15. Saral Samudrik Shastra — अनामिका का प्रभाव
अनामिका का प्रभाव
इसे अंग्रेजी में ‘रिंग फिंगर’ भी कहते हैं यह सूर्य पर्वत की अंगुली है इसके तीन पोरों पर कर्क, सिंह और कन्या राशि होती है। यह अंगुली सोना पहनती है तथा अतिथि सम्बन्धी को तिलक करते समय इस अंगुली से पहले बिन्दी स्पर्श करते हैं। तीसरी अंगुली का सीधा सम्बन्ध मस्तिष्क के अचेतन मन और व्यक्तिगत जीवन के साथ है। यह तर्जनी के बराबर तथा सीधी हो तो हम यह आशा करते हैं कि जीवन के संवेगों के साथ शेष व्यक्तित्व का ताल मेल बना रहेगा।
अनामिका के टेढ़ी रहने से मनुष्य को कठिनाइयां, निराशा, धोखा और गलत प्रताड़नाएं मिलती रहती है। जीवन दूभर हो जाता है और कई बार धोखा खाने से हताश दिखाई देने लगते हैं। इस अंगुली में एक मानसिक चेतना अच्छे स्तर की होती है जो जीवन तत्व के साथ घुली मिली रहती है। उद्योगी हाथ की अंगुली व्यक्ति को कलात्मक रुचि प्रदान करती है। मानसिक और शारीरिक सम्बन्धों को अनामिका उंगली तालमेल बनाये रहती है।
अनामिका के अधिक लम्बा होने से ‘येन केन उपायेन’ धनोपार्जन की चेष्टा हर वक्त बनी रहती है। वह सौदा सट्टा भी कर सकता है, जुआ, लॉटरी की तरफ उस व्यक्ति का झुकाव होगा तथा लम्बी अनामिका वाला व्यक्ति यह जानते हुए भी कि 'जुआ लोभ का पुत्र है, दुराचार का भाई है, और बुराइयों का पिता है' फिर भी वह उसे खेले बगैर मानेगा नहीं। अचानक उसकी मनःस्थिति बिगड़ जाती है और गुस्से में आकर जल्दी ही गाली-गलौज कर सकता है। साथ में मंगल पर्वत उठा हुआ होने से ही यह बात पुष्ट होती है अन्यथा नहीं।
कनिष्ठा का प्रभाव
यह अंगुली बुध पर्वत की होती है इसका अधिक सम्बन्ध शीर्ष रेखा से है।
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कनिष्ठा और अनामिका यदि बराबर हों तो व्यक्ति अच्छा भाषण देने वाला और अपने विचारों को स्टेज पर भलीभांति व्यक्त करने की क्षमता रखता है।
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इसका ऊपरी सिरा अनामिका की पहली रेखा तक जाय तो वह वैज्ञानिक मस्तिष्कवाला होता है और एक अच्छा विद्वान भी होता है।
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इसके लम्बी होने से व्यक्ति साधारण स्थिति से ऊपर उठकर अपनी ख्याति स्वयं अर्जित करता है। पौर्वात्य पद्धति में इसके लम्बे होने पर 'शुभ' माना गया है।
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कनिष्ठा का नुकीला होना हंसी मजाक पसन्द करने व उसे चुटकुले सुनाने का शौक रहे।
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कनिष्ठा का पहला पोर सभा में चतुराई से भाषण दिलवाता है तथा वह श्रोताओं को मोहित कर सकता है।
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अगर पहला पोर लचीला है और शीर्ष रेखा स्पष्ट है और पहली गांठ सुदृढ़ है तो व्यक्ति व्यापार, उद्योग चलायेगा और उसे कड़ी मेहनत और लगन से सम्पन्न करेगा।
