110. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — सृष्टिक्रमो
सृष्टिक्रमो (Part 1)
संवत्सरपकरखम् ... ... ६५ प्रकृतिस्व रूपमाह रोगप्रकरणम् ... ६1 ... शिवस्वरोदयाध्यायः कालपकरणम् ... ... ६७ ४६् .... ११० शिष्यलक्षणाम् इति शिवस्वरोदयाध्यायः अ्थ कविवंशवर्नमाह .११० विपरीतलक्षणम् ... ग्रन्थपूर्ति: ... .... ११२ अथ इडा .... इति सामुद्रिकस्योच्तरार्द्धे द्वितीयाङ्कस्प अथ पिङ्गला .... सूचीपत्रम्। .... अथ सामुद्रिकशास्त्रस्योत्तरार्द्वे द्वितीयाक्कमाह॥ मङ्गलाचरणम्।। नत्वाहं गजतुएडकं गणपति सौख्यप्रदं शाम्भवं धन्यं धर्मधरं धराधिपनुतं सिन्दूरभालाङितम्। विघ्नव्यूहहरं परेशनिरतं भूत्यादिभिः सेवितं स्वप्नाध्याययुतं स्वरोदयगतं ज्ञानं ब्रुवे विन्मुदे॥ १ ॥ सामुद्रिकस्वमाध्याये सुस्वमानाह- नन्द उवाच। केन स्वमेन किं पुरायं केन पुंसां भवेत्सुखम्। कोपि कोपि च सुस्वपस्तत्सर्वं कथय प्रभो ॥ १ ॥ नन्दजी बोले कि, हे मभो ! किस स्वम्र से पुरुषों को क्या पुएय होता है ? और किस वम से क्या सुख होता है और कौन कौन सुस्वम् हैं उन सवों को कहिये ॥ १॥ श्रीभगवानुवाच। वेदेषु सामवेदश्र प्रशस्तः सर्वकर्ममु। तत्रैव कारवशाखायां पुरायकाएडे मनोहरे॥ २ ॥ श्रीभगवान्जी वोले कि, वेदों में सामवेद सब कर्मों में प्रशस्त है वहां ही काएवशाखत्रा मनोहर पुएयकाएड के उपस्थित होने में ॥२॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य सुव्यक्ो यश्र सुस्वमः शश्वत्पुरायफलप्रदः। तत्सर्वं लिखितं तात ! कथयामि निशामय॥ ३ ॥ जो सुस्वम प्रकटित है वह निरन्तर पुएयफल का दाता है हे तात ! वह सब लिखा मैं कहता हूँ सुनिये ।। ३ ।। स्व्माध्यायं प्रवक्ष्यामि बहुपुरायफलग्रदः। स्वमाध्यायं नरः श्रुत्वा गङ्गास्नानफलं लभेत्॥४ ॥ स्वमाध्यायको मैं कहूंगा जोकि बहुत से पुएयफल का प्रदाता है उस स्वमाध्यायको सुनकर मनुष्य गज्जास्नानका फल पाता है॥४ ॥ स्वमस्तु प्रथमे यामे संवत्सरफलप्रदः। द्वितीये चाष्टभिर्मासैस्त्रिभिर्मासैस्तृतीयके ॥ ५ ॥ जो स्वम पहले पहर में देखाजाता है वह सालभरे में फलदायक होता है व जो दूसरे पहर में देखाजाता है वह आठ महीना में फल देता है और जो तीसरे पहर में स्वम देखाजाता है वह तीन महीना में फलदायक होता है ॥ ५ ॥ चतुर्थे चार्धमासेन स्वपः स्यान्तु फलप्रदः। दशाहे फलदः स्वनोऽप्यरुणोदयदर्शने॥ ६॥ जो स्वम् चौथे पहर में देखा जाता है वह आधे महीना (पन्द्रह दिन) में फल को देता है और जो स्वम अरुणोदय के दर्शन में देखाजाता है वह दश दिन में फलदायक होता है॥। ६ । प्रातः स्वप्श्च फलदस्तत्क्षणं यदि बोधितः। दिने मनसि यद्दृष्टं तत्सर्वं च लभेड्वम् ॥७॥ जो स्वम् प्रभातकाल देखाजाता है वह जगनेपर उसी क्षण फलको देता है दिन में जे देखागया वा मनमें विचारा गया है उस सबको निशयकर पाता है।। ७॥ चिन्ताव्याधिसमायुक्को नरः स्वपं च पश्यति। तत्सर्वं निष्फलं तात प्रयात्येव न संशयः ॥८॥ हे तात ! जो प्राणी चिन्ता व व्याधि से संयुक्त होता हुआ स्पम को देखता है वह संपूर्ण निस्सन्देह निष्फलता को प्राप्त होता है॥८॥। जडो मूत्रपुरीपेण पीडितश्र भयाकुलः। पर उत्तराद्ध द्वितीयाङ: । दिगम्वरो मुककेशो न लभेत्स्वप्जं फलम् ॥ ६ ॥ जो पाणी स्वम्न में जड़ होकर पेशाव व दस्त से पीड़ित व भय से व्याकुल व नङ्गा तथा होड़े केशवाला होजाता है वह स्वम् से उपजेहुए फल को नहीं पाता है।। ६।। दृष्टा स्वमं च निद्रालुर्यदि निद्रां प्रयाति च। विमूढव्यक्किश्रेद्ात्रौ न लभेत्स्वभजं फलम् ॥ १० ॥ जो निद्रावान् प्राणी स्वपको देखकर निद्राको प्राप्त होता है और जो रात्रि में विमूद हेजाता है वह स्वमज फलको नहीं पाता है॥ १०॥ उत्क्ता काश्यपगोत्रे च विपत्ति लभते धुवम्। दुर्गते दुर्गतिं याति नीचे व्याधिं प्रयाति च । ११।। काश्यपगोत्र में कहकर निश्चय विपत्ति को पाता है, दुर्गत में दुर्गति को पाता है और बिच में व्याधि को प्राप्त होता है । ११ ॥ शत्रौ भयं च लभते मूर्खे च कलहो भवेत्। कामिन्यां धनहानिः स्याद्रात्रौ चोरभयं भवेत् ॥१२ ॥ बैरी के देखने में भय को पाता है, मूर्ख के देखने में लड़ाई होती है व कामिनी में न का विनाश होता है और रात्रि में चोरों का भय होता है ॥ १२ ॥ निद्रायां लभते शोकं पाीडते वाञ्छितं फलम्। न प्रकाश्यश्र मुस्त्प्ः परिडतैः काश्यपे ब्रज ॥ १३ ॥ स्वम में निद्रा के आजाने पर शोक को पाता है, पसिडत के देखने पर वाञ्छित फल को णाता है और पणडितों को भला स्वम प्रकाशित नहीं करना चाहिये इसालये काश्यप- गोत्रीय के पास चलो ॥ १३ ॥ गवां च कुञ्जराणां च हयानां च ब्रजेश्वर। प्रासादानां च शैलानां वृक्षाणां च तथैव च ।। १४ ।। आरोहएं च धनदं भोजनं रोदनं तथा। प्रतिगृह्य तथा वीणां सस्याढ्यां भूमिमालभेत् ॥ १५ ॥ है बरजेश्वर ! स्त्रम् में बैल, हाथी, घोढ़ा, देवमन्दिर, राजमन्दिर, पह्दाड़ और वृक्षों पर चढे तो धनदायक होता है तथा भोजन व रोदन करे और वीणा को लेकर बजावे नो सस्यसंपन्न भूमि को पाता है॥ १४। २५ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य शस्त्रास्त्रेण यदा विद्धो व्रणेन कृमिणा तथा। विष्व्या रुधिरेणैव संयुक्कोप्यर्थमालभेव॥ १६॥ जो स्वम् में शस्त्र व अस्त्र से विध जावे घाव, कृमि, विष्ठा और रुधिर से संयुक् होजादे तो वह धन को पाता है॥ १६ ॥ स्वभेऽप्यगम्यागमनं भार्यालाभं करोति च। मूत्रसिक्कं पिवेच्छुक्रं नरकं च विशत्यप॥ १७॥ नगरं प्रविशेन्नक्ं समूत्रां वा सुधां पिबेत। शाभवार्तामवामोति विपुलं चार्थमालभेव॥१८ ।। जो स्वम्र में अगव्यागमन करता है तो भार्या को पाता है, जो मूत्रसिक़ बीज को पीता है और नरक में घुसता है व रात्रि में नगर को जाता है या मूत्रसमेत सुधा को पीता है तो वह शुभवार्ता को पाता हुआ उड़ेभारी धन को लहता है ।। १७। १८ ।। गजं नृप सुवर्ण च वृपभं धनुमेव च। दीपमन्नं फलं पुष्पं कन्यां छत्रं रथं ध्वजय् ॥ १६ ॥ कुट्ुम्वं लभते दृष्टा कीर्ति च विपुलां श्रियम्। पूर्णकुम्भं द्विजं वहिं पूपं ताम्बूलमन्दिरम्॥ २०॥ शुक्कधान्यं नटं वेश्यां दृष्टा श्रियमवाशुयात। गोक्षीरं च घृतं दृष्टा चार्थ पुरायं धनं लभेत्॥ २१॥ हाथी, राजा, सोना, वैल, धनुप, दीपक, अन्न, फल, फूल, कन्या, छाता, रथ, ध्वजा और कुटुम्च को देख कर यश और घनी लक्ष्मी को पाता है तथा पूर्णकुम्भ, ब्राह्मय अग्नि, पुआ, ताम्बूल, मन्दिर, सफ़ेद धान्य, नट और वेश्या को देख कर लक्ष्मी को थाता है और गऊ का दूध व घी को देख कर अर्थसिद्धि, पुएय व धन को पाता है॥१६/२१। पायसं पझ्मपत्रे च दधि दुग्धं घृतं मधु। मिष्टान्नं स्वस्तिकं भुक्त्वा ध्रुवं राजा भविष्यति॥ २२।। पक्षिणां मानुषाणां च भुङ्गे मांस नरो यदि। बह्वर्थ शुभवार्तां च लभते वाञ्छितं फलम् ॥ २३ ॥ कमल के पत्ते पर खीर, दही, दूध, घी, शहद, मीठा अन्न और स्वस्तिकों का भोजन उत्तरार्द्धे द्वितीयाङक:। عو र निश्चय कर राजा होता है पक्षी व मनुष्यों का मांस जो भाणी खाता है वह बहुत सा न, शुभवार्ता और वाञ्छितफल को पाता है॥। २२।२३। छत्नं वा पादुकां वापि लव्ध्वाध्वानं च गच्छति। छ्रसिं च निर्मलं तीक्ष्णं तत्तथैव भविष्यति॥ २४॥ भेलया संतरेद्यो हि सप्धानं भविष्यति। दृष्टा च फलिनं वृक्षं धनमाननोति निश्चितम् ॥ २५॥ छाता वा खड़ाऊं को पाकर मार्गपर चले या पैनी, निर्मल तलवार लेकर चले और भेला (घन्नई) आपरादि से तरता है वह पधान होता है और फले हुए दृक्षको देखकर नको निश्चय कर पाता है ॥ २४।२५॥ यस्य श्वेतेन सर्पेण दश्यते दक्षिणे सुजे। सोऽचिराल्मते भार्या विनीतां प्रियवादिनीम् ॥ २६॥ सर्पेण भक्षितो यो हि अर्थलाभश्च तद्गवेत्। स्वभे सूर्यं विध्वं दृष्टा सुच्यते व्याघिवन्धनात् ॥ २७॥ जिसकी दाहिनी भुजा में सफ़ेद सांप काट खाबे तो वह थोड़े ही समय में बिनीता व पेयवादिनी मार्या को पाता है २६ जो स्वम में सांप से भक्षित हो वह अर्थलाभ हो पाताहै और स्वम में सूर्य व चन्द्रमा को देखकर व्याधिवन्धन से हूट जाताहै॥ २७॥ बडवां कुकुटी कौशी दृष्टा भार्या लभेद्ध्रुवम। स्वन्े यो निगडैर्वद्धः प्रतिष्ठामुत्तमां लभेत् ॥ २८॥ ब्राह्मणी या घोड़ी, मुर्गी और कराकुली को देखकर भार्या को निश्चय कर पाता है और जो स्वन्न में बेड़ी हथकड़ी से वाँधा गया हो तो वह उच्तम प्रतिष्ठा को पाताहै ॥२८॥ दध्यन्नं पायसं भुक्धे तडागे वा नदीतटे। विशीषें पद्मपत्रे च सोपि राजा भविष्यति ॥ २६ ।। जलौकसं वृश्चिकं च सर्पं च यदि पश्यति। धनं पुत्रं च विजयं प्रतिष्ठ च लभेदिति ॥३०॥ जो परारी स्वम में तालाब या नदी के किनारे फटे केला के पत्ते पर दही, भात और श्रीर को खाता है वह राजा होता है और यदि स्वम्र में जोंक बीछू और सांप को देखता हैं तो धन, पुत्र, विजय और प्रतिष्ठा को पाता है ॥ २ह। ३० ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य शृङ्गिभिर्दंष्टिभिः कोलैर्वानरैः पीडितो यदि। निश्चितं च भवेदाजा धनं च विपुलं लभेत्॥३१॥ मत्स्यं मांसं मौक्किकं च शङ्गचन्दनहीरकम्। यस्तु पश्यति स्व्पान्ते विपुलं धनमालभेत्॥ ३२॥ यदि स्वम में सींगवाले, दाढ़वाले, सूअर और वानरों से पीड़ित होता है तो वह निश्चय कर राजा होता हुआ वड़े धन को पाता है और जो माणी मछली, मांस, मोती, शङ्क, चन्दन और हीरा को देखता है तो वह स्त्रम्ान्त में भारी धनको पाताहै ॥३१।३२॥ सुरां च रुधिरं स्वणं भुक्त्वा विष्वां धनं लभेत्। प्रतिमां शिवलिङ्ग च लभेद्दृष्टा जयं धनम् ॥ ३३॥ फलितं पुष्पितं बिल्वमात्रं दृष्टा लभेद्धनम्। दृष्टा च जलमग्नि च धनं बुद्धिं श्रियं लभेत् ॥३४॥ EC जो प्राणी स्वम्र में मदिरा, रक्र और सोना व विष्ठा को खाता है तो वह धन को पाता है व जो मूर्तति व शिवलिङ्ग को देखता है तो वह जय व धनको पाता है और जो फले, फूले वेल व आँब को देखता है तो वह धनको पाता है और जो जल व आगी को देखता है तो वह धन, बुद्धि और लक्ष्नी को पाता है। ३३। ३४ ।। आमलकं धात्रीफलमुत्पलं च धनागमम्। देवताश्च द्विजा गावः पितरो लिङ्रिनस्तथा॥ ३५॥ यददाति मिथः स्वप्े तत्तथैव भविष्यति। शुक्काम्बरधरां नारीं शुक्कमाल्यानुलेपनाम्॥ समाश्लिष्यति यः स्वप्ने तस्य श्रीः सर्वतः सुखम् ॥३६॥ जो स्वम में आमरा, अँवरा, कमल, देवता, व्राह्मण, गौ, पितर और लिद्रियों को देखता है तो वह प्राखणी धनको पाता है और जो परस्पर देता है वह वैसाही होता है और जो स्वम् में सफ़ेद वस्त्रों को धारे व सफ़ेद माला पहने व चन्दन को लगाये हुई नारी का आलिङ्गन करता है उसको लक्ष्मी मिलती है व सब कहीं सुख को पाता है॥। ३५ । ३६ ।। पीताम्बरधरां नारीं पीतमाल्यानुलेपनाम्। उपगूहति यः स्वमे कल्याएं तस्य जायते ॥ ३७॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । जो स्व्म्र में पीतवस्त्र धारे, पीतमाला पहने व पीतचन्दन काही लेपन किये हुई रमणी का आलिङ्गन करता है तो उसको कल्याण होता है॥ ३७ ॥। सर्वाषि शुक्कानि प्रशंसितानि भस्मास्थिकार्पासविवर्जितानि। सर्वाषि कृष्णानि विनिन्दितानि गोहस्तिदेवद्विजवर्जितानि ॥३८॥ स्व्म्न में राख, हड्डी, कपास से रहित सारी सफ़ेद चीजें पशंसित होती हैं और गऊ, हांथी, देवता और ब्राह्मण से वर्जित सारी काली चीजें विशेपता से निन्दित कहातीः हैं ।। ३८ ॥। दिव्या स्त्री संमिता वि्रा रत्नभूषणभूषिता ।। यस्य मन्दिरमायाति स प्रियं लभते ध्रुवम्॥ ३६ ॥ स्वममें रन्नभूपणों से भूपित ब्राह्मणी प्रमाणवाली दिव्य रमणी जिस के घर आाती है वह मियपदार्थ को निश्चयकर पाता है॥ ३ ॥ स्वभे च ब्राह्मणो देवो ब्राह्मणी देवकन्यका। कुमारी चाष्टवर्षीया रत्नभूषणभूषिता। यस्य तुष्टा भवेत्स्वने तस्य तुष्ट च पार्वती॥४० ॥ जिसके स्वम्र में ब्राह्मण, देवता, ब्राह्मणी, देवकन्या, कुमारी और रव्रभूषणों से पित आठ वर्ष की कन्या संतुष्ट होती है उसके ऊपर पार्वतीजी प्रसन्न होती हैं ॥ ४० ॥ ब्राह्मणो ब्राह्मणी वापि संतुष्टः संमिता सती। फलं ददाति यस्मै च तस्य पुत्रो भविष्यति ॥ ४१॥ यः स्वभे ब्राह्मणो नन्द! करोति च शुभाशिषम्। यद्दति भवेत्तस्य तस्यैश्वर्यं भवेद्धुवम् ॥ ४२ ॥ ब्राह्मण या ब्राह्मणी जोकि साध्वी होकर भलीभांति मानी गई हो वह सन्तुष्ट होकर जिसके लिये फल को देती है उसके पुत्र उपजता है ४१ हे नन्द ! सम में जो ब्राह्मण गुभाशीर्वाद देता है या जो कहता है वह उस स्व्रमद्रष्टा के होता है और निश्चयकर शवयें होता है।। ४२ ।। परितुष्टो द्विजश्रेष्ठश्चायाति यस्य मन्दिरम्। नारायण: शिवो ब्रह्मा प्रविशेनु तदाश्रमम् ॥४३॥ सम्पत्तिस्तस्य भवति यशश्च विपुलं शुभम्। सामुद्रिकशास्त्रस्य I5 पदे पदे सुखं तस्य सम्मानं गौरवं लभेत् ॥४४॥ स्वम्र में जिसके घर सन्तृष्ट होकर श्रेष्ठ व्राह्मय आता है उसके आश्रम में नारायण, शिव व ब्रह्माजी आते हैं व उसकी सम्पत्ति बढ़ती है और शुभदायक बड़ाभारी यश होता है और पद २ में उसको सुख होता है और वह सम्मान व गौरवता को पाता है॥ ४३ । ४४ ।। छ्रकस्मादपि रवे तु लभते सुरभी यदि। भूमिलाभो भवेत्तस्य भार्या चापि पतिव्रता ॥।४५ ॥ करेण कृत्वा हस्ती यं मस्तके स्थापयेद्यदि। राज्यलाभो भवेत्तस्य निश्चितं च श्रुतौ श्रुतम् ॥ ४६ ॥ यदि स्वम में एकाएकी सुरभी गऊ को पाजाता है तो उसे भूमि का लाभ होता है और स्त्री पतिव्रता मिलती है ४५ स्वम में हाथी शूंड से पकड़ कर जिसको माथे पर धरलेता है तो उसको राज्य का लाभ होता है यह निश्चित शास्त्रों में सुनागया है॥४६ ॥ स्वमे तु ब्राह्मणश्रेष्ठः समाश्लिष्यति यं नरम। तीर्थस्नायी भवेत्सोपि निश्चितश्च श्रियान्वितः॥४७।। स्वम् में श्रेष्ठ ब्राह्मण जिस नर को लिपटा लेता है तो वह निश्यकर लक्ष्मी से सं- पन्न होता हुआ तीर्थस्नायी होता है॥ ४७॥ स्व्रने ददाति पुष्पं च यस्मै पुरायवते द्विजः । जययुक्ो भवेत्सोपि यशस्वी च धनी सुखी ॥४८॥ स्वभे दृष्टा च तीर्थानि सौधरत्नगृहाणि च। जययुकश्च धनवांस्तीर्थस्नायी भवेन्नरः ॥४६॥ स्वम्न में ब्राह्मण जिस पुएयवान् के लिये फूल को देता है वह प्राणी जययुक् होता हुआ यशस्वी, धनी व सुखी होता है ४८ स्वम में तीर्थ, राजघर, रत्न और घर को देख कर पाणी जययुक् होकर धनवान होता हुआ तीर्थस्नायी होता है।। ४६॥। स्वपे तु पूर्णकलशं कश्रित्कस्मै ददाति वा। पुत्रलाभो भवेत्तस्य संपत्ति वा समालभेत्॥५० ॥ हस्ते कृत्वा तु कुडवमाढकं वापि सुन्दरी। यस्य मन्दिरमायाति स लक्ष्मीं लभते घ्रुवम् ॥ ५१॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क । स्वम में कोई किसी के लिये पूर्ण कलश को देता है तो उसको पुत्र का लाभ होता है या सम्पत्ति को पाता है ५० हाथ में कुडव या आदक को धरकर सुन्दरी रमी जिस के घर आाती है वह लक्ष्मी को निश्चयकर पाता है॥ ५१॥ दिव्या स्त्री यद्हं गत्वा पुरीषं वितृजेद्यदा। अर्थलाभो भवेत्तस्य दारिद्रयं च प्रयाति च ॥ ५२ ॥ यस्य गेहं समायाति भार्यया सह ब्राह्मणः। पार्वत्या सह शम्भुर्वा लक्ष्मीनारायणोथवा॥ ५३ ॥ दिव्य रमणी जिसके घर जाकर विष्ठा का त्याग करती है तो उसको अर्थ का लाभ होता है और दरिद्र चलाजाता है ५२ जिसके घर में ब्राह्मणी समेत ब्राह्मण आजाता है तो उसको पार्वती समेत महादेव या लक्ष्मी समेत नारायणजी मिलते हैं ॥ ५३॥ ब्राह्मणो ब्राह्मणी वापि स्वन्े यस्मै ददाति वा। धान्यं पुष्पाञ्जलिं वापि तस्य श्रीः सर्वतः सुखी ॥५४॥ ब्राह्म या ब्राह्मणी स्वम में जिसके लिये धान्य व पुष्पाञ्जलि को देती है उसके यहां चारों ओर से लक्ष्मी आती है और वह माखी सुखी रहता है।। ५४॥ मुकाहारं पुष्पमाल्यं चन्दनं च सितं तथा। स्वभे ददाति विप्रश्च तस्य श्रीः सर्वतः सुखी ॥५५ ॥ गोरोचनां पताकां वा हरिद्रामिक्षुदरडकम्। स्निग्धाननं लभते स्वने तस्य श्रीः सर्वतः सुखी ॥ ५६ ॥ मुक्ाहार, पुष्पमाला और सफ़ेद चन्दन को जो ब्राह्मण स्वम्र में जिसको देता है उसको लक्ष्मी मिलती है. और वह सब कहीं सुखी रहता है ५५ गोरोचना, पताका, इरिद्रा, ईखकादएड, सिद्धान्न या स्निग्धान्न को जो प्राणी स्वम् में पाता है तो उसको लक्ष्मी माप्त होती है और वह सब कहीं सुखी रहता है॥। ५६।। ब्राह्मणो ब्राह्मणी वापि ददाति यस्य मस्तके। छत्रं वा शुक्कधान्यं वा स च राजा भविष्यति॥५७॥। स्वे स्थस्थः पुरुषः शुक्कमाल्यानुलेपनः। तत्रस्थो दधि भुङ्के च पायसं वा नृपो भवेत् ॥। ५८ ॥ बाझश या ब्राह्मणी जिसके माथे पर छाता को धरती है या सफ़ेद धान्यको चढ़ाती सामुद्रिकशास्त्रस्य है तो वह राजा होता है ५७ स्वम् में रथ में बैठा पुरुप सफ़ेद माला पहने व चन्दन को लगाये हुए वहां टिकाहुआ दही या खीरको खाता है तो वह राजा होता है।। ५८ ॥। स्वपे ददाति विप्रश्च ब्राह्मणी वा सुधां दधि। प्रशस्तपात्रं यस्मै वा सोपि राजा भवेद्धुवम्॥५६॥। ददाति पुस्तकं स्वपे यस्मै पुरायवते द्विजः। स भवेद्विश्वविख्यातः कवीन्द्रः परिडतेश्वरः॥६८ ॥। ब्राह्मण या ब्राह्मणी स्वम्र में जिसके लिये सुधा, दही और योग्यपात्र को देती है तो वह निश्चय कर राजा होता है ५६ ब्राह्मण स्वम्न में जिस पुएयवान् के लिये पुस्तक को देता है तो वह विश्व में विख्यात होतां हुआ कबीन्द्र होकर पणडतेश्वर होता है॥। ६० ॥ यं पाठयति स्व्रमे या मातेव च सुतं यथा। सरस्वती सुतः सोपि तत्परो नास्ति पडतः ॥ ६१ ॥ ब्राह्मण: पाठयेद्यञ्च पितेव यत्रपूर्वकम्। ददाति पुस्तकं प्रीत्या स च तत्सदृशो भवेत् ॥ ६२ ॥ स्वम में जो माता पुत्र के नाई जिसको पढ़ाती है वह सरस्वतीसुत होता है और उससे परे पणडत कोई नहीं होता है ६१ ब्राममख पिता के नाई यत्नपूर्वक जिसको पढ़ाता है और प्रीति से पुस्तक को देता है वह उसके समान होता है ॥ ६२ ॥ प्रामोति पुस्तकं स्वभे पथि वा यत्र तत्र वा। स परिडतो यशस्वी च विख्यातश्च महीतले ॥ ६३ ॥ स्वने यस्मै महामन्त्रं विश्रो विप्रा ददाति चेत्। स भवेत्पुरुषः प्राज्ञो धनवान्गुणवान्मुधीः ॥६४.॥ स्वप्न में जो मनुष्य मार्ग में या जहां तहां पुस्तक को पाजाता है तो वह पडित व यशस्वी होकर पृथ्वीमण्डल में विख्यात होता है ६२ स्वम में ब्राझ्मण या ब्राह्मणी जिसके लिये महामन्त्र को देती है तो वह पुरुष प्राज्ञ, धनवान् व गुणवान् होकर बड़ी बुद्धिवाला होता है॥ ६४ ।। स्वमे ददादि मन्त्रं वा प्रतिमां वा शिलामयीम्। यस्मै ददाति विप्रश्च मन्त्रसिद्धिश्च तद्गवेत् ॥ ६५ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्ः । विप्रान्विप्रसमूहं च दृष्ट्रा नत्वाशिष लभेत्। राजेन्द्रः स भवेद्ापि किं वा च कविपरिडतः ॥ ६६ ।। स्वम में ब्राह्मण जिसके लिये मन्त्र या शिलामयी प्रतिमा को देता है तो उसके मन्त्र की सिद्धि होती है ६५ ब्राह्मण या ब्राह्मणसमूहों को देख व नमस्कार कर जो आशीर्वाद को पाता है वह राजेन्द्र होता है अथवा कचियों में पएिडत कहाता है॥ ६६ ॥। शुक्कधान्ययुतां भूमिं यस्मै विप्रः समुत्सृजेत्। स्वपे च परितुष्टश्र स भवेत्पृथिवीपतिः ॥६७॥ स्वभे विप्रो रथे कृत्वा नानास्वर्ग प्रदर्शयेत्। चिरजीवी भवेदायुर्धनवृद्धिर्भवेद्ध्रवम् ॥ ६८ ॥ स्वप्में ब्राह्मण सफ़ेद धान्य संयुक्र पृथ्वी को जिसके लिये देता है और जो परितुष्ट होता है वह पृथ्वीका स्वामी होता है ६७ सवममें ब्राह्मण जिसको रथमें करके नानाभांति स्वर्गको देखलाता है वह चिरजीवी होता है व उसकी आयु व धनकी बढ़ती निश्चय कर होती है।। ६८ ।। विप्राचिप्रश्च सन्तुष्टो यस्मै कन्यां दक्षति च। स्वपे च स भवेन्नित्यं धनाढ्यो भूपतिः स्वयम् ॥ ६६॥ स्वभे सरोवरं दृष्ट्रा समुद्र वा नदीं नदम्। शुक्काहिं शुक्कशैलं च दृष्ट्रा प्रियमवाशुयात् ॥ ७०॥ स्वम में ब्राह्मणी व ब्राअ्मणण जिसके लिये कन्या को देता है वह नित्यही धनशाली होता हुआ आपही राजा होता है ६६ स्व्रम में सरोवर, समुद्र, नदी, नद, सफ़ेद सांप और सफ़ेद पहाड़ को देखकर प्यारे पदार्थ को पाता है। ७० ॥ यः पश्यति मृतं स्वन्ने स भवेचिरजीवनः । अरोगो रोगिएं दृष्टा सुखिनं च सुखी भवेत् ॥ ७१॥ दिव्या स्त्री यं प्रवदति मम स्वामी भवान्भव । स्वभे दृष्टा च जागर्ति स च राजा भवेदधुवम्॥७२॥ स्वम् में जो मृतक को देखता है वह चिरजीवी होता है, अरोगी को देखकर अरोगे सामुद्रिकशास्त्रस्य। और सुखी को देखकर सुवी होता है ७१ स्वम्न में दिव्य रमणी जिससे कहती है कि आप मेरे स्व्रामी होवें ऐसा देखकर जो जाग पड़ता है तो वह निश्चय कर राजा होता है॥ ७२॥ स्वपे च बालिकां दृष्टा लव््वा स्फाटिकमालिकाम्। इन्द्रचापं शुक्कघनं स प्रतिष्ठं लभेदधुवम् ॥७३॥ स्वमे विप्रो वदति यं मम दासो भवेति च। हरिदासस्य सद्धक्ि लव्ध्ा स वैष्णवो भवेत् ॥७४॥ स्वप्र में वालिका को देखकर व स्फटिक माला को पाकर इन्द्रधनु व सफ़ेद मेघ को देखकर वह निश्चयकर प्रतिष्ठा को पाता है ७३ स्त्रम में ब्राह्मण जिससे कहता है कि तुम मेरे दास होजाओ व हरिदास की जूटन पाकर वह वैष्णन होता है॥ ७४॥ स्वभे विम्रो हरिः शम्भुर्वराह्मणी कमला शिवा। शुक्का स्त्री वेदमाता वा जाह्नवी वा सरस्वती॥ ७५॥ गोपालिका वेशधरा वालिका राधिका मम। बालश्र वालगोपालः स्वप्रविद्धिः प्रकाशितः॥७६ ।। जिसने स्व्रम में ब्राह्मण को देखा वह विष्णु व महादेव को देखता है व जिसने ब्राह्मणी को देखा वह लक्ष्मी व पार्वती को देखता है व जिसने श्वेताम्बर धारिणी स्त्री का आलोकन किया उसने वेदमाता का दर्शन पाया व जिसने गङ्गाजी को देखा उसने सरस्वती का दर्शन पाया व जिसने गोपालिका वेशधारिका वालिका का अ्पवलोकन किया उसने मेरी राधिका का दर्शन किया व जिसने वालकों को देखा उसने वालगो- पालों का दर्शन पाया ऐसा स्व्रमवरेत्ताओंने प्रकाशित किया है ॥ ७५।७६॥ एष ते कथितो नन्द सुस्वप्नः पुरायहेतुकः। श्रोतुमिच्छसि किं वा त्वं कि भूयः कथयामि ते॥७७॥ अ्रहो नन्दजी ! यह पुएयहेतुक भला स्वम्र तुमसे मैंने कहां अव तुम क्या सुनने की इच्छा करते हो ? फिर मैं तुमसे क्या कहूं ।।७७।। इति श्रीव्अ्वैवर्ते श्रीकृष्णजन्मखएडे सुस्त्रम्दर्शनम् ॥ १॥ उत्तरार्धे द्वितीयाङ्: । अथ दुःस्वप्ना यथा। नन्द उवाच। श्रुतं सर्वं महाभाग दुःस्वमं कथय प्रभो। उवाच तञ्च भगवान् श्रूयतामिति तद्चः ॥ १ ॥ हे महाभाग ! मैंने सब सुना हे पभो ! दुःस्वप्र को कहिये ऐसा उन का वचन सुनकर श्रीभगवान् जी उन से बोले कि सुनिये मैं कहता हूं ।। १ ॥ स्त्रमे हसति यो हर्षाद्विवाहं यदि पश्यति। नर्तकं गीतमिष्टं च विपत्तिस्तस्य निश्चितम् ॥२॥ स्वम में जो हर्ष से हँसता है और यदि विवाह तथा नाचनेव्राले को देखता है या आभि- त्पित गीत को सुनता है तो उसको निश्चय कर विपत्ति आनकर घेरलेती है ॥ २॥ दन्ता यस्प विपीड्यन्ते विचरन्तं च पश्यति। धनहानिर्भवेत्तस्य पीडा चापि शरीरजा॥ ३ ॥ अभ्यङ्गितश्र तैलेन यो गच्छेद्दक्षिणां दिशम्। खरोष्ट्रमहिपारूढो मृत्युस्तस्य न संशयम् ॥ ४॥ जिस के दांत विशेषता से पीड़ित होते हैं व बिचरते हुए को देखता है तो उसके धन की हानि व शरीर से उपजी हुई पीड़ा होती है ३ जो तैल से अभ्यक्गित होकर गदहा, ऊंट व मैंसा पर चढ़ा हुआ दक्षिणादिशा को जाता है तो उसकी निस्संशय मौत होजाती है। ४ ॥ स्वपे चूर्णं जवापुष्पमशोकं करवीरकम्। : विपत्तिस्तस्य तैलं च लवणं यदि पश्यति ॥ ५ ॥। नग्नां कृष्णं छिन्ननासां शद्रस्य विधवां तथा। कपर्दकं तालफलं दृष्टा शोकमवामुयात्॥ ६॥ यदि स्त्रम में चूना, गुड़हल का फूल, अशोक, कनेर, तैल और लवण को देखता है तो उसको विपत्ति होती है ५ नंगी, काली, नकटी शूद्रकी विधवा (रांड) स्त्री कौड़ा और तालफल को देखकर शोक को पाता है॥ ६ ॥ सवमे रुष्टं ब्राह्मणं च ब्राह्मणीं कोपसंयुताम्। सामुद्रिकशास्त्रस्य विपत्तिश्र भवेत्तस्य लक्ष्मीर्यांति गृहाङ्रवम्॥७॥ वनपुष्पं रक्कपुष्पं पलाशं च सुपुष्पितम्। कार्पासं शुक्कवस्त्रं च दृष्ट्रा दुःखमवाशुयात्॥८॥। यदि स्वम् में रुष्ट व्राह्मण व कोपवती ब्राह्मणी को देखता है तो उसको विपत्ति होती है और उसकी लक्ष्मी घरसे निश्य कर चली जाती है ७ वनपुष्प, रक्रपुष्प, बहुपुष्पित पलाश, कपास और सफ़ेद वस्त्र को देखकर दुःख को पाता है॥। ८।। गायन्तीं च हसन्तीं च कृष्णाम्वरधरां स्त्रियम्। दृष्टा कृष्णां च विधवां नरो मृत्युमवाधुयात्॥ ६ ।। देवता यत्र नृत्यन्ति गायन्ति च हसन्ति च। आस्फोटयन्ति धावन्ति तस्य देशो विनश्यति॥ १०॥ गाती, हँसती, काले वस्त्र पहने काली विधवा स्त्री को देखकर माणी मौत को पाता है ह जहां देवतागख नाचते, गाते व हँसते हैं और ताल ठोंकते हुए दौड़ते हैं उसके देश का विनाश होजाता है ॥ १० ॥ वान्तं मूत्रं पुरीषं वा वैद्यं रौप्यं सुवर्णकम्। प्रत्यक्षमथवा स्वने जीवितं दशमासिकम् ॥ ११॥ कृष्णाम्बरधरां नारीं कृष्णमाल्यानुलेपनाम्। उपगूहति यः स्वभे तस्य मृत्युर्भविष्यति ॥१२॥ वमन, मूत्र, विष्ठा, वैद्य, रूपा और सोना इनको जो प्रत्यक्ष अथवा स्वम्र में देखता है तो वह दश महीना जीता है ११ काले वस्त्र पहने, काली माला धारे व काला अनुलेपन लगाये हुई नारी को जो नर स्वम्र में आलिङ्वन करता है उसकी मौत हो जाती है॥ १२॥ मृतं वत्सं च मुरडं च मृगस्य च नरस्य वा। यः प्रापोत्यस्थिमालां च विपत्तिस्तस्य निश्चितम् ॥१३॥ अभ्यङ्गितस्तु हविषा क्षीरेण मधुनापि वा। तक्रेणापि गुडेनैव पीडा तस्य विनिश्चितम् ॥ १४।। मरा हुआ वछड़ा, हरिए व मनुष्य का मूंड और हड्डियों की माला को जो माी स्वम में देखता है उसको निश्चय कर विपत्ति होती है १३ और जो माी स्वम में घी, दूध, शहद, मठा और गुड़से अभ्यक्रित होता है तो उसको निशय कर पीड़ा होती है॥ १४॥ उत्तराद्धें द्वितीयाङ्: । रथं खरोट्ररसंयुक्कमेकाकी योधिरोहयेत्। तत्रस्थोऽपि च जागर्ति मृत्युरेव न संशयः ॥१५॥ रक्राम्बरघरां नारीं रक्नमाल्यानुलेपनाम्। उपगूहति यः स्वप्ने व्याधिस्तस्य विनिश्चितम् ॥ १६॥ यदि स्वम में अकेला माणी गदहा व ऊंटसे जुते हुए रथपर सवार होता है और वहां ा हुआ भी जागता रहता है तो उसकी निःसन्देह मौतही होजाती है १५ लाल वस्त्र रे, लाल माला पहने व लाल चन्दन का ही लेप लगाये हुई रमणी को जो माणी म्र में आलिङ्गन करता है उसको निश्चय कर व्याधि होती है ॥ १६ ॥ पतितं नखकेशं च निर्वाणाङ्गारमेव च। भस्मपूर्णां चितां दृष्टा लभते मृत्युमेव च ॥ १७॥ श्मशानं शुक्ककाष्ठं च तृणानि लोहमेव च। मसीं च किश्चित्कृष्णां वा दृष्टा दुःखं लभेद्धुवम् ॥१८॥ गिरेहुए नख, केश, आगीका अंगार और भस्मपूरित चिताको देखकर प्राणी मौतही को पाता है १७ रमशान, सफ़ेद काष्ठ, तृण, लोहा या कुछ्ेककालीस्याही को देखकर पाणी निश्चयकर दुःखको पाता है॥ १८॥ पादुकां फलकं रक्तपुष्पमाल्यं भयानकम्। माषं मसूरं मुद्धं वा दृष्टा सद्यो व्रणं लभेत् ॥ १६ ॥ भग्नभाएडं क्षतं शूदं गलत्कुष्ठं च रोगिएम्। रक्काम्बरं च जटिलं शूकरं महिषं तथा॥ २० ॥ कराटकं सरलं काकं भन्जूकं वानरं खरम्। पूयं गात्रमलं स्वपे केवलं व्याधिकारणम॥ २१ ॥ खड़ाऊं, ढाल, लालफूलों की माला, भयानक पदार्थ, उड़द, मसूर या मूंग को देख कर शीघ्रही घाव को पाता है ११ फूटे बासन, घायल शूद्र, गलत्कुष्ठवाला रोगी, लालवस्त्रधारी जटिल, सूत्रर, भैंसा, सीधाकांटा, कौआ, रीछ, वानर, गदहा, पीव है। २०। २१ । और शरीर का मैल इनको स्वम् में देख कर मेवल व्याधि का ही कारण होता अन्धकारं महाघोरं मृतजीवं भयानकम्। दृष्ट्ा स्वपे योनिलिं विपत्ति लभते ध्रुवम्॥ २२॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य स्वममें महाघोर अर्पन्धकार, भयानक मरा हुआ जीव और योनिलिF को देखरर म्राणी निश्चयकर बिपदा को पाता है॥ २२।। कुवेशरूपं म्लेच्छं च यमदूतं भयंकरम्। पाशहस्तं पाशशस्त्रं दृष्टा मृत्युं लभेन्नरः ॥ २३॥। ब्राह्मणो ब्राह्मणी वाला वालको वा सुतः सुता। विदायं करुते कोपादृष्टा दुःखमवाप्ुयात्॥२४॥ निन्दितवेशरूपधारी म्लेच्छ और भयंकर पाशपाशि व पाशायुधधारी यमद्त को देख कर पाणी मौतको पाता है २३ ब्राह्मण, ब्राह्मणी, वाला, वालक, पुत्र या पुत्री कोपसे हिस्सा को न वांटतेहुर देखकर दुःख को पाता है ॥ २४॥ कृष्णपुष्पं च तन्माल्यं शल्यशस्त्रास्त्रधारिणम। म्लेच्छां च विकृताकारां दृष्टा मृत्युं लभेद्धुवम् ॥२५॥ वाद्यं च नर्तनं गीतं गायनं रक्तवाससम्। मृदङ्गवाद्यमानद्धं दृष्टा दुःखं लभेद्धुवम् ॥२६॥ कालाफूल या कालेफूलों की माला शल्य-शस्त्र-अस्त्रधारी और विकृतरूपिणी म्लेच्छा रमणी को देखकर प्राणी मौत को निश्रयकर पाता है २५ वजाना, नाचना, गाना, रक्वस्त्नधारी गायक, मृदङचाजा और मुरचङ् आदि वाजा को देखकर पाणी निश्चयकर दुःख को पाता है॥ २६॥ मत्स्यादिधारयेद्यो हि तद्द्रातुर्मरणं ध्रुवम्। छिन्नं वापि कबन्धं वा विकृतं मुक्केशिनम्॥ २७॥ क्षिप्ं नृत्यं च कुर्वन्तु दृष्ट्रा मृत्युं लभेन्नरः । मृतो वापि मृता वापि कृष्णां म्लेच्छां भयानकाम्॥ उपग्ूहति यः स्वमे तस्य मृत्युर्विनिश्चितः ॥ २८॥ स्वम् में जो भाी मत्स्य आदि जीवों को पकड़ता है तो उसके भाई का मरण निश्चय कर होता है कटाहुआ या बिना शिरका धड़, बीमार, वालों को छिटकाये, हाथ पैर च लाते और नाचते हुए जन को देखकर प्राणणी मौतको पाता है मृतकपुरुप, या मरीहुई काली भयानक म्लेच्छा रमणी को जो स्वम में लिपटा लेता है तो उसकी मौत निश्चय कर होती है॥ २७। २८ ।। येषां दन्ताश्र भगनाश्र केशाश्रापि पतन्ति च। उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । धनहानिर्भवेत्तेषां पीडा वा तच्छरीरजा॥ २६ ॥ स्वम में जिनके दांत टूटजाते और वाल गिरपड़ते हैं उनके धन की हानि या उनके शरीर से उपजी हुई पीड़ा होती है॥ २६॥ उपद्रवन्ति यं स्वभे शृक्गिणो दंष्रिणोपि वा। बालका मानवाश्चैव तस्य राजकुलाद्गयम्॥३०॥ च्िन्नवृक्षं पतन्तं च शिलावृष्टिं तुषं क्षरम्। रक्ाङ्वारं भस्मवृष्टिं दृष्टा दुःखमवाप्टुयात्॥३१॥ स्व्म में सींगवाले या दाबवाले, वालक और मानतरगण जिससे उपद्रब् करते हैं उस को राजकुल से भय होती है ३० गिराह्गुआ कटावृक्ष शिलावृष्टि, भूसी, खार, लाल भ्रेगार और भस्मवृष्टि को देख कर दुःख को पाता है॥ ३१॥ गृहं पतन्तं शैलं वा धूमकेतुं भयानकम्। भग्नस्कन्धं तरोर्वापि दृष्टा दुःखमवाशुयात्॥३२।। स्थगेहशैलवृक्षगोहस्तितुरगात्खरात्। पतन्ति भूमौ ये स्वभे विपत्तिस्तस्य संकुला ॥ ३३ ॥ गिरता हुआ घर, पहाड़, भयानक धूमकेतु और वृक्षका ट्टा, स्कन्ध इनको स्वम में देखकर दुःख को पाता है ३२ स्वम में जो पाणी रथ-घर, पहाड़, वृक्ष, वैल, हाथी, घोड़ा और गदहा से भूमिमें गिरते हैं उनको बड़ीभारी विपत्ति होती है। ३३ ॥। उच्चैः पतन्ति गर्त्तेषु भस्माङ्गारचिताु च। क्षारकुराडेपु चूर्णोषु मृत्युस्तेषां न संशयः ॥ ३४॥ वलाद्गह्वाति दुष्टथ् छत्रं च यस्य मस्तकात्। पितुर्नाशो भवेत्तस्य गुरोर्वापि नृपस्य वा ॥ ३५॥ गड़हा, भस्म, अँगार, चिता, क्षारकुएड और चूना में जो उं.ग से गिरते हैं उनकी मौत निस्सन्देह होजाती है ३४ जिसके मस्तक से छाता को को दुष्ट वलसे लेलेता है तो उसके पिता, गुरु वा राजा का विनाश होता है॥ ३५ ॥ सुरभी यस्य गेहाच याति त्रस्ता सवत्सिका। प्रयाति पापिनस्तस्य लक्ष्मीरपि वसुन्धरा ॥३६॥ पाशेन कृत्वा बन्धं च यं गृहीत्वा प्रयान्ति च। यमदृताश्र ये म्लेच्छास्तस्य मृत्युर्न संशयः॥३७॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिस के घर से बछड़ासमेत डरीहुई सुरभी गऊ चली जाती है उस पापी के घर से लक्ष्मी और वसुन्धरा भी जाती रहती है ३६ स्त्रम में यमराज के दूत जोकि म्लेच्छरूप- धारी हैं वे जिस को पकड़ के पाश से बाँधकर लेजाते हैं उसको मौत निस्सन्देह हो जाती है।। ३७ ।। गणको ब्राह्मणो वापि ब्राह्मणी वा गुरुस्तथा। परिरुष्टः शपति यं विपत्तिस्तस्य निश्चितम् ॥३८॥ विरोधिनश्च काकाश्र कुक्करा भल्लकास्तथा। पतन्त्यागत्य यद्गात्रे तस्य मृत्युर्न संशयः ॥३६॥ महिषा भल्लुका उष्ट्रा: शूकरा गर्दभास्तथा। रुष्टा धावन्ति यं स्वभे स रोगी निश्चितं भवेत् ॥ ४०॥ ज्योतिपी, ब्राह्मण वा ब्राह्मणी तथा गुरुदेव ये स्वम में नाराज होकर जिसको शाप देते हैं उसको निश्चयकर विपदा घेरती है३= शत्रुगणण, कौआ, कूकुर तथा रीछ ये आकर जिसके अङ्गपर गिरते हैं उसकी निस्सन्देह मौत होजाती है ३६ भैसा, भल्लूक, ऊंट, सूअर और गदहा ये स्वममें नाराज होकर जिसके ऊपर दौड़ते हैं वह निश्चयकर रोगी होजाता है॥ ४० ॥ इति श्रीमह्मवैवर्ते श्री कृप्णाजन्मखएडे दुस्स्मदर्शनम् ॥२॥ उत्तराभिमुखस्थो यो यदि गच्छति दक्षिणम्। दिङ्मूढः स तदा ज्ञेयः सप्तमासान्न जीवति॥१॥ जो प्राणी उत्तरदिशा के सामने टिका हुआ यदि दक्षिणदिशा को जाता है तो उसें दिब्बूढ जानना चाहिये वह सात महीना से अधिक नहीं जीता है।। ?॥ शुद्धनिर्मलमादित्ये विवरं यदि पश्यति। तद्वर्पान्ते क्षयं याति नान्यथा भैरवोदितः ॥२॥ यदि कोई माखणी सूर्यमएडल में निर्मल विवर (गड़हा) को देखता है तो वह वर्षान् में क्षयको मांप्त होता है अन्यथा नहीं होसका ऐसा मैरवने कहा है। २॥ उत्तरार्द्धें द्वितीयाङ्क: । सितं कृष्णं हरिद्राभं समूलं भानुमएडलम्। यदि पश्यति सदा सो वै वर्षादर्ध न जीवति॥३॥ यदि कोई प्राखणी मूलसमेत सूर्यमए्डलको सफ़ेद, काला और हल्दीसमान वर्णवाला सदैव देखता है वह छः महीना से अधिक नहीं जीता है ॥ ३ ॥ रविविम्बे जले दृष्टे संपूर्णे न मृतिः क्कचित्। खएडे दिक्षु क्रमान्मृत्युरेकद्वित्रिु मासतः॥। मध्यच्छिद्रे दशाहेन तज्जले धूमसङ्कुले ॥ ४ ॥ जब जलमें सूर्यका मण्डल पूरा देख पड़ता है तो कभी मौत नहीं होती है व दिशाओं खएड क्रमसे एक मास, दो मास व तीन मास में मौत होती है और यदि धूमसंकुलित स जल में सूर्य के मएडल में मध्यवर्ती छेद देखा जाता है तो दश दिवस में मौत होती है।। ४ ।। अरुन्धतीं ध्रुवं सोमं छायायां वा महापथम्। यो न पश्यति निस्तेजो वर्षान्ते ग्रियते ध्रुवम् ॥ ५ ॥ अरुन्धती, धुव, सोम वा छाया में निस्तेज महापथ को जो नहीं देखता है वह वर्पान्त मेंनिश्चयकर मर जाता है।। ५॥ सच्छिद्रो दृश्यते चन्द्रस्तदद्धा दर्पणो रविः। दृश्यते निस्पृहो वापि यस्यासौ ग्रियतेऽदतः ॥ ६ ॥ जो प्राणी दर्पण (शीशा) में चन्द्रमा और सूर्य को छेदसमेत देखता है या निस्पृह देखा जाता है तो वह वर्ष के भीतरही मर जाता है ॥ ६ ॥ संपूर्णों वहते सूर्यो यस्य सोमो न दृश्यते। वर्षान्ते जायते मृत्युः कालज्ञानं शिवोदितम्॥७॥ जिसकी सूर्यनाड़ी (इड़ा) पूर्ण बहती हो और चन्द्रनाड़ी (पिङला) नहीं देख पड़ती हो तो उसकी वर्पान्त में मौत होती है यह कालज्ञान श्रीशिवजीने कहा है।।७॥ यस्य वा स्नानमात्रेण हृदयं यदि शुष्यति। धूमो वा दर्शने यस्य सप्तमासान्तजीवनम्॥ ८ ॥ जिसके स्नानमात्रसे यदि हृदय सूखजाता है या जिसके दर्शन में धुआं देख पड़ता है उसकी सातपहीना के बीचमें ही माँत होती है॥ ८ । YD सामुद्विकशास्त्रस्य अग्रतः पृष्ठतो वापि यस्य स्यात्खिडतं पदम्। कर्दमेपांशुपुञ्जे वा सपमासान्तजीवनम्॥ ६। आगे या पीछे जिसका पैर कीचड़ या धलिसमूह में खएिडत भासता हो उसकी सात महीना के भीतरही मौत होजाती है। ६।। कृष्णरक्ानि वस्त्राषि रक्तमाल्यानुलेपनम्। स्वभे यो लभतेऽकस्मात्परमासान्ते न जीवति॥१०॥ जो भाणी एकाएकी रवममें काले व लालकपड़े लालमाला व लालचन्दनकाही अनुलेपन पाजाता है तो वह बाणी छः महीनाके भौतर नहीं जीता है ॥ १०॥ भक्ति: शीलं स्पृतिस्त्यागो बुद्धिर्वलमहेतुकम्। यस्यैतानि निवर्तन्ते पसमासान्तं न जीवति॥११॥ यक्ति (प्रेम) शील (स्वभाव) रमरण शक्ि, त्याग, बुद्धि और वल ये जिसके अकारण वदल जाते हैं तो वह छः मासके भीतर नहीं जीता है ॥। ११॥ राक्षसैर्भूतवेतालैः श्वानशूकरगर्दमैः । गृड्टैः काकैरुलकैश्र महिषर्वा क्रमेलकैः॥ स्वप्े वेष्टितमात्मानं पश्येदव्दान्न जीवति॥१२॥ जो स्वम्न में राक्षस, भृत, वेताल, कुत्ता, सूअर, गदहा, गीध, कौआ, उल्लू, भैंसा और ऊंट इन्होंसे घेरा हुआ अपनाको देखता है तो वह माणी साल के भीतर नहीं जीता है॥ १२ ॥ आसोरस्कां यदा पश्येदात्मच्छायामथापि वा। सुकष्णास्तारकाः पश्येत्पयमासान्ते न जीवति ॥१३॥। जो अपनी छाया को वक्षस्थल पर्थन्त देखता है अ्थवा आकाश में तारागणों को काले वर्सवाला देखता है तो वह प्राणी छः महीना के भीतर नहीं जीता है । १३।। निशि चापं दिवा चोल्काममेधे निशि दर्शनम्। यः पश्येन्म्रियते सोपि परामासाच्छइ्करोदितम् ॥। १४।। जो रात्रिमें इन्द्रधनु व दिन में उल्का व मेघरहित समयमें रात्रिका दर्शन करता है वह भी पाणी छः महीनामें मरजाता है ऐसा शंकरने कहा है॥ २४ ॥ शङ्कावर्ते अवोर्मध्ये गुल्फयोर्मर्मसन्धिष। स्यन्दनं यस्य नैवास्ति मासादूर्ध्वं न जीवति॥१५॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क: । ललाट, भौंह का विचला भाग, गएठा और मर्मसन्धियां इन्होंमें जिसके पलीना नहीं आाता है वह महीना से ऊपर नहीं जीता है॥ १५ ॥। चक्षुषी स्त्रवतो नित्यं न शृणोत्यपि निश्चितम्। दीपगन्धं न जानाति पक्षादूर्ध्व न जीवति ॥१६॥ जिसके दोनों नेत्र निरन्तर वहा करते हों व जो निक्चयकर सुनता न हो और दीप की गन्ध को भी न जानता हो तो वह गाणी पक्ष से अधिक नहीं जीता है ॥ १६॥ औधयोर्धूसरत्वं च शुष्कं वा तालुदेशकम्। स्कन्धौ च भग्नमायान्तौ षयमासान्ते न जीवति॥१७॥। जिसके दोनों ओठ धूलरवर्ण से हो गये हों व तालू सूखगया हो और दोनों कन्धे ूटेसे विदित होते हों तो वह नाखी छः महीना के बीच में नहीं जीता है ॥ १७ ।। भुञ्जतो यस्य वा नित्यं यूका वा मक्षिकादयः । त्यजतो वाथ वैरस्यं षरमासान्ते न जीवति॥ १८॥ जो जुआं या मक्खी आदिकों को सदैव खाता या विरसता को त्यागता है तो वह राणी छः महीना के भीतर नहीं जीता है ॥। १८ ॥ अहोरात्रदयं यस्य पिङ्गलायां सदागतिः। तस्य वर्षद्रयं ज्ञेयं जीवितं तत्त्ववेदिभिः ॥ १६ ॥ जिसका पवन दो दिन पिड़गला ( चन्द्रनाड़ी) में बहता रहे तो उसका जीवन दो वर्ष का तत्ववेदियों को जानना चाहिये ।। १६ । त्रिरात्रं वहते यस्य वायुरेकपुटे स्थितः। वत्सरं यावदायुःस्यात्मवदन्ति मनीविणः ॥ २० ॥! जिसका वायु एक नासापुट में टिका हुआ तीनरात बरावर वहता रहे तो उसका जीवन एक वर्ष का पणिडितों ने कहा है॥ २०॥ रात्रौ चन्द्रो दिवा सूर्यो वहेद्यस्य निरन्तरम्। तस्य मृत्युं विजानीयात्पमासाभ्यन्तरे सुधीः ॥१॥ जिसकी चन्द्रनाड़ी रात्रि में और दिन में सूर्यनाड़ी निरन्तर बहती रहे तो उसकी मौतें छः मडीना के भीतर पसिडितों को जानना चाहिये। २१॥ एकादिषोडशाहानि यदि भानुर्निरन्तरम्। सामुद्रिकशास्रस्य वहेद्यस्य च वै मृत्यु: शेषाहेन च मासिकैः ॥ २२॥ जिसकी सूर्यनाड़ी पक्ष, मास, वर्ष के पहले दिन से लेकर सोलह दिन पर्यन्त बरावर वहती रहे तो उस प्राणी की मृत्यु महीना के शेषदिन में कहना चाहिये ॥ २२॥ संपूर्णं वहते सर्यश्चन्द्रमा नैव दृश्यते। पक्षेण जायते मृत्युः कालज्ञानेन भाषितम् ॥२३॥ वर्ष-मास व पक्ष के पहले दिन में जिसके दक्षिण नासापुटकी वायु लगातार बहती रहे एवं वामनासापुटकी पत्रन नहीं चलती देखी जाते तो उस प्राणी की पक्ष भर में मृत्यु होजाती है ऐसा स्वरज्ञानी योगियों ने कहा है। २३॥ संपूण वहते चन्द्रः सूर्यों नैव च दृश्यते। मासेन दृश्यते मृत्युः कालज्ञानेन भाषितम्॥ २४॥ वर्ष-मास व पक्ष के पहले दिन में जिसकी चन्द्रनाड़ी यानी वाम नासापुटकी श्वास निरन्तर वहती रहे और दक्षिण नासापुटकी पवन नहीं वहती देखी जावे तो उस प्राखी की मास भर में मौत होजाती है ऐसा कालज्ञानी योगी ने कहा है॥ २४॥ मूत्रं पुरीषं वायुश्च समकालं प्रजायते। तदासौ चलितो ज्ञेयो दशाहे ग्रियते ध्रुवम् ॥२५॥ जिसके एक काल में ही मूत्र-मल और अधोवायु निकलते हैं तो उसको चलित जानना चाहिये और वह प्राणी दश दिवस के बीच में निश्चयकर मरजाता है॥२५॥ एवं चन्द्रप्रवाहश्च सुखलाभो जयस्तथा। सूर्यचन्द्रप्रणाशे तु सद्यो मृत्युर्न संशयः॥२६॥ इस प्रकार चन्द्रमवाह चलता रहे यानी इड़ानाड़ी से पवन समकाल में बहता रहे तो सुखका लाभ और जय होता है और जिसका दक्षिर नासापुट व वामनासापुट का पवन एकबारही वन्द होजावे तो शीघ्रही उस माी की मौत निस्सन्देह होजाती है॥ २६॥ अ्रुन्धतीं ध्रुवञ्चैव विष्णोस्त्रीणि पदानि च। आयुर्हीना न पश्यन्ति चतुर्थ मातृमएडलम् ॥२७॥ देखते हैं॥ २७॥ अरुन्धती, ध्रुव, विष्णुपदत्रय और चौथे मातृमएडल को आयुदीनलोग नहीं अरुन्धती भवेजिह्वा ध्रुवो नासाग्रमुच्यते। स्रवोर्मध्यो विष्णुपदं तारकं मातृमएडलम् ॥२८॥ उत्तरार्धे द्वितीयाङ्क: । जिंहा 'अरुन्धती' होती है, नासिका का अग्रभाग 'घुव' कहाता है, भौंहों का विचला भाग विष्णुपद और चक्षुस्ताराको मातृमएडल कहते हैं ॥ २८ । नव ध्रुवः सप्तमो वा पञ्चतारा त्रिनासिका। जिह्वामेकदिनं प्रोक्कं प्रियते मानवो धुवम्॥ २६॥ जो भौंहों का मध्यभाग नहीं देखता है तो वह प्राणी उसी दिन से नव या सात दि- बस में मरजाता है जो चक्षुताराको नहीं देखता है तो वह पांच दिन में, जो नासाका अम्र भाग नहीं देखता है वह तीन दिन में और जो जिह्वा को नहीं देखता है तो वह माणी एकही दिनमें निश्चयकर मर जाता है॥ २६॥ कोणमक्ष्णोङ्गलीभ्यान्तु किश्चित्पीडां निरीक्षयेत्। यदा न दृश्यते बिन्दुर्दशाहेन जनो मृतः॥३०॥ आंखों के कोण को अँगुलियों से कुछेक पीड़ित कर देखे यदि बिन्दु नहीं देखा जाता हो तो वह पाणी दश दिवस के भीतरही मर जाता है ॥ ३० ॥ याम्ये नासापुटे वायुर्यस्य वाति दिवानिशम्। अखरडं तस्य चैवायुः क्षयेदह्वन्नयेण हि ॥ ३१॥ जिसके दक्षिणनासापुट में वायु दिन रात बहता हो तो उसकी अखसिडत आयुर्दाय व्रीन दिन में क्षीण हो जाती है। ३१ ॥ द्यहोरात्रं त्र्यहोरात्रं वायुर्वहति सन्ततम्। सार्वेकमासं तस्येह जीवितं खलु चोच्यते ॥३२ ॥ दो दिन व दो रात किंवा तीन दिन व तीन रात पर्यन्त जिसका वायु निरन्तर बहता रहे तो उसका जीवन डेद महीना पर्यन्त रहता है॥ ३२ ॥ बहिर्नासापुटे युग्मे दशाहनि निरन्तरम्। वायुश्रेत्सहसंक्रान्तः स जीवति दिनद्वयम्॥३३ ॥ जिसका श्वासा दोनों नासापुट में दश दिन पर्यन्त लगातार बहता रहे तो वह माणी दो दिन तक जीता रहता है॥ ३३ ॥ नासावर्त्मद्यं हित्वा यस्य वायुर्मुखाद्वजेत्। स चेद्दिनद्यं स्थित्वा ततो यमपुरं त्रजेत् ॥ ३४॥ १ रन्युग्मम् ॥। सामुद्विकशास्त्रस्य .जिसका श्वास दोनों नासारन्त्रों को छोड़कर केवल मुखसेही चलता रहे तो वह माणी दो दिन टिककर यमालय को जाता है ॥ ३४॥ अकस्माद्ीक्षेते यस्तु पुरुषं कृष्णपिङ्गलम्। तस्मिन्नेव क्षणे रूपं स जीवेद्त्सरद्रयम् ।। ३५ ॥ जो प्राणी एकाएकी पुरुषको काले पीले वर्णवाला देखता है एवं उसी क्षण में रूपान्तर को निझारता है तो वह दो वर्ष पर्यन्त जीता है।। ३५ ।। यत्र वीर्यं मलं मूत्रं क्षुतं नूनमनन्तरम्। इत्येकदा भवेद्ापि अव्दमायुश्च नश्यति ॥ ३६॥ जिसके एकही समय में बीज, मल, मूत्र और छींक ये होते हैं उसकी एक वर्ष की आयु शेष रहजाती है यानी वह प्राणी एक साल भर के बाद नहीं जीता है।। ३६ ॥। इन्द्रनीलनिभं व्योम्नि नाकं घूम्रं समीक्षते। इतस्ततः प्रसृमरं षरामासं च स जीवति ॥ ३७॥ जो प्राणी आकाश में इन्द्रनीलमशि के समान वर्ण को देखता है या धुमैले इधर उधर घूमते हुए आ्काश को ही निहारता है तो वह छः मास पर्यन्त जीता है॥ ३७॥ अरुन्धतीं ध्रुवञ्चैव विष्णोस्त्रीणि पदानि च। आसन्नमृत्युर्न पश्येच्चतुर्थ मातृमएडलम् ॥३८॥ जिसकी मृत्यु निकटवर्ती होती है तो वह प्राणी अरुन्धती, ध्ुव, विष्णुपदत्रय और चौथे मातृमएडल को नहीं देखता है।। ३८ ॥। भाद्रेहिवारे सूर्यस्य पुष्टीकृत्य दिवाकरम। प्रकृत्याष्मु न तम्पश्येत्षरमासेन स मृत्युभाक्॥ ३६॥ भाद्रमास इतवार के दिवस दिवाकर को पुष्टकर प्रकृति से जल में उनको न देख पावे तो वह छः महीना के बीच में मरजाता है॥ ३६॥ वे त्ति नी रादिवस्त्वन्यत्कद्वम्लादिरसस्य च। अकस्मादन्यथाभावं षरामासेन स मृत्युभाकू ॥ ४० ।। जो प्राणी जलका स्वाद नहीं पाता हो एवं कड़वे व खट्टे आदि अन्यान्य वस्तुओं का स्वाद विपरीत जानता हो तो वह छः महीना से अधिक नहीं जीता है॥ ४० ॥ १ पश्यति २ रविवारे ३ जानाति ।। उत्तराद्दे द्वितीयाङ्क: । षरामांसमृत्युलोकस्य करठौष्ठरसना यदा। शुष्यन्ति सततं तस्य नरस्य तालपञ्चमाः॥४१।। जिसके कएठ, ओठ, जीभ और तालु ये सदैव सुखते रहते हों तो वह छः मास के मध्य में मृत्युके लोक को जाता है । ४१॥ रेतःकवचनेत्रान्ता मलिनानि भवन्ति वै। स एव यामेनगरं पष्ठे मासि ब्रजेन्नरः ॥ ४२ ॥ जिसके वीर्य, वक्षस्थल और नेत्रों के किनारे ये मैलेसे भासते हों तो वह पाणी छः महदीना में यमपुर को जाता है॥। ४२॥ दुतमारुह्य शंकटं त्रिवर्ग यस्य मस्तकम्। ध्रुवं प्रयाति तस्यायुः परामासात्परिसंक्षयम् ॥ ४३॥ गाड़े पर जल्द चढ़कर जिसका माथा घूमजावे तो उस माणी की आयुर्दाय छः हीना के भीतरही निश्चयकर क्षीणता को प्राप्त होती है ।। ४३॥ सुस्नातस्यापि यस्याश हृदयं परिशुष्यति। चरणौ च करौ वापि त्रिमासं तस्य जीवितम्।। ४४।। भलीभांति नहाये हुए जिस पाणी का हृदय जल्द सूखजाता हो और दोनों पैर व हाथ ही शीघ्रही सूखजाते हों तो उसका जीवन तीनमास पर्यन्त रहता है यानी वह प्राण न महीना में ही मरजाता है॥। ४४ ॥ पृथिवीद्धिभवेद्यस्य पादं खएडपदाकृतिः। पार्श्वे च कुरडलं वापि पञ्चमासान्स जीवति॥४५ ॥ जो माणी स्वप्नमें या अरपचानकही पृथिवी के दो खएड व खिडतपदाकृति और पाश्वों कुएडलाकति को निहारता है तो वह पांच महीना से अधिक नहीं जीता है।। ४५। देहः प्रकम्पते यस्य देहबन्धोऽपि निश्चलः। कृतान्तदूता बभ्नन्ति चतुर्थे मासि निश्चितम् ॥ ४६॥ जिसकी देह बहुतही कांपती हो और देहका बन्धनभी निश्चल (अकड़तासा) भा- सता हो तो उस प्राणी को चौथे महीना में यमदूत निश्यकर बांधते हैं ॥ ४६॥ निजस्य प्रतिबिम्बस्य निश्चलेषूदकेषुच। उत्तमाङं न पश्येद: षरामासेन विनश्यति॥४७॥ १.यमपुरं २ क्रीबेडन: शकटोडस्तरी स्यादित्यमरः ३ शीघम् ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जो माणी निश्चल जलों में अपनी छाया (परछाहीं) को शीश बिना देखता है तो वह छः महीना के भीतरही मरजाता है॥ ४७॥ मतिभ्रंश्येत्स्थले वापि धनुरैन्द्रं न पश्यति। चन्द्रस्य मएडलं यस्तु रात्रौ व्योम्नि दिवावसु ॥४८॥ युगपच चतुर्दिक्षु शक्रकोदएडमएडलम्। भूधरो भूधराग्रो वा गन्धर्वनगरालयम्॥ दिवा निशा च नृत्यञ्च एते पञ्चत्वहेतवः ॥ ४६ ॥। जिसका स्थल में मतिभ्रम हो जावे और जो इन्द्रधन्वा को न देखता हो व रात्रि के समय आकाश में चन्द्रभएडल को न निहारता हो और दिन में आकाश को नक्षत्रपूर्ण देखता हो और एकही समय चारों दिशाओं में इन्द्र का चापमएडल और पर्वत पर्वताग्र, गन्धर्बनगरालय और दिन रात में नाच का दर्शन करता हो तो वह माणी शीघ्रही मरजाता है॥। ४८। ४६॥ करावरुद्धश्रवणः संशृणोति न च ध्वनिम्। स्थूल: कृशः कृशस्स्थूलस्तदा मासान्न वर्तते॥५० ॥ जो माणी हाथों से कानों को दवाता हुआ शब्द को नहीं सुनता है और जिसको मोटा दुबला व दुबला मोटासा भासता हो तो वह प्राणी महीना से अधिक नहीं बचता है॥ ५० ॥ यः पश्येदात्मनश्छायां दक्षिणाशासमाश्रिताम्। दिनानि पञ्च जीवित्वा पञ्चत्वमुपयाति सः॥५१॥ जो प्राणी दक्षिण दिशामें टिकीहुई अपनी छाया को नहीं देखता है वह पांच दिवस जीवित रहकर मरजाता है॥ ५१ ॥ प्रेक्ष्यते भक्ष्यते यस्तु पिशाचासुरराक्षसैः। भूतैः प्रेतैः श्वभिर्गृध्रैगोंमायुमृगसूकरैः ॥५२॥ शरमैः शलभैः श्येनैर्वायसैरपि कोरकैः। स्वपे संजीवितं दृष्ट्ा वर्षान्ते यममीक्षते॥५३॥ स्वम् में जिस पाखी को पिशाच, असुर, राक्षस, भूत, प्रेत, कुत्ते, गींध, सियार, मृग, सूधर, शरभ (मृगभेद) पतङ्र2 बाज, कौआ और चकोर ये देखते या खाये लेते हैं तो उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क:। वह साल भरके बाद यमराज को देखता है अथवा स्वप् में पिशाचादिकों को जीवित देखता है तो वह वर्षान्त में मर जाता है॥ ५२। ५३॥ गन्धपुष्पांशुकै: श्येनैः स्वां तनुं भूषितां नरः। यः पश्येत्स्वभसमये त्वश्टै मासान्न जीवति॥५४.॥ जो प्राणी स्वम्र के समय चन्दन, फूल और सफ़ेद् वस्त्रों से भूपित अपने शरीर को खता है वह आठ महीना से अधिक नहीं जीता है॥ ५४ ॥ पांशुराशिञ्च वल्मीकं यूपं दडमथापि च। योऽधिरोहति वै स्वने सोष्टमासात्पणश्यति ॥ ५५॥ जो प्राणी स्वम्र में धूलिराशि, व्यमौर, यूपकाष्ठ और दएड पै चढ़ता है वह आठ महीना भीतर ही मरजाता है॥ ५५ ॥ रासभारूढमात्मानं तैलाभ्यकञ्च मिडतम्। यमालये नीयमानः स्वपे पश्येत्स पूर्वजान्॥५६॥ जो माणणी स्वम्र में गदहे पर चढ़े व तैल से भूपित अपना को निहारता है तथा पूर्वज गों को देखता है तो वह शीघ्रही यमालय को पहुँचाया जाता है॥ ५६॥ स्वमौलौ स्वतनौ वापि यः पश्येत्स्वगगोचरः। तृणानि शुष्ककाष्ठानि पष्ठे मासि न जीवति।।५७।। जो पाणी स्वम् में अपने शीश या अपने शरीर के ऊपर तृण या सूखे काठोंको देखता तो वह छह महीना से अधिक नहीं जीता है॥। ५७ ।। लोहदएडधरं कृष्णपूरुषं कृष्णवाससम्। स्वयं योडग्रे स्थितं पश्येत्रिमासान्नात्र संशयः ॥५८ ॥ जो पराणी स्वम्र में लोहदएडधारी व काले वस्त्र पहने हुए काले
सृष्टिक्रमो (Part 2)
पुरुप को आगे खड़ा आ आपही देखता है तो वह निस्सन्देह तीन महीना से अधिक नहीं जीता है।। ५८॥ कालीं कुमारीं यः स्वपे बध्नीयाडबाहुपाशकैः। षरामासेन च वीक्षेत नगरीं शमनाश्रयाम्॥ ५६ ॥ जो प्राणणी स्वप्रमें काली कुमारी को बाहुरूप पाशों से वांधलेता है तो वह छह महीना भीतरही यमपुरी को देखता है॥ ५६ ॥। छरश्मिबिम्वं सूर्यञ्च वहिं चैवांशुमालिनम। दष्दैकादशमासाच न चोर्ध्वं स तु जीवति॥ ६०॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जो माणी स्वम्में सूर्यको किरणरहितमएडलवाला व अग्निको अंशुमाली देखता है, तो वह प्राखी ग्यारहमाससे ऊपर नहीं जीता है॥ ६० ।। हन्यते काकपङ्कीभि: पांशुर्वर्षति वामतः। स्वच्छायामन्यथा दृष्ट्वा चतुःपञ्च स जीवति ।६१।। जो पाणी स्वम्न में काकगणों से ठुनकाया जाता है व जिसके वामभाग में धूरि वर्पती हो और जो अपनी छाया को अन्यथा देखता हो तो वह चार या पांच मास पर्यन्त जीता है ॥ ६१ ॥ घृतैस्तैलैस्तथादर्शैस्तोयेन तनुमात्मनः। यश्च पश्येदशिरस्कां मासाच्चोर्ध्व न जीवति॥ ६२॥। जो माणी स्वप् में घी, तैल, शीशा और जल के द्वारा अपनी काया को शीश बिना निहारता है तो वह एक मास से अधिक नहीं जीता है॥ ६२॥ यस्य नित्यं शवगन्धो गात्रवसनयोरपि। तस्यार्ध मासिकं ज्ञेयं योगी चापि न जीवति ॥६३॥ जिस भाणी के शरीर व वस्त्रों में सदा मुरदे कीसी गन्ध आती हो तो उसका जीवन अर्धमासपर्यन्त जानना चाहिये और यदि योगी हो तो भी नहीं जीता है॥ ६३॥ यस्य वै स्नानमात्रन्तु कपालं चाशु शुष्यति। पीतं चापि जलं पश्येद्दशाहं तस्य जीवनम् ॥ ६४॥ स्नानमात्र से जिस प्राणी का कपाल (मत्था) शीघ्र सूख जाता हो और पिये हुए पानी को देखता हो यानी पानी पीचुका हो प्यास न वुझाती हो बारम्बार पीता हो तो उसका जीना दश दिवप्पर्थन्त रहता है ॥ ६४ ॥ ऋृक्षवानरयानस्थो यो गच्छेद्दक्षिणं दिशम्। स्व्भे पश्यति तस्यापि मृत्युरेव न संशयः ॥ ६५॥ जो पाणी स्वम् में रीछ व वानर की सवारी पै चढ़ा दक्षिण दिशा को जाते हुए चपना को देखता है तो उस की निस्सन्देह मौत ही होजाती है॥ ६५ ॥ रक्कृष्णम्चरधरा गायन्ति वा हसन्ति च। दक्षिणाशां नयेद्दापि स्वपे सोपि न जीवति ॥ ६६।। स्वम्र में लाले व काले कपड़े पहने हुंई कामिनियां जिस प्राणी को गाती या हँसती हैं था कि दक्षिए दिशा को ले जाती हैं तो भी वह नहीं जीता है ॥ ६६ ॥ उत्तरार्द्धे द्वितीयाङ्क:। ाम्रमस्तकमूलाद्ा निमग्नं पङ्कसागरे। स्वने पश्येत्तदा यस्तु स सद्यो भ्रियते नरः ॥६७॥ जो पाणी स्वम्न में आर्प्राम्रव्ृक्ष की फुनगी या जड़ से कीचड़ के सागर में गिरे हुए अपना को देखता है वह शीघ्रही मर जाता है॥ ६७ । दृष्टा स्वे दशाहे वा मृत्युरेकादशे दिने ॥ ६८॥ जो भाणी स्वम्न में केश, अंगार, चिताभस्म, सांप और निर्जल नदी को निहारता है तो उसकी दश दिन या ग्यारह दिन में ही मौत हेजाती है ॥ ६८ ॥ सूर्योदये शिवा यस्य क्रोशन्याति च सम्मुखम्। विपरीतं पुरीषं वा सद्यो मृत्युं स गच्छति ॥ ६६॥ सूर्योदय के समय सियार जिसके सामने फेकरता हुआ चला जाता है एवं जिसके मल बहुत सा निकलता है तो वह प्राणी शीघ्र ही मृत्यु को पाता है।। ६६ ।। यस्य वै भुक्मात्रन्तु हृदयं वाध्यते क्षुधा। जायन्ते दन्तहर्षाश्च स गतायुर्न संशयः॥७०॥ भोजन करचुक ने पर भी जिसका हृदय भूख से व्याकुल बना रहना हो और दन्तहर्प होते हों तो वह निस्सन्देह मरजाता है॥७०॥ शक्रायुधं चार्धरात्रे चन्द्रस्य ग्रहणं दिवा। दृष्टा तेन च संक्षीणजीवितं नात्र संशयः॥७१॥ जो प्राणी अर्रात्र के समय इन्द्रधन्वा और दिन में चन्द्रग्रहण को देखता है तो उस प्राणणी का जीवन जल्द क्षीण होजाता है इसमें संशय नहीं है।। ७१ ॥ नासिका वक्रतामेति कर्णो नयनकौ तथा। नेत्रे वाष्पं सरेद्यस्य स गच्छेद्यमसादनम्॥७२॥ जिस माणणी की नाक टेढी होजावे तथा कान व नेत्र टेढे होजावें और जिसके नेत्रों में धुआ्ंसा निकलता होवे तो वह पाखी यमालय को जाता है.॥ ७२॥ १ शीतरूक्षप्रवाताम्लस्पर्शानामसहा हविजाः। यत्र स्युर्वातपित्ताभ्यां दन्तहर्षः स कीर्तितः॥ (इति भावप्रकाशः)।। सामुद्रिकशास्त्रस्य