2. २. भारतीय नाटक-साहित्य का उद्गम
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२. भारतीय नाटक-साहित्य का उद्गम
साहित्य में नाटक एक प्रमुख स्थान रखता है और वह दर्शकों को ऐतिहासिक पात्रों से साक्षात्कार सा करवा देता है। उन्हें अपने अतीत के नायकों से शिक्षा ग्रहण करने के लिए प्रेरित करता रहता है। रूपक दृश्य काव्य का एक मात्र रूप है। दर्शक अपने सम्मुख की घटनाओं को देखता हुआ स्वतः शिक्षा ग्रहण करता है। इस प्रकार नाटक प्राचीन काल से ही शिक्षा देने का सुंदर ढंग रहा है। नाटक के देखने से प्रेक्षकों के हृदयों में एक अद्भुत आत्मतुष्टि होती है और वे स्वर्गीय आनंद का अनुभव करते हैं। इतना ही नहीं, उनके हृदयों से संसारजन्य अनेक क्लेश अभिनीत नाटक का दर्शन करते हुए सीमित काल के लिए दूर हो जाते हैं। नाटक-साहित्य का उद्गम किस प्रकार हुआ, इस विषय में विद्वानों में बहुत मतभेद है। पिश्चल नामक एक पाश्चात्य विद्वान् का कथन है कि पुतलियों के खेल व नाच से ही नाटक-साहित्य का उद्गम हुआ। सूत्रधार शब्द इस मत का प्रमुख आधार है। सूत्रधार शब्द का अर्थ (सूत्रं धारयति इति सूत्रधार: अर्थात्) डोरा धारण करनेवाला है। सूत्रधार ही प्रत्येक नाटक में उसका संचालक होता है और सर्वप्रथम उसमें उसका ही भाग होता है। पुतली के नाच में संचालक मनुष्य सूत्रधार के रूप में डोरा धारण करता है और उसी के द्वारा अपना कार्य संपादित करता है। इसी पुतली के खेल का डोरा धारण करनेवाला कालांतर में नाटक का सूत्रधार हुआ और रूपक इसी खेल के विकसित रूप का परिणाम हुआ। इस मत की पुष्टि अन्य अनेक प्रमाणों द्वारा भी होती है। महाभारत में पुतली के खेल का वर्णन है। प्रथम शताब्दी में गुणाढय द्वारा रची हुई बृहत्कथा के आधार पर कथासरित्सागर नामक ग्रंथ की रचना हुई। उसमें एक अद्भुत प्रकार की पुतली का उल्लेख है। असुर की नव-यौवना पुत्री माया के सहयोगियों में एक विचित्र प्रकार की पुतली ऐसी है जो नाचती है, उड़ती है, पानी भरती है, फूल
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तोड़ती है और हार बनाती है। इसी प्रकार राजशेखर कृत 'बाल रामायण' में वर्णन है कि रावण सीता की प्रतिकृति-रूप एक पुतली को देख कर धोखे में पड़ जाता है। महाराष्ट्र देश में गांवों में घूमनेवाले भ्रमणशील मंच आधुनिक काल में भी प्रचलित हैं। शंकर पांडुरंग पंडित का मत है कि उनके समय में लकड़ी और कागज की बनी हुई पुतलियों का खेल गांवों में बहुत अधिक मात्रा में प्रचलित था जो कि भ्रमणशील मंच का एक रूप कहा जा सकता है। पिश्चल के पुतलियों से नाटक की उत्पत्ति के मत के विरुद्ध आलोचकों का मत है कि नाटकों की अपेक्षा पुतली के नाच अधिक पुराने प्रतीत नहीं होते। अतः यह मत सर्वथा उपेक्षणीय है। रामायण, महाभारत एवं पतंजलि मुनि कृत महा- भाष्य में नाटकों की प्रारंभिक दशा का उल्लेख मिलता है। उनमें इस प्रकार की पुतलियों के नाच का उल्लेख नहीं है। नाटकों के विकसित और अभिनीत होने के पश्चात् ही इस खेल का आरंभ हमारे देश में हुआ। पुतली को संस्कृत में पुत्त- लिका कहते हैं जो पुत्रिका (छोटी पुत्री) का परिवर्तित रूप विदित होता है जो पुत्रिका, पुत्तलि, पुत्तलिका, दुहित्रिका आदि रूपों को धारण कर चुका होगा। नाटय ग्रंथों के मूल स्थान भारतवर्ष देश में ही इस खेल का विकास हुआ है। प्राची- नता एवं शब्द की व्युत्पत्ति के आधार पर विद्वानों ने इस खेल के प्रचार को नाटकों के बाद का