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4. ४. ऋग्वेद और रूपक

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४. ऋग्वेद और रूपक

संसार के समस्त विद्वानों ने इस तथ्य को स्वीकार कर लिया है कि वेद ही समस्त संसार के प्राचीनतम ग्रन्थ हैं और ऋग्वेद उनमें सबसे प्रमुख एवं अग्रगण्य है, यद्यपि उनके रचनाकाल के विषय में विद्वानों में बहुत ही मतभेद है। इस विषय में अनुसंधान इतना अपूर्ण है कि विद्वानों के कठिन परिश्रम एवं गवेषणा के उपरांत भी किसी वैज्ञानिक निर्णय पर पहुंचना संभव नहीं हो पाया है। भारतीय विद्वानों का सिद्धान्त है कि वेद के रचना-काल के निर्णय करने का प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। उनकी यह दृढ़ धारणा है कि वेद अपौरुषेय, अनादि एवं शाश्वत हैं। वेद सृष्टि के सर्जन के साथ ही परम पिता परमात्मा द्वारा रचे गये और चार ऋषियों के हृदयों में प्रकाशित किये गये जब कि उनके शुद्ध अन्त :- करण में समाधि की अवस्था में उनका प्रादुर्भाव हुआ। उन ऋषियों में अग्नि ऋग्वेद के, वायु यजुर्वेद के, आदित्य सामवेद के तथा अंगिरा अथर्ववेद के प्रकाशक हुए। इस प्रकार उनकी रचना हुए उतना ही समय व्यतीत हुआ जितना कि सृष्टि की रचना को। भारतीय विद्वानों की गणना के अनुसार वेद और सृष्टि को रचे हुए विक्रम संवत् २०१५ (सन् १६५८ ई०) में १६७२६४६०४८ वर्ष व्यतीत हो चुके हैं। पं० गोपीनाथ शास्त्री चुलैट का मत है कि वेदों की रचना हुए लगभग तीन लाख वर्ष व्यतीत हो गये हैं। पाश्चात्य विद्वान् उक्त समस्त धारणाओं को निर्मूल एवं भ्रान्तिमय ही मानते हैं। यूरोप में संस्कृत विद्या के प्रचार होने के अनन्तर यूरोपवासियों का भी वेदों के अध्ययन और अध्यापन के प्रति अनुराग उत्पन्न हुआ और उन्होंने वेदों के रचना- काल आदि गम्भीर समस्याओं पर अनुसंधान करना प्रारम्भ किया। यद्यपि भार- तीय विद्वान् अपनी उक्त गणना पर पूर्णरूप से स्थिर थे, फिर भी उसके सम्बन्ध

