Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

100. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — भ्रलक्षण

भ्रलक्षण

खवौ सुवर्तुले तन्व्याःस्निग्धे कृष्णे असंहते। प्रशस्ते मृदुरोमाणौ सुख्ुवः कार्मुकाकृती॥१५॥ १ चन्द्रानना च या कन्या वालसूर्यसमप्रभा। विशालनेत्रा रक़ाक्षी तां कन्यां बरे दुध: ॥ १ ॥ पूर्वार्धः। खररोमा च पृथुला विकीर्णा सरला स्त्रियाः। न भ्रूः प्रशस्ता मिलिता दीर्घरोमा च पिङ्गला ॥ १६ ॥ जिसकी मौहैं गोल, चिकनी, काली, परस्पर नहीं मिली हुई, कोमल रोमोंवाली होकर धनुपाकार प्रतीत हों तो उस स्त्री को शुभदायक होती हैं और जिसकी मौंहैं खरखरे रोमोंवाली चौड़ी, विकीर्ण, सीधी व मिली हुई तथा दीर्घ रोमों वाली होकर पीलीसी प्रतीत हों तो शुभदायक नहीं होती हैं ।। १५। १६।।