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6. ६. महाकवि भास

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६. महाकवि भास

(चौथी शताब्दी ई० पू० या इसके समीप का समय)

सन् १६०६ ई० के पूर्व विद्वानों की धारणा थी कि महाकवि कालिदास ही संस्कृत साहित्य के सर्वप्रथम नाटककार हैं। यही विचार प्रो० मेकडोनेल ने अपने प्रसिद्ध ग्रन्थ 'संस्कृत साहित्य के इतिहास' में भी प्रकट किया है। सन् १९०९ ई० में त्रावणकोर राज्य के तत्कालीन महाराजा की आज्ञा से स्वर्गीय महामहोपाध्याय श्री टी० गणपति शास्त्री को पुराने हस्तलिखित ग्रन्थों की खोज करते समय तीन- चार सौ वर्ष पूर्व के लिखे हुए तेरह रूपक मिले जिनको उन्होंने महाकवि भास की अमर कृतियों के रूप में घोषित किया। कालिदास ने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ माल- विकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास का इस प्रकार उल्लेख किया है- "प्रथितयशसां भाससौमिल्ल-कविपुत्रादीनां प्रबन्धानतिक्रम्य कथं वर्तमानस्य कवे: कालिदासस्य कृतौ बहुमानः।" अर्थात् विख्यात यशवाले भास, सौमिल्ल और कविपुत्र आदि लब्धप्रतिष्ठ विद्वानों की रचनाओं का अतिकमण कर किस प्रकार वर्तमान कवि कालिदास की रचनाएँ अधिक सम्माननीय हो सकती हैं। इससे विदित होता है कि कालिदास के समय में इन तीनों नाटककारों का यश पर्याप्त विकसित हो चुका था। भास की रचनाएँ तो उपलब्ध हो गयी हैं परन्तु सौमिल्ल और कविपुत्र के काव्य-सर्जन और जीवन के विषय में हमें कुछ भी सामग्री उपलब्ध नहीं होती। हम आशा करते हैं कि स्वतंत्र भारत में विद्या की सर्वांगीण उन्नति के साथ इस लुप्त साहित्य के पुनरुद्धार पर भी सम्यक ध्यान दिया जायगा। भास के रूपकों में पश्चाद्वर्ती कवियों के रूपकों के नियम के प्रतिकूल, प्रस्तावना में कर्ता के नाम का उल्लेख नहीं है और प्रस्तावना के स्थान पर स्थापना शब्द प्रयुक्त हुआ है। इस कारण इन ग्रन्थों के कर्ता के विषय

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में कुछ मतभेद हो गया है। कतिपय पाश्चात्य विद्वान् भास के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते और इन्हें किसी अन्य कवि की रचना मानते हैं। परन्तु अधिकांश विद्वानों ने इन्हें भास की रचना स्वीकार कर लिया है। भास का अस्तित्व ही संस्कृत साहित्य में विवाद का विषय बन गया है जिस पर यहाँ संक्षेप में विचार करना आवश्यक है। जो विद्वान् इन रूपकों को भास-रचित नहीं मानते उनका निम्नलिखित कथन है- (१) नवीं शताब्दी के प्रसिद्ध नाटककार राजशेखर के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थकार ने भास का स्वप्नवासवदत्तकार के रूप में उल्लेख नहीं किया। १२वीं शताब्दी में रामचन्द्र और गुणचन्द्र ने नाटयदर्पण नामक एक ग्रन्थ रचा जिसमें स्वप्नवासवदत्त का यह श्लोक उद्धृत किया है-