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में भिन्न-भिन्न कटाक्ष करके यूरोपीय विद्वानों ने गड़बड़ पैदा करने के लिए पुनः काल-निर्णय करने का आडम्बर रचा जिसमें ज्मनी देश के वैदिक संस्कृत के विद्वान् प्रोफेसर मैक्समूलर सर्वप्रथम थे। उन्होंने सन् १८५६ ई० में 'प्राचीन संस्कृत साहित्य का इतिहास' नामक एक ग्रन्थ प्रकाशित किया। उन्होंने स्वीकार किया है कि महात्मा गौतम बुद्ध के समय में वेदों की संहिता ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनि- षद विद्यमान थे। गौतम बुद्ध का समय ईसवी पूर्व पांचवीं और छठीं शताब्दी है। सूत्र-साहित्य भी बौद्ध मत के उद्गम एवं प्रसरणकाल के समकालीन अथवा पश्चात्वर्ती ही प्रतीत होता है। अतः इसका समय ई० पू० ६०० से २०० तक माना जा सकता है। ब्राह्मण ग्रन्थों को रचने में कम से कम २०० वर्ष का समय अवश्य लगा होगा। अतः उनका प्राचीनतम रूप ८०० ई० पू० के बाद का रचा हुआ नहीं हो सकता। ब्राह्मण साहित्य अपने पूर्व समस्त वैदिक संहिताओं की कल्पना करता है। इस प्रणयन में भी कम से कम २०० वर्ष का समय अवश्य लगा होगा। इसलिए वेद संहिता के रचनाकाल को ई० पू० १००० और ८०० के मध्य में ही स्वीकार कर लेना चाहिए। मंत्रों एवं वैदिक भाषा के विकास के लिए २०० वर्ष का और समय मान कर उन्होंने ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों को १२०० ई० पू० के लगभग का स्वीकार किया है। इस मत की सत्यता पर विचार करते हुए हम देखते हैं कि यह बड़ा ही स्वेच्छा-प्रेरित एवं भ्रामक प्रतीत होता है। यह केवल कल्पना पर ही आधा- रित है। ब्राह्मण अथवा संहिता के सर्जनकाल को २०० वर्ष ही क्यों माना जावे ? यह न्यून अथवा अधिक भी हो सकता है। इस धारणा के सम्बन्ध में स्वयं मैक्स- मूलर को भी अपने ऊपर विश्वास न था और उन्होंने स्वीकार किया है कि वेदों के काल-निर्णय के विषय में निश्चित तिथि निर्धारित करना सम्भव नहीं है। व्हिटने, स्काडर, जैकोवी आदि विद्वानों ने उसकी तीव्र आलोचना की है और इस मत को सर्वथा विवेकहीन ही बतलाया है। इस विषय में सन् १८६३ में किये गये अनुसंधान का विशेष महत्त्व है। एक ही समय में जर्मनी के प्रसिद्ध नगर बान में प्रोफेसर जैकोबी और बम्बई कारावास में प्रकांड भारतीय विद्वान् लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने अपने-अपने तर्क

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एवं उक्तियों के आधार पर विद्वानों के समक्ष एक नवीन धारणा प्रस्तुत की। यद्यपि उनके विवेचन की पद्धति पृथक् थी, दोनों ही विद्वान् लगभग एक ही निर्णय पर पहुंच गये। जैकोबी को ब्राह्मण ग्रन्थों का अध्ययन करते हुए एक ऐसा वर्णन मिला जिसमें यह उल्लेख था कि कृत्तिका नक्षत्र के उदित होने के समय वासन्ती संक्रान्ति® हुई। ज्योतिष के आधार पर उन्होंने यह सिद्ध किया कि उक्त संक्रांति ई० पू० २५०० में हुई। अतः ब्राह्मण ग्रन्थ इस काल के पूर्व अवश्य रचे जा चुके थे और वेदों का समय निश्चित ही इस काल से बहुत पूर्व होगा। इस प्रकार अनु- मान करते हुए ई० पू० ४५०० तक वेदों का रचना-काल पहुंच गया। इसी प्रकार बाल गंगाधर तिलक ने ऋग्वेद संहिता के आधार पर एक वर्णन प्रस्तुत किया जिसमें कि मृगशिरा नक्षत्र के उदित होने पर वासन्ती संक्रांति का उल्लेख था। ज्योतिष के आधार पर गणित द्वारा उन्होंने यह निर्णय किया कि इस प्रकार की संक्रांति ई० पू० ४५०० में हुई और ऋग्वेद के सर्जन-काल को ई० पू० ६००० के लगभग का अनुमान किया। हूगोविकलर ने सन् १६०७ ई० में एशिया माइनर के बोधाज़कोई नामक स्थान में खुदाई का अनुसंधान करते हुए एक मृत्तिका फलक प्राप्त किया जिसमें उस देश के तत्कालीन राजाओं द्वारा किये गये संधिपत्रों का उल्लेख था। ये संधि- पत्र निश्चित प्रमाणों के आधार पर ई० पू० १४०० के लगभग माने जाते हैं जब कि उक्त फलक का निर्माण हुआ होगा। इन संधिपत्रों में उभयपक्ष के देवताओं का संरक्षकों के रूप में आह्वान किया गया है। उन देवताओं के साथ-साथ वैदिक देवता मित्र, वरुण, इन्द्र इत्यादि का भी उल्लेख है परन्तु उनके नाम कुछ परिव- तित रूप में लिखे गये हैं, जैसे वरुण का उरुन, मित्र का मितर तथा इन्द्र का इन्दर। इससे प्रतीत होता है कि उस समय वेद एवं वैदिक देवताओं का प्रसार एशिया माइनर जैसे भारत के सुदूरवर्ती देशों में भी हो गया था और वेदों का इतना

