112. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — सृष्टिक्रमं
सृष्टिक्रमं (Part 1)
· पपात्मा ज्योतिश्चिदानन्दरूपो नित्यश्च निस्पृहः। निर्गुणः प्रकृतेर्योगात्सगुणः कुरुते जगत् ॥ १ ॥ सत्त्वं रजस्तमश्रेति गुणास्ते प्रकृतिः समाः। सा जडापि जगत्कर्त्री परमात्मचिदव्ययात् ॥२॥ अव सष्टिक्रम कहते हैं-आत्मा ज्योतिःस्वरूप, चिदानन्दरूप, नित्य, निस्पृह और निर्गण है वह प्रकृति के योग से इच्छावान् होकर जगत् को रचता है सतोगु, रजोगुण और तमोगुण समान होनेसे 'प्रकृति' कहलाते हैं और न्यूनाधिक यानी कमवढ़ होकर विकृति'कहाते हैं वह प्रकृति स्वयं जड़ होकर भी अविनाशी सच्चिदानन्द परमात्मा के सहारे से जगत् को बनाती है ॥ १।२ ॥ अथ सुश्ुतोपदेशं कुर्वाणो धन्वन्तरि: प्रकृतिस्वरूपमाह- सर्वभूतानां कारणमकारणं सत्त्वरजस्तमोलक्षणमष्टरूप- मखिलस्य जगतः सम्भवहेतुरव्यक्ं नामेति ॥ ३ ॥ अव सुश्रत का उपदेश करतेहुए धन्वन्तरिजी प्रकृति के स्वरूप विशेपण को कहते हैं- ध्रव्यक्क (मूलपकृति) सर्व माणियों की (समकायि) कारण स्वयं अरकारण तथा सम सत्व रज तम स्वरूपवान् होकर अव्यक्त, महान्, अहंकार और पश्चतन्मात्रा ऐसे आठ रूप वाली तथा अखिल जगत् की संभवका हेतु है ॥ ३ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य उभावप्यनादी उभावप्यनन्तावुभावप्यलिङ्गाबुभावपि नित्यावुभावप्यपरावुभावपि सर्वगताविति॥४ ।। प्कृति-पुरुष दोनों अनादि, दोनों अनन्त, दोनों अलिङ्ग, दोनों नित्य, दोनों ऊपर और दोनों सर्वगत (सर्वव्यापक) हैं ॥ ४ ॥ एका तु प्रकृतिरचेतना त्रिगुणा बीजधर्मिणी। प्रसवधर्मिरायमध्यस्थधर्मिणी चेति ।। ५ ।। प्रकृति-पुरुषका वैधर्म्य दिखाते हैं-कि, एक प्रकृति चैतन्यता रहित, तीन गुणवाली, बीजधर्मिणी, प्रसवधर्मिणी और अमध्यस्थधर्मिणी है यानी सुख दुःखादि की भोगने चाली है॥। ५ ॥ पुरुषस्तु चेतनावान्निर्गणो Sप्रसवधमी डबीज- धर्मा मध्यस्थधर्मा चेति॥ ६ ॥ पुरुष-चेतनावान् (चैतन्यतायुक्) गुणरहित, अन्ुत्पत्तिकर्ता होकर अपरबीजधर्मा होता हुआ मध्यस्थधर्मा यानी सुख-दुःख-इच्छा और दोपादि से उदासीन बना रहता है ॥ ६ ॥ पकृतिनामानि- प्रधानं प्रकृतिः शक्किर्नित्या चाविकृतिस्तथा। एतानि तस्या नामानि पुरुषं या समाश्रिता।। ७।। अब प्रकृति के नाम कहते हैं कि, प्रधान, प्रकृति, शक्कि, नित्या और अविकृति ये ५ उस प्रकृति के नाम हैं जो कि पुरुष के आश्रित रहती है ।। ७॥ प्रकृतिगुणनाह- सत्त्वं रजस्तमस्त्रीणि विज्ञेया: प्रकृतेर्गुणाः। तैश्र युक्कस्य चित्तस्य कथयाम्यखिलान् गुणान्॥८॥ सच्व, रज और तम ये तीन प्रकृति के गुण जानने चाहियॅ उन गुणों से युक्त चित्तके सारे गुणों को मैं कहता हूं ।। = ।। सत्वादियुक्मनोलक्षणान्याइ- आस्तिक्यं प्रविभज्य भोजनमनूतापश्र तथ्यं वचो मेधाबुद्धिष्टतिक्षमाश्र करुणा ज्ञानं च निर्दम्भता। कर्मानिन्दितमस्पहं च विनयो धर्म: सदैवादरा- उत्तरार्धे द्वितीयाङ्क: । देते सत्त्वगुणान्वितस्य मनसो गीता गुणा ज्ञानिभिः॥६।। वेद, शास्त्र, लोक व परलोक में विश्वास रखना, कुदम् को वांटकर भोजन करना, कोधरहित, सत्य वचन वोलना, मेधा, वुद्धि, धृति, क्षमा, करुण, ज्ञान, निर्दम्भता, अनिन्दितकर्मकर्ता, निष्काम विनय और सदैव धर्मका आदर करनेवाला ये सतोगुणयुक् मनके गुख ज्ञानियोंने गाये हैं।। ६।। क्रोधस्ताडनशीलता च बहुलं दुःखं सुखेच्छाधिका दम्भ: कामुकताऽप्यलीकवचनं चाधारताहंकृतिः । ऐश्वर्यादभिमानितातिशयितानन्दोऽधिकश्चाटनं प्रख्याता हि रजोगुपेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥१० ॥ क्रोध, ताड़नशीलता, घना दुःख, अधिक सुखेच्छा, कपट, कामुकता, भूंठा वचन, सहन- शीलता, अहंकार, ऐश्वर्य से अभिमानता, अत्यन्त आनन्द और पृथ्वी में बहुत विच- रना ये रजोगुणयुक्त चित्त के गुण कहाते हैं ॥ १०॥ नास्तिक्यं सुविषष्मतातिशयितालस्यं च दुष्टामतिः प्रीतिर्निन्दितकर्मशर्मि सदा निद्रालुताहर्निशम्। प्र्प्रज्ञानं किल सर्वतोऽपि सततं क्रोधान्धता मूढता प्रख्याताहि तमोगुपेन सहितस्यैते गुणाश्चेतसः ॥ ११ ॥ नास्तिकपना, अतिखेद, अत्यन्त आलस्य, दुर्मति, निन्दितकर्म में प्रीति सदैव रखना, दिन राति सोना, सर्वत्र अज्ञान, सदैव क्रोध से अन्धा बना रहना और मूढता ये तमोगु- युक्र चित्त के गुण कहलाते हैं ॥ ११ ॥ तत्र प्रभूतसत्त्वस्तु सात्त्विकः पुरुषः स्मृतः। राजसस्तामसश्चैव त्रिविधस्तेन मानवः॥१२॥ वहां अधिक सतोगुणवाला पुरुष साश्विक कहलाता है इसी प्रकार राजसी व तामसी कहेजाते हैं उसीसे मानव तीन भांति के होते हैं ॥ १२ ॥ महत्तत्वोत्पत्तिमाह- ततो Sभवन्महत्त्वं बुद्धितत्त्वापराभिधम्। त्रिगुएं सत्त्वबहुलं निर्मलं स्फटिकोपमम्॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य चिच्छाया प्राप्तचैतन्यं तदिच्छामयमीरितम्॥१३॥ उस प्रकृति से महत्तत्व प्रकट हुआ और उसका दूसरा नाम बुद्धितर्व भी है यह 'त्रि- गुण अधिक सच्ववाला व निर्मल होकर स्फटिक के समान है तथा चिच्छाया अर्थात् चिदानन्द की छाया से चैतन्यता को पाप्त होकर उस परमात्मा की इच्छामय कहा है यद्यपि उस महत्तत्व में प्रकृति के तीनों गुण विद्यमान रहते हैं तो भी सत्वगुण की अधि- कता है इसका यह अभिमाय है कि जैसे निश्चल सरोवर में बहुतसी वस्तुओं के गेरने से उसका जल बढ़ता जाता है ऐसेही चिद्रूपपुरुष के आक्रमण होने से तुल्य गुरत्रयात्मिका प्रकृतिका ज्ञानहेतु प्रकाश ऐसा सतोगुण बढ़ता है, फिर बढ़े हुए सतोगुण से प्रकृति का सत्वबहुल बुद्धितत्व हुआ॥ १३॥ महतास्त्रिगुणाज्जातोहंकारस्त्रिगणान्वितः। सात्त्विको राजसश्चापि तामसश्चेति स त्रिधा।। १४ ।। त्रिगुणात्मक महत्तत्व से त्रिगुणात्मक अहंकार प्रकट हुआ साश्विक, राजस और तामस इन भेदों से वह तीन प्रकार का होता है॥ १४ ॥ जातानि सात्त्विकात्तस्मादिन्द्रियाणि सराजसात्। तानि श्रोत्रं त्वचो नेत्रं रसना नासिका तथा॥ वाग्घस्तचरणोपस्थं गुदान्येकादशो मनः ॥ १५॥ रजोगुणसमेत उस साश्विक अहंकार से इन्द्रियां उपजी हैं उनको कहते हैं कि, कान, खाल, नेत्र, जीभ, नाक, वाणी, हाथ, पांव, लिङ्ग, गुदा और ग्यारहवां मन है। १५।। पञ्चबुद्धीन्द्रियारायाहुः प्राक्कनानीतराणी च। · कर्मेन्द्रियाणि पञ्चैव कथयन्ति विपश्चितः ॥ १६॥ बुद्धिके आश्रित होनेसे पहली पांच बुद्धीन्द्रियां यानी ज्ञानेन्द्रियां कहाती हैं और दूसरी पांचों को पिंडतों ने कर्मेन्द्रियां कहा है॥ १६.।। मनोबुद्धीन्द्रियं विज्ञैः कर्मेन्द्रियमपि स्मृतम्। मनोधिष्ठितमेवेदमिन्द्रियं यत्पवर्तते ॥ १७॥ विद्वानों ने मन को बुद्धीन्द्रिय व कर्मेन्द्रिय भी कहा है यानी ज्ञानेन्द्रिय व कर्मेन्द्रियों का पएिडतों ने मनही अधिष्ठान कहा है क्योंकि मनके वशीभूत होकर इन्द्रियां अपने अपने कमां को करती हैं॥ १७।। शब्द: स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धो ह्यनुक्रमात्। बुद्धीन्द्रियाणां विषयाः समाख्याता महर्षिभिः ॥१८॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । कर्णेन्द्रिय का विषय शब्द, त्वचाका विषय स्पर्श, नेत्रों का विषय रूप, जिह्वा का हैहैं॥ १= ॥ घय रंस और नासिका का विषय गन्ध ये क्रम से बुद्धीन्द्रियों के विषय महर्षियों ने वाच्यं ग्राह्यं च गन्तव्यमानन्दं त्याज्यमेव च। कर्मेन्द्रियाणं विषया ज्ञातव्यं विषयो हृदः ॥१६॥ वाणी का विषय बोलना, हाथोंका विषय लेना-देना, पैरों का विषयं चलना, लिग्गे- दय का विषय आनन्द भोगना और गुदाका विषय मलका त्याग करना ये कर्मेन्द्रियों के पय हैं और ज्ञातव्य (जानना) मनका विषय है ॥ १६ ॥ तामसादप्यहंकारात्तन्मात्राणि सराजसात। पञ्चाल्पसत्त्वसन्वन्धात्तल्लिङ्गानि भवन्ति हि॥ २० ॥ राजस अहंकार समेत तामस अहंकार से भी पश्चतन्मात्रायें प्रकट हुंई, इनमें सतोगुण अल्पसम्बन्ध होने से राजस और तामस के मोहादिक लिङ् (चिह्न) मिलते हैं ॥२०॥ शब्दतन्मात्रकं स्पर्शतन्मात्रं रूपमात्रकम्। रसतन्मात्रकं गन्धतन्मात्रमिति तानि तु ॥ २१ ॥ शब्दतन्मात्रा, स्पर्शतन्मात्रा, रूपतन्मात्रा, रसतन्मात्रा और गन्धतन्मात्रा ये पांच तन्मात्रा हननी चाहियें उनको योगीलोग ही जानते हैं ॥ २१ ॥ तन्मात्रेम्यो वियद्धायुर्वहिर्वारि वमुन्धरा। एतानि पञ्च जायन्ते महाभूतानि तत्क्मात् ॥ २२॥ उन तन्मात्राओं से एकोत्तरद्ृद्धि करके आकाश आदि पश्चभूत प्रकट होते हैं, जैसे कि ब्दतन्मात्रा से शब्दगुखवाला आकाश, शब्दतन्मात्रा सहित स्पर्शतन्मात्रा से शब्द, पर्शगुणणवाला पवन प्रकट हुआ, शब्दतन्मात्रा व स्पर्शतन्मात्रा सहित रूपतन्मात्रा से शब्द, पर्श, रूपगुणवान् अग्नि मकट हुआ, शब्द स्पर्श, रूपतन्मात्रा सहित रसतन्मात्रा से शब्द, पर्रा, रूप, रसगुणवान् जल प्रकट हुआ एवं शब्द, स्पर्श, रूप, रसतन्मात्रा सहित गन्धतन्मात्रा। शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्धगुणवाली पृथ्वी भकट हुई॥ २२ ॥ शब्द: श्रोत्रेन्द्रियं वापि विद्राणि च विविक्रता। वियतः कथिता एते गुणा गुणविचारिभिः॥।२३॥ शब्द, कर्णेन्द्रिय, छिद्र (शिरा, स्नायु, अस्थि, पेशी आदि) शारीरिकभावों का जाति बाकि करके आपस में अलग अलग होना ये आकाश के गुण गुरविचारियों ने कहेहैं॥२३॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य स्पर्शस्त्वगिन्द्रियं चापि लघुता स्यन्दनं तनोः। चेष्टाः सर्वशरीरस्य वायोरेते गृणाः स्मृताः ॥२४॥ स्पर्श का होना, त्वगिन्द्रिय, हलकापना, देह का कुछ कुछ हिलना और सर्वदेह की चेष्टा होना ये पवन के गुण कहे हैं ॥ २४ ।। रूपं नेत्रेन्द्रियं पाक: संतापस्तीक्ष्णता तथा। वर्णौ भ्राजिष्णुतामर्षः शौर्यं वहेर्गणा अमी॥२५॥ रूप, नेत्रेन्द्रिय, पाक (उदर की आगी से आहार का पचना) संताप (गरमी) तीक्ष्यता (शीघ्रकारित्व) वर्ण (गौरादि ) भ्राजिष्णाता (दीप्ति ) अरप्रमर्प (क्रोध ) और शुरता ये अग्नि के गुर हैं॥ २५॥ रसो रसेन्द्रियं शैत्यं स्नेहश्च गुरुता तथा। सर्वद्रव्यसमूहश्र शुक् वारिगुणा: स्मृताः ॥२६॥ रस, रसनेन्द्रिय, शीतलता, चिकनाई, भारीपना, समस्त द्रवपदार्थों का एकत्र होना औरै वीर्थ ये जल के गुण कहे हैं । २६॥ गन्धो घ्राणेन्द्रियं चापि काठिन्यं गौरवस्तथा। वसुन्धरा गुणा एते गदिता गुणवेदिभिः ॥२७॥ गन्ध, नासेन्द्रिय, कठोरता, भारीपना ये गुज्ञाताओं ने पृथ्वी के गुण कहे हैं॥२७॥ शब्द: स्पर्शश्र रूपं च रसो गन्धश्र तत्क्रमात्। तन्मात्राणां विशेषा: स्युः स्थूलभावमुपागताः॥२८।। स्थूलभाव को प्रांप्त होकर शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध ये शब्दतन्मात्रादि के क्रम से तन्मात्राओं के विशेप हैं यानी अनुभव योग्य सुख दुःख मोहरूप धर्म विशेप है परन्तु अपरतिसूक्ष्म होने से तन्मात्रा सुखादिक के विशेष नहीं हैं ॥ २८॥ प्रकृतेः कारणा योगान्मता प्रकृतिरेव सा। महत्तत्त्वादयः सप्त शक्केर्विकृतयः स्मृताः॥२६॥ सब की कारणरूप होने से यानी कार्यरूप न होने से प्रकति को ही प्रकृति माना है और महत्तच्वादिक सातों उस प्रकृति की विकृतियां कही हैं प्रकृति, महत्तच्व्, अ्हंकार, और पांच तन्माता-ये-आठन्कृतियां कहलाती हैं॥ २६ ॥ इन्द्रियाणां च भूतानां कारणत्वान्महर्पिभिः। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्: । महत्तत्त्वादयः सप्त प्रोक्ताः प्रकृतयोपि च॥ ३०॥ इन्द्रियों के कार्य और भूतों के कारण होनेसे महत्तत्त्वादि सातों को भी महर्पियों ने अकृति कहा है ॥ ३० ॥ दशेन्द्रियाणि चित्तं च महाभूतानि पञ्च च। एतानि सृष्टिं जानद्विर्विकाराः पोडश स्थृताः॥३१॥ कहे हैं ॥ ३१ ॥ दश इन्द्रियां, चित्त और पश्चमहाभूत इनको सृष्टि ज्ञाताओं ने सोलह विकार (कार्य) एवं चतुर्विशतिभिस्तत्वैः सिद्धे वपुर्गृहे। जीवात्मा नियतेर्निघ्नो वसति स्वान्तदृतवान् ॥३२॥ इस प्रकार चौवीस तत्वों से रचेहुए देहरूप घरमें महत्तत्वादि प्रकृतिभाव (शुभाशुभ. कर्म) के आधीन होकर मनरूप दूतवाला होता हुआ जीवात्मा बसता है।। ३२।। सदेही कथ्यते पापपुरायदुःखसुखादिभिः। व्याप्तो बद्धश्र मनसा कृत्रिमैः कर्मबन्धनैः ॥३३॥ जोकि पाप, पुएय, दुःख व सुख आदिकों से व्याप्त होकर मनके द्वारा कृत्रिम कर्मवन्धनों से वँधाहुआ है वह देही कहाजाता है॥ ३३ ॥ इच्छाद्वेषमुखासुखानि विषयज्ञानं प्रयत्नो मनः संकल्पश्च विचारण स्मृतिरथो बुद्धि: कलाविज्ञता। प्राणस्योपरियापनं गुदवशाद्ायोरघ: प्रेरणं नेत्रोन्मेषनिमेषकृत्यकरणोत्साहाश्र जीवे गुणाः ॥३४॥ इच्छा (सुख की अभिलापा) द्वेप (वैर करना) सुख (प्रीति) दुःख (अमीति) विष- पज्ञान (शब्दादिज्ञान) प्रयत्न (कार्य में तत्परता यानी उद्योग) मन (संशयात्मक) संकल्प (मन का कर्म) विचार (ऊहापोह यानी तर्क वितर्क करके वस्तु का जान लेना) स्मृति (पूर्वानुभूत अरर्थ का स्मरण करना ) बुद्धि ( निश्चयात्मिका) कलाविज्ञता शिल्पशास्त्रादि बोध) प्राय का उपरियापन (हृदयस्थित वायु को पुखादि ऊपर के भाग में लाना) गुदा के वश से अधोवायु का नीचे परेरणा करना, नेत्रों का खोलना पूदना और कार्य करने में उत्साह रखना ये मनोयुक्क जीवात्मा के गण कहे हैं ॥ ३४:॥ इति सटष्टिमकरणम्॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य तथ शिवस्वरोदयाध्यायः॥ देव्युवाच। देवदेव महादेव कृपां कृत्वा ममोपरि। सर्वसिद्धिकरं ज्ञानं कथयस्व मम प्रभो ॥ १ ॥ देवीजी बोलीं कि, अहो देवताओं के देव, महादेव, प्रभुजी ! मेरे ऊपर कृपाकर सर्वसिंद्धिकारक ज्ञानको मुझरसे कहिये ॥ १ ॥ कथं ब्रह्माएडमुत्पन्नं कर्थ वा परिवर्तते। कथं विलीयते देव वद ब्रह्माएडनिर्णयम्॥ २॥ अरहो देव ! यह व्रह्माएड कैसे उत्पन्न होता है वा किसभांति पालन किया जाता और किस प्रकार लीन हो जाता है ? इस ब्रह्माएड का निर्णय मुझर् से कहो ॥ २॥ ईश्वर उवाच। तत्त्वाद् ब्रह्माएडमुत्पन्नं तत्त्वेन परिवर्तते। तत्त्वे विलीयते देवि तत्त्वाद् ब्रह्माएडनिर्एयः॥ ३॥ श्रीसदाशिवजी बोले कि, हे देवि ! यह ब्रह्माएड तत्वों से उत्पन्न होता है व त्त्वो सेही पालन कियाजाता है और तत्वों मेंही लीन होजाता है इसलिये तत्वों से ब्रह्माएड का निर्णय समझना चाहिये । ३॥ देव्युवाच। तत्त्वमेव परंमूलं निश्चितं तत्त्ववादिभिः। तत्त्वस्वरूपं किं देव तत्त्वमेव प्रकाशय ।। ४।। देवीजी बोलीं कि, तच्ववादियों ने तत्वकोही परम मूल निश्चित किया है इसलिये हे देव ! तत्वका स्वरूप क्या है ? उसको आपही प्रकाश करें॥ ४ ॥ ईश्वर उवाच। निरञ्जनो निराकारो ह्येको देवो महेश्वरः। तस्मादाकाशमुत्पन्नमाकाशाद्ायुसंभवः॥ ५॥ श्रीशिवजी बोले कि निरञ्जन, निराकार, एकदेव परमेश्वर है उससे आकाश पैदाहुआ और आकाश से वायु उपजा है॥। ५ ॥ वायोस्तेजस्ततश्रापस्ततः पृथ्वीसमुद्धवः। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । एतानि पञ्चतत्त्वानि विस्तीर्णानि च पञ्चधा॥ ६ ॥ वायु से तेज व तेज से जल व जल से पृथ्वी उपजी है ये पांच तच्व एक एक प्रति पांच प्रकार से विस्तार को माप्त होते हैं यानी पश्चीकरण करने से पश्चीस तत्व हो जाते हैं ॥ ६ ॥। तेभ्यो ब्रह्माराडमुत्पन्नं तैरेव परिवर्तते। विलीयते च तत्रैव तत्रैव रमते पुनः ॥।७॥ उनसे ब्रह्माएड उत्पन्न होता है व उन्हींसे ब्रह्माएडकी पालना होती है और उन्हीं में ही लीन होजाता है फिर सूक्ष्मरूपसे वहीं रमता है॥। ७॥ पञ्चतत्त्वमये देहे पञ्चतत्त्वानि सुन्दरि। सूक्ष्म रूपेण वर्तन्ते ज्ञायन्ते तत्त्वयोगिभिः॥८॥ अहो सुन्दरि ! पांच तत्वोंसे उपजे हुए देहमें पांचों तच्व सूक्ष्मरूप से वर्तते हैं उनको तत्वज्ञाता योगीजन जानते हैं ॥ ८ ॥ अपरथ स्वर प्रवक्ष्यामि शरीरस्थस्वरोदयम्। हंसचारस्वरूपेण भवेज्ज्ञानं त्रिकालजम् ॥६॥ अब जिसमें शरीरस्थ स्वरों का उदय होता है उस स्वर को कहूंगा जिसके ज्ञानद्वारा इंस चारस्वरूप से भूत-भविष्य-वर्तमान तीनों कालों का ज्ञान होता है॥ ६॥ गुह्याद्रुह्यतरं सारमुपकारप्रकाशनम्। इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञानानां मस्तके मणिः ॥ १०॥ यह स्वरोदय ज्ञान गुह्यसे गुह्यतर होकर साररूप होता हुआ उपकारों का प्रकाशक है जो कि ज्ञानों का शिरोमणि कहाजाता है ॥ १० ॥ सूक्ष्मात्मूक्ष्मतरं ज्ञानं सुबोधं सत्यप्रत्ययम्। आश्चर्य नास्तिके लोके आधारं त्वास्तिके जने ॥ ११॥ यह स्वरोदय ज्ञान सूक्ष्म से सूक्ष्मतर व बड़े बोधका दायक व जिसमें सत्य की प्रतीति होती है व नास्तिकलोकों में आश्चर्यकारक दीखता है व आरस्तिकजनों का आधार कहाता है । ११ ॥ अथ शिष्यलक्षणम्- शान्ते शुद्धे सदाचारे गुरुभक्त्यैकमानसे। दृढ़चित्ते कृतज्ञे च देयं चैव स्वरोदयम्।। १२।। सामुद्रिकशास्त्रस्य शान्तस्वभाव व शुद्धस्वरूप, उत्तम आचरणशील व जिसका मन गुरु की भक्ति में रहता हो व चित्त दृढ़ हो व उपकारों का ज्ञाता हो उस शिष्य को स्वरोदय देना चाहिये ॥ १२ ॥ दुष्टे च दुर्जने क्रुद्धे नास्तिके गुरुतल्पगे। हीनसत्त्वे दुराचारे स्वरज्ञानं न दीयते ॥ १३॥ जो दुष्ट, दुर्जन, क्रोधी, नास्तिक, गुरुदारगामी, अधीर और दुराचारी हो उसको स्वरका ज्ञान नहीं दियाजाता है। १३ ॥ शृणु त्वं कथितं देवि देहस्थं ज्ञानमुत्तमम्। येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं प्रणीयते ॥ १४ । अहो देवि ! मेरे से कहे हुए देह में स्थित उत्तम ज्ञानको तुम सुनो कि जिसके विज्ञान- मात्र से सर्वज्ञता प्राप्त की जाती है॥ १४ ॥ स्वरे वेदाश्च शास्त्राणि स्वरे गान्धर्वसुत्तमम्। स्वरे च सर्वत्रैलोक्यं स्वरमात्मस्वरूपकम् ॥ १५ ॥ स्वर में चारो वेद व पद्शास्त्र स्थित हैं व स्वर में उत्तम गान्धर्वशास्त्र रहता है व स्वर में सारा त्रैलोक्य टिका रहता है व स्वरही आत्मस्वरूप है ॥१५ ॥ स्वरहीनश्र दैवज्ञो नाथहीनं यथा गृहम्। शास्त्रहीनं यथा वक्कं शिरोहीनं च यद्रपुः॥१६॥ जैसे स्वरहीन ज्योतिर्विद्, नाथहीन घर व शास्त्रहीन वदन और स्वरहीन शरीर नहीं सोहता है॥ १६ ॥ नाडीभेदं तथा प्राणतत्त्वभेदं तथैव च। सुषुम्ना मिश्रभेदं च यो जानाति स मुक्किगः॥ १७॥ जो मनुष्य नाड़ी, माख, तत्त्व और सुपुन्ना आदि मिश्रित तीन नाड़ियों के भेद को जानता है वह मुक्ति को प्राप्त होता है॥ १७ ॥ साकारे वा निराकारे शुभं वायुबलात्कृते। कथयन्ति शुभं केचित्स्वरज्ञानं बरानने ॥ १८॥ साकार या निराकार में वायु (स्वर) के वलसे शुभ होता है अहो वरानने ! कितेक आचार्य स्वरज्ञान को ही शुभदायक कहते हैं॥ १=॥ उत्तरा्धे दविर्तायाङ:। ब्रह्माएडखएडपिएडाद्या: स्वरेणैव हि निर्मिताः। सृष्टिसंहारकर्ता च स्वरः साक्षान्महेश्वरः॥१६॥ ब्रह्माएड के खएड व पिएडआदि को स्वरनेही बनाया है और सटष्टि व संहार का करने वाला साक्षात् महेश्वररूप स्वरही है॥ १६ ॥ स्वरज्ञानात्परं गुह्यं स्वरज्ञानात्परं धनम्। स्वरज्ञानात्परं ज्ञानं नवा हष्ट नवा श्ुतम् ॥२०॥ स्वरके ज्ञान से परे गुह्य, स्वरके ज्ञानसे परे धन और स्वरके ज्ञानसे परे ज्ञान न देखा गया और न सुना गया है॥ २० ॥ शत्रुं हन्यात्स्वरबले तथा मित्रसमागमः । लक्ष्मीप्राप्तिः स्वरवले कीर्तिः स्वरबले सुखम् ॥२१॥ जो स्वरका बल होवे तो वैरी को मारडाले तथा मित्रों से मिलाप करे व स्वरवल के होने पर लक्ष्मी की पाप्ति होती है और जव स्वरका बल होता है तभी कीर्ति और सुख मिलता है ॥ २१॥ कन्याप्राप्तिः स्वरबले स्वरतो राजदर्शनम्। स्वरेण देवतासिद्धिः स्वरेण क्षितिपो वशः ॥२२॥ स्वरबल के होने पर कन्या की प्राप्ति (विवाह) होती है, स्वरसेही राजा का दर्शन होता है, स्वरसेही. देवता की सिद्धि मिलती है और स्वरसेही राजा वश होजाता है ॥ २२॥ स्वरेण गम्यते देशो भोज्यं स्वरबले तथा। लघुशङ्गां स्वरबले मलं चैव निवारयेत्॥ २३ ।। स्व्ररकेही वलसे देशको जाता है व स्व्रवलके होने पर भोजन मिलता है और स्व्र- चलके होतेही पेशाब और मलका त्याग करे ॥ २३॥ सर्वशास्त्रपुराणादिस्मृतिवेदाङ्गपूर्वकम्। स्वरज्ञानात्परं तत्त्वं नास्ति किञ्चिद्रानने ॥२४ ॥ अ्रहो बरानने ! समस्त शास्त्र, पुराण आदि, स्मृति और वेदाङ्गपूर्वक स्व्ररज्ञान से परे कुछ तत्त्र नहीं है॥ २४ ॥ नामरूपादिकः सर्वो मिथ्या सर्वेषु विभ्रमः । १ क्षिति पृथ्वीं पाति रक्षतीति क्षितिपः पृथ्वीनाथः॥ ५o सामुद्रिकशास्त्रस्य अ्रपज्ञानमोहिता मूढा यावत्तत्त्वं न विद्यते ॥ २५ ॥ तभीतक सर्वोंमें नाम रूपादिक सर्व विभ्रम मिथ्या है व तभीतक मूढलोग अज्ञान से मोहित रहते हैं जबतक तत्त्वका ज्ञान नहीं होता है॥२५॥ इदं स्वरोदयं शास्त्रं सर्वशास्त्रोत्तमोत्तमम् । आत्मघटप्रकाशार्थ प्रदीपकलिकोपमम् ॥२६॥ यह स्व्ररोदय शास्त्र समस्त उत्तम शास्त्रों में उत्तम है और आत्मारूपी घट के प्रकाशार्थ दीपक की कलिकाके समान है॥ २६॥ यस्मै कस्मै परस्मै वा न प्रोक़ं प्रश्नहेतवे। तस्मादेतत्स्वयं ज्ञेयमात्मनो वात्मनात्मनि॥२७॥ यह स्वरोदय प्रश्नके लिये जिस किसी से या पर से नहीं कहा गया है किन्तु अपने लिये अपनीही देह में अपनी बुद्धि से स्वयं जानना चाहिये।। २७ ॥ न तिथिर्न च नक्षत्रं न वारो ग्रहदेवता। न च विष्टिर्व्यतीपातो वैधृत्याद्यास्तथैव च ॥२८॥ इस स्वरोदय में तिथि, नक्षत्र, वार, ग्रह, देवता, भद्रा, व्यतीपात और वैधृति आदिकों का दोप नहीं विचारा जाता है ॥।२८॥। कुयोगो नास्तिको देवि भविता वा कदाचन। प्राप्ते स्वरबले शुद्धे सर्वमेव शुभं फलम् ॥ २६ ॥ अहो देवि ! इसमें कोई कुयोग नहीं है और न कभी होगा जब स्वर का शुद्ध बल आास होता है तब सारा फल शुभही होजाता है ॥। २६ ॥। देहमध्ये स्थिता नाड्यो बहुरूपाः सुविस्तरात्। ज्ञातव्याश्र बुधैर्नित्यं स्वदेहज्ञानहेतवः॥३० ॥ देह के मध्य में बड़े विस्तार से अनेक रूपवाली नाड़ियां स्थित हैं उन सबों को अपने देह के ज्ञानार्थ पछिडितों को सदैव जानना चाहिये ॥ ३० ॥ नाभिस्थानगकन्दोर्ध्वमङ्करादेव निर्गताः। द्विसप्ततिसहस्राणि देहमध्ये व्यवस्थिताः।३१॥ नाभिस्थानगामी कन्द के ऊपर अंकुर से ही निकली हुई बहत्तर हज़ार नाड़ियां देह के मध्य में स्थित हैं॥ ३१ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । पू१ नाडिस्था कुएडली शक्किर्भुजङ्गाकारशायिनी। ततो दशोर्ध्वगा नाड्यो दशैवाध:प्रतिष्ठिताः ॥३२॥ नाड़ी में टिकी व सर्पांकार के समान सोती हुई कुएडलिनी शक्ति है उससे ऊपर को गई हुई दश नाड़ियां हैं और दशही निचले भाग में प्रतिष्ठित हैं ॥ ३२॥ द्े दे तिर्यग्गते नाड्यौ चतुरविशतिसंख्यया। प्रधाना दशनाड्यस्तु दश वायुगवाहकाः ॥३३॥ दो दो नाड़ियां तिरछी गई हैं ये चौबीस नाड़ियां हैं उनमें दशनाड़ियां प्रधान हैं और दश नाड़ियां वायुको बहाती हैं।। ३३ ॥ तिर्यगूर्ध्वास्तथा नाड्यो वायुदेहसमन्विताः । चक्रवत्संस्थिता देहे सर्वाः पाएसमाश्रिताः ॥३४॥ तिरछी-ऊपर और नीचे स्थित और वायु व देह के आश्रित सारी नाड़ियां देह में टिकी हुई प्राण के अधीन रहती हैं ॥ ३४ ॥ तासां मध्ये दशश्रेष्ठा दशानां तिस्र उत्तमाः। इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयिका ॥ ३५ ॥ उन सब नाड़ियों मेंसे दश नाड़ियां प्रधान हैं और उन दशों में से इडा, पिकला और तीसरी सुपुन्ना ये तीनों उत्तम कहलाती हैं॥ ३५ ॥ गान्धारी हस्तिजिह्वा पूपा चैव यशस्विरिनी। अलम्बुषा कुहूश्रैव शद्धिनी दशमी तथा॥ ३६ ॥ चाहिये।। ३६॥ गान्धारी, हस्तिजिह्ा, पूषा, यशस्विरिनी, अपरलस्तुपा, कुहू और दशवीं शद्धिनी जानना इडा वामे स्थिता भागे पिङ्गला दक्षिण स्मृता। सुषुम्रा मध्यदेशे तु गान्धारी वामचक्षुपि॥ ३७।। वामभाग में इडानाड़ी स्थित है और दक्षिणभाग में पिङ़गला कही है तथा मध्यदेश में सुपुन्ना और वायें नेत्र में गान्धारी जानना चाहिये।। ३७ ।। दक्षिण हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णों च दक्षिण। यशस्विनी वामकर्णें आपरानने चाप्यलम्बुषा ॥३८॥ दाहिने नेत्रमें हस्तिजिह्वा व दाहिने कान में पूर्षा व वायें कानमें यशस्व्रिनी औरपर मुखमें अलम्तुषा रहती है।। ३८ ।। पूर सामुद्रिकशास्त्रस्य कुहूश्र लिङ्गदेशे तु मूलस्थाने तु शङ्गिनी। एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दश नाडिकाः ॥ ३६॥ लिङ्गदेशमें कुह और गुदास्थान में शङिनी जानना चाहिये इस पकार द्वारों का सहारा लेकर दश नाड़िकायें टिकी रहती हैं॥ ३६ ॥ इडा पिङ्गला सुषुम्ना च प्राणमार्गे समाश्रिताः। एता हि दश नाड्यस्तु देहमध्ये व्यवस्थिताः।४०।। इडा, पिडला, सुपुन्ना ये तीनों पराणमार्ग में आश्रित हैं ये दश नाड़ियां देहके मध्यमें स्थित हैं॥ ४० ॥ नामानि नाडिकानान्तु वातानां तु वदाम्यहम्। प्राणोऽपान: समानश्र उदानो व्यान एव च । ४१।। नाग: कूर्मोऽथ कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः। हृदि प्राणो वसेन्नित्यमपानो गुदमएडले॥ ४२ ॥ वातलनाड़ियों के नामों को मैं कहताहूं कि माणण, अपान, समान, उदान, व्यान, नाग, कूर्म, ककल, देवदत्त और धनञ्जय ये दश हैं उनमें से प्राणण हमेशा हृदयमें बसता है और गुदामएडल में अपान रहता है।। ४१। ४२॥ समानो नाभिदेशे तु उदान: कराठमध्यगः। व्यानो व्यापी शरीरेषु प्रधाना दश वायवः ॥४३॥ नाभिमएडल में समान, कएठमध्यगामी उदान और सर्वशरीरव्यापी व्यान कहाता है ये दशवायु प्रधान हैं॥ ४३ ॥ प्राणाद्याः पञ्च विख्याता नागाद्याः पञ्च वायवः। तेषामपि च पञ्चानां स्थानानि च वदाम्यहम् ॥ ४४ ॥ प्राणआ्रदि पांच विख्यात होचुके हैं अव नागादि जो पांच वायु हैं उन पांचों के स्थानों कोभी बतलाताहूं ॥ ४४॥ उद्गारे नाग आाख्यातः कूर्म उन्मीलने स्मृतः। कृकल: क्षुतकृज्ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भऐो ॥ ४५ ॥ उगलने में नाग, नेत्रों के उघाड़ने में कूर्म, छींकने में ककल और जँभाई लेने में देवदत्त कहलाता है॥। ४५ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनञ्जयः। एते नाडीषु सर्वामु भ्रमन्ते जीवरूपिणः ॥ ४६॥ सर्वव्यापी धनञ्जय पवन मृतक शरीर को भी नहीं त्यागता है ये दश पवन जीवरूपी हिकर सारी नाड़ियों में भ्रमते हैं ॥ ४६॥ प्रकट प्राणसंचारं लक्षयेद्देहमध्यतः। देहके वीचमें जो पकट प्राणोंका संचार होताहै उसको इडा, पिङ़गला और सुपुन्ना इन ीनों नाड़ियों सेही पणिडत को लखना चाहिये।। ४७ ॥ इडा वामे च विज्ञेया पिङ्गला दक्षिण स्मृता। इडानाडी स्थिता वामा ततो व्यस्ता च पिङ्गला ॥ ४८ ॥। वामभागमें इडा जानना चाहिये और दक्षिणभागमें पिङ्गला कहलाती है, इडा नाड़ी गमारूप से स्थित है और पिङ़ला व्यस्तरूप से रहती है ॥। ४८॥ इडायां तु स्थितश्चन्द्रः पिङ्गलायां च भास्करः। सुषुम्रा शम्भुरूपेण शम्भुर्हसस्वरूपतः ॥ ४६ ॥ इडानाड़ी में चन्द्रमा स्थित है व पिङला नाड़ी में सूर्य टिकाहै और सुपुम्ना शम्भुरूप से रहती है और शम्भु हंसरूपसे स्थित है।। ४६ ॥ हकारो निर्गमे प्रोक्त: सकारेण प्रवेशनम्। हकारः शिवरूपेण सकारः शक्तिरुच्यते॥५० ॥ श्वास के निकलने में हकार कहा है और सकार से श्वासका प्रवेश होता है और हकार शिवरूप से रहता है व सकार शक्किरूप कहाती है॥। ५० ॥ शक्किरूपः स्थितश्चन्द्रो वामनाडीप्रवाहकः। दक्षनाडीप्रवाहश्च शम्भुरूपो दिवाकरः ॥५१ ॥ वामनाड़ीका चलानेवाला चन्द्रमा शक्तिरूप से स्थित है और दक्षिण नाड़ीका वहाने वाला सूर्य शम्मुरूप से टिकारहता है॥५१॥ श्वासे सकारसंस्थे तु यद्दानं दीयते बुधैः। तद्दानं जीवलोकेस्मिन्कोटिकोटिगुणं भवेत् ॥ ५२ ॥ जव श्वास सकार में टिकता है तब पसिडतों करके जो दान दियाजाता है वह दान इस जीवलोक में करोड़ का करोड़गुण्ण फलदायक होता है॥ ५२ ॥ ५.४ सामुद्रिकशास्त्रस्य अ्नेन लक्षयेद्योगी चैकचित्तः समाहितः। सर्वमेव विजानीयान्मार्गे वै चन्द्रसूर्ययोः॥५३॥ सावधान व एकाग्रचित्त होता हुआ योगी इसी मार्ग से देखे और चन्द्रमा व सूर्यकी मार्गमें ही सबको जानलेवे ।। ५३॥ ध्यायेत्तत्वं स्थिरे जीवे अस्थिरे न कदाचन। इष्टसिद्धिर्भवेत्तस्य महालाभोजयस्तथा ॥ ५४॥ जब जीव स्थिर होजावे तो मनुष्य तत्वका ध्यान करे और जब स्थिर न होवे तो क- दापि ध्यान न करे उसके इष्टकी सिद्धि होती है और महालाभ तथा जय होताहै ॥ ५४॥ चन्द्रमूर्यसमभ्यासं ये कुर्वन्ति सदा नराः। अतीतानागतज्ञानं तेषां, हस्तगतं भवेत्॥ ५५ ॥ जो मनुष्य सदैव चन्द्र व सर्यके स्वरोंका भेलीभांति अभ्यास करते हैं उनको भूत- भविष्य का ज्ञान प्रत्यक्ष भासने लगता है॥ ५५ ॥ वामे चामृतरूपा स्याजजगदाप्यायनं परम्। दक्षिण चरभागेन जगदुत्पादयेत्सदा॥ ५६॥ वामभाग में इडानाड़ी अमृतरूप होकर जगत् को परम पोषण करती है और दक्षियभाग में चरभाग से पिङ्गलानाड़ी सदैव जगत् को उपजाती है॥ ५६॥ मध्यमा भवति क्रूरा दुष्टा सर्वत्र कर्मसु। सर्वत्र शुभकार्येषु वामा भवति सिद्धिदा॥ ५७ ॥ मध्यमा (सुपुन्ना.) नाड़ी कठोर होकर सवकामों में निन्दित कहलाती है और वामा नाड़ी सब शुभकार्योंमें सिद्धिदायक होती है॥५७ ॥ निर्गमे तु शुभा वामा प्रवेशे दक्षिणा शुभा। चन्द्रः समस्सुविज्ञेयो रविस्तु विषमः सदा ॥५८॥ गमन के समय वामा नाड़ी और प्रवेश के समय दक्षिण (पिङ्रला) नाड़ी शुभदायक कहाती है और चन्द्रमा को सम व सूर्यको विषम सदैव जानना चाहिये॥ ५८॥ चन्द्रः स्त्री पुरुषः सूर्यश्चन्द्रो गौरोसितो रविः। चन्द्रनाडीप्रवाहेण सौम्यकार्याणि कारयेत्॥ ५.६ ॥। चन्द्रमा स्त्रीसंश्ञक और सूर्य पुरुपसंक्ञक कहाजाता है, चन्द्रमा गौरवर्स और सूर्य उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । यामवर्ण कहलाते हैं और जब चन्द्रमाकी नाड़ी का प्वाह होता हो उस समय सौम्य कायों को करावे॥ ५६॥ मूर्यनाडी प्रवाहेण रौद्रकर्माणि कारयेत्। सुषुम्रायाः प्रवाहेण भुक्किमक्किफलानि च ॥ ६०॥ जब सूर्यकी नाड़ीका पवाह होता हो उससमय रौद्रकर्मों (उग्रकामों) को करे और तव सुपुन्ना नाड़ीका स्वर बहता हो तो भुक्ति-मुक्किदायक कमों को करना चाहिये ॥ ६० ॥ ादौ चन्द्रः सिते पक्षे भास्करो हि सितेतरे। प्रतिपत्तो दिनान्याहुस्त्रीणि त्रीणि कृतोदयौ ॥ ६१ ॥ शक्कपक्ष में पहले चन्द्रमा का स्वर और कृष्णपक्ष में पहले सुर्यका स्वर चलता है औरौर परेवासे लेकर तीन २ दिन चन्द्रमा व सूर्यका स्वर बलवान् होता है॥ ६?॥ सार्धद्विघटिके ज्ञेय: शुक्के कृष्णे शशीरविः। वहत्येकदिनेनैव यथा पष्टिघटीःकरमात् ॥ ६२॥ ढाईढाई २३ घटी शुक्कपक्ष में चन्द्रमा और ढाईढाई २३ घटी कृष्णपक्ष में सूर्य एकदिनमें गाठ्यटी पर्यन्त बहते हैं अरथात् दोनों स्वरों की क्रमसे चौबीस २ आदृत्तियां होती हैं ॥ ६२॥ वहेयुतद्घटीमध्ये पञ्च तत्त्वानि निर्दिशेत्। प्रतिपत्तो दिनान्याहुर्विपरीते विवर्जयेत्॥६३॥ उन मत्येक ढाई २३ घटियों में पांचों तच्तों को कहे और प्रतिपदा से लेकर जो बन्द्रमा व सूर्य के दिन कहे हैं उनसे विपरीत होयँ यानी चन्द्रमा के स्वर में सूर्यका और सूर्यके स्वर में चन्द्रमा का स्वर चले तो उसको वर्ज देना चाहिये क्योंकि वह अशुभ- दायक कहा जाता है॥ ६३ ॥ शुक्कपक्षे भवेद्धामा कृष्णपक्षे च दक्षिणा। जानीयात्प्रतिपत्पूर्वां योगी तद्यतमानसः ॥ ६४॥ शुक्कपक्ष में परेवा से लेकर पहले वामा नाड़ी और कृष्णपक्ष में दक्षिणा नाड़ी को एकाग्रमनवाला योगी जाने ।। ६४ ॥ शशाङ्कं वारयेद्रात्रौ दिवावारयभास्करम्। इत्यभ्यासरतो नित्यं स योगी नात्र संशयः ॥६५॥ रात्रिके समय चन्द्रस्वर को और दिनमें सूर्यस्वरको वजिदेवे इस भांति सदैव अभ्यास मं लगा हुआ वह निस्सन्देह योगी कहलाता है॥ ६५ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य सूर्येण बध्यते सूर्यश्रन्द्रश्चन्द्ेण वध्यते। यो जानाति क्रियामेतां त्रैलोक्यं वशगं क्षणात् ॥ ६६ ॥ सूर्यंके स्वर से सूर्य और चन्द्रमा के स्वर से चन्द्रमा बन्द किया जाता है इस क्रिया को जो मनुष्य जानता है उसके वश में त्रैलोक्य क्षणमात्र में आ जाता है॥ ६६ ॥। उदयं चन्द्रमार्गेण सूर्येणास्तमनं यदि। तदा ते गुणसंघाता विपरीतं विवर्जयेत्॥ ६७ ॥ यदि चन्द्रमा के स्वरमें सूर्यका उदय हो और सूर्यके स्वर में अ्स्त हो तो उस समय अ्रनेक गुणों के समुदाय पैदा हो जाते हैं इससे उलटा हो तो उसको वर्जिदेना चाहिये।६७।। गुरुशुकबधेन्दूनां वासरे वामनाडिका। सिद्धिदा सर्वकार्येषु शुक्कपक्षे विशेषतः ॥ ६८॥ बृहस्पति, शुक्र, बुध और सोम इन वारों में वामा नाड़ी सवकार्यों में सिद्धिदायक होती है और शुक्कपक्ष में विशेषता से फलदायक होती है॥ ६८ ॥ अर्काङ्वारकसौरीणां वासरे दक्षनाडिका। स्मर्तव्या चरकार्येषु कृष्णापक्षे विशेषतः ॥ ६६ । सूर्य, मङल, शनैश्रर इन वारों में दक्षिण नाड़ी चर कार्यों में स्मरण करना चाहिये और कृष्णापक्ष में विशेषता से स्मरणीय है॥ ६६॥ प्रथमं वहते वायुर्द्वितीयं च तथानलः । तृतीयं वहते भूमिश्चतुर्थ वारुणी वहेत्॥ ७० ॥ पहले वायुतत्व बहता है दूसरी वार अग्नितत्व व तीसरीवार भूमितत्त्व व चौथीवार जलतत्व और पांचवींवार आकाशतत्त्व वहता है॥। ७० ॥ सार्धद्विघटिके पञ्च क्रमेणोदयन्ति च। क्रमादेकैकनाड्यां च तत्त्वानां पृथगुद्गवः ।७१।। ढाईघड़ी के समय में पूर्वोक्क पांचों तत्त्व क्रम से उदय करते हैं और एक २ नाड़ी में भी क्रम से पृथक् पांचों तत्त्वों का उदय होता है। ७१॥ अहोरात्रस्य मध्ये तु ज्ञेया द्ादशसंक्रमाः। वृषकर्कटकन्यालिमृगमीना निशाकरे॥ ७२॥ दिन और रात्रिके मध्य में चन्द्रमा व सूर्य की बारह संक्रान्तियां कहलाती हैं उनमें वृप, कर्क, कन्या, व्रथ्िक, मकर और मीन ये चन्द्रमा की संक्रान्तियां होती हैं॥ ७२॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । मेषसिंहौ च कम्भश्र तुला च मिथुनं धनम्। उदये दक्षिणे ज्ञेय: शुभाशुभविनिर्णयः॥७३॥ भेप, सिंह, कुम्भ, तुला, मिथुन और धन ये सूर्य की संक्रान्तियां जाननी चाहियें इस भांति उदय व दक्षिण में शुभाशुभका निर्णय जानना चाहिये ॥। ७३॥ तिष्ठेत्पूर्वोत्तरे चन्द्रो भानु: पश्चिमदक्षिण। दक्षनाड्या: प्रसारे त न गच्छेद्याम्यपश्रिमे।७४॥ पूर्व व उत्तर में चन्द्रमा टिकता है और पश्चिम व दक्षिण में सर्य रहता है और दक्षिण नाड़ी के ग्रवाह (स्वर) में दक्षिण व पश्चिम में न जावे ।। ७४॥ वामाचारप्वाहे तुन गच्छेत्पूर्व उत्तरे। परिपन्थिभयं तस्य गतोऽसौ न निवर्तते॥७५॥ वामानाड़ी के प्रचार में पूर्व और उत्तर में न जावे यदि जावे तो उसको वैरियों से पय होती है और गया हुआ वह फिर लौटकर नहीं आता है।। ७५॥। तत्र तस्मान्न गन्तव्यं बुधैः सर्वहितैषिभिः। तदा तत्र तु संजाते मृत्युरेव न संशयः॥७६ ॥ इसलिये वहां पर सर्वहितैपी परिडतों को नहीं जाना चाहिये और यदि, उस समय वहां पर जावें तो मौत के होनेमें संदेह नहीं होती है॥ ७६॥ शुक्कपक्षे द्वितीयायामर्के वहति चन्द्रमाः । दृश्यते लाभदः पुंसां सौम्ये सौख्यं प्रजायते ॥