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७. शूद्रक
(द्वितीय शताब्दी या तृतीय शताब्दी ई० पू०)
प्रसिद्ध प्रकरण मृच्छकटिक के रचयिता महाकवि शूद्रक थे जिनके जीवन के विषय में बहुत ही अल्प सामग्री उपलब्ध है। अनेक विदेशी विद्वान् उन्हें कल्पित व्यक्ति ही मानते हैं। इस सम्बन्ध में ऐतिहासिक अनुसंधान की महती आवश्यकता है। इस विषय में बिना पर्याप्त अनुसंधान के कुछ निर्णय करना संभव प्रतीत नहीं होता। कादम्बरी, हर्षचरित, वेतालपंचविशतिका, स्कन्द पुराण आदि अनेक ग्रन्थों में शूद्रक का उल्लेख है। मृच्छकटिक की प्रस्तावना में शूद्रक के निधन का भी इस प्रकार उल्लेख किया गया है-
"ऋग्वेदं सामवेदं गणितमथ कलां वैशिकीं हस्तिशिक्षा ज्ञात्वा शर्वप्रसादादव्यपगततिमिरे चक्षुषी चोपलभ्य। राजानं वीक्ष्य पुत्रं परमसमुदयेनाश्वमेधेन चेष्ट्वा लब्ध्वा चायुः शताब्दं दशदिनसहितं शूद्रकोर्जाग्न प्रविष्टः ॥" मृच्छ० १।४ भगवान शिव के अनुग्रह से शूद्रक ऋग्वेद, गणित, वाणिज्य और हाथियों को वश में करने की विशेष शिक्षा प्राप्त करके, अज्ञान अंधकार के नाश होने पर ज्ञानचक्षु प्राप्त कर समारोहपूर्वक अश्वमेध यज्ञ पूर्ण करने के उपरान्त अपने पुत्र को राजा के रूप में देखकर अर्थात् राज्यारूढ़ कर १०० वर्ष और दस दिन की आयु को प्राप्त कर अग्नि में प्रविष्ट हो गये। इस प्रकार इसमें शूद्रक की मृत्यु का स्पष्ट उल्लेख है जिस कारण कीथ का मत है कि कोई भी मनुष्य अपनी मृत्यु को पहले से नहीं जान सकता। इस श्लोक के ग्रन्थ में समाविष्ट होने के कारण यह ग्रन्थ अन्य किसी कवि की रचना हो सकता
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है और शूद्रक केवल एक काल्पनिक व्यक्ति मात्र ही रह जाते हैं। यह श्लोक प्रक्षिप्त हो सकता है। केवल एक श्लोक के आधार पर रचयिता के अस्तित्व को ही अस्वी- कार करना उचित नहीं। एक जनश्रुति के अनुसार रामिल्ल और सौमिल्ल ने शूद्रक कथा नामक ग्रन्थ लिखा है जिसमें कि शिव की वंदना और स्तुति है। इस प्रकार भी शूद्रक एक काल्पनिक व्यक्ति ही रहते हैं। सम्भवतः कविपुत्र या सौमिल्ल ने, जिनका कि कालिदास ने मालविकाग्निमित्र में उल्लेख किया है, इसकी रचना की हो। वामन ने (दवीं शताब्दी ई०) मृच्छकटिक को शूद्रक की ही रचना स्वीकार किया है।
रचना-काल कालिदास के रूपकों पर मृच्छकटिक का स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है। जितने प्रकार की प्राकृत इस ग्रन्थ में प्रयुक्त हुई है उतनी कालिदास ने नहीं की है। शैली भी अपेक्षाकृत सरल है। अतः इसकी रचना कालिदास के पूर्व की प्रतीत होती है। अब प्रश्न उठता है कि कालिदास ने इनका उल्लेख क्यों नहीं किया। उस समय के कवि राजनीतिक परिस्थिति के अशान्तिमय होने के कारण किसी पूर्व ग्रन्थ का परिवर्द्धन किया करते थे। संभवतः कालिदास शूद्रक को उसका रच- यिता न मानते हों और उनकी दृष्टि में रामिल्ल, सौमिल्ल या कविपुत्र ही इस प्रकरण के कर्ता हों जिनका कि उन्होंने अपनी प्रथम रचना मालविकाग्निमित्र के आरम्भ में ही उल्लेख कर दिया है। मृच्छकटिक में राष्ट्रिय शब्द का प्रयोग एक पुलिस के अधिकारी के रूप में हुआ है जो कि उसके शाब्दिक अर्थ के अधिक उपयुक्त है। राष्ट्र का रक्षक राष्ट्रिय हुआ जिसका पुलिस के अधिकारी के लिए प्रयुक्त होना उचित प्रतीत होता है, जबकि कालिदास ने इस शब्द को रूढ़ि करके राजा के साले के स्थान पर प्रयुक्त किया है। शब्द का रूढ़ होना बाद की घटना होती है। अतः शूद्रक कालिदास के पूर्ववर्ती प्रतीत होते हैं। मृच्छकटिक में जो आठ प्रकार की प्राकृत प्रयुक्त हुई है वह व्याकरण के नियमों के सवथा अनुकूल नहीं है और विकास की पूर्व अवस्था ही प्रतीत होती है। इस प्रकार शूद्रक कालिदास के पूर्ववर्ती प्रमाणित होते हैं।