१. वसन्त ऋतु में दिन रात के बराबर होने को वासन्ती संक्रांति कहते हैं जो अंग्रेजी कलेन्डर के अनुसार २२ मार्च को होती है।

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प्रचार हो गया था कि भाषा का रूप भी बदलने लगा था जिस कारण इन विकृत शब्दों का फलक में प्रयोग हुआ है। यदि इस परिवर्त्तन और विकास को एक सहस्र वर्ष भी माना जावे तो ऋग्वेद के रचना-काल को ई० पू० २५०० मानने में कोई आपत्ति नहीं होनी चाहिए। इस प्रकार हमने ऋग्वेद के रचनाकाल के विषय में विभिन्न विद्वानों की भिन्न धारणाओं का विवेचन किया है। इस सब विवेचन के बाद भी पर्याप्त अन्वे- षण के अभाव में हम वेदों का कालनिर्णय करने में असमर्थ ही हैं। साथ ही साथ भारतीय गणना को किस आधार पर असंगत माना जावे, यह भी विचारणीय है। जैकोबी और तिलक के मतों पर टिप्पणी करते हुए विन्टरनिट्ज़ का मत है कि ज्योतिष के आधार पर अवलम्बित किया हुआ ऋग्वेद का समय पूर्णतः प्रमाणित नहीं हो सकता, क्योंकि जिन वैदिक स्थलों के आधार पर ऐसा निर्णय किया गया है वे पूर्णरूपेण असंदिग्ध नहीं हैं। अतः हमको भारतीय इतिहास के आधार पर ही यह कालनिर्णय करना पड़ता है। वेदों की रचना का विकासकाल तथा ऋग्वेद के प्राचीनतम अंशों का सर्जनकाल ई० पू० २५०० से २००० तक, मुख्य रचनाकाल २००० से १२०० तक तथा समाप्तिकाल १२०० से ८०० तक विन्टरनिट्ज ने माना है। इस विषय में गवेषणा बहुत अपूर्ण है परन्तु पश्चिमीय विद्वानों के द्वारा किये गये अनुसंधान के आधार पर हम यह कह सकते हैं कि वेद २००० ई० पू० में अवश्यमेव विद्यमान थे। भारतीय विद्वानों के सिद्धान्त के अनुसार वेद परमात्मा द्वारा रचे गये और उनमें समस्त विद्या का मूल रूप से समावेश है। एक सहज प्रश्न उठता है कि हम संसार में समस्त ग्रन्थ मनुष्यों द्वारा रचे हुए देखते हैं तो वेदों में ही क्या विशेषता है कि उनकी रचना परमात्मा द्वारा की हुई मानी जावे। मनुष्य जो कुछ ज्ञानो- पार्जन करता है वह उसके शिक्षक एवं समाज की शिक्षा का ही परिणाम होता है। यदि उसको कुछ भी न सिखाया जावे और जन्म से ही अन्य मनुष्यों से पृथक् रखा जावे तो वह पशुओं के समान ही चेष्टा करने लगेगा। सृष्टि के आरंभ में जब मनुष्य उत्पन्न हुआ तब उसको शिक्षा देनेवाला कोई अन्य व्यक्ति न था। वह स्वतः किसी प्रकार ज्ञानोपार्जन नहीं कर सकता था। अतः प्राकृतिक नियमों के द्वारा