७७॥ यदि शुक्कपक्षकी द्वितीया के दिवस सूर्यके प्रवाह में चन्द्रमा बहता हो तो पुरुषों को लाभदायक देखा जाता है और यदि सौम्यकार्य किया, जावे तो सौख्य उपजाता है।७७॥ सूर्योदये यदा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रोदये भवेत्। सिध्यन्ति सर्वकार्याणि दिवरात्रिगतान्यपि॥७८॥ जिस समय सूर्य के उदय में सूर्य और चन्द्रमा के उदय में चन्द्रमा का ही स्वर बहता हो उस समय दिन व राति में किये हुए सब काम सिद्ध हो जाते हैं॥ ७८॥ चन्द्रकाले यदा सूर्य: सूर्यश्चन्द्रोदये भवेत्। उद्देग: कलहो हानिः शुभं सर्व निवारयेत्॥७६॥ १ "उद्लेग उदूसनमे" (इत्यमर:) ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जबकि चन्द्रमा के समय में सर्य और सूर्य के समय में चन्द्रमा होय तब चिन्ता, लड़ाई और हानि होती है और सारे शुभकामों की निवृत्ति हो जाती है॥ ७६ ॥ सूर्यस्य वाहे प्रवदन्ति विज्ञा ज्ञानं ह्यगम्यस्य तु निश्चयेन। श्वासेन युक्कस्य तु शीतरश्मेः प्रवाहकाले फलमन्यथा स्यात्॥ ८० ॥ सूर्य के प्वाह में विज्ञलोग अगम्य वस्तुका ज्ञान निश्चयकर बतलाने हैं और श्वासयुक् चन्द्रमा के पत्राहकाल में फल अन्यथा हो जाता है॥। ८० ॥। अथ चिपरीतलक्षगाम्- यदा प्रत्यूपकालेन विपरीतोदयो भवेत्। चन्द्रस्थाने वहत्यर्को रविस्थाने च चन्द्रमाः ।।८१।। जब पभातकाल से ही विपरीिस्वरों का उदय होता है यानी चन्द्रमा के स्थानमें सूर्य और सर्य के स्थान में चन्द्रमा बहता है ।। ८१ ॥। प्रथमे मनउद्धेगं धनहानिर्द््धवितीयके। तृतीये गमनं प्रोक्रमिष्टनाशं चतुर्थके॥। =२ ।। प्रथम में मनका उद्देग (घवराहट) होती है दूसरे में धन की हानि होती है तीसरे में गमन कहा है और चौथे में इष्टका विनाश हो जाता है॥। =२ ।। पञ्चमे राज्यविध्वंसं षष्ठे सर्वार्थनाशनम्। सप्मे व्याधिदुःखानि अष्टमे मृत्युमादिशेत्॥।=३॥ पांचवें में राज्य का विध्वंस, छठे में समस्त अर्थों का नाश, सातनें में व्याधि औरर दुःख होते हैं और आठनें में मौत को कहना चाहिये ।। = ३॥ कालत्रये दिनान्यष्टौ विपरीतं यदा वहेत। तदा दुष्टफलं प्रोक्कं किञ्चिन्न्यूनं तु शोभनम् ॥८४॥ प्रातःकाल, मध्याह्वकाल और साथकाल इन तीनों कालों में यदि आठ दिन पर्यन्त वरावर विपरीत स्वर बहता रहे तो अशुभ फल कहा है और यदि कुछेक कम विपरीत चले तो शुभफल जानना चाहिये।। =४।। प्रातर्मध्याह्नयोश्चन्द्रः सायंकाले दिवाकरः। तदा नित्यं जयो लाभो विपरीतं विवर्जयेत् ॥८५॥ जिसदिन पातःकाल व मध्याहसमय चन्द्रमाका स्वर और सायकाल में सर्यका स्वर चलना हो तो नित्यही जय व लाभ होता है और यदि विपरीत चले तो वर्जिदेवे॥दश।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क:। वामे वा दक्षिणे वापि यत्र संक्रमते शिवः। कृत्वा तत्पादमादौ च यात्रा भवति सिद्धिदा ॥८ ६ ॥ यात्रा के समय बायां या दांयां जो स्वर चलता हो उसी पैर को पहले आगे धरकर यात्रा करे तो वह यात्रा सिद्धिदायक होती है॥ =६ ॥ चन्द्रः समपद: कार्यो रविस्तु विषमः सदा। पूर्णपादं पुरस्कृत्य यात्रा भवति सिद्धिदा ॥८७॥ यदि चन्द्रमा का स्वर चलता हो तो समपद २-४-६ आदि आगे रखना चाहिये और वदि सूर्यका स्वर बहता हो तो विपमपद १-३-५ आदि सदैव आगे रखना इस मांति सूर्णपादको आरागे धरकर यात्रा करे तो सिद्धिदायक होती है॥ ८७॥ यत्राङ्गे वहते वायुस्तदङ्गकरसंतलात। सुप्तोत्थितो मुखं स्पृष्टा लभते वाञ्छितं फलम् ॥ ८८॥ जिस अङ्गमें वायु बहता हो उसी अङ्गके करतल से शयन से उठाहुआ मनुष्य मुखका पर्श करे तो वाञ्छित फलको पाताहै॥। ८द ॥ परदत्ते तथा ग्राह्ये गृहान्निर्गमनेऽपि च। यदङ्के वहते नाडी ग्राह्यं तेन कराङमिया॥=६॥ दूसरे को दानदेने या ग्रहण करने में या घरसे बाहर जाने में जिस अड्गकी नाड़ी लती हो उसी हाथ या पैर से वस्तु को पकड़ लेना चाहिये॥ ८६॥ न हानि: कलहो नैव कराटकैर्नापि भिद्यते। निवर्तते सुखी चैव सर्वोपद्रववर्जितः ॥६० ॥ तो न हानि हो न कलह हो और न शत्रुओं से भेदन कियाजावे और वह सुखी होकर सव उपद्रवों से रहित होताहुआ निष्टत्त होजाता है ॥ १० ॥ गुरुबन्धुनृपामात्येष्वन्येषु शुभदायिनी। पूर्णाङ्गे खलु कर्तव्या कार्यसिद्धिर्मनःस्थिता॥६१ ॥ गुरु, वान्धव, राजा, मन्त्री व अन्य महन्तलोगों से यदि शुभदायक कार्यकी सिद्धि बाहता हो तो पूर्णहाथ से करनी चाहिये यानी हाथमें कोई फल आदि वस्तु को लेकर पूर्वो्त लोगों के पास जावे तो मनवाञ्छित सिद्धि को पाताहै। ६१ ॥ अग्निचौराधर्मधर्मा अन्येषां वादिनिग्रहः। कर्तव्या: खलु रिक्कायां जयनाभमुखार्थिमिः॥६२॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य यदि अग्निदाह-चौरकर्म-अधर्मकार्य-धर्मकार्य तथा अन्य व सुखके अभिलापी लोगों के वादी को दएड देना चाहे तो खाली हाथ सेही जय, लाभ, जनों को कार्यसिद्धि करनी चाहिये । ६२।। दूरदेशे विधातव्यं गमनं तु हिमदुतौ। अभ्यर्णदेशे दीसे तु तरणाविति केचन ॥ ६ ३ ।। कितेक आचार्य ऐसा कहतेहैं कि यदि दूरदेश में गमन करना चाहे तो चन्द्रमा के स्वर में चलाजावे और यदि समीप देशमें जानाचाहे तो सूर्य के स्वर में जावे।। ६३ ॥ यत्किश्चित्पूर्वपुद्दिष्टं लाभादिसमरागमः । •तत्सवं पूर्णनाडीषु जायते निर्विकल्पकम् ॥६४॥ होता है।। ६४ ।। जो कुछ लाभादि व युद्धागम पहले कहागया है वह सब पूर्णनाड़ियों मेंही निस्सन्देह शून्यनाड्या विपर्यस्तं यत्पूर्वं प्रतिपादितम्। जायते नान्यथा चैव यथा सर्वज्ञभापितम्॥ ६५ ॥ पहले कहाहुआ शून्यनाड़ी का जो उलटा फल है वह अन्य भांति का नहीं होता है जैसेकि शिवजी ने कहाहै॥ ६५ ॥ व्यवहारे खेलोचाटे द्वेषि विद्यादिवञ्चके। कुपितस्वामिचौराधे पूर्णास्था: स्युर्भयंकराः॥६६ ।। व्यवहार, खलोंका उच्वाटन,वैरी, विद्याआदि से ठगना, स्वामी का कोप और चौरआदि क्रूर कामों में पूर्णस्वर भयकारक होते हैं ॥ ६६ ॥ दूराध्वनि शुभश्चन्द्रो निर्विप्नोभीष्टसिद्धिदः । प्रवेशकार्यहेतौ च सर्यनाडी प्रशस्यते॥६७॥ जो मनुष्य दूरमार्ग में जाना चाहे तो उसको चन्द्रमा का स्वर शुभदायक होताहुआ निर्विघ्नता से अभीष्ट सिद्धिका देनेवाला होता है. और प्रवेश कार्य में सूर्य की नाड़ी प्रशस्त होती है।। ६७ ।। अयोग्ये योग्यता नाड्या योग्यस्थाने ऽप्ययोग्यता। कार्यानुबन्धनो जीवो यथा रुद्रस्तथा चरेत्॥। ६८ ।। अयोग्य कार्य में नाड़ी की योग्यता और योग्यकार्य में अयोग्यता को कार्य का अनुबन्धी १ "सर्पः फ्ूरः खलः कूरः सर्पांत्कूरतरः खलः। सर्प एकाकिनं हन्ति सलः सर्वविनाशकृत" उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । जीव प्राप्त होता है इसलिये जैसा स्वर बहता हो वैसाही मनुष्य आचरण करे॥ ६८ ॥ चन्द्राचारे विषहते सूर्यो बलिवशं नयेत। सुषुम्नायां भवेन्मोक्ष एको देवस्त्रिधास्थितः ॥ ६६॥ चन्द्रमा का स्वर चले तो मनुष्य किसीके किये अपराध को भी सहलेता है और वदि सूर्य का स्वर चलताहो तो बलवान् को भी वश में लासका है और यदि सुपुन्ना ताड़ी का स्वरहो तो मोक्ष होता है इसभांति एकदेव (स्वर) तीन प्रकार से स्थित हता है।। ६६ । शाभान्यशुभकार्याणि क्रियन्तेऽहर्निशं यदा। तदा कार्यानुरोधेन कार्यं नाडीप्रचालनम्॥ १००॥ जिस समय दिनरात शुभ व अशुभकार्य किये जाते हैं उससमय कार्य के अनुसार नाड़ी हो चलाना चाहिये॥ १०० ॥ अथ इडा। स्थिरकर्मराय लंकारे.दूराध्वगमने तथा। आश्रमे धर्मगासादे वस्तूनां संग्रहेऽपिच॥१॥ स्थिरकार्य, अलद्कार (गहना), दूरमार्ग में चलना, आश्रम, धर्ममन्दिर और वस्तुओं संचय करने में भी ॥ १ ॥ वापीकूपतडागादिप्रतिष्ठा स्तम्भदेवयोः । यात्रा दाने विवाहे च वस्त्रालंकारभूषणे॥ २।। वावड़ी,कुँवां, तालाब, देवता व स्तम्भ की प्रतिष्ठा, यात्रा, दान, विवाह, वस्त्र, अल- हार और भूषण में ॥ २ । शान्तिके पौष्टिके चैव दिव्यौषधिरसायने। स्वस्वामिदर्शने मित्रे वाणिज्ये कणसंग्रहे॥३॥ शान्तिकर्म, पौष्टिक कार्य, दिव्यौष रसायनअपने स्वामी का दर्शन, मित्र, व्यापार और धान्यसंग्रह में ॥ ३ ॥ गृहपवेशे सेवायां कृषौ च बीजवापने। शुभकर्मि सन्धौ च निर्गमे च शुभः शशी॥४॥ रहमवेश, सेवा, खेती, बीजका वोना, शुभकर्म, सन्धि और गमन इनमें चन्द्रमा का नर शुभदायक होता है॥। ४ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य विद्यारम्भादिकार्येषु बान्धवानां च दर्शने। जन्ममोक्षे च धर्मे च दीक्षायां मन्त्रसाधने।। ५॥ विद्यारम्भ आदि कार्य, बान्धवों का दर्शन, जन्म, मोक्ष, धर्मकृत्य, यज्ञादिकों की दीक्षा और मन्त्रसिद्धि में इडानाड़ी शुभदायक होती है॥ ५ ॥ कालविज्ञानसूत्रे तु चतुष्पादगृहागमे। कालव्याधिचिकित्सायां स्वामिसम्बोधने तथा॥ ६ ॥ काल व विज्ञान की सूचना, पशुओं का घरमें आना, काल व व्याधि की चिकित्सा और स्वामीका बुलाना इनमें चन्द्रमा का स्वर शुभदायक होता है॥ ६ ॥ गजाश्वारोहणे धन्विगजाश्वानां च बन्धने। परोपकरणे चैव निधीनां स्थापने तथा ॥।७॥। हाथी व घोड़े की सवारी, धनुषका धारना, हाथी व धोड़े का बांधना, परोपकार करना और ख़ज़ाना का स्थापन करना इनमें इडा शुभदायक होती है।। ७। गीतवाद्यादिनृत्यादौ नृत्यशास्त्रविचारणे। पुरग्रामनिवेशे च तिलकक्षेत्रधारणे ॥ ८ ॥ गाना, बजाना आदि, नाचना आदि, नृत्यशास्त्र का विचार, पुर व ग्राम का प्रवेश, तिलक और क्षेत्र के धारने में चन्द्रनाड़ी का स्वर शुभदायक होता है॥ ८ ॥ आर्तिशोकविषादे च ज्वरिते मूर्च्छितेपि वा। स्वजनस्वामिसम्बन्धे अ्रन्नादेर्दारुसंग्रहे॥ ६॥ रोग, शोक, विपाद (उदासी) ज्वर, मूर्च्छा, अपने जन व स्वामी के सम्बन्ध में और अन्नआदि तथा काग्टसंचय में भी चन्द्रनाड़ी शुभदायक होती है।। ६।। स्त्रीणां दन्तादिभूषायां वृष्टेरागमने तथा। गुरुपूजाविषादीनां चालने च वरानने ॥ १० ॥ स्त्रियों के दांत आदिका भूपण, वर्षा का आगमन2 गुरुपूजा और विषआदिकों के चलाने यानी निकालने में हे वरानने ! चन्द्रनाड़ी शुभदायक कहलाती है॥ १०॥ इडायाँ सिद्धिदं प्रोक्कं योगाभ्यासादिकर्म च। तन्नापि वर्जयेदायुं तेज आकाशमेव च॥ ११॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङः । चन्द्रनाड़ी में योगाभ्यास आदि कर्म सिद्धिदायक कहाहै वहांभी जब वायु-अग्नि और आकाश तत्त्व वहतेहों तब योगाभ्यासादिकों को वर्जिदेवे॥ ११॥ सर्वकार्याणि सिध्यन्ति दिवारात्रिगतान्यपि। सर्वेषु शुभकार्येषु चन्द्रचारः प्रशस्यते ॥ १२॥ दिन व रात्रि में कियेहुए सवकाम चन्द्रनाड़ी में सिद्ध होते हैं और सारे शुभकामों में चन्द्रमा का चार प्रशस्त होता है यानी सर्वोत्तम गिना जाता है॥ १२ ।। अथ पिङ्गला । कठिन क्ूरविद्यानां पठने पाठने तथा। स्ररीसंगवेश्यागमने महानौकाधिरोहणे॥ १३ ॥ कठिन व क्रूरकर्म मारणआ्दि कृत्य, विद्याओं का पढना, पढ़ाना, स्त्रीसमागम, वेश्या- गमन और जहाज़ में चढ़ना इनमें पिझ़लानाड़ी शुभदायक होती है ॥ १३॥ भ्रष्टकार्ये सुरापाने वीरमन्त्राछपासने। विह्वलोद्ध्वंसदेशादौ विषदाने च वैरिणाम् ॥ १४ ॥ भ्रष्टकार्य, मद्यपान, वीरमन्त्रआदि की उपासना, विहलहोना, देश आदिकों का विध्वंस होजाना और शब्रुओं को विप देना इनमें सूर्यका चार शुभदायक होता है ॥ १४ ॥ शास्त्राभ्यासे च गमने मृगया पशविक्रये। इष्टिकाकाष्ठपाषाएरत्घर्षणदारणे॥ १५॥ शाख्त्रोंका अभ्यास, ग्रामान्तर का गमन, शिकारखेलना, पशुओंका बेंचना, ईट-काठ- पत्थर और रत्ोंका घिसना व तोड़ना इनमें पिङ्गला शुभदायक होती है॥ १५॥ गत्यभ्यासे यन्त्रतन्त्रे दुर्गपर्वतरोहणे। ध्यूते चौर्ये गजाश्वादिरथसाधनवाहने ॥ १६ ॥ चलने का अभ्यास, यन्त्र, तन्त्र, किला व पर्वत पर चढ़ना, जुआखिलना, चोरी करना, हाथी, घोड़ा, वैल और रथका साधना व चलाना इनमें सूर्य का चार शुभदायक होता है॥ १६ ॥ व्यायामे मारणोचाटे षट्कर्मादिकसाधने। यक्षिणीयक्षवेतालविषभूतादिनिग्रहे॥ १७॥ व्यायाम (कसरतकरना) मारण व उच्चाटन आदि पदकर्मों का साधना यक्षिणी, यक्ष, बवाल, विप औप्रर भृत त्र्प्रादिकों का रोकना इनमें पिङ्ललानाड़ी शुभदायक होती है ॥ १७ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य खरोष्ट्रमहिषादीनां गजाश्वारोहणे तथा। नदीजलौघतरणे भेषजे लिपिलेखने ॥ १८॥ गधा, ऊंट, मैंसादि, हाथी व घोड़ा पर चढ़ना और नदी के जलसमूह को तैरना या पार होना, दवाई करना, लीपना और लिखना इनमें सूर्यका स्वर शुभदायक होताहै॥। १८॥ मारणे मोहने स्तम्भे विद्ेषोचाटने वशे। प्रेरणे कर्षणो क्षोभे दाने च क्रयविक्रये ॥ १६॥ मारण, मोहन, स्तम्भन (रोकदेना), विद्वेपण, उच्चाटन, वशीकरण, मेरण, खेतीकरना, क्षोभ, दान, खरीदना और वेंचना इनमें सूर्यका चार उत्तम होता है। १६ ॥ प्रेताकर्षणविद्वेषशत्रुनिग्रहणेपि च। खङ्गहस्ते वैरियुद्धे भोगे वा राजदर्शने॥ भोज्ये स्नाने व्यवहारे दीप्कार्ये रविः शुभः॥२०॥ प्रेतोंका बुलाना, वैर, वैरियों को वशमें लाना, तलवार को हाथ में लेना, वैरियों से लड़ना, भोग, राजदर्शन, भोजन, स्नान, व्यवहार और दीप्कार्य में सूर्यका स्वर शुभदायक कहा है॥। २० ।। भुक्कमार्गेण मन्दाग्नौ स्त्रीणां वश्यादिकर्मणि। शयनं सूर्यवाहेन कर्तव्यं सर्वदा बुधैः ॥२१॥ भोजनकी मार्ग से मन्दाग्नि का होना, स्ति्रियों को वशीकरण आदि करना और सोना ये सब काम परिडतों को सुर्यस्वर के चलते समय मेंही करना चाहिये ॥ २१॥ क्रूराणि सर्वकर्माि चराषि विविधानि च। तानि सिध्यन्ति सूर्येष नात्र कार्या विचारण ॥ २२ ॥ समस्त कउिन काम और अनेक चर काम वे सूर्य के स्वर सेही सिद्ध होते हैं इसमें विचार नहीं करना चाहिये ॥ २२॥ अथ सुपुन्ना ।I क्षणं वामे क्षणं दक्षे यदा वहति मारुतः। सुषुम्रा सा च विज्ञेया सर्वकार्यहरा स्मृता।। २३।। जिस समय वायु क्षणभर वामभाग में और क्षणभर दाहिने भाग में बहती हो वह सुपुन्ना जानना चाहिये जोकि सर्वकार्यों की हरनेहारी कही है ॥ २३ ॥ १ पवनः २ कथिता॥ उत्तरार्द्धें द्वितीयाङ्क: । तस्यां नाड्यां स्थितो वहिर्ज्वलते कालरूपकः। विषवन्तं विजानीयात्सर्वकार्यविनाशनम्॥२४॥ उस नाड़ी में टिकी हुई आगी कालरूप होकर जलती है उसको विपवाली व सर्वकार्य विनाशनेवाली जानना चाहिये ॥। २४॥ यदानुक्रेममुल्लङ्कय यस्य नाडीद्वयं वहेत। तदा तस्य विजानीयादशुभं नात्र संशयः ॥२५॥ जिस समय अपने २ स्वाभाविक क्रमका उल्लङ्न कर जिस पुरुष की दोनों नाड़ी चहती हों तो उसको अशुभ जानना चाहिये इसमें सन्देह नहीं है॥ २५॥। क्षणं वामे क्षणं दक्षे विषमं भावमादिशेत। विपरीतं फलं सर्वं ज्ञातव्यं च वरानने ॥ २६॥ क्षणभर वामभाग व क्षणभर दाहिनेभाग में पवन चले उसको विषमभाव कहै अहो रानने ! उसका सारा फल विपरीत (उलटा) जानना चाहिये॥ २६॥ उभयोरेव संचारं विषवन्तं विदुर्वुधाः। न कुर्यात्क्रूरसौम्यानि तत्स्वं विफलं भवेत् ॥ २७ ॥ इडा व पिझला दोनों नाड़ियों केही संचारको पणडतलोग विपवान् कहतेहैं उसमें क्रूर सौम्यकार्यों को न करे यदि करे तो वह सारे काम विफल होजाते हैं॥
सृष्टिक्रमं (Part 2)
