के प्रथम अंक में पाये जाने वाले वर्णन से बहुत कुछ मिलता है। दोनों मनुष्य क्र्मशः दुष्यन्त और मुनि प्रतीत होते हैं। बालिका शकुन्तला हो सकती है। इस साम्य से हमें महाकवि का समय प्रथम शताब्दी ई० पू० मानने में संदेह की आशंका नहीं रहती। इस पदक का विस्तृत वर्णन सन् १६०६-१० ई० के भारतवर्ष के पुरातत्व विभाग संबंधी अनुसंधान के वार्षिक विवरण के पृष्ठ ४०, ४१ पर प्रकाशित हुआ है। उसका तात्पर्य यह है- "इलाहाबाद के निकट भीटा नामक स्थान पर श्री मार्शल की अध्यक्षता में की गयी खुदाई निस्संदेह ही सन् १६०६-१० ई० में किये गये अनुसंधानों में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है जिसके विषय में सन् १६११ की रायल एशियाटिक सोसायटी के वार्षिक विवरण में भी उल्लेख है। ........ श्री मार्शल को सेठ जयबसुद के घर में एक पकी हुई मिट्टी का बना हुआ पदक प्राप्त हुआ जिसके साथ उसका आरम्भिक विवरण भी दिया गया है। वह पदक हमारा ध्यान भारतवर्ष

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के अत्यन्त प्रसिद्ध नाटक शकुन्तला के एक दृश्य की ओर आकर्षित करता है। उस पदक के मध्य में एक चार घोड़ों से जुता हुआ रथ है और उस पर दो मनुष्य बैठे हैं जिनमें हम सम्भवतः दुष्यन्त और उसके सारथी के दर्शन करते हैं जो कि कण्व के आश्रम में शरणागत एक हिरण को न मारने के लिए एक तपस्वी से आदेश पा रहे हैं। तपस्वी की झोपड़ी भी एक ओर अंकित की गयी है जिसके सम्मुख एक कन्या पौधों को सींच रही है जो नाटक की नायिका शकुन्तला समझी जा सकती है। यह पदक निश्चित रूप से शुंग काल में बना था जो निस्संदेह ही कालिदास के समय के बहुत पूर्व का है। यहां यह भी उल्लेखनीय है कि उस कवि ने अपने विख्यात नाटक की कथावस्तु स्वयं निर्मित नहीं की थी। उसका महाभारत के प्रथम पर्व में प्रासंगिक कथा के रूप में उल्लेख है पर साथ-साथ हमें यह भी स्वीकार करना पड़ता है कि उक्त रथ का चित्रण कथा के प्रासंगिक रूप की अपेक्षा नाटकीय रूप से अधिक समता प्रकट करता है और इस प्रकार यह साम्य निश्चयात्मक नहीं कहा जा सकता।" पदक के उक्त विवरण से विदित होता है कि वह शुंगवंश के काल में रचा गया था जिसका समय ऐतिहासिक प्रमाणों के आधार पर प्रथम शताब्दी ई० पू० सिद्ध है। इस प्रकार पदक का भी यही समय हुआ। इस विवरण में यह भी अनु- मान लगाया गया है कि कालिदास का समय उससे बहुत बाद का होने के कारण पदक के निर्माता को उसकी कथावस्तु नाटक की मूलकथा महाभारत के शाकुन्तलो- पाख्यान से प्राप्त हुई होगी। इस आख्यान के अवलोकन करने से विदित होता है कि पदक और उसका वर्णन बहुत भिन्न है। उस कथा में कोई तपस्वी राजा और सारथी को मृग पर प्रहार न करने के लिए रोकता नहीं है। उसमें यह भी वर्णन नहीं है कि शकुन्तला किसी स्थल पर पौधों को सींचती है। इस प्रकार उक्त पदक के निर्माण की प्रेरणा कालिदास के अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक से ही प्राप्त हुई होगी और महाकवि प्रथम शताब्दी ई० पू० में अवश्य प्रादुर्भूत हुए होंगे। इस मत के विरुद्ध प्रमुख आपत्तियां निम्नलिखित हैं- (१) यूरोपीय विद्वानों का कथन है कि गुप्तवंशीय सम्राट् चन्द्रगुप्त द्वितीय के पूर्व जिसने सर्वप्रथम विक्रमादित्य की उपाधि धारण की, विक्रमादित्य नामक कोई

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नरेश नहीं हुआ। इतनी प्रबल जनश्रुति की अवहेलना करना उचित प्रतीत नहीं होता, यद्यपि इतिहास परमार वंशीय उज्जैनी के सम्राट् विक्रमादित्य के जीवन पर अधिक प्रकाश नहीं डालता। केवल इतिहास के मूक होने से ही किसी के अस्तित्व को संदिग्ध नहीं कहा जा सकता। (२) भीटा में प्राप्त प्रत्यक्ष प्रमाण स्वरूप पदक के विषय में भी हमारे पाश्चात्य मित्रों का कथन है कि यह चित्र महाभारत में पायी जानेवाली शकुन्तला की मूल कथा या अन्य किसी कथा के आधार पर होगा। किन्तु जब तक इस विषय में पूर्ण गवेषणा न हो जाय निर्णय पूर्णतः संदेह रहित नहीं कहा जा सकता। इस प्रकार हम कह सकते हैं कि अब तक प्राप्त प्रमाणों के आधार पर कालिदास का समय प्रथम शताब्दी ई० पू० मानना अधिक श्रेयस्कर प्रतीत होता है। महाकवि कालि- दास ने विक्रमोर्वशी, मालविकाग्निमित्र तथा अभिज्ञानशाकुन्तल नामक तीन रूपक ग्रंथों की क्रम से रचना की जो कि उनकी काव्य-प्रतिभा के अनूठे उदाहरण हैं।

मालविकाग्निमित्र

मालविकाग्निमित्र महाकवि कालिदास की प्रथम रूपक रचना है। इस कृति में कवि अपनी सर्वतोमुखी रूपक प्रतिभा का परिचय न दे सका। ग्रंथ की प्रस्तावना में कवि ने यह तर्क उपस्थित किया है कि न कोई रचना प्राचीन होने से उत्कृष्ट होती है और न नवीन होने से निकृष्ट। इससे विदित होता है कि कालि- दास के समय में इस कृति का समुचित आदर न हुआ। यद्यपि कवि की अन्य नाटक-रचना विक्रमोर्वशी एवं अभिज्ञानशाकुन्तलम् की अपेक्षा इसमें कवि की पूर्ण नाटककुशलता नहीं प्रकट होती, तब भी यह संस्कृत साहित्य का एक विशेष नाटक ग्रंथ है। इस रचना का कथानक निम्नलिखित है- इसमें विदर्भ देश की राजपुत्री मालविका एवं महाराज अग्निमित्र की प्रणय- कथा का रोचक वर्णन है। माधवसेन पर यज्ञसेन आक्रमण कर देता है और भया- कांत हो माधवसेन की बहिन मालविका विदिशा की ओर जान बचा कर भागती है। मार्ग में वनवासी उस पर आक्रमण कर देते हैं तथा वह बड़ी कठिनता से

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मालविकाग्निमित्र ऐतिहासिक घटनाओं पर रचा गया एक नाटक है। इसके नायक अग्निमित्र शुंगवंश के प्रवर्तक महाराज पुष्यमित्र के पुत्र थे। इतिहासा- नुसार अग्निमित्र अंतिम मीर्य सम्राट् बृहद्रथ के सेनापति थे। अपने स्वामी का वध करने के उपरान्त अपने पूज्य पिता पुष्यमित्र को राज्याभिषिक्त कर उन्होंने शुंग- वंश की स्थापना की। यह घटना ईसा से १८३ वर्ष पूर्व के लगभग की है। इति- हासवेत्ताओं का अनुमान है कि पुष्यमित्र ने यवनों या यूनानियों को परास्त कर अश्वमेध यज्ञ संपादित किया था। ये दोनों ही घटनाएँ कालिदास ने अपनी रचना में समाविष्ट की हैं जिनके आधार पर हम नाटक के उद्गम को ऐति- हासिक घटना के आधार पर मानने को प्रस्तुत होते हैं। यद्यपि यह ग्रंथ कालिदास की प्रथम रचना है, कवि ने ऐतिहासिक घटनाओं को बड़ी ही कुशलतापूर्वक पाठकों के समक्ष उपस्थित किया है। नाटक की समस्त घटनाएँ एवं पात्र अग्निमित्र की प्रणयसिद्धि में यथास्थान कौतूहल उत्पन्न करते हैं। कथानक के निर्माण एवं पात्रों के चरित्र-चित्रण में कवि ने आश्चर्यजनक कुशलता प्रदरशित की है। प्रेमी और प्रेमिका अग्निमित्र और मालविका का पुनः- पुनः मिलन और वियोग दिखाकर कवि ने अपनी कृति में एक विचित्र रुचि उत्पन्न कर दी है। भाषा मनोहर, प्रसादपूर्ण एवं चित्ताकर्षक है। सरस एवं विनोदपूर्ण सामयिक श्लेषोक्तियां नाटक के संवादों में सुन्दर सजीवता उत्पन्न करती हैं। मानसिक भावों के गम्भीर चित्रण एवं मनोविकारों के जटिल विश्लेषण में कवि ने विशेष प्रतिभा का दिग्दर्शन इस ग्रंथ में नहीं कराया है जैसा कि उसकी पश्चाद्वर्ती कृतियों में दृष्टिगोचर होता है। कवि ने जीवन की अधिक व्यापक गतियों का स्पर्श न करते हुए अपने कथानक को अन्तःपुर के प्रणय-षड्यन्त्रों तक ही सीमित रखा है। प्राकृतिक सौन्दर्य के चित्रण में कवि ने अलौकिक निपुणता का प्रदर्शन किया है। समस्त ऋतुओं का कालिदास ने बड़ा ही सजीव और स्वाभाविक वर्णन किया है। इस दृष्टिकोण को सम्मुख रखते हुए कवि ने ऋतुसंहार नामक एक अपूर्व खण्ड काव्य की रचना की। इस ग्रंथ में ग्रीष्म ऋतु का वर्णन विशेष उल्लेखनीय है जिसका एक उदाहरण निम्नलिखित है-