"पादाक्रान्तानि पुष्पाणि सोष्म चेदं शिलातलम्। नूनं काचिदिहासीना मां वृष्ट्वा सहसा गता॥" स्वप्न० ४।४ अर्थात् यहां पैरों से कुचले हुए फूल हैं और यह शिला भी गर्म हो रही है, इससे प्रतीत होता है कि निश्चय ही कोई इस स्थान पर बैठा था जो कि अकस्मात् मुझको देखकर चला गया। यह श्लोक उद्धृत ग्रन्थ में नहीं मिलता। इसके आधार पर प्रो० सिलवन लेवी स्वप्नवासवदत्त को भास रचित नहीं मानते। इस श्लोक के प्रसंग पर विचार करने से विदित होता है कि चौथे अंक के प्रथम दृश्य के उपरान्त पद्मावती के सहसा हट जाने पर यह राजा उदयन की अपने विदूषक के प्रति उक्ति है। संभवतः किसी प्रतिलिपिकर्त्ता ने बाद में त्रुटिवश इसे छोड़ दिया हो। काले ने अपने संपादित ग्रन्थ में इस श्लोक को उपयुक्त स्थान पर रखा है। यह कथन भी ठीक नहीं कि राजशेखर के अतिरिक्त अन्य किसी ग्रन्थकार ने स्वप्न- वासवदत्त के रचयिता के रूप में भास का वर्णन नहीं किया है। अभिनवगुप्त, भोजदेव, सर्वानन्द, शारदातनय इत्यादि कितने ही ग्रन्थकारों ने भास के स्वप्न- वासवदत्त के अनेक उद्धरण उपस्थित किये हैं और भास को उसका कर्त्ता बताया है। अतः भास का अस्तित्व अस्वीकार करना सर्वथा अनुचित है।

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(२) इसी प्रकार अभिनव गुप्त ने ध्वन्यालोक की टीका में एक आर्या उद्धृत की है जो स्वप्नवासवदत्त में नहीं पायी जाती। गणपति शास्त्री के मत के अनु- सार यह आर्या कथावस्तु के लिए अनुपयुक्त है और संभवतः टीकाकार ने मूल ग्रन्थ का निर्देश करने में भूल की हो। विंटरनिट्ज ने उस आर्या को उपयुक्त स्थान पर आवश्यक बताया है। संभवतः बाद में विरोध के कारण वह छोड़ दी गयी हो। (३) महेन्द्रविक्रम वर्मा ने 'मत्तविलास' नामक एक प्रहसन की रचना की जिसकी प्रस्तावना भास के समान ही है। अन्य नाटकों के विरुद्ध भास के रूपकों और मत्तविलास में नान्दी के उपरान्त सूत्रधार का प्रवेश होता है। इस आधार पर डा० वारनेट का मत है कि यह ग्रंथ भी महेन्द्रविक्रम या उसके किसी समकालीन कवि की रचना हो सकता है परन्तु भाषा, भरतवाक्य की आकृति तथा अन्य नाटक- प्रणाली में बहुत भेद है। अतः मत्तविलास और इन ग्रन्थों के रचयिता को केवल प्रस्तावना के कुछ भाग की आकृति से एक मानना उचित नहीं। मत्तविलास के रचयिता का नाम प्रस्तावना में स्पष्ट लिखा है जबकि इन ग्रन्थों में नहीं। उपर्युक्त विवेचन से सिद्ध हो जाता है कि भास अवश्य ही एक विख्यात नाटक- कार थे जिनका यश कालिदास के समय में पर्याप्त रूप से विस्तृत हो चुका था। भास के अस्तित्व विषयक तर्क भास के अस्तित्व के पक्ष में निम्नलिखित तर्क उपस्थित किये जाते हैं- (१) राजशेखर का कथन नवीं शताब्दी के प्रसिद्ध नाटककार राजशेखर ने अपने 'सूक्ति मुक्तावली' ग्रन्थ में भास का इस प्रकार उल्लेख किया है-

"भास नाटकचऋेऽपिच्छेके: क्षिप्ते परीक्षितुम्। स्वप्नवासवदत्तस्य दाहकोऽभून्न पावकः॥" अर्थात् भास के नाटकों के समूह की आलोचकों द्वारा अग्नि-परीक्षा करने पर स्वप्न- वासवदत्त के यश को अग्नि झुलसाने में असमर्थ ही रही। इस उद्धरण से सिद्ध होता है कि स्वप्नवासवदत्त भास का एक नाटक था और उन्होंने अनेक नाटक-ग्रन्थों की

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रचना की। त्रावणकोर में जो तेरह रूपक उपलब्ध हुए हैं उनकी आकृति, भाषा और विचार में एक अद्भुत साम्य दीख पड़ता है जिसके कारण हम उनके एक ही लेखनी की कृति होने का निर्णय करने पर बाध्य होते हैं।