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मृच्छकटिक भास के चारुदत्त का परिवद्धित रूप है। अतः उसकी रचना भास के पश्चात् हुई है। भास का समय ईसा से लगभग ४०० वर्ष पूर्व या इससे पहले का है। इसलिए मृच्छकटिक की रचना भास और कालिदास के काल के बीच की प्रतीत होती है। प्रोफेसर कोनो का मत है कि यह ग्रन्थ तीसरी शताब्दी ई० की रचना है। इस ग्रन्थ में वर्णन है कि आर्यक पालक को मार स्वयं राजा बन जाता है। राजा के मारने की घटना का प्रकरण में समाविष्ट करना भी किसी तत्कालीन राजनीतिक क्रान्ति का द्योतक है। ईश्वरसेन या उसके पिता शिवदत्त ने अन्ध्र वंश का नाश करने पर २४८-४६ के लगभग चेदि संवत् चलाया। संभ- वतः किसी कवि ने इस घटना को ध्यान में रखते हुए ग्रन्थ की रचना की हो, किन्तु कालिदास के ग्रन्थों पर प्रभाव होने से यह मत उपयुक्त प्रतीत नहीं होता और केवल कोरी कल्पना मात्र जान पड़ता है।
मृच्छकटिक का कथानक यह ग्रंथ दस अंकों का प्रकरण है जिसमें दरिद्र ब्राह्मण चारुदत्त और वेश्या वसन्तसेना की प्रणयकथा वणित है। चारुदत्त और राजा का साला शकार दोनों ही वसन्तसेना पर अनुरक्त हैं। एक दिन शकार वसन्तसेना का पीछा करता है और रात होने के कारण युक्ति से वसन्तसेना चारुदत्त के घर में प्रविष्ट हो जाती है तथा अपनी बहुमूल्य रत्नावली उसके समीप रख देती है। वसन्तसेना की दासी मदनिका शार्वलिक पर मुग्ध है जो अपनी प्रेमिका को मुक्त कराने के हेतु चारुदत्त के घर में सेंध लगा कर वसंतसेना के आभूषण चुरा लेता है और उनको वसन्तसेना को सम्पपत कर मदनिका को उसकी सेवा से मुक्त कर लेता है। चारुदत्त की पतिव्रता पत्नी धूता उन आभूषणों के स्थान पर अपने रत्न वसन्तसेना को दे देती है। इसी अवसर पर चारुदत्त का पुत्र रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी लिये हुए वसन्तसेना के घर जाता है और वसन्तसेना अपने रत्नों को उसकी मिट्टी की गाड़ी में भर देती है और उससे सोने की गाड़ी खरीदने का आदेश देती है। मृच्छ- कटिक अर्थात् मिट्टी की गाड़ी, इस प्रकरण का नामकरण भी इसी घटना के आधार पर हुआ है। ५
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दूसरे दिन चारुदत्त पुष्पकरण्डक नामक उद्यान में जाता है और वसन्तसेना भी उसके समीप जाने को उद्यत होती है किन्तु भ्रमवश चारुदत्त की गाड़ी के समीप ही खड़ी हुई शकार की गाड़ी में बैठ जाती है। इसी अवसर पर कुछ ज्योतिषी भविष्य- वाणी करते हैं कि तत्कालीन राजा पालक के पश्चात् गोपाल का पुत्र आर्यक राज्या- रूढ़ होगा। राजा इस घटना पर विश्वास कर आर्यक को बन्दीगृह का दण्ड देता है। आर्यक अधिकारियों से बचकर चारुदत्त की गाड़ी में बैठ जाता है। लोहे की बेड़ियों की ध्वनि को सारथी आभूषणों की झनकार समझ कर गाड़ी हांक देता है। आर्यक चारुदत्त के समीप पहुंचता है और उससे मित्रता कर कहीं छिप जाता है। वसन्तसेना को चारुदत्त के स्थान पर शकार मिलता है जो उससे प्रणय का प्रस्ताव करता है और जिसे वसन्तसेना ठुकरा देती है। शकार ऋुद्ध होकर उसका गला घोंट देता है और संवाहक नामक एक बौद्ध भिक्षु उसका उपचार कर पुनः जीवित करता है। शकार न्यायालय में उपस्थित होता है और चारुदत्त पर वसन्तसेना की हत्या का मिथ्या अभियोग लगाता है जिस कारण उसे प्राणदण्ड मिलता है। इस अवसर पर चारुदत्त का मित्र आर्यक पालक को मार स्वतः राजा बन जाता है। वह चारु- दत्त के स्थान पर मिथ्या अभियोग लगाने के कारण न्याय के अनुसार शकार को मृत्यु-दण्ड देता है। चारुदत्त क्षमा कर देते हैं और अन्त में वसन्तसेना और चारुदत्त दोनों का विवाह हो जाता है।
मृच्छकटिक में सामाजिक चित्रण मृच्छकटिक अपने ढंग का एक अनूठा प्रकरण है जिसमें कवि ने प्रेम के कथा- नक को अपनी रचना-कुशलता से राजनीतिक घटनाओं के साथ संबद्ध किया है। इसके अध्ययन से रोचकता के साथ-साथ तत्कालीन सामाजिक दशा पर भी पर्याप्त प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। समाज के विभिन्न वर्गों के लोगों-चोर, धूर्त, वेश्या, राज्य के अधिकारी आदि-का इसमें पर्याप्त विश्लेषण किया गया है। यद्यपि इस ग्रन्थ के अध्ययन से तत्कालीन राज्य के स्वरूप का पता नहीं चलता कि वह आधुनिक राजतंत्र था या प्रजातंत्र, तब भी विदित होता है कि उम्र समय