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"पत्रच्छायासु हंसा मुकुलितनयना दीघिकापभ्रिनीनां सौधान्यत्यर्थतापाद्वलभिपरिचयद्वेषिपारावतानि। विन्दूत्क्षेपान्पिपासुः परिपतति शिखी भ्रान्तिमद्वारियन्त्रे सर्वेरुत्रैंः समग्रस्त्वमिव नृपगुणैर्दोप्यते सप्तसप्तिः॥" -- मालवि० २।१२

हे राजन्! राजप्रासाद के अन्तर्गत वापियों को शोभा ग्रीष्म ऋतु में अवलोकनीय है। कमलपत्रों की शीतल छाया में मनोरम हंस आधी आंखें बंद किये ऊंघ रहे हैं। ग्रीष्म ऋतु के अत्यधिक ताप के कारण कबूतर महलों की ऊंची उष्ण छतों को त्याग कर इधर-उधर उड़ रहे हैं। पिपासा से व्याकुल जल की इच्छावाला मयूर इधर-उधर चक्कर काटने के उपरान्त फौवारे के पास आकर पुनः-पुनः बैठता है। सूर्य अपनी प्रचण्ड देदीप्यमान किरणों से उसी भांति उद्भासित होता है जिस प्रकार अपने समस्त राजकीय प्रशस्त गुणों से युक्त आप जैसे चक्र्वर्ती सम्राट्। उपर्युक्त पद में ग्रीष्म ऋतु का बड़ा ही चित्ताकर्षक एवं सहज वर्णन किया गया है। ऋतुओं के प्राकृतिक एवं स्वाभाविक वर्णन करने में कालिदास की प्रतिभा सर्वतोमुखी है। प्रथम नाटयकृति होने पर भी कालिदास की रचनाओं में माल- विकाग्निमित्र का स्थान उपेक्षणीय नहीं कहा जा सकता।

विक्रमोर्वशीय

विक्रमोर्वशीय पांच अंकों का एक त्रोटक है जो कि दशरूपककार धनंजय के मतानुसार अट्ठारह उप-रूपकों का एक भेद है। इसमें महाराज पुरुरवा और अप्सरा उर्वशी की प्रणय-कथा का विशद वर्णन किया गया है। अपनी एक रचना का नामकरण विक्रमोर्वशीय करके महाकवि कालिदास ने अपने एक परमावश्यक उद्देश्य की सिद्धि की। जैसा कि बताया जा चुका है, वह उज्जयिनी के चक्रवर्ती देदीप्यमान सम्राट् महाराज विक्र्मादित्य के आश्रित राजकवि थे। विक्रमोर्वशी शब्द में विक्रम का समावेश हुआ है। इस नामकरण से महाकवि ने अपने आश्रयदाता को अमर बनाने का सफल प्रयत्न किया है।

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विक्रमोर्वशीय में कवि की प्रतिभा मालविकाग्निमित्र की अपेक्षा अधिक जाग्रत और प्रस्फुटित हुई है।

कथानक

कैलाश पर्वत से इन्द्रलोक लौटने पर उर्वशी नामक एक अप्सरा को केशी नामक भयानक दैत्य सता रहा है। संयोगवश महाराज पुरुरवा की दृष्टि उस ओर पड़ती है और वह इस अन्याय का प्रतिकार करने के हेतु उर्वशी का उस दैत्य से उद्धार करते हैं। इस प्रथम मिलन में ही वे दोनों परस्पर अनुरक्त हो जाते हैं। राजा उर्वशी को उसके संबंधियों को सौंप देता है। पुरुरवा अपनी भावी प्रेमिका संबंधी मनोव्यथा की सूचना अपने मित्र विदूषक को देता है। इसी अवसर पर महाराज को वल्कल पर लिखा हुआ उर्वशी का एक प्रणय-संदेश मिलता है, जिसे प्राप्त कर महाराज फूले नहीं समाते। कुछ काल पश्चात् लक्ष्मी के प्रणय का अवसर आता है। भरत मुनि इस सुखद काल में एक नाटक के अभिनय का प्रबंध करते हैं जिसमें उर्वशी का भी भाग है। उर्वशी से उसके भावी पति के विषय में प्रश्न पूछा जाता है। उर्वशी भरत मुनि की इच्छा के विरुद्ध पुरुषोत्तम या विष्णु इस प्रश्न का उत्तर न देकर पुरुरवस् उत्तर देती है जिस कारण भरत मुनि कुपित होकर क्रोध की अन्तिम पराकाष्ठा पर पहुंच जाते हैं। वह उसे यह अभिशाप देते हैं कि वह इस लोक को त्याग कर मर्त्यलोक में जाकर निवास करे। इन्द्र-पुत्र-दर्शन पर्यन्त उसके श्राप की अवधि निश्चित कर देते हैं। महाराज पुरुरवा राजधानी में लौट कर उर्वशी के विरह में ही व्याकुल रहते हैं। उर्वशी मर्त्यलोक में आकर अपनी सखियों के साथ पुरुरवा की दशा का वेश बदल कर अवलोकन करती है। महाराज की मनोव्यथा का अनुभव कर उर्वशी को अपने प्रति महाराज के अटूट प्रेम का निश्चय हो जाता है। सखियाँ उर्वशी को महाराज पुरुरवा को सौंप कर लौट जाती हैं तथा दोनों सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करते हैं। एक दिन मंदाकिनी के तट पर खेलती हुई एक विद्याधर कुमारी की ओर

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पुरुरवा देखने लगता है जिस पर उर्वशी कुद्ध हो जाती है। रूठने के उपरान्त वह कार्तिकेय के गंधमादन उद्यान में चली जाती है जहां स्त्री का प्रवेश वर्जित था। यदि कोई वनिता त्रुटिवश उसमें प्रविष्ट हो भी जाती तो वह कार्तिकेय के नियमा- नुसार लता रूप में परिवर्तित हो जाती थी। हतभागिनी उर्वशी की भी यही दुर्दशा होती है। महाराज पुरुरवा अपनी प्रियतमा के वियोग में अतिशय विलाप करते हैं। वह विरह की असह्य वेदना से पीड़ित हो हस्ती, शूकर एवं वारहसिंगा आदि पशुओं से तथा सरिता, तरंग वृक्ष आदि अचेतन पदार्थों से उर्वशी के गन्तव्य स्थान को जानने का प्रयत्न करते हैं। इस क्लान्त दशा में उन्मत्त की भांति अचेतन से हो जाते हैं तथा इधर-उधर भटकते हैं। उनकी इस दशा को शान्त करने के हेतु एक आकाशवाणी भी होती है जो उर्वशी के परिवर्तित रूप के विषय में उन्हें सूचना देती है। आकाशवाणी पुरुरवा को बताती है कि यदि वह संगमनीय मणि को अपने पास रख उर्वशीरूपी लता का आलिंगन करें तो वह अपने पूर्वरूप को प्राप्त हो जायेगी। पुरुरवा आकाशवाणी के आदेशानुसार अपनी प्रियतमा उर्वशी को उसका मूल रूप प्राप्त करवाने में सफल हो जाते हैं। दोनों राजधानी में लौटकर आनन्दपूर्वक जीवन-यापन करने लगते हैं। राजधानी में उन दोनों को वैवाहिक जीवन व्यतीत करते हुए बहुत काल व्यतीत हो गया जब कि एक दिन अकस्मात् वनवासिनी स्त्री एक अल्पवयस्क युवक के साथ महाराज पुरुरवा के दरबार में उपस्थित हुई। वह युवक उस समय सम्राट् का पुत्र एवं राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया गया। इसी अवसर पर अपने शाप की निवृत्ति के अनुसार उर्वशी भी इन्द्रलोक में लौट जाती है। उर्वशी के पुनः वियोग से महाराज को वैराग्य उत्पन्न हो जाता है। वे अपने पुत्र को राज्या- भिषिक्त कर अपना शेष जीवन वन में बिताने का निश्चय करते हैं। पुरुरवा के लिए ऐसे महादुःखदायी अवसर पर नारद मुनि का आगमन होता है जिनसे उनके लिए महाहर्षमय सूचना मिलती है कि इन्द्र के आज्ञानुसार उर्वशी समस्त जीवन महाराज पुरुरवा की सहधर्मचारिणी ही रहेगी। इस विक्रमोर्वशीय त्रोटक के हमें दो हस्तलिखित लेख प्राप्त हुए हैं। एक बंगाली और देवनागरी लिपि में लिखा गया है जिस पर सन् १६५६ ई० में रंगनाथ

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नामक टीकाकार ने टीका लिखी है और दूसरा दक्षिण भारत में प्रचलित प्रणाली के अनुकूल पाया गया है तथा सन् १४०० ई० के लगभग कौण्डविडड के रेडि्ड राजकुमार कुमारगिरि के मंत्री कात्यायन द्वारा लिखी हुई टीका उस पर उपलब्ध हुई है। इन दोनों हस्तलेखों में एक मुख्य भेद यह है कि बंगाली तथा देवनागरी लिपि में प्राप्त हस्तलेख के चतुर्थ अंक में अपभ्रंश पद्यों का अपेक्षाकृत अधिक प्रयोग है। यह नवीन प्रथा है। अतः कुछ विद्वान् इसे कालिदास की कृति होने में संदेह करते हैं। भेद होने पर उक्त लेख के कथित भाग का प्रक्षिप्त होना संभव है। संस्कृत के लगभग समस्त ग्रन्थों में कुछ न कुछ प्रक्षेप अवश्य हुआ है। अतः इस विषय में अधिक निर्णय करना सम्भव प्रतीत नहीं होता। विक्रमोर्वशीय में मालवि- काग्निमित्र की अपेक्षा नाटककला का अधिक परिपाक दृष्टिगोचर हुआ है, यद्यपि कालिदास की नाटककला की पराकाष्ठास्वरूप अभिज्ञानशाकुन्तल की अपेक्षा काव्यशैली कम विकसित हुई है। पुरुरवा और उर्वशी के प्राचीन आख्यान को नाटकीय रूप प्रदान कर कवि ने एक अलौकिक कार्य किया। इन्द्र का शाप, उर्वशी का रूप-परिवर्तन एवं पुरुरवा का विरह में उन्मत्त प्रलाप महाकवि की लेखनशैली की अनुपम कल्पना-शक्ति के उदाहरण हैं। द्वितीय एवं तृतीय अंक की कतिपय घटनाएं कथानक की प्रगति के लिए आवश्यक प्रतीत नहीं होतीं। विप्रलम्भ शृंगार का इस त्रोटक में आवश्यकता से कहीं अधिक चित्रण हुआ है। अभिज्ञानशाकुन्तल की अपेक्षा भाषा भी अधिक प्रांजल, प्रवाहपूर्ण, सौष्ठवयुक्त एवं प्रसादयुक्त नहीं है। नारी-सौन्दर्य एवं प्रकृति की रमणीयता का कवि ने स्थान-स्थान पर बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है जिसके कतिपय उदाहरण यहां प्रस्तुत करना अनुपयुक्त न होगा। उर्वशी के प्रथम दर्शन के अवसर पर महाराज पुरुरवा उसकी दिव्य शोभा निहार कर अपने मन में इस प्रकार विचार करते हैं- "अस्या: सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चंद्रो नु कान्तिप्रदः शृंगारंकरसः स्वयं नु मदनो मासो नु पुष्पाकरः। वेदाभ्यासजड: कथं नु विषयव्यावृत्त कौतूहलः निर्मातुं प्रभवेन्मनोहरमिदं रूपं पुराणो मुनिः॥" -- विक० १।८