(२) आकृति में समता (क) प्रस्तावना में कर्त्ता के नाम का उल्लेख नहीं है। पश्चाद्वर्ती शूद्रक, भवभूति, कालिदास आदि कवियों के रूपकों की प्रस्तावना में कर्ता के नाम का उल्लेख हुआ है, परन्तु इन उपलब्ध रूपकों में नहीं हुआ है। (ख) प्रस्तावना के आरम्भ में अन्य रूपकों में नान्दी के बाद सूत्रधार का प्रवेश होता है परन्तु इन रूपकों में सूत्रधार ही आरम्भ में नान्दी का पाठ करता है। नान्दी रूपक के आदि में इष्टदेव से पाठकों के कल्याण के लिए प्रार्थना होती है। (ग) लगभग सभी रूपकों के अन्त में भरतवाक्य का अन्तिम चरण "राज- सिंहः प्रशास्तु नः" अर्थात् 'सिंह के समान पराक्रमी राजा हमारी रक्षा करें है। (घ) बाण ने अपने हर्षचरित में भास का इस प्रकार उल्लेख किया है और उनके ग्रन्थों की विशेषता बतायी है-

सपताकैयंशोलेभे भासो देवकुलैरिव।।"

अर्थात् भास के रूपक सूत्रधार द्वारा आरम्भ होते हैं और इनमें पात्रों व पताकाओं का बाहुल्य है। पताका रूपक के अन्तर्गत उल्लिखित अन्तर्कथा को कहते हैं।

(३) भाषा-साम्य भास ने अपनी रचनाओं में अनेक शब्द, वाक्य, श्लोक एक से ही कई ग्रन्थों में प्रयुक्त किये हैं। उन सब का यहां उल्लेख करना कठिन है। एक वाक्य उन्होंने स्वप्नवासवदत्त, दूतवाक्य, दूतघटोत्कच, ऊरुभंग, बालचरित, अभिषेक और पंचरात्र में प्रयुक्त किया है जो इस प्रकार है-

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"एवमार्यमिश्रान् विज्ञापयामि। अये किन्नु खलु मयि विज्ञापनव्यग्रे शब्द इव श्रूयते, भवतु पश्यामि।" स्वप्नवासवदत्त एवं बालचरित का भरतवाक्य एक सा ही है। (४) विचारों की समता

भास की अनेक रचनाओं को देखने से एक ही प्रकार के विचार दो या अधिक ग्रन्थों में मिलते हैं। मध्यम व्यायोग में भीम और उनके पुत्र घटोत्कच का मिलन पंचरात्र में अर्जुन और अभिमन्यु के पिता-पुत्र-मिलन के समान है। इसी प्रकार अविमारक, मध्यम व्यायोग और स्वप्नवासवदत्त तीनों में गेंद के खेल का रोचक वर्णन है। इन आधारों पर भास का अस्तित्व और उनका अनेक रूपकों की रचना करना सिद्ध हो जाता है।

भास का समय

कीथ का कथन है कि भास का प्रादुर्भाव दूसरी शताब्दी में हुआ। उनका एक श्लोक अश्वघोष के बुद्धचरित के समान का मिला है। इस प्रकार भास को अश्व- घोष का पश्चाद्वर्ती सिद्ध करने का प्रयास किया गया है। अश्वघोष महाराज कनिष्क के राजगुरु थे जिनका समय सन् ७८ से १२० ई० तक है। परन्तु यह मत केवल एक श्लोक की समता से पुष्ट नहीं होता क्योंकि भास ने अपनी रचना में कहीं बुद्धचरित या उसके कर्ता का उल्लेख नहीं किया है। जैसा ऊपर बताया जा चुका है, कालिदास ने अपने प्रथम नाटकग्रंथ मालविकाग्निमित्र की प्रस्तावना में भास का सादर उल्लेख किया है। अतः वह निःसन्देह कालिदास के पूर्ववर्ती थे। भारतीय विद्वानों ने कालिदास का समय अकाट्य तर्कों से पाश्चात्य विद्वानों के पांचवीं शताब्दी ई० के समय के प्रति- कूल प्रथम शताब्दी (ई० पू०) निश्चित किया है। अतः भास अवश्य इसके पूर्व हुए। कौटिल्य ने अपने अर्थशास्त्र में प्रतिज्ञायौगन्धरायण का एक श्लोक उद्धृत