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राजा प्रजातन्त्र के सिद्धान्त के अनुकूल प्रतिनिधिरूप मंत्रियों की अनुमति से अनेक प्रकार के गुप्तचर विभाग के अधिकारीगण, दूत एवं अनेकों सेवकों की सहायता से राज्य-कार्य सम्पन्न करते थे। इस दशा का निरूपण करता हुआ न्यायालय में चारुदत्त न्यायाधीश के सम्मुख कहता है-
"चिन्तासक्तनिमग्नमंत्रिसलिलं दूतोमिशंखाकुलं पर्यन्तस्थितचारनक्रमकरं नागाश्वहिं स्राश्रयं। नानावाशक कंकपक्षिरुचिरं कायस्थसर्पास्पिदं नीतिक्षुण्णतटं च राजकरणं हिंत्र: समुद्रायते॥" मृच्छ० ९।१४ यह राजमंडल समुद्र के समान भयंकर हिंसक जन्तुओं से घिरा हुआ प्रतीत होता है जहां पर निरन्तर राज्य की अवस्थाओं पर विचार करते हुए चिन्तित मंत्रिगण जल के समान हैं और इधर-उधर से आनेवाले दूत लहरों से लाये हुए शंखों के समान हैं। चारों ओर स्थित गुप्तचर विभाग के अधिकारी मगर एवं नाकों के समान विद्यमान हैं। दोनों ही स्थानों पर अनेकों नाग और अश्व हिंसक हैं। राज्य के अनेक पदाधिकारी हिंसक जन्तुओं के समान प्रजा को भय दिखाते हैं। कायस्थ लोग सर्प के समान हैं। इस प्रकार यह राज्यमंडल हिंसक जन्तुओं के समान भयानक शक्तियों से घिरा हुआ है। इससे विदित होता है कि उस समय राजा लोग मंत्रियों की सलाह से कार्य किया करते थे। राज्य- प्रणाली कुछ गूढ़ हो चली थी। प्रजा राजदंड से भयभीत रहती थी। उस समय मृत्यु-दंड की प्रथा प्रचलित थी और न्याय सर्वथा दोष के अनुकूल एवं पक्षपात रहित ही हुआ करता था। यदि अभियोग चलानेवाला चाहे तो अपने प्रतिपक्षी को मुक्त भी कर सकता था। यद्यपि शकार को मृत्युदंड हो गया था, किन्तु चारुदत्त ने उसे क्षमा कर दिया। न्याय की व्यवस्था का इससे पता चलता है कि जिस समय चारुदत्त न्यायालय में उपस्थित हुआ, न्यायाधीश उसका बहुत आदर करते थे। परन्तु दोष सिद्ध होने पर उस जैसे ब्राह्मण को भी मृत्यु-दंड देने में तनिक भी न सकुचाये। चारुदत्त ब्राह्मण था और उसके द्वारा न्यायालय में दिये गये वक्तव्य से पता
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चलता है कि ब्राह्मण को उस समय दंड देना अनुचित समझा जाता था। जिस समय चारुदत्त पर अभियोग लगाया गया, वह कुद्ध होकर बोला-
"विषसलिलतुलाग्निप्रार्थिते मे विचारे ऋकचमिह शरीरे वीक्ष्य दात यमद्य। अथ रिपुवचनाव्श ब्राह्मणं मां निहंसि पतसि नरकमध्ये पुत्रपौत्रेः समेतः॥" मृच्छ० ९।४३ हे न्यायाधीश ! यदि विष, जल, तुला और अग्नि की साक्षी से मेरा न्याय किया गया है तो आज ही मेरे शरीर पर आरा चलाना चाहिए और यदि शत्रु के वचनों के वशीभत होकर आप मुझ ब्राह्मण को वध-दंड देते हैं तो आप अपने सकल पुत्र पौत्रों सहित नरक में जायेंगे। इस उक्ति से विदित होता है कि उस समय पौराणिक विचारों का प्राबल्य था और अग्नि, जल, तुला की साक्षी से न्याय किया जाता था। यदि किसी ब्राह्मण का अन्याय के कारण अनिष्ट हो जाता तो उससे भविष्य में किसी भयंकर विपत्ति की संभावना की आशंका रहती थी। दंड देने का उस समय कैसा विधान था और दोषी को किस प्रकार का दंड दिया जाता था, इसका भी ग्रन्थ में बड़ा ही स्पष्ट निरूपण किया गया है। शकार के दोषी सिद्ध होने पर उसके प्रति क्या दंड होना चाहिए, ऐसा चारुदत्त से पूछता हुआ शार्वलिक कहता है-
"आकर्षन्तु सुबद्ध्वैनं श्वभिः संखाद्यतामय। शूले वा तिष्ठतामेष पाटयतां ऋकचेन वा।" मृच्छ० १०।५३ हे चारुदत्त ! मुझे बताओ कि इस दुष्ट के साथ क्या करना चाहिए। क्या यह बांध कर घसीटा जाये या कुत्तों का भक्ष्य बनाया जाये या शूली पर चढ़ाया जाये अथवा इसके शरीर पर आरा लगाया जाये। इस श्लोक से प्रकट होता है कि उस समय अपराधियों को बहुत कड़ा दण्ड दिया जाता था। उस समय देन-लेन की प्रथा भी प्रचलित थी और उधार लेने पर उसको वसूल करने के लिए बड़ी कठोरता