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इस परम सुन्दररूपिणी कान्ता का निर्माता संभवतः स्वतः रमणीय कान्ति प्रदान करनेवाला चंद्रमा ही होगा। शृंगार रस की मूर्त्तिमान् प्रतिमा कामदेव अथवा नाना पुष्पों का भंडार वसन्त भी इसके निर्माण-कार्य में सफल हो सकता है। परन्तु यह स्वाभाविक प्रतीत नहीं होता कि निरन्तर वेदों के अभ्यास में रत रहने के कारण शुष्क-हृदय एवं समस्त विषय-वासनाओं से उदासीन ब्रह्मा इस अद्वितीय मनोहर रूप की सृष्टि में समर्थ हो सके हों। इस श्लोक में संदेह अलंकार द्वारा उर्वशी के सम्भाव्य रूप का बड़ा ही रोचक वणंन प्रस्तुत किया गया है। प्रजापति या उर्वशी के निर्माता के विषय में शङ्का उत्पन्न कर कवि ने उस नारी के रमणीय- तम रूप की कल्पना पाठकों के हृदय में स्वाभाविक रीति से करा दी है। विरह के वर्णन एवं प्रकृति की अनुपम छटा का भी उदाहरण देखिए। उर्वशी के लतारूप में परिवर्तित हो जाने पर महाराज पुरुरवा एक नदी की तरंग को अपनी प्रियतमा के अनुरूप समझ कर इस प्रकार सोचता है-

तरंगभ्रभङ्गा क्षुभितविहगश्रेणिरसना विकर्षन्ती फेनं संरम्भशिथलम्। यथाविद्धं याति स्खलितमभिसंधाय बहुशो नदी भावेनेयं ध्रुवमसहना सा परिणता॥-विक० ४।२८ प्रियतमा उर्वशी मालूम पड़ता है कि मेरे असह्य अपराधों को न सहन कर सकने के कारण दुःख के वशीभूत हो नदी के रूप में परिवर्तित हो गयी है। तरंगें उसकी तिरछी भौहों के समान हैं, सुन्दर कलरव करते हुए पक्षिगण उसके कटिसूत्र हैं। अत्यधिक कोप के कारण फेनरूपी उसके वस्त्राञ्चल गिर गये हैं तथा वह चली आ रही है। इस श्लोक में नारी-सौन्दर्य की प्राकृतिक पदार्थों से तुलना तथा प्रकृति रूप नदी की नारी-सौन्दर्य से अनुरूपता प्रकट कर महाकवि कालिदास की काव्य- शैली का रोचक चित्र खींचा गया है।

अभिज्ञान शाकुन्तल अभिज्ञान शाकुन्तल महाकवि कालिदास की सर्वोत्कृष्ट रचना है जिसमें

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उनकी नाटक-रचना सम्बन्धी एवं काव्य-प्रतिभा का पूर्ण परिपाक मिलता है। यह नाटक अपनी रोचकता, रचना-कौशल एवं सर्वप्रियता के कारण संस्कृत के समस्त दृश्यकाव्यग्रंथों में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। इसमें सात अंक हैं जिनमें दुष्यन्त और शकुन्तला के प्रणय, वियोग और पुनर्मिलन की कथा का बड़ा रोचक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। हस्तिनापुर के महाराज दुष्यन्त मृगया में बहुत प्रवीण हैं। एक बार संयोगवश इसी व्यसन के वशीभूत होकर वह कण्व मुनि के आश्रम में पहुंच गये और वहीं उनका मुनि-कन्या शकुन्तला से साक्षात्कार हुआ। उस कन्या के जन्म का वृत्तान्त ज्ञात होने पर महाराज सहसा ही उस पर अनुरक्त हो जाते हैं और शकुन्तला भी उनकी दिव्य आकृति पर मुग्ध हो जाती है। दोनों ही अपनी मनोकामना की सिद्धि के लिए गांधर्व विधि से प्रणयसूत्र में आबद्ध हो जाते हैं। इसी अवसर पर किसी आवश्यक कार्य के आ जाने के कारण महाराज दुष्यन्त को अपनी राजधानी लौटना पड़ता है। जाते समय वह अपनी नामांकित अंगूठी शकुन्तला को यह कह कर भेंट कर जाते हैं कि जितने अक्षर मेरे नाम में हैं उतने ही दिनों के अन्तर्गत मैं तुमको अपने समीप बुलवा लूंगा। महाराज दुष्यन्त के जाने के पश्चात् शकुन्तला निरन्तर उन्हीं के ध्यान में लीन रहती है और आवश्यक कार्यों की भी सुध नहीं लेती। ऐसे ही एक अवसर पर सहसा कोपमूर्ति दुर्वासा मुनि का आश्रम में प्रवेश होता है। शकुन्तला शून्य-हृदय होने के कारण उचित आदर-सत्कार करने में असमर्थ ही रहती है। इस पर रुष्ट होकर मुनि उस अबोध बालिका को यह शाप देकर लौट जाते हैं कि तुम जिसको स्मरण कर मुझ अतिथि का उचित आदर-सत्कार नहीं करती हो वह तुम्हें भूल जायगा और पुनः-पुनः याद दिलाने पर भी याद न करेगा। अभिज्ञान या चिह्न दिखाने पर ही यह शाप निवृत्त होगा। तीर्थयात्रा के उपरान्त लौटने पर कण्व मुनि को शकुन्तला के विवाह का वृत्तान्त ज्ञात होता है और वह तत्काल ही उसे पतिगृह भेजने का प्रबन्ध करते हैं। कन्या के बिदाई का चित्रण बड़ा ही मार्मिक एवं हृदयग्राही है जिसमें पशु-पक्षी, वृक्ष-लता आदि भी मानवीय ढंग से स्नेहपूर्ण बिदाई देते हैं एवं करुण विलाप भी करते हैं। दुष्यन्त, श्राप के वशीभूत होने के कारण, पत्नी शकुन्तला को अपने समीप

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पहुंचने पर अस्वीकार कर देता है। इस विषम परिस्थिति में एक दिव्य ज्योति उसे आकाश में उड़ा ले जाती है और मरीचिकाश्रम में उसकी जन्मदात्री माता मेनका के समीप पहुंचा देती है। उसी के यहां शकुन्तला अपने वियोग के दिन काटती है। कुछ समय पश्चात् एक मछुए को राजा की नामांकित अंगूठी, जो शचीतीर्थ में वन्दना करते समय शकुन्तला द्वारा जल में छूट गयी थी, मिली, जिसे उसने राजा को ही समर्पपत कर दिया। दुष्यंत को अंगूठी मिलने से अपने पूर्व विवाह का स्मरण हो आया और वह अपने दारुण कृत्य का स्मरण करके अत्यधिक व्याकुल हो उठा। इसके पश्चात् कालिदास ने दोनों ही शकुन्तला और दुष्यन्त, के विरह का वर्णन करने में अद्विनीय नाटयकुशलता प्रदर्शित की है। अन्त में इन्द्र के सहायतार्थ स्वर्गयात्रा समाप्त कर लौटते हुए महाराज दुष्यन्त का मरीचिकाश्रम में अपने पुत्र सर्वदमन एवं प्रियपत्नी शकुन्तला से साक्षात्कार तथा पुनर्मिलन होता है। दोनों अपनी राजधानी में लौट कर शेष जीवन सुखपूर्वक व्यतीत करते हैं। इस नाटक की मूलकथा महाभारत के आदि पर्व के अन्तर्गत शाकुन्तलो- पाख्यान नाम से सर्ग ६६ से ७४ तक पायी जाती है। महाकवि कालिदास ने अपनी नाटयचातुरी प्रकट करने के हेतु उसमें अनेक मौलिक परिवर्तन भी किये हैं। इन परिवर्तनों का नाटक पर प्रभाव ज्ञात करने के लिए मूलकथा का संक्षेप में यहां उल्लेख कर देना अनुपयुक्त न होगा। महाराज दुष्यन्त अपने नगर से मृगया के लिए प्रस्थान करते हैं। उनके साथ में जानेवाली विशाल सेना का वर्णन करने के उपरान्त कवि वन के नागरिकों द्वारा राजा के भव्य सम्मान, प्राकृतिक दृश्य एवं मृगया का रोचक वर्णन प्रस्तुत करता है। सेना के पीछे रह जाने के कारण वनों में होकर दुष्यन्त एकाकी ही महर्षि कण्व के आश्रम में पहुंच जाते हैं जहां कि उनका सर्वप्रथम मुनि-कन्या शकु- न्तला से एकान्त में ही साक्षात्कार होता है। उस समय महर्षषि कण्व फल लेने के लिए वन में गये हुए होते हैं। उचित अतिथि-सत्कार करने के उपरान्त वह राजा को स्वयम् ही अपने जन्म की कथा इस प्रकार सुनाती है- महर्षि विश्वामित्र की उग्र तपस्या से भयभीत होकर देवराज इन्द्र ने मेनका नामक अप्सरा को दिव्य शक्ति प्रदान करने के बाद तप में विघ्न डालने के लिए