सिद्ध किया है और पिश्चल के मत को सर्वथा अग्राह्य प्रमाणित कर दिया है। उपर्युक्त मत के समान ही प्रोफेसर कोनो का मत है किछा या नृत्य की अनु- कृति से नाटकों का उद्गम हुआ। पतंजलि मुनि कृत महाभाष्य में शौनिक कृत्यों का वर्णन है। विद्वानों के मतानुसार शौनिक मूक या छाया पात्रों के कृत्यों को दर्शकों के मध्य में समझाया करते थे। उपर्युक्त दोनों कार्यों में से शौनिक कौन सा कार्य करते थे, इस विषय में विद्वान लोग अभी तक किसी उचित निर्णय पर नहीं पहुंच सके हैं। इस आधार पर लूडर्स का मत है कि छाया नाटक ही हमारे देश में अत्यन्त प्राचीन काल से प्रचलित है। प्रोफेसर कीथ इस विचार से सहमत नहीं हैं और उनका कथन है कि महाकाव्य का ऐसा अर्थ करना अनुचित है। इसके अतिरिक्त
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२४ संस्कृत नाटककार
विशाल संस्कृत साहित्य में छाया नृत्य का नाटक के प्राथमिक रूप में कहीं उल्लेख नहीं है और इस मत के समर्थकों के समीप कोरी कल्पना के अतिरिक्त अन्य कोई आधार पुष्टि के लिए नहीं रहता। कोनो का मत है कि रामायण और महाभारत के सुमनोरम प्रसंगों को दर्शकों के सम्मुख अभिनय योग्य बनाने में इस प्रथा की सहायता ली गयी। अशोक के स्तम्भों पर दिव्य हाथियों के सम्भाषण एवं भ्रमण का उल्लेख है तथा इस क्रिया का वर्णन करने के लिए रूपक शब्द का प्रयोग है जो कि कोनो के मतानुसार रूपक का पूर्व रूप प्रतीत होता है। यह मत भी उपयुक्त प्रतीत नहीं होता। महाभाष्य का प्रमाण संदिग्ध हो सकता है। अशोक स्तम्भ का प्रमाण भी सर्वथा निर्भ्रान्त नहीं कहा जा सकता। यदि उसको सत्य मान भी लिया जाय तो वह नाटकों के प्रारंभिक रूप का वर्णन करने में सफल नहीं हो सकता। अशोक के समय में नाट्यकला का पर्याप्त विकास हो चुका था। महाकवि भास जिनकी रचनाओं में संस्कृत-नाटक-साहित्य के प्राथमिक रूप का चरमोत्कर्ष दृष्टिगोचर होता है निःसंदेह सम्राट् महान् अशोक के पूर्ववर्ती थे, यद्यपि यूरोपीय विद्वान् इस मत से सहमत नहीं हैं। हम तो अशोक के शिलालेखों में छाया नाटकों का वर्णन मान सकते हैं पर उनको नाटक-साहित्य का उद्गम मानने में असमर्थ हैं। महाभाष्य में कंस-वध एवं बालि-वध नामक दो नाटकों का उल्लेख है, यद्यपि साहित्य के ये अमूल्य रत्न काल की कराल गति में समा गये और अभी तक उपलब्ध नहीं हो सके हैं। प्रो० कोनो ने इस दृष्टि से भी महाभाष्य का गंभीर अध्ययन किया और उसके आधार पर नृत्य, गान, मनोरंजक दृश्य आदि का उसमें विवरण पाया। नटों का उसमें विस्तार से वर्णन है। इस विषय में विद्वानों में मतभेद है कि ये नट एकपात्रात्मक रूपक जिनको अंग्रेजी में 'माइम' कहते हैं उनके पात्र हैं या पूर्ण विकसित नाटक के। जातक कथाओं के साक्ष्य से विदित होता है कि उस समय नाटक अपने पूर्ण विकास को प्राप्त हो चुका था और उल्लिखित नटों से विकसित नाटकों के पात्रों से ही तात्पर्य है। नृत्य एवं गान वैदिक काल में ही अपने विकास की चरम सीमा पर पहुंच चुका था और पश्चात्वर्ती साहित्य में सदा महत्त्वपूर्ण रहा। अशोक के काल में समाज नामक एक सामाजिक उत्सव प्रचलित था जो कि