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की जाती थी। दूसरे अंक में संवाहक और माथुर एक दूसरे से अपने उधार लिये हुए धन के विषय में बातचीत करते हैं। माथुर संवाहक से उधार लिया हुआ धन वापस मांगता है जिसे संवाहक देने में असमर्थ है। माथुर इस हेतु उसको अपने माता-पिता और अपने आप सबको बेचने तक की अनुमति देता है। इस घटना से जहां एक हास्य का पुट मिलता है वहीं पर उधार लिये हुए धन को लौटाने के लिए असह्य कठोरता का भी परिचय मिलता है। व्यापार उस समय समुन्नत दशा में विद्यमान था और समुद्रयात्रा भी प्रचलित थी जैसा कि चौथे अंक में मैत्रेय की चेटी के प्रति उक्ति है। वह चेटी से पूछता है कि क्या तुम्हारे यानपत्र या जहाज समुद्र में चलते हैं और चेटी नकारात्मक उत्तर देती है। इससे विदित होता है कि साधारण श्रेणी के व्यक्तियों को भी अपने जहाज चलाने और समुद्र द्वारा व्यापार करने की सुविधा प्राप्त थी। बौद्ध धर्म का पतन आरम्भ हो गया था और जन साधारण की दृष्टि में यह धर्म बहुत अपमान की दृष्टि से देखा जाने लगा था। मार्ग में अकस्मात् बौद्ध भिक्षु का केवल आ जाना भी एक अपशकुन समझा जाने लगा था। उच्च कुलीन लोग वह मार्ग त्याग देते जहां से बौद्ध भिक्षु जाता था। सातवें अंक के अन्त में चारुदत्त और आर्यक बौद्ध भिक्ष को देखते हैं और उसको अपने किसी अनिष्ट की संभावना समझ कर मार्ग दूसरी ओर कर देते हैं। समाज में कुछ लोगों का चरित्र दूषित भी हो गया था। वसन्तसेना एक गणिका महिला थी जो कि समाज के लिए कलंक समझी जा सकती है। यह जीवन- वृत्ति, यद्यपि उस समय अपनायी जाती थी, लोगों की दृष्टि में घृणित अवश्य हो. गयी थी। स्त्रियों के लिए यह वृत्ति अपनाना सदा से ही महानिष्टकारी रहा है। इसके विषय में अधिक उल्लेख करने की आवश्यकता नहीं। चौथे अंक में शार्व- लिक और वसन्तसेना का वार्तालाप होता है जिसमें वह तत्कालीन स्त्रियों के दोषों का निरूपण करता है और वेश्या को शमशान के पुष्प के समान त्याज्य बताता है। वह कहता है- "एता हसन्ति च रुवन्ति च वित्तहेतो विश्वासयन्ति पुरुषं न तु विश्वसन्ति।
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तस्मान्नरेण कुलशीलसमन्वितेन वेश्या: शमशानसुमना इव वर्जनीयाः"॥ मृच्छ० ४।१४
ये वेश्याएँ धन के कारण ही हंसती और रोती हैं। पुरुष को प्रत्येक प्रकार से अपना विश्वास दिलाती हैं, परन्तु स्वयं किसी का भी विश्वास नहीं करतीं। अतः सज्जन और कुलीन व्यक्ति को श्मशान में उत्पन्न पुष्पों के समान वेश्या का त्याग कर देना चाहिए। इस उक्ति से पता लगता है कि स्त्रियों की दशा उस समय कुछ-कुछ अवनति की ओर अवश्य चल पड़ी थी और वेश्या-वृत्ति के प्रति लोगों को घृणा उत्पन्न हो गयी थी। प्राचीन काल में देश अवश्य समृद्धिशाली था परन्तु उस समय दरिद्र लोगों को बहुत कष्ट होता था और दरिद्रता एक भीषण अभिशाप समझी जाती थी। इस ग्रन्थ में कुछ ऐसी उक्तियां भी हैं जिनसे प्रतीत होता है कि दरिद्रता में लोग क्या-क्या कुकर्म कर सकते हैं तथा उनका समाज में किस प्रकार का निरादर होता है। प्रथम अंक में चारुदत्त दरिद्रता से उत्पन्न दोषों का इस प्रकार मालालंकार द्वारा वर्णन करते हैं-
"दारिद्रधादृह्नियमेति ह्वीपरिगतः प्रभ्रश्यते तेजसो निस्तेजाः परिभूयते परिभवान्निर्वेदमापद्यते। निर्विण्ण: शुचमेति शोकनिहतो बुद्धया परित्यज्यते निर्बुद्धिः क्षयमेत्यहो निधनता सर्वापदामास्पदम्"॥ -- मृच्छ० १११४
दरिद्रता से पुरुष लज्जा को प्राप्त होता है। लज्जित व्यक्ति अपने अभिमान को त्याग देता है, निरभिमान व्यक्ति तिरस्कृत होता है, तिरस्कार से आत्मपतन को प्राप्त होता है, आत्मपतित व्यक्ति शोक को, शोकाकुल व्यक्ति बुद्धि को त्याग देता है और निर्बुद्धि पुरुष नाश को प्राप्त होता है। इस प्रकार निर्धनता या गरीबी नाना प्रकार के कष्टों का कारण होती है। आगे चल कर चारुदत्त निर्धन व्यक्ति की समाज में क्या दुर्दशा होती है उसका चित्रण करते हुए कहता है-
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"दारिद्रधात् पुरुषस्य बान्धवजनो वाक्ये न संतिष्ठते सुस्निग्धा विमुखी भवन्ति सुहृदः स्फारीभवन्त्यापदः। सत्वं ह्रासमुपैति शीलशशिनः कान्तिः परिम्लायते पापं कर्म च यत्परैरपि कृतं तत्तस्य संभाव्यते॥" मृच्छ० १।३६