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कुछ ज्ञान कार्य-संचालनार्थ अवश्य प्राप्त हुआ होगा। वही ज्ञान वैदिक ज्ञान के नाम से प्रसिद्ध हुआ और चारों वेदों में उसी का समावेश हुआ है। जब परमात्मा ने वेदों का प्रकाश किया तो अनेक ऋषियों ने उनका मनन करना आरम्भ किया। इस प्रक्रिया में जिस ऋषि ने जिस मन्त्र पर मनन कर उसके अर्थ को समझा, वह उस मंत्र का द्रष्टा कहलाया। प्रत्येक मंत्र के विनियोग में इन ऋषियों का नाम स्मरणार्थ अब तक लिखा जाता है। पार्चात्य विद्वान् भारतीय विद्वानों के इस सिद्धान्त को कि वेदों की रचना ईश्वर द्वारा हुई नहीं मानते। उनका यह भी विश्वास है कि वेद में प्रयुक्त होने वाले व्यक्तिवाचक नाम किसी व्यक्तिविशेष या स्थानविशेष के ही नाम हैं। उनका यह भी कथन है कि ऋग्वेद का कुछ भाग नाट्यसाहित्य का प्राचीनतम रूप है। उन्होंने ऋग्वेद के कुछ ऐसे सूक्तों की ओर संकेत किया है जिनमें नाट्यसाहित्य का ऐसा रूप मिलता है। कीथ ने लिखा है कि ऋग्वेद में लगभग १५ ऐसे सूक्त हैं जिनमें दो या अधिक वक्ताओं के बीच सम्भाषण प्रस्तुत किया गया है। संवाद ही नाट्यसाहित्य का प्राथमिक रूप है और बाद में उसको अभिनय का पुट दिया गया। इनमें से कुछ सूक्त ऐसे हैं जिनमें उनके मंत्रों के ऋषियों के मध्य में ही संवाद माना गया है। यूरोपीय विद्वान् इन ऋषियों को वेदों का मनन करनेवाला द्रष्टा न मान कर रचयिता ही मानते हैं और अपना उक्त मत प्रदशित करते हैं। ऋग्वेद में पाये जानेवाले प्रमुख संवाद-सूक्त निम्नलिखित हैं जिनमें इस प्रकार संवाद पाया जाता है- १ मण्डल १ सूक्त १७६ अगस्त्य और लोपामुद्रा २ ३ ३३ विश्वामित्र एवं विपाशा (झेलम) तथा शतद्रु (सतलज) नदियां ३ ४ " १८ इन्द्र, अदिति और वामदेव ४ ४ ४२ इन्द्र और वरुण ५ ७ ८३ वशिष्ठ और सुदास १० यम और यमी 11 १०

७ १० २८ इन्द्र, वसुक और वसुक-पत्नी "

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मण्डल १० सूक्त ५१ देवताओं द्वारा अग्नि की स्तुति १० इन्द्र, इन्द्राणी और वृषा कपि " 11 ८६ १० १० पुरुवस् और उर्वशी 11 ११ १० १०८ सरमा और पणि " मैक्समूलर का मत है कि कथित संवाद-सूक्त इन्द्र, मरुत तथा अन्य देव- ताओं की स्तुति में उनके अनुयायियों द्वारा गाये जाते थे। लेवी का कथन है कि सामवेद काल में गान-कला अपने विकास की चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। ऋग्वेद में ऐसी महिलाओं का उल्लेख है जो सुन्दर परिधान धारण कर नृत्य और गान द्वारा अपने प्रेमियों को आकृष्ट किया करती थीं। ऋग्वेद में मनुष्य के नाचने- गाने के लिए भिन्न-भिन्न विधियों और प्रथाओं का वर्णन है। इन समस्त कलाओं के संवाद में समाविष्ट होने के उपरान्त ही नाट्यसाहित्य का जन्म हुआ होगा। नृत्य और गान तथा रूपक में एक स्वाभाविक सम्बन्ध है जिसका बड़ी सर- लता से अनुभव किया जा सकता है। इस समय यह कहना कठिन है कि वैदिक काल में उस नृत्य का मूल रूप क्या था। सम्भव है कि यज्ञ के अवसर पर ये नृत्य विधिवत् प्रतिपादित किये जाते होंगे। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने जिस समय सृष्टि-रचना सम्पन्न की, उस समय भी एक दिव्य प्रकार के नृत्य का अभिनय हुआ। कुछ लोगों का अनुमान है कि इसी नृत्य की कल्पना कर कालान्तर में उसका रूपक में समावेश किया गया होगा, यद्यपि इस विषय में कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिला है। सृष्टि के आरंभ में यूनान देश में भी लोग परमेश्वर की रचयित्री शक्ति की प्रशंसा कर उस पर मुग्ध हो नाचने लगते थे। इसी प्रकार के नृत्यों से यूनान देश में नृत्यकला का जन्म हुआ होगा किन्तु हमारे देश के साहित्य में इस प्रकार के नृत्यों का कोई उल्लेख नहीं मिला है। अतः यह मत अनुचित ही प्रतीत होता है। डाक्टर हर्टल का मत है कि वैदिक ऋचाएँ सदा से ही गायी जाती थीं। एक गानेवाले के लिए दो पात्रों का संवाद प्रस्तुत करना सम्भव नहीं है। अतः सम्भव है कि ऐसे सूक्तों को नाटकीय रूप प्रदान करने के उद्देश्य से यह दो गायकों का गान होता हो। इस कला का अवशेष जयदेव कृत गीतगोविन्द में कुछ परिवर्तित रूप