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प्रारम्भिक नाटक का एक रूप माना जा सकता है। समाज में पशुओं का परस्पर युद्ध दिखाया जाता था जो अशोक के मन्तव्य बौद्ध मत के सिद्धान्तों के प्रतिकूल था। संस्कृत के आदिकाव्य रामायण में भी नट, नर्तक अवश्यमेव विद्यमान थे, यद्यपि यह नहीं कहा जा सकता कि ये आधुनिक नाटक के पात्रों से कितने भिन्न थे। एकपात्रात्मक नाटकों का विवेचन केवल कल्पना के आधार पर ही है। डा० ग्रे का मत है कि नाटक का संस्कृत भाषा में केवल सुखान्त होना इस बात का द्योतक है कि वह आरम्भ से ही दर्शकों का मनोरंजन उत्पन्न करने के लिए किया जाता था। यह सत्य है कि संस्कृत के नाटककार दर्शकों के मन पर सुखान्त प्रभाव डाल कर उन्हें प्रभावित करते थे। नाटक समाज में प्रचलित हो जाय और सब लोग उसमें सरलतापूर्वक रस ग्रहण कर सकें, इसका अनुमान उसमें प्राकृत के प्रयोग से भी मिलता है। प्राकृत जनसाधारण की भाषा थी और नाटक में उसका स्थान-स्थान में प्रयोग होना इस बात का द्योतक है कि नाटक के कर्ता अपनी रचना जनता में अधिक रोचक और गम्य बनाने के लिए उसका प्रयोग किया करते थे। हमारे भारतवर्ष देश के सुयोग्य प्रधान मंत्री पं० जवाहरलाल नेहरू ने अपनी सर्वोत्कृष्ट कृति भारत की खोज (डिसकवरी आफ इण्डिया) में भी इस मत की पुष्टि की है। वेद विद्याओं के मूल ग्रंथ हैं। वैदिक काल में नाटक के प्रधान अंग नृत्य, संगीत, संवाद का अस्तित्व अवश्य विद्यमान था। कुछ विद्वानों की यही धारणा है कि यही अंग विकसित होकर कालान्तर में नाटक के रूप में परिवर्तित हो गये। इन क्रिया- कलापों में नाटक का पुट भले ही हो किन्तु उन्हें हम नाटक कदापि नहीं कह सकते। यद्यपि इन्हें नाटक नहीं कहा जा सकता, नाटकशास्त्र के उद्गम में वेदों का महत्त्व- पूर्ण भाग अवश्य रहा। वैदिककालीन सोमयज्ञ में एक ऐसे महाव्रत ब्राह्मण का वर्णन है जो सोम विक्रय करमेवाले शूद्र का अवशेष रूप ही प्रतीत होता है। यह कीथ का मत है। विदूषक का नाटक में भाग हास्यपूर्ण है और सोम विक्रय में भी वैसा ही प्रतीत होता है। इस साम्य के आधार पर ही कुछ विद्वानों का ऐसा मत है। उपर्युक्त विवाद में न पड़ते हुए हमें यह निर्णय करना पड़ता है कि नाटक के विकास पर वेदों का पर्याप्त प्रभाव पड़ा और नाटक के प्रधान अंग उसी से उद्धृत
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२६ संस्कृत नाटककार
किये गये। नाटय लक्षणशास्त्र के सर्व-प्राचीन ग्रंथ भरत नाटयशास्त्र के कर्ता आचार्य भरत मुनि का इस विषय में मत निम्नलिखित है-
जग्राह पाठयमुग्वेदात् सामम्यो गीतमेव च। यजुर्वेदादभिनयान् रासनाथर्वणादपि॥ भरतनाट्यशास्त्र १।१७ ब्रह्मा ने ऋग्वेद से संवाद, सामवेद से गान, यजुर्वेद से अभिनय व अथर्व वेद से रस को संगृहीत कर पंचम नाटयवेद का निर्माण किया। नाटय-साहित्य का साहित्य- क्षेत्र में अद्भुत स्थान होने के कारण भरत मुनि का इस शास्त्र को पंचम नाटयवेद कहना उपयुक्त ही प्रतीत होता है।
वेदोपवेहैः सम्बद्धो नाट्यवेवो महात्मना। एवं भगवता सृष्टो ब्रह्मणा सर्ववेदिना॥ भ० १।१८ इस प्रकार समस्त वेदों के अनन्य भंडार भगवान् ब्रह्मा ने चारों वेद व उपवेदों से सम्बन्ध रखनेवाले इस प्रसिद्ध नाटय वेद का निर्माण किया। उपर्युक्त विवेचन के पश्चात् यद्यपि हम नाटयसाहित्य एवं नाटक-साहित्य के उद्गम के विषय में निश्चित निर्णय पर नहीं पहुंच पाये हैं पर उपर्युक्त सभी मतों का नाटक के उद्गम पर पर्याप्त प्रभाव पड़ा। पुतली का खेल, छाया नृत्य, संवाद नृत्य, गान, वादन, अभिनय आदि विकसित हो नाटक के रूप में परिवर्तित हुए। नाटक काव्य का रमणीयतम अंग कहा जा सकता है जो काव्य के समस्त अंगों में शिक्षा देने का सर्वोत्तम रूप है। अतः नाटक के विषय में यह ठीक ही कहा गया है कि काव्येषु नाटकं रम्यम्।