गरीबी के कारण पुरुष के कुटुम्बी उसके वचनों का आदर नहीं करते। अत्यन्त घनिष्ट मित्र भी विमुख हो जाते हैं और उसकी विपत्तियां सतत बढ़ती ही रहती हैं। उसके गर्व का ह्रास होता है और कान्ति मलिन पड़ जाती है। जो कोई दूसरों के द्वारा किया हुआ बुरा कर्म होता है उसी दरिद्र के द्वारा किया हुआ समझा जाता है। इस प्रकार कवि ने दरिद्रता का बड़ा ही रोचक एवं सजीव वर्णन किया है जो आज भी प्रत्यक्ष सा प्रतीत होता है। मृच्छकटिक में चरित्र-चित्रण
यह प्रकरण शुद्ध चरित्र-चित्रण-प्रधान है। इसमें किसी विशेष रस का निरू- पण न करते हुए केवल घटनाओं को ही अधिक महत्त्व दिया गया है। दरिद्र चारु- दत्त इस प्रकरण का नायक है तथा वसन्तसेना नायिका के पद पर आसीन होती है जो कि एक गणिका है। चारुदत्त जैसे लोक में लब्धप्रतिष्ठ ब्राह्मण और वसन्तसेना के समान दर-दर भटकनेवाली गणिका में प्रेम दिखाकर कवि ने स्वाभाविकता एवं रोचकता का मनोरम संचार किया है। इसमें बहुत अधिक पात्रों का चरित्र-चित्रण किया गया है जिनमें से कुछ प्रमुख पात्रों का चित्र नीचे निरूपित किया जाता है।
चारुदत्त
चारुदत्त एक आदर्श कर्तव्य-परायण प्रेमी, आत्म-विश्वासी, दयालु, धर्मप्रिय सम्माननीय व्यक्ति है। अत्यन्त दरिद्र होने पर भी वह दान देने में अतिशय उदार है। अपने महान् द्वेषी एवं मिथ्या अभियोग लगानेवाले शकार को भी न्यायालय में प्राणदण्ड मिलने पर अपनी अतिशय उदारता के कारण क्षमा कर मुक्त कर
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देता है। मार्ग में अकस्मात् दिखलाई पड़ने पर विट की उसके विषय में उक्ति उसके दिव्य चरित्र को हमारे सम्मुख बड़े स्पष्ट रूप में उपस्थित कर देती है जो इस प्रकार है-
"दीनानां कल्पवृक्षः, स्वगुणफलनतः, सज्जनानां कुटुम्बी आदर्श: शिक्षितानां सुचरितनिकषः शीलवेलासमुद्र:। सत्कर्ता नावमन्ता पुरुषगुणनिधिर्दक्षिणोदारसत्त्वो, हयोक: श्लाध्यः स जीवत्यधिकगुणतया चोछ्वसन्तीव चान्ये"॥ -- मृच्छ० ११४८
आर्य चारुदत्त अपने दिव्य गुणों के कारण स्वाभाविक रूप से दीन दुखियों को कल्प- वृक्ष के समान मनोवांछित फल देनेवाला महा परोपकारी व्यक्ति है। वह सज्जनों का कुटुम्बी तथा परम विद्वान् शिक्षित पुरुषों के लिए दर्पण के समान है। किसी दोष के कारण भी अपने चरित्र में कलंक नहीं आने देता। शील रूपी समुद्र के वह तट के समान है अर्थात् शीलता में वह समस्त समाज में अग्रगण्य है। सत्कार्यों में रत है और अवगुणों की ओर किसी प्रकार भी प्रवृत्त न होनेवाले तथा सज्जनों के समस्त उदार गुणों से युक्त है। ऐसा प्रतीत होता है कि अपने दिव्य गुणों के कारण वह एकाकी ही प्रशंसनीय जीवन व्यतीत करता है तथा अन्य सब लोग तो मानो केवल श्वास मात्र ही लेते हैं। कवि ने श्लोक में चारुदत्त के चरित्र का जो चित्रण किया है उससे उस समय के ब्राह्मणों की दशा और लोगों की दान संबंधी मनो- वृत्ति का परिचय मिलता है। चारुदत्त एक परात्रमी व्यक्ति है और इस नाटक की सभी घटनाएँ उस पर केन्द्रित हैं। इतना ही नहीं कि अधिकरणिक या न्यायाधीश की चारुदत्त के विषय में केवल उच्च भावना मात्र ही थी वह उसके दोष लगानेवाले को भी महापातकी सम- झता था, जैसा कि उसकी निम्न उक्ति से विदित होता है- "वेदार्यान् प्राकृतस्त्वं वदसि न ते जिह्वा निपतिता, मध्याह ने वीक्षसेडर्कम् न तव सहसा दृष्टिविचलिता।
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वीप्ताग्नौ पाणिमन्तः लषिपसि स च ते दग्धो भवति नो, चरित्र्याच्चादवत्तं चलयसि न ते वेहं हरति भूः"॥ मृच्छ० ९।२१
आर्य चारुदत्त पर मिथ्या अभियोग लगानेवाले हे शकार! तुम्हारा यह कार्य ऐसा है जो निकृष्ट जाति में उत्पन्न पुरुष द्वारा वेदपाठ के समान पापमय है। तब भी तुम्हारी जिह्वा मुख से पृथक् नहीं हुई। मध्याह्न में अत्यन्त देदीप्यमान सूर्य पर टकटकी लगा कर देखने के समान यह कार्य करने पर भी तुम्हारी आंखों की ज्योति अन्धत्व को प्राप्त नहीं हुई। प्रज्वलित अग्नि पर हाथ रखने के समान यह कुकर्म करने पर भी तुम्हारी खाल नहीं झुलसायी। तुम चारुदत्त के उज्ज्वल चरित्र को कलंकित कर रहे हो। तब भी तुम्हारे शरीर को पृथ्वी नहीं हर लेती। कहने का तात्पर्य यह है कि चारुदत्त के चरित्र पर किसी प्रकार दोष लगाना न्याया- लय तक में महानिष्टकारी समझा गया था। चारुदत्त एक अत्यन्त दरिद्र