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भेजा। जब मेनका महर्षि के समीप पहुंची तो वह उसके मोहिनी रूप पर मुग्ध हो गये। मेनका चिरकाल तक विश्वामित्र के समीप ही रही और उनका अनेक प्रकार से मनोरंजन करती रही। कुछ काल बीतने पर उन दोनों माता पिताओं ने मुझ शकुन्तला को जन्म दिया। मेरे जन्म के उपरान्त वह सफलमनोरथा मेरी माता तत्काल ही स्वर्ग को लौट गयी और जाते समय मुझे शकुन्त पक्षियों के मध्य में छोड़ गयी जिन्होंने मेरी रक्षा की और इसी कारण मेरा नाम शकुन्तला (पक्षियों द्वारा पाली गयी) पड़ा। उन्हीं के मध्य में से उठा कर महर्षि कण्व ने मेरा लालन- पालन किया। इस प्रकार शकुन्तला से उसके जन्म का वृत्तान्त सुनने पर राजा का उसके प्रति अनुराग उत्पन्न हो गया और उन्होंने विवाह का प्रस्ताव प्रस्तुत किया। राजा द्वारा धर्मोपदेश एवं गांधर्व विवाह का महत्त्व श्रवण करने के उपरान्त भी शकुन्तला ने अपने पुत्र को युवराज बनाने की शर्त रखी। राजा द्वारा उसके अंगीकार कर लिये जाने पर उन दोनों का परस्पर प्रणय हो जाता है। कुछ दिन में सेना सहित बुलाने का आश्वासन देने के उपरान्त दुष्यन्त लौट जाते हैं। महर्षि कण्व को लौटने पर जब शकुन्तला का यह वृत्तान्त ज्ञात हुआ तब वह बहुत प्रसन्न हुए। कुछ काल बीतने के उपरान्त सर्वदमन का जन्म हुआ जो बाद में भरत के नाम से विख्यात हुआ। वह वन के हिंसक जन्तुओं के साथ खिलौनों के समान खेलता था तथा अन्य अनेकों अमानुषिक बाल-क्रीड़ाएँ करता था। उसके युवा और राज्यारूढ़ होने के योग्य होने पर कन्या को बहुत दिन तक पितृगृह में रखना अनुचित समझ कर कण्व मुनि ने शकुन्तला को शिष्यों सहित पतिगृह को भेजा, शिष्य उसे यथास्थान पहुंचाकर लौट आये। दुष्यन्त समस्त वृत्तान्त स्मरण होने पर भी पत्नी को अस्वीकार करते हुए उसके सम्मुख इस प्रकार बोला- "मुझे यह तनिक भी स्मरण नहीं कि मैं कभी तुम्हारे साथ प्रणय-सूत्र में आबद्ध हुआ हूंगा। तुम इस समय वेश्याओं के समान ऐसा आचरण क्यों कर रही हो?" शकुन्तला के बहुत समझाने पर और पत्नीव्रत धर्म का उपदेश देने पर भी दुष्यन्त न माना, तब आकाशवाणी द्वारा उसके भावी भाग्य का निर्णय हुआ। इस प्रकार महाराज दुष्यन्त ने लोकापवाद को ही कारण बताकर अपने कृत्य पर पश्चात्ताप

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करते हुए शकुन्तला को धर्मपत्नी रूप में अंगीकार किया। तत्पश्चात् दोनों का शेष जीवन आनन्दपूर्वक व्यतीत हुआ। इस प्रकार हमने देखा कि महाकवि कालिदास ने अपनी नाटक-रचना-सम्बन्धी प्रतिभा के आधार पर मूल कथा में अनेकों परिवर्तन किये। अब हम उनका विवेचन करते हुए उनके नाटक पर प्रभाव का संक्षिप्त अवलोकन करेंगे। (१) वन, आश्रम, सेना, नगर आदि का महाभारत में बहुत ही विस्तृत वर्णन किया गया है जहां कि कथा का आरम्भ सेना सहित दुष्यन्त के अपने नगर से प्रस्थान से हुआ है। मार्ग में नर-नारियों द्वारा उनके भव्य सम्मान तथा सेना द्वारा मृगया का विस्तृत वर्णन है। दो वनों को पार करने के उपरान्त वह आश्रम में एकाकी ही प्रवेश करते हैं। कालिदास ने इन विस्तृत वर्णनों को नाटकीय दृष्टि से अनुपयुक्त समझ कर छोड़ दिया है। अभिज्ञान शाकुन्तल का आरम्भ रोचक नाटकीय ढंग से प्रस्तावना के बाद सूत सहित अत्यन्त वेगवान रथ पर बैठे हुए दुष्यन्त से होता है। वह एक मृग का पीछा करते हुए संयोगवश कण्व ऋषि के आश्रम में पहुंच जाते हैं। संन्यासी से वार्तालाप, विश्राम एवं भ्रमण के कारण बहु कालक्षेप के उपरान्त ही उनका शकुन्तला से साक्षात्कार होता है। कवि ने उन दोनों के प्रथम साक्षात्कार का भी सुन्दर चित्र खींचा है जब कि दुष्यन्त भौरों के आतंक से व्याकुल शकुन्तला के समीप एक रक्षक के रूप में अपने पुरुवंश की मर्यादा के अनुसार अबला के रक्षार्थ पहुंचते हैं। किन्तु महाभारत के अनुसार दुष्यन्त आश्रम में पहुंचते ही शकुंतला से साक्षात्कार कर लेते हैं और उसका उचित आतिथ्य-सत्कार ग्रहण करते हैं। कालिदास की नाटक आरम्भ करने की यह पृष्ठ- भूमि सचमुच ही बड़ी अनुपम है। (२) महाभारत के शाकुन्तलोपाख्यान में शकुंतला प्रगल्भ, स्पष्टभाषिणी, निर्भीक तरुणी के रूप में चित्रित की गयी है जब कि कालिदास ने उसको लज्जा- शील, प्रेम-परायण और मुग्ध बालिका के रूप में अंकित किया है। महाभारत में दुष्यन्त उससे निर्जन वन में एकाकी ही मिलते हैं। महाराज द्वारा कौतूहल प्रकट करने पर वह अपने जन्म का वृत्तान्त भी स्वयं ही कहती है। यहां तक कि अपनी माता मेनका तथा पिता विश्वामित्र की प्रेमकथा का स्वयम् ही उच्चारण कर उचित

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शिष्टाचार का भी उल्लंघन करती है। कालिदास ने शकुंतला के जन्म की कथा अपेक्षाकृत बहुत ही संक्षिप्त रूप में उसकी प्रिय सखी अनुसूया द्वारा कहलवायी है। "अनसूया-ततो वसन्तावतार रमणीये समये उन्मादहेतुकं तस्याः रूपं प्रेक्ष्य। इत्यर्द्धोक्ते लज्जाम् नाटयति।" अर्थात् यह कह कर कि इसके वसन्त ऋतु के संचार से उस रमणीय समय में उस मेनका का मादक रूप देख कर ... . . .ऐसा आधा ही वाक्य कह कर लज्जित हो जाती है। यह कालिदास ने स्त्रियोचित लज्जा एवं भारतीय मर्यादा का उपयुक्त उदाहरण प्रस्तुत किया है। (३) महाभारत में शकुन्तला अकेली है और उसका दुष्यन्त के साथ विवाह करने का ढंग भी एक सौदा सा प्रतीत होता है। राजा तो आरंभ में ही शकुंतला पर मोहित हो जाते हैं पर शकुन्तला उन पर तनिक भी आसक्त नहीं होती। उसको ममाने के लिए राजा को उसे विस्तृत धर्मोपदेश एवं गांधर्व विवाह पद्धति का धार्मिक महत्त्व समझाना पड़ता है। इस सबके उपरांत भी शकुंतला राजा के समक्ष प्रणय विषय में एक अद्भुत शर्त रखती है जो कि निम्नलिखित है-

मयि जायेत यः पुत्रः स भवेत्त्ववनन्तरम्। युवराजो महाराज सत्यमेतद् ब्रवीमि ते।। -- महा० आदि० ७३, १६, १७

हे राजन् ! जो मुझसे उत्पन्न पुत्र हो वही आपके उपरान्त आपके साम्राज्य का युथराज हो। यह शर्त राजा द्वारा स्वीकार होने पर ही उन दोनों का प्रणय होता है। इस आख्यान के प्रतिकूल अभिज्ञान शाकुन्तल में कालिदास ने प्रेम का स्वाभा- विक विकास दिखाया है जिसमें दुष्यन्त ही नहीं अपितु शकुन्तला भी उसके दिव्य गुणों पर समान रूप से अनुरक्त है। दुष्यन्त विदूषक से शकुन्तला विषयक अपनी मनःकामना प्रकट करता है तथा अपनी प्रेमिका की प्राकृतिक चेष्टाओं से उसकी मानसिक व्यथा का भी अनुभव करता है। इस विषय में शकुन्तला अपनी सखियों से इस प्रकार अनुमति लेती है- 'यदि वामनुमतं स्यात्तथा वर्तेथा : यथा तस्य राजषेरनुकम्पनीया भवामि अर्थात् हे मेरी प्यारी सखियो, यदि तुम दोनों की अनुमति हो तो ऐसा प्रबंध करो कि मैं

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उस राजषि की कृपापात्री बनी रहूं। इस प्रकार कालिदास ने दुष्यन्त और शकु- न्तला दोनों के ही चरित्रों में उचित शिष्टाचार का प्रदर्शन किया है। (४) महाभारत में दुष्यन्त और शकुन्तला दोनों ही अकेले हैं। एकान्त में सब वार्तालाप, प्रेम का विकास एवं विवाह आदि सम्पन्न होता है। कालिदास को यह उपयुक्त प्रतीत नहीं होता अतः वह शकुन्तला के सहायतार्थ प्रियंवदा और अनुसूया नामक दो सखियों का नाटक में समावेश करते हैं। इसी प्रकार विदूषक दुष्यन्त का अभिन्न साथी है। इन तीनों के नाटक में समावेश करने से कथानक की रोचकता और स्वाभाविकता में आशातीत वृद्धि हुई है। (५) महाभारत की कथा में कण्व फलों के संग्रह करने के हेतु वन में गये हुए हैं और उनकी थोड़ी ही देर की अनुपस्थिति में यह सब काण्ड हो जाता है। प्रेम के विकसित होने में समय अवश्य लगता है। इसलिए महाकवि ऋषि को शकुन्तला के भावी अरिष्ट की निवृत्ति के लिए सोमतीर्थ भेज देते हैं और उन्हें आश्रम से एक दीर्घकाल तक अनुपस्थित कर दोनों को कई बार मिलने और विरह में व्याकुल होने का अवसर प्रदान करते हैं। इस प्रकार दीर्घ सहवास से उन दोनों के परस्पर प्रेम को प्रगाढ़ होने का अधिक अवसर मिलता है जो कि निश्चय ही महाभारत की अपेक्षा अघिक सरल, स्वाभाविक और रमणीयतर है। (६) कण्व को दुष्यन्त और शकुन्तला के परस्पर प्रणय की सूचना किस प्रकार मिलती है, यह भी विचारणीय है। महाभारत के ढंग को परिवर्तित कर कालिदास ने अपनी प्रतिभा का अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया है। महाभारत में फल लेकर लौटने पर शकुन्तला स्वयम् ही उनके पास जाकर इस प्रकार कहती है-

