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३. यूनानी तथा भारतीय नाटक-साहित्य का परस्पर प्रभाव
भारतवर्ष एक प्राचीन देश है जो सदा से ही विभिन्न संस्कृतियों का केन्द्र रहा है। संसार में सर्वप्रथम विद्या का प्रचार तथा सभ्यता का जन्म इसी देश में हुआ था। संसार के अन्य देशों को देखते हुए यूनान भी एक अति प्राचीन देश है। इसकी सभ्यता भी पुरा काल में अपने विकास की चरम सीमा पर पहुंच चुकी थी। विद्वानों का अनुमान है कि प्राचीन संस्कृति के इन दोनों केन्द्रों का परस्पर प्रभाव अवश्य पड़ा होगा। प्रत्येक भाषा के साहित्य में नाटक-साहित्य का विशेष स्थान होता है तथा वह सदा ही पाठकों को एक अद्भुद् प्रेरणा प्रदान करता रहता है। पाश्चात्य विद्वानों का विचार है कि नाटक साहित्य का सर्वप्रथम उद्गम यूनान में ही हुआ। उस देश के भारत से संपर्क स्थापित करने के उपरान्त ही हमारे देश में रूपकों की रचना आरम्भ हुई। यद्यपि यह धारणा सर्वथा निर्मूल है, फिर भी हमारे लिए इस कथन की सत्यता पर विचार प्रकट करना आवश्यक है। वेबर का मत है कि भारत में यूनानी राजदूत सर्वप्रथम पंजाब व गुजरात के राज-दरबार में आये। उनके साथ ही यूनानी नाटकों का भी हमारे देश में प्रवेश हुआ। लगभग उसी समय के रचे हुए पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य में नाटकों का उल्लेख मिलता है। इस प्रकार संभव है कि भारतीय नाटक-साहित्य पर उनका प्रभाव पड़ा हो। विडिश ने इस विषय में अपना विशेष मत प्रकट किया है। उसका विचार है कि रामायण तथा महाभारत जैसे सुमनोहर महाकाव्यों के रम- णीय प्रसंग तथा एकपात्रात्मक रूपकों द्वारा संस्कृत नाटकों का उद्गम हुआ। एक ही पात्र द्वारा आरम्भ में अभिनय होता था जो कि सामाजिक मनोरंजन का विशेष साधन था। उसे अंग्रेजी में 'माइम' कहते हैं। वह पात्र नट कहलाता था। (यह शब्द संस्कृत के मूल धातु नृत् का प्राकृत रूप है) अतः उसका विचार है कि भार- तीय नृत्य ने ही कालान्तर में नाट्य-साहित्य का रूप धारण कर लिया। इस प्रकार
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के एकपात्रात्मक रूपक कुछ भिन्न प्रकार से यूनान में भी प्रचलित थे। इन्हें अंग्रेजी में (पैन्टोमाइम) कहते हैं। इस प्रकार समता होने से उसका अनुमान है कि हमारे देश के इस विशेष साहित्य पर यूनान का प्रभाव अवश्यमेव पड़ा होगा। महाभाष्य में नाटयसाहित्य का जो उल्लेख मिलता है उसमें यूनान का नामोनिशान तक नहीं है। रामायण तथा महाभाष्य में उल्लिखित नाटकों में अन्तर है जो विदेशी प्रभाव के कारण हो सकता है। इस विषय में कोई निश्चित प्रमाण न देकर केवल कल्पना मात्र ही की गयी है। जिस समय रामायण, महाभारत तथा पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य की रचना हुई थी उस समय यूनान देश के रूपक अपनी शैशवावस्था को भी प्राप्त नहीं कर पाये थे। भारतवर्ष के साहित्य में कहीं इस प्रभाव का उल्लेख नहीं है, न इस विषय में कोई निश्चित प्रमाण ही मिलता है। इस प्रकार यह धारणा कोरी कल्पना मात्र ही प्रतीत होती है। भारतवर्ष में गांधार कला' प्रचलित थी। इस कला के विषय में विंडिश का मत है कि हमारे देश में यूनानियों के