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कनिष्ठा का लम्बा होना चालाकी का सूचक है लेकिन इस बात का ध्यान रखा जाय कि शीर्ष रेखा चन्द्र पर्वत की ओर तो नहीं जा रही है अन्यथा व्यक्ति धोखेबाज, धूर्त और असत्य भाषण करेगा।
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अगर अनामिका और कनिष्ठा दोनों लम्बाई में समान है तो व्यक्ति एक अच्छा दार्शनिक होगा तथा थोड़ी और ज्यादा लम्बी होने पर जीवन की सारी कठिनाइयों को हल कर लेगा।
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कनिष्ठा के टेढ़ी-मेढ़ी होने से उस व्यक्ति में सद्गुण तो रहेंगे लेकिन अवसर आते ही उनका लाभ नहीं ले सकेगा और न शुद्ध विचार होंगे। यदि कनिष्ठा नुकीली और टेढ़ी-मेढ़ी है, अंगुष्ठ और शीर्ष रेखा ठीक है तो वह केवल इस
सिद्धान्त को अपनायेगा कि किसी पर भी विश्वास मत करो।
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इस अंगुली की नोक ज्यादा नुकीली हो तो वह दूसरों को किसी भी जाल में फंसा सकता है। इसका नुकीला भाग चौरस (चौकोन) हो तो वह व्यक्ति एक अच्छा शिक्षक होगा।
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अगला भाग गोल और चपटा होने से व्यक्ति व्यापार की व्यवस्था अच्छी से अच्छी कर सकता है।
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सम्पूर्ण भाग अंगुली का सुगठित हो और ऊपरी भाग चौरस हो तो उस व्यक्ति में काल्पनिक गुण तथा वैज्ञानिक विचारधारा होगी।
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अंगुली का अग्रभाग चौरस हो और पहला पोर लम्बा हो तो वह व्यक्ति तत्व वेत्ता, भाषण द्वारा दूसरों पर प्रभाव डालने वाला तथा अच्छी पोशाक पहनने वाला होता है।
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तीसरे पोर से पहले पोर तक यदि नुकीली है तो गुप्त विद्या का प्रेमी होता है।
कनिष्ठायदि दीर्घास्यादूर्ध्वरेखा समाश्रिता। व्यवसायात्ततो लाभो यशस्तस्य महोज्ज्वलम्।।
यदि किसी की कनिष्ठा अंगुली अनामिका से लम्बी तथा उससे ज्यादा उर्ध्व रेखाओं से युक्त हो तो व्यक्ति को व्यापार में लाभ होगा। ऐसा व्यक्ति अत्यन्त प्रसिद्ध तथा यशस्वी होता है।
तर्जनी, मध्यमा, अनामिका एवं कनिष्ठा के नाम
तर्जनी– प्रदेशिनी, तर्जनी, शत्रुघ्न, आद्या, गवेषिणी आदि।
मध्यमा– ज्येष्ठा, मध्या, मध्यमा, लक्ष्मी, सौभाग्यवती
अनामिका– सावित्री, गौरी, भगवती, शिवा।
कनिष्ठा– कनीनिका, कनिष्ठा, अन्त्या, लघुतारा तथा कांचनी।
अंगुलियों के नाम
अङ् करशाखाः स्युरङ्गुल्यः करपल्लवाः। त्रिपुराः करजाम्बाश्च मायाः कर्मयुधा मताः
इसी क्रम में आठ नाम अंगुलियों के भी पाये गये हैं जो इस प्रकार है अंगुली, करशाखा, करपल्लव, त्रिपुरा, करजा, कराम्बा, माया, कर्मयुधा आदि।
अंगुलियों के वर्ण (रंग)
अंगुलियों के रंग पांच प्रकार के माने गये हैं। भूरा, लाल, पीला, सफेद व काला।
अंगुलियों का वर्ण ज्ञान
ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्याः शूद्राः स्युः करपल्लवाः। कनीनिकाद्या हंसोऽपि योगवान् वर्णवर्जितः।।