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में मिलता है। वैदिक संवाद-सूक्तों के विकसित रूप में परिवर्तित होने में राज यात्राओं के अवसर पर किये गये उत्सवों का विशेष भाग है। विष्णु, कृष्ण, रुद्र, शिव की पूजा वैदिक काल से प्रचलित है। इन पूजाओं का भी नाट्यसाहित्य के विकास पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। प्रारंभिक अवस्था में ये संवाद-सूक्त ऋत्विजों द्वारा यज्ञ के अवसर पर गाये जाते थे जिनमें प्रायः देव या दानवों की स्तुति अथवा निन्दा समाविष्ट रहती थी। यद्यपि ऋग्वेद के अधिकतर अंश यज्ञ के विधान के हेतु ही लिखे गये हैं, उनमें फिर भी कुछ भाग ऐसा अवश्य है जिसकी साहित्यिक दृष्टि से उपेक्षा कदापि नहीं की जा सकती। विश्वामित्र और वशिष्ठ तथा सुदास और दशराज्ञ के युद्धों के वर्णन इस कथन के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं। ऋग्वेद में पायी जानेवाली भाषा और उसके विभिन्न रूपों पर विवेचना करने से यूरोपीय विद्वानों को ऐसा प्रतीत होता है कि ऋग्वेद के सर्जन में बहुत लम्बा काल लगा जिस कारण उसमें कई कालों की भाषा पायी जाती है तथा उसका नवीन और प्राचीन रूप स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। ऋग्वेद के नवीन भागों में यज्ञ के अवसर पर गेय सूक्त क्रमशः कम होते गये तथा साहित्यिक सूक्त बढ़ते गये। उक्त संवाद-सूक्त उन्हीं नवीन पश्चाद्वर्ती सूक्तों के अन्तर्गत ही समाविष्ट हैं। यही कारण है कि ऋग्वेद के अन्तिम दशम मंडल में ऐसे सूक्त अधिक पाये जाते हैं जो कि अपेक्षाकृत नवीन ही प्रतोत होता है। जैसा कि पहले बताया जा चुका है, डा० हर्टल इस विषय में कहते हैं कि ऋग्वेद के इन संवाद-सूक्तों में गायक दो या अधिक श्रेणियों में विभक्त थे जो कि अपनी योग्यता के अनुसार वक्ता का भाग लिया करते थे। इस मत के विरुद्ध कीथ का कथन है कि ऋग्वेद के सूक्त सामवेद के समान केवल गाये ही न जाते थे, अपितु एक विशेष प्रकार से उच्चरित भी किये जाते थे। दुर्भाग्यवश इस विषय में अधिक ज्ञान नहीं है कि उन उच्चारणों का मूल रूप क्या था। अतः सम्भव है कि एक ही वक्ता या गायक भिन्न-भिन्न प्रकार के दो स्वरों का उच्चारण कर इस भिन्नता को द्योतित करता हो। अतः दो या अधिक वक्ताओं का इसमें मानना उचित प्रतीत नहीं होता। ऋग्वेद के समस्त छन्द केवल यज्ञ के अवसर पर ही प्रयुक्त होने के हेतु नहीं