सम्पर्क से ही इस कला का श्रीगणेश हुआ। इसी प्रकार यूनान देश के प्रभाव से बौद्ध मतावलम्बियों ने महात्मा गौतम बुद्ध की प्रतिमा को विशाल रूप में चित्रित किया। कीथ के मतानुसार ईसा की प्रथम शताब्दी में गांधार कला का भारतवर्ष में प्रवेश हुआ। विंडिश के समय में लोगों का अनुमान था कि महाकवि कालिदास ही संस्कृत साहित्य में प्रथम नाटककार हैं जिनकी रचना उपलब्ध होती है। उसके काल के उपरान्त कालिदास से भी पूर्ववर्ती महाकवि भास के तेरह रूपक उपलब्ध हुए हैं। यह मत कालिदास के समय को पांचवीं शताब्दी ई० मान कर ही निश्चित किया गया है। किन्तु जैसा कालि- दास के अध्याय में बताया गया है, भारतीय विद्वानों ने अपने अकाटय प्रमाणों से उनका समय प्रथम शताब्दी ई० पू० निश्चित रूप से सिद्ध किया है। इस प्रकार विदित होता है कि ईसा की प्रथम शताब्दी तक भारत में संस्कृत नाटक साहित्य का पर्याप्त प्रचार हो गया था, जब कि मिनान्डर मध्य-पूर्व की विजय करता हुआ
१. गान तथा किंचित, अभिनय।
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भारत आया और भारतीय नरेशों को यूनान देश की कला से प्रभावित किया। इस प्रकार गांधार कला का भारत में प्रवेश यूनान के सम्पर्क से हुआ, यह मत सर्वथा निराधार ही प्रतीत होता है। अब हमें विचार करना है कि भारतीय राज दरबारों में यूनान के कला-मर्मज्ञ आये या नहीं। उन्होंने किस प्रकार अपने देश की कला का दिग्दर्शन कराया। यूनान के प्रसिद्ध विजेता सिकन्दर महान् नाटयकला के विशेष प्रेमी थे। प्रो० लेवी का अनुमान है कि विजयार्थ उनके भारत-आगमन के समय यूनानी कलाकारों तथा कला का हमारे देश में अवश्यमेव प्रवेश हुआ होगा। इतिहास सिकंदर के जीवन तथा उसकी विजय संबंधी घटनाओं पर विस्तृत प्रकाश डालता है। परन्तु नाटक-शास्त्र पर ऐसे प्रभाव के विषय में सर्वथा मूक है। इस प्रकार लेवी का मत भी अधिक प्रभावोत्पादक नहीं है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतवर्ष और यूनान दोनों ही संसार की प्राचीन सभ्यता के केन्द्र रह चुके हैं परन्तु जिस समय हम इन दोनों देशों की सभ्यता की तुलना करते हैं तो भिन्नता स्पष्ट दृष्टिगोचर होती है। दोनों देशों की भाषाओं में बहुत अन्तर है जिससे कि साहित्य पर परस्पर प्रभाव होना सम्भव नहीं प्रतीत होता। भारतवर्ष में यूनानी ही नहीं, अपितु शक, कुशान तथा अन्य अनेकों जातियों का आगमन हुआ। हमारे देश की उस समय यह एक अत्युल्लेखनीय विशेषता रही है कि अनेक विदेशी जातियां भारत में समा गयीं तथा हमारी सभ्यता ने उनके अस्तित्व का ही भारतीयकरण कर लिया। ऐसे समय यूनान का कुछ प्रभाव पड़ना संभवनीय सा प्रतीत नहीं होता। विंडिश का मत है कि यूनान में एक नवीन प्रकार की नाटयकला का प्रादुर्भाव हुआ जिसका समय ईसा से पूर्व ३४० से २६० तक है। यह कला अंग्रेजी में (न्यू एटिक कोमेडी) के नाम से विख्यात है। प्राचीन संस्कृत नाटक-साहित्य से इस विशेष यूनानी कला की तुलना करने पर कुछ समता दृष्टिगोचर होती है। दोनों का ही अंकों में विभाजन है जिसकी समाप्ति समस्त पात्रों के रंगमंच से पृथक् होने पर ही होती है। किसी नवीन पात्र का प्रवेश ग्रंथ के मध्य में एकाकी नहीं होता। किसी परिचित पात्र के उपस्थित रहने पर ही दर्शकों के मध्य में उसका आगमन होता है। संस्कृत में अंक किसी विशेष घटना को लक्ष्य करके समाप्त