२७॥ जीविते मरणे प्रश्ने लाभालाभे जयाजये। विषमे विपरीते च संस्मरेज्जगदीश्वरम्॥२८॥ जीने, मरने, पूछने, लाभ, अलाभ, जय, पराजय और विपम व विपरीत स्वर के वलने में जगदीश का स्मरण करे॥ २८॥ ईश्वरे चिन्तिते कार्यं योगाभ्यासादि कर्म च। अन्यत्तत्र न कर्तव्यं जयलाभसुखैषिभिः॥२६॥ जब ईश्वर का चिन्तन करे उस समय योगाभ्यास आदि कर्मही करना चाहिये वहां सर जय, लाभ व सुख के अभिलाषी जनोंको और कोई काम करना उचित नहीं है।।२६।। सूर्येण वहमानायां सुषुम्नायां मुहुर्मुहुः। शापं दद्यादरं दद्यात्सर्वथैव तदन्यथा॥३०॥ "आनुपूर्वीख्त्यां वा वृत् परिपाटी अनुकमः" (इत्यमर:) ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जब सुषुन्ना नाड़ी सर्यके स्वर से वारम्बार बहती हो तब जो शाप या वरको देवे वह सर्वथा अन्यथा (भूंठा या उलटा) हो जाता है॥ ३० ॥ नाडीसंक्रमणे काले तत्त्वसंगमनेपि च। शुभं किश्चिन्न कर्तव्यं पुरायदोनादिकानि च ॥ ३१॥ नाड़ी के संक्रमणकाल और तत्वों के संचलन में भी कुछ पुायदान आदि शुभकर्म नहीं करना चाहिये ।। ३१ ॥। विषमस्योदयो यत्र मनसापि न चिन्तयेत्। यात्रा हानिकरी तस्य मृत्युः क्वेशो न संशयः ॥३२॥ जिस समय विषमस्वर का उदय हो तब मनसे भी किसी कार्य की चिन्तना न करे यदि करे तो उस मनुष्य की यात्रा हानिकारिणी होती है और पृत्यु और पीड़ा निस्सन्देर होती है।। ३२ ।। पुरो वामोर्ध्वतश्चन्द्रो दक्षाघः पृष्ठतो रविः। पूर्णरिक्कविवेकोयं ज्ञातव्यो देशिकैःसदा॥३३ ॥ जव चन्द्रमा का स्वर बहता हो उस समय आगे, वायें व ऊपरले भाग में खड़ा हुआ प्रष्टा प्रश्न करे तो वह पूर्ण होता है और जब सूर्य का स्वर चले उस समय पूछने वाला दाहिने, निचले या पीठ के पीछे आनकर पूछे तो वह भूंठा हो जाता है यह पूर्ण रिक्र-(खाली) का विचार पणिडतों को सदैव जानना चाहिये।। ३३ ॥ ऊर्ध्ववामाग्रतो दूतो ज्ञेयो वामपथि स्थितः। पृष्ठे दक्षे तथाऽघस्तात्मूर्यवाहागतः शुभः॥३४॥ जव इडानाड़ी का स्वर वाममार्ग में स्थित हो जस समय ऊपर वायें व आगे आया हुआा दूत शुभदायक जानना चाहिये और जय सूर्यका स्वर बहता हो उस समय पीछे, दाहिने तथा नीचे तरफ़ आया हुआ दूत शुभदायक होता है ॥। ३४ ।। अरनादिर्विषमः सन्धिर्निराहारो निराकुलः । परे सूक्ष्मे विलीयेत सा सन्ध्या सद्गिरुच्यते ॥ ३५॥ आदिरहित, विषमरूप, सन्धि (सुपुन्ना) निराहार व निराकुन होकर पर व सूक्ष्म रूप ब्रह्म में लीन हो जावे उसको सज्जनों ने सन्ध्या कहा है॥ ३५ ॥ न वेदं वेद इत्याहुरवेदो वेदो न विद्यते। १ पुरायदानादिकोटिकेत्यपपाठः।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ:। परात्मा विद्यते येन स वेदो विद्विरुच्यते ॥ ३६॥ सज्जनलोग वेद को वेद नहीं कहते हैं और न वेद वेदरूप होकर विद्यमान रहता है रन जिससे परात्मा जाना जाता है उसीको विद्वानों ने 'वेद' कहा है॥ ३६॥ न सन्ध्यां सन्धिरित्याहुः सन्ध्या सन्विर्न गद्यते। विषम: सन्धिग: प्रायः स सन्विस्सद्विरुच्यते॥३७॥ पलिडतलोग सन्ध्या को सन्धि नहीं कहते हैं और न सन्ध्या को सन्धि कहसके हैं रन जब प्राण विषम सन्धि में जाता है उसीको सज्जनों ने सन्धि कहा है॥ ३७ ॥ इति नाडीभेदः । श्रीदेव्युवाच । देवदेव महादेव सर्वसंसारतारक। स्थितं त्वदीयहृदये रहस्यं वद मे प्रभो ॥ ३८ ॥ श्रीपार्वतीजी बोलीं कि हे देवों के देव, महादेव, सर्वसंसारतारक, मभुजी! जो स्य आपके हृदय में टिका है उसको मुझसे कहो ॥। ३८ ॥ ईश्वर उवाच। स्वरज्ञानरहस्यान्तु न काचिचेष्टदेवता। स्वरज्ञानरतो योगी स योगी परमो मतः ॥३६॥ श्रीमहादेवजी बोले कि, स्वरज्ञान के रहस्य से परे कोई इष्टदेवता नहीं और जो गी स्वरज्ञान में रत रहता है वही योगी परम माना जाता है।। ३६ ।। पञ्च तत्त्वाद्गवेत्सृष्टिस्तत्वे तत्त्वं प्रलीयते। पञ्चतत्त्वं परन्त्त्त्वं तत्त्वातीतं निरञ्ञनम् ॥४० ॥ पांचों तत्त्वों से सृष्टि उपजती है व तत्त्व में ही तत्त्व लीन हो जाता है व पञ्चतत्त्व ही मतत्व कहाता है और परब्रह्म तत्त्वों से पर माना जाता है॥। ४०॥ तत्त्वानां नाम विज्ञेयं सिद्धियोगेन योगिनाम्। भूतानां दुष्टचिह्नानि जानातीह स्वरोत्तमः ॥। ४१ ।। योगीजनों को सिद्धियोग से तत्त्वों का नाम जानना चाहिये जो प्राणी स्वरों को म समझ्ता है वह सर्वप्राशियों के दुष्टचिह्नों को भी जानसका है॥ ४१॥ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। पञ्चभूतात्मकं विश्वं यो जानाति स पूजितः ॥ ४२। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश इन पश्चभूतों से उपजे विश्वको जो जानता है वही पूजित होता है॥। ४२॥ सर्वलोकस्थजीवानां न देहो भिन्नतत्त्त्वकः । भूलोकात्सत्यपर्यन्तं नाडीभेद: पृथक् पृथक् ॥४३॥ भूलोक से लेकर सत्यलोकपर्यन्त सबलोकों में रहते हुए जितने जीव हैं उनका देह भिन्न भिन्न तत्वरूप नहीं है परन्तु नाड़ी का भेद अलग अलग रहता है ॥ ४३॥ वामे वा दक्षिणे वापि उदया: पञ्च कीर्तिताः। अष्टया तत्त्वविज्ञानं शृणु वक्ष्यामि सुन्दरि।। ४४।। वामभाग या दक्षिणभाग में भी पांच पांच उदय कहे हैं उन तत्वों का विज्ञान आठ भांति का होता है अहो सुन्दरि ! उसे मैं कहंगा तुम सुनो ॥ ४४॥ प्रथमे तत्त्वसंख्यानं द्वितीये श्वाससन्धयः । तृतीये स्वरचिह्नानि चतुर्थे स्थानमेव च ।। ४५ ॥ पहले भेद में तत्त्वों की गणना, दूसरे भेद में श्वास की सन्धि, तीसरे भेद में स्वरों के निशान और चौथे भेद में स्वरों का स्थानही कहा है॥ ४५॥ पञ्चमे तस्य वर्णाश्र पष्ठे तु प्राण एव च। सप्तमे स्वादसंयुक्ा अष्टमे गतिलक्षणम् ॥ ४६ ॥ पांचवें भेद में उन तत्वों का रङ्र्, छठेभेद में प्रा, सातवें भेद में स्वाद का संयोग और आठवें भेद में गतिके लक्षण कहे हैं ॥ ४६॥ एवमष्टविधं प्राएं विषुवन्तं चराचरय्। स्वरात्परतरं देवि नान्यथा त्वम्बुजेक्षणे ॥ ४७॥ इसप्रकार चराचर में व्यापक आठ प्रकारका प्राय होता है अहो देवि ! अयि कञ्जलो- चने ! स्वर से परतर इतर ज्ञान कोई नहीं है॥ ४७॥ निरीक्षितव्यं यत्नेन सदा प्रत्यूषकालतः। कालस्य वञ्चनार्थाय कर्म कुर्वन्ति योगिनः ॥४८ ॥ प्भातकाल से लेकर सदैव यत्र के साथ स्वर को देखना चाहिये क्योंकि योगीजन कालक्षेप के लिये कर्मों को करते हैं इसीलिये उनको स्वरं व तत्त्व का विज्ञान बना रहता है॥ ४८ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । श्रुत्योरङ्डुष्ठकौ मध्याङ्गुल्यौ नासापुटद्धये। वदनप्रान्तके चान्याङ्गलीर्दद्याच् नेत्रयोः ॥। ४६॥ कानों में दोनों अँगूठे देवे, दोनों नासा पुटों में मध्यमा अँगुली और मुखमान्त तथा त्रों में अरन्य शेष अ्ँगुलियों को देवे यानी नेत्रों में तर्जनी और अ्नामिका व कनिष्ठा को खमान्त में लगाना चाहिये।। ४६।। पस्यान्तस्तु प्रथिव्यादितत्त्वज्ञानं भवेत्कमात्। पीतश्वेतारुणश्यामैर्विन्दुभिर्निरुपाधिकम् ॥५० ॥ इसके बीचमें पृथ्वी आदितत्त्वों का ज्ञान क्रमसे पीला, सफ़ेद, लाल और काले न्दुओं से उपाधिरहित प्रतीत होता है थानी पृथ्वी का पीलावर्ण, जलका सफ़ेद गी का लाल, वायुका श्याम और आकाश का चित्रवर्ण कहाजाता है॥ ५० ॥ दर्पपेन समालोक्य तत्र श्वासं विनिक्षिपेत्। आ्कारैस्तु विजानीयात्तत्त्व्रभेदं विचक्षणः॥ ५१ ॥ वहां दर्पण में मुखका अवलोकनकर श्वास को छोड़े और आकारों से तत्वों का द पणडत को जानना चाहिये।। ५१॥ चतुरसं चार्धचन्द्रं त्रिकोणं वर्तुलं स्मृतम्। बिन्दुभिस्तु नभो ज्ञेयमाकारैस्तत्त्त्वलक्षणम् ॥ ५२ ॥ चतुष्कोणण, अर्धचन्द्र, त्रिकोण, वर्तुल (गोल) और बिन्दुरूप इन आकारों से तत्त्वों लक्षण जानना चाहिये यानी पृथ्वी चतुष्को(चौकोर) जलअर्चन्द्राकार, तेज वकोणणकार, वायु वर्तुलाकार और आकाश विन्द्वाकार कहलाता है॥ ५२॥ मध्ये पृथ्वी ह्यवश्चापश्चोर्ध वहति चानलः । तिर्यग्वायुप्रवाहश्च नभो वहति संक्रमे॥। ५३॥ बीचमें पृथ्वी, नीचे जल, ऊपर आगी और तिरछा वायु का प्रवाह चलता है और दो स्वरों के चलनेपर आरक्राशतत्त्व बहता है॥ ५३ ॥ आपः श्वेतः क्षितिः पीता रक्वणों हुताशनः। मारुतो नीलजीमूत आकाश: सर्ववर्णक: ॥ ५४ ॥ जल श्वेतवर्ण, पृथ्वी पीतवर्ण, अग्नि रक्कवर्ण, वायु श्यामवर् और आ्ररकाश सर्व गला कहाता है।। ५४॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य अथ स्थानपरत्वात्तत्त्वज्ञानम्- स्कन्धद्ये स्थितो वहिर्नाभिमूले प्रभञ्जनः । जानुदेशे क्षितिस्तोयं पादान्ते मस्तके नभः ॥५५॥ दोनों कन्धों पर आगी, नाभिमूल में वायु, बुदुनुओं में पृथ्वी, पादान्त में जल और मस्तक में आ्र्प्रक्राशतत्त्व टिका रहता है॥ ५५ ॥ अथ स्वादात्तत्वज्ञानपकारमाह- माहेयं मधुरं स्वादे कषायं जलमेव च। तीक्ष्णं तेज: समीरोडम्ल आकाशं कडकं तथा॥ ५६॥ स्वाद में पृथ्वी का तच्व मीठा, जलका तत्त्व कपैला, अग्नि का तत्त्व तीखा, वायु का तत्त्व खट्टा और आ्र्काश का तत्त्व कड़आ कहलाता है ॥ ५६ ॥ अथ गत्या तत्त्वज्ञानम्- दादशाङ्गुलं माहेयं वारुणं षोडशाङ्गलम्॥५७ ॥। वायुतत्व आठ अक्ञुल वहता है, अग्नितत्त्व चार अङ्गल, पृथ्वीतत्त्त्व वारह अ्गल औ्र्र जलतत्त्व सोलह अङ्रुल चलता है॥ ५७ ॥ ऊर्ध्वं मृत्युरध: शान्तिस्तिर्यगुच्चाटनं तथा। मध्ये स्तम्भं विजानीयान्नभः सर्वत्र मध्यमम् ॥५८॥ जब ऊर्ध्व स्वर चले तो मृत्यु, नीचा स्वर चले तो शान्ति, तिरीछा स्वर चले तो उच्चाटन औरर मध्य का स्वर चले तो स्तम्भ और आकाशतत्त्व सर्वत्र मध्यम जानना चाहिये॥। ५८ ॥ पृथिव्यां स्थिरकर्माणि चरकर्माणि वारुणे। तेजसि क्रूरकर्माष्ि मारणोच्चाटनेऽनिले॥ ५६ ॥। पृथ्वीतच्व में स्थिर कार्य, जल में चरकाम, तेज में क्रूरकर्म और वायुतत्व में मारण और उच्चाटन सिद्ध होता है॥ ५६॥ व्योम्नि किश्चिन्न कर्तव्यमभ्यसेद्योगसेवनम्। शून्यता सर्वकार्येषु नात्र कार्या विचारण ॥ ६० ।। आ्रपरकाशतत्व में कुछ काम नहीं करना चाहिये वरन केवल योग सेवन काही अ्- भ्यास रक्खे औ्रर सब कामों में शून्यता होती है इसमें विचार नहीं करना चाहिये ॥६०।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । पृथ्वीजलाम्यां सिद्धिः स्यान्मृत्युर्वह्नौ क्षयोऽनिले। नभसो निष्फलं सर्वं ज्ञातव्यं तत्त्ववादिभिः ॥६१॥ पृथ्वी व जलतत्त्व से सिद्धि होती है अग्नितत्त्व में मृत्यु और वायुतत्व में क्षय होजाता है और आकाशत्त्व से सब काम निष्फल होजाते हैं यह तत्त्ववादियों को जानना चाहिये॥ ६१ ॥ चिरलाभः क्षितेर्जेयस्तत्क्षणे तोयतत्वतः। हानि: स्याद्रहिवाताम्यां नभसो निष्फलं भवेत् ॥६२॥ पृथ्वीतत्त्व से बहुतसा लाभ जानना चाहिये, जलतत्त्व से उसी क्षणमें लाभ होताहै अग्नि और वायुतत्त्व से हानि होती है और आकाशतत्त्वसे सब काम निष्फल होजाते हैं ॥६२॥ पीतः शनैर्मध्यवाही हनुर्यावद्गुरुध्वनिः। कवोष्ण: पार्थिवो वायुः स्थिरकार्यप्रसाधकः ॥६३॥ पीला, धारे धीरे या मध्यगति से चलनेवाला, ठोदीपर्यन्त भारी शब्दका रखनेहारा, कुछेक गरम पृथ्वीसम्बन्धी वायु स्थिरकार्यों का साधक होता है ॥ ६३॥ अधोवाही गुरुध्वानः शीघ्रगः शीतलः स्थितः। यः षोडशाङ्गलो वायुः स आपः शुभकर्मकृत्॥ ६४॥ नीचवाही, महाध्वनिकारी, शीघ्रगामी, ठएढा होकर टिकाहुआ जो सोलह अङ्कलवाल वायु वह जलसम्बन्धी है जोकि शुभकर्मों का करनेवाला होता है॥ ६४ ॥ आवर्तगश्चात्युष्णश्च शोषाभश्रतुरङ्गुलः। ऊर्ध्ववाही च यः क्रूरकर्मकारी स तैजसः॥ ६५ ॥ चक्कर देकर जानेवाला, बड़ागरम, लाल, चारतक्कुल ऊपर जानेवाला जो वायु वह तैजस होकर क्रूर कमोंका करनेवाला होता है॥ ६५ ॥ ऊष्णः शीतः कृष्णवर्णस्तिर्यग्गाम्यष्टकाङ्गलः । वायुः पवनसंज्ञस्तु चरकर्मप्रसाधकः ॥६६ ॥ जो गरम, ठएढा, श्यामवर्ण, तिरीछा जानेवाला, आठ अक्गुल का हो वह वायु पवन- संज्ञक होकर चरकर्मों का प्रसाधक होता है॥ ६६ ॥ यः समीरः समरसः सर्वतत्त्वगुणावहः। आम्बरन्तं विजानीयाद्योगिनां योगदायकम् ॥ ६७।। सामुद्रिकशास्त्रस्य जो वायु समरस यानी एकरस होकर समस्त तत्वों के गुणों का वाहक होता है वह आकाशसम्बन्धी जानना चाहिये जोकि योगियों को योगदायक होता है॥ ६७ ।। पीतवर्णं चतुष्कोएं मधुरं मध्यमाश्रितम्। भोगदं पार्थिवं तत्त्वं प्रवाहे द्वादशाङ्गलम् ॥ ६८ ॥ पीले वर्णवाला, चौकोर, मीठा, वीचमें टिकाहुआ जोकि प्रवाह में बारह अक्कुलका होता है वह पृथ्वीतत्त्व भोगदायक जानना चाहिये॥ ६८॥ श्वेतमर्धेन्दुसंकाशं स्वादुकापायमार्दकम्। लाभक्रद्धारुणं तत्त्वं प्रवाहे षोडशाङ्गलय् ॥ ६६॥ जिसका वर्ण सफ़ेद हो जोकि अर्धचन्द्राकार, स्व्रादिल, कपैला व गीला होकर प्रवाह में सोलह अङ्गलका रदता है उसे जलतत्त्व कहते हैं और वह लाभकारी होता है॥ ६६ ॥ रक्ं त्रिकोएं नीक्षां च ऊर्ध्वभागप्रवाहकम्ू। दीसं च तैजसं तत्त्वं प्रवाहे चतुरह्ुलम् ॥७० ॥ जिसका वर्स लाल हो जोकि तिकोना, तीखा व ऊपरले भाग में बहनेवाला होताहुआ प्रकाशित होकर प्रवाह में चार अङ्गुलका रहता है उसे तैजसतत्व कहते हैं ॥ ७० ॥ नीलं च वर्तुलाकार स्वाद्म्लं तिर्यगाशितम्। चपलं मारुतं तत्त्वं प्रवाहेऽशङ्गलं स्पृतम् ॥ ७१॥ जोकि श्यामवर्स, गोलाकार, स्वाद में खट्टा, तिर्यग्गामी होकर चपल होताहुआ पवाह में आठ अंगुलवाला कहाता है उले वायुतत्व कहते हैं । ७? ॥ वर्णकारे म्वादवाहे अव्यकं सर्वगामिनम्। मोक्षदं नाभसं तत्त्त्वं सर्वकार्येषु निष्फलम् ॥ ७२॥ वर्, आकार, स्वाद और प्रवाह में छिपाहुआ सबों में जानेव्राला व मोक्षदायक होकर आकाशतत्त्व कहलाता है जोकि सब कार्यों में निष्फल होता है॥ ७२॥ पृथ्वीजले शुभे तत्त्वे तेजोमिश्रफलोदयम्। हानिमृत्युकरौ पुंसामशुभौ व्योममारुतौ ॥ ७३ ॥ पृथ्वीतत्व व जलतत्व्र ये दोनों शुभदायक होते हैं व अग्नितत्त्र मिश्रफल का उदय उत्तराद्द्े द्वितीयाङ्क: । वाला होता है और आकाशतत्व व वायुतत्त्व ये दोनों पुरुपों को अुभदायक होकर हानि व मौतके करनेवाले होते हैं ॥। ७३॥ ्रपूर्वपश्चिमे पृथ्वी तेजश्र दक्षिणे तथा। वायुश्चोत्तरदिग्ज्ञेयो मध्ये कोणगतं नभः॥७४॥ पूर्वसे लेकर पश्चिमपर्यन्त पृथ्वतित्व, दक्षिण में तेजतत्त्व, उत्तर में वायुतत्त्व और मध्य कोण में गयाहुआ आकाशतत्त्व जानना चाहिये।। ७४॥ चन्द्रे पृथ्वी जले स्यातां सूर्ये चाग्निर्यदा भवेत्। तदा सिद्धिर्न सन्देहः सौम्यासौम्येषु कर्मसु ॥७५॥ जिससमय चन्द्रमा के स्वर में पृथ्वी व जलतत्त्व हों और सूर्य के स्वर में अग्नितत्त्व हो उससमय शुभाशुभकामों में निस्सन्देह सिद्धि होती है । ७५॥ पृथ्वीलाभकृदह्नि स्यान्निशायां लाभकृज्जलम्। वह्नौ मृत्युः क्षयो वायुर्नभस्थानं दहेत्कचित्।७६॥ जो दिनमें पृथ्वीतत्त्व और रात्रि में जलतत्त्व हो तो लाभकारी होता है और वह्वितत्व में मृत्यु, वायुतत्त्व में विनाश और आकाशतत्त्व कभी स्थानको जलाता है॥ ७६॥ जीवितव्ये जये लाभे कृष्यां च धनकर्मणि। मन्त्रार्थे युद्धप्रश्ने च गमनागमने तथा॥७७॥ जीवन, जय, लाभ, खेती, धनका कर्म, मन्त्रका कार्य, युद्ध, प्श्न, गमन और आगमन इनमें पृथ्वीतत्व शुभदायक होता है।।७७॥ आयाति वारुणे तत्त्वे शत्रुरस्ति शुभं क्षितौ। प्रयाति वायुतोऽन्यंत्र हानिमृत्यू नभोनले ॥ ७८ ॥ यदि जलका तत्व होवे तो वैरी आता है,पृथ्वीतत्त्व होवे तो शुभ होता है यदि वायुतत्त्व होतो वैरी अन्य स्थान को पधारता है और यदि आकाश व अग्नितत्व हो तो हानि व मृत्यु होती है।। ७=॥! पृथिव्यां मूलचिन्ता स्याजजीवस्य जलवातयोः। तेजसा धातुचिन्ता स्याच्छून्यमाकाशतो वदेत्॥७६॥ यदि प्रश्न करने के समय पृथ्वतित्व हो तो मूलचिन्ता होती है, जल व वायुतत्व हो तां. जीवकी चिन्ता यदि त्र्प्रनितच्त्र हो तो धातकी चिन्ता कहना चाहिये और यदि आकाश तत् हो तो शन्य बतलाना चाहिये॥ ७६ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य पृथिव्यां बहुपादा: स्युर्द्धिपदस्तोयवायुतः। तेजस्येव चतुष्पादो नभसा पादवर्जितः ॥। ८० ॥। यदि पृथ्वीतत्व हो तो बहुतसे पैरोंवाले जीवकी चिन्ता कहे यदि जल व वायुतत्व हो तो द्विपदकी चिन्ता, अग्नितत्त्व हो तो चौपाये की चिन्ता वतलावे और यदि आ्काश- तत्व हो तो बेपैर की चिन्ता कहना चाहिये ॥ ८० ॥ कुजो वही रविः पृथ्वी सौरिरपः प्रकीरतितः । वायुस्थानस्थितो राहुर्दक्षरन्ध्रप्रवाहकः ॥=१॥ यदि दाहिना स्वर बहता हो तो अग्नितत्व्र में मङ्ल, पृथ्वीतत्व में सूर्य, जलतत्त्व में शनैश्चर और वायुतत्त्व में राहु टिकारहता है॥ =१ ॥ जलं चन्द्रो बुधः पृथ्वी गुरुर्वातः सितोऽनलः। वामनाडयां स्थिता: सर्वे सर्वकार्येषु निश्चिताः ॥८२।। जलतत्त्व में चन्द्रमा, पृथ्वीतत्त्व में वुध, वायुतत्त्व में बृहस्पति और अर्प्रग्नितत्त्व में शुक्र ये सप ग्रह वामनाड़ी में टिकेहुए सम्पूर्ण कार्यों में निश्चित हैं ॥ =२ ॥ पृथ्वी बुधो जलादिन्दुः शुक्रो वह्नी रविः कुजः। वायू राहुशनीव्योमगुरुरेव प्रकीर्तितः ।।८३।। पृथ्वीतत्व में वुध, जलतत्त्व में चन्द्रमा व शुक्र अग्नितत्व में सूर्य व मङल वायुतत्त्व में राहु व शनैश्चर और आकाशतत्त्व में बृहस्पति कहा है ।। ८३ ।। प्रवासप्रश्न आदित्ये यदि राह्ुर्गतोनिले। तदासौ चलितो ज्ञेयः स्थानान्तरमपेक्षते ॥४॥ सूर्यस्वर के चलने के समय पत्रासप्रश्न में यदि राहु वायुतत्त्वमें गया हो तो वह प्रवासी स्थानान्तर को चलचुका है ऐसा जानना चाहिये।। ८४ ।। आरयाति वारुणे तत्त्वे तत्रैवास्ति शुभं क्षितौ। प्रवासी पवनेन्यत्र मृत्युरेवानले भवेत् ॥ ८५ ॥ यदि जलतत्व हो तो परदेशी आता है व जो पृथ्वीतच्व्र हो तो परदेशी जहां गया था वहां ही सुखी है यदि वायुतच्व हो तो प्रवासी अन्य स्थान को चला गया और यदि अग्नितच्व हो तो प्रवासी की मौतही होजाती है॥ ८५ ॥ पार्थिवे मूलविज्ञानं शुभं कार्यं जले तथा। आग्नेये धातुविज्ञानं व्योम्ि शून्यं विनिर्दिशेत्॥=६॥। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क:। पृथ्वीतत्त्व में मूलका विज्ञान होता है, जलतच्त्र में शुभकार्य, अग्नि तत्त्व में धातुओं का विज्ञान और आकाशतत्व में शून्यता को कहै ॥ ८६ ॥ तुष्टिः पुष्टी रतिः क्रीडा जयहर्षो धराजले। तेजोवाय्वोश्च सुप्ताक्षो ज्वरकम्पः प्रवासिनः ॥८७॥ यदि मवासी के प्रश्न के समय पृथ्वी व जलतत्व हो तो तुष्टि, पुष्टि, रति, क्रड़ा, जय और हर्ष होता है और यदि तेज और वायुतत्व हो तो परदेशी आंखें मीचे सोता हुआ वर से कांपता है॥ ८७ ॥ गतायुर्मृत्युराकाशे तत्त्वस्थाने प्रकीर्तिताः । द्वादशैता: प्रयत्नेन ज्ञातव्या देशिकैः सदाः ॥८८ ॥ यदि आकाशतत्व हो तो आयुरहित परदेशी की मौत कही है ये बारह प्रश्न वड़े यत्र से परिटतों को सदैव जानना चाहिये ॥ ८८ ॥ पूर्वस्यां पश्चिमे याम्ये उत्तरस्यां यथाक्रमम्। पृथिव्यादीनि भूतानि वलिष्ठानि विनिर्दिशेत्॥८६॥ पूर्व, पश्चिम, दक्षिण और उत्तर इन चारों दिशाओं में क्रमसे पृथ्वी, जल, तेज और वायु ये चारों भूत बलवान् कहलाते हैं ॥ ८ै ॥ पृथिव्यापस्तथा तेजो वायुराकाशमेव च। पञ्चभूतात्मको देहो ज्ञातव्यश्च वरानने ॥६० ॥ शहो वरानने ! पृथ्वी, जल, आगी, वायु और आकाश इन पश्चभूतवाले देह को जा- नना चाहिये॥। ६ै० ॥ अस्थि मांसं त्वचा नाड़ी रोम चैव तु पञ्चमम्। पृथ्वीपञ्चगुणाः प्रोक्त ब्रह्मज्ञानेन भाषितम् ॥ ६१ ॥ हाड़, मांस, खाल, नाड़ी और पांचवां लोम ये पृथ्वी के पांच गुण कहे हैं यह ज्ञान वेदान्तवेत्ता ब्रह्मज्ञानी कहते हैं । ६१ ॥ शुक्रशोषितमज्ाश्च मूत्रं लालां च पञ्चमम्। आपः पञ्चगुणाः प्रोक्का ब्रह्मज्ञानेन भाषितम् ॥ ६२।। ब्रह्मज्ञानी लोग कहते हैं कि, बीज, रुधिर, मज्जा, मूत्र और पांचवां लार ये जलके पांच गुया कहे हैं ॥। ६२ ।। सामुद्विकशास्त्रस्य क्षुधा तृषा तथा निद्रा क़ान्तिरालस्यमेव च। तेज: पञ्चगुएं पोक्ं ब्रह्मज्ञानेन भाषितम् ॥६३ ॥ ब्रह्मज्ञानी ने कहा है कि, क्षुधा, तृपा, निद्रा, कान्ति और आलस्य ये पांच अग्नि के गुण कहे हैं ।। ६३ । धावनं चलनं ग्रन्थि: संकोचनप्रसारणे। वायोः पञ्चगुणाः प्रोक्त ब्रह्मज्ञानेन भाषितम्॥६४ ॥ वेदान्ती लोग कहते हैं कि, दौड़ना, चलना, गांठना, सिकोड़ना और पसारना ये वायु के पांच गुण कहे हैं ॥ ६४ । रागद्वेपौ तथा लजा भयं मोहश्र पञ्चमः। नभ: पञ्चगुएं प्रोक्ं ब्रह्मज्ञानेन भाषितम् ॥ ६५ ॥ ब्रह्मज्ञाता वेदान्ती का कथन है कि, मीति, वैर, लज्जा, भय और पांचवां मोह ये आ काश के पांच गुण कहे हैं।। ६५ ॥ पृथ्व्याः पलानि पञ्चाशचत्वारिंशत्तथाम्भसः। इस काया में पृथ्वी पचास पल, जल चालीस पल, आगी तीस पल, वायु बीस पल और आकाश दश पल रहता है॥ ६६ ॥। पृथिव्यां चिरकालेन लाभेश्रापः क्षणाद्धवेत्। जायते पवने स्वल्पः सिद्धोप्यग्नौ विनश्यति॥६७॥। लाभप्रश्न करने के समय पृथ्वीतत्व हो तो देर में लाभ होता है, यदि जल तत्त्व हो तो उसी क्षण लाभ होता है, यदि वायुतत्व प्रतीत हो तो थोड़ासा लाभ होजाता और यदि अग्नि तत्व हो तो सिद्ध हुआ कार्य भी विनष्ट होजाता है॥ ६७।। पृथ्व्याः पंञ्च ह्यपां भेदा गुणास्तेजो द्विवायुतः । नभस्येकगुणश्रैव तत्त्वज्ञानमिदं भवेत् ॥।६८।। पृथ्वी के पांच गुण, जलके चार गुण, आगी के तीन गुण, वायु के दो गुण और आ काश का एक गुख कहा है यह तथ्वों का ज्ञान होता है।। ६८ ।।: फूत्कारकृत्पस्फुटिता विदीर्णा पतिता धरा। १ लाभोऽधिकं फलमित्यमरः ॥ 40.6 उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । ददाति सर्वकार्येषु अवस्थासदृशं फलम्॥ ६६॥ फूत्कार की करनेहारी, फूटी, फटी व हृथा पड़ी हुई पृथ्वी सब कार्यों में अवस्था के अनुसार फल को देती है।। ६६ ।। धनिष्ठा रोहिणी ज्येश्ठानुराधा श्रवणं तथा। अभिजिदुत्तरापाढा पृथ्वीतत्त्वमुदाहृतम्॥ २००॥ धनिष्ठा, रोहिणी, ज्येष्ठा, अनुराधा, अ्रवण, अभिजित् और उत्तरापाढा ये सात नक्षत्र ृथ्वीतत्ववाले कहे हैं ॥ २०० ॥ पूर्वापाढा तथाश्लेषा मूलमार्द्रा च खेती। उत्तराभाद्रपदातोयतत्त्त्वं शतभिषक् प्रिये ॥ १॥ अयि मिये ! पूर्वापाढा, आश्लेपा, मूल, आर्द्रा, रवती, उत्तराभाद्रपदा और शतभिपा सात नक्षत्र जलतत्बवाले कहे हैं । १॥ भरणी कृत्तिका पुष्यो मघा पूर्वा च फाल्गुनी। पूर्वाभाद्रपदा स्वाती तेजस्तत्त्वमिति प्रिये!॥ २॥ शहो परिये ! भरणी, कत्तिका, पुष्य, मघा, पूर्वाफाल्गुनी, पूर्वाभाद्रपदा और स्वाती ये सात नक्षत्र अग्नितत्ववाले कहलाते हैं ॥ २ ॥ विशाखोत्तरफाल्गुन्यौ हस्तचित्रे पुनर्वसु। अश्विनीमृगशीर्षे च वायुतत्त्वमुदाहृतम्॥ ३॥ विशाखा, उत्तराफाल्गुनी, हस्त, चित्रा, पुनर्वसु, अश्विनी और मृगशिरा ये सात नक्षत्र वायुतत्ववाले कहे हैं ॥ ३ ॥ वहन्नाडीस्थितो दूतो यत्पृच्छति शुभाशुभम्। तत्सवं सिद्धिमापोति शून्ये शून्यं न संशयः॥४ ॥ वहती हुई नाड़ी की ओर टिका हुआ दूत जिस शुभ व अशुभ को पूछता है वह सब सिद्धिको प्राप्त होता है और यदि शून्य में पूछे तो निस्सन्देह शून्य होजाता है॥४॥ पूर्णोऽपि निर्गमश्वासे सुतत्त्वेऽपि न सिद्धिदः। सूर्यश्चन्द्रो ऽथवा नृणं संग्रहे सर्वसिद्धिदः ॥ ५ ॥ यदि शुभतत्ववाले निकले श्वास में सूर्यस्वर या चन्द्रस्वर पूर्ण होकर भी प्रतीत होवे वो मनुष्यों को सिद्धिदायक नहीं होता है और यदि दोनों स्वरों का संग्रह (मेल) हो प्र सर्वसिद्धिदायक होजाा है ॥ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य तत्त्वे रामो जयं प्राप्तः सुतत्त्वे च धनञ्जयः । कौरवा निहताः सर्वे युद्धे तत्त्वविपर्ययात्॥ ६॥ शुभतत्व में ही रामजीने जयको पाया औपर शुभतच्त में ही अर्जुनजी विजयको प्राप्त हुए और तत्वों के विपरीत होनेसे सारे कौरवलोग लड़ाई में मारेगये ॥ ६ ॥ जन्मान्तरीयसंस्कारात्प्रसादादथवा गुरोः । केपांचिज्ायते तत्त्ववासना विमलात्मनाम्॥७॥ अ्र्परनेक जन्मान्तरों के संस्कारवलसे अ्रपथवा गुरुकी प्रसन्नता से कितेक विमल आत्मा- वाले जनों को तच्तों की वासना उपजती है॥ ७॥ लं वीजं धरणीं ध्यायेचतुरसां सुपीतभाम्। सुगन्धं स्वर्णवर्णाभां प्राप्ुयाद्देहलाघवम् ॥८॥ जो योगी चौकोर व पीली पृथ्वीके तत्त्व में (लं) बीजका ध्यान करे तो वह सुगन्ध सोनेकीसी कान्ति और देहकी लबुताको पाता है॥ ८ ॥ वं बीजं वारुणं ध्यायेत्तत्त्वमर्धशशिप्रभम्।. क्षुनृष्णादिसहिष्णत्वं जलमध्ये च मज्जनम् ॥ ह।। अर्चन्द्रसम पभावाले जलतच्त में जो (वं) बीज का ध्यान करे तो वह भूख, प्यास आदि सहने व पानी के वीच डुब्वी लगाने की सामर्थ्य को पाता है॥ ६।। रं बीजमग्निजं ध्यायेत्रिकोणमरुणप्रभम् । तिकोने, लालवर्णवाले अरपरग्नितत्वमें जो योगी (रं) वीज का ध्यान करे तो वह बहुतसे अन्नपान भक्षण करने की सामर्थ्य को पाताहुआ घाम व आगीका वेग भी सहसक़ा है॥ १० ॥ यं वीजं पावनं ध्यायेदर्तुलं श्यामलप्रभम्। आकाशगमनादयं च पक्षिवद्गमनं तथा ॥ ११॥ गोलाकार, श्यामप्रभावाले वायुतत्त्व में जो (यं) बीजका ध्यान करे तो वह आकाश में गमन करने आदिकी और पक्षी के समान उड़ने की भी सामर्थ्य को पाता है ।११॥ हं बीजं गगनं ध्यायेन्निराकारं बहुप्रभम्। ज्ञानं त्रिकालविषयमैश्वर्यमणिमादिकम् ॥ १२ ॥ उत्तरार्ध्धे द्वितीयाङ्क: । निराकार अप्रधिक प्रभाववाले आ्र््रकाशतत्व में जो ( हं) बीजका ध्यान करे तो वह त्रिकालविपयक ज्ञान व अखिमादि आठसिद्धिवाले ऐश्वर्य को भी पाता है ।। १२ ।। स्व्ररज्ञानी नरो यत्र धनं नास्ति ततः परम्। गभ्यते स्वरज्ञानेन ह्यनायासं फलं भवेत ॥ १३ ॥ जिस स्थानपर स्वरज्ञानी नर बसता है उससे परे अ्न्य कोई धन नहीं है-जो मनुष्य स्वरज्ञान से गमन करता है उसको अनायास (वेपयास) फल मिलता है । १३॥ श्रीदेव्युवाच। देवदेव महादेव महाज्ञानं स्वरोदयम्। त्रिकालविषयं चैव कथं भवति शंकर॥ १४ ॥ श्रीदेवीजी बोलीं कि अहो देवताओंके देव, महादेव, शिवशंकरजी ! यह स्वरोदय महाज्ञान है जोकि भूत, भविष्य, वर्तमान कालका प्रकाशक है वह कैसे होता है? कहिये ॥ १४ ॥ ईश्वर उवाच । अर्थकालजयप्रश्नशुभाशुभमिति त्रिधा। एतत्त्रिकालविज्ञानं नान्यद्भवति सुन्दरि॥ १५॥ श्रीमहादेवजी बोले कि, अहो सुन्दरि ! अर्थ (मतलव या धन) कांल (समय) और जय के प्रश्न का जो शुभाशुभ वह तीन भांति का है यह स्वरोदयज्ञान त्रिकालविषयक विज्ञान कहलाता है इससे बढ़कर कोई ज्ञान नहीं होता है।। १५ ॥ तत्त्वे शुभाशुभं कार्यं तत्वे जयपराजयौ। ततत्वे सुभिक्षदुर्भिक्षे तत्त्वं त्रिपदमुच्यते ॥१६॥ त्त्व मेंही शुभ, अशुभ कार्य होते हैं, तत्व मेंही जय-पराजय होते हैं और तत्त्व मेंही सुभिक्ष-दुर्भिक्ष टिके रहते हैं इसलिये तत्व ही त्रिपद कहलाता है ॥ १६ ॥ श्रीदेव्युवाच। देवदेव महादेव ! सर्वसंसारसागरे। किं नराणां परं मित्रं सर्वकार्यार्थसाधकम् ॥ १७॥ श्रीदेबीजी बोलीं कि, अहो देवाधिदेव, महादेव ! समस्त संसारसागर में मनुष्यों का परम मित्र व सर्वकार्यार्थों का साधक क्या है ? उसे कहिये ॥१७॥ सामुद्विकशास्त्रस्य। ईश्वर उवाच। प्राण एव परं मित्रं प्राण एव परः सखा। प्राणतुल्यः परो बन्धुर्नास्ति नास्ति वरानने ॥१८ ॥ श्रीमहादेवजी बोले कि, अहो वरबदने ! म्रारही परम मित्र है, मारही परम सखा (मिलापी) है और भ्ाणों के वरावर अन्य वान्धव नहीं है नहीं है॥ १८ ॥ श्रीदेव्युवाच। कथं प्राणस्थितो वायुर्देहः किं प्राणरूपकः । तत्त्वेषु संचरन्प्राणो ज्ञायते योगिभि: कथम् ॥ १६ ॥ श्रीपार्वतीजी बोलीं कि अहो देव ! वायु प्रारण में कैसे टिका रहता है व देह प्रागरूप कैसे होसका है और तत्त्रों में विचरता हुआ माण योगियों से कैसे जाना जाता है। १६॥ श्रीशित उवाच। कायानगरमध्यस्थो मारुतो रक्षपालकः। प्रवेशे दशभिः प्रोक्को निर्गमे दादशाङ्कलः॥२०॥ श्रीसदाशिवजी वोले कि अहो देवि ! कायारूपी नगर के बीच में टिका हुआ प्राण- वायु रक्षपाल (चौकीदार) कहलाता है जोकि प्रवेशमें दश अ्रंगुल और निकलने में बारह अंगुलवाला कहा है।। २०॥ गमने तु चतुर्विशन्नेत्रवेदास्तु धावने। मैथुने पञ्चषष्टिश्च शयने च शताङ्कुलम् ॥२१॥ चलने में चौबीस अफल, दौड़ने में बयालीस अक्गुल, मैथुन में पैंसठ अक्गुल और सोने में सौ अकुलवाला कहा है।। २१॥ प्राणस्य तु गतिर्देवि स्वभावाद द्वादशाङ्गलम्। भोजने वमने चैव गतिरष्टादशाङ्गलम् ॥२२॥ श्हो देवि ! माणकी गति स्वभाव से बारह अ्र्ल की होती है और भोजन तथा वगन (क्रय) करने के समय प्राणकी गति अट्ठारह अब्ुल की होजाती है ॥'२२ ॥ एकाङ्गलं कृते न्यूने प्राणे निष्कामता मता। आनन्दस्तु द्वितीये स्यात्कविशक्िस्तृतीयके ॥ २३ ॥ जिस समय पारणवायु एक अप्रक्कल कमती कीजाती है उस समय योगी को निष्कामता उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क। =१ प्राप्त होती है जब दो अक्कुल कमती की जाती है तब आनन्द मिलता है और जब तीन भह्गुल कमती की जाती है तब कविता की शक्कि आकर म्ाप्त होती है ।। २३ ॥ वाचा सिद्धिश्रतुर्थे च दूरदृष्टिस्तु पञ्चमे। पष्ठे त्वाकाशगमनं चएडवेगश्र सप्तमे ॥२४॥ जब चार अकुल कम की जाती है तो वाणी की सिद्धि होती है पांच अकुल कम की जाती है तो दूरदृष्टि छः अक्गुल कम होने पर आकाश में चलना और सात अङ्कुल कम होजाने पर चएडवेग होजाता है॥ २४॥ उष्टमे सिद्धयश्चैव नवमे निधयो नव। दशमे दशमूर्तीश्च छाया नैकादशे भवेत् ॥ २५ ॥ आठ अकल कम करलेने पर आठों सिद्धियों, नव अङ्कल कम हो ने पर नवनिधियों, दश अङ्ुल कम होजाने पर दश मूर्तियों (अनेकरूपों) की प्राप्ति होती है और ग्यारह अ- मुल कम होने पर छायाअभाव यानी अन्तर्धान की शक्कि प्राप्त होती है॥। २५ ।। द्वादशे हंसचारश्र गङ्गामृतरसं पिवेत्। आानखाग्रं प्राणपूर्णे कस्य भक्ष्यं च भोजनम् ॥२६॥ बारह अङ्गल प्राणकी गति कमतीकर लेवे तो वह योगी हंस के समान चलता हुआ गङ्गामृतरस को पीता है और यदि शिखा से लेकर नखपर्यन्त प्राण पूर्ण होजावे तो किस का भक्ष्य व किसका भोजन है ॥ २६॥ एवं प्राणविधि: प्रोक्क: सर्वकार्यफलप्रदः । जायते गुरुवाक्येन न विद्याशास्त्रकोटिमिः॥२७॥ इस प्रकार सब कार्यों के फलकी देनेवाली प्राणविधि कही है कि जिसका ज्ञान केवल गुरुके वाक्य सेही उपजता है करोड़ों विद्यार्यें व शास्त्रों से नहीं ॥ २७॥ प्रातश्चन्द्रो रविः सायं यदि दैवान्न लभ्यते। मध्याह्वान्मध्यरात्राच्च परतस्तु प्रवर्तते ॥२८॥ यदि मभात समय चन्द्रस्वर व सायं समय सूर्यस्वर दैवयोग से न मिलता हो तो दोपहर या आधी रात के उपरान्त मिलजाते हैं ॥ २८॥ दूरयुद्धे जयी चन्द्रः समासन्नेदिवाकरः। वहन्नाड्यागतः पाद: सर्वसिद्धिप्दायकः ॥२६॥ सामुद्िकशास्त्रस्य यदि दूरदेशी युद्ध में चन्द्रमा का स्वर होतो जयकारी होता है और यदि समीपी युद्ध में सर्य का स्वर वहता हो तो जयकारी होता है और यदि बहती हुई नाड़ी में चलने के स- य पैर रक्खा जावे तो सारी सिद्धियों को देता है ॥ २६ ॥ यात्रारम्भो विवाहश्च प्रवेशो नगरादिके। शुभकार्यापि सिध्यन्ति चन्द्रचारेषु सर्वदा ॥ ३०॥ यात्रारम्भ, विवाह, नगर व गृह आदिका प्रवेश और शुभ कार्य ये चन्द्रस्वर के चार में सदैव सिद्ध होते हैं ॥ ३० ॥ अयनतिथिदिनेशैः स्वीयतत्वे च युक्के यदि वहति कदाचिद्दैवयोगेन पुंसाम्। स जयति रिपुसैन्यं स्तम्भमात्रस्वरेण प्रभवति न च विघ्नं केशवस्यापि लोके ।। ३१ ॥ कदापि दैवयोग से पुरुषों का अपपना स्वर व तत्व अयन, तिथि और दिन के स्वामियों से युक होता हुआ यदि बहता हो तो वह स्वर के रोकनेमात्र सेही शत्रु सेना को जीत लेता है और वैकुएठलोक में भी उसको विन्न नहीं सताता है ॥ ३१॥ रक्ष जीवं रक्ष जीवं जीवाङ्गे परिधाय च। जीवो जपति यो युद्धे जीवञ्जयति मेदिनीम् ॥३२ ॥ अपने अङ्गपर वस्त्रों को पहिरकर जो जीवयुद्ध में (जीवं रक्ष जीवं रक्ष ) ऐसा जपता है वह पुरुष जीता हुआ सारी पृथ्वी को जीतता है॥ ३२ ।। भूमौ जले च कर्तव्यं गमनं शान्तिकर्मसु। वह्हौ वायौ प्रदीपेषु खे पुननों भयेष्वपि॥ ३३ ॥ शान्तिकमों में पृथ्वीतत्व व जनतत्व्र में गमन करना चाहिये और उग्रकर्मों में तेज तच्त्र व वायुतत्व में गमन करना चाहिये और आकाशतत्व में पूर्वोक दोनों कर्मों के उपस्थित होने पर गमन नहीं करना चाहिये ॥ ३३ ॥ जीवेन शस्त्रं वश्ीयाजीवेनैव विकाशयेत्। जीवेन प्रक्षिपेच्छस्त्रं युद्धे जयति सर्वदा॥ ३४॥ जीवस्वरसे शस्त्रको बांधे यानी जिस तरफ़ का स्वर चलता हो उसी तरफ़के हाथ से हथियार को धारे व जीवस्वर से ही हथियार को निकाले व जीवस्वरसे हीं हथियार को फेंके तो वह योद्ा पुरुष लड़ाई में सदैव जयको पाता है ॥ ३४ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । आकृष्य प्राणपवनं समारोहेत वाहनम्। समुत्तरे पदं दद्यात्सर्वकार्याणि साधयेत् ॥ ३५॥ जो पुरुष पाणवायु को खींचकर घोड़े आदि सवारी पर चढे और पवनके उतारपर परे को रकाव में देवे तो वह सब कामों को साधता है।। ३५ ॥ अपूर्णे शत्रुसामग्रीं पूर्णे वा स्ववलं तथा। कुरुते पूर्णतत्वस्थो जयत्येको वमुन्धराम् ॥ ३६ ॥ पूर्णातच्व में टिका हुआ जो पुरुप अपूर्ण स्वर में शत्रुकी सामग्री (सेना) औ्रर पूर्ण वर में अपनी सेना को स्थापित करता है वह अकेलाही पृथ्वी को जीतता है॥ ३६॥। या नाडी वहते चाङ्गे तस्यामेवाधिदेवता। सम्मुखेऽपि दिशा तेषां सर्वकार्यफलप्रदा॥३७॥। जिन वीरों के अङ्ग में जो नाड़ी बहती हो उसका अधिदेवता और उसकी दिशा सा- ने हो तो उनको सर्वकार्यों का फल देती है। ३७ ।। शदौ तु क्रियते मुद्रा पश्चादयुद्धं समाचरेत्। सर्पमुद्रा कृता येन तस्य सिद्धिर्न संशयः ॥३८॥ पुरुष पहले मुद्रा करलेवे पीछे से युद्ध को करे और जिसने सर्पमुद्राको किया है उसकी नेस्सन्देह सिद्धि होती है।। ३८ ॥। चन्द्रपवाहे ऽप्यथ सूर्यवाहे भटाः समायान्ति च योडकामाः । समीरणस्तत्वविदां प्रतीतो या शून्यता सा प्रतिकार्यनाशम् ॥३६॥ यदि चन्द्रमा का स्वर या सूर्य का स्वर बहता हो और तत्ववेत्ताओं को वायुतत्व भी तीत होता हो तो लड़नेवाले योद्धालोग भलीभांति आते हैं और यदि शून्यता प्रतीत होती हो यानी आ्काशतत्व बहता हो तो प्रतिकार्यों को विनाश करता है॥ ३६ ॥ यां दिशं वहते वायुर्युद्धं तददिशि दापयेत्। जयत्येव न संदेहः शक्रोऽपि यदि चाग्रतः॥।४० ॥ जिस दिशा में वायुतत्व बहता हो उसी दिशा में फ्रौज को भेजे यदि इन्द्रभी आगे माजावे तोभी निस्सन्देह जीतता है ॥ ४० ॥ यत्र नाड्यां वहेद्वायुस्तदङ्के प्राणमेव च। आ्कृष्य गच्छेत्कर्णान्तं जयत्येव पुरन्दरम्॥ ४१। सामुद्रिकशास्त्रस्य जिस नाड़ी में वायुतत्व बहता हो उसी नाड़ी की माएवायुको कर्णपर्यन्त खींचकर जो योद्धा युद्ध के लिये जाता है वह इन्द्रकोभी जीतसक्ा है ॥ ४१॥ प्रतिपक्षपहारेभ्यः पूर्षाङ्गं योभिरक्षति। न तस्य रिपुभिः शक्किर्बलिष्ठैरपि हन्यते॥४२॥ जो योद्धा वैरियोंके प्रहारों से अपने सारे अङ्रों की रक्षा करता है उसकी शक्िको चलवान् वैरीभी नहीं विनाश करसके हैं ॥ ४२॥ अङ्गश्ठतर्जनीवंशे पादाङ्कष्टे तथाध्वनिः। युद्धकाले च कर्तव्यो लक्षयोद्धाजयी भवेत् ॥ ४३ ॥ अँगूठा व तर्जनी अँगुली की पोर तथा पैरके अँगूठे में जो योद्धा युद्धके समय ध्वनिको करे तो लाख योद्धाओं को जीतसक़ा है। ४३॥ निशाकरे रवौ चारे मध्ये यस्य समीरणः। स्थितो रक्षेद्दिगन्तानि जयकाङ्क्षी गतः सदा ॥४४॥ जिसके चन्द्रस्वर व सूर्यस्वर के चलने के बीच में वायुतर्व टिका हो तो युद्धमें गया हुआ जयाभिलाषी वीर दिगन्तों की सदैव रक्षा करता है॥ ४४॥ श्वासप्रवेशकाले तु दूतो जल्पति वाञ्छितम्। तस्यार्थः सिद्धिमायाति निर्गमे नैव सुन्दरि॥ ४५॥ श्रह्ो सुन्दरि ! जिस मनुष्य के श्व्रास प्रवेश करने के समय दूत वाञ्छित कार्य को कहता है तो उसका अर्थ सिद्ध होजाता है और जब श्वास निकलने के समय दृत वाञ्छित कार्य को कहता है तो उसका अर्थ सिद्ध नहीं होता है।। ४५॥ लाभादीन्यपि कार्याणि पृष्टानि कीर्तितानि च। जीवे विशति सिद्धन्ति हानिर्निस्सारणे भवेत् ॥ ४६ ॥ जिस समय पाखवायु प्रविष्ट होती है उस समय पूछे या कहे हुए लाभादिक कारय सिद्ध होजाते हैं और जब माणवायु निकलती है उस समय पूर्वोंक कार्यों का विनाश होजाता है॥ ४६॥ नरे दक्षा स्वकीया च स्त्रियां वामा प्रशस्यते। कुम्भको युद्धकाले च तिस्रो नाड्यस्रयीगतिः।४७।। पुरुषों की अपनी दाहनी नाड़ी व त्रियों की वामनाड़ी और युद्ध में कुम्भकनाड़ी पशस्त होती है इस आांति तीन नाड़ियां हैं और उनकी तीजही गति हैं।। ४७॥ उत्तरा्धे द्वितीयाङ्क: । हकारस्य सकारस्व विना भेदं स्वरः कथम्। सोहं हंसपदेनैव जीवो जयति सर्वदा ॥ ४८ ॥ हकार और सकार के भेद बिना स्वरका ज्ञान कैसे होसका है ? इससे जीव 'सोई' तैर 'हंस' इन दो पदों सेही सदैव जयको प्राप्त होता है ॥ ४८॥ शन्याङं पूरितं कृत्वा जीवाङ्गे गोपयेज्यम्। जीवाङ्े घातमाभोति शून्याङ्कं रक्षते सदा ॥। ४६॥। यदि शून्याङ् को पूरितकर जीवाङ्ग की रक्षा करे तो जयको पाता है और यदि जीवाक़ रक्षा न करे तो घात को पाता है इसलिये शून्याङ की सदैव रक्षा करे ॥ ४६॥ वामे वा यदि वा दक्षे यदि पृच्छति पृच्छकः। पूर्णे घातो न जायेत शन्ये घातं विनिर्दिशेत्॥ ५० ॥ यदि वाई या दाहिनी तरफ़ बैठा हुआ पूछनेवाला पूछे उस समय पूर्णस्वर बहता हो घात नहीं होगा और यदि शून्यस्वर प्रतीत हो तो घात (नाश) कहना चाहिये॥ ५०। भूतत्वेनोदरे घातः पदस्थानेडम्बुना भवेत्। ऊरुस्थानेSग्नितत्वेन करस्थाने च वायुना ॥५१॥ पूछने के समय यदि पृथ्वीतत्त्व प्रतीत हो तो उदर में, जलतत्व हो तो पैरों में, अरग्नि व हो तो जङ्गाओं में घाव होगा और यदि वायुतन्त प्रतीत हो तो हाथों में हथियार गेगा ।। ५१। शिरसि व्योमतत्वेन ज्ञातव्यो घातनिर्णयः। एवं पञ्चविधो घातः स्वरशास्त्रे प्रकाशितः॥५२॥ यदि आकाशतत्त्व प्रतीत हो तो शीश में घावका निर्णय जानना चाहिये इस भाति परशास्त्र में पांच प्रकार का घाव प्रकाशित किया है॥ ५२॥ युद्धकाले यदा चन्द्र: स्थायी जयति निश्चितम्। यदा सूर्यप्रवाहस्तु यायी विजयते तदा ॥ ५३ ॥ जयमध्ये तु सन्देहे नाडीमध्यं तु लक्षयेत्। सुषुम्नायां गते प्राणे समरे शत्रुसंकटम् ॥ ५४॥ सुद्ध के समय जब चन्द्रमा का स्वर वहता हो तो स्थायी (ठहरनेवाले) का विजय वय कर होता है औौर जब सूर्यस्वर का प्रवाह चलता हो तो यायो (चढ़नेवाले) =६ सामुद्रिकशाखस्य का विजय होता है और यदि विजय में सन्देह हो तो नाड़ी का मध्य देखे यदि सुपुन्न नाड़ी में पाण चला गया हो तो संग्राम में शत्रुको संकट आरानकर घेरलेता है॥५३।५४। यस्या नाड्या भवेच्चारस्तां दिशं युधि संश्रयेत। तदासौ जयमापोति नात्र कार्या विचारण॥ ५ ५॥! जिस नाड़ी का चलना हो उसी दिशा में जाकर संग्राम में खड़ा होवे तो वह ल़ वाला वीर विजय को पाता है इसमें विचार नहीं करना चाहिये।। ५५ ॥ यदि संग्रामकाले तु वामनाडी यदा वहेत्। स्थायिनो विजयं विद्याद्विपुवश्योदयोऽपिच॥५६॥ यदि संग्राम के समय वामनाड़ी का स्वर वहता हो तो स्थायी का विजय जानना औ यायी का शत्रुके वश में पड़जाने को समझना चाहिये ॥ ५६॥ यदि संग्रामकाले तु सूर्यस्तु व्यावृतो वहेत। तदा यायिजयं विद्यात्सदेवासुरमानवे ॥ ५७ ॥ यदि लड़ाई लड़ने के समय सूर्य का स्वर लगातार बहता रहे तो देवता व राक्षस समेत मानवीयुद्ध में यायी का विजय जानना चाहिये॥ ५७॥ रणे हरति शत्ुस्तं वामायां प्रविशेन्नरः। स्थानं विषुवचारेण जय: सूर्येण घावता॥५८॥ जो मनुष्य वामनाड़ी स्वर के चलते समय लड़ाई में जाता है तो उसको वैरी मार लेता है और यदि सुपुन्ना नाड़ी के वहते हुए लड़ाई में जावे तो स्थान मिलता यानी युद्ध नहीं होता है और यदि सूर्यस्वर के बहते धावा करे तो विजय को पाता है॥ ५८॥ युद्धद्वयकृते प्रश्ने पूर्णस्य प्रथमे जयः। रिक्के चैव द्वितीयस्तु जयी भवति नान्यथा॥ ५६ ॥। जिस समय युद्धविषयक दो प्रश्न किये जावें उस समय पूर्णस्वर बहता हो तो पहली लड़ाई में जय होती है और यदि रिक़स्वर चलता हो तो दूसरी लड़ाई में विजय मिलत है अन्यथा नहीं होसका है॥। ५६॥ पूर्णनाडीगत: पृष्ठे शून्याङ्गं च तदाग्रतः। शून्यस्थाने कृतः शत्रुर्म्रियते नात्र संशयः ॥६०॥ यदि पूर्णनाड़ी में गया हो तो बैरी पीठ देकर भाग जाता है और यदि शून्यनाड़ी का अङ्ग हो तो शत्रु आपरागे आप्रात्ता है अ्परथवा पूर्णस्वर बहता हो तो यायी पीछे से धावा करे उत्तराद्दें द्वितीयाङ्कः । और जो शून्य नाड़ी हो तो आगे से धावा करे तो विजयी होता है क्योंकि शून्य स्थान में किया हुआप्रा शत्रु निःसन्देह मरजाता है ॥ ६० ॥ वामचारे समं नाम यस्य तस्य जयो भवेत्। पृच्छको दक्षिणे भागे विजयी विषमाक्षरः ॥६१ ॥ वामस्वर के चलते समय वामभाग में टिका हुआ पृच्छक युद्ध का प्रश्न करे कि जिसका नाम समान अक्षरोंवाला हो तो उसका विजय होता है और यदि दाहिने स्वर के चलते दाहिनी तरफ़ बैठा हुआ पूछनेवाला लड़ाई को पूछे कि जिसका नाम विपम अक्षरोंवाला हो तो वह विजयी होता है और यदि समान अक्षरवाला नाम हो तो परा- जय होजाता है॥ ६१॥ यदा पृच्छति चन्द्रस्य तदा सन्धानमादिशेत्। पृच्छेद्यदा तु सूर्यस्य तदा जानीहि विग्रहम् ॥ ६२ ॥ यदि चन्द्रमा के स्वर में पृच्छक पूछता है तो सन्धि (मिलाप) होजाने को कहना चाहिये और यदि सूर्यस्वर के चलते समय पूछे तो लड़ाई को जानो ॥ ६२॥ पार्िवे च समं युद्धं सिद्धिर्भवति वारुणे। युद्धेहि तेजसो भङ्गो मृत्युर्वायौ नभस्यपि ॥६३ ॥ यदि पृथ्वीतत्व में युद्ध का आ्ररम्भ हो तो समान युद्ध होता है यानी लड़ाई में बरा- चरी रहती है, यदि जलतत्व में युद्ध हो तो सिद्धि होती है यदि अग्नितत्त्व में युद्ध हो तो भङ्ग होता है और यदि वायु व आकाशतत्त्व में लड़ाई हो तो मौत होजाती है । ६३॥ निमित्तकप्रमादाद्ा यदा न ज्ञायतेऽनिलः। पृच्छाकाले तदा कुर्यादिदं यत्रेन बुद्धिमान् ॥ ६४॥ यदि किसी कारण या असावधानी से प्रश्न के समय प्राणवायु नहीं जानाजाता हो तो बुद्धिमान् मनुष्यको यत्र के साथ यह काम करना चाहिये ॥ ६४ ॥ निश्चलां धारणां कृत्वा पुष्पं हस्तान्निपातयेत्। पूर्ण ङ्गे पुष्पपतनं शन्यं वा तत्परं भवेत्॥ ६५ ॥ निश्ल धारणा को कर फूलको हाथ से गिरावे यदि पूर्णङ् में फूलका पतन हो तो कार्य पूर्ण होजाता है और यदि शून्याङ्ग में फूल का गिरना हो तो कार्य निष्फलता को जाता है।। ६५ ॥. तिष्ठन्रुपविशन्नापि प्राणमाकर्षयन्निजम्। सामुद्विकशास्त्रस्य मनोभङ्गमकुर्वाणः सर्वकार्येषु जीवति ॥६६॥ जो मनुष्य खड़ा हेता या बैठता या मन को नहीं विगाड़ता हुआ अपनी प्राणवायु को खींचता है तो वह समस्त कार्यों में जीता है यानी उसके सम्पूर्ण कार्य सिद्ध होजाते हैं॥ ६६॥ न कालो विविधं घोरं न शस्त्रं नच पन्नगाः। न शत्रुव्याधिचौराद्याः शन्यस्था नाशितुं क्षमाः॥६७॥। काल, अनेक भयकारी हथियार, सांप, वैरी, व्याधि (रोग) और चौर आदि ये शून्यस्थान में टिकेहुए विनाश करने को समर्थ नहीं होसके हैं ॥६७ ॥। जीवेन स्थापयेद्ायुं जीवेनारम्भयेत्पुनः। जीवेन क्रीडते नित्यं द्यूते जयति सर्वथा॥ ६८ ॥। जीवस्वरसे वायुको स्थापित करे व जीवसेही आररम्भ करे व जीवस्वरसेही हमेशा जुआा खेलता रहे तो सर्वथा जुआ में जय होती है।। ६८ ॥। स्व्ररज्ञानिबलादग्रे निष्फलं कोटिधा भवेत्। इहलोके परत्रापि स्वरज्ञानी बली सदा ॥ ६६ ॥। स्वरज्ञानी के बलके सामने करोड़ों प्रकारका बल निष्फल होजाता है क्योंकि इस लोक या परलोक में स्वरज्ञानीही सदैव बलवान् होता है॥ ६६॥ दशशतायुतं लक्षं देशाधिपवलं क्कचित्। शतकतुमुरेन्द्राणां वलं कोटिगुएं भवेत् ॥ ७० ॥ कितेक मनुष्य को दश, कितेक को सौ, कितेक को दश हजार, कितेक को लाख, कितेक को देशाधिपत्य का बल होता है इससे इन्द्र और ब्रह्मा आदि देवताओं का वल कोटिगुना होता है ऐसेही सब बलों में से स्वरका बल कोटिगुना कहा है॥ ७० ॥ देव्युवाच । परस्परं मनुष्याणां युद्धे प्रोक्तो जयस्त्वया। यमयुद्धे समुत्पन्ने मनुष्याणां कथं जयः ॥ ७१॥ श्रीदेवीजी बोलीं कि मनुषयों के परस्पर युद्ध में आपने जय को कहा जब यमराज के साथ युद्ध हो तब मनुष्यों की जय कैसे होसकी है ॥ ७१॥ ईश्वर उवाच। ध्यायेद्देवं स्थिरो जीवं जुहुयाज्जीवसंगमै। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । दह इष्टसिद्धिर्भेवेत्तस्य महालाभो जयस्तथा ॥७२॥ श्रीसदाशिवजी बोले कि, अहो पाणामिये! जो मनुष्य स्थिर होकर इष्टदेवका ध्यान करे और जीवसंगम (नाभिचक्र) में जीव (प्राणवायु) का होम करे तो उस मनुष्य की इष्टसिद्धि व महालाभ होकर जय प्राप्त होती है।। ७२ ॥। निराकारात्समुत्पन्नं साकारं सकलं जगत्। तत्साकारं निराकारं ज्ञाने भवति तत्क्षणात्॥७३॥ निराकारसे सारा जगत् साकार होकर उपजा है और जब ज्ञान होता है. तब वह साकार (जगत्) उसीक्षय निराकार होजाता है॥ ७३॥ देव्युवाच। नरयुद्धं यमयुद्धं त्वया प्रोक्कं महेश्वर। इदानीं देवदेवानां वशीकरणकं वद ॥७४॥ श्रीपार्वतीजी बोलीं कि हे देवाधिदेव महेश्वरजी! नरयुद्ध और यमयुद्ध को तो आपने कहा अब वशीकरण को भी बतलाइये॥ ७४॥ ईश्वर उवाच। चन्द्रं सूर्येण चाकृष्य स्थापयेजीवमरडले। आाजन्मवशगा रामा कथितेयं तपोधनैः ॥७॥ श्रीमहादेवजी बोले कि, स्त्री के चन्द्रस्वर को सूर्यस्वर से खींचकर जीवमएडल में स्थापित करे तो वह रमणी जन्मपर्यन्त वंश में रहती है यह तपस्विर्योंने कहा है॥ ७५ ॥ जीवेन गृह्यते जीवो जीवो जीवस्य दीयते। जीवस्थाने गतो जीवो बाला जीवान्तकारकः ॥७६ ॥ पुरुष जीवस्वर से स्त्री के जीवस्वर को ग्रहण करे और रमणी के जीवस्वर में अपना नीवस्वर दे इस भांति जीवके स्थान में गया हुआ जीव जिसका हो वह नर जन्मपर्यन्त रमखी के वश में रहता है।। ७६ ॥ रात्र्यन्तयामवेलायां प्रसुप्े कामिनीजने। ब्रह्मजीवं पिबेद्यस्तु बालाप्राणहरो नरः॥७७॥ रात्रिके पिछले प्रहर के समय कामिनीजनके सोते हुए जो पुरुष ब्रह्मजीव (चन्द्र- सवर) को पीता है वह मनुष्य स्त्रियों के प्रारणों को वश में करता है॥ ७७॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य अ्ष्टाक्षरं जपित्वा तु तस्मिन्काले गते सति। तत्क्षणं दीयते चन्द्रो मोहमायाति कामिनी॥७८ ॥ उस समय के व्यतीत होजाने पर अष्टाक्षर मन्त्र को जप कर जो पुरुप अपना चन्द्रस्वर स्त्री को देता है तो वह कामिनी उसीक्षण मोह को प्राप्त होती है। ७८॥ शयने वा प्रसङ्के वा युवत्यालिङ्गनेऽपि वा। यः सूर्येण पिबेचन्द्रं स भवेन्मकरध्वजः ॥७६॥ शयन करने के समय या स्त्रीमसंग या युवती के आलिङ्वन में भी जो पुरुप सूर्यस्वर से चन्द्रस्वर को पीता है वह कामदेव के समान मोह करनेवाला होता है॥ ७६॥ शिंव आलिङ्ग्यते शक्त्या पसङ्गे दक्षिणेऽपि वा। तत्क्षणादापयेद्यस्तु मोहयेत्कामिनीशतम् ॥८०॥ चन्द्रस्वर से सूर्यस्वर आलिङ्न किया जाता है इसलिये दक्षिणावर्त प्रसंग के होते हुए जो पुरुप कामिनी के चन्द्रस्वर में अपने सूर्यस्वर को देता है तो वह सैकड़ों कामि- नियों को मोहित कर सक्ा है॥। ८० ॥ सप्नवत्रयः पञ्चवारान्संगस्तु सूर्यभे। चन्द्रे द्वितुर्यषद् कृत्वा वश्या भवति कामिनी ॥८१॥ स्त्रीके चन्द्रस्वरको अपने सूर्यस्वर में देने के बाद सात ७ नव ह तीन ३ या पांचवार संग होजावे अथवा स्त्रीके चन्द्रस्वरमें अपना सूर्यस्वर देकर दो २ चार ४ या छः ६ बार मिलजावे तो वह कामिनी वशमें होती है॥ ८१ ॥ सूर्यचन्द्रौ समाकृष्य सर्पाक्रान्त्याघरोष्ठयोः। महापझ्मे मुखं स्पृष्टा वारं वारमिदं चरेत्।८२।। अपने सूर्य व चन्द्रस्वर को सर्प की गति से खींच कर अधरोंष्ठों पर स्त्री के मुखमें अपना मुख लगाकर वारम्वार पूर्वोक्क प्रकार से चन्द्र और सूर्यस्वरका मेल करता रहे॥ ८२ ॥ आप्राणमिति पद्मस्य यावत्निद्रावशंगता। पश्चाज्जागर्तिवेलायां चोष्यते गलचक्षुषी।८३ ।। जब्र तक स्त्री निद्रा के वश में रहे तवतक पूर्वोक्कप्कार से रमणी के मुखपद्म का पान करे पीछे जागने के समय गला व नेत्रों का चुम्बन करे॥ =३ ॥ १ कामदेव: २ सूर्यस्वरः ३ चन्द्रस्वरेण ।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । अ्र्परनेन विधिना कामी वशयेत्सर्वकामिनीः। इदं न वाच्यमन्यस्मिन्नित्याज्ञा पारमेश्वरी॥ ८४॥ कामीपुरुष इसी विधि से सब कामिनियों को वश में करता है यह वशीकरण ज्ञान अन्यलम्पट पुरुप से नहीं कहना चाहिये यह परमेश्वर की आज्ञा है॥। ८४ः॥ इति वशीकरणम् ॥ अथ गर्भप्रकरणम्। ऋतुकालभवा नारी पञ्चमेडह्ि यदा भवेत्। सूर्याचन्द्रमसोर्योंगे सेवनात्पुत्रसंभवः ॥। =५ ॥ ऋतुकाल के अनन्तर जब स्त्री को पांचवां दिन हो और पुरुष का सूर्यस्वर व स्त्री का चन्द्रस्वर बहता हो उस समय सेवन करने से पुत्रका संभव होता है।। ८५ ॥ शङ्गवल्लीगवां दुग्धे पृथ्व्यापो वहते यदा। भर्तुरेव वदेद्ाक्यं दर्प देहि त्रिभिर्वचः ॥८६॥ जिस समय पृथ्वी और जलतर्व बहते हों उस समय स्त्री को गौके दूध में शङ्गवल्वी को खिलावे फिर रमणी अपने स्वामी से तीन बार भोग करने की प्रार्थना करे॥ ८६॥ ऋतुस्नाता पिवेन्नारी ऋतुदानन्तु योजयेत्। रूपलावरायसम्पन्नो नरसिंहः प्रसूयते ॥ ८७॥ जब ऋतुस्नाता रमणी उक्क औषधका पान करलेवे उस समय पुरुष ऋतुदान को देवे तो रूप व सुन्दरता से संपन्न होता हुआ नरसिंहरूप होकर वालक पैदा होता है॥। ८७॥ सुषुम्ना सूर्यवाहेन ऋतुदानं तु योजयेत। अङ्गहीन: पुमान्यस्तु जायते त्रासविग्रहः॥८८ ॥ विषमाङ्के दिवारात्रौ विषमाङ्के दिनाधिपः । चन्द्रने
सृष्टिक्रमं (Part 3)
त्राग्नितत्त्वेषु बन्ध्यापुत्रत्वमाप्ुयात्।।=६।। जो मनुष्य सूर्यस्वर के प्रवाह के साथ सुपुम्ना स्वर के बहने के समय ऋतुदान को देता हैं तो उसके अङ्गहीन व कुरूप होकर बालक उपजता है व ऋतु के अनन्तर विपमाङ्गवाले द्दिन-रात्रि हों व विषमाङ्क में ही सूर्यस्वर बहता हो और पृथ्वी, जल व अग्नितत्त्व वहते उस समय बन्ध्या रमणी भी यदि गर्भको धारे तो पुत्रको पाती है॥ ८८।८६ ॥ ऋत्वारम्भे रविः पुंसां स्त्रीणां चैव सुधाकरः। सामुद्रिकशास्त्रस्य उभयोः संगमे प्राप्ते बन्ध्या पुत्रमवामुयात्॥ ६० ॥। यदि ऋतुकालके आ्ररम्भ में पुरुषों का सूर्यस्वर चलता हो व स्त्रियों का चन्द्रस्वर बहता हो उस समय दोनों का संगम प्राप्त होजावे तो बन्ध्या भी पुत्रको पाती है॥। ६ै० ॥ ऋत्वारम्भे रविः पुंसां शुक्रान्ते च सुधाकरः । अ्रनेन क्रमयोगेन नादत्ते देवि दारकम् ॥ ६१ ॥ यदि भोग के आरम्भ में पुरुपों का सूर्यस्व्रर चले और वीर्यपात के समय चन्द्रस्वर बहने लगे तो हे देवि ! इस क्रमयोग से स्त्री गर्भको नहीं धारती है। ६१ ॥ चन्दनाडी यदा प्रश्ने गर्भे कन्या तदा भवेत। सूर्यो भवेत्तदा पुत्रो द्वयोर्गर्भो विहन्यते ॥ ६२ ॥ यदि गर्भिणी के प्रश्न समय चन्द्रनाड़ी चले तो गर्भ में कन्या उपजती है और यदि सूर्य स्वर वहे तो पुत्र होता है और यदि दोनों चलते हों तो गर्भही बिनष्ट होजाता है ॥ ६२॥ पृथ्वी पुत्री जले पुत्रः कन्यका तु प्रभञ्जने। तेजसि गर्भपातः स्यान्नभस्यपि नपुंसक: ॥६३ ॥ यदि प्रश्न के समय पृथ्वीतत्त्व हो तो पुत्री, जलतच्व्र हो तो पुत्र, वायुतच्त्र हो तो कन्या, तेजतच्व हो तो गर्भ का पात और यदि आकाशतच्व्र हो तो नपुंसक पैदा होता है।। ६ ३ । चन्द्रे स्त्री पुरुषः सूर्यो मध्यमार्गे नपुंसकः । गर्भप्रश्ने यदा दूतः पूर्णे पुत्रः प्रजायते ॥ ६४ ॥ यदि गर्भपश्न के समय चन्द्रस्वर चलता हो तो पुत्री, सूर्यस्वर चलता हो तो पुत्र, सुपुन्ना स्वर हो तो नपुसक होता है और यदि पूर्णस्वर में दूत प्रश्न करे तो पुत्र पैदा होता है।। ६४ ।। शून्ये शून्यं युगे युग्मं गर्भपातश्र संक्रमे। तत्त्ववित्स विजानीयात्कथितं तत्तु सुन्दरि ॥ ६५ ॥ अहो सुन्दरि ! पूछनेवाला शून्यस्वर में प्रश्न करे तो शून्य, दोनों स्वर में जो पूछे तो जोड़ा (कन्या, पुत्र) पैदा होता है और यदि स्वरों का संक्रम या सुपुन्ना हो तो गर्भ का पात तत्ववेत्ताओं को जानना चाहिये।। ६५ ।। गर्भाधानं मारुते स्याच दुःखी दिक्षु ख्यातो वारुणे सौख्ययुक्ः। गर्भसावः स्वल्पजीवश्च वहौ भोगी भव्य: पार्थिवेनार्थयुक्ः॥ ६६॥ उत्तरार्धे द्ितीयाङ्ग । यदि वायुतत्व में गर्भाधान हो तो दुःखी, जलतत्त्व में हो तो दिशाओं में विख्यात होकर सुखी, अग्नितत्व में हो तो गर्भपात या अल्पजीवी होता है और यदि पृथ्वीतत्व हो तो भोगी व धनी होकर भाग्यवान् पुत्र पैदा होता है ।। ६६ ।। धनवान्सौख्ययुकश्च भोगवानर्थसंस्थितिः। स्यान्नित्यं वारुणे तत्त्वे व्योम्नि गर्भो विनश्यति ॥६७।। यदि जलनत्व में गर्भाधान हो तो धनवान, सौख्यवान, भोगवान् कि जिसके समीप सदैव धन रहता है ऐसा पुत्र पैदा होता है और यदि आकाशतत्व में गर्भाधान हो तो गर्ही विनष्ट होजाता है॥ ६७।। माहेन्द्रे सुसुतोत्पत्तिर्वारुणे दुहिता भवेत्। शेषेषु गर्भहानिः स्याज्जातमात्रस्य वा मृतिः ॥६८॥ यदि पृथ्वीतत्व में गर्भाधान होवे तो पुत्रकी उत्पत्ति होती है यदि जलतत्त्व में गर्भ रहे तो पुत्री होती है और यदि शेपतत्वों में गर्भ रहे तो उसकी हानि होजाती है या पैदा होते ही मरजाता है॥ ६८ ॥ रविमध्यगतश्चन्द्रश्चन्द्रमध्यगतो रविः। ज्ञातव्यं गुरुतः शीघ्रं न वेदैः शास्त्रकोटिमिः ॥६६॥ सूर्यस्वर के मध्य में चन्द्रस्वर की व चन्द्रस्वर के बीच में सूर्यस्वर की गति गुरु से शीघ्र जानना चाहिये क्योंकि वह गति वेदों व करोड़ों शास्त्रों से भी नहीं जानी जाती है।। ६६।। चैत्रशुक्कप्रतिपदि प्रातस्तत्त्वविभेदतः। पश्येद्धिचक्षणो योगी दक्षिणे चोत्तरायणे॥ ३००॥ चैत्रमास शुक्कपक्ष प्रतिपदा को प्रभात के समय तत्वों के विचार से दक्षिणायन और उत्तरायण का फल चतुरयोगी को देखना चाहिये यानी तत्वों के विभेद से सालभरे का फल बता देना चाहिये॥। ३०० ॥ चन्द्रोदयस्य वेलायां वहमानोऽथ तत्त्वतः। पृथिव्यापस्तथा वायुः सुभिक्षं सर्वसस्यजम् ॥ १ ॥ चन्द्रस्वर के उदय के समय यदि पृथ्वी, जल और वायुतत्व बहता हो तो सब खेती बारी के लिये सुभिक्ष होता है ॥ १॥ तेजोव्योम्नोर्भयं घोरं दुर्भिक्षं कालतत्त्वतः। एवं तत्त्वफलं ज्ञेयं वर्षे मासे दिनेष्वपि॥ २॥ सामुद्विकशास्त्रस्य यदि चन्द्रोदय के समय अग्नि और आकाशतत्व बहता हो तो घोरभय और अकाल पड़ता है इस भांति समय के तच्वानुसार वर्ष, मास और दिनों में भी समस्त तत्वों का फल जानना चाहिये॥ २ ॥ मध्यमा भवति क्ररा दुष्टा सर्वेषु कर्ममु। मध्यमा (सुपुन्ना) नाड़ी कूर व सब कर्मों में बुरी होकर देशभङ्क, महारोग, क्ेश और कष्टआादि दुःखों की देनेवाली होती है । ३॥ मेषसंक्रान्तिवेलायां स्वरभेदं विचारयेत्। सँव्वत्सरफलं ब्रयाल्लोकानां तत्त्वचिन्तकः ॥४ ॥ यदि मेपकी संक्रान्ति के समय स्वरभेद का विचार करे तो तत्वचिन्तक योगीजन लोगों से साल भरे का फल कहसका है।। ४ ।। पृथिव्यादिकतत्वेन दिनमासाव्दजं फलम्। शोभनं च यथा दुषट व्योममारुतवह्निमिः॥