"मया पतिवृ तो राजा वुष्यन्तः पुरुषोत्तमः। तस्म ससचिवाय त्वं प्रसादं कतुमर्हसि॥" महा० आदि० ७३,३२ हे पिता ! पुरुषश्रेष्ठ महाराज दुष्यन्त को मैंने पति-रूप में वरण कर लिया है। अब आप कृपया मंत्रियों सहित उन पर प्रसन्न हो अनुग्रहदृष्टि रखिए। इस प्रकार स्वयम् ही शकुन्तला द्वारा कण्व को ऐसी सूचना देना यथोचित शिष्टाचार का उल्लंघन कर मिर्लज्जता और प्रगल्भता का उदाहस्ण है। कालिदास ने यह सूचमा

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किसी के मुख से न कहला कर एक छंदोमयी वाणी द्वारा प्रकट करना ही श्रेष्ठतर समझा है, शकुन्तला की प्रिय सखी प्रियंवदा ने जिसका वर्णन इस प्रकार किया है-

"दुष्यन्तेनाहितं तेजो दधानां भूतये भुवः। अवेहि तनयां ब्रह्मन्नग्निगर्भा शमीमिव।।" -अ० शा० ४।३

हे ब्राह्मण! जिसके गर्भ में अग्नि रहती है ऐसी शमीलता के समान आपकी कन्या ने दुष्यन्त के द्वारा तेज को गर्भ रूप में धारण किया है। यह भली भांति समझ लीजिए और तदनुकूल आचरण कीजिए। इस घटना के अनुकूल सूचना देने का कालिदास का यह ढंग ही सचमुच बड़ा निराला है। (७) विवाह होने के उपरान्त अति दीर्घ काल तक कन्या को पिता के घर में रखना अनुचित है। महाभारत की कथा के अनुसार शकुन्तला विवाह के पश्चात् चिरकाल तक अपने पिता कण्व के समीप ही रहती है। आश्रम में ही भरत का जन्म और लालन-पालन होता है। भरत के युवा और राज्यारूढ़ होने के योग्य होने पर ही कण्व शकुन्तला को उसके पति के समीप भेजते हैं। यह भारतीय मर्यादा के प्रतिकूल है। अतः अभिज्ञान शाकुन्तल में कण्व को इस प्रणय की सूचना दिलवाते ही शकुन्तला को तत्काल ही पतिगृह भिजवाने की व्यवस्था की गयी है। इस विषय में कण्व की उक्ति उल्लेखनीय है-

"अर्थो हि कन्या परकीय एव, तामद्य सम्प्रेष्य परिप्रहीतुः। जातोऽस्मि सदो विशवान्तरात्मा चिरस्य निक्षेपमिवार्पयित्वा॥" -- अ० शा० ४।२४

कन्यारूपी धन वास्तव में पराया ही होता है। आज उसे उसके ग्रहण करनेवाले स्वामी दुष्यन्त के समीप भेज कर मैं उसी प्रकार निश्चिन्त हूं, जैसा किसी की बहुत

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दिनों की धरोहर उसको लौटा देने पर निश्चिन्तता होती है। आज मुझे शकुन्तला रूपी दुष्यन्त की धरोहर उसके स्वामी को लौटा कर अत्यधिक प्रसन्नता, निश्चि- न्तता, एवं आनंद हो रहा है। इस उक्ति से कवि जहां विवाह के उपरांत तत्काल ही कन्या को पति-गृह भेज देने की प्राचीन भारतीय मर्यादा का पालन करता है, उसी के साथ ही कन्या के बिदा करने के उपरान्त प्रत्येक मननशील पिता की मानसिक दशा को भी व्यक्त करता है। (८) दुर्वासा के श्राप को नाटक में समाविष्ट करना कालिदास के समस्त नाटकीय परिवर्तनों में प्रधान है। इससे महाराज दुष्यन्त के चरित्र की रक्षा होती है और वह सदाचारी प्रमाणित होते हैं। महाभारत के शाकुन्तलो- पाख्यान में उपलब्ध वृत्तांत के अनुसार कण्व अपने शिष्यों सहित शकुन्तला को उसके पति के समीप भेजते हैं। वे उसे राजा को बिना सौंपे ही उसके समीप छोड़ कर चले जाते हैं। राजा को अपने विवाह का पूर्व वृत्तांत स्मरण रहते हुए भी वह अपनी पत्नी को अस्वीकार कर देता है। इस अवसर पर भी अपने पति को समझाने के लिए शकुन्तला अकेली है और साथ में युवक पुत्र भरत है। शकुन्तला दुष्यन्त को पुत्रप्रेम प्रदर्शित करने की प्रेरणा करती है और उसके स्पर्श से प्राप्त होनेवाले सुख का वर्णन इस प्रकार करती है-

प्रतिपद्य यदा पितुराश्लिष्यतेऽङ्गानि किमन्याम्यधिकं ततः॥

यह कह कर शकुन्तला दुष्यन्त को पत्नीव्रत धर्म का विस्तृत उपदेश देती है और उसको पत्नी-त्यागी एवं महा पापी बताती हुई ऋुद्ध होती है। दुष्यन्त इस पर भी राजी नहीं होता। एक आकाशवाणी होती है जो उनके परस्पर गांधर्व विवाह की सत्यता को घोषित करती है जो इस प्रकार है-

"त्वं चाऽस्य धाता गर्भस्य सत्यमाह शकुन्तला। जाया जनयते पुत्रमात्मनोऽङ्ग द्विषाकृतम्।।" -महा० आदि० ७४।११४

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हे दुष्यन्त! शकुन्तला ने जो कुछ कहा है सत्य ही कहा है। यह पुत्र तुम्हारे द्वारा ही उत्पन्न हुआ है। अपना अंग ही दो भागों में विभक्त होकर पुत्र के रूप में भार्या के गर्भ से जन्म लेता है। हे महापौरव ! अपने पुत्र और पत्नी को स्वीकार कर आनन्द का उपभोग करो। ऐसी आकाशवाणी होने पर महाराज दुष्यन्त पत्नी और पुत्र को लज्जित होकर स्वीकार करते समय कहते हैं कि मैंने विबाह अवश्य किया था परन्तु सम्भवतः लोक इस घटना को सत्य स्वीकार न करता। इसी कारण मैंने ऐसा आचरण किया है। आकाशवाणी से मेरे पूर्व कृत्य की पुष्टि हो गयी है। अतः अब मैं इन दोनों को सहर्ष स्वीकार करता हूं। संस्कृत नाटक-साहित्य के नियमानुसार नाटक का नायक "धीरोदाल" प्रताप- वान्, गुणवान्, नायकोमतः अर्थात् सच्चरित्र, लोक के लिए आदर्श होना चाहिए। दुष्यन्त के शकुन्तला को अस्वीकार करने से उसका चरित्र किसी भांति नायक के अनुरूप नहीं हो सकता और इस वृत्तांत से उस जैसे पुरुषवंश में उत्पन्न सम्राट् के खरित्र में कलंक आता है तथा वह असत्यवादी प्रमाणित होता है। इसी कारण कालिदास ने दुर्वासा ऋषि के श्राप का समावेश किया है। पति की सतत चिन्ता में व्याकुल रहने के कारण दुर्वासा ऋषि के आगमन पर शकुन्तला उनका यथोचित अतिथि-सत्कार करने में असमर्थ रहती है और वह उस पर कुद्ध हो श्राप दे देते हैं कि जिस पति को तुम स्मरण कर रही हो वह तुम्हारा प्रणय विषयक समस्त वृत्तान्त भूल जावेगा और तुम्हारे द्वारा पुनः-पुनः स्मरण करवाने पर भी उसे याद नहीं आयेगा। उसकी सखी अनुसूया के दुर्वासा को बहुत समझाने पर उन्होंने दुष्यन्त के सम्मुख कोई चिह्न या अभिज्ञान उपस्थित करना शकुन्तला के श्राप की निवृत्ति मान लिया। पति के समीप पहुंचने पर वह उसे अस्वीकार करता है। इस अवसर पर महाभारत की कथा के समान वह अकेली नहीं है परंतु उसके साथ गौतमी और कण्व के प्रधान शिष्य शार्ङ्गरव तथा शारद्वत भी हैं। शकुन्तला के अस्वीकृत होने पर वह स्वयं तथा उसके सहयोगी दुष्यन्त को समझाते हैं तथा महाराज शकु- न्तला द्वारा चिह्न दिखलाने के प्रस्ताव को स्वीकृत कर लेते हैं। शक्रावतार में वन्दना करते समय जल में अंगूठी के गिर जाने के कारण शकुन्तला ऐसा करने में