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किया है। कौटिल्य चन्द्रगुप्त मौर्य के मंत्री थे और चौथी शताब्दी (ई० पू०) के आरम्भ में हुए। अतः भास इस समय हो चुके थे। गणपति शास्त्री के अनुसार भास का समय ४०० ई० पू० के पश्चात् का नहीं हो सकता। भास ने बहुत ही सरल भाषा में अपने ग्रन्थों की रचना की। उस समय संस्कृत साधारण बोलचाल की भाषा थी। इन ग्रन्थों में अष्टाध्यायी के नियमों का अक्षरशः पालन नहीं हुआ है। इसलिए शास्त्री जी के कथनानुसार भास पाणिनि के समकालीन थे और इसी कारण उन्होंने इन व्याकरण के नियमों की विडम्बना की। पाणिनि का समय प्रो. मेकडौनेल के अनुसार ४०० ई० पू० और गोल्डस्टकर के अनुसार ६०० ई० पू० है। अतः निःसंदेह ही भास इस समय के लगभग हुए होंगे। भास की रचनाएँ एक जनश्रुति के अनुसार भास ने तीस से अधिक ग्रन्थों की रचना की, परन्तु अभी तक खोज में केवल तेरह रूपक ही उपलब्ध हुए हैं। वे महाभारत, रामायण एवं कल्पना के आधार पर लिखे गये हैं। महाभारत के आधार पर लिखे हुए रूपक निम्नलिखित हैं-

(१) मध्यम व्यायोग इस ग्रन्थ की रचना हिडम्बा और भीम के विवाह के संस्मरण के आधार पर की गयी है। घटोत्कच अपनी माता हिडम्बा के आज्ञानुसार एक ब्राह्मण को सता रहा है जिसे मार कर वह हिडम्बा के पास ले जाना चाहता है। भीम ब्राह्मण को देखते हैं और उसकी रक्षा करते हैं तथा स्वयं उसके स्थान पर उस राक्षसी के समीप जाते हैं। हिडम्बा अपने पति से मिल कर प्रसन्न होती है और केवल उससे मिलने के लिए ही यह सब षड्यन्त्र रचा है, ऐसा बताती है। घटोत्कच को भी पिता से मिलकर अपूर्व आनन्द होता है। (२) दूत घटोत्कच जयद्रथ द्वारा अभिमन्यु का वध होने के पश्चात् हिडिम्बा-पुत्र घटोत्कच जयद्रथ के समीप जाता है और अर्जुन द्वारा उसके भावी नाश की सूचना देता है। उस समय कौरव अपनी विजय पर बहुत प्रसन्न हो रहे हैं।

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(३) कर्णभार कर्ण ने अपना दिव्य कर्णाभूषण परशुराम द्वारा प्राप्त किया था परन्तु परशु- राम जी का इस विषय पर यह कहना था कि यह तुम्हारी आवश्यकता पड़ने के समय काम में नहीं आयेगा। अर्जुन जिस समय कर्ण के पास युद्ध के लिए सन्नद्ध होते हैं, शल्य ब्राह्मण के रूप में उस कर्णाभूषण की कर्ण से याचना करते हैं। कर्ण उन्हें दे देता है और अपने लिए भीषण हानि करता है। (४) ऊरुभंग यह एक एकांकी उत्सृष्टिकांक है तथा संस्कृत साहित्य में एक मात्र दुःखान्त रूपक है। इसमें कौरव तथा पांडवों का अन्तिम संघर्ष, भीम और दुर्योधन का गदा- युद्ध वणित है जिसका अन्त दुर्योधन की ऊरु अर्थात् जंधाओं के भंग में है। दुर्यो- घन का पुत्र अपने पिता को मृत देखकर बहुत शोक करता है और दुर्योधन की पत्नियां भी करुणामय विलाप करती हैं।

(५) पंचरात्र यह तीन अंकों का समवकार है। महाभारत की एक घटना उससे कुछ भिन्न रूप में वणित है। गुरु द्रोणाचार्य एक युक्ति द्वारा पांडवों को आधा राज्य दिल- वाते हैं। दुर्योधन ने गुरु से कहा कि यदि पांडव मुझे पांच दिन के अन्दर मिल जावें तो मैं उन्हें आधा राज्य दे दूंगा। उस समय पांडव विराट के यहां अज्ञातवास कर रहे थे। द्रोण की सहायता से अभिमन्यु का पता चल जाता है और उसका विवाह विराट की पुत्री उत्तरा से करवा दिया जाता है। इस प्रकार पता चलने पर दुर्योधन अपने कथनानुसार आधा राज्य पाण्डवों को दे देता है और प्रतिज्ञा सत्य होती है।