५॥ मेपसंक्रान्ति के समय पृथ्वीआदिक तत्वों से दिन, मास और वर्ष का फल भला जानना चाहिये और आकाश, वायु व अग्नितत्वों से निन्दित फल कहना चाहिये॥ ५॥ सुभिक्ष राष्ट्रवृद्धि: स्याद्बहुसस्या वमुन्धरा। बहुवृष्टिस्तथा सौख्यं पृथ्वीतत्त्त्वं वहेद्यदि॥ ६॥ यदि मेपसंक्रान्ति के दिन पृथ्वीतत्त्व बहता हो तो सुभिक्ष, देशवृद्धि, अधिक धान्य वाली पृथ्वी, घनी दृष्टि और बड़ा सुख होता है ॥ ६ ॥ अतिवृष्टिः सुभिक्ष स्यादारोग्यं सौख्यमेव च। बहुसस्या तथा पृथ्वी अप्त्त्वं वै वहेद्यदि।। ७॥ यदि जलतरव बहता हो तो महावृष्टि, सुकाल, आरोग्य, सौख्य और पृथ्वी अधिक धान्यवाली होती है।। ७॥ दुर्भिक्षं राष्ट्रभङ्ग: स्यादुत्पत्तिश्र विनश्यति। अल्पादल्पतरा वृष्टिरग्नितत्त्वं वहेद्यदि।८॥। यदि मेपसंक्रान्ति के दिवस अग्नितत्व बहता हो तो आकराल पड़ता है, देशका भग्र होजाता है, उपज की क्षय होती है और वर्षा बहुत ही कम होती है॥। ८ ।। १ बसा हुआ देश या मुल्क॥ उत्तरार्ध्द्रे द्वितीयाङ्क:। उत्पातोपद्रवा भीतिरल्पा वृद्धि: स्युरीतयः । मेपसंक्रान्तिवेलायां वायुतत्त्वं वहेद्यदि॥ ६ ।। यदि भेप की संक्रान्ति के समय वायुतत्व बहता हो तो उत्पात, उपद्रव, भीति, थोड़ी सी वृद्धि और ईतियां होती हैं ।। ६ ।। मेपसंक्ान्तिवेलायां व्योमतत्त्वं वहेद्यदि। तत्रापि शून्यता ज्ञेया सस्यादीनां सुखस्य च ॥ १० ॥ यदि मेपकी संक्रान्ति के समय आ्र्परकाशतच्त्र बहता हो तो धान्य आदि और मुखकी शून्यता जानना चाहिये ॥ १० ॥ पूर्णप्रवेशने श्वासे सस्यं तत्त्वेन सिद्धयति। सूर्यचन्द्रेऽन्यथाभूते संग्रहः सर्वसिद्धिदः ॥ ११॥ यदि श्वासका पूर्णप्रवेश होजावे तो तत्व से धान्य की सिद्धि होती है और यदि तच्वो- दय के समय सूर्य व चन्द्रस्वर विपरीत होवें यानी चन्द्र के योगमें सूर्यस्वर व सूर्य के योग पें चन्द्रस्वर बहता हो तो अन्र का संग्रह सर्वसिद्धिदायक होता है ॥ ११ ॥ विषमे वह्नितत्त्वं स्याज्ज्ञायते केवलं नभः। तत्कुर्याद्धस्तुसंग्राहो द्विमासे च महर्घता ॥ १२ ॥ यदि दक्षिणस्वर में अग्नितत्व या केवल आकाशतत्त्व ही जाना जाता हो तो वस्तुओं का संग्रह करे क्योंकि दो महीने में महँगी पड़ेगी उससे बड़ा लाभ होगा ॥ १२ ॥ रवौ संक्रमते नाडी चन्द्रमन्ते प्रसर्पिता। खानिले वहियोगेन रौरवं जगतीतले ॥१३॥ यदि रात्रि के समय सूर्य की नाड़ी बहती हो और प्रभात के समय चन्द्रमा की नाड़ी चलती हो और उसी समय आकाश, वायु और अग्नितत्व का योग हो तो पृथ्वीतल में बढ़ा अनर्थ होता है॥ १३॥ इति संवत्सरप्रकरणम् ॥। अथ रोगप्रकरखम्। महीतत्त्वे स्वरोगश्च जले च जलमातृतः। तेजास खेटवाटीस्थशाकिनीपितृदोषतः ॥१४॥ सामुद्विकशास्त्रस्य यदि रोगप्रश्न के समय पृथ्वीतत्व्र बहता हो तो अपने पापसे रोग होता है और यहि जलतत्व चलता हो तो जलमातृकाओं के दोप से बाधा होती है और यदि अग्नितत्त् बहता हो तो खेटवाटी में टिकी शाकिनी या पितरों के दोष से पीड़ा उपजती है ॥ १४॥ आदौ शन्यगतो दूतः पश्चात्पूर्णे विशेद्यदि। मृर्च्छितोऽपि ध्रुवं जीवेद्यदर्थ प्रतिपृच्छति ॥१५ ॥ यदि प्रश्न करनेवाला दूत पहले शून्य अङ्की तरफ आया हो व पीछे से पूर्ाङ् की तरफ़ बैठजावे तो जिस रोगी के लिये पूछता है वह मूर्च्छित भी होगया हो तो भी निश्चय से जीता है।। १५ ।। यस्मिन्नङ्गे स्थितो जीवस्तन्रस्थः परिपृच्छति। तदा जीवति जीवोसौ यदि रोगैरुपड्तः ।१६।। • जिस अङ्ग में प्राणवायु टिका हो उसी तरफ़ बैठा हुआ दूत जिस रोगी को पूछ्ता है वह यदि रोगों से घिर भी गया हो तो भी जीता है ॥ १६॥ दक्षिणेन यदा वायुर्दूतो रौद्राक्षरो वदेत। तदा जीवति जीवोऽसौ चन्द्रे समफलं भवेत् ॥ १७॥। यदि दाहिने स्वर से वायु बहता हो उसी समय आया हुआ दूत मुख से भयानक वचनों को बोले तो वह जीव जीता है और यदि चन्द्रस्वर चलता हो तो समान फल होताहै॥ १७॥ जीवाकारं च वा धृत्वा जीवाकारं विलोक्य च। जीवस्थो जीवितप्रश्ने तस्य स्याज्ीवितं फलम् ॥१८ ॥ जीवाकार को धारकर और जीवाकार को देखकर जिस तरफ़ माणणवायु बहता हो उस तरफ़ बैठा हुआ दूत जीवित का प्श्न करे तो उस रोगी का जीवित फल होता है ॥ १८॥ वामचारे तथा दक्षप्रवेशे यत्र वाहने। तत्रस्थः पृच्छते दूतस्तस्य सिद्धिर्न संशयः ॥१६॥ वामनाड़ी (इडा) तथा दक्षिणनाड़ी (पिङ्ला) इन दोनों के चलने या प्रवेश करने के समय जिस तरफ़ का स्वर बहता हो उसी तरफ़ बैठा हुआ दूत जिस रोगी को पूछता है उसकी निस्सन्देह सिद्धि होती है ॥ १६ ॥ प्रश्ने चाधस्थितो जीवो नूनं जीवोहि जीवेति। ऊर्ध्वचारस्थितो जीवो जीवो याति यमालयैम्॥ २० ॥ १ प्राणाधारएं करोति २ यमलोकम् ।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । यदि प्रश्न के समय दूत अधोभाग में बैठा हो तो वह रोगी निश्चय कर जीता है और दि दूत ऊपरले भाग में टिका हो तो जीव यमालय को जाता है ॥ २० ॥ विषमाक्षरयुते प्रश्ने रिक्ायां पृच्छको यदि। विपर्ययं च विज्ञेयं विषमस्योदये सति ॥२१॥ यदि विपम नाड़ी (सुषुन्ना) का उदय हो और प्रश्नकर्ता रिक्नाड़ी में मश्न करे कि जिसके अक्षर विपम हों तो विपरीत फल जानना चाहिये ।। २१॥ चन्द्रस्थाने स्थितो जीवः सूर्यस्थाने तु पृच्छकः । तदा प्राणवियुक्कोसौ यदि वैद्यशतैर्वृतः ॥२२॥ यदि मावायु चन्द्रमाके चारमें टिकी हो और पूछनेवाला सूर्य के चार में बैठा हो वह रोगी चाहे सैकड़ों वैद्यों से घिरा भी हो तो भी मरजाता है ॥ २२॥ पिङ्गलायां स्थितो जीवो वामे दूतस्तु पृच्छति। तदापि श्रियते रोगी यदि त्राता महेश्वरः ॥ २३॥ यदि प्राणवायु पिङ्गला नाड़ी में टिकी हो और दूत वामभाग में पूछता हो तो भी गी मरजाता है चाहे महादेव भी रक्षा क्यों न करें॥ २३॥ एकस्य भूतस्य विपर्ययेण रोगाभिभूतिर्भवतीह पुंसाम्। तयोर्द्वयोर्वन्धुसुहृद्धिपत्तिः पक्षद्ये व्यत्ययतो मृतिःस्यात्॥२४।। एक तत्व के विपरीत होने से पुरुषों को रोग पीड़ित करते हैं और दो तच्वों के विप- पत होनेसे बन्धुओ्ं व मित्रों से विपदा आकर घेरती है और यदि मासपर्यन्त व्यत्यय लाजावे तो मरण ही होजाता है॥ २४ इति रोगप्रकरणम् ॥ अथ कालपकरणम्। मासादौ चैव पक्षादौ वत्सरादौ यथाक्रमम्। क्षयकालं परीक्षेत वायुचारवशात्सुघीः॥२५॥ मास, पक्ष और वर्ष इनके आदि में क्रमसे विद्वान् योगी वायुचार के बश से मरणा समय की परीक्षा करे॥ २५॥ पञ्चभूतात्मकं दीपं शिवस्नेहेन सिञ्चितम्। १ परितः पश्येत् २ सुषध्यायति- शोभनाधीर्यस्येति वा॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य रक्षयेत्मूर्यवातेन प्राणी जीवः स्थिरो भवेत्॥२६॥ . शिवरूप तैलसे सींचेहुए पश्चभूतवाले दीप (देह) को जो प्राणी सुर्यरूप वायुसे रक्षा करता है उसका जीव स्थिर बनारहता है॥ २६ ॥ मारुतं बन्धयित्वा तु सूर्यं बन्धयते यदि। छभ्यासाज्जीवते जीवः सूर्यकालेऽपि वश्चिते ॥२७॥ जो मनुष्य मारणवायु को बांध कर दिन भर सूर्य स्वर को बांधे रहता है इस भांति जब अभ्यास के बल से सूर्यकाल भी वश्चित होजाता है तब जीव जीवित रहता है॥ २७ ॥ गगनात्स्रवते चन्द्रः कायपद्मानि सिश्चयेत्। कर्मयोगात्सदाभ्यासैरमरः शशिसंश्रयात् ॥ २८॥ आकाश से भिरता हुआ चन्द्रमा कायारूप पद्मों को सींचता है इस प्रकार योगी चन्द्रमा का आश्रय लेने से सदा अभ्यास के द्वारा अमर होजाता है ॥ २८ ॥ शशाङं वारयेद्रात्रौ दिवा वार्यो दिवाकरः। इत्यम्यासरतो नित्यं स योगी नात्र संशयः ॥ २६॥ जो रात्रिमें चन्द्रस्वर और दिनमें सूर्यस्वरर को बराता है इस भांति सदैव अभ्यास में लगारहता है वह निस्सन्देह योगी कहलाता है॥ २६ ॥ अहोरात्रे यदैकत्र वहते यस्य मारुतः । तदा तस्य भवेन्मृत्युः संपूर्णे वत्सरत्रये॥ ३०॥ जिसका माणवायु दिन रात एकही स्थानमें बहता रहे तो उस मनुष्य की पूरे तीन वर्षमें ही मृत्यु होजाती है॥ ३० ॥ अहोरात्रद्धयं यस्य पिङ्नलायां सदागतिः। तस्य वर्षद्यं प्रोक्कं जीवितं तत्त्ववेदिभिः ॥३१॥ जिसका प्रायवायु दो दिन रात लगातार पिङ़लानाड़ी मेंही बहता रहे उसका जीवन तच्ववेत्ताओंने दो वर्षका कहा है। ३१ ।। त्रिरात्रे वहते यस्य वायुरेकपुटे स्थितः । तदा संवत्सरायुस्तं प्रवदन्ति मनीषिणः ॥ ३२ ॥ १ "श्वसनः स्पर्शनो वायुर्मातरिश्त्रा सदागतिः" (इत्यमरः)॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । . हह जिस मनुष्यका माखवायु एकही नासापुट में तीनरात पर्यन्त बहतारहे तो पसिडतलोग इसकी आयुर्दाय सालभरे की कहते हैं॥। ३२ ॥ रात्रौ चन्द्रो दिवासूर्यो वहेद्यस्य निरन्तरय। जानीयात्तस्य वै मृत्युः परमासाभ्यन्तरे भवेत् ॥ ३३ ॥ जिस सनुष्य का रात्रि में चन्द्रस्वर और दिन में सुर्यस्वर लगातार बहता रहे े उसकी मृत्यु छः महीना के भीतर ही होजाती है ऐसा जानना चाहिये ।। ३३॥ लक्ष्ये लक्षितलक्षणेन सलिले भानुर्यदा दृश्यते क्षीणो दक्षिणपश्चिमोत्तरपुरः पदत्रिद्विमासैकतः । मध्यं छिद्रमिदं भवेहदशदिनं धूमाकुलं तहिने सर्वजञैरपि भाषितं सुनि वरैरायुः प्रमाणं स्फुटय् ॥ ३४॥। लखे हुए लक्षणवाले पुरुष को लक्ष्यरूप जलमें जय सूर्य का मएडल दक्षिण, थ्रिम, उत्तर व पूर्व की तरफ़ कटा हुआ देख पड़ता हो तो करमसे छः तीन दो और क मास की आयुर्दार्य समझनी चाहिये यानी दक्षिण में कटा सा दीखे तो छः मास, श्रिम में तीन मास, उत्तर में दो मास और पूर्व में एक मास की आयु कहना उचित । यदि मणडल के मध्य में छेद दीखे तो दरदिन की आयु जानना चाहिये और दि पूर्णमएडल में धुवां सा प्रतीत होता हो तो उसी दिन मृत्यु होती है यह सर्वज्ञाता निवरों ने आयुर्दाय का मकट पमारण कहा है॥ ३४ ॥ दूतः कृष्णकषायकृष्णवसनो दन्तक्षतो मुसिडत- स्तैलाभ्यक्शरीररज्जुककरो दीनश्र पूर्णोत्तरः। अस्माङ्गारकपालपाशमुशलीमूर्यास्तमायाति यः काली शून्यपदस्थितो गदयुतः कालानलस्यादृतः॥ ३५॥ यदि पूछनेवाला दूत काले या भगवें कपड़े पहने हो कि जिसके दांतों में घाव हो शीश ुँड़ाये हो व बदन में तेल लगाये हो व हाथ में रस्सी लिये हो व दीन हो व त्तर देने में समर्थ और भस्म,अँगार, कपाल व मूसल को धारे कालाव नहे पैरोंवाला कर सर्यास्त के समय पूछने को आवे तो रोगी कालानल से आदर किया जाता यानी रजाता है॥। ३५ ॥ अकस्माच्चित्तविकृतिरकस्मात्पुरुषोत्तम: । अकस्मादिन्द्रियोत्पातः सन्निपाताग्रलक्षणम्॥ ३६॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिस रोगी के चित्त में एकाएकी विकार आजावे व अकस्मात् पुरुषों में उत्तम होजावे व अरक्रस्मात् इन्द्रियों में उत्पात देखेजावें तो यह सन्निपात का पूर्व लक्षण होता है॥२६॥ शरीरं शीतलं यस्य प्रकतिर्विकृता भवेत्। तदरिष्टं समासेन व्यासतस्तु निबोध मे ॥३७॥ जिस मनुष्य का शरीर शीतल होगया हो और प्रकृति विकारयुक् होगई हो यानी स्वभाव बदल गया हो वह अरिष्ट संक्षेप से जानना चाहिये अब विस्तार से मुझ से सुनो ॥ ३७ ॥ दुष्टशब्देषु रमते शुद्धशव्देषु चाप्यति। पश्चात्तापो भवेद्यस्य तस्य मृत्युर्न संशयः ॥३८॥। जो मनुष्य बुरे वचनों को बकता हुआ शुद्धशब्दों को बहुतही बोलता है और जिसको पीछे से पछितावा होता है उसकी निस्संदेह मृत्यु होजाती है ॥ ३८॥ हुंकारः शीतलो यस्य फूत्कारो वह्िसन्निमः। महावैद्यो भवेद्यस्य तस्य मृत्युर्भवेद् ध्रुवम्॥ ३६॥ जिस मनुष्य का 'हुंकार' शीतल हो और 'फूत्कार' आगी के समान हो और जिस के पास महावैद्य (वड़ा डाक्टर या हकीम) भी विद्यमान हो तौ भी उसकी मृत्यु निश्चय कर होजाती है॥ ३६ ॥ जिह्वां विष्णुपदं ध्रुवं सुरपदं सन्मातृकामएडल- मेतान्येवमरुन्धतीममृतगुं शुक्रं ध्रुवं वा क्षणम्। एतेष्वेकमपि स्फुटं न पुरुषः पश्येत्पुरः प्रेषितः सोऽवश्यं विशतीह कालवदनं संवत्सरादूर्ध्वतः॥४०॥ जीभ, आकाश, ध्ुव, देवमार्ग, मातृकामएडल, अरुन्धती, चन्द्रमा, शुक्र और अगस्ति इन्हों में से एक को भी पहले से भेजा हुआ जो पुरुप प्रकट नहीं देखता है वह वर्षभरे के बाद काल के मुख में अवश्य समाजाता है॥ ४०॥ अरश्मिबिम्वं सूर्यस्य वह्ेः शीतांशुमालिनः। दृष्ट्रैकादशमासायुर्नरश्रोर्ध्व न जीवति।।४१।। जो मनुष्य सूर्य, आगी और चन्द्रमाके मएडलको किरणरहित देखता है वह ग्यारह मासकी आयुवाला होता हुआ उससे अधिक नहीं जीसक़ा है ।। ४१॥ १ शीतलतासमेतः २ अ्रग्निसमान: ३ निश्चितम्॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्: । वाप्यां पुरीषमूत्राणि सुवएं रजतं तथा। प्रत्यक्षमथवा स्वभे दशमासान्न जीवति॥४२॥ जो पुरुष स्वम त्रथवा जाग्रत् अवस्था में बावलीके भीतर विष्ठा, मूत्र, सुवर्स और चांदी को देखता है वह दशमास से अधिक नहीं जीता है।। ४२॥ क्कचित्पश्यति यो दीपं सुवणं च कपान्वितम्। विरूपाणि च भूतानि नव मासान्न जीवति॥४३॥ जो मनुष्य दीपक व कसौटी पर कसा हुआ सोना और समस्त माणियों को कभी भी विपरीतसा देखता है वह नवमाससे अधिक नहीं जीसक़ा है। ४३॥ स्थूलाङ्गोऽपि कृशः कृशोपि सहसा स्थूलत्वमालभ्यते प्राप्तो वा कनकप्रभां यदि भवेत्करूरोऽपि कृष्णच्छविः। शूरो भीरु सुधीरधर्मनिपुणः शान्तो विकारी पुमा- त्नित्येवं प्रकृतिः प्रयाति चलनं मासाष्टकं जीवति॥४४। जिस पुरुष का स्वभाव ऐसा बदल जावे कि जिससे मोटा हो वह दुबला, जो दुवला ह मोटा व जो कूर या काला वर्ण वह सुवर्णसा, जो शूरवीर वह डरपोक, जो धर्मी ह अधर्मी और जो शान्तिमान् वह विकारवान् भासने लगे तो वह आठ महीना पर्यन्त ता है।। ४४।। पीडा भवेत्पाणितले च जिह्वा मूले तथा स्याद्ुधिरं च कृष्णम्। * विद्धं नच ग्लायति यत्र यष्ट्या जीवेन्मनुष्यः सहि सप्तमासम्॥४५॥ जिस पुरुष की हथेली और जीभ के अड़ में पीड़ा होती हो व रुधिर काला पड़गया ो और जिस अङ्ग में लाठी से मारागया हो वहां दुखता न हो तो वह मनुष्य सातमास पर्यन्त जीता रहता है।। ४५ ।। मध्याङ्गुलीनां त्रितयं न वक्रं रोगं विना शुष्यति यस्य कराठः। मुहुर्मुहुः प्रश्नवशेन जाड्यात् षड्भिः स मासैः प्रलेयं प्रयाति॥ ४६।। जिस मनुष्य की बीचकी तीन अंगुलियां न मुड़तीहों व रोग के बिना कएठ (गला) सखता हो और बारम्बार पूछने से जड़ता होजावे यानी पूर्वापर का अनुसन्धान न रहे तो वह ः मास में मरजाता है॥। ४६॥ १ चिनाशं प्राम्नोति। सामुद्रिकशास्त्रस्य न यस्य स्मरणं किश्चिद्विद्यते स्तनचर्मपि। सोऽवश्यं पञ्चमे मासि स्कन्धारूढो भविष्यति॥४७॥। जिसके देहकी खाल में कुछ स्मरण नहीं रहता है यानी चाम शून्य पड़जाती है क मनुष्य पांचवें महीना में अवश्य चार जनों के कन्धेपर चढ़ा हुआ जाता है यान मरजाताहै॥। ४७ ॥ यस्य न स्फुरति ज्योति: पीड्यते नयनदयम्। मरणं तस्य निर्दिष्टं चतुर्थे मासि निश्चितम्॥। ४८॥। जिसकी आंखों की ज्योति फुरती न हो और दोनों नेत्रों में पीड़ा होती हो तो उ का मरण चौथे मास में अवश्य कहा है।। ४८॥ दन्ताश्च वृषणौ यस्य न किश्चिदपि पीड्यते। तृतीयं मासमावश्यं कालाज्ञायां भवेन्रः॥ ४६॥। जिस मनुष्य के दांत और अएडकोश दवाने परभी कुछ पीड़ित न होते हों तो व तीसरे मास में अवश्य ही कालकी आजञा में होजावेगा॥ ४६॥ कालो दूरस्थितो वापि येनोपायेन लक्ष्यते। तं वदामि समासेन यथादिष्ट शिवागमे॥ ५०॥ दूरपर टिका हुआ भी काल जिस उपाय से लखाजाता है, उस उपाय को मैं शिव शाख्रानुसार संक्षेप से कहता हूं कि॥ ५०॥ एकान्तं विजनं गत्वा कृत्वाSSदित्यं च पृष्ठतः। निरीक्षयेन्निजच्छायां करठदेशे समाहितः ॥ ५१॥ एकान्त विजन वन में जाकर सूर्य को पीठ देकर सातधान होता हुआ जो मनुष्य अपरन छाया को कएठदेश में निहारता है॥ ५१ ॥ ततश्चाकाशमीक्षेत हीं परब्रह्मणे नमः। ्रष्टोत्तरशतं जप्त्वा ततः पश्यति शंकरम् ॥५२॥ और आकाश को देखता हुआ "उ हीं परव्रह्मणो नमः " इस मन्त्र को एकसौ आ वार जपता है वह शंकर जी का दर्शन करता है॥ ५२॥ शुद्धस्फटिकसंकाशं नानारूपघरं हरम्। १ कथितम्।। उत्तरार्धे द्वितीयाङ्क: । षरमासाभ्यासयोगेन भूचराणां पतिर्भवेत्॥ वर्षद्वयेन तेनाथ कर्ता हर्ता स्वयं प्रमुः॥५३॥ कि जिनका शरीर साफ़ विल्लौर पत्थर के समान सफ़ेद सोहता है जो कि अनेकानेक रूपों को धरते हुए पापों को हरते हैं इस भांति छः मास अभ्यास करने से योगी माणियों का स्व्रामी होता है और दो वर्ष अभ्यास रखने से कर्ता व हर्ता होकर स्वयं प्रभु हो जाता है॥ ५३ ॥ त्रिकालज्ञत्वमापोति परमानन्दमेव च। सतता्यासयोगेन नास्ति किश्चित्सुदुर्लभम् ॥५४॥ नित्य अभ्यास करने से भूत, भविष्यत् वर्तमान तीनों कालों का ज्ञान व परम आ- नन्द को पाता है और कोई ऐसा पदार्थ नहीं जो उसको दुर्लभ हो ॥ ५४॥ तदूपं कृष्णवर्सां यः पश्यति व्योम्नि निर्मले। रामासान्मृत्युमाप्नोति स योगी नात्र संशयः॥ ५५ ॥ निर्मल आकाश में जो योगी उस पूर्वोक शिवरूप को कालावर्ण देखता है वह निःस- न्देह छः मास में मृत्यु को पाता है।। ५५ ॥ पीते व्याधिर्भयं रक्ने नीले हानिं विनिर्दिशेत्। नानावर्णेऽथ चेत्तस्मिन्सिद्धश्च गीयैते महान्॥५६॥ पीला देखे तो व्याधि, लाल देखे तो भय, नीला देखे तो हानि कहना चाहिये और यदि नानावर्ण देखे तो वह योगी बड़ा भारी सिद्ध गाया जाता है॥। ५६ ॥ पादे गुल्फे च जठरे विनाश: क्रमशो भवेत्। विनश्यतो यदा बाहू स्वयन्तु त्रियते धवम् ॥५७॥ यदि छाया में क्रम से पांव, टखना और पेट को नहीं देखता है तो उस योगी का विनाश होजाता है अथवा भुजाओं को नहीं देखता है तो वह योगी निश्चय कर आपही मरजाता है।। ५७॥ वामवाहुस्तथा भार्या नश्यतीति न संशयः। दक्षिणे बन्धुनाशोहि मृत्युं मासं विनिर्दिशेत् ।।५८ ॥ यदि हई भुजा को न देखे तो निस्संदेह भार्या का विनाश होजाता है और यदि १ आकाशे २ कथ्यते ३ तद्ग्रन्थी घुटिके गुल्फी ४ उदरे ५ कथयेत् ॥ सामुद्विकशास्त्रस्य दाहिनी भुजा को न देखे तो बन्धुओं का विनाश होता है और महीना भरे में उस योगी की भी मृत्यु कहना चाहिये ॥ ५८ ॥। अशिरो मासमरणं विना जड्े दिनाष्टकम्। अष्टाभि: स्कन्दनाशेन छायालोपेन तत्क्षणात्॥ ५६।। यदि शीश न देखे तो मास भर में, जङ्गा न दीखे तो आठ दिन में, कन्धों को न देखे तो भी आठ दिन में मरण होता है और यदि छाया का लोप होजाता है तो उसी क्षण में योगी मरजाता है॥ ५६ ॥ प्रातः पृष्ठगते खौ च निमिषाच्छायाङ्गलीश्राधरं दृष्टार्घेन मृतिस्त्वनन्तरमहोच्छायां नरः पश्यति। तत्कर्णांसकरास्यपार्श्वहृदयाभावेक्षणार्घात्स्वयं दिड्यूढो हि नरः शिरो विगमतो मासांस्तु पड् जीवति॥ ६०॥ जो पुरुष प्रभातसमय सूर्य को पीठ की तरफ़ देकर छाया पुरुष की अंगुलियों व ओठों को नहीं देखता है वह निमिपमात्र में मरजाता है और जो छाया को ही नहीं दे- खता है वह आधे निमिप में मरता है और जो छाया के कान, कन्धे, हाथ, मुख, पार्श्व और हृदय को नहीं देखता है तो उसका आधे क्षण में मरण होजाता है और जो छाया का शीश नहीं देखता है व जिसमें दिशाओं का ज्ञान नहीं रहता है वह छः मास पर्यन्त जीता रहता है ।। ६० ।। एकादिषोडशाहानि यदि भानुर्निरन्तरम्। वहेद्यस्य च वै मृत्युः शेषाहेन च मासिके ॥ ६१ ॥ यदि मास के पहले दिनसे लेकर सोलह दिन पर्यन्त जिसका सुर्यस्वर ही लगातार बहता रहे तो उसकी मृत्यु शेप दिन में होजाती है ॥ ६१॥ संपूणं वहते सूर्यश्रन्द्रमा नैव दृश्यते। पक्षेण जायते मृत्युः कालज्ञानेन भाषितम् ॥ ६२ ॥ जिस मनुष्य का सूर्यस्वर ही पूरा बहता रहे और चन्द्रस्वर न देखा जाता हो तो उस की मृत्यु पक्षभर में होजाती है यह कालज्ञाताओं ने कहा है ॥ ६२ ॥ मूत्रं पुरीषं वायुश्र समकालं प्रवर्तते। तदाऽसौ चलितो ज्ञेयो दशाहे म्रियते धुवम् ॥ ६३ ॥ जिस पुरुपके मूत्र, मल और वायु एकही बार निकलते हैं तो उसको चलित जानना चाहिये और वह दश दिन में अवश्य ही मरजाता है॥ ६३॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । संपूरणं वहते चन्द्रः सूर्यो नैव च दृश्यते। मासेन जायते मृत्युः कालज्ञेनानुभाषितम्॥६४॥ जिस मनुष्य का चन्द्रस्वरही पूरा बहता रहे और सूर्यस्वर न देखाजाता हो तो उसकी मृत्यु एकमास में होजाती है ऐसा कालवेत्ताओं ने कहा है॥ ६४ ॥ अरुन्धतीं धवं चैव विष्णोस्त्रीषि पदानि च। आयुर्हीना न पश्यन्ति चतुर्थ मातृमएडलम् ॥ ६५॥ देखते हैं ॥ ६५ ॥ अरुन्धती, ध्रुव, विष्ुपद और चौथा मातुमएडल इनकों आयुहीन लोग नहीं पररुन्ती भवेजिह्वा भ्रवो नासाग्रमेव च। ुवौ विष्णुपदं ज्ञेयं तारकं मातृमएडलम् ॥ ६६ ॥ जिह्वा को अरुन्धती, नासिका के अग्रभाग को ध्रुत्र, भौहों को विष्णुपद और नेत्रस्थ तारा को मातृमएडल कहते हैं॥ ६६ ॥ नवश्रुवं सप्तघोषं पञ्चतारां त्रिनासिकाम्। जिह्वामेकदिनं प्रोक्नं ्रियते मानवो ध्रुवम् ॥ ६७ ॥ यदि भौहों को न देखे तो नवदिन में, कानों का शब्द न सुने तो सात दिन में, चक्षुस्थ वारा को न देखे तो पांच दिन में, नासा को न देखे तो तीन दिन में और जीभ को न देखे तो मनुष्य एक दिन में निश्चय कर मरजाता है॥ ६७ ॥ कोणावक्ष्णोरङ्गलिभ्यां किश्चित्पीड्य निरीक्षयेत्। यदा न दृश्यते बिन्दुर्दशाहेन भवेन्मृतः ॥ ६८॥ आांखों के कोनों को अंगुलियों से कुछेक दबाकर निहारे यदि दबाने से जलका बिन्दु न देख पड़ता हो तो वह मनुष्य दश दिवस में मृतक होजाता है॥ ६८ ॥ तीर्थस्नानेन दानेन तपसा मुकृतेन च। जपैध्यानेन योगेन जायते कालवञ्चना॥ ६६ ॥ तीर्थों में स्नान, दान, तपस्या, पुएय, जप, ध्यान और योग करने से काल की वश्चना होजाती है यानी ऊपर आया हुआ भी काल टलजाता है ॥ ६६॥ शरीरं नाशयन्त्येते दोषा धातुमलास्तथा। समस्तु वायुर्विज्ञेयो बलतेजोविवर्धनः ॥७०॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य धातु व मल आदि ये दोष शरीर को विनष्ट कर देते हैं और सम वायु बल व तेज का वढ़ानेवाला जानना चाहिये।।। ७० ॥। रक्षणीयस्ततो देहो यतो धर्मादिसाघनम्। योगाभ्यासत्वमायान्ति साधिजप्यास्तु साध्यताम्। परसाध्या जीवितं पन्ति न तत्रास्ति प्रतिक्रिया ॥७१॥ उसी से देह की रक्षा करनी चाहिये कि जिससे धर्म आदिकों का साधन होता है और साधिजप्य साध्यता को साधते हुए योगाभ्यास को प्राप्त होते हैं और असाध्य होते हुए जीवन को विनाशते हैं इसलिये उसका कोई म्रतीकार नहीं है।। ७?॥ येषां हृदि स्फुरति शाश्वतमद्ितीयं तेजस्तमोनिवहनाशकरं रहस्यम। स्वपेऽपि नो भवति कालभयं नराणाम्॥ ७२॥ जिनके हृदय में अनादि, अद्वितीय, अन्धकारसमूहनाशक, गोपनीय तेज (शिव- स्वरोदयज्ञान) फुरता है उन अखएिडत चन्द्रसम रमणीय सुक्ान्तिभाजी नरों के स्वम में भी कालकी भय नहीं रहती है।। ७२।। इडा गङ्नेति विज्ञेया पिङ्गला यमुना नदी। मध्ये सरस्वतीं विद्यात्पयागादिसमस्तथा॥७३॥ इडा नाड़ी गङ्गा, पिङ्गलानाड़ी यमुनानदी और बीचकी सुपुम्ना नाड़ी सरस्वती जा ननी चाहिये और इन तीनों नाड़ियों के संगम को प्रयाग आदि के समान समझना उचित है।। ७३ ॥ आदौ साधनमाख्यातं सद्यः प्रत्ययकारकम्। वद्धपद्मासनो योगी बन्धयेदुड्डियानकम् ॥७४॥ आदिमें साधनकोही शीघ्र प्रत्ययकारक कहा है इसलिये पझ्मासनको बांधेहुए योगी लावे।। ७४॥ उड्डियानक नामक आसनको वांधे यानी अपानकी गतिको ऊपर करके नाभिरन्ध्रके समीप पूरक: कुम्भकश्रैव रेचकश्र तृतीयकः । ज्ञातव्यो योगिभिर्नित्यं देहसंशुद्धिहेतवे।। ७५॥ उत्तरार्द्धें द्वितीयाङ्क: । पूरक, कुम्भक और तीसरा रेचक ये तीनों प्रारायाम योगियों को देहकी शुद्धिके लिये सदैव जानना चाहिये।। ७५॥ पूरकः कुरुते वृष्टिं धातुसाम्यं तथैव च। कुम्भके स्तम्भनं कुर्याजीवरक्षाविवर्धनम्॥७६॥ उन तीनों में से पूरक प्राायाम (बाहर की वायु को भीतर खींचना) दृष्टि से देह को सींचता है और समस्त धातुओं को समान करता है और कुम्भक प्रारायाम (बाहर भीतर की वायु को स्थिर रखना) देहकी धातुओं का स्तम्भन (जहां की तहां रखना) करता है और जीवरक्षा का बढ़ानेवाला होता है॥ ७६॥ रचको हरते पापं कुर्याद्योगपदं त्रजेत्। पश्चात्संग्रामवत्तिष्ठेल्लयवन्धं च कारयेत्॥७७।। रेचक प्राणयाम (भीतर की वायु वाहर निकालना) पाप को हरता है इस भांति जो पराणायाम करता है वह योगपद को पाता है और जो पीछे से संग्राम के समान टिकता हैं वह लयबन्ध कोभी करासक़ा है॥ ७७॥ कुम्भयेत्सहजं वायुं यथाशक्ति प्रकल्पयेत्। रेचयेचन्द्रमार्गेण सूर्येणोंपूरयेत्मुधीः॥७८ ॥ वुद्धिमान् मनुष्य स्वाभाविक वायु को अपनी शक्कि के अनुसार कुम्भक प्राणयाम से रोके व चन्द्रस्वर से रेचक करे और सूर्यस्वर से पूरक पाखणयाम को करे॥ ७८ ॥ चन्द्रं पिवति सूर्यश्र सूर्यं पिवति चन्द्रमाः। छन्योन्यकालभावेन जीवेदाचन्द्रतारकम् ॥ ७६॥ जिसके चन्द्रस्वर को सूर्यस्वर और सूर्यस्वर को चन्द्रस्वर परस्पर समय समय पर पीता है वह चन्द्रमा व तारों की स्थिति पर्यन्त जीता है॥ ७६॥ स्वीयाङ्गे बहते नाडी तन्नाडीरोधनं कुरु। मुखबन्धममुञ्न्वै पवनं जायते युवा॥ ८० ॥ अपने अङ्ग में जो नाड़ी बहती हो उसको रोककर व मुखको वांध कर जो योगी पवन को नहीं छोड़ता है वह वृद्ध हुआ भी युवा होजातां है या कि वह योगी सदैव ज्वानही बना रहता है॥। ८० ॥ १ एवं यो योगी प्रासायामत्रयं कुर्यात् २ कुम्भकप्रायामं कुर्यात् ३ रेचकप्राणायामम् ४ पिङ्गलया पूर्ायेदिति॥ १०८: सामुद्रिकशास्त्रस्य मुखनासाक्षिकर्णान्तानङ्गलीभिर्निरोधयेत्। तत्त्वोदयमिति ज्ञेयं षरामुखीकरणं प्रियम् ॥ ८१॥ मुख, नासिका, आंखी और कान पर्यन्त भाग को अंगुलियों से रोके यानी कनिष्ठा व अरनामिका से मुहँको, व मध्यमासे नथुनों को, तर्जनी से शरंखों को और अँगूठे से कानों को रोकदेवे तो इससे तच्वों के उदयका भान होजाता है यह प्यारा पएमुखीकरण जा- नना चाहिये ॥ ८१ ॥ तस्य रूपं गतिः स्वादो मरडलं लक्षणं त्विदम्। सवेत्ति मानवो लोके संसर्गादपि मार्गवित्॥।८२ ।। उसका रूप, गति, स्वाद, मए्डल और लक्षण इस सवों को जो मनुष्य लोक में जा- नता है वह हेलमेल से भी मार्गवेत्ता होजाता है ॥। =२ ॥। निर्रोशो निष्कलो योगी न किञ्चिदपि चिन्तयेत्। वासनामुन्मनां कृत्वा कालं जयति लीलैया । ८३ ॥ जो योगी आशारहित व शुद्धरूप होकर किसी पदार्थ की भी चिन्ता नहीं करता है तो वह वासना को त्याग कर लीला (अनायास) से काल को जीतता है।। =३ ।। विश्वस्य वेदिका शक्किर्नेत्रांभ्यां परिदृश्यते। तत्रस्थन्तु मनो यस्य यामैमात्रं भवेदिह॥। ८४ ।। तस्यायुर्वर्धते नित्यं घटिकात्रयमानतः । शिवेनोकं पुरा तन्त्रे सिद्धस्य गुणगह्वरे॥। ८ ५ ॥ विश्वकी जाननेहारी शक्ति नेत्रों से देखी जाती है वहां पर जिसका मन एक पहर मात्र टिकजाता है तो उसकी आयुर्दाय तीन घटियों के प्रमाण से नित्य बढ़ा करती है पुरा- तन समय सिद्धों के गुणसमूहवाले तन्त्रशास्त्र में शिवजी ने कही है ।। ८४। ८५ ।। बद्धं पझ्मासनस्था गुदगतपवनं सन्निरुद्धयामुमुच्चै- स्तं तस्या पानरन्ध्रक्रमजितमनिलं प्राणशक्क्या निरुष्य। एकीभूतं सुपुम्ना विवरमुपगतं ब्रह्मरन्धे च नीत्वा निक्षिप्याकाशमार्गे शिवचरणरता यान्तिते केऽपि धन्याः।।८६।। १ नितरामपवारयेदिति २ जानाति ३ मार्गे वेत्तीति मार्गवेत्ता भवतीति ४ निर्गता आ्रशा- लिप्सायस्मादिति ५ "लीलां विदुः केलिविलासखेलाश्टंगारभावप्रभवक्रियासु" (इति विश्व- प्रकाश:)६ विशन्ति भूतान्यस्मिन्निति विश्वम् संसारस्तस्य येदिका ज्ञात्री ७ लोचनाभ्याम् = प्रहरमात्रम् ६ सदाशिचन भगितम् ।। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ:। पद्मासन को बांधकर गुका में टिके अपानवायु को रोककर उसे ऊंचे को ले जावे व पानरन्ध्रमें जीतेहुए पवनको प्राणशक्कि के साथ रोककर दोनों की एकता करे जब वे नों एक होजावें तब सुपुन्ना नाड़ी के विवर (रन्ध्र) में पहुँचावें फिर ब्रह्मरन्ध्में ले- कर आकाश मार्ग में छोड़ दें इस भांति शिवजी के चरणों में रतहुए जो कोई योगी ोग मरजाते हैं वे धन्य कहलाते हैं ॥ ८६ ॥ एतज्जानाति यो योगी एतत्पठति नित्यशः। सर्वदुःखविनिर्मुक्ो लभते वाञ्छितं फलम् ॥८७ ॥ जो योगी इस स्वरोदय ज्ञानको जानता है व सदैव पढ़ता है तो वह सर्वदुःखों से टा हुआ वाञ्छितफल को पाता है॥ ८७॥ स्वरज्ञानं नरे यत्र लक्ष्मीः पादतले भवेत्। सर्वत्र च शरीरे 5पि सुखं तस्य सदा भवेत् ॥| ८८ ॥। जिस मनुष्यमें स्वरका ज्ञान रहता है उसके पादतल में लक्ष्मी वास करती है और सब नों में उसके शरीरमें सुख सदैव मिलता है॥। ८८ ।। प्रणवः सर्ववेदानां ब्राह्मेणो भास्करो यथा। मृत्युलोके तथा पूज्य: स्वरज्ञानी पुमानपि॥८६॥ जैसे कि सब वेदों के मध्य में प्रशव (अंकार) व मृत्युलोक में ब्राह्मण व सूर्य नीय होते हैं वैसेही स्वरज्ञानी पुरुप भी पूज्य होता है॥। = ॥ नाडीत्रयं विजानाति तत्त्वज्ञानं तथैव च। नैव तेन भवेत्तुल्यं लक्षकोटिरसायनम् ॥ ६० ॥ जो मनुष्य पूर्वोक तीनों नाड़ियों को जानता है और जिसको त्त्त्वों का ज्ञान होता है सके समान लाखों व करोड़ों रसायन नहीं हैं॥। ६० ।। एकाक्षरप्रदातारं नाड़ीभेदविवेचकम्। पृथिव्यां नास्ति तड्ूव्यं यद्दत्त्वा चानृणो भवेत् ॥ ६१ ॥। नाड़ीभेदका विवेचन करनेवाला जो एकाक्षरमात्रका भी दाता हो तो उसके लिये बवीमएडल में वह द्रव्य नहीं है जिसको देकर उऋ्रण होजावे यानी एकाक्षरप्दाता गुरुसे उद्धार नहीं होसका है।। ६१ ।। १ धुवस्तारस्त्रिवृद्गह्मवेदादिस्तारकोऽव्ययः । प्ररवश्च त्रिमात्रोथ ऊकारो ज्यो- तिरादिम: ( इति मात्रिकानिघराटुः) २ ब्रह्म वेदं वेत्ति जानाति वा ब्राझ्मणः ३ भास्कार: सूर्यः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य स्वरस्तत्त्वं तथा युद्धं देवि वश्यं स्त्रियस्तथा। गर्भाधानं च रोगश्च कलार्घेनैव मुच्यते ॥ ६२ ॥ अहो देवि ! स्वर, तत्व, युद्ध, स्त्रियोंका वशीकरण, गर्भाधान और रोग इन सवों क ज्ञान आधी कलासेही कहा जाता है ॥। ६२ ।। एवं प्रवर्तितं लोके प्रसिद्धं सिद्धयोगिभिः। चन्द्रार्कग्रहणे जाप्यपठतां सिद्धिदायकम्॥ ६३ ॥ इसमकार लोक में पृत्त हुआ व सिद्ध योगियों से प्रसिद्ध किया हुआ भी स्वरो दय का ज्ञान चन्द्र व सूर्य के ग्रहण में जपते व पढ़ते हुए जनों को सिद्धिदायन होता है।। ६३ ॥। स्वस्थाने तु समासीनो निद्रां चाहारमल्पकम्। चिन्तयेत्परमात्मानं यो वेद स भविष्यति ॥६४ ॥ जो मनुष्य अपने स्थानपर बैठाहुआ निद्रा व भोजन को अल्प करता व परमात्मा क चिन्तन करता व जानता है वह स्वरज्ञानी होजाता है॥ ३६४ ॥। इति शिवस्व्ररोदयाध्यायः ॥ अथ ग्रन्थमुपसंहरन्कविवशवर्णनमाह। शाके शैलगुणाष्टेभूपरिमिते वर्षे द्विगोत्राईको भाद्रे मास्यसिते गृहेशतिथिके भूनन्दने वासरे। नानाग्रन्थमतानुगोतिविशदो ग्रन्थो मया भाषितो भूयाद्गव्यतराय सर्वविदुषां सामुद्रिको नित्यशः ॥ १ ॥ शाके १८३७ संवत् १६७२ भाद्रमास कृष्णापक्ष पष्ठी मङ्गलवार दिवस में नानायन मतानुयायी विशदरूप सामुद्रिक ग्रन्थको मैंने कहा है वह सदैव सर्वविद्वान्महोदयों के मङ्ग के लिये होवे ॥ १ ॥ सामुद्रिकं शास्त्रवरं विशुद्धं प्रोक्कं शिवायै शशिशेखरेण। आदाय सर्व भणितं मयैतद् भूयान्मुदे मसिडतपरिडतानाम्॥२ ॥ विशुद्ध, शास्त्रों में श्रेष्ठ जिस सामुद्रिकशास्त्र को चन्द्रचूड शिवजीने शिवा (पार्वती) से कहा है वह सब लेकर इस सामुद्रिक को मैंने बनाया है वह गुएगएामएिडत पित महोदयों की परीति के लिये होने ॥ २॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । सामुद्रिकं शास्त्रमिदं मनोजं द्वाविंशमव्दं मृगितं नितान्तम्। नो देयमेतत्सुधिया कदापि लोकडुहां निन्दनतत्पराणाम् ॥ ३ ॥ यह सामुद्विकशास्त्र मनोज्ञ है कि जिसको वाडर्सवर्षपर्यन्त, पुराण, अंगरेजी, फ़ारसी तथा वंगला व महाराठी आरादिकों में अत्यन्तही गवेषण किया है इसको लोकदीही निन्दकजनों के लिये विद्वानों को कदापि नहीं देना चाहिये.॥ ३॥। शान्ताय शाक्काय शिवप्रियाय शिष्याय देयं गुरुभक्तकाय। वाणी भवेन्रो विफला कदापि स्वधर्मपालात्सफलं समस्तम् ॥४ ॥। शान्त, शाक्र, शिवमिय, गुरुभक शिष्य के लिये देना चाहिये उसकी वाणी कदापि निष्फल नहीं होसकी है क्योंकि अपने धर्म की पालना से सबही सफल होताहै ।। ४ ॥ सामुद्रिकाभ्यासपरा नितान्तं सत्येन युक्ाः सरलस्वभावाः। सद्धर्मवन्तो मनुजा हि नूनं कीर्ति लभन्तां विमलां दिगन्ते ॥ ५ ॥ सत्यवान् सरलस्व्रभाववाले जो मनुष्य, सामुद्रिक के अभ्यास में अत्यन्त परायण होवेंगे वे लोग अवश्य सच्चेधर्मवाले होकर दिगन्तों में विमल कीर्ति को पावेंगे ॥ ५ ॥ फलन्ति वारयो मनुजस्य तस्य सत्येन युकं हृदयं हि यस्य। तेनोदितं वै वचनं जनेभ्यः प्राप्नोति सिद्धिं न मृषा कदापि ॥ ६ ॥ जिस मानव का हृदय सत्यसम्पन्न होता है उसकी वाखियां सफल होती हैं उस कर के जनों के लिये जो वचन कहा जाता है वड सिद्धि को पाता हुआ भूठा कभी नहीं होसक़ा है॥ ६ ॥ पठन्तु नित्यं सुधियो महान्तो, धनं लभन्तां जनयूथकेभ्यः। पुत्रप्रपौत्रादियुता भवन्तु चायुष्यवन्तो नितरामुदाराः।।७।। जो विद्वानलोग इसको सदैव पढ़ेंगे वे महन्त होकर जनसमूहों से धन को पावेंगे और पुत्र, पपौत्र आदिकों से संयुक्त होवेंगे व आयुर्दायवाले होकर बड़ेही उदार गिनेजावेंगे॥७॥ श्रीमत्प्राज्ञनरायणेन प्रभुणा सद्धर्मविद्याविदा सर्वेषामुपकारकाय नितरामाज्ञापितोहं मुदा। नाम्ना शक्किघरः सदाशिवपदद्न्द्े रतो नित्यश- श्रक्रे ग्रन्थमनुत्तमं मतिमतां सामुद्रिकं सौख्यदम् ॥८ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य श्रीमान् रायबहादुर मुंशी पयागनारायखजी भार्गव मेरे स्वामी जोकि सच्चे धर्म व विद्या के जाननेवाले हैं उन्होंसे सवों के उपकार के लिये आज्ञापित, सदाशिवजी के युगल पदारविन्द के सेवक शक्तिधरनामक मैंने मतिमानों को सदैव सौख्यदायक सर्वोत्तम सामुद्रिक ग्रन्थ को बनाया है॥। ८ ॥ पुरे मुरादाबादाख्ये शुक्कवंशोद्गवः सुधीः। आासीद्ददुर्गाप्रसादाख्यो कलभद्रस्तु तत्मुतः॥ ६।। तस्यात्मजः शक्किघरः शिवपादार्चने रतः। चक्रे सामुद्रिक शास्त्रं सरलं सर्वसम्मतम् ॥१०॥ सामुद्रिक: समाप्तिं पफाखेति शम् ॥। समाप्तोयं ग्रन्थः ।। विक्रयार्थ पुस्तकों का सूचीपत्र संग्रहशिरोमणिमूल मिद्धान्तशिरोमणि गोला- 2) बृहतसंहिता अर्थात वाराही- संहिता .. ध्याय १।) तथा .... जातकाभरण मूल .. कर्मविपाकसंहिता मुहूर्त्तचन्द्रिका .. Ju तथा .. मुहूर्त्चिन्तामणिसटीक वालविचेकिनी सटीक LGC महूर्त्तगणपति जातकचन्द्रिका मुहूर्त्तमार्त्तएड संस्कृतटीका 1-]। जातकाभरण सटीक होराम करन्द जातकालंकार सटीक जातकपारिजातमूल तथा सटीक र वभविचार तथा भाषा मुहूर चंचक्रदीपिका -JHI लग्नचन्द्रिका सटीक PO5 mana अ्रहलाघव ज्योतिस्सारावली नारचन्द्रदीपिका .... तथा सामुद्रिकसंस्कृत ज्योतिस्सिद्धान्तसारसंग्रह प्रश्नविद्याद्रेष्काणनिरूपण रमलनवरत्न नरपतिजयचर्या .... .... रमखसार समरसार सटीक DI .. तथा .... अद्भततरंगिणी JII .... II) दैवज्ञाभरण .. मिलने का पता :- रायबहादुर मुंशी प्रयागनारायरख मालिक नवलकिशोर प्रेर