Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

109. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — स्त्रीणां ललाटलक्षणं

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 1)

भालगेन त्रिशलेन निर्मितेन स्वयंभुवा। नितम्त्रिनीसहस्राणां स्वामित्वं योषिदाघ्ुयात्।।७४॥ जिसके ललाट में ब्रह्माजी के रचेहुए त्रिशूलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री हजा स्त्रियों के स्वामित्व को पाती है यानी उस स्त्री को हज़ारों स्ति्रियां हाथ जोड़े हुए से करती हुई आज्ञा को मानती हैं।। ७४॥ एकरेखा भवेद्यस्या ललाटे शोभना भवेत्। श्रीवत्सं स्वस्तिकं चैव ललाटे दृश्यते सदा॥७५ ॥ प्रलम्धिनि ललाटे तु देवरं हन्ति चाङ्गना। स्मिते कूपे गएडयोश्र सा भ्रवं व्यभिचारिणी॥७६॥ जिसके ललाट में एकमात्र रेखा प्रतीत हो अथवा श्रीवत्स या स्वस्तिक ( त्रिकोर कार) निशान प्रतीत हो तो सदैव शुभदायक होता है और जिसका लम्बा प्रतीत हो वह स्त्री देवर को निश्चय कर विनाशती है और जिस स्त्री के इसने पर गालों में गड़ा देखेजावें तो वह स्त्री निश्चयकर व्यभिचारिणी (छिनारि) होती है॥ ७५।७६॥ ललाटे दृश्यते यस्यास्त्रिशलं कृष्णपिङ्गलम्। सा पञ्च जनयेत्पुत्रान्धनधान्यं विवर्धयेत्॥७७॥ न पृथू बालेन्दुनिमे खवौ चाथ ललाटकम्। पूर्वार्धः । शुभमर्घेन्दुसंस्थानमतुङ्गं स्यादलोमकम्॥७८ ॥ जिसके ललाट में काला व पीला त्रिशूलाकार निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री पांच पुत्रों को उपजाती हुई धन, धान्य को बढ़ाती है और जिसकी भांहैं चौड़ी न होकर बालचन्द्रमा के समान प्रतीत हों व जिसका ललाट उच्चतारहित व लोमों से विहीन होकर अर्धचन्द्राकार प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होता है। ७७। ७=॥ भाल: शिराविरहितो निर्लोमार्घेन्दुसन्निमः । छनिम्नस्त्रयङ्गलो नार्याः सौभाग्यारोग्यकारणम्॥७६ ॥ व्यक्स्वस्तिकरेखं च ललाट राज्यसम्पदे। रोमशेन शिरालेन प्रांशना रोगिणी स्मृता ॥ ८०॥ जिसका ललाट नसों से रहित व लोमों से विहीन व अर्धचन्द्राकार व गहिरा न हो कर तीन अक्कल पतीत हो तो वह स्त्री सुहागिल होकर आरोग्य रहती है व जिसके ल- लाट में स्वस्तिक (त्रिकोणकार) रेखा विशेष प्रकट होती हो तो राज्यसंपदा के लिये कहाती है यानी वह स्त्री रानी होकर संपदा को भोगती है और जिसका ललाट रोमों से संयुत होकर नसों से घिरा हुआ ऊंचासा प्रतीत हो तो वह स्त्री रोगिणी (रोगवाली) कहीजाती है यानी उस स्त्री को हमेशा रोगही घेरे रहता है॥ ७६ । ८० ॥ अथ ललाटे सप्तस्वराणां विचारमाह- श्रुतिभा: स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः। पञ्चमो घैवतश्चाथ निषाद इति सप् ते ।। ८१॥ कानों में प्काशित होते हुए वे सात स्वर होते हैं जिनमें पहला पड्ज, दूसरा ऋषभ, तीसरा गान्धार, चौथा मध्यम, पांचवां पञ्चम, छठा घैवत और सातवां निषाद कहाता है वहां पहले 'षड्ज' का व्याख्यान करते हैं कि, "नासा कएठमुरस्तालु जिह्वा दन्तांश्र संस्पृशन्। षड्भ्यः संजायते यस्मात्तस्मात्पह्ज इति स्मृत:" नाक, कएठ, वक्षःस्थल, तालु, जिहा और दांत इनको स्पर्श करता हुआ जो छहों से पैदा होता है इसलिये उसको पड्ज कहते हैं और (ऋपति बलीवर्दस्वरसादृश्यं गच्छतीति ऋपभः) जो बैलके स्वर के समान चलता है उसे 'ऋषभ' कहते हैं और (गन्धारदेशे भवः गान्धारः) जो गन्धार देश में हुआ है उसे 'गान्धार' कहते हैं और (तद्वदेवोत्थितो वायुरुरः कएठसमाइतः । नाभिं पासो महानादो मध्यस्थस्तेन मध्यमः ) उसी प्रकार उठा वायु वक्षःस्थल व कएठ से ताहित होता हुआ नाभि में पहुँचकर महानादवाला होकर बीच में रहता है इसलिये मध्यम कहा जाता है और (वायु: समुद्रतो नाभेरुरोहृत्कएठमूर्धसु । विचरन्पञ्चमस्थान- सामुद्रिकशास्त्रस्य पाप्त्या पश्चम उच्यते) नाभि से उठा हुआ पवन वक्षःस्थल, हृदय, कएठ और मस्तक में विचरता हुआ रहता है इसलिये पांच स्थानों की प्राप्ति से 'पश्चम' कहाताहै और (धीमता- मय धैवतः) धीमानों का जो यह शब्द है उसे धैत्रत कहते हैं और (निषीदति मनो यस्पिन्निति निपादः ) जिसमें मन लगता है उसे 'निषाद' कहते हैं ये सातो स्वर लला की रेखाओं से जाने जाते हैं यह सांगीत शास्त्रवालों ने कहा है अब पूर्वोक्क स्वरों को कौन कौनसे प्राणी बोलते हैं उसको कहते हैं ॥। =१ ॥ पड्जं रौति मयूरस्तु गावो नर्दन्ति चर्षभम्। अ्रजाविकौ च गान्धारं क्रौञ्चो नदति मध्यमय् ॥८२॥ पुष्पसाधारणे काले कोकिलो रौति पञ्चमम्। अश्वस्तु घैवतं रौति निपादं रौति कुअरः ।। ८३।। मोर पड्ज स्वरको बोलता है व गौवें ऋपभ स्वरको वोलती हैं व बकरी तथा भेंड़ गान्धार स्वरको बोलती हैं और क्रौंच ( कराकुलनामक) पक्षी मध्यमं स्वरको वोलता पुप्पों के साधारण काल में कोकिला पश्चम स्वरको बोलती है व घोड़ा घैवतस्वरको वोलता है और हाथी निपाद स्वरको बोलता है॥ ८२। ८३ ॥ अथ पड्जाधिपान्ग्रहानाह- षड्जाधिपः सूर्यसनुर्तपभेशो गुरुः स्मृतः। गान्धाराधिपतिर्भोमो रविर्मध्यमनायकः ॥ =४॥ पञ्चमेशोभृगुःप्रोक्को धैवतेशो बुधः स्मृतः। निषादाधिपतिश्चोको निशानायकसंज्ञकः ॥८५॥ पड्जका स्वामी शनैश्चर, ऋपभका स्वामी बृहस्पति, गान्धारका स्वामी मङ्गल, मध्य का स्वामी सूर्य, पश्चम का स्वामी शुक्र, धैवतका स्वामी बुध और निषादका स्वामी चन्द्रमा कहाता है॥। ८४ । ८५ ॥ पूर्वार्धः। नखेषु विन्दव: श्वेताः प्रायः स्यु: स्वैरिणीस्तिियः। पुरुपा अपि जायन्ते दुःखिनः पुष्पितैर्नखैः ॥८६॥ जिनके नखों में सफ़ेद विन्दु (कौड़ीसी) प्रतीत हों तो वे स्त्रियां मायः स्वैरियी (व्यभिचारिणी) होती हैं और यदि पुरुषों के नखों में सफ़ेद बिन्दु प्रतीत हों तो वे भी दुःखी रहते हैं ॥। ८६ ॥ विषमैर्जन्रुभिर्निःस्वा अ्रस्थिनद्धैश्र मानवाः। उन्नतैर्भोगिनो निम्नैर्निःस्वाः पीनैर्धनान्विताः।।८७।। जिनकी हँसुलियां विपम होकर हाड़ों से बँधी हों तो वे पाणी दरिद्रतासंपत्र होते हैं व जिनकी हँसुलियां ऊंचीसी प्रतीत हो तो वे प्राणी भोगी होते हैं व जिनकी इँसुलियां निचलीसी पतीत हों तो वे पाणी निर्धनी होते हैं और जिनकी हँसुलियां मोटीसी प्रतीत हों तो वे भाणी धनवान् होते हैं ॥। ८७ ।। मुखे तिलं यस्य च तस्य लिङ्गे ह्यक्ष्णोरधस्तस्य च कुक्षिगं स्यात्। भुजे भवेत्तस्य च मूलजन्म पूर्वाद्द्वितीये जटुलं स्वदेहे ॥ ८८ ॥ जिसके मुख में तिलका निशान प्रतीत हो तो उस माणी के लिङ्ग देश में अवश्यही तिलका निशान होता है और यदि स्रत्रियों के मुख में तिलका निशान प्रतीत हो तो उन स्त्रियों की योनि (भग) में अवश्यही तिल होता है व जिसकी आंखों के नीचे तिलका निशान प्रतीत हो तो उस नर व नारीकी कोखि में अवश्यही तिल होता है व जिसकी भुजों में तिलका निशान प्रतीत हो तो उसका जन्म मूलनक्षत्र में कहाजाता है और . जिसको अपनी देह में लसुन का निशान प्रतीत हो तो उसका जन्म पूर्वापाढ़ में जानना चाहिये ॥। ८८ ॥ खुवोरन्ते ललाटे वा मशको राज्यसूचकः। पुत्रदो ज्ञानदो भूत्वा दुःखदौर्भाग्यभञ्जकः ॥८६॥ जिसके भौहों के बीच या ललाट में मशेका निशान प्रतीत हो तो राज्यसूचक होता हतथा पुत्रदायक व ज्ञानदायक होकर दुःख व दौर्भाग्य को बिनाशता है॥ ८६ ॥ वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नदः स्त्रियाः। पिधीयते ॥१ ॥ १ पर्ति त्यफत्वा तु या नारी गृहादन्यत्र गच्छति। अ्न्येषु रमते नित्यं स्वैरिणी सा सामुद्रिकशास्त्रस्य तिलकं लाञ्छनं वापि हृदि सौभाग्यकारणम्॥ ६० ॥ जिसके बायें कपोल (गाल) पै रक्तवर्णवाले मशे का निशान प्रतीत हो तो उ नारी के लिये शुभकारी होकर मिषान्दायक होता है और जिसके हृदय में तिलक निशान प्रतीत हो तो सौभाग्य का कारण होता है॥ ६० ॥ यस्या दक्षिणवक्षोजे भवेत्तिलकलाञ्छनम्। कन्याचतुष्टयं सूते सूते सा च सुतन्रयम् ॥ ६१।। तिलकं लाञ्छनं शोएं यस्या वामकुचे भवेत्। एकं पुत्रं प्रसूयादौ अन्ते च विधवा भवेत्॥ ६२।। जिसके दाहिने स्तनमें तिलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री चार कन्याओं को पैद कर तीन लड़के या दो लड़कों को उपजाती है और जिसके वायें स्तन (दूध) में तिल का निशान लालवर्ण होकर प्रतीत हो तो वह स्त्री पहले पुत्र को उपजा कर आखिरी विधवा (रांड़) होजाती है ॥। ६१ । ६२ ।। ग्ुह्यस्य दक्षिणे भागे तिलको यदि शोभते। तदा क्षितिपतेः पत्नी सूते च क्षितिपं सुतम् ॥ ६३ ॥ नासाग्रे मशकः शोणो महिष्या एव जायते। कृष्ण: स एव भर्तृध्न्या: पुंश्चल्या वा प्रकीर्तितः ॥६४ ॥ जिसके गुह्यदेश के दक्षिण भाग में यदि तिलका निशान सोहता हो तो वह स्त्री रारद होकर राजकुमार को उपजाती है और जिसकी नासिका के आगे लाल मशा का निशा प्रतीत हो तो वह स्त्री पटरानी होती है और जिसकी नासिका के आगे काले तिलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री स्वामी को मारती है या व्यभिचारिणी होजाती है॥ ६३। ६४। नाभेरधस्तात्तिलको मशको लाञ्छनं शुभम् । मशकस्तिलकश्चिहनं गुल्फदेशे दरिद्रकृत्॥ ६५ ॥ करे कर्णे कपाले वा करठे वामे भवेद्यदि। एपां त्रयाणामेकं तु प्राग्गर्भो एत्रदो भवेत्॥ ६६।। जिसकी नाभि (तोंदी) के नीचे तिल या मशे का निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होता है व जिसके गुल्फदेश ( गएठों ) में मशा व तिलका निशान प्रतीत है तो दरिद्र को करता है व जिसके हाथ, कान, गाल व कएठ के वामभाग में यति पूर्वार्धः । लहसुन, मशा या तिलका निशान प्रतीत हो और यदि इन तीनों निशानों में से एकभी निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री का पहला गर्भ पुत्रदायक होता है ॥ ६५ । ६६ ॥ नासाग्रे दृश्यते यस्यास्तिलको मशकोपि च। कृष्णदन्ता कृष्णजिह्वा दशाहेन पतिं हरेत्॥६७।। तिलको वामतो यस्याः कुक्षिदेशे च जायते। मापकस्य समो वापि राजपत्नी भवेद् ध्रुवम्॥६८ ॥। जिसकी नासिका के अग्रभाग में तिल या मशे का निशान प्रतीत हो व जिसके काले दांत व काली जीभ प्रतीत हो तो वह स्त्री व्याह से दश दिनकी अवधि में ही पति को मारडालती है और जिसके कुक्षिदेश (कोखि) के वामभाग में तिल या मशा के समान निशान प्रवीत हो तो वह स्त्री निश्चय कर राजपत्री (रानी) होती है ॥ ६७ । ह८ ।। पार्श्वें स्याद्दीर्घतिलको यस्याः स्निग्धश्च जायते। वामहस्ते पति प्राप्य पुत्रपौत्रं प्रवर्धयेत्। ६६॥। जिसके पार्श्वदेश में या वायें हाथ में चिकना होकर दीर्घाकार तिलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री पति को पाकर पुत्र पौत्रों को बढ़ाती है ॥ ६६ ॥। यस्या गएडेघरे वामे हस्ते कर्णे गले तथा। माषकं तिलकं विद्यात्सा कन्या सुखमेधते॥२०० ॥ जिसके गाल, ओठ, हाथ, कान तथा गला इन्होंके वामभाग में मशा या तिलका निशान प्रतीत हो तो वह कन्या सुखको पाती है॥ २०० ॥। आरकं वामके यस्याः कुक्षिदेशे च दृश्यते। माषकं तिलकं वापि सा कन्या सुखभागिनी॥ १ ॥ जिसके कुक्षिदेश में बायेंतरफ़ लालवर्णवाला मशा व तिलका निशान प्रतीत हो तो वह कन्या सुखों की सेवनेवाली होती है ॥ १ ॥ पाणौ प्रदक्षिणावर्तो धम्यों वामो न शोभनः। नाभौ श्रताबुरसि वा दक्षिणावर्त ईंडितः ॥ २ ॥ जिसके हाथ में रोमों या रेखाओरं का 'दहिनावर्त' प्रतीत हो तो उस स्त्री के लिये धम- वर्धक होता है व जिसके हाथ में 'वामावर्त' प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक नहीं होता है व जिसकी नाभि, कान व छाती में 'दहिनावर्त' प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभ- दायक कहाता है॥ २ ॥ सामुद्विकशास्त्रस्य सुखाय दक्षिणावर्तः पृष्ठवंशस्य दक्षिणे। अ्रन्तःपृष्ठे नाभिसमो बह्वायुः पुत्रवर्धनः॥३॥ राजपलन्याः प्रदृश्येत भगमौलौ प्रदक्षिपः। सचेच्छकटभङ्ग: स्याद बह्वपत्यः सुखप्रदः॥४॥ जिसके पृष्ठवंश (पीठके बांस) की दाहिनी ओर दहिनावर्त प्रतीत हो तो सुखने लिये होता है व जिसकी पीठ के बीच में तोंदी के समान दहिनावर्त प्रतीत हो तो बहु सी आयु को करता हुआ पुत्रों को बढ़ाता है और जिसकी भग ( योनि) के ऊपरी भा में दहिनावर्त निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री राजपत्री (रानी) होती है व जिसकी भगे ऊपरी भाग में शकटाकार निशान भङ्ग होकर प्रतीत हो तो बहुत संतानों को करत हुआ सुखदायक होता है ।। ३ । ४।। कटिगो गुह्यवेधेन पत्यपत्यनिपातनः। स्यातामुदरवेधेन पृष्ठावर्तो न शोभनौ॥। ५॥ एकेन हन्ति भर्तारं भवेदन्येन पुंश्रली। करठगो दक्षिणावर्तो दुःखनैधव्यसूचकः ॥ ६॥ जिसकी कमर में गुदा को बेधन कर दहिनावर्त निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री के पति व पुत्रों का मारनेवाला होता है व जिसकी पीठ में पेट को वेधन कर दो दहिनावत प्रतीत हों तो उस स्त्री को शुभदायक नहीं होते हैं वरन वह स्त्री एक निशान से पतिको मारती है और दूसरे निशान से व्यभिवारिणी होजाती है और जिसके कएठ में दहिना वर्त निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री के लिये दुःख व वैधव्य को जताता है ॥ ५।६॥ सीमन्तेऽथ ललाटे वा त्याज्या दूरात्प्रयत्नतः। सा पतिं हन्ति वर्षेण यस्या मध्ये कृकाटिके ॥ ७॥ प्रदक्षिणो वा वामो वा रोम्णामावर्तक: स्त्रियाः। एको वा मूर्धनि द्ौ वा वामे वामगतौ यदि। आदशाहं पतिन्नी सा त्याज्या दूरात्सुबुद्धिना॥८ ॥ जिसके शीश या ललाट में दहिनावर्त निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री को बड़े यत्र के साथ त्याग देना चाहिये व जिसकी घांटी के बीच दहिनावर्त निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री व्याह से एकही वर्ष में पति को मारडालती है व जिसके मस्तक में एकमात्र रोमों का दहिनावर्त या वामावर्त प्रतीत हो अथवा दो वामावर्त प्रतीत हों तो वह स्त्री व्याहसे दश दिवस मेंही पति को मारती है इसलिये बुद्धिमानों को वह स्त्री दूरसेही त्यागना चाहिये।।७=।। पूर्वार्धः। कव्यावर्ता च कुलटा नाभ्यावर्ता पतिव्रता। पृष्ठावर्ता च भर्तृघ्री कुलटाप्यथ जायते ॥ ६॥ जिसकी कमर में तर्प्रावर्तरखा प्रतीत हो तो वह स्त्री व्यभिचारिणी होती है व जिसकी नाभि (तोंदी) में आरवर्तरेखा प्रतीत हो तो वह स्त्री पतिव्रता होती है व जिसकी पीठ में आवर्तरेखा प्रतीत हो तो वह स्त्री पति को विनाशती है अथवा वेश्या होजाती है ॥ ६ ॥ एकमुद्रो भवेदाजा दशमुद्रो महाधनी। मुद्राहीनस्तु दुःखी स्याद द्वित्रिकाम्यां तथैव च । १० ॥ एकमुद्रो भवेद्राजा द्विमुद्रो धनवान्नरः। त्रिमुद्रो रोगसम्पन्नो बहुमुद्रो बहुप्जः॥११॥ जिसके करतल में एक मुद्रा प्रतीत हो तो वह प्रागी राजा होता है व जिसके करतल में दश मुद्रायें प्तीत हों तो वह माणणी महाधनी होता है व जिसका करतल मुद्रारहित प्रतीत हो तो वह पाणी दुःखी रहता है और जिसके करतल में दो व तीन मुद्रायें देखी जावे तो भी वह माणी दुःखी रहता है अथवा जिसके करतल में एक मुद्रा का निशान प्तीत हो तो वह राजा होता है व जिसके करतल में दो मुद्रायें प्रतीत हों तो वह प्ाखी धनवान् होता है व जिसके करतल में तीन मुद्रायें प्रतीत हों तो वह माणी रोगी रहता है और जिसके करतल में बहुतसी मुद्रायें प्रतीत हों तो वह माणी घने सन्तानोंवाला होता है॥ १० । ११ ।। अथ सामुद्रकीयराजयोगा व्याख्यायन्ते- जनने प्रबलो यस्य राजयोगो भवेद्यदि। करे वा चरणे Sवश्यं राजचिह्नं प्रजायते ॥१२॥ जिसके जन्मकाल में यदि राजयोग मवल हो तो उस प्राणी के करतल या पादतल में अवश्यही राजचिह्न होता है ॥ १२ ॥ अनामामूलगा रेखा सैव पुरायाभिधा मता। मध्यमाङ्कलिमारभ्य मणिबन्धान्तमागता ॥१३।। सोर्ध्वरेखा विशेषेण राज्यलाभकरी भवेत्। खरिडता दुष्टफलदा क्षीणा क्षीणफला मता ॥ १४॥ १०= सामुद्रिकशास्रस्य करतल में जो रेखा अनामिका की मूल में म्राप्त होती है उसको ही पुएयनामक रेख सामुद्रिकशास्त्रवेत्तागणों ने माना है और जो मध्यमाङ्गली से चलकर मणिवन्ध (करब्ज्ञा के पास तक आती है वह ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) विशेपता से राज्यलाभकारिए होती है व यदि ऊर्ध्वरेखा खसिडित प्रतीत हो तो दुष्टफलदायक होती है और यदि दिर भिन्न प्रतीत हो तो क्षीएफलों को प्दान करती है । १३ । १४।। अङ्ुष्टमध्ये पुरुपस्य यस्य विराजते चारु यवो यशस्वी। स्ववंशभूषासहितो विभूषा योषाजनैरर्थगणैश्र मर्त्यः ॥१५॥ वैसारिणो वातपवारणो वा चेद्ारणो दक्षिणपाषिमध्ये। सरोवरं चाङ्कश एव यस्य वीणा च राजा भुवि जायते सः॥१६। जिसके करतल में अँगूठा के बीच मनोहर यवाकार का निशान प्रतीत हो तो वह पाख विभूपणों, स्त्रीजनों व अर्गणों समेत होता हुआ यशस्वी होकर अपने वंश में भूपए होत है और जिसके दहिने करतल में मछली, छाता, हाथी, सरोवर, अंकुश व वीणा क निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी पृथ्वी में राजा होता है ॥ १५ । १६ ॥ मुकरशैलकपाणहलाङितं करतलं किल यस्य स वित्तपः। कसुममालिकया फलमीदृशं नृपतिरेव नृपालभवो यदा॥१७। करतलेपि च पादतले नृणां तुरगपङ्कजचापरथाङ्गवत्। ध्वजरथासनदोलिकया समं भवति लक्ष्म रमापरमालये॥१८। जिसका करतल दर्पण, पर्वत, तलवार व हल इन चिह्नों से चिह्नित हो तो वह पराए धनों का स्वामी होता है व जिसका करतल फूलों की माला से अङ्गित हो तो भी वा पाखणी धनशाली होता है और यदि राजवंश में पेदा हो तो वह पाणी राजाही होताह और जिनके करतल व पादतल में घोड़ा, कमल, धनुप, चक्र, ध्वजा, रथ, आरसन औरी हिंडोले या डोली के समान निशान प्रतीत हो तो उन माशियों के घर में महालक्ष्मीज निवास करती हैं ॥ १७ । १८ ॥ कुम्भस्तम्भो वा तुरङ्गो मृदङ्ग: पाणावङ्को वा दुमो यस्य पुंसः। चञ्चद्दएडो Sखएडलक्ष्म्या परीतः किंवा सोयं परिडतः शौरिडको वा ॥१६॥ विशालभालोम्बुजपत्रनेत्र: सुवृत्तमौलि: क्षितिमरडले यः । आजानुवाहुः पुरुषं तमाहुः क्षोणीभृतां सौख्यतरं महान्तम्॥२०॥ जिसके करतल में घड़ा, खंभा, घोड़ा, मृदङ्ग या दृक्ष अथवा दएडे का निशान प्रतीत पूर्वार्धः। हो तो वह माणी अखएडलक्ष्मी से परिपूर्ण होता हुआ पणिडत होता है अथवा शौरिडक (कलवार) होता है और जिसका भाल विशाल प्रतीत हो व लोचन कमलदल के समान हों व मस्तक गोलाकार प्रतीत हो व जिसकी भुजायें जानुओं पर्यन्त देखी जावें तो उस प्राणी को भूतल में पछिडितों ने राजाओं के बीच बड़ा राजा कहा है जोकि अधिक सौख्यवाला होता है ॥ १६। २० ॥ नाभिर्गभीरा सरला च नासा वक्षस्स्थलं रक्ृशिलातलाभम्। आरक्तवर्णों खख् यस्य पादौ मृदू भवेतां स वृपोच्म: स्यात् ॥ २१।। जिसकी नाभि (तोंदी) गहरी हो वा नासिका सीधी गतीत हो व जिसका वक्ष :- स्थल(छाती) लालशिलातल के समान प्रतीत हो और जिसके पैर लाल वर्णवाले होकर कोमल से प्रतीत हों तो वह प्राणी राजाओं में से उत्तम राजा (शाहंशाह) होता है।। २१ ।। राजते करगो यस्य तिलोतुलघनप्रदः। तथा पादतले पुंसां वाहनार्थेमुखप्रदः॥२२॥ राजवंशप्रजातानां समस्तफलमीदृशम्। · अन्येषामल्पतां याति तथा व्यक्नं सुलक्षणम्॥ २३ ।। इति।। 5126मे जिसके करतल में तिलका निशान प्रतीत हो तो उस पाणी के लिये अतुल धनदायक होता है ऐसेही जिनके पादतल में तिलका निशान प्रतीत हो तो उन भाणियों के लिये सवारी, धन व सुखों का दायक होता है यह सारा फल राजवंश में उपजे हुए महाराजो के लिये कहा है और अन्य साधारण जनों को थोड़ा सा फल प्राप्त होता है उसी प्रकार जिनके करतल या पादतल में पूर्वोक् निशान साफ़ जाहिर न होते हों तोभी वे पाणी थोड़ा। सा फल पाते हैं ॥ २२। २३। इति भावकुतूहले राजयोगादि:॥। अथ ग्रन्थान्तरेभ्यस्समुद्धृत्य राजयोगा व्याख्यायन्ते। पस्य प्रसूतिसमये प्रबला नृंपालयोगा भवन्ति यदि वा पुरुषस्य नूनम्। सद्राज्यलाञ्छनवराशि पदे तदीये यद्धा भवन्त्यपिच पाणितलेमलानि॥२४।। जिसके जन्मसमय यदि प्रबलराजयोग प्रतीत हों तो उस पराणी के पैर में निश्चयकर होते हैं ॥ २४।। श्रेष्ट राजचिह्न होते हैं अथवा उस प्राणी के करतल में भी अमल (साफ़) राजिह् सामुद्रिकशास्नस्य अनामिकामूलगता रेखा पुरायाह्वया च सा। प्राप्ता मध्याङ्गष्ठगोर्ध्वा मणिबन्धन्तु राज्यदा ॥ २५।। यवचिह्नं यदा यस्याङ्गष्ठमध्ये विराजते। विनीतः स्याद्यशस्वी च स्ववंशाभरणं च सः॥२६॥ जिसके अनामिका की मूलमें जो रेखा प्राप्त हो उसको पुएयरेखा कहते हैं श जो मध्यमाकी मूल में पाप्त होकर अँगूठा की मूल में पहुँचती हुई कब्ज़े के पास आाती है उसको ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) कहते हैं वह उस पाणणी के लिये राज्यदायक होती है और जिसके करतल में अँगूठा के बीच यदि यबका निशान प्रतीत हो तो व पराणणी विनयवाला होता हुआ यशस्व्री होकर अपने वंशमें भूपर होता है॥ २५। २६ वैसारिणो वारणो वातपवारणकं सृषिः। वीणा पुष्करिणी पाणौ चरणे स्युर्नराधिपाः॥।२७। करवालादर्शमालाहलपर्वतवाजि यत्। पाणौ चेन्नरनाथो वा मडलीको यथाकुलम् ॥२८॥ जिनके करतज़ या पादतल में मछली, हाथी, छाता, अ्ंकुश, दीणा और पुष्करिखी का निशान प्रतीत हो तो वे माणी राजा होते हैं और जिसके करतल में तलवार, शीशा माला, हल, पर्वत और घोड़े का निशान प्रतीत हो तो वह माणी अपने वंश के अनुसार राजा या मएडलीक राजा होता है॥ २७ । २८ ।। चेत्पाणौ चरणे हि यस्य च स्थो दोला सरोजध्वजा- श्चक्रंवा व्यजनासनानि च भवन्त्येतानि चिह्नानि च। नूनं तस्य गृहे भवन्ति कमलालीलाविलासो भृशं शालाः कुञ्जरजास्तुरङ्गमभवाः ख्याता महीमएडले ॥२६॥ जिसके करतल या पादतल में रथ, हिंडोला, कमल, ध्वजा, चक्र, व्यजन (पंखा और आ्र्प्रांसन ये निशान प्रतीत हों तो उस प्राणी के घरमें निश्चयकर लक्ष्मीलीला विलास अधिकता से होते हैं तथा गजशाला व अश्वशाला पृथ्वीमएडल में विरूयात हती हैं॥ २६॥ स्तम्भ: कुम्भः पादपो वा मृदङ्गो पाणौ दडो घोटको वा यदा चेत्। मर्त्योऽत्यर्थ राजते राजलक्ष्म्या ख्यातो नूनं परिडतानां वरेरायः॥ ३०। पूर्वार्धः । जिसके करतल में खंभा, घड़ा, दृक्ष, मृदङ, दएडा या घोड़े का निशान यदि प्रतीत हो तो वह प्राणी निश्चय कर विरयात होता हुआ पशिडतों में प्रधान पिडत होकर राजलक्ष्मी से अत्यन्त सोहता है ॥ ३० ॥ विशालभालश्चाकर्णनीलोत्पलदलेक्षणः। तमाहुवै बुधा भूमौ मएडलाखएडलं नृपम्। नासा तु सरला यस्य शिलातलनिमं च हत् ॥ ३२॥ जिसका भाल विशाल हो व जिसके लोचन नीलकमल के समान होकर कानोपर्यन्त विस्तृत हो व जिसका शीश गोलाकार प्रतीत हो व जिसकी बाहु जानुओं पर्यन्त चली गई हों उस माणी को पडतों ने पृथ्वीमएडल में अखएडमएडलाधीश कहा है और जिसकी नासिका (नाक) सीधी प्रतीत हो व जिसका हृदय शिलातलके समान हो तो वह प्राणी राजों में राजा होता है ॥ ३१ । ३२ ।। नाभिगम्भीरातिमृदू चरणौ रक्तवर्णकौ। राजराजः स तु भवेन्नात्र कार्या विचारण॥ ३३ ।। वंशाभिमान: समुदारचेताः प्रसन्नपूर्तिर्गरुसाधुनम्रः । अनीतिभीरुः शुभवाग्विलासः साम्राज्यलक्ष्मी लभते मनुष्यः ॥३४॥ जिसकी नाभि (तोंदी) गहिरी हो व जिसके चरण लाल वर्णवाले होकर कोमल से प्रतीत हों तो वह माणी राजों में राजा होता है इसमें विचार नहीं करना चाहिये और वह पाणी अपने वंश में अभिमान रखनेवाला, उदारचित्त, प्रसन्नमूर्ति, गुरु व साधुओं में नम्रभाव रखनेहारा तथा अप्रनीति से डरता हुआ शुभवाग्विलासी होकर साम्राज्यलक्ष्मी को पाता है। ३३ । ३४ ।। तिल: करतले यस्य विरलः स्याद्धनागमः। तिल: पादे नरेशः स्याद्वाहनाङसमन्वितः।।३५।। जिसके करतल में तिलका निशान विरल प्रतीत हो तो उस पाणी के लिये धन का आगम होता है और जिसके पादतल में तिलका निशान प्रतीत हो तो वह प्राखी वाहन समूहों से संयुत होकर राजा होता है॥ ३५ ।। एतचिह्नं राजवंशोद्धवानां स्यान्मर्त्यानां तद्विदः संवदन्ति। स्वल्पं कल्प्यं वान्यवंशोद्धवानां मर्त्यानां वा स्वीयवंशानुमानात्॥ ३६।। सामुद्रिकशास्रस्य सामुद्रिकशास्त्रनेत्ता पशिडतगणोंने राजवंश में उपजे हुए माणियों का यह चिह्न क है और अन्यवंश में उपने हुए पाणियों के लिये थोड़ासा फल कहना चाहिये जो साधारणवंश में उपजे हैं उन प्राशियों का फल अपने वंश के अनुसार कह चाहिये॥ ३६ ॥ चिह्नानि यानि मुनिभि: प्रतिपादितानिव्यक्कानि तानि परिपूर्ण फलप्रदानि दक्षेकरे च चरणे खलु मानवानां धन्यानि चेदितरयोश्चसुलोचनानाम्॥३७ जिनके दाहिने करतल व पादतल में जिन चिह्नों ( निशानों) को मुनियों ने कहा वे यदि साफ़ साफ़ प्रतीत हों तो उन माणियों के लिये निश्चय कर परिपूर्ण फलदाय होते हैं और यदि स्तिरियों के वायें करतल व पादतल में पूर्योक निशान प्रतीत हों तो ध दायक होते हैं या प्शंसनीय कहाते हैं ॥ ३७ ।। इति शम्भुहोरागकाशे राजयोगादि: ॥ सथ वाल्मीकीयरामायणवालकाएडटीकाया: समुदृत्य श्रीमन्महाराजाधिराजरामचन्द्रस्प सामुद्रिकीयराजलक्षखानि व्याख्यायन्त इत्याह- कक्ष: कक्षिश्च वक्षश्च घ्राणस्कन्धौ लजाटिका। सर्वभूतेषु निर्दिष्ट उन्नतास्ते सुखगदाः॥३८॥ [ इति वररुचि: ] कांख ('बगल) कोपि, बक्षस्स्थल, नासिका, स्कन्ध और ललाट ये सर्व म्राखिय में निर्दिष्ट हुए ऊंचे से प्रतीत हों तो सुखदायक होते हैं यह महर्षि वररुचि ने कहाहै॥३= शंखे ललाटश्रवणे ग्रीवा वक्षश्च हत्तथा। उदरं पाणिपादं च पृष्ठं दश महत्मुखम् ॥३६ ॥ दीर्घजू बाहुमुष्कश्च चिरंजीवी महीपतिः। लोके विख्यातकीर्तिः सन्महाराजो भवेन्नरः ॥ ४०॥ जिसके ललाट की हड्डियां, भाल, कान, ग्रीवा, वक्षस्स्थल, हृदय, पेट, हाथ,पे [ इति ब्राह्मे ] सौर पीठ ये दश ऊंचे से पतीत हों तो उस माी के लिये महासुखदायक होते हैं औ्रर भोगी धनी स्यादुदरे विशाले विशालकट्याश्च फटी विशाले। बहुपुत्रदारोपि विशाह पादो धनान्घितः स्याश् विशालचक्ः।१। पूर्वार्धः। दब अंश हता ई। जिसकी भौहैं, वाँहँ और अएडकोप दीर्घाकार प्रतीत हों तो वह प्राणी पृथ्वी का स्वामी व चिरंजीवी होकर लोक में विख्यात कीर्तिवाला होता हुआ महाराजा होता है यह ब्रह्म पुराण में कहा है।। ३६।४०।। एकच्छत्रां महीं झुङ्गे दीर्घमायुश् विन्दति ॥४१! [इति नारद: ] जिसका शीश समान होकर गोलाकार गतीत हो तथा जिसका शीश छाता के आकार प्रतीत हो तो वह पाणी एकछत्रवाली पृथ्वी को भोगता हुआ दीर्घायु को पाता है यह नारदजी ने कहा है ।। ४१ ।। ललाटे यस्य दृश्यन्ते चतुस्त्रिद्वयेकरेखिकाः। शतदयं शतं पष्टिस्तस्यायुर्विशतिस्तथा ॥।४२॥ [ इति कात्यायन: ] क रेल जिसके ललाट में यदि चार रेखायें प्रतीत हों तो वह माणी दो सौ वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में तीन रेखायें प्रतीत हों तो वह माणी सौवर्ष की आयु पाता है व जिसके ललाट में दो रेखायें प्रतीत हों तो वह माणी साठि वर्ष पर्यन्त जीता है और जिसके ललाट में यदि एकरेखा प्रतीत हो तो वह प्राणणी बीस वर्ष की आयु पाता है यह, कात्यायन ने कहा है। ४२ ॥ स्वरोगतिश्च नाभिश्र गम्भीरः स प्रशस्यते। षणवत्यङ्गुलोत्सेधो योनांशः स दिवौकसाम् ॥४३॥ [ इति ब्राह्मे ] जिसका स्वर, गमन और नामि (तोंदी) ये तीनों गंभीरभाव से प्रतीत हों तो वड प्राणी लोक में प्रशस्त होता है और जो छानवे अंगुल ऊंचासा प्रतीत हो तो वह प्राणी हेवताओं का अंश कहाता है यानी वह देवता का अवतार मानाजाता है यह ब्रह्मपुराण में कहा है।। ४३।। १ छत्राकारं नरेन्द्राणं शिरो दीर्घ च दुःखिनाम्। अधमानां च पापानां येषां स्थूलपुटं पुनः ॥ स्थूलशीपों नरो यस्तु धनवान्परिकीर्तितः। शुलाकारेण शीर्षेण मानवो मानवाधिपः॥ विषमेण तु शीर्षेण नरेन्द्रः पुषयहेतुकः । दीर्घशीएाशिरो यस्तु दुःखिनो नात्र संशयः ॥ गज- कुम्भशिरो यस्तु राजा स्यान्नात्र संशयः । शिरालमुन्नतं यस्य प्रशस्तं च शिरो यदि॥ स राजा पृथिवीं भुङ्के गजवाजिसमन्वितामिति । सामुद्रिकशास्त्रस्य स्रुवौ नासापुटे नेत्रे कर्णावोष्ठौ च चूचकौ। कूर्परौ मणिबन्धौ च जानुनी वृषणौ कटी।। ४४ ॥ करौ पादौ स्फिजौ यस्य समौ ज्ञेयः स भूपतिः। दानविख्यातकीर्तिः स्यादात्मज्ञानपरायणः॥ ४५ ॥ जिसकी भौहैं, नासायुट (नाकके पोर) नेत्र, कान, ओठ, कुचाग्र (चूचियों की पुनी) कोहनी, कब्ज़ा, घुटुना, अएडकोप, कमर, हाथ, पैरऔर कूले ये समाना प्रतीत हों तो वह प्राणी पृथ्वीपाल होता है और दान से विख्यातकीर्तिवाला हुआ आत्मज्ञान में परायण रहता है।। ४४। ४५। अथ पुनरपि वाल्मीकीयरामायणयुद्धकाएडेऽप्टचत्वारिंशत्सर्गे श्रीमतीमहाराज्ञीसीता नैजानि यानि सामुद्रकीयराजलक्ष्णानि त्रिजटां पत्युक्कवती तान्याह- इमानि खलु पद्मानि पादयोवैं कुलस्त्रियः। आधिराज्येभिषिच्यन्ते नरेन्द्रैःपतिभिस्सह॥४६ ॥ अहो मातः, त्रिजटे ! पैरों में ये जो पद्मों के निशान प्रतीत होते हैं उनसे कुलीन राज्यासन में नरेन्द्रपतियों के साथ निश्चयकर अभिपिक़ होती हैं यानी उन स्ति्रियों पतियों के साथ राज्यासन में अप्रभिषेक किया जाता है। ४६ ॥ वैधव्यं यान्ति यैर्नार्य्योऽलक्षणैर्भाग्यदुर्लभाः। नात्मनस्तानि पश्यामि पश्यन्ती हतलक्षणा॥ ४७॥ जिन अलक्षणों (कुलक्षणों) से दुर्लभ भाग्यवाली (अभागिनियां) स्त्रियां वि पनेको पाती हैं यानी रांड़ै होजाती हैं उनको मैं अपने शरीर में नहीं देखती हूं ऐसा क मूर्च्छित रामजी को तथा लक्षणोंको भी देखती हुई सीताजी इतलक्षणोंवाली होगई॥४ सत्यनामानि पद्मानि स्त्रीणामुकानि लक्षणैः। तान्यद्य निहते रामे वितथानि भवन्ति मे ॥४८ ॥ लक्षणज्ञाता पसिडतों ने या लक्षणप्रतिपादकशास्त्रों ने ख्रियों के करतल या पा में जो पद्मों के निशान सच्चेनामवाले यानी सफल कहे थे वे आज मेरे, रामजीके होजाने पर विफल होते हैं।। ४८॥ केशां: सूक्ष्माः समा नीला खवौ चासंहते मम। १ नामि: स्थूला सूक्ष्मकेशी नातिदीर्घा सुमव्यमा। पीनस्तनी सृगाक्षी च सा नारी मेधत इति ॥ १॥ पूर्वार्धः । वृत्ते चारोमके जङ्गे दन्ताश्चाविरला मम ॥४६॥ मेरे केश (वाल) पतले व समानाकार होकर काले से प्रतीत होते हैं व मेरी भौ हैं मिली हुई नहीं प्रतीत होती हैं व मेरी जांघैं गोलाकार होकर लोमों से रहित देखी जाती और मेरे दांत अ्र्परविरल होकर कुन्दकली से प्रतीत होते हैं ॥ ४६॥ शङ्के नेत्रे करौ पादौ गुल्फावूरू समौ चितौ। अनुवृत्तनखाः स्निग्धाः समाश्चाङ्कलयो मम ॥ ५० ॥ ललाट की हड्डियां, नेत्र, हाथ, पैर, गंठे और ऊरू ये समानाकार होकर बड़े से प्रतीत होते हैं व मेरे नख (नह) क्रमसे गोलाकार होकर चिकने से प्रतीत होते हैं और मेरी अँगुलियां समानाकार देखी जाती हैं ॥ ५० ॥ स्तनौ चाविरलौ पीनौ मामकौ मग्नचूचुकौ। मग्ना चोत्सेधनी नाभि: पार्श्वोरस्कं च मेचितम् ॥ ५१॥ मेरे स्तन मिलेहुए व मोटे होकर चुसी ढेपुनियोवाले देखे जाते हैं व मेरी नाभि (तोंदी) मग्नहुई ऊंची सी प्रतीत होती है और मेरी पसुरियाँ व छाता ऊंचा सा प्रतीत होता है।। ५१ ॥ मम वर्णो मणिनिभो मृदून्यक्करुहाणि च। प्रतिष्ठितां द्वादशाभिर्मामूचुः शुभलक्षणाम्॥ ५२॥। मेरा वर् मखि के समान प्रतीत होता है व मेरे रोवां कोमल से प्रतीत होते हैं तथा/ वायें पैर की पांचों अँगुलियां व दाहिने पैर की पांचों अँगुलियां व दोनों पैरों के तलवे इन वारह निशानों से प्रतिष्ठित मुझ्कको मुनियों ने शुभ लक्षणोंवाली कहा है॥ ५२॥ समग्रयवमच्छिद्ं पाणिपादं च वर्णवत्। मन्दस्मितेत्येव च मां कन्यालाक्षिषिका विदुः ॥ ५३॥। मेरे हाथ व पैरकी सारी अँगुलियां यतों के निशानों से अक्धित होकर छेद रहित म- सीत होती हैं व मेरे हाथ व पैर वर्णवाले देखे जाते हैं व भेरा हँसना मन्द प्रतीत होता है इसलिये कन्यालक्षणों के ज्ञाता पएडतलोग मुझे शुभलक्षणोंवाली जानते हैं-॥ ५३॥ आधिराज्येभिषेको मे ब्राह्मणैः पतिना सह। कृतान्तनिपुणैरुकं तत्सवं वितथीकृतम् ॥५४॥ १ चर्णाद् बहुतरो देही देहादू बहुतरःस्परः । स्वराद् बहुतर सत्वं सर्व सत्वे प्रतिष्टित मिति॥१॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य राज्यासन में पति के साथ मेरा अभिषेक होगा यह जो ज्योतिःशास्त्रवरेत्ता ब्राह्मर ने कहा था वह सबही आज श्रीरामजी के न होने पर झूंठासा किया गया ऐसा बच सुनकर त्रिजटानामक राक्षसी ने कहा कि अहो सीते ! ये राम लक्ष्मण दोनों भाई अ्र मृतक नहीं हुए, क्योंकि इनके मुखमएडलों की मभा विनष्ट नहीं हुई है इसलिये जीते इनको मूर्च्छित जानना चाहिये यह सुनकर सीताजी ने कहा कि अहो मातः ! आपका चन ऐसाही हो ऐसा कह पुष्पकारूढ़ रामदयिता सीताजी अशोकवाटिका में आब् श्रीरामचन्द्रजी को चिन्तन करने लगीं।। ५४।। इति स्त्ीरणां राजयोगादि:। अथ सामुद्विकीयायुर्याययोगा व्याख्यायन्ते- गूढसन्धिशिरास्नायुः संहताङ्ग: स्थिरेन्द्रियः। उत्तरोत्तरमुक्षेत्रो यः स दीर्घायुरुच्यते॥ ५५ ॥ गर्भात्प्रभृत्यरोगो यः शनैः समुपचीयते। शरीरज्ञानविज्ञानैःस दीर्घायुः समासतः॥५६॥ जिसके शरीर में सन्धि, शिरा और स्नायु ये छिपे हुए प्रतीत हों व जिसका सा अङ्क दृढ़ (मज़वूत) व इन्द्रियां स्थिर हों व शरीर उत्तरोत्तर सुदृश्य हो तो वह प्रार दीर्घायु कहा जाता है और जो गर्भ से लगाकर आरोग्य रहता हुआ धारे धीरे बढ़ता व जिसका शरीर ज्ञान व विज्ञान से पूर्ण बना रहता है वह प्राणणी दीर्घायु कहाता है य संक्षेप से कहागया॥ ५५ / ५६॥ मध्यमस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निवोध मे। अधस्तादक्षयो यस्य लेखाः स्युर्व्यक्कमायताः॥५७।। द्वे वा तिस्त्रोधिका वापि पादौ कर्णों च मांसलौ। नासाग्रमूर्ध्व च भवेदूर्ध्वलेखाश्र पृष्ठतः। यस्य स्युस्तस्य परममायुर्भवति सप्ततिः॥५८ ॥ श्रह्दो मिये ! इसके अनन्तर मध्यम आपयुका ज्ञान मुझ्क से सुनिये कि जिसकी आ्र्प्रांस के नीचे व्यक्त व विस्तृत होकर दो या तीन या अ्र्परनेक रखायें प्रतीत हों व पैर तथा का मांसल हों व नासिका का अग्रभाग ऊंचासा प्रतीत हो व जिसकी पीठ में ऊ्ध्वरेखा तीत हो तो उस प्राणी की परम आयु सत्तरि ७० वर्षकी होती है॥ ५७। ५८॥ पूर्वार्धः । जघन्यस्यायुषो ज्ञानमत ऊर्ध्वं निबोध मे। इस्वानि यस्य पर्वाणि सुमहच्चापि मेहनम् ॥ ५६॥ तथोरस्यवलीढानि न च स्यात्पृष्ठमायतम्। ऊर्ध्वञ्च श्रवणौ स्थानान्नासा चोचा शरीरिणः ॥ ६० ।। हसतो जल्पतो वापि दन्तमांसं प्रदृश्यते। प्रेक्षते यच विभ्रान्तं स जीवेत्पञ्चविंशतिम्॥६१॥ अहो मिये ! अब अल्पायु का ज्ञान मुझसे सुनिये कि जिसके करतल में अँगुलियों की पतैं छोटीसी हों व लिङ बड़ा भारी प्रतीत हो व वक्षस्स्थल लोम व मांस से विहीन हो व पीठ चौड़ी न हो व कान यथास्थान स्थित व कुछेक ऊपर को चढ़े से प्रतीत हों व जिसकी नासिका (नाक) ऊंचीसी प्रतीत हो व जिसके हँसते व बात करते हुए दांतों का मांस देखा जाता हो और जो उन्मत्त की नांई दीखता है वह प्राी पच्चीस २५ वर्ष पर्यन्त जीता है ॥ ५६। ६१॥ पादौ पाणी च पार्श्वे च पृष्ठं चैव तु चूचुकम्। रदनावदनं चैव स्कन्धौ चैव ललाटिका ॥ ६२ ॥ यस्यैतानि च दृश्यन्ते महान्ति च शरीरिण: । अङ्गलीनां च सर्वासां पर्वारायुच्ानि यस्य वै॥ ६३ ॥ विशालौ च भुजौ यस्य नेत्रे स्यातां सुदीर्घके। अ्ुकुट्योस्स्तनयोर्मध्यं वक्षश्रैव तु विस्तृतम् ॥ ६४॥ ज्डे च मेहनं चैव ग्रीवादेशश्र हस्वकः। नांभि: स्वरश्र बुद्धिश्र गम्भीरा यस्य दृश्यते॥ ६५ ॥ स्तनौ चानुन्नतौ स्यातां कर्णो चैव तु रोमशौ। आयतौ विस्तृतौ यस्य मस्तकं चन्दनार्चितम् ॥ ६६ ॥। विशुष्कं हृदयं यस्य शरीरं शुष्यमाणकम्। सन्मुखमिति ॥ १॥ १ न थ्रीस्त्यजति रक्काक्षं नार्थ: कनकपिङ्गलम्। दीर्घवाहुं न चैश्वर्य न सौख्यं प्रह्- २ स्वरो बुद्धिश्च नामिश्व त्रिगम्भीरमुदाहृतम् । त्रयं यस्य तु विस्तीरर तस्य श्रीः स- वंदा सुखी ॥ उर: शिरो ललाटं च त्रिविस्तीर्ण प्रधृश्यत इति ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य दीर्घायुषं विजानीयातं नरं धर्मधारिणम्॥ ६७॥ एतल्वक्षणहीनो यो ह्यल्पोयुः स प्रका्तितः। मिश्रलक्षणयुक्ो यो मध्यमायुरुदाहतः ॥ ६८ ॥। जिसके पैर, हाथ, वगल, स्तनाग्र, दांत, मुख, कन्धे और भाल ये अतीव विशा होकर प्रतीत हों व सारी अँगुलियां व उनकी पौरैं बड़ीसी प्रतीत हों व जिसकी भु विशाल प्रतीत हों व लोचन लम्बे से प्रतीत हों व भौहैं व स्तनों का मध्यभाग त वक्षस्स्थल चौड़ासा प्रतीत हो व जांघ, लिङ् और ग्रीवा ये छोटे से प्तीत हों नाभि (तोर्द स्वर और बुद्धि ये गंभीरभावसे प्रतीत हों व दोनों स्तन ऊंचे न हों व कान लोमोंव होकर लम्बे व चौड़े से प्रतीत हों व जिसका मस्तक चन्दन से चर्चित हो व जिसका ह सूखगया हो व सारा शरीर सृखा हुआ प्रतीत हो तो उस धर्मधारी भाणी को दीघ जानना चाहिये और जो माणी इन पूर्वोक् लक्षणों से हीन देखा जावे तो वह अलप कहाता है और जो प्राणी मिले लक्षणोंवाला प्रतीत हो तो उसको आचार्यों ने मध्य कहा है॥ ६२। ६८ ।। पुनरायुर्विबोधार्थमङ्गपत्यङ्गसुच्यते। हस्तपादादिकानीह ह्यङ्गानि कथितानि वै ॥ ६६ ॥ तदन्यानि च सर्वाषि प्रत्यङ्गानि विदुर्बुधाः। तेषां प्रमाएं वक्ष्यामि शृणुष्वावहिता प्रिये॥ ७० ॥ अब फिर आयुर्दाय के परिज्ञानार्थ अङ्ग व प्रत्यङ्ग कहेजाते हैं तहां हस्त, पाद व मस आदि अङ्ग कहे व उनसे अन्य समस्त अवयवों को पणिडतों ने प्रत्यङ्ग जतलाया है उन पमाण मैं कहूंगा अहो मिये ! सावधान होकर सुनिये ॥ ६६।७० ॥ पादाङ्गुष्ठप्रदेशिन्योरन्तरं द्वयङ्गुलं मतम्। प्रदेशिन्याः कनिश्ठन्तं ज्ञेयं मानं मनीषिभिः॥७१॥ यथोत्तरं प्रमाएं तु हीनं पञ्चमभागकैः। पादप्रपादतलयोरायतं चतुरङ्ुलम्॥ ७२ ॥ पैरों का अँगूठा व तर्जनी इन दोनों के अन्तर (मध्यस्थल) का प्रमाण दो श्ं १ अतिमेधातिक तिश्च विक्रमश्च सुखानि च। प्रथमे वयास दश्यन्ते ह्ल्पायु भवचरः ॥ १ ॥ पूर्वार्धः। माना है, मध्यमा का प्रमाण तर्जनी के पांच भाग का चार भाग कहा है व अनामिकाकी दीर्घता का मान मध्यमा के पांच भाग का चार भाग है व कनिष्ठा की दीर्घता का पमाण अनामिका के पांच भाग का चार भाग है व पैरों तथा पदागरं के तलों की दीर्घता का मान चार अंगुल कहा है।। ७१।७२।। पञ्चाङ्कलप्रमाणेन विस्तृतं प्रोच्यते बुधैः। पञ्चाङ्गलप्रमाणेन पाष्पर्योरायतमुच्यते॥७३॥ चतुभिरङ्गलैः प्रोक्कं विस्तृतं बुद्धिमत्तरैः। पादयोराततं ज्ञेयं चाङ्गुलैर्मनुसंभितैः॥७४॥ पांच अंगुल के प्रमाण से पणिडतलोग विस्तार कहते हैं व एंड़ियों की दीर्घता पांच अंगुल के प्रमाण से कही जाती है व उनका विस्तार बुद्धिमानों ने चार अंगुल कहा है और पैरों की दीर्घता चौदह अंगुल जानना चाहिये।। ७३। ७४॥। पादगुल्फं समारभ्य यावजानु प्रदृश्यते। तन्मध्यविस्तृतं ज्ञेयमङ्गलैर्मनुसंमितैः ॥७५॥ अष्टादशाङ्गलैर्जड्ा चायता मुनिसंमता। पैरों के गएठों से लेकर जहां तक जानु (बुटुन) देखे जाते हैं उनके बीच का विस्तार चौदह अंगुल जानना चाहिये और मुनियों से मानी मोटी जङ्गायें चौड़ी अठारह अंगुल दीर्घ कहदाती हैं व जानुओं के ऊपर दीर्घता का प्माण वत्तीस अंगुल कहा है॥ ७५।७६॥ एवं प्रमाएं पञ्चाशद्ङ्गलं प्रोच्यते बुधैः। ऊरुमानप्रमाणन तुल्या जड्का च कीर्तिता ॥७७॥ वृषणौ चिबुके दन्ता तथैवं कर्णमूलकम्। नासापुटौ च नयने तेषां मध्यं च ड्यङ्गुलम् ॥७८ ॥ इसप्रकार सामुद्रिकशास्त्रवेत्ता पण्डितलोग पचास अंगुल प्रमाण कहते हैं और जं- घायें ऊरुवों के मान के प्रमाण से समान कही जाती हैं व अएडकोप, चिच्रुक (ठुड्ढी), दांत, कर्णमूल, नासापुद्र और नेत्र इन्हों का मध्यस्थल दो अ्गल कहाता है।। ७७।७=॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य मेहनं वदनं चैच नासाकर्णो ललाटिका। एषां चैव शिरोधेश्च उच्चता चतुरङ्गुला ॥ ७६ ॥ चक्षुषोरायतं ज्ञेयमङ्गलैर्वेदसंमितैः । लिङ्गतो यावती नाभिर्नाभितो हृदयं तथा ॥ ८० ॥ लिङ्र, मुख, नासिका, कान, ललाट और ग्रीवा इन्हों की उच्चता चार अंगुल कहा है और नेत्रों की दीर्घता चार अंगुल कही जाती है व लिन् से जहां तक तोंदी व तो से जहांतक हृदय रहता है॥ ७६ । ८० ॥ हृदयाद्यावती ग्रीवा तन्मानं द्वादशाङ्गलम्। मध्यं स्तनद्यस्यैव दीर्घता वदनस्य च ॥ १॥ द्वादशाङ्गलमानेन कथिता च सदा बुधैः। प्रकोश्ठन्मणिबन्धान्तं स्थौल्यं स्याद्वादशाङ्गलम् ॥ ८२॥ हृदय से जहां तक ग्रीवा (घींच) रहती है उन सवों का मान प्रत्येक वारह अ्ंगुल क है व दोनों स्तनों का अन्तर (मध्यभाग) तथा मुख की दीर्घता पएिडतों ने वारह अंगु कही है और प्रकोष्ठ से मणिबन्ध (कब्ज़े ) पर्यन्त स्थूलता (मोटापन) वारह अंगु कहाती है॥ =१ । ८२ ।। नाभेर्निम्नतलस्यापि विस्तृतं पोडशाङ्गलम्। कूर्परात्स्कन्धदेशान्तं चान्तरं पोडशाङ्गुलम् ॥=३ ॥ हस्तयोर्दीर्घता ज्ञेया चतुर्विशाङ्गला बुधैः। बाह्वोश्रैव प्रमाएं तु दात्रिंशदङ्गुलं स्मृतम् ॥। ८४।। नाभि के निचले भाग (वस्तिदेश) का विस्तार सोलह अंगुल कहाता है व कोहन से कन्धों तक वीच का भाग सोलह अंगुल होता है व हाथों की दीर्घता चौबीस अंगुल पणिडतों को जानना चाहिये और बाहुवों (भुजाओं) का प्रमाण बत्तीस अंगुल कहा है॥। ८३ । ८४ ॥ ऊर्वोश्रैव तथा ज्ञेयं प्रमाएं पूर्वसंमतम्। मणिबन्धात्कूर्परान्तं प्रमाएं षोडशाङ्गुलम् ॥ ८५ ॥ दैर्ध्यं पाशितलस्यैव षडङ्गुलमितं स्मृतम्। पूर्वार्धः । एवन्तु विस्तृतं प्रोक्कमङ्गलैर्वेदसंमितैः ॥८६॥ ऊरुवों का प्रमाण जो कि पहले संमत होचुका है यानी बत्तीस अंगुल जानना चा- हिये व करतल की दीर्घता छः अंगुल कही है ऐसेही करतल का विस्तार चार अंगुल कहा है॥। ८५ । ८६ ॥ पङ्गश्ठमूलादारभ्य यावत्स्यानु प्रदेशिनी। तदन्तरं बुधैर्ज्ेयमङ्कलद्यमानकम्॥ ८७॥ कर्णतो लोचनोपान्तं पञ्चाङ्गुलमितं स्मृतम्। तर्जन्यनामिकाङ्गुल्योरन्तरं सार्धद्यङ्ुलम् ॥न॥ अँगूठा की मूल से लेकर जहां तक तर्जनी रहती है उनका मध्यस्थल पषिडितों को दा अंगुल जानना चाहिये व कानों से आंखों की कोरों तक का मान पांच अंगुल कहा है तर्जनी व अ्पनामिका का अ्रन्तर (मध्यभाग) ढाई अंगुल कड़ाता है ॥ ८७। ८द ॥ कनिष्ठाअष्ठपर्यन्तमन्तरं सार्धत्र्यङ्गलम्। ग्रीवाया वदनस्यापि विस्तृतं द्वादशाङ्गलम् ॥८६॥ नासाछिद्रप्रमाणन्तु त्रिभागाङ्कुलसंमितम्। चक्षुषोस्तारकामानं वेदभागत्रिभागकम् ॥ ६० ॥ कनिष्ठा से अ्ँगूठा पर्यन्त के अन्तर (मध्यस्थल ) का प्रमाण साढ़े तीन अङ्गल कहाता है, ग्रीबा और वदन (मुहँ) का विस्तार वारह अंगुल कहाजाता है व नासिका के छेदों का पमाख एक अंगुल के चार भाग का तीन भाग कहाता है और नेत्रों के वारा का प्माण नेत्र पमाण के चार भाग का तीन भाग होता है॥। ८६। ६ै० । तारयोर्नवमो भागः पुत्तल्योर्मानमुच्यते। मस्तकन्तु समारभ्य केशान्तं यावदेवहि॥ ६१ ॥ एकादशाङ्डगुलैरुक्रमन्तरं बुद्धिमत्तरैः । मस्तकात्पृष्ठतो भागे केशान्तं यावदेवहि ॥ ६२ ॥ ताराओं का नववां भाग पुतलियों का प्रमाण कहाजाता है मस्तक से सन्मुख केशान्तों कमध्यस्थल बुद्धिमानों ने ग्यारह अंगुल कहा है मस्तक से पीछे की तरफ़ जहांतक वाल हते हैं ॥। ६१। ६२ ।। तन्मानन्तु बुधैरुक्तमङ्गलैर्दशभि: भिये। कर्णतो घाटिकामध्यं सप्ताङ्गलकविस्तृतम् ॥ ६३ ॥ कान्ताकटिप्रमाणेन पूरुषाणापुरः स्मृतम्। अष्टादशाङ्गलैः प्रोक्कं रमणीनामुरो बुधैः ॥ ६४ ॥ उसका प्रमाण पसिडतगणों ने दश अंगुल कहा है अहो मिये ! कानों से घोंटा प मध्यस्थल के विस्तार का प्रमाण सात अंगुल कहाजाता है और स्त्रियों के कमर का माण चौबीस अंगुल माना है उसी प्रमाण से पुरुपों का वक्षःस्थल कहाजाता है पएिडतों ने स्त्रियों के वक्षःस्थल का प्रमाण अठारह अ्ंगुल कहा है ॥। ६३ । ६४। नराणां केटिदेशस्य मानं चाष्टादशाङ्कलम्। एवं सर्वशरीस्य मानं विंशाधिकं शतम् ॥ ६५ ॥ पञ्चविशे ततो वर्षे पुमान्नारी तु षोडशे। समत्वागतवीर्यो तौ जानीयात्कशलः सुघीः ॥६६ ॥ पुरुषों की कमर का प्रमाणण अठारह अंगुल कहा है इस प्रकार समस्त शरीर का प एकसौ वीस अ्ंगुल मुनियों ने बतलाया है इस प्रमाण का तिचार तभी करना चा जब कि पुरुप पच्चीस वर्ष का हो और स्त्री सोलह वर्ष की हो व समानता से वीर्य वल आचुका हो उस समय सामुद्रिकशास्त्र में प्रवीण पलिडत पूर्वोक् प्रमाण का वि करै॥ ६५ । ६६॥ देहः स्वैरङ्गुलैरेष यथावदनुकीर्तितः। युक्कप्रमाऐनानेन पुमान्वा यदि वाङ्गना ॥ ६७।। दीर्घमायुरवाप्ोति वित्तं च महद्च्छति। मध्यमैर्मध्यमे वायुर्वित्तहीनैस्तथावरम् ॥। ६८ ॥। अपने अंगुलों से यह देह यथावत कीर्तन किया, गया है स्त्री या पुरुष जो पू प्रमाणों से संयुक्क हो तो दीर्घायुको भोगता हुआ बड़े धनको पाता है और जो स्त्री अ पुरुप मध्यम प्रमाणों से प्रतीत हो तो वह मध्यमायु को भोगता हुआ मध्यम धनको १ काटेविशाला बहुपुत्रभोगी विशालहस्तो नरपुङ्गवः स्यात्। उरो िशालं धनथ भागी शिरोविशालं नरपूजित: स्यादिति ॥ १॥ पूर्वार्ः। है और जो पूर्तोक़ प्माणों से हीनलक्षणवाला प्रतीत हो तो वह अल्पायु को भोगता हुआ थोड़ेसे धनको पाता है ।। ६७ । है८ ॥ इत्यायुर्द्दाययोगा: ॥ अथ पाएयादीनां परीक्षाविचारमाह- आदौ पाणितले रेखा जानौ पादे तथैव च। जङ्गयोर्लक्षणं चैव उच्चस्य चिबुकस्य च ॥६६ ॥ गएडयोः पार्श्वयोश्चैव ललाटस्य च लक्षणम्। सर्वाङ्गानननासानां दन्तानां लक्षणं तथा ॥ १०० ॥ अब् हाथ आदि के देखने का विचार कहते हैं कि अझे मिये ! सामुद्रिकशास्त्रवेत्ता पण्डित को उचित है कि पहले पाशितल की रेखा को देखे तदनन्तर बुटुनू, पैर और जङ्गाओं के लक्षण का विचार करै फिर टुड्ढी, गाल, वगल और भाल का लक्षण देखे वैसेही समस्त अन्, मुख और दांनों के लक्षणों की परीक्षा करै॥ ६६। १०० ॥ मयेदमुकं सति ! पूरुषाणां तथाङ्गनानां च सुलोचनानाम्। पठन्तु सभ्याः सुधियो द्विजेन्द्रा भवन्तु पूज्या नृपसंमताश्र।। १।। अ्रहो मिये ! पुरुपों तथा सुनयनी नारियों का यह लक्षण मैंने कहा इसको जो ब्राह्मणा लोग पढ़ेंगे वे अच्छी बुद्धिवाले व सभा में चतुर तथा सर्वजनों से पूजनीय होकर राजा लोगों से माने जावेंगे ॥ १ ॥ इदं सामुद्रिकं शास्त्रं विष्णुना भाषितं पुरा। तत्सर्वं वर्णितं देवि! किं पुनः श्रोतुभिच्छसि ॥ २ ॥ तच्छुत्वा तु महादेवी महद्धर्षमवाप सा। प्रहृष्टवदना देवी शंकरं प्रत्युवाच ह।। ३॥। अहो देवि ! पुरातन समय विष्णु भगवान्जी ने इस सामुद्रिकशास्त्र को कहा है उस समस्त को मैंने तुमसे कहा अब फिर क्या सुनना चाहती हो उस वचन को सुनकर वे महादेवीजी बड़े हर्ष को प्राप्त हुंई व हर्षित वदनवाली होकर भक्कसुखदायक निजनायक शंकरजी से बोलीं ॥ २।३॥ त्वन्मुखाब्जाच्छुतं नाथ नृनारीलक्षणं समम्। य इदं पठन्तु विद्वांसश्चाभ्यसन्तु दिवानिशम् ॥४॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य धनं धान्यं सुखं सर्व लभन्तां कीर्तिमुत्तमाम्। न तेषां जायते किञ्चिदुर्ल्लभं त्वत्पसादतः॥५॥ अहो नाथ! आपके बदनारविन्द से समस्त नर नारी लक्षणों को मैंने सुना जो। द्वान् लोग इंसको पढ़ैंगे व दिन राति अभ्यास करेंगे वे लोग धन, धान्य व समग्र तथा उत्तम कीर्ति को पावैंगे और आपकी पसन्नता से उन लोगों को कुछ दुर्लभ रहता है यानी वे लोग सभी पदार्थ को माप्त होते हैं ॥। ४। ५॥ इति श्रीवृहत्सामुद्रिके पएिडतशक्किधरसंकलितं भापाभाष्यं समाप्तिमगादिति ।शत्रम् ॥। इति सामुद्रिकशास्त्रस्य पूर्वार्धे प्रथमोऽङ्क: समाप्तिं पफाय ॥ सामुद्रिकशास्त्रम् पूर्वार्ध: द्वितीयोऽङ्कः सटीकः। पयागनारायणभार्गवेण सर्वसुखाय स्वकीयव्ययेन प्रथमावृत्तौ लक्ष्मणापुरे मावू मनोहरक्षाल् नार्गव बी. ए., छपरिंटेडेंट इस्युपाविपारिय: प्रनंग्धन मुंशी नवलकिशोर सी. आई. ई., मुद्रणालये झुद्राप- यित्वा प्राकाश्यं नीतम्। सन् १६१६ ई० । अस्याविकार: सर्वथास्वाधीन एव रक्षितः। अथ सामुद्रिकशास्त्स्य पूर्वाद्ध द्वितीयाङ्कस्य सूचीपत्रम्। विपया: पृष्ठाङ्का: विपयाः पृष्ठाङ्क: ङ्गलाचरणम् .... बालