Books / Saral Samudrik Shastra — Face Reading

14. Saral Samudrik Shastra — 4. The Importance of Hand Symtomps

4. The Importance of Hand Symtomps

अंगे हस्तः प्रशस्तोऽयं शीर्षादपि विशिष्यते। साध्यन्ते पादशौचाद्या धार्मिक्‍यो येन सत्क्रिया।।

अंग विद्या में यद्यपि समस्त शारीरिक लक्षणों का अध्ययन किया जाता है, किन्तु शरीर के लक्षणों से हाथ के लक्षण विशेष महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि इन्हीं हाथों से मनुष्य सभी सांसारिक क्रियाएं करता है।

सर्वाङ्गलक्षणप्रेक्षाव्याकुलानां नृणां मुदे। श्रीसामुद्रेण मुनिना तेन हस्तः प्रकाशितः।।

मनुष्य स्वभावतः जिज्ञासु है इसीलिए वह सभी लक्षणों का ज्ञान प्राप्त करना चाहता है। मनुष्य की इस ज्ञान-पिपासा को शान्त करने के लिए महामुनि श्री सामुद्र या समुद्र ने मनुष्य के कल्याण के लिए यह हस्तरेखा व सामुद्रिक शास्त्र विद्या प्रकाशित की है।

हथेलियों के लक्षण

उंगली की जड़ से पहले मणिबन्ध तक हथेली की लम्बाई कहलाती है तथा अंगूठे की जड़ से दूसरे अन्तिम सिरे तक के भाग को हथेली की चौड़ाई कहा जाता है। इस सारे भाग पर जो भी चिन्ह होते हैं, वे सभी चिन्ह हस्तरेखा विशेषज्ञ के लिए अत्यन्त आवश्यक होते हैं।

  1. अत्यधिक चौड़ी हथेली— ऐसे व्यक्ति सामान्यतः अस्थिर प्रकृति के होते हैं। इनकी पहचान यह है कि इन लोगों की हथेली लम्बाई की अपेक्षा चौड़ी ज्यादा होती है। ऐसी हथेली वाले व्यक्ति तुरन्त निर्णय नहीं ले पाते और किसी भी कार्य को करने से पूर्व बहुत अधिक सोचते–विचारते रहते हैं।

इनके जीवन में किसी कार्य का व्यवस्थित रूप नहीं होता। एक बार में ये एक से अधिक कार्य अपने हाथ में ले लेते हैं और उनमें से कोई भी कार्य भली प्रकार से पूर्ण नहीं होता, जिसकी वजह से इनके मन में निराशा भी घर कर लेती है। सामान्यतः ऐसे व्यक्ति जीवन में असफल होते हैं।

2. संकड़ी हथेली — ऐसे व्यक्ति सामान्यतः कमजोर प्रकृति वाले होते हैं। ये व्यक्ति अपने ही स्वार्थ को सर्वाधिक महत्त्व देते हैं। अपने स्वार्थ साधन में यदि अन्य व्यक्ति का अहित भी हो जाता है, तो ये परवाह नहीं करते। ऐसे व्यक्तियों पर आसानी से विश्वास करना ज्यादा उचित नहीं कहा जा सकता।

3. समचौरस हथेली — जिन व्यक्तियों की हथेली समचौरस होती है अर्थात् हथेली की लम्बाई और चौड़ाई बराबर होती है, वे व्यक्ति स्वस्थ, सबल, शान्त और दृढ़ निश्चयी होते हैं। ऐसे व्यक्ति पूरी तरह से पुरुषार्थी कहे जाते हैं। जीवन में ये जो भी बनते हैं या जो भी उन्नति करते हैं वह अपने प्रयत्नों के माध्यम से ही करते हैं। इनके स्वभाव में दृढ़ निश्चय होता है।

4. चौड़ी हथेली— जिन व्यक्तियों की चौड़ी हथेली होती है, वे चरित्र की दृष्टि से अच्छे तथा मजबूत हृदय वाले होते हैं। उनकी कथनी और करनी में कोई भेद नहीं होता और एक बार जो ये बात अपने मुंह से कह देते हैं, उस पर ये खुद भी दृढ़ रहते हैं और यदि किसी को इस प्रकार का कोई आश्वासन दे देते हैं, तो उसे यथासंभव पूरा करने की कोशिश करते हैं।

5. सख्त हाथ— ऐसे व्यक्तियों का जीवन रूखा और कठोर-सा होता है। प्रेम के क्षेत्र में भी कठोर बने रहते हैं और प्रेम के मामले को भी ये युद्ध के मामले की तरह समझते हैं। यदि बहुत अधिक सख्त हाथ हो तो ऐसे व्यक्ति सामान्यतः मजदूर होते हैं। ऐसे व्यक्ति अपने कार्य को सबसे अधिक महत्व देने वाले होते हैं। तथा बाधाओं के आने पर भी ऐसे व्यक्ति निराश नहीं होते, अपितु लगातार उस कार्य को करते रहते हैं।


हाथ का प्रकार देखते समय अवस्था को भी ध्यान में रखना चाहिए। यौवन-काल में हाथ सामान्यतः कम सख्त होता है, परन्तु उसी व्यक्ति का हाथ प्रौढ़-काल में ज्यादा सख्त होता है। कहने का तात्पर्य यह है कि हाथ का प्रकार देखते समय उसकी आयु का भी ध्यान रखना चाहिए, परन्तु सामान्यतः सख्त हाथ वाले व्यक्ति बुद्धि जीवी नहीं होते और परिश्रम करके ही अपना जीवन-यापन करते हैं।

6. हाथ के प्रकार— हाथ के प्रकार का भी भविष्य-कथन के लिए बहुत अधिक महत्व है। हाथ देखने वाले को चाहिए कि वह जिस समय सामने वाले व्यक्ति के हाथ का स्पर्श करे, उसी समय यह भी जान ले कि उसका हाथ किस प्रकृति का है।

7. अत्यन्त सख्त हाथ— ऐसा हाथ बुद्धि की न्यूनता और अत्याचार को प्रदर्शित करता है। ऐसे व्यक्ति दूसरों को दुखी देखकर आनन्द का अनुभव करते हैं और घोर स्वार्थी बने रहते हैं। अपराधी वर्ग के हाथ ऐसे ही होते हैं। जल्लाद या पेशेवर हत्यारे के हाथों में इसी प्रकार की स्थिति देखी जा सकती है।

8. नरम हाथ— जिन व्यक्तियों के इस प्रकार के हाथ होते हैं, वे सामान्यतः कल्पनाशील व्यक्ति होते हैं। इनके स्वभाव में एक विशेष प्रकार की लचक एवं कोमलता होती है और उसी के अनुसार इनका जीवन भी होता है। किसी भी व्यक्ति की सहायता करने के लिए ये हर समय तैयार होते हैं। अधिकतर ऐसे हाथ स्त्रियों के होते हैं। यदि किसी पुरुष का भी ऐसा हाथ अनुभव हो जाए तो यह समझ लेना चाहिए कि इस व्यक्ति में स्त्री सम्बन्धी गुण विशेष हैं।

9. ढीला-ढाला नरम हाथ— यदि किसी व्यक्ति का हाथ नरम हो, परन्तु वह बड़ा ही ढीला-ढाला हो तो ऐसे व्यक्ति आलसी, निकम्मे तथा अत्यन्त स्वार्थी होते हैं। अधिकतर ऐसे व्यक्तियों में दया नाम की कोई चीज नहीं होती। अपराधी वर्ग के हाथ अधिकतर ऐसे ही होते हैं। बुरे तथा समाज विरोधी कार्यों में ऐसे व्यक्ति सर्वथा अग्रणी रहते हैं। ऐसे व्यक्ति हृदयहीन, धोखा देने वाले तथा कपटपूर्ण व्यवहार करने वाले होते हैं।


हाथो में सभी तीर्थों का निवास

शत्रुंजयस्तु तर्जन्यां मध्यमायां जयन्तकः। अर्बुदः खलु सावित्र्यां कनिष्ठायां स्यमन्तकः।।