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लिखे गये अपितु उनमें नाना प्रकार की सत्य विद्याओं का समावेश है। संसार के इस प्राचीनतम ग्रन्थ में अध्यात्म विद्या सम्बन्धी अनेक प्रकार के मन्त्र पाये जाते हैं। यम और यमी का संवाद भी इसी प्रकार का एक सूक्त है। सातवें मंडल में कुछ ऐतिहासिक सूक्तों का भी इसमें समावेश है। कुछ सूक्त मृत्यु के अवसर पर दिवंगत आत्मा को शान्ति प्रदान करने के हेतु ही लिखे गये हैं। इस प्रकार यह सहज ही निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ऋग्वेद के समस्त छन्द केवल यज्ञ में ही प्रयुक्त होने के हेतु नहीं लिखे गये। कुछ सूक्तों में साहित्यिक चमत्कार भी दिखाये गये है जिनमें संस्कृत नाटक-साहित्य का प्राचीनतम रूप समाविष्ट है। ऋग्वेद के अधिकांश मंत्र यज्ञीय अवसर पर प्रयुक्त होते थे तथा संस्कृत नाटकों के विकसित होने पर ये वैदिक नाटक समाप्तप्राय ही हो गये। यहां तक कि अब उनके अभिनय का कहीं उल्लेखमात्र भी नहीं मिलता। पश्चाद्वर्ती नाटय- साहित्य एवं अभिनय के अधिक विकसित होने पर इन वैदिक नाटकों का सर्वथा लोप सा ही हो गया। डा० हर्टल की सम्मति के अनुसार ये संवाद-सूक्त बहुत ही प्रारंभिक रूप में थे और अपेक्षाकृत बहुत अधिक रोचक नाट्यसाहित्य के पश्चाद्- वर्ती काल में विकसित होने के कारण इनकी नाटयमहत्ता का अस्तित्व ही समाप्त हो गया। संस्कृत नाटक-साहित्य की एक विशेषता यह है कि उसमें गद्य-पद्य का सम्मिश्रण सामान्य रूप से पाया जाता है। यह कला न्यूनाधिक रूप में अन्य नाटकों में भी पायी जाती है। इस शैली के विषय में विंडिश, ओल्डेनवर्ग आदि यूरो- पीय विद्वानों ने अपनी अद्भत सम्मति प्रदान की है। उनका विचार है कि भारत यूरोपीय भाषा के प्राचीनतम रूप में एक दिव्य प्रकार के महाकाव्य का अस्तित्व विद्यमान था जिसमें विचार-गाम्भीर्य की पराकाष्ठा एवं गद्य-पद्य का सम्मिश्रण समाविष्ट था। उसी भाषा के आधार पर संस्कृत में गद्य-पद्यमय नाटयसाहित्य का जन्म हुआ। पिशेल का इसके विरुद्ध मत है कि इन वैदिक संवाद-सूक्तों में आरम्भ में गद्य भी होगा। यज्ञीय अवसरों के लिए सर्वथा अनुपयुक्त रहने के कारण काला- न्तर में उनका लोप हो गया। इस विचार के विरुद्ध हमारा कथन है कि वेद आरम्भ से अब तक ज्यों के त्यों अपरिवत्तित रूप में विद्यमान हैं। उनके जटिल व्याकरण,