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असमर्थ होती है। इसलिए उसका पति उसे किसी भांति भी स्वीकार करने में उद्यत नहीं होता। आकाश से एक दिव्य ज्योति का आगमन होता है तथा वह शकुन्तला को उसकी माता मेनका के समीप ले जाती है। महाभारत की कथा में दुष्यन्त द्वारा शकुन्तला का अस्वीकार किया जाना उसके चरित्र को कलंकित कर देता है। एक राजर्षि के लिए स्वेच्छानुसार गांधर्व विवाह करने के उपरान्त लोकापवाद के भय से पत्नी को अस्वीकार करना सचमुच ही असत्याचरण है और भारतीय सभ्यता के अनुसार सर्बथा अनुचित है। दुष्यन्त के इस कलंक को दूर करने के लिए इस श्राप का निर्माण किया गया है। उसको पूर्व वृत्तांत विस्मृत हो जाता है। यही कारण है कि वह अपनी पत्नी को आगन्तुक गर्भवती स्त्री के रूप में अस्वीकार कर देता है। यह विचार कर उसके लिए ऐसा करना किसी प्रकार भी अनुचित प्रतीत नहीं होता। इस प्रकार महा- कवि कालिदास ने अपने नाटक के नायक के चरित्र को निर्दोष प्रमाणित करने के लिए एक अनुपम प्रतिभा दिखलायी है। महाभारत में आकाशवाणी के उपरान्त दोनों के विवाह की पुष्टि होती है और शकुन्तला को पत्नी के रूप में स्वीकार किया जाता है। कालिदास का भी दोनों के मेल करवाने का ढंग सचमुच अनुपम है। इन्द्र को सहायता पहुंचाने के उपरान्त लौटते समय वह मरीचाश्रम में अपने पुत्र सर्वदमन से मिलते हैं। उस समय वह बालक सिंह के साथ खेलता हुआ पाया जाता है जिसको अवलोकन कर उन्हें एक अद्भुद् वात्सल्य रस का अनुभव होता है। सहसा ही उन्हें उससे प्रीति हो जाती है। उसकी शैशवीय चेष्टाओं का राजा के मन पर असा- धारण प्रभाव पड़ता है और वह पुत्राभाव के कारण बहुत दुखी होते हैं और कहते हैं

आलक्ष्यदन्तमुकुलाननिमित्तहास. .... रव्यक्तवर्णरमणीयवचः - प्रवृत्तीन्। अङकाश्रयप्रणयिनस्तनयान् बहन्तो धन्यास्तवङ्गरजसा कलुषीभवन्ति॥-अ० शा० ७।१७ अकारण हँसने से जिसके नये-नये दांत कभी-कभी दिखाई दे जाते हैं, तोतली बोली में बोले गये जिसके वाक्य बड़े मीठे लगते हैं और गोद में आने के लिए जो प्रार्थना

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कर रहा है, ऐसे पुत्र या पुत्री के गोद में लेने से भाग्यवान् पुरुषों के ही अंग उन बच्चों की धूल से मलिन होते हैं अभागों के नहीं। इस उक्ति से पुत्रहीन लोगों की मानसिक व्यथा का स्पष्ट चित्रण मिलता है। सर्वदमन के जातकर्म संस्कार के समय महर्षि मरीचि ने उसकी बाहु पर एक रक्षासूत्र बांधा था जिसके भूमि पर गिरने पर उसके माता-पिता और उसके अतिरिक्त यदि अन्य कोई व्यत्ति किसी कारणवश उसे उठा ले तो वह सूत्र सर्प का रूप धारण कर उसे डस लेता था। इसी अवसर पर वह सूत्र गिर पड़ा तथा सहसा दुष्यन्त ने उसे उठा लिया और उसका उन पर किंचिन्मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा। इस प्रकार उनके पुत्र-पिता-सम्बन्ध की पुष्टि हुई। यद्यपि इसके कुछ प्रमाण पहले भी मिल चुके थे जो कि दुष्यन्त के हृदयोद्गार से प्रकट हो चुके थे। इस प्रकार महाराज दुष्यन्त का उनकी पत्नी से साक्षात्कार एवं पुनममिलन होता है और श्राप का वृत्तांत ज्ञात होने पर शकुन्तला पति के पूर्वकृत्य को किसी भांति अनुचित नहीं समझती तथा दोनों एक अलौकिक आनंद का अनुभव करते हैं। कालिदास का उन दोनों पति-पत्नी के मिलन करवाने का ढंग सचमुच बहुत अनूठा है। (६) अंगूठी की घटना का समावेश करने से भी नाटक में एक रोचक विचि- त्रता उत्पन्न हो गयी है। दुष्यन्त अपनी राजधानी की ओर प्रस्थान करते समय शकुन्तला को प्रेम-भेंट के रूप में अंगूठी प्रस्तुत कर लौट जाते हैं। यही अंगूठी कोपमूर्ति दुर्वासा ऋषि के परम दुःखदायी श्राप का उपराम करने में भी समर्थ होती है और शक्रावतार में गिर जाने के कारण शकुन्तला अपने पति को अपने प्रणय का पूर्व वृत्तांत स्मरण करवाने में असमर्थ होती है। इसी अंगूठी की घटना के समावेश करने के कारण महाकवि कालिदास को तत्कालीन दंड-व्यवस्था का चित्र प्रस्तुत करने में पर्याप्त सफलता मिली है जो कि अंगूठी के महाराज के समीप पहुंचने तक में घटित होती है, जैसा कि अंगूठी पानेवाले मछुए के प्रति अधि- कारियों के व्यवहार से विदित होता है। अंगूठी पाकर शकुन्तला की दुष्यन्त को याद आती है और वह सतत उसके विरह में व्याकुल रहने लगता है। इस घटना के नाटक में समावेश करने से कालिदास को विरह का रोचक वर्णन प्रस्तुत करने का भी पर्याप्त अवसर मिला।

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हमने उपर्युक्त पंक्तियों में महाकवि द्वारा किये गये उन परिवर्तनों का संक्षेप में अवलोकन किया है जो उसने अपने अमर नाटक अभिज्ञानशाकुन्तल में महाभारत के आदि पर्व के अन्तर्गत 'शाकुन्तलोपाख्यान' की मूल कथा में किये हैं। इन परिवर्तनों के ही कारण कालिदास संस्कृत साहित्य के सर्वश्रेष्ठ नाटककार हैं और "अभिज्ञान शाकुन्तलम्" उनकी सर्वश्रेष्ठ नाटय कृति समझी जाती है।

अभिज्ञान शाकुन्तल में सामाजिक चित्रण इस ग्रंथ के अवलोकन करने से कालिदास के समय की तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति पर पूर्णरूपेण प्रकाश पड़ता है। ब्राह्मण यज्ञ-याग, अध्ययन-अध्यापन आदि कार्यों में रत रहते थे। राजा प्रजा का रंजन करनेवाला ही होता था। वैश्य व्यापार के लिए दूर देशों में आवागमन किया करते थे तथा समुद्र-यात्रा में भी कुशल थे। शूद्र भी स्वधर्मानुसार राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति में ही रत रहना अपना श्रेय समझते थे। आश्रम-मर्यादा की भी उस समय पर्याप्त प्रगति थी। ब्रह्मचर्य और गृहस्थ आश्रम विधिवत् समाप्त कर लोग वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करते थे। राजा दुखियों एवं पीड़ितों की रक्षा करना अपना परम पुनीत कर्त्तव्य समझता था। शकुन्तला के समीप सर्वप्रथम दुष्यन्त भौंरे के अन्याय के रक्षक के रूप में ही पहुंचता है। मनु के आज्ञानुसार राज्यकर आय का छठा भाग लिया जाता था जो कि महाकवि द्वारा प्रयुक्त राजा के लिए षष्ठांशवृत्ति शब्द से प्रकट होता है। निःसंतान व्यक्ति के स्वर्गस्थ होने पर उसकी चल एवं अचल समस्त सम्पत्ति राजा के अधीन हो जाती थी। वृद्धावस्था में राजा सपत्नीक वानप्रस्थ आश्रम का अनुसरण करता था और राज्य का भार उचित उत्तराधिकारी पर पड़ता था। कैदियों तथा अत्याचारियों को मारने के लिए अधिकारियों के हाथों में खुजली उठा करती थी और वे घूस लेने में बड़े कुशल थे। धीवर के प्रति किया गया दुर्व्य- वहार इसका ज्वलन्त उदाहरण है।

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अभिज्ञानशाकुन्तल की भाषा एवं शैली

जैसा कि पहिले लिखा जा चुका है, अभिज्ञान शाकुतल महाकवि कालिदास की समस्त रचनाओं में सर्वोत्कृष्ट एवं संस्कृत नाटक-साहित्य की सर्वश्रेष्ठ रचना है। भाषा भी सर्वथा ग्रंथ के अनुरूप ही सरस, प्रांजल, परिमारजित एवं प्रवाहपूर्ण है। स्थान-स्थान पर मुहावरेदार वाक्यों तथा चुस्त प्रयोगों से कवि ने एक अपूर्व सजीवता का संचार किया है। शकुन्तला को दुर्वासा का श्राप हो जाने पर अन- सूया प्रियंवदा से ऐसा प्रयत्न करने को कहती है कि यह चित्तविदारक समाचार कोमल-हृदय शकुन्तला के समीप न पहुंचे जिसका उत्तर प्रियवंदा बड़े ही चुभते हुए शब्दों में इस प्रकार देती है- "कः इदानीमुष्णोदकेन नवमालिकां सिञ्चति. " "भला ऐसा कौन है जो कि जूही की कोमल कमनीय लता को उबलते हुए जल से सींचेगा।" पात्रानुरूप भाषा के प्रयोग में भी कालिदास ने पर्याप्त कुशलता का परिचय दिया है। महात्मा कण्व की उक्तियां उनके सतत यज्ञयाग एवं अध्यापन-कार्य में रत रहने से सर्वथा उनके अनुकूल ही प्रतीत होती हैं। शकुन्तला और दुष्यन्त के परस्पर गांघर्व विवाह का अनुमोदन करते हुए उनकी उक्ति है- "दिष्टया धूमाकुलितदृष्टेरपि यजमानस्य पावक एवाहृतिः पतिता।" यह हर्ष का विषय है कि धूम से व्याकुल दृष्टिवाले यजमान की आहुति अग्नि में ही गिरी। इस प्रकार विदूषक की उक्तियों में उसके पेटूपन एवं हास्य की सुमनो- हर झलक दृष्टिगोचर होती है। न केवल मनुष्यों का अपितु पशु-पक्षियों के सुन्दर रूप का निरूपण करने में भी कवि को अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है। नाटक के आरंभ में महाराज दुष्यंत के रथ में जुते हुए घोड़ों की गति का वर्णन देखिए- "ग्रीवाभ्गाभिरामं मुहुरनुपतति स्यंदने बद्धदृष्टिः पश्चार्द्धेन प्रविष्टः शरपतनभयाद्भूयसा पूर्वकायम्। शष्परर्व्धावलीढ: श्रमबिवृतमुखभ्रंशिभि: कीर्णवर्त्मा पश्योवग्रप्लुतत्वाद्वियति बहुतरं स्तोकमुर्व्या प्रयाति॥" अ० झा० १।७