(६) दूतवाक्य कौरवों की सभा में द्रौपदी के अपमान के कारण खिन्न होकर पांडव योगिराज भगवान् कृष्ण को दूत रूप में सन्धि का प्रस्ताव लेकर कौरवों के समीप भेजते हैं। दुर्योधन द्रौपदी के अपमान से बड़ी प्रसन्नता प्रकट करता है। कृष्ण द्वारा पांडवों

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के लिए आधा राज्य मांगे जाने पर दुर्योधन उनकी प्रार्थना को अस्वीकार कर देता है और कृष्ण बिना अपना मनोरथ सिद्ध किये लौट आते हैं।

(७) बालचरित यह एक सात अंकों का नाटक है। इसमें भागवत, हरिवंश तथा विष्णु पुराण से कुछ परिवर्तित रूप में कृष्ण-जन्म से कंस-वध पर्यन्त कथा वणित है। कृष्ण का जन्म होने पर नारद उनका दर्शन करने जाते हैं और वसुदेव आठवीं बार पुत्र के जन्म पर प्रसन्नता प्रकट करते हैं परन्तु कंस के भय के कारण पुत्र को यमुना पार वृन्दावन में ले जाने का निश्चय करते हैं। मार्ग में दिव्य अस्त्र उनकी रक्षा करते हैं। वसुदेव नन्द की पुत्री को पुत्र के स्थान पर ले आते हैं और कंस को भेंट करते हैं। कंस पत्थर की शिला पर पटक कर उसका काम तमाम करता है। कृष्ण पूतना, प्रलम्ब, धेनुका तथा कालिया आदि राक्षसों का वध करते हैं और अपने सौजन्य से समस्त वृन्दावनवासियों के स्नेह-भाजन हो जाते हैं। कुछ काल बाद जब कंस को सत्यता का पता लगता है तो वह कृष्ण को बुलवाता है। पहले कृष्ण हाथी से युद्ध करते हैं और कंस के दरबारी मुष्टिका और कनूरा को अपनी मुट्ठियों से पछाड़ देते हैं। इसी समय कंस का वध होता है और कृष्ण अपने नाना उग्रसेन को राज्यारूढ़ करते हैं।

रामायण के आधार पर लिखे हुए रूपक ये हैं-

(१) प्रतिमा नाटक इसमें रामायण की घटना राम के वनवास से लेकर राज्याभिषेक पर्यन्त व्णित है। जिस समय भरत अपने मामा के यहां से लौटते हैं तो मार्ग में उनको वह स्थान मिलता है जहां उनके दिवंगत पूर्वजों की प्रतिमाएँ संगृहीत की गयी थीं। उनमें अपने पिता दशरथ की प्रतिमा देख भरत चकित हो जाते हैं और उनको महा भयावह घटना की सूचना मिलती है। जिस समय राम रावण से युद्ध करने को तैयार होते हैं, भरत सेना द्वारा उनकी सहायता करते हैं। यह घटना

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रामायण से भिन्न है। सीता के स्वयंवर में असफल होने पर रावण परशुराम को राम के विरुद्ध उकसाता है और सूर्पणखा को मंथरा के रूप में भेजता है। रावण- राम का विरोध आदि से अन्त तक दर्शाया गया है।

(२) अभिषेक नाटक इस नाटक में छः अंक है जिनमें वालि-वध से राम-राज्याभिषेक तक की कथा रवणित है। हनुमान जी को लंका पहुंच कर भगवती सीता को सान्त्वना देना तथा वहां उस नगरी का नष्ट करना एवं जलाना, रावण का सीता के सम्मुख राम- लक्ष्मण के कटे हुए मस्तक दिखा कर छल करना इस नाटक में समाविष्ट है। कल्पना के आधार पर लिखे हुए रूपक ये हैं-