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किये जाते हैं जब कि यूनानी साहित्य में कोई ऐसा विशेष नियम नहीं है। इस विशेष लक्षण से संस्कृत नाटक यूनानी की अपेक्षा अधिक विकसित सिद्ध होते हैं। संस्कृत में प्रायः सभी रूपक सुखान्त हैं। यह विशेषण भी सुखान्त होने का द्योतक है। अधिक विकसित तथा सुखान्त होने के कारण संस्कृत का यूनानियों पर प्रभाव पड़ा, ऐसी संभावना अधिक उचित प्रतीत होती है। हमारे देश के सुखान्त नाटकों के आधार पर ही यूनानवासियों को अपना यह विशेष साहित्य सुखान्त बनाने की प्रेरणा मिली। अब यह प्रश्न उपस्थित होता है कि ई० पू० चतुर्थ शताब्दी में क्या भारतीय नाटक-साहित्य इतना विकसित हो गया था कि वह यूनान के साहित्य पर प्रभाव डाल सके ? महाकवि भास का उस समय तक प्रादुर्भाव हो चुका था जो संस्कृत साहित्य के प्रथम उपलब्ध नाटककार हैं। भरत नाटयशास्त्र की रचना भी, जो संस्कृत नाटय लक्षण ग्रन्थों में प्रमुख है, तब तक हो चुकी थी। लक्षण-ग्रन्थों से लक्ष्य-ग्रंथ का निर्माण सदा पहले होता है। यद्यपि उस समय का नाटक-साहित्य उपलब्ध नहीं होता, इस प्रमाण से उसका भी विकसित होना सिद्ध होता है। दोनों ही देशों के तत्कालीन इतिहास पर विचार करने से विदित होता है कि पारस्परिक वाणिज्य-सम्पर्क दढ़ थे। अतः यात्रियों के आवागमन से ही यूनान में एक नवीन परंपरा के नाटक-साहित्य का जन्म हुआ होगा। जब हम उस समय के संस्कृत नाटकों और इस विशेष यूनानी साहित्य की तुलना करते हैं तो हमारे उपर्युक्त मत की पुष्टि होती है। दोनों ही साहित्यों में नाटक का नायक प्रायः राजा होता है। वह किसी रूपवती कामिनी पर सहसा दृष्टिपात कर उसकी प्राप्ति के लिए भांति- भांति के प्रयत्न करता है। उसके इस पौरुष में अनेक विघ्न-बाधाएं उपस्थित होती हैं, जिनका वह साहसपूर्वक सामना करता है। अंत में सफलता उसका साथ देती है और वह प्रेमिका के साथ अपना भावी जीवन सुखमय बनाने में समर्थ होता है। यूनानी साहित्य में भी इस प्रकार की प्रणय-कथाएँ पायी जाती हैं जिससे उन पर हमारे देश के नाटकीय प्रभाव की स्पष्ट झलक मिलती है। संस्कृत नाटकों में प्रयुक्त होनेवाले परदे के लिए यवनिका शब्द का प्रयोग किया गया है। पाश्चात्य यवन देशों का हमारे इस साहित्य पर प्रभाव सिद्ध करने के लिए पाश्चात्य विद्वान् इस शब्द का प्रमुख आधार मानते हैं। यवनिका शब्द यवन से
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बना हुआ विशेषण है जिसका अर्थ यवन सम्बन्धी है। यवन देशों में फारस, अरब, सीरिया, यूनान सबका समावेश हो जाता है। इस शब्द का रूपक में उल्लेख होने से प्रतीत होता है कि किसी यवन देशीय वस्तु का हमारे नाटकों में अवश्यमेव प्रयोग होता था। लेवी का मत है कि यूनान देश के व्यापारियों के सम्पर्क में आने के उपरांत ही हमारे देश में सुंदर यूनानी वस्त्र के परदे बनाये गये और तदुपरांत ही भारत में इस कला का विकास हुआ। विडिश का मत भी इस विषय में उल्ले- खनीय है। उसका विचार है कि जो परदे