Books / Samskrit Natakkar Kanti Kishore Bharatiya

5. ५. धर्म और रूपक

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५. धर्म और रूपक

अभिनीत रूपकों का सर्वप्रथम उल्लेख पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य में मिलता है जिसका अवलोकन करने से विदित होता है कि उनमें अभिनय के अन्तर्गत वार्त्तालाप को दो विभागों में विभक्त किया गया है। नट उस काल में केवल वार्त्तालाप तक ही सीमित नहीं रहते थे अपितु गान एवं नृत्य में भी पर्याप्त भाग लिया करते थे। उक्त ग्रन्थ का अवलोकन करने से विदित होता है कि रूपक उस समय अपनी आर- म्भिक एवं अविकसित दशा में ही विद्यमान था। महाभाष्य में कंसवध नामक रूपक का उल्लेख है जिसमें भगवान् श्रीकृष्ण द्वारा कंस के वध किये जाने की कथा का समावेश है। यह नाटक अभी तक उपलब्ध नहीं हो सका है इसलिए हम इसके विषय में शैली, कथानक आदि का विस्तृत विवेचन करने में असमर्थ ही हैं। इस नाटक में कंसपक्षी लोग काले तथा कृष्णपक्षी लोग लाल वस्त्र धारण करते थे। यह काले तथा लाल रंग के वस्त्रों को दो विपक्षियों में धारण करवाना कुछ विद्वानों के मतानुसार ग्रीष्म और शरद् ऋतुओं में अथवा अन्धकार और प्रकाश में सामंजस्य करने का द्योतक है। इसी प्रकार यह भी वर्णन है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र भी अपनी मर्यादानुसार भिन्न-भिन्न रंग के वस्त्र धारण करते थे और इस प्रकार अभिनय में अपनी धार्मिक अवस्था का परिचय दिया करते थे। रूपक में धार्मिकता के भावों को अध्ययन करने के लिए हास्यमय पात्र विद्ू- षक की उत्पत्ति एवं उसके स्थान पर भी ध्यान देना आवश्यक है। समस्त भार- तीय नाटकसाहित्य के अवलोकन करने से विदित होता है कि यह विदूषक रूपक के नायक का अभिन्न साथी है। इसके वर्ण के विषय में विद्वानों में मतभेद है कि वह शूद्र था अथवा ब्राह्मण था। वैदिक सोम यज्ञ में एक शूद्र को प्रतिमा के समान समझ कर उपहास किया जाता था। प्रोफेसर हिलेब्रानड्ट के मतानुसार यह विद्व-

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षक उसी शूद्र का अवशेष है जो रूपक में प्राकृत भाषा में ही सम्भाषण करता है और बड़े ही सुन्दर ढंग से पाठकों का मनोरंजन भी सम्पन्न करता है। महिलाओं के मध्य में उसे स्वच्छंदतापूर्वक विचरण करने का पूर्ण अधिकार प्राप्त है। सोम यज्ञ के एक पात्र का मनोरंजन में उसी भांति भाग लेना रूपक में धार्मिकता का परिचायक है। कृष्ण-भक्ति का भी रूपक पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। अपने दिव्य अमानु- षिक कृत्यों के कारण भगवान् कृष्ण का स्थान इतिहास में सदा देदीप्यमान रहा है और उन्हें विष्णु का अवतार माना गया है। उनकी बाल-लीलाओं का सदा से ही अभिनय होता चला आया है। वह दृश्य चित्ताकर्षक है जब कंस के दरबार में कृष्ण कंस के सहायक कुश्ती लड़नेवालों को परास्त कर उसका वध करते हैं और कृष्ण अपनी माता देवकी के साथ चित्रित किये जाते हैं तो यशोदा की प्रसन्नता का पारावार नहीं रहता। इधर अप्सराएँ और गंधर्व अपने दिव्य नृत्य में लीन रहते हैं। कृष्ण की बाल-लीलाओं तथा गोपिकाओं के साथ करीड़ा का भी रोचक वर्णन प्रस्तुत किया गया है। मुरली बजा कर पशु-पक्षियों को मुग्ध कर लेने की उनकी दिव्य विधि सर्वविदित ही है। राधा के साथ उनकी प्रेममयी लीलाओं का प्रदर्शन किया गया है जिनका कि पश्चाद्वर्ती संस्कृत साहित्य पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। जयदेव कृत गीतगोविन्द इस विषय में उल्लेखनीय है जिसमें इस प्रकार की अनेक कृष्ण-लीलाएँ समाविष्ट हैं। भारतीय जनता आरम्भ से ही अपनी धार्मिक भावना से ओत-प्रोत होकर कृष्ण का गुणगान करती चली आयी है। उनकी जन्मभूमि व्रज में शौरसेनी प्राकृत का प्रचार हुआ जो मध्यकालीन हिन्दी साहित्य में ब्रजभाषा की जन्मदात्री हुई। इस प्रकार कृष्ण के चरित्र का पश्चाद्वर्ती अनेक नाटककारों पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा और उन्होंने अपने ग्रंथों में कृष्ण चरित्र के आधार पर कथानक का निर्माण किया। कृष्ण-भक्ति के समान ही संस्कृत नाटकसाहित्य में शिव-भक्ति का भी विशेष महत्त्व है। पार्वती के साथ शिव ने मनोरंजन में तांडव और लास्य नृत्यों को जन्म दिया। वैदिक काल में शिव की आराधना आरम्भ हो गयी थी। इन लास्य और