व्यक्ति था और वह अपनी निर्घनता के कारण बहुत ही दुखी रहता था। प्रथम अंक में उसने निर्धनता से उत्पन्न होनेवाले दोषों का यथावत् निरूपण किया है। महान् भीषण परिस्थिति में भी वह दान से पराङमुख न होता था। जहां यह घटना महानता की परिचायक है वहाँ अपने ऊपर पड़ी हुई विपत्ति को साहसपूर्वक सहन न करते हुए पुनः-पुनः व्याकुल हो उठना किसी आदर्श पुरुष के योग्य नहीं कहा जा सकता। कतिपय आलोचकों ने शूद्रक द्वारा नायक के चरित्र-चित्रण में इसको एक महती न्यूनता बताया है। यदि वह दरिद्रता से इस प्रकार व्याकुल न हो कर उसका साहस-पूर्वक सामना करता तो वह अवश्य एक आदर्श चरित्रवान् नायक समझा जा सकता था। जबकि वह अपने मित्रों से अपनी दरिद्रता को छिपाने में किंचिन्मात्र भी नहीं झिझकता, अपने शत्रुओं तथा अन्य लोगों को ही अपना मिथ्याभिमान दिखलाना चाहता है। चोरों द्वारा उसको अपने घर की सम्पत्ति के हरे जाने का इतना भय नहीं जितना कि उनके द्वारा उसकी दरिद्रता प्रकाशन का भय है। इसी प्रकार वह न्यायालय में यह प्रकट नहीं करता कि वसन्तसेना ने उसे स्वर्णाभूषण दिये थे। समाज में अपनी दरिद्रता को वह किसी प्रकार भी विदित नहीं होने देता।
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चारुदत्त एक दरिद्र ब्राह्मण है जिसे अपने जीवन में विषम परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है। आरम्भ में वह तो एक लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति बना रहता है परन्तु भाग्यवश उसे भी वसन्तसेना की हत्या के मिथ्यारोप में न्यायालय में उपस्थित होना पड़ता है। न्यायालय में चारुदत्त अपने चरित्र पर दोष आने के अवसर पर स्वतः ही उसके सम्बन्ध में गर्वोक्ति करता है-
"योऽहं लतां कुसुमितामपि पुष्पहेतो राकृष्य नैव कुसुमावचयं सोऽहं कथं भ्रमरपक्षरचौ करोमि। सुदीर्घें केशे निगृह्य रुदतीं प्रमदां निहन्मि"॥ मृच्छ० ९२८ जो मै चारुदत्त पुष्पों की रक्षा हेतु खिले हुए विकसित मनोरम पुष्पों को तोड़कर उनका संग्रह भी करना उचित नहीं समझता, क्या वही चारुदत्त में इस समय भौरों के पंखों के समान मनोहर लम्बे-लम्बे केशों को पकड़ कर रोती हुई महिला की हत्या करूंगा। यह तर्क तो बहुत सुन्दर उपस्थित किया गया है परन्तु क्या न्याय के सम्मुख यह कथन उचित है ? धर्मप्राण चारुदत्त को प्राणदण्ड देने के अवसर पर अधिकरण या न्यायालय भी व्यथित हो उठा था। आर्य चारुदत्त के चरित्र पर दोष लगाते समय न्यायाधीश या अधिकरणिक का भी मन अत्यन्त संतप्त हो गया और वह कहने लगे-
"कृत्वा समुद्रमुदकोच्छ्यमात्रशेषं दत्तानि येन हि धनानक्षितानि। स श्रेयसां कथममिवैकनिधिर्महात्मा पापं करिष्यति धनार्थमवरिजुष्टम्"।। मृच्छ० ९।२२ जिस चारुदत्त ने बिना किसी भेदभाव के दान देते समय रत्नों के विशाल समूह समुद्र को केवल जल के एक विशाल केन्द्र के रूप में परिवर्तित कर दिया है अर्थात् दीन-दुखियों को समुद्र के समस्त रत्न दान कर दिये हैं और जिनकी समाप्ति के
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कारण समुद्र केवल जलराशि मात्र ही रह गया है, वह कल्याणकारियों का आदर्श स्वरूप एक सच्चरित्र महात्मा धन-प्राप्ति के लिए महिला का वध जैसा भीषण अपराध कैसे करेगा। इस श्लोक से विदित होता है कि चारुदत्त के उज्ज्वल चरित्र के विषय में न्यायालय तक में उच्च भावना थी।
वसन्तसेना
मृच्छकटिक के नायक चारुदत्त के चरित्र का वर्णन करने के उपरान्त नायिका वसन्तसेना के विषय में भी कुछ उल्लेख कर देना अनुपयुक्त न होगा। वह एक गणिका है और इसी रूप में वह अपने जीवन का निर्वाह करती है। विट, शकार और चारुदत्त तीनों ही उस पर अनुरक्त हैं। वह नगर की प्रत्यक्ष श्री और रूप की लावण्यमय मूर्ति है। विट उसकी आकृति पर मोहित होकर कहता है-