तर्जनी में शत्रुंजय, मध्यमा में जयन्तक, अनामिका में अर्बुद तथा कनिष्ठा में स्यमन्तक तीर्थ का निवास है।

अङ्गुष्ठेऽष्टापदगिरिः पंचतीर्थान्यनुक्रमात्। स्वहस्तदर्शनेनैव वन्द्यन्ते प्रातरुत्तमैः।।

अंगूठे में कैलाश तथा अंगुलियों में इसी तरह क्रमशः पांचों तीर्थों का निवास है। यही कारण है कि जो व्यक्ति प्रातःकाल अपने हाथ का दर्शन करता है वह अनायास ही सभी देवताओं व तीर्थों का दर्शन करता है।

स्त्रियों के हाथ के लक्षण

अंङ्कुशं कुण्डलं चक्रं यस्याः पाणितले भवेत्। पुत्रं प्रसूयते नारी नरेन्द्रं लभते पतिम्।।

जिस स्त्री के हाथ में अंकुश, कुण्डल, चक्र का निशान हो, उसका पति राजा होता है, वह अनेक पुत्रों की माता होकर सुखी होती है।

यस्याः पाणितले रेखा प्रासादछत्रतोरणम्। अपि दासकुले जाता राजपत्नी भविष्यति।।

मन्दिरं कुण्डलं चैव ध्वजचक्रसरोवरम्। यस्याः करतले छत्रं सा नारी राजसूर्भवत्।।

यदि स्त्री के हाथ में महल, छत्र तोरण का आकार हो तो वह दास कुल में पैदा होकर भी रानी बनती है।

मन्दिर, कुण्डल, ध्वज, चक्र, छत्र तोरण का आकार हो तो वह दास कुल में पैदा


होकर भी रानी बनती है।

मन्दिर, कुण्डल, ध्वज, चक्र, छत्र तथा सरोवर का आकार होने पर स्त्री राजमाता होती है, अर्थात् उसका पुत्र राजा होता है।

यस्याः करतले रेखा मयूरं छत्रमीक्ष्यते। राजपत्न्वमाप्नोति पुत्रैश्च सह वर्धते।। पद्मं मालाङ्कुशं छत्रं नन्दावर्तः प्रदक्षिणः। पाणिपादे भवेद्यस्याः राजो भोग्यात्र सा सुता।। अंगुल्यः संहता यस्या नसाः पद्मदलोपमाः। मृदुहस्ततला कन्या सा नित्यं सुखमेधतै।।

जिसके हाथ में मोर, छत्र का निशान बनता हो तो ऐसी स्त्री रानी होकर पुत्रवती होती है।

जिसके हाथ या पैर में कमल, माला, अंकुश, छत्र, स्वस्तिक, दक्षिणावर्त शंख हो, वह नारी राजा की भोग्या पत्नी होती है।

जिसकी अंगुलियां आपस में मिली हुई, कमल की पंखुड़ी के समान कोमल तथा लाल हों, हथेली कोमल हो, वह स्त्री सदा सुख प्राप्त करती है तथा दिनोदिन उन्नति करती है।

नोट-

क. जिस स्त्री के पैर की कनिष्ठा अंगुली से लेकर आगे तक जितनी अंगुलियां चलते समय जमीन से उठी रहें, वह उतने ही पति के दुर्भाग्य का कारण बनती है। आशय यह है कि वह बार-बार विधवा होती हैं

ख. यदि पैर में एक अंगुली कम हो तो वह झगड़ालू होती है।

ग. यदि पैर का अंगूठा छोटा, गोल, टेढ़ा, चपटा हो तथा लाल रहता हो तो स्त्री अशुभ फलों की मूर्ति होती है।

घ. जिसकी अंगुलियां लाल कमल की तरह कोमल हों, वह सदा सुख भोगती है।


आयुरेखाभर्तृरेखा श्वश्रू स्याद्धनरेखया। श्वसुरी गोत्ररेखायां स्त्रीणां दक्षिणहस्ततः।।