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स्वरकौशल एवं सन्धि-विज्ञान के कारण उनमें किसी प्रकार का परिवर्तन करना सम्भव नहीं है। इसलिए नाटक-साहित्य के गद्य-पद्य की शैली का उद्गम वेदों से मानना सर्वथा अनुपयुक्त ही है। यद्यपि वेदों में इस प्रकार का कोई साहित्य प्राप्त नहीं होता, फिर भी कुछ विद्वानों का अनुमान है कि ऐतरेय ब्राह्मण में शुनः शेप की कथा तथा शतपथ ब्राह्मण में पुरुवस और उर्वशी की कथा इस प्रणाली के प्राचीनतम रूप हैं। परन्तु उनके कथानक और विषय पर दृष्टिपात करने से हम उन्हें नाटक-साहित्य का रूप किसी प्रकार मानने को उद्यत नहीं हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि महात्मा गौतम बुद्ध के काल में उनकी रचना बौद्ध जातकों में ही इस प्रणाली का प्रथम रूप पाया जाता है। भारतीय विद्वानों की धारणा के अनुसार उस काल तक नाटक-साहित्य का पर्याप्त विकास हो चुका था और उसके प्रथम उपलब्ध आचार्य महाकवि भास का प्रादुर्भाव भी हो चुका था या उस समय के बहुत ही समीप होनेवाला था। इसलिए बौद्ध जातकों के उपलब्ध अंश के आधार पर उसको नाटयसाहित्य का प्रथम रूप मानना किसी प्रकार युक्तिसंगत नहीं है। इस प्रकार भारतीय विद्वानों की धारणा है कि यज्ञीय अवसरों को सुमनोहर बनाने के लिए ही नाटकसाहित्य का जन्म हुआ। गद्य-पद्य के सम्मिश्रित प्रयोग के उद्गम के विषय में मतभेद है। कुछ विद्वानों का यह भी मत है कि इसका कारण यह हो सकता है कि इन वैदिक नाटकों की आरम्भिक अवस्था में गद्य न हो और कुछ समय पश्चात् उनको नाटकीय दृष्टि से उपयुक्त बनाने के लिए गद्य का समावेश किया गया हो, जो कि इन सूक्तों के नाटकीय महत्त्व के लुप्त होने के साथ-साथ विलुप्त हो गया हो। प्रमापपाभाव के कारण इस विषय में भी किसी निश्चित निर्णय पर नहीं पहुँचा जा सकता। जब वेदों में किसी प्रकार का परिवर्तन सम्भव नहीं है, तो इस प्रकार का कोई प्रश्न ही उपस्थित नहीं होता। विभिन्न विद्वानों के मतानुसार इन संवाद-सूक्तों के रूपों पर विवेचना करने के उपरान्त एक सहज प्रश्न उपस्थित होता है कि संवाद केवल ऋग्वेद में ही नहीं अपितु ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद जैसे उत्तरकालीन वैदिक साहित्य में एवं पुराण, रामायण तथा महाभारत आदि महाकाव्यों में प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, फिर

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ऋग्वेद को ही नाटकसाहित्य का प्राथमिक रूप क्यों कर माना जावे। कालचक्र के अनुसार ऋग्वेद हमारे साहित्य का प्राचीनतम रूप है, केवल संवाद को नाटक नहीं कहा जा सकता ; क्योंकि उसकी विद्यमानता में भी अभिनय सम्बन्धी क्रियाकलापों के अभाव में नाटक की कल्पना करना सम्भव नहीं है। नाटयशास्त्र के प्रणेता भरत मुनि ने स्वीकार किया है कि नाटयसाहित्य में संवाद समाविष्ट करने का मूल स्रोत ऋग्वेद ही है, जिसके आधार पर पश्चाद्वर्ती कवियों ने अपनी रचनाओं में इस प्रणाली का श्रीगणेश किया। अतः हम इन सूक्तों को नाटक न मानते हुए यह स्वीकार करते हैं कि नाटकीय संवाद के मूल स्रोत के रूप में उनको इस साहित्य विशेष का प्राचीनतम आकार अवश्य कहा जा सकता है। अपेक्षाकृत नवीन साहित्य जिसमें ब्राह्मण, आरण्यक, उपनिषद इत्यादि का समावेश है केवल दार्शनिक वार्त्ता- लाप तक ही सीमित है और बाद में कभी उनकी सहायता से इस प्रकार की नाटयप्रवृत्ति नहीं मिली।