(१) अविमारक

इसमें महाराज कुन्तिभोज की पुत्री कुरंगी और अविमारक नामक राजकुमार की प्रेमकथा वणित है। अविमारक एक हाथी से कुरंगी की रक्षा करता है और उस पर अनुरक्त हो जाता है। वह शापवश अपने पिता महाराज सौवीर के साथ एक निम्न जाति के पुरुष के समान रहता है। वह कुरंगी के समीप पहुंचने के लिए चोर की भांति उसके घर में जाता है और अकस्मात् पकड़ जाता है। उसे मृत्यु-दंड मिलता है। इसी समय नारद मुनि का आगमन होता है और वह अविमारक को सौवीर का पुत्र घोषित करते हैं। इस सत्य के प्रकट होने के उपरान्त ही दोनों का विवाह हो जाता है।

(२) दरिद्रचारुदत्त

इसमें ब्राह्मण चारुदत्त और गणिका वसन्तसेना की प्रेमकथा वणित है। एक गरीब ब्राह्मण वसन्तसेना पर अनुरक्त है और राजा का साला शकार भी इस प्रेम में प्रतिद्वन्दी है। वसन्तसेना अपने आभूषण चारुदत्त के पास रख देती है जिनको कि शार्वलिक चारुदत्त के घर में सेंध लगा कर चुरा ले जाता है और अपनी

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प्रेमिका मदनिका को वसन्तसेना की सेवा से मुक्त करता है। इसके उपरान्त दोनों का परिणय हो जाता है। इसी के आधार पर शूद्रक ने मृच्छकटिक नामक प्रकरण की रचना की है।

(३) प्रतिज्ञायौगन्वरायण महाराज उदयन हाथी का शिकार करते हुए महासेन के राज्य में पहुंचते हैं। मृगया में कुछ त्रुटि करने से महासेन द्वारा कैद कर लिये जाते हैं। कारागार में महासेन अपनी पुत्री वासवदत्ता को उदयन से वीणा सीखने के हेतु भेजते हैं। इसी शिक्षा के मध्य में दोनों परस्पर अनुरक्त हो जाते हैं और छिप कर अपनी राजधानी को भाग जाते हैं।

(४) स्वप्नवासवदत्त स्वप्नवासवदत्त प्रतिज्ञायौगन्धरायण की कथा का उत्तरार्द्ध है। यौगन्धरायण वासवदत्ता को राजा से वियुक्त कर पद्मावती के सम्मुख छोड़ देते हैं और वह जल गयी ऐसा घोषित करते हैं। पद्मावती और राजा का विवाह राज्य की समृद्धि के लिए ज्योतिषीगणों ने आवश्यक बताया था। अपनी प्रिय वासवदत्ता के जलने का समाचार सुन उदयन पद्मावती से विवाह कर लेते हैं। एक बार शिरोवेदना से पीड़ित पद्मावती के समीप वासवदत्ता जाती है और वहां संयोगवश पद्मावती के अनुपस्थित होने पर वासवदत्ता उस स्थान पर विद्यमान उदयन का सिर दबाने लगती है। उस समय राजा को वासवदत्ता का सा भान होता है परन्तु यह घटना स्वप्न की बता दी जाती है। इसी घटना के आधार पर इस नाटक का नामकरण हुआ है। कुछ काल उपरान्त यौगन्धरायण का आगमन होता है और सत्यता प्रकट होती है।

भास की नाटककला और शैली महाकवि भास अपनी मौलिकता एवं नाटकरचना-कौशल के लिए विख्यात हैं। यद्यपि भरत मुनि के नाटयशास्त्र के नियमों का उन्होंने अक्षरशः पालन नहीं