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यह महाराज दुष्यन्त की अपने सारथी के प्रति उक्ति है. यह अश्व पीछे तीव्र गति से दौड़ते हुए रथ की ओर बार-बार देखता है। बाण के आक्रमण के भय से अपने शरीर के पिछले भाग को अगले भाग के अन्तर्गत समेट लेता है अर्थात् अंगड़ाई लेता है। बहुत अधिक थकान के कारण उसका मुख खुल जाने से आधी चबायी हुई घास के गिर जाने से सारा रास्ता भर गया है। देखो न ऊंची-ऊंची चौकड़ी भरता हुआ यह अधिकतर आकाश में ही रहता है तथा भूमि में बहुत ही कम अर्थात् अत्यधिक तीव्र गति के कारण रथ में जुता हुआ घोड़ा अपने लिए भूमि की अपेक्षा आकाश में ही अधिक रहता है। यह श्लोक स्वभावोक्ति अलंकार का मनोहर उदाहरण है। उपमाओं के लिए कालिदास की शैली विख्यात है जैसा कि इस श्लोक से प्रकट होता है। 'उपमा कालिदासस्य भारवेरर्थगौरवम्। नैषधे पदलालित्यं माघे सन्ति त्रयो गुणा:।।' उपमा के रोचक और सरल वर्णन करने में कालिदास का स्थान न केवल संस्कृत के साहित्यकारों में अपितु संसार के समस्त साहित्याचार्यों में अग्रगण्य है। महात्मा कण्व के आश्रम में मुनि-कन्या शकुन्तला से प्रथम साक्षात्कार होने के सुअवसर पर महाराज दुष्यन्त उसके कमनीय रूप एवं अनवद्य सौन्दर्य के विषय में अपने हृदयोद्गार प्रकट करते हुए कहते हैं-

"अनाघातं पुष्पं किसलयमलूनं कररुहै रनाविद्धं रत्नं मधु नवमनास्वादितरसम्। अखण्डं पुण्यानां फलमिव च तब्रूपमनघं न जाने भोक्तारं कमिह समुपस्थास्यति विषिः॥" अ० शा० २।१० यह मुनि-कन्या शकुन्तला वह सुमनोहर सुमन है जिसे सूंघने का सौभाग्य अद्य पर्यन्त सम्भवतः किसी को प्राप्त नहीं हुआ है। यह एक कमनीय नूतन किस- लय है जिस पर किसी के नाखून तक की खरोंच नहीं लग पायी है। यह वह अमूल्य रत्न है जो कि अभी तक बींधा नहीं गया। यह वह स्वच्छ मधु है जिसका कि अभी तक किसी ने स्वाद नहीं लिया है। इस विषय में मुझे अतिशय जिज्ञासा है कि न

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जाने परम पिता परमेश्वर किस पूर्व जन्म के संचित पुण्यों के अनुरूप अनेकों गुणों के सारभूत पुरुष को इस निष्कलंक सुमनोरम सौन्दर्य का भोक्ता बनायेगा। व्यंजना वृत्ति कालिदास की शैली का विशेष गुण है। एक भाव-विशेष का लम्बा-चौड़ा विस्तृत वर्णन न कर कवि उसकी सूक्ष्म एवं मार्मिक व्यजंना कर देना ही श्रेयस्कर समझता है। लम्बी प्रतीक्षा के उपरान्त जब दुष्यन्त शकुन्तला को देखते हैं तो सहसा आनन्दोल्लास व्यंजित करते हैं। 'अये लब्धं नेत्र-निर्वाणम्' अर्थात् मेरे नेत्रों ने निर्वाण का परमानन्द प्राप्त कर लिया है। जैसा कि योगी सतत परिश्रम और योगाभ्यास के उपरान्त निर्वाण का परमानन्द प्राप्त करता है उसी प्रकार आज मैंने नेत्रों से उस आनन्द का अनुभव किया। दुष्यन्त कार्यवश शकुन्तला को छोड़कर अपनी राजधानी को चले जाते है और वहां से न कोई अपनी कुशल-क्षेम की सूचना भेजते हैं और न शकुन्तला की ही कुछ सुधि लेते हैं। इस अवसर पर बहुत कुछ लिखा जा सकता है। महर्षि दुर्वासा का उचित अतिथि-सत्कार न करने के कारण उसको शाप मिल जाता है। उसी के आधार पर हम उस हतभागिनी अबला शकुन्तला की मनोव्यथा का अनुमान कर सकते हैं। चतुर्थअंक में जिस समय शकुन्तला पतिगृह जाने को उद्यत होती है उस समय का भी कवि ने बड़ा मनोरम वर्णन प्रस्तुत किया है। कन्या को प्रथम बार उसके पति के गृह में भेजने के अवसर पर प्रत्येक कुटुम्बी के हृदय में एक असाधारण मानसिक व्यथा उत्पन्न होती है। उसका अनुभव करते हुए महर्षि कण्व कहते हैं

यास्यत्यद्य शकुन्तलेति हृवयं संस्पृष्टमुत्कण्ठया कण्ठः स्तम्भितवाष्पवृत्तिकलुषश्चिन्ताजडं दर्शनम्। वैक्लव्यं मम तावदीदृशमपि स्नेहादरण्यौकसः पीड्यन्ते गृहिणः कयं न तनया-विश्लेष-दुःखेन वै॥ अ० शा० ४।५ आज प्रिय शकुन्तला पतिगृह जायगी। अतः विषाद ने आकर मेरे हृदय को व्याकुलता से उत्कंठित कर दिया है। अश्रुधारा के रोकने का प्रयत्न करता हूं लेकिन वह कंठ की ध्वनि को अस्पष्ट कर देती है। सतत चिन्ता के कारण मेरी

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दृष्टि-शक्ति भी कुंठित होने लगी है। जब मुझ जैसे वनवासी को स्नेह के कारण ऐसी विह्वलता की पराकाष्ठा हो रही है तब कन्या के नव-वियोग के अवसर विवाह पर साधारण गृहस्थ जनों की क्या अवस्था होगी। पतिगृह-गमन के अवसर पर महात्मा कण्व का शकुन्तला के प्रति गार्हस्थ्य धर्म का उपदेश भी अवसर के सर्वथा अनुरूप है और आज भी एक सद्योविवाहिता वधू के लिए आदर्श है। वह इस प्रकार है-

शुश्रूषस्व गुरून् कुरु प्रियसखीवृत्ति सपत्नीजने, भुर्तुरविप्रकृतापि रोषणतया मा स्म प्रतीपं गमः। भूयिष्ठं भव वक्षिणा परिजने भोगेष्वनुत्सेकिनी यान्त्येवं गृहिणीपदं युवतयः वामाःकुलस्याधयः॥ अ० शा० ४।१७

हे शकुन्तला ! तुम अपने सतत निवास-स्थान पतिगृह में पहुंच कर गुरु एवं अन्य पूज्य जनों की यथोचित सेवा करो, पति की अन्य सौतों से प्रिय सखी के समान आचरण करो। यदि किसी कारणवश तुम्हारा पति अपमान भी करे तो तुम कोधवश हो किसी कारण भी उसका अनिष्ट न करो। दास-दासी इत्यादि सेवक- वृन्द पर सदैव उदारता प्रदर्शित करती रहना। भोग एवं ऐश्वर्य में आसक्त होकर अभिमान कदापि न करना। हे प्रिय पुत्रि! इस प्रकार उपर्युक्त रीति से आचरण करनेवाली मनस्वी स्त्रियां ही सहजतापूर्वक गृहिणी पद को प्राप्त होती हैं तथा इसके प्रतिकूल आचरण करनेवाली वनिताएं गृहवासियों के हृदय को विषादग्रस्त करती हुई कुलघातिनी होती हैं। अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक ध्वन्यात्मक शैली का भी एक अपूर्व उदाहरण है। इस शैली के आधार पर कवि ने भविष्य की घटनाओं की ओर सूक्ष्म संकेत किया है। ग्रीष्म ऋतु के वर्णन में "दिवसाः परिणामरमणीयाः" नाटक के सुखद अन्त की ओर संकेत करता है। इसी प्रकार नाटक के आरम्भ में "ईषदीषच्चु- म्वितानि सुकुमारकेशर शिखानि" इत्यादि श्लोक दुष्यन्त एवं शकुन्तला के अल्प- स्थायी मिलन की ओर संकेत करता है। "आश्रममृगोऽयं न हन्तव्यः न हन्तव्यः" शकुन्तला के प्रति महाराज दुष्यन्त के दारुण प्रणय-प्रहार का सूचक है। इस प्रकार

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की अनेकों उक्तियों का समावेश इस अनुपम नाटक में किया गया है जो कि भावी घटनाओं का पहले से ही संकेत मात्र हैं इस नाटक के पठन से हमें विदित होता है कि महाकवि कालिदास के समय में नृत्य, संगीत, चित्रकला इत्यादि ललित कलाओं का पर्याप्त विकास हो चुका था। कवि ने अपनी रचना में ऐसे अनेकों भावपूर्ण स्थल उपस्थित किये हैं जिनका बड़ा ही रोचक चित्र खींचा जा सकता है। दुष्यन्त धीवर द्वारा अपनी खोई हुई अंगूठी को पाकर अपनी प्रियतमा के प्रति किये गये अपराधों का स्मरण करते हैं तथा विलाप करते हुए शकुन्तला द्वारा चित्रित एक सुन्दर चित्र का बड़ा रोचक वर्णन करते हैं। वह चित्र अधूरा है। मालनी नदी, हिमालय, हंसयुगल, हरिण के चित्रण में अन्य अनेक उपयुक्त न्यूनताओं को बता कर दुष्यन्त ने तत्कालीन चित्र-कला का परिचय दिया है। अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक में प्रकृति एवं जड़पदार्थों का मानवीकरण बड़े ही सुन्दर ढंग से किया गया है। पशु-पक्षी एवं तपोवन के वृक्ष-लता एवं तरु भी मानवी वेदनाओं के प्रति उचित समवेदना प्रकट करते हैं। शकुन्तला के पतिगृह- गमन के अवसर पर तपोवन के तरुओं तथा लताओं को संबोधित करते हुए महात्मा कण्व कहते हैं-