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तांडव नृत्यों का उत्तरकालीन संस्कृत नाटकसाहित्य पर विशेष प्रभाव पड़ा जिसके आधार पर नृत्यकला का इसमें समावेश किया गया। यही कारण है कि अनेक संस्कृत नाटककार शैवमतानुयायी हुए हैं और उन्होंने अपने ग्रंथों के आरम्भिक श्लोक नान्दी में इष्टदेव शिव की आराधना का समावेश किया है जिनमें महाकवि शूद्रक, कालिदास एवं सम्राट् हर्षवर्धन विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। कृष्ण और शिव-भक्ति के समान ही राम भक्ति की भी इस दिशा में किंचिद्- मात्र भी उपेक्षा नहीं की जा सकती। रामचंद्र जी का जीवन सदा से ही संसार- वासियों को अपना जीवन उज्जवल बनाने की प्रेरणा देता चला आया है। इसी कारण रामचरित सदा से ही लोक में विख्यात रहा है। इसी उद्देश्य को लेकर रामलीला का प्रजा के मनोरंजनार्थ समय-समय पर अभिनय होता चला आया है। कुछ विद्वानों का यही मत है कि रामलीला के रूप में अभिनीत नाटकीय रूप कालान्तर में विकसित होकर आधुनिक अभिनीत रूपकों का जन्मदाता हुआ। महात्मा गौतम बुद्ध ने भारतीय धार्मिक दशा का आमूल परिवर्तन कर देश के सामाजिक जीवन में एक विशेष क्रान्ति उत्पन्न कर दी। अपने उद्देश्य की सिद्धि के लिए वह सरलतम भाषा में जनसाधारण के मध्य उपदेश दिया करते थे जिससे उन पर आशातीत प्रभाव पड़ता था। उनके सिद्धान्तों को कार्य रूप में परिणत करने के लिए कुछ नाटकसाहित्य का भी सर्जन हुआ। दुर्भाग्यवश बौद्ध धर्म के आधार पर लिखा हुआ इस प्रकार का नाटक-साहित्य प्रचुर मात्रा में उपलब्ध नहीं होता। अश्वघोष कृत शारिपुत्र प्रकरण तथा सम्राट् हर्षवर्धन कृत नागानन्द नामक नाटक इस विषय में उल्लेखनीय हैं। महात्मा गौतम बद्ध के काल में भारत की तत्कालीन साहित्यिक दशा पर दृष्टिपात करने से विदित होता है कि उस समय भी नाटकसाहित्य का पर्याप्त प्रचार था। एक किंवदन्ती के अनुसार पाटलिपुत्र के तत्कालीन सम्राट् बिम्बसार ने दो नागा राजाओं के आगमन के उपलक्ष्य में एक नाटक में स्वयं भाग लिया था जिसकी अध्यक्षता महात्मा गौतम बुद्ध द्वारा स्वयम् की गयी थी। यह प्रसिद्ध नाटक शोभावती नगरी में अभिनीत किया गया था। इसी अवसर पर एक कुव- लया नामक स्त्री पात्रा को बौद्ध धर्म की दीक्षा मिली थी। यद्यपि महात्मा गौतम

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बुद्ध के जीवनकाल में अभिनीत इन नाटकों का मूल रूप उपलब्ध नहीं होता, पश्चा- द्वर्ती साहित्य पर इन कृतियों का विशेष प्रभाव पड़ा है। महात्मा गौतम बुद्ध के अहिंसा और सत्य के सिद्धान्तों का प्रचार करने में इन ग्रंथों का निश्चय ही सक्रिय भाग रहा है। रामायण और महाभारत के गेय प्रसंगों से ही कालान्तर में नाटक-साहित्य ने जन्म लिया। यह भावना रूपक के अन्तर्गत धार्मिक भावना को परिपूर्ण करने में बहुत ही सहायक सिद्ध हुई है। पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य में जिस कंस-वध नामक नाटक का उल्लेख है उसमें गेय प्रसंगों एवं महाभारत के उद्धृत श्लोकों का विशेष भाग है। मैकडौनेल की सम्मति के अनुसार महाभाष्य का समय द्वितीय शताब्दी ई० पू० है परन्तु यह मत उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। महाभाष्य में पायी जानेवाली भाषा एवं उसकी शैली पर दृष्टिपात करने से वह बहुत पूर्व की रचना प्रतीत होती है और इस प्रकार नाटकसाहित्य भी उस काल का ही है। पतंजलि मुनि के समय में सम्भवतः पश्चाद्वर्ती नाटक-साहित्य के समान ही गद्य भाषाओं में अपनी योग्यता के अनुसार ही संस्कृत और प्राकृत भाषाओं का पात्रों द्वारा प्रयोग किया जाता था। कंसवध उस समय बहुत ही लोकप्रिय ग्रंथ रहा होगा और उसमें महाभारत के श्लोकों का विशेष रूप से समावेश किया गया होगा। भरत मुनि ने अपने नाटयशास्त्र में भी रामायण और महाभारत के गेय प्रसंगों को नाटक-साहित्य का प्राथमिक रूप माना है। मथुरा के समीपवर्ती प्रदेशों में शौरसेनी प्राकृत बोली जाती थी। इसी कारण कृष्ण-चरित्र सम्बन्धी नाटकों में इस भाषा का विशेष रूप से समावेश हुआ है। प्रो. लेवी का मत है कि सर्वप्रथम प्राकृत भाषा में ही नाटक-साहित्य का जन्म हुआ। प्राकृत साधारण रूप में बोलचाल की भाषा थी जब कि संस्कृत साहित्यिक एवं धार्मिक कार्यों के लिए अधिक उपयुक्त तथा सीमित थी। अतः अपनी रचना को लोक में अधिक विख्यात बनाने के हेतु सर्वप्रथम प्राकृत में नाटक-साहित्य का सर्जन करना अधिक उपयुक्त समझा गया। हमें यह मत युक्तिसंगत प्रतीत नहीं होता क्योंकि संस्कृत ही पूर्ववर्ती थी और उसी में अपना साहित्यिक चमत्कार दिखाने के लिए नाटकसाहित्य की रचना की गयी होगी।

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पर भाग लेना इतना मनोरंजक था कि वह पश्चाद्वर्ती नाटक-साहित्य के विदूषक से समता रखता है। हरिवंश के एक दूसरे स्थल में इन्द्र के आज्ञानुसार कृष्ण द्वारा वज्तरनाभ नामक राक्षस के वध की कथा का वर्णन है। वज्रनाभ अपने निवास के लिए अधिक स्थान चाहता है जिससे जनसाधारण में उसके अत्याचारों और उपद्रवों के विस्तृत होने की अधिक संभावना है। कृष्ण वेष बदल कर उसकी हत्या करते हैं जिसके पश्चात् असाधारण हर्ष मनाया जाता है। विदूषक मनोरंजन का अभिनय करता है तथा रूपवती स्त्रियां भी नृत्य एवं गान में यथायोग्य भाग लेती हैं। रामायण की कथा सुनाई जाती है। उत्सव के समाप्त होने पर कृष्ण कुवेर की कथा को सुनकर दर्शक बहुत ही प्रभावित होते हैं। इन दोनों हरिवंश की कथाओं के आधार पर विद्वानों का मत है कि रूपक में धार्मिक भावना का समावेश किया गया और किसी की मृत्यु के अवसर पर किये गये रूपकों से ही संस्कृत रूपकों का जन्म हुआ। इन स्थलों को देखने से विदित होता है कि यह उत्सव मृत्यु के अवसर पर समवेदना प्रकट करने के लिए नहीं अपितु दुष्टों के वध पर हर्षोल्लास मनाने के हेतु किये जाते थे। इस प्रकार रिजवे का यह मत कि नाटक आरंभ में समवेदना प्रकट करने के हेतु रचे गये और उन्हीं का विकसित रूप संसार का आधुनिक नाटक-साहित्य हुआ, सर्वथा निराधार है। हमें यह निर्विवाद रूप से स्वीकार करना पड़ता है कि संस्कृत नाटक-साहित्य पर धार्मिकता के भावों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा जिसमें शिव, राम एवं कृष्ण की भक्ति प्रमुख रही। राम और कृष्ण की लीलाएँ भी उपर्युक्त कथन की साक्षी हैं। शिव की स्तुति प्रायः नान्दी या भरतवाक्य तक ही सीमित रही।