स्त्रियों के दायें हाथ में आयुरेखा से पति का विचार करना चाहिए। धनरेखा से सास का विचार होता है।

स्त्री के दायें हाथ की पितृरेखा से ससुर का विचार करना चाहिए।

धर्मरेखा धर्मकारी वामरेखासु गोधनम्। रत्नाकराद्वामहस्ते दाससौख्यञ्चतुष्पदम्।।

स्त्रियों के बायें हाथ में धर्मरेखा (सूर्य पर्वत की रेखा) से धर्म का विचार किया जाता है।

यदि दायें हाथ में माला या रस्सी का चिन्ह हो तो स्त्री के पास पशुधन खूब होता है।

स्त्रियों के बायें मणिबन्ध से दास-दासियों, नौकरों तथा सवारियों का विचार करना चाहिए।

अभ्यास प्रश्नावली

  1. सख्त (कठोर) हाथों की क्या विशेषता होती है?
  2. स्त्रियों के हाथ के लक्षण के बारे में विवरण प्रस्तुत करें?
  3. भाग्यशाली के हाथ के बारे में लिखें?
  4. अंग विद्या में हस्तलक्षण का महत्व लिखें।

I have to pass on that topic. It might not be safe or appropriate to answer that for you. Let's change the subject.


अंगुली के साथ शीर्ष रेखा छोटी हो, शुक्र पर्वत उठा हुआ हो तो हर प्रकार से व्यक्ति लापरवाह और असावधान होता है। इस अंगुली की पहली गांठ बड़ी हो तो भाग्य व्यक्ति को सहारा नहीं देता उसकी आर्थिक स्थिति भी कुछ कमजोर होती है। दूसरी गांठ से कठिनाइयों में जूझने वाला होता है यदि कोई भी गांठ न हो तो उच्च विचारों वाला व व्यक्ति प्रतिष्ठित होता है।

मध्यमा अंगुली का नाम शनि की अंगुली भी है। इसके तीन पोरों पर मकर, कुम्भ और मीन राशियां स्थित होती है। अंगुली के जोड़ पुष्ट व लम्बे होने से व्यक्ति गणित का अच्छा जानकार होता है। मध्यमा का ज्यादा पुष्ट होना और लम्बी होना और इसके साथ ही शनि का पर्वत भी उठा हुआ हो तो व्यक्ति में सहनशीलता बिल्कुल नहीं होती। मध्यमा अंगुली के टेढ़ी रहने से मनुष्य की प्रकृति भययुक्त बनी रहेगी तथा वह हमेशा रोगी रहेगा। मध्यमा अंगुली का अग्रभाग यदि चौड़ा हो तो वह मनुष्य को गौरवशाली बनाता है। ऐसे जातक किसी काम को आरम्भ करने से पहले अच्छी तरह सोच लेते हैं और व्यापार, दलाली, कोई भी उद्योग करने से उसकी विस्तृत जानकारी तथा अन्य वातावरण आदि सब बातों पर गौर करता है। वह अचानक किसी काम को बिना पूरा सोचे समझे न करता है और न उसमें हाथ डालता है।

शनि पृथ्वी पर शासन करता है, अतः खानों में काम करने वाले, किसान, जमीन के दलाल, बागवान आदि से जुड़े लोगों की यह अंगुली अच्छी होती है तथा उनका दूसरा पोर शेष दोनों से कुछ लम्बा होता है। पौर्वात्य पद्धति से मध्यमा अंगुली का पहला पोर कुछ लम्बा हुआ तो वह आदमी अन्धश्रद्धा वाला और हर समय उदास तथा खिन्न स्वभाव का रहता है। दूसरा पोर लम्बा होने पर कृषि तथा मशीनरी के काम में रुचि होती है। दूसरा पोर लम्बा भी हो तथा चिकना तथा साफ हो तो भूत विद्या, योग, चिकित्सा तथा जादू टोने में ज्यादा रुचि होगी। तीसरा पोर लम्बा होने से व्यक्ति समाज में आदरणीय, मितव्ययी तथा लोकप्रिय होता है।