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किया है तथापि उन्होंने अपनी अद्वितीय कल्पना-शक्ति से उन्हें अपूर्व रोचक और मनोरम बनाने में कुशल प्रतिभा दिखायी है। भास की अनुपम शैली यह है कि वह कहीं-कहीं परोक्ष घटनाओं तथा अनुपस्थित पात्रों को बिना रंगमंच पर उपस्थित किये ही दर्शकों की उनमें पूर्ण रुचि उत्पन्न कर देते हैं। प्रतिज्ञायौगंध- रायण में वासवदत्ता और उदयन रंगमंच पर अनुपस्थित रहते हुए भी निरंतर दर्शकों के मन में उपस्थित से रहते हैं और कौतूहल पैदा करते रहते हैं। किसी- किसी स्थान पर उन्होंने घटनाओं की मनोहारिणी शृंखला उपस्थित कर दी है। उदयन जैसे राजा को कारागार में भेजना, ब्राह्मण चारुदत्त व वेश्या वसन्तसेना का प्रेम दिखाना, पिता पुत्रों का युद्ध दिखाना उनकी लेखनी के अद्वितीय चमत्कार हैं। पद्य को पादों तथा उपपादों में विभक्त कर कई पात्रों से कहलाना उनकी शैली का सरल रूप है। वह प्रायः मुद्रालंकार द्वारा नान्दी में ही रूपक के पात्रों का उल्लेख कर देते हैं। उपमा, रूपक और उत्प्रेक्षा आदि अलंकारों का उन्होंने प्रयोग किया है। रस और अवसर के अनुरूप शैली में परिवर्तन भी किया है। अतः प्रकृति के चित्रण करने में उन्हें आश्चर्यजनक सफलता मिली है। महाकवि कालिदास पर भी उनका प्रभाव पड़ा है। प्रतिमा नाटक में सीता का वल्कल वस्त्रों का धारण करना और अभिज्ञान शाकुन्तल में शकुन्तला का वल्कल वस्त्रधारी निरूपित करना दोनों ग्रन्थों की समान घटनाएँ हैं। इसी प्रकार प्रतिमा नाटक और अभिज्ञान शाकुन्तल में सीता-वियोग और शकुन्तला-वियोग में साम्य दिखाई पड़ता है। भास ने प्रकृति का भी अनुपम वर्णन किया है। उन्होंने तपोवन तथा प्रकृति की रमणीय अवस्था का बड़ा ही रोचक चित्र खींचा है। तपोवन का वर्णन करते हुए वे कहते हैं- "विश्रब्धं हरिणाश्चरन्त्यचकिता देशागतप्रत्यया वृक्षाः पुष्पफलँः समुद्धविटपाः सर्वे दयारक्षिताः। भूयिष्ठं कपिलानि गोकुलधनान्यक्षेत्रवत्यो दिशो निःसंदिग्धमिदं तपोवनमयं धूमो हि बहवाश्रयः।।" -- स्वप्न० १।१२

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तपोवन के कारण ही मृग निश्चिन्त और निर्भीक होकर अपने-अपने निवास- स्थान में आये हुए भ्रमण कर रहे हैं। वृक्ष और पौधे पुष्प और फलों से परिपूर्ण हैं और कपिला गौवें भी अधिक संख्या में घूम रही हैं। समीपवर्ती स्थान में कहीं खेती की सी भूमि दृष्टिगोचर नहीं होती और यज्ञ का धुआं भी विस्तृत हो रहा है, इसलिये यह स्थान निःसन्देह ही तपोवन है।- भास ने मानवीय मनोभावों और मानसिक स्थिति का भी बड़ा सुन्दर चित्रण किया है। वासवदत्ता के स्वर्गवासी होने की सूचना मिलने पर कंचुकी राजा को इस प्रकार सान्त्वना देता है-

"कः कं शक्तो रक्षितुं मृत्युकाले रज्जुच्छेदे के घटं धारयन्ते। एवं लोकस्तुल्यधर्मो वनानां काले काले छिद्यते रुह्यते च॥" -- स्वप्न० ६।१०

अकस्मात् मृत्यु के आ जाने पर कौन किसकी रक्षा कर सकता है? रस्सी के टूट जाने पर घड़े को कौन धारण कर सकता है? मनुष्य वृक्षों के समान ही है जो समय-समय पर काटे जाते हैं और उत्पन्न हो जाते हैं। भास का सान्त्वना देने का यह ढंग निश्चय ही अत्यन्त निराला है। महाकवि भास संस्कृत साहित्य के प्रथम उपलब्ध नाटककार हैं जिन्होंने अपनी प्रतिभा का बड़े ही सुन्दर ढंग से दिग्दर्शन कराया है। महाकवि कालिदास ने उनका बड़े ही आदरपूर्वक कविकुलगुरु के रूप में उल्लेख किया है जो सर्वथा उनके अनुरूप ही प्रतीत होता है।