Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

111. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — शारीरकाध्यायो

शारीरकाध्यायो

तर्क्ष्य उवाच। कथमुत्पद्यते जन्तुर्भूतग्रामे चतुर्विधे। त्वचा रक्ं तथा मांसं मेदो मज्जास्थिजीवनम् ॥ १ ॥ गरुड़जी वोले कि अहो भगवन् ! चार प्काश्णाले प्राणिसमूहों में पराणी कैसे उपजता है ? तथा खाल, रुधिर, मांस, मेदा, मज्जा, हाड़ और जीवन ये किस भांति उपजते हैं॥१॥ पादौ पाणी गुदं जिह्वा दन्ता: केशा नखानि च। सन्धिमार्गा ह्यनेकाश्च रेखानेकविधास्तथा॥२॥ पांव, हाथ, गुदा, जिह्ना, दांत, केश, नख और अपनेक सन्धिमार्ग तथा अनेक प्रकार की रेखायें किस भांति उपजती हैं ।। २।। कामः क्रोधो भयं लजा मनोहर्ष: शुभाशुभम्। विचित्रं छिद्वितं चापि नाडीजालेन वेष्टितम्॥ ३ ॥ काम, क्रोध, भय, लज्जा, मनोहर्ष और नाड़ीजाल से वेष्टित विचित्र िद्र किस भांति उपजते हैं ॥ ३।। इन्द्रजालमिदं मन्ये संसारेSसारसागरे। कर्ता कोडत्र महावाहो संसारे5सारसागरे॥ ४ ॥ हे महावाहो ! असार सागरसंसार में इस दृश्य को इन्द्रजाल के नाई मैं मानता हूं और इस असार सागरसंसार में कर्ता कौन है ? उसे कहिये ॥ ४॥ श्रीभगवानुवाच । कथयामि परं गोप्यमनाख्येयं तु कस्यचित्। येन विज्ञानमात्रेण सर्वज्ञत्वं भजायते॥ ५ ॥ श्रीभगवान्जी बोले कि; परमगोपनीय जो कि किसी से कहने योग्य नहीं है उस को मैं कहता हूं जिसके विज्ञानमात्र से सर्वज्ञता उपजती है ॥ ५॥ साधु पृष्टं त्वया लोके सदा संजीवकारणम्। वैनतेय शृणुष्वाद्य एकाग्रकृतमानसः ॥ ६।। १ इन्द्रजाल (इन्द्र=पश्वर्य अर्थात् चतुराई) जाल आंखों को ढकना, (जल-ढकना) पु० मन्त्र अथवा औषधी से चीज़े और तरह से दीखना, वाज़ीगरी, छलकपट, फरफन्द, धोखा।। उत्तराद्धे द्वितीयाङ्क:। अहो गरुड़जी ! तुप ने बहुत अच्छा पूछा है जो कि सदैव भली भांति जीवों का कारण है उसको आ्रज सावधान मनवाले होकर सुनो ॥ ६ ॥ ऋतुकालन्तु नारीणां त्यजेददिनचतुष्टयम्। नारियों का ऋतुकाल (मासिकधर्म) चार दिन पर्यन्त त्याग देना चाहिये "यानी ऋतु समय स्त्री से चार दिन संभोग बचाना चाहिये" क्योंकि उसमें पुरातन समय इन्द्रको त्रासुरके मारडालने से उपजी ब्रह्महत्या लगी थी उसे उन्होंने चार भागों में वांट दिया था उसका एक भाग स्तियों में भी आया है।। ७॥ प्रथमेहनि चाएडाली द्वितीये ब्रह्मघातिनी। तृतीये रजकी ज्ञेया चतुर्थेऽहनि शुध्यति ॥८॥ जिस समय स्त्री रजस्वला हो तो पहले दिन चाएडाली, दूसरे दिन ब्रह्मघातिनी, ठेसरे दिन धोबिन जानना चाहिये और चौथे दिन शुद्ध होजाती है ।। ८ ॥ सप्ताहात्पितृदेवानां भवेद्योग्या व्रतार्चने। सप्ताहमध्ये यो गर्भस्तत्संभूतिर्मलिम्लुचा ॥ ६ ॥ सात दिवस के अनन्तर नारी पितर व देवताओं के व्रतार्चन में सुयोग्य होती है और सात दिन के बीच में गर्भ रह जाता है तो उसकी पैदायश मल कहलाती है ॥ ै॥ युग्मामु पुत्रा जायन्ते स्त्रियो युग्मासु रात्रिपु। पूर्वसप्तकमुत्सृज्य तस्माधुग्मामु संविशेत्॥ १० ॥ पहले के सात दिन छोड़ कर युग्म (सम) रात्रियों में पुत्र पैदा होते हैं और विपम त्रियों में कन्यायें उपजती हैं इसलिये युग्म रात्रियों में ही नरको नारी से समागम रना चाहिये ॥ १० ॥ षोडशास्तु निशाः स्त्रीणां सामान्याः समुदाहताः। यावच्चतुर्दशी रात्रिर्गर्भस्तिष्ठति तत्र चेत् ।। ११ ।। ऋतुकाल से रमणियों के लिये सोलह रात्रियां सामान्य कहलाती हैं उनमें से गँदह रात्रियों तक यदि गर्भ टिक जाता है। ११ ॥ गुणभाग्यनिधिः पुत्रस्ततो जायेत धार्मिकः। सा निशा तत्र सामान्यैन लभ्येत खगाधिप ॥ १२ ॥ तो उससे गुग् व भाग्य का निधान होता हुआ धार्मिक होकर पुत्र उपजता है यानी सामुद्रिकशास्त्रस्य उस गर्भ से जो लड़का पैदा होता है तो वह गुणवान् व भाग्यवान होकर धार्मिक कहाता है हे खगनायक! उस रात्रि को सामान्य पुरुप नहीं पासके हैं ॥ १२॥। पञ्चमेहनि साश्नीयाच्छौक्कयमाधुर्यभोजनम्। कटुक्षारं च तीक्ष्णं च त्यजेद्यतेन भोजनम्॥ १३॥ पांचवें दिन वह स्त्री सफ़ेद मीठे भोजन को करे और कडुआ खारा तथा तीखा भोजन उपाय से त्याग देवे ॥ १ ३ ॥ स्त्रीक्षेत्रमोषधीपात्रं तस्माच्छीतलसेवनम्। ताम्बूलं चाथ श्रीखरडं शुभं च संगमेऽहनि ॥ १४॥ स्त्री क्षेत्र होकर ओपधियों का पात्र है इसलिये शीतल वस्तुओं का सेवन करे तद नन्तर संगम के दिन में पान खावे व सिखरन आदि शुभपदाथों का भोजन करै॥ १४॥ निषेकसमये याहक् नरे चित्तविकल्पना। तादक्स्वभावसंभूतिर्जन्तुर्भवति पक्षिप ॥ १५॥ अहो खगनायक ! गर्भाधान के समय जैले पुरुप में चित्त लगजाता है वैसीही सन्तान पैदा होती है।। १५।। शुक्रशोषितयोयोंगे पिएडोत्पत्ति: प्रजायते। जठरे च स्थितो जन्तुस्तारापत्युश्र विच्युतः ॥१६ ॥ बीज व रुधिर के संयोग होने पर पिएड की उत्पत्ति होती है और चन्द्रमएडल से गिर हुआ जीव धान्यद्वारा पेट में टिकजाता है॥ १६ ॥ चैतन्यबीजरूपो हि पुंशुक्रे च व्यवस्थितः । कामं चित्तञ्च शुकं च यदा ह्येकत्वमाुयात्॥१७।। चैतन्य वीजरूप होकर पुरुष के रेतस में स्थित है काम, चित्त, नीर्य और रुधिर ये ज एकता को प्राप्त होजाते हैं तवहीं गर्भ टिकता है ॥ १७॥ रक्राधिके भवेन्नारी शुक्राधिक्ये भवेत्पुमान्। शुक्शोणितयोः साम्ये गर्भः पराढत्वमाश्ुयात्॥१८।। रक्न अधिक होवे तो कन्या उपज़ती है, वीर्य अधिक होवे तो पुत्र उपजता है और ज वीर्य व रुधिर ये दोनों बरावर होते हैं तो गर्भ नपुसकता को प्राप्त होता है। १८।। कललं त्वेकरात्रेण बुद्बुदं पञ्चभिर्दिनैः। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्गः । चतुर्दशैर्भवेन्मांसं धातुभिश्र समन्वितम् ॥ १६॥ एक रात्रि में कलल होता है, पांच दिनों में बुलवुला सा उठता है और चौदह दिनों में धातु समेत मांस होजाता है ॥ १६ ॥ एकमासे न पूर्णेन पञ्चतत्त्वं च जायते। मासदये च पूर्णे च त्वचा मेदश्र जायते॥ २० ॥ एक मास के पूर्ण होने से पांच तच्त्र उपजते हैं दूसरे मास के पूर्ण होने पर खाल औौर मेदा उपजती है॥ २०॥ मजजास्थीनि त्रिमासेन केशाङ्गल्यश्चतुर्थके। कर्णो तु नासिका चैव वक्कं मासे तु पञ्चमे॥ २१॥ तीन मास के पूर्ण होने पर मज्जा और हड्डियां उपजती हैं व चार मास के पूर्ण होजाने र केश व अँगुलियां उपजती हैं और पांचवें मास में कान, नाक व मुख उपजते हैं ॥ २१॥ करठरन्ध्रोदरं पष्ठे गुदगुह्ये तु सप्मे। अङ्गप्रत्यङ्गसंपूर्णो गर्भो मासे तथाष्टमे ॥ २२॥ छठे मास कएठरन्ध्र और उदर उपजता है, सातवें मास गुदा व लिङ्ग होता है तथा आाठवें मास में गर्भ अङ्ध व प्रत्यङ्गों से पूर्ण होजाता है। २२ ॥ नवमें मासि संमापे गर्भस्थश्चरति स्वयम्। चिकित्सा जायते तस्य गर्भवास परित्यजे ॥२३ ॥ नवयें मासके प्राप्त होजानेपर गर्भस्थ प्राणी आपही चलता है और उसको चाहना होती हैं कि मैं गर्भ का वास कब परित्याग करूंगा ।। २३ ।। रक्ाधिके भवेननारी पुमाञ्छुक्राधिके भवेत्। नपुंसका समे द्रव्ये त्रिविधं पिएडसंभवम् ॥ २४॥ जो रुधिर अधिक होवे तो कन्या उपजती है व वीर्य अधिक होवे तो पुत्र उपजता है और रज व बीज दोनों समान होवें तो नपुंसक होता है इसभांति पिएडकी उत्पत्ति तीन प्रकार की कहाती है॥ २४।। शक्कित्रयं विशालाक्ष षादकौशिकसमाकुलम्। पञ्चेन्द्रियसमायुकं दशनाडीविभूषितम् ॥ २५ ॥ श्रह्ो विशालाक्ष ! तीन शक्कियोंवाला, छह कोशों से व्याप्त, पश्चेन्द्रियों से संयुक होकर दश नाड़ियों से विभूषित होता हुआ देह कहाजाता है ॥ २५ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य दशप्राणगुणोपेतं यो आनाति स वेत्ति तम्। मज्जास्थिशक्रमांसानि रोमरक्बलं तथा॥ २६॥ दश प्राों के गुणों से संयुक्त देहको जो जानता है वह उसका वेत्ता कहाता है और मज्जा, हड्डी, वीर्य, मांस, रोम और रक् इनका पुतला है॥ २६॥ षादकौशिकमिदं पिएडे तस्यान्ते पञ्चभूतकम्। क्षितिर्वारि हविर्भोका पवनाकाशमेव च।।२७।। पिएडमें यह छह कोश हैं उसके वाद पृथ्वी, जल, अग्नि, पवन और आकाश ये पश्चभूत हैं॥ २७ ।। एभिर्सूतेश्र पिएडेस्तु बद्ध: स्नायुनिबन्धनः । स्थूलभूता इमे प्रोक्काः सपनाड्योऽन्तरे स्थिताः॥२८॥ इन पश्चभूतों से देह जो कि नसोंसे बँधनेवाली है वह बँधी है ये स्थूलभृत कहाते हैं और इसके भीतर सात नाड़ियां भी रहती हैं। २८ ।। त्वचास्थिनाड्यो रोमाणि मांसञ्चैव तु पञ्चमे। क्षिते: पञ्चगुणाः प्रोक्ता समासेन प्रकीर्तिताः॥२६॥ खाल, इड्डी, नाड़ी, रोवां और मांस ये पांचवें मास में उपजे हैं ये पांच धरती के गुण संक्षेप से कहे हैं ॥ २६॥ लाला मूत्रं तथा शुकं मज्जा रकं च पञ्चमम्। अपां पञ्चगणाः प्रोक्का ज्ञातव्यास्ते प्रयत्नतः ॥३०॥ लार, मूत्र, शुक्र, मज्जा (चर्वी) और रक ये पांच जल के गुणा कहे हैं वे बड़े यत्र के साथ जानना चाहिये ॥ ३० ॥ क्षुधा तृषा तथा निद्रा आलस्यं कान्तिरेव च। तेजःपञ्चगुणाः प्रोक्का ज्ञातव्या हि प्रयत्नतः ॥३१॥ भूख, तृपा, निद्रा, आलस्य और कान्ति ये पांच तेज के गुण कहे हैं जो कि बड़े यत्र के साथ जानने चाहियें॥ ३१ ॥ रागद्वेषौ तथा लज्जा भयं मोहस्तथैव च । पाशिपादौ गुदा वाचा गुह्यं वायोर्गुषा नव ॥ ३२।। १ "पिएडो वोले बले सान्द्रे देहाग/रैकदेशयोः । देहमात्रे निवापे च गोलससिह्रकयोरपि। ओराइपुष्पे च पुंसि स्थात्क्कीवमाजीवनायसोः" (इति मेदिनी)॥ उत्तरार्द्े द्वितीयाङ्ग: । राग, वैर, लज्जा, भय, मोह, हाथ, पांव, गुदा, वाणी ये नतर वायु के गुणा कहे हैं॥। ३२ ॥ दर्पश्चिन्ता तु गाम्भीर्यं श्रवणं गमनं क्रमात्। आकाशस्य गुणाः पञ्च प्रोक्काः सर्वत्र योगिभिः॥३३॥ अहंकार, चिन्ता, गम्भीरपना, सुनना और चलना ये पांच आकाश के गुण क्रम से सर्वग्रन्थों में योगियों ने कहे हैं ॥ ३३ ॥ श्रोत्रं त्वक चक्षुी जिह्वा नासा बुद्धेरितीन्द्रियाः। इडा च पिङ्गला चैव सुषुम्ना च तृतीयका ॥ ३४॥ कान, खाल, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये पांच ज्ञानेन्द्रियां कहलाती हैं और इडा, विङ्गला व तीसरी सुपुम्ना ॥। ३४ ॥। गान्धारी हस्तिनी जिह्वा पूषैव सहजा स्थिता। छलम्बुषा कुहूश्रैव शङ्िनी दशमी स्मृता ॥३५॥ गान्धारी, हस्तिनी, जिह्वा, पूपा, सहजा, अलम्बुपा, कुहू और शह्डिनी ये दश नाड़ियां हाती हैं॥ ३५ । पिएडमध्ये स्थिताः प्रोक्ताः प्रधाना दशनाडिकाः । प्राणोऽपानः समानश्च उदानो व्यान एव च ॥ ३६॥ शरीर के भीतर टिकीहुई प्रधान दश नाडिकायें कही हैं माण, अपान, समान, उदान गैर व्यान ये पांच पाण कहलाते हैं यानी हृदय में प्राण, गुदा में अपान, नामिमएडल समान, कएठ में उदान और व्यान सर्वशरीर में रहता है।। ३६॥ नाग: कूर्मोडथ कृकरो देवदत्तो धनञ्जयः। केवलं भुक्मन्नं च पुष्टिदं सर्वदेहिनाम्॥३७॥ नाग, कूर्म, ककर, देवदत्त और धनञ्जय ये पांच उपमाण कहाते हैं यानी उद्गार वमन) में नाग, नेत्रों के उघाड़ने में कूर्म, छीकने में ककर, जँभाई में देवदत्त और इतक शरीर में धनञ्जय पवन रहता है व केवल खाया हुआ अनाज सब देहधारियों को ष्टिदायक होता है॥ ३७ ।। १ उद्वारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने समृतः । कृकलः क्ुतकृज्जेयो देवदत्तो विज- भरो ॥ न जहाति मृतं वापि सर्वड्यापी धनअ्ञयः।एते नाडीषु सवासु भ्रमन्ते जीव कुपिग: ॥ सामुद्रिकशास्तस्य संप्रविश्य गुदे सम्यक पृथगन्नं पृथक् जलम्। ऊर्ध्वमार्ग जलं कृत्वा तदननं च जलादषः ॥३८॥ सो वायु गुदा में प्रविष्ट होकर अन्न व जल को न्यारा न्यारा करता है व जलको ऊ पर करके अन्नको नीचे कर देता है॥। ३८ ॥। अग्नेस्त्वधः स्वयं प्राप्तो ह्यर्नि चैव धमेच्छनैः । वायुना ध्मायमानोऽग्निः पृथकिट्टं पृथग्रसम् ॥ ३६ ॥ अग्निके नीचे आपही गाप्त हुआ माणवायु अग्नि को धीरे धीरे जलाता है व वायु से जलाया हुआ अरग्नि कीट व रसको न्यारा न्यारा करता है यानी रसको न्यारा करके मैल को अलग कर देता है॥। ३६ । ग. पु. अ्. १६ ॥। श्रीभगवानुवाच। आ्ालयैर्दशभिः किट्टो भिन्नो देहाद्वहिर्व्रजेत। कर्णाक्षिनासिका जिह्वा दन्ता नाभिर्वपुर्गदम् ।। १।। नखमाला शिरः शेषं विष्ठामूत्रमनन्तकम्। शुक्रशोषितसंयोगात्पादकौशिकमुदाहृतम् ॥२॥ श्रीभगवान्जी बोले कि, अहो खगनायक ! कान, नेत्र, नाक, जीभ, दांत, नाभि लिङ्र, गुदा, नख और शीश इन दश घरों से निकला हुआ मैल देह से बाहर जाता यानी अल्प मैल, विष्ठा व मूत्र आदि अनन्त बहते हैं और बीज-रज के संयोग से ब कोशोंवाला देह कहाजाता है ॥ १२॥ रोमकोट्यस्तथा तिस्रो ह्यर्धकोटिसमन्विताः। द्ात्रिंशद्दशना: प्रोक्काः सामान्यात्समुदाहताः॥३॥ इस देह में सादे तीन करोड़ रोम हैं और सामान्य से बत्तीस दांत कहाते हैं ॥ ३॥ विंशतिस्तु नखाः केशा: सप्तविशतिकोटयः। मांसं पलसहसैकं सामान्यं देहसंस्थितम्॥४॥ बीस नख, सत्ताईस करोड़ केश और एक हज़ार पल मांस है जो कि सामान्य होकर देह में टिका है।। ४ ।। रक्ं पलशतं तार्क्ष्य वक्ष्यते वै पुरातनैः। पलानि दश मेदश्च त्वचा चैव ततः समा॥५॥ उत्तरार्द्धें द्वितीयाङ्क: । अहो गरुढ़जी ! सौपल रुधिर पुरातनों ने कहा है दश पल मेदा है और उसी के बरावर खाल भी है॥। ५ ॥ पलद्वादशकं मज्जा महारक्नं पलत्रयम्। शुक्रं द्विकुडवं ज्ञेयं शोषितं कुडवद्धयम् । श्लेष्मा त्रिकुडवं चोर्ध्वं विष्वामूत्रं तु तत्समम् ॥ ६ ॥ बारह पल मज्जा, तीन पल महारक्क, दो कुड़व वीर्य, दो कुड़ब रुधिर, तीन कुड़व कफ और उसी के समान मल व मूत्र भी है।। ६ ।। बलपिएडं समाख्यातं ज्ञेयं वै वेदपारगैः। ब्रह्माएडे ये गुणा: सन्ति शरीरे ते व्यवस्थिताः ।७।। देह का बल कहा गया जो कि वेदवेत्ताओं को जानना चाहिये आरै ब्रह्माएड में जो विद्यमान हैं वे सघ शरीर में भी टिके हैं । ७॥ पातालं पर्वता लोकास्तथान्ये दवीपसागराः। आदित्यादिग्रहाः सर्वे पिएडमध्ये व्यवस्थिताः॥८।। पाताल, पर्वत, लोक, द्वीप, सागर और सूर्य आदि ग्रह ये सब देह के बीच में व्यव- स्थित हैं यानी टिके हैं॥ ८ ॥ पादाधस्त्वतलं ज्ञेयं पादोर्ध्वं वितलं तथा। जानुभ्यां सुतलं विद्धि ह्यरू चैव महातलम् ॥ ६ ॥ पांव के नीचे अतललोक, पांव के ऊपर वितल, घुटनुओं में सुतल और जांघों में द्दातल तथा तलातल है।। ६ ।। तथा तलातलं चैव गुह्यदेशे रसातलम्। पातालं पादतलयोरेवं लोकाः प्रतिष्ठिताः ॥१० ॥ गुद्देश में रसातल और पादतलों में पाताल लोक है इस भांति सातों लोक प्रति- छेत हैं॥ १० ॥ भूर्लोकोनाभिमध्ये तु भुवर्लोकस्तदूर्ध्वके। स्वर्लोको हृदये प्रोक़: कराठमध्ये महस्तथा ॥ ११॥ नाभिमएडल में भूर्लोक, उदर में भुवलोक, हृदय में स्वलोक और कएठ के बीच में हलोंक कहा है ।। ११ ।। १ कुडव=पावसेर को कहते हैं।। सामुद्रिकशास्त्रस्य त्रिकोण संस्थितो मेरुरधः कोणेतु मन्दरः। दक्षिण चैव कैलासो वामकोण हिमालयः ॥१२ ॥ त्रिकोण में सुमेरु, निचले कोण में मन्दराचल, दक्षिण कोण में कैलास और वाम को में हिमालय है। १२ ॥ निषधश्चोर्ध्वभागे वै दक्षिणे गन्धमादनः । रमणो वामरेखायां सस्तैते कुलपर्वताः।१३॥ ऊर्ध्वभाग में निषध, दक्षिण में गन्धमादन और वामरेखा में रमण पर्वत है ये सात कुलपर्वत कलेवर में टिके हैं ॥ १३ ॥ अस्थिस्थाने गतं जम्बु शाकं मज्जामु संस्थितम्। कटिदेशे भवेत्प्रक्षं क्रौञ्चः शिरसि वर्तते ॥१४॥ वर्तता है ॥ १४ ॥ हाड़ों में जम्बूद्वीप, मज्जा में शाकद्वीप, कमर में सक्षद्वीप और शीश में क्रौश्चद्वीप त्वचायां शाल्मली द्वीपं गोमेदं रोमसंचये। नखस्थं पुष्करं द्वीपं सागरास्तदनन्तरम् ॥ १५ ॥ खाल में शाल्मलीद्वीप, रोमसमूहों में गोमेदद्वीप और पुष्करद्वीप नखों में रहता है और इसके अनन्तर समुद्र रहते हैं ॥ १५ ॥ क्षारोदश्र तथा मूत्रे क्षीरोदसागरोरसे। सुरोदधि: श्लेष्मसंस्थो मज्ायां घृतसागरः॥ १६॥ सागर है ॥ १६ ॥ मूत्र में खारा समुद्र, रसमें क्षीरसागर, कफ में सुरा का समुद्र और चर्वी में घी का दन्तेष्विक्षुरसं तस्थौ शौषिते दधिसागरम्। सलिलं लम्बिकास्थाने गर्भोदं शुक्रसंस्थितौ ॥ १७॥ दांतों में पौंड़े का रस, रुधिर में दही का सागर, लम्बिका में सलिलसमुद्र और वीर्यस्थान में गर्भोदसमुद्र है॥ १७ ॥ नादचक्रे स्थितः सूर्यो बिन्दुचक्रे तु चन्द्रमाः। लोचनाम्यां कुजो ज्ेयो हृदये बुधसंज्ञितः ॥ १८।। मिनोति प्रक्षिपति उच्चत्याज्ज्योरतीपि इति॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्ग: । नादचक्र में सूर्य स्थित है, बिन्दुचक्रमें चन्द्रमा है, लोचनों में मङल जानना चाहिये और हृदय में बुध रहता है ।। १८ ।। विष्स्थाने गुरुं विद्याच्छुक्र: शुक्रे व्यवस्थितः। नाभिस्थाने स्थितो मन्दो मुखे राहुर्व्यवस्थितः ॥ १६ ॥ विष्णस्थानमें बृहस्पति, वीर्यस्थान में शुक्र, नाभिस्थान में शनैश्रर और मुख में राहु टिका रहता है॥ १६ ॥ वायुस्थाने स्थितः केतुः शरीरे ग्रहमएडलम्। विभक्कं च समाख्यातमापदां नियतं पदम् ॥ २० ॥ वायुस्थानमें केतु रहता है यह शरीर में ग्रहों का मए्डल विभक्क होता हुआ कहागया हैं जो कि निश्चयकर आपदाओं का स्थान है॥ २०॥ इति शारीरकाध्याय: ।