पातुं न प्रथमं व्यवस्यति जलं युष्माष्वपीतेषु या नादत्ते प्रियमण्डनापि भवतां स्नेहेन या पल्लवम्। आद्ये वः कुसुमप्रसूतिसमये यस्या भवत्युत्सवः सेयं याति शकुन्तला पतिगृहं सर्वेरनुज्ञायताम्॥ अ० शा० ४।८ जो आप लोगों की यह प्रिय शुभचितिका आप लोगों को सींच कर जब तक पानी नहीं पिला लेती थी स्वयं जल तक ग्रहण नहीं करती थी, जो अत्यघिक शृंगार प्रिय एवं सजने की शौकीन होने पर भी आप लोगों के प्रति अतिशय स्नेह होने के कारण कोई किसलय व कोमल पत्र भी न तोड़ती थी। आपके पुष्प लगने के समय जों अति हर्ष-उल्लास मनाया करती थी आज वही शकुन्तला अपने पतिगृह को प्रस्थान कर रही हैं, आप सब लोग इस अवसर पर उसे जानें की उचित अनुमति

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प्रदान करें। चेतन के प्रति अचेतन प्राणियों की आत्मीयता का यह सुन्दर उदाहरण है। इस अवसर पर समस्त तपोवन की व्याकुलता का भी एक चित्र देखिए-

"उद्गलितदर्भकवलाः मृगयः परित्यक्तनर्तना मयूराः। अपसृतपाण्डुपत्रा मुञ्चन्त्यश्रूणीव लताः"॥ -- अ० शा० ४।११

हरिणियों के मुख से भी इस असाधारण दुःख के अवसर पर घास गिर पड़ती है। मोर नाचना त्याग देते हैं। लताएँ सूखे पत्ते के रूप में आंसू गिराती हैं। शकु- न्तला वनज्योत्स्ना नामक लता-संगिनी का स्नेहपूर्वक आलिंगन करती है एवं गर्भिणी सखी मृगी का प्रसव संवाद भेजने के लिए पिता से साग्रह विनय करती है। शिष्ट एवं मनोहर परिहास का भी इस नाटक में बड़ा मनोहर एवं सुरुचिपूर्ण वर्णन किया गया है। द्वितीय अंक में जब सेनापति राजा के सम्मुख मृगया के गुणों का वर्णन करता है विदूषक उसे अपनी स्वाभाविक हास्यपूर्ण वाणी में उत्तर देता है। मृगया में उत्साह न बढ़ा कर तुम शान्त रहो। तुम वन में भटको। मनुष्य के नासिका-भक्षण के लालची किसी वृद्ध भालू के मुख में तुम पुनः गिर जाओगे। इसी प्रकार छठे अंक में विरह-व्याकुल दुष्यन्त के आम्रमंजरी को मदन-बाण कहने पर विदूषक उस पर लाठी से प्रहार करने के लिए दौड़ता है। इस अंक का प्रवेशक धीवर तथा दंड-विभाग के अधिकारियों के मध्य में बड़ा ही मनोहर विनोद- पूर्ण कथनोपकथन प्रस्तुत करता है। इस अभिज्ञान शाकुन्तल नाटक के नायक महाराज दुष्यन्त धीरोदात्त नायक हैं। वे मनोहर, गम्भीराकृति, पराक्रमशाली एवं ललितकला-मर्मज्ञ हैं। पांचवें अंक में सम्राज्ञी हंसपदिका द्वारा उलाहना सुनकर उनकी उक्ति (अहो राग परिवाहिनी गीतिः) उनकी संगीत एवं ललित-कला-प्रियता की परिचायक है। प्रकृति के सौन्दर्य का उन पर असाधारण प्रभाव पड़ता है। ऋषि- मुनियों के आश्रम के प्रति उनमें अटूट श्रद्धा है जिसको शार्ङ्रगरव की कटूक्तियां किंचिन्मात्र भी विचलित करने में समथ न हुई। महात्मा कण्व के आश्रम में दैवी सुन्दरता की मूर्तिमान् प्रतिमा शकुन्तला पर अनुरक्त होना सर्वथा उनके

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अनुरूप ही था। उस आश्रम-कुमारी को सहधर्मचारिणी बनाने के पूर्व उन्होंने अपनी कुल-मर्यादा के अनुसार उसका ब्रह्मचारिणी होना निश्चित कर लिया था। अनेक पत्नियों के भर्ता होने पर भी दुष्यन्त शकुन्तला के प्रति सदैव विशेष रूप से कारुणिक रहते थे। कवि ने नाटक के नायक दुष्यन्त की मानवोचित दुर्बलताओं का भी यथा- स्थान दिग्दर्शन कराया है। आरंभ के तीन अंकों में पतन, तत्पश्चात् दो अंकों में उन्नति की चेष्टा और अंतिम दो अंकों में उत्थान है। एक कन्या पर दृष्टिपात करते ही सहसा उस पर अनुरक्त हो जाना, युवतियों की विलासमय करीड़ा को लता एवं झाड़ियों में छिप कर देखना तथा शकुन्तला के अभिभावक कण्व की वापसी के लिए कुछ भी प्रतीक्षा न करना, स्वेच्छापूर्वक महात्मा मनु द्वारा निषिद्ध बताये हुए गांधर्व रीति से उससे परिणय कर लेना उनके पतन की पराकाष्ठा की हमें सूचना देते हैं। माता की आज्ञा के विरुद्ध विदूषक से मिथ्या बोलकर उसे राजधानी भेज देना भी उनके लिए उचित नहीं है। वह अकारण किसी सुन्दर स्त्री पर मोहित नहीं हो जाते। "अनिर्वर्णनीयं परकलत्रं" तथा "अनार्यः परदारव्यवहारः," आदि उक्तियों में उनकी धर्मपरायणता की झलक मिलती है। छठे अंक में शकुन्तला का स्मरण होने पर वह अतिशय दुःख का अनुभव करते हैं। अपने राजकीय कर्त्तव्य एवं धर्म- व्यवस्था में वे किचिन्मात्र भी उदासीनता प्रकट नहीं करते। पुत्र भरत को देख- कर उनमें एक अपूर्व वात्सल्य का भाव उत्पन्न होता है। अन्त में पत्नी शकुन्तला के चरणों में मस्तक रख क्षमा मांगना उनकी धर्म-परायणता एवं शिष्टाचार की भावना का चरमोत्कर्ष है। नाटक की नायिका शकुन्तला के चरित्र-चित्रण में भी कवि ने अपनी असा- धारण प्रतिभा का परिचय दिया है। माता प्रकृति के संरक्षण में उसने अपने लावण्य एवं रूप का पर्याप्त विकास किया है। वह आश्रमवासिनी, ब्रह्मचारिणी होकर गृहस्थ है एवं ऋषि-कन्या के रूप में एक सहज प्रेमिका भी है। शकुन्तला सहज स्वभाव की नारी थी तथा नारी-हृदय के प्रेम, उच्छ्वास एवं तरंग उसमें पर्याप्त मात्रा में विद्यमान थी। पति के समान ही उसके

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चरित्र में भी उसके उत्थान और पतन की भावना दृष्टिगोचर होती है। पतिदर्शन होते ही तत्काल ही उसके हृदय में प्रगाढ़ एवं अटूट प्रेम की जाग्रति होती है। पांचवें अंक में जब पति उसे अस्वीकार कर समस्त नारी जाति को अशि- क्षितपटुत्व का दोष लगाता है, उसके आत्मसम्मान पर भारी धक्का लगता है। वह भी अवसर से नहीं चूकती तथा राजा को धर्म का चोला पहिने तृण से ढँके कूप के समान कह कर अपने अलौकिक स्वाभिमान का परिचय देती है। सातवें अंक में वह एक विरहिणी के रूप में चित्रित की गयी है। नाना प्रकार के कष्ट भोगने पर भी वह सदा पति के चिंतन में रत रहती है। पुत्र भरत के दुष्यन्त के विषय में प्रश्न करने पर "वत्स ते भागधेयानि पृच्छ" (बेटा अपने भाग्य से पूछ) उत्तर देती है। इस उत्तर में पति एवं दैव का अन्याय, पुत्र के प्रति स्नेह तथा विधाता के प्रति समुचित आदर अभिव्यक्त होता है। इस प्रकार महाकवि कालिदास ने शकुन्तला को स्नेह, करुणा एवं लज्जा की एक सजीव प्रतिमा के रूप में प्रस्तुत किया है। अपने अनुपम कथानक एवं भाषा के लालित्य के कारण अभिज्ञान शाकुन्तल एक अत्यन्त लोकप्रिय नाटक हो गया है। संस्कृत साहित्य के विदेश-गमन होने पर विदेशों में भी इस नाटक का पर्याप्त प्रभाव पड़ा। सन् १७८४ ई० में रायल एशियाटिक सोसाइटी आफ बंगाल के आदेशानुसार सर विलियम जोन्स नामक अंग्रेज़ विद्वान् ने इस नाटक का सर्वप्रथम अंग्रेज़ी अनुवाद प्रस्तुत किया जिसका विदेशी पाठकों पर असाधारण प्रभाव पड़ा। जर्मनी देश के प्रसिद्ध कवि गेटे ने इस नाटक का अनुवाद पढ़ने के उपरान्त जो हृदयोद्गार व्यक्त किये वे आज भी स्वणाक्षरों में लिखने योग्य हैं। मूल जर्मन भाषा में है जिसका अंग्रेजी अनुवाद निम्नलिखित है-

"Wouldst thou the young year's blossoms and the fruits of its decline, And all by which the soul is charmed, enraptured feasted, fed ? ८

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Wouldst thou the earth and heaven itself in one soul name combine ? I name thee, O Shakuntala and all at once is said".

यदि यौवन-वसन्त का पुष्प-सौरभ और प्रौढ़त्व, ग्रीष्म का मधुर फल-परिपाक एकत्र देखना चाहते हो, अथवा अन्तःकरण को अमृत के समान सन्तृप्त एवं मुग्ध करनेवाली वस्तु का अवलोकन करना चाहते हो, अथवा स्वर्गीय सुषमा एवं पार्थिव सौन्दर्य इन दोनों के अभूतपूर्व सम्मिलन की अपूर्व झांकी देखना चाहते हो तो एक बार अभिज्ञान शाकुन्तल का अनुशीलन एवं मनन करो।