तर्जनी का शूद्र वर्ण है, मध्यमा का वैश्य वर्ण है अनामिका का क्षत्रिय और कनिष्ठा का ब्राम्हण वर्ण है। अंगूठे को योगी मान कर किसी भी वर्ण में नहीं रखा गया है।
अंगुलियों में गन्ध
तर्जनी का सम्बन्ध दुर्गन्ध से है। अंगूठे का सुगन्ध से कनिष्ठा व मध्यमा का कोई गंध नहीं अर्थात् वे गन्ध रहित होती है।
अंगुलियों के बीच का छिद्र
तर्जनीमध्यमारंधे मध्यमानामिकान्तरे। अनामिकाकनिष्ठान्तः दिद्रे सति यथाक्रमम्।।
जन्मतः प्रथमेंऽशे वा द्वितीये च तृतीयके। भोजनावसरे दुःखं केप्याहुः श्रीमतामपि।।
यदि तर्जनी व मध्यमा के बीच में अन्तर रहे तो जवानी के समय तक बड़े-बड़े धनवान लोगों को भी भोजन के समय मानसिक पीड़ा होती है।
मध्यमा व अनामिका के बीच छिद्र हों तो मध्यमावस्था (30 से 50 वर्ष) तक तथा कनिष्ठा व अनामिका के बीच अन्तर रहता हो तो बुढ़ापे में ऊपर बताया गया फल होता है ऐसा विद्वानों का मत है।
अंगुलियों की लम्बाई
अनामिकान्त्यरेखायाः कनिष्ठा स्याद्यदाधिका। धनवृद्धस्तदा पुंसां मातृपक्षो बहुस्तथा।।
अनामिका के तीसरे पर्व से यदि कनिष्ठा अंगुली लम्बी हो तो ऐसे व्यक्ति की रात-दिन धन की बढ़ोत्तरी होती है। ऐसे व्यक्ति का मातृपक्ष भी बलवान होता है।
मध्यमाप्रान्तरेखाया अधिका यदि तर्जनी। प्रचुरस्तु पितुः श्रियश्च विपदोऽन्यथा।।
मध्यमा के आखिरी पर्व से तर्जनी अंगुली ऊपर हो तो ऐसा व्यक्ति धन-सम्पत्ति प्राप्त करता है तथा इसका पितृपक्ष काफी बलवान होता है। मध्यमा के तीसरे पर्व से नीचे रहने वाली तर्जनी अशुभ फल देने वाली होती है।
अंगुष्ठस्यांगुलीनां च यदूनाधिकता भवेत्। धनैर्धान्यैस्तदा हीनो नरः स्यादायुषाऽपि च।।
यदि अंगूठे की तुलना में अंगुलियां अधिक छोटी या बड़ी हों तो वह व्यक्ति अल्पायु तथा धन-धान्य से रहित होता है।
मध्यमायां तु दीर्घायां भार्याहानिर्विनिर्दिशेत्। अनामिकायां दीर्घायां विद्याभोगी भवेन्नरः।।
यदि मध्यमा असामान्य रूप से बड़ी हो तो ऐसे व्यक्ति को स्त्री का सुख प्रायः नहीं मिलता है। उसे कई विवाह भी करने पड़ सकते हैं अनामिका अंगुली लम्बी होने पर व्यक्ति बुद्धिमान तथा विद्यावान और पढ़ने का शौकीन होता है।
अंगुलियों से आयु विचार
अनामिकापर्वं यदा बिलङघते कनीनिका वर्षशतं स जीवति। नवत्यशीतिर्विगमे च सत्पतिः समानभावे खलु षष्ठिजीवितम्।।
यदि कनिष्ठा अंगुली अनामिका के तीसरे पर्व से लम्बी हो तो वह व्यक्ति दीर्घायु वाला होता है।
अनामिका के तीसरे पर्व से आगे निकलती हुई कनिष्ठा अंगुली के अनुपात से सौ, नब्बे, अस्सी, सत्तर तथा साठ वर्ष की लगभग आयु माननी चाहिए।
पंचभिर्दशवर्षाणीत्येवं निर्णयमायुषि। ललाटे शतवर्षाणि रेखापंचकतो वदेत्।।
जिस प्रकार कनिष्ठा से आयु का विचार होता है, इसी प्रकार माथे पर पाई जाने वाली रेखाओं से भी आयु का निर्णय होता है।
यदि माथे पर साफ पांच रेखाएं हों तो व्यक्ति सौ वर्ष की आयु वाला होता है। यहां भी अनुपात से आयु समझनी चाहिए।