"अपद्ा श्रीरेषा प्रहरणमनंगस्य ललितं कुलस्त्रीणां शोको मदनवरवृक्षस्य कुसुमम्। सलीलं गच्छन्ती रतिसमयलज्जाप्रणयिनी रतिक्षेत्रे रंगे प्रियपथिकसार्थेरनुगता"॥ मृच्छ० ५।१२ यह गणिका महिला वसन्तसेना भगवती लक्ष्मी की पद्मरहित शोभा है। कामदेव का मनोहर हस्तशस्त्र है। कुलवती महिलाओं के लिए यह शोक रूप है। कामदेव से प्रेम द्वारा उत्पन्न वृक्ष का यह पुष्प है। जिस वसन्तसेना के प्रेमियों का समूह इस प्रकार जाता है जिस प्रकार कि यात्रियों का समूह तीर्थ को जाता है, वही वसन्तसेना इस समय अपने प्रणय-कार्य के हेतु प्रस्थान कर रही है। इस श्लोक से विदित होता है कि जिस सामाजिक दशा का मृच्छकटिक में चित्रण किया गया है उसमें गणिकाओं से सामान्य रूप से प्रेम करने की प्रथा का प्रचलन रहा होगा। गणिका की वृत्ति कुत्सित अवश्य समझी जाती थी परन्तु उसका वध करना उस काल में भी निन्द्य एवं घोर नरक का साधन माना जाता था। वसन्तसेना के वध का प्रस्ताव सुनकर विट की यह उक्ति है-
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"बालां स्त्रियं नगरस्य विभूषणं च वेश्यामवेशसदृशप्रणयोपचाराम्। एनामनागसमहं यदि घातयामि केनोडुपेन परलोकनदीं तरिष्ये"॥ मृच्छ० ८।२३
इस नगर की शोभा वेश्या स्त्री का जिसकी जीविका ही अन्यों के मनोरंजन पर निर्भर है उस निष्पाप वसन्तसेना का वध करके मेरी जीवन-नौका को कौन भवसागर से पार लगायेगा। इस उक्ति से प्रतीत होता है कि विट जैसे निम्नकोटि के व्यक्ति भी धर्म से सदा भयभीत रहते थे और अपने किये हुए कर्मों का फल अवश्य भोक्तव्य समझते थे। वसन्तसेना सुन्दर, चतुर, दयालु, प्रिय एवं मधुरभाषिणी वनिता है। ग्रंथ में उसको गणिका के रूप में चित्रित किया गया है और इस रूप में भी वह समाज में कितनी प्रतिष्ठित है यह विट की शकार के प्रति निम्न उक्ति से स्पष्ट विदित हो जाता है-
"अन्धस्य दृष्टिरिव पुष्टिरिवातुरस्य, मूर्खस्य बुद्धिरिव सिद्धिरिवालसस्य। स्वल्पस्मृतेर्व्यसनिनः परमेव विद्या, त्वां प्राप्य सा रतिरिवारिजने प्रनष्टा"॥ मृच्छ० १।४९ हे, मित्र यह गणिका वसन्तसेना अपने दिव्यगुणों के ही कारण अंधों के लिए नेत्रों की ज्योति के समान, रोगी के लिए सुपाच्य आहार के समान, मूर्ख के लिए बुद्धि के समान, आलसी के लिए सफलता के समान, दुर्गुणों व दुर्व्यसनों में फंसे हुए कम स्मृति वाले व्यक्ति के लिए ज्ञान की परम सीमा के समान है। जिस प्रकार शत्रु से प्रेम पराङमुख हो जाता है उसी प्रकार वह तुमको ठुकरा कर चली गयी है। ग्रंथ के अवलोकन से विदित होता है कि वह सौन्दर्य की भी अनुपम प्रतिमा थी, जिस कारण विट, शकार आदि सब उस पर अनुरक्त थे। यद्यपि वह गणिका का नीच कार्य करती थी, फिर भी बहुत लोग उससे प्रेम करते थे और वह समाज में
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सम्मान की दृष्टि से देखी जाती थी। चारुदत जब कि एक महान् उदार एवं दानी के रूप में चित्रित किया गया है वसन्तसेना भी किसी भांति उससे कम उदार नहीं है। जिस समय चारुदत्त का पुत्र रोहसेन अपनी मिट्टी की गाड़ी लेकर वसन्तसेना के घर जाता है वह उसको स्वर्ण से भर देती है। यह घटना वसन्तसेना की उदारता का उज्जवल प्रमाण प्रस्तुत करती है।
अन्य पात्र
प्रकरण के नायक और नायिका चारुदत्त और वसन्तसेना का चरित्र-चित्रण करने के उपरान्त प्रकरण के कुछ अन्य चरित्रों के विषय में भी किञ्चित् विचार कर लेना चाहिए। स्थावरक और मदनिका एक अनुपम कोटि के दास और दासी हैं जो सचमुच ही बड़े स्वाभाविक हैं। विट एक अद्भुत प्रेमी और हंसोड़ है। वह ललित कलाओं एवं सौन्दर्य से बहुत प्रेम करता है। इसी कारण डा० राइडर का मत है कि वह एक उत्तम कोटि का विदूषक है। दर्दुरक और शार्वलिक भी इस ग्रंथ में अपना पृथक्-पृथक् महत्त्व रखते हैं। उन दोनों में एक आदर्श मैत्री है और दोनों ही उच्च कुलीन ब्राह्मण परिवार में उत्पन्न चरित्रभ्रष्ट व्यक्ति हैं। दर्दुरक द्यूतप्रेमी और शार्वलिक चोरी के हेतु घरों में सेंध लगाने में कुशल- हस्त है। दोनों ही अपने कार्यों में प्रवीण हैं जिनकी पूर्ति करने में वे प्रत्येक सम्भव उपाय का प्रयोग करने के लिए प्रयत्नशील रहते हैं। चारुदत्त का न्याय करनेवाले न्यायाधीश या अधिकरणिक के चरित्र पर भी कुछ विचार कर लेना चाहिए। शकार द्वारा मिथ्या अभियोग लगाने पर वह आरम्भ में तो चारुदत्त के विरुद्ध कुछ सुनना तक अस्वीकार कर देता है। शकार के बहुत कहने पर और राज-भय दिखाने पर ही वह ऐसा करने को उद्यत होता है। इस प्रकार उसको कोई पक्षपाती कह सकता है परन्तु उसके न्याय पर दृष्टि- पात करने से वह सर्वथा धर्मानुकूल आचरणकर्ता एवं न्यायकारी ही प्रमाणित होता है। शकार भी इस प्रकरण में अपना विशेष महत्त्व रखता है। वह एक विनोद- जनक पात्र है और अपने अभिनय में स्थान-स्थान पर दर्शकों का मनोरंजन करता
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है। प्रथम अंक में वह कुछ मूर्खतामय कार्य अवश्य करता है। वह भी वसन्तसेना को अपनी प्रेमिका व जीवनसंगिनी बनाने का प्रबल इच्छुक है। वह अपनी इस मनो- कामना की पूर्ति में सर्वथा असफल ही रहता है जिसके कारण उसके जीवन पर गहरा धक्का लगता है। उद्यान में जब अकस्मात् ही शकार और वसन्तसेना का साक्षात्कार होता है और जब वह गणिका शकार की मनोकामना को ठुकरा देती है तब शकार द्वारा उसका गला घोंट कर एक भीषण पाप किया जाता है। इस प्रकार शकार नाट्यकार द्वारा एक दुष्ट के रूप में चित्रित किया गया है। मिथ्याभियोग लगाना भी ऐसा ही एक भीषण कुकर्म है। इस प्रकरण की भाषा और शैली बड़ी सरल, स्वाभाविक और प्रवाहयुक्त है, यद्यपि इसके कवि में कालिदास की चारुता व भवभूति की उदारता का अभाव है। वह हृदगत् भावों के चित्रण में सिद्धहस्त है जैसा कि उपर्युक्त उद्धरणों द्वारा स्पष्ट हो जाता है। इस ग्रन्थ में सामाजिक व्यवस्था का बड़ा ही सुन्दर निरूपण किया गया है और यही उसकी लोकप्रियता का कारण है। इस प्रकरण का विदेशों पर भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा। इस शूद्रक-रचित मृच्छकटिक के अंग्रेज़ी अनुवाद का अमेरिका के प्रसिद्ध नगर न्यूयार्क में सन् १६२४ ई० में अभिनय हुआ और वहां की जनता पर उसका बड़ा व्यापक प्रभाव पड़ा। तत्कालीन प्रसिद्ध नाटक-कला के आलोचक जौसेफ वुड करुच ने इसकी प्रशंसा बड़े ही मनोरम शब्दों में की है जैसा कि हमारे देश के सुयोग्य प्रधान मंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपनी अन्तिम सर्वोत्कृष्ट कृति भारत की खोज (डिस्कवरी ऑफ इण्डिया) में उद्धृत किया है। उसका भावार्थ इस प्रकार है- "इस प्रकरण को देखने से हमें नाटककला के शुद्ध स्वरूप का दर्शन होता है जो कि पूर्व की पश्चिम के प्रति एक अमूल्य देन है। इसके रचयिता के समय के विवाद में न पड़ते हुए भी हमें निर्विवादरूप से स्वीकार करना पड़ता है कि वह एक परम विद्वान् व्यक्ति था जिसने जनता के हृदय का सूक्ष्म गंभीर अध्ययन किया था। इस प्रकार का रूपक एक बहुत ही उच्च राजनीतिक सभ्यता में निर्मित हुआ होगा जिसके समक्ष अंग्रेज़ी के अमर नाटककार शेक्सपियर के मैकबेथ और
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अथलो जैसे ग्रन्थ भी निम्न ही प्रतीत होते हैं। इससे पता लगता है कि विदेशियों की दृष्टि में भी इस ग्रन्थ का समुचित आदर था। भरत मुनि के नाट्य शास्त्र के नियम के अनुसार प्रत्येक रूपक में कोई शृंगार अथवा वीर रस प्रधान होना चाहिए किन्तु यह ग्रन्थ उस परम्परा का पालन न करते हुए एक घटना-प्रधान रूपक है तब भी इसमें शृंगार और करुण रस का मार्मिक चित्रण हुआ है। वसन्तसेना के प्रति शृंगार और न्यायालय में उपस्थित चारुदत्त करुण रस के मूर्तिमान् स्वरूप हैं।" जिस समय यह ग्रन्थ रचा गया उस समय प्राकृत भाषाओं का पूर्ण विकास नहीं हुआ था। इस कारण इस ग्रन्थ में अनेकों प्रकार की प्राकृत पायी जाती है। उसका क्रम इस प्रकार है- भाषा जिन पात्रों द्वारा बोली जाती है शौरसेनी प्राकृत वसन्तसेना, मदनिका, कर्णपूरक, धूता, रदनिका शकारी शकार अवन्तिका वीरक और चन्दनक प्राश्य विदूषक मागधी स्थावरक, संस्थानक, कुम्भीलक, वर्धमानक, रोहसेन, चाण्डाल, धवकी संस्कृत शुद्ध विट, आर्यक, चारुदत्त, शार्वलिक इस प्रकार यह प्रकरण संस्कृत साहित्य की अनुपम निधि है जो अपने ढंग से अनूठी भी है। महाकवि शूद्रक के विषय में जो कि इसके रचियता माने जाते हैं ऐतिहासिक खोज न होना स्वतंत्र भारत के लिए लज्जा की बात है। हम आशा करते हैं कि हमारे देश के प्रगतिशील विद्वान् इस ओर समुचित ध्यान देंगे।