रंगमंच पर प्रयुक्त होते थे उन पर यूनान देश के समान ही चित्रकारी एवं कढ़ाई की हुई होती थी। यह दोनों ही मत वस्त्र के आयात पर प्रकाश डालते हैं। केवल परदे के कारण ही नाटयकला का देश में आगमन मानना उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। केवल एक भाग-विशेष के प्रत्या- गमन से समस्त कला का आगमन मानना अनुचित प्रतीत होता है। यवन शब्द समस्त यवन देशों का द्योतक हो सकता है, फिर केवल यूनान का ही क्यों ग्रहण किया जाये। कुछ विद्वानों की धारणा है कि भारत में नाटकों के अभिनय के अवसर पर यूनान देश की युवतियां राजा की अंगरक्षिका का कार्य किया करती थीं। यूनान तथा अन्य पाश्चात्य देशों के व्यापारियों के साथ वे युवतियां आया करती थीं और यह कार्य उनके जीविकोपार्जन का प्रमुख साधन था। इस विषय में इतिहास मौन है और यह मत केवल कोरी कल्पनामात्र ही प्रतीत होता है। कुछ विद्वानों का मत है कि यूनान में वस्त्र-निर्माण एवं कढ़ाई की कला का विशेष प्रचार था। यूनान देश से आनेवाले व्यापारी भारतीय नरेशों के यहां अनुगामी के रूप में यूनानी वस्त्र पर अपने देश की कलानुसार चित्रांकन किया करते थे। इस कारण परदे का नाम यवनिका पड़ा। सम्भवतः यवन देश के आयात किये हुए वस्त्रों से यह परदा बनाया जाता हो। किंतु भारत के तत्कालीन वस्त्र-उद्योग के विकास की ओर दृष्टिपात करने से यह मत उचित प्रतीत नहीं होता। यवनिका शब्द के आधार पर यह अनुमान करना कि यूनान के सम्पर्क के उपरांत ही हमारे देश में इस साहित्य का श्रीगणेश हुआ, सर्वथा भ्रामक है।
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प्राचीन ग्रन्थों में इसका कहीं उल्लेख नहीं हुआ है। जिस समय के उपरान्त इस शब्द का प्रयोग हुआ उस समय यूनान देश से हमारे वाणिज्य सम्बन्ध स्थापित हो चुके थे। रंग मंच के परदे के लिए आरंभ में विदेशी वस्त्र का उपयोग होता होगा तथा कालान्तर में यह शब्द रूढ़ हो गया होगा, उपर्युक्त कथन के अनुसार यह मत भी उचित प्रतीत नहीं होता। पाश्चात्य विद्वानों ने अपने मत की पुष्टि के लिए विभिन्न संस्कृत और यूनानी नाटकों के कथानक की तुलना कर विदेशी प्रभाव को सिद्ध करने का प्रयास किया है। संस्कृत में अधिकांश नाटक ग्रंथ रामायण एवं महाभारत जैसे प्रसिद्ध महाकाव्यों के आधार पर निर्मित किये गये हैं। कवियों ने कुछ कृतियाँ अपनी अनुपम कल्पना के आधार पर भी लिखी हैं जिनके विषय में यूनानी मूल नहीं मिल सका है। इन महाकाव्यों पर यूनानी कला किंचिदपि प्रभाव नहीं डालती। नल-दमयन्ती की कथा से मिलती हुई प्राचीन यूनानी गल्प में एक कथा मिलती है किंतु केवल एक कथा की समता से ही यह निर्णय करना उचित नहीं। विंडिश महोदय बहुत प्रयत्न करने पर भी किसी संतोषजनक परिणाम पर न पहुंच सके। उन्होंने सम्राट् शूद्रक कृत मृच्छकटिक और यूनानी नाटक (शिष्टेलिरिया) या (औलुलेरिया) से, जिसका अर्थ छोटी शतरंज या छोटा बरतन है, तुलना की है। दोनों ही ग्रंथों में प्रणय-कथा को राजनीतिक क्रान्ति के आधार पर नाटकीय रूप प्रदान किया गया है। चारुदत्त और गणिका वसन्तसेना के प्रेम की यूनानी नाटक के नायक-नायिका से तुलना की गयी है। प्रेमिका की प्राप्ति के उद्देश्य से दोनों ही ग्रंथों में सेंध लगाना और चोरी करना आदि घटनाओं का समा- वेश है। एक गणिका और समृद्ध ब्राह्मण का प्रेम भी शिष्टेलिरिया के विभिन्न जाति में उत्पन्न नायक और नायिका के समान ही है। मृच्छकटिक भास की रचना चारुदत्त के आधार पर रचा गया है और भारतीय नाटक का प्राचीनतम रूप नहीं कहा जा सकता। मृच्छकटिक में विट, विदूषक व शकार पात्रों में एक रोचक मनोरंजन प्रस्तुत किया गया है। इसी प्रकार उल्लिखित यूनानी ग्रंथ में भी ऐसे पात्र चित्रित किये गये हैं। यद्यपि दोनों नाटकों के पात्र मनोरंजन के हेतु ही समा-
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विष्ट हैं. अन्य प्रकार की भिन्नता मिलने पर यूनानी नाटक का हमारे साहित्य पर प्रभाव सिद्ध नहीं होता। संस्कृत नाटकों में ब्राह्मण विदूषक का भाग लेता है। नाटक में विदूषक का कार्य मनोरंजन होता है। यह कार्य प्रायः विद्वान् ब्राह्मण द्वारा ही क्यों सम्पादित होता है जब कि साधारण कोटि का व्यक्ति भी यह कार्य कर सकता है? इसके अतिरिक्त यूनानी नाटकों में भी साधारण कोटि के मनुष्य मनोरंजन का कार्य नहीं करते थे। विदूषक का विद्वान् होना यूनानी आधार पर मानना ठीक नहीं, क्योंकि विद्वान् ही मनोरंजन में कुशल हो सकता है। उसका नाटक में प्राकृत-भाषी होना केवल पात्रत्व का परिचायक है। यूनान के नाटकों में पात्रों की संख्या न्यून है जो कि भारतीय नाट्यप्रणाली के सर्वथा प्रतिकूल है। संस्कृत रूपकों में पात्रों की दीर्घ संख्या प्राप्त होती है। भास के उपलब्ध तेरह रूपकों में पात्रों की बहुलता पायी गयी है। इसके अतिरिक्त अभिज्ञानशाकुन्तल में ३०, मृच्छकटिक में २६, मुद्राराक्षस में २४, विक्रमोर्वशी में १८ पात्र हैं। इससे भी विदित होता है कि भारतीय नाटक-साहित्य का विकास बिना किसी विदेशी प्रभाव के स्वतंत्र रूप से ही हुआ। यूनान में नाटक-साहित्य के उद्गम के विषय में अनुमान है कि उसका विकास एकपात्रात्मक रूपक से, जिसको कि अंग्रेज़ी में 'माइम' कहते हैं, हुआ किंतु भारत में इस प्रकार का कोई निश्चित प्रमाण नहीं मिलता जिससे हम यह सिद्ध कर सकें कि यूनानी एकपात्रात्मक रूपक यहां प्रचलित थे जिनसे नाटक का विकास हुआ। विदेशी विद्वानों ने भारतीय नाटक-साहित्य पर प्रारंभ में यूनान का प्रभाव ही सिद्ध करने का भरसक प्रयत्न किया है। निस्सन्देह संस्कृत साहित्य संसार के समस्त साहित्यों में अद्वितीय एवं प्राचीनतम है। यूनानी साहित्य उसकी अपेक्षा बहुत ही कम विकसित और नवीन है। अधिक प्रभावशाली का कम प्रभावशाली पर प्रभाव पड़ता है। आरम्भिक युग में भारतीय नाटक-साहित्य पर यूनान अथवा अन्य किसी विदेशी साहित्य का किचिद् मात्र भी प्रभाव नहीं पड़ा। यूनान में एक विशेष प्रकार के सुखांत नाटक का विकसित होना वहां पर संस्कृत के प्रभाव
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का स्पष्ट द्योतक है। शेक्सपियर के नाटकों पर भी संस्कृत का प्रभाव दृष्टिगोचर होता है। इससे प्रतीत होता है कि न केवल प्राचीन यूनान के नाटक-साहित्य पर अपितु मध्यकालीन यूरोपीय साहित्य पर भी संस्कृत नाट्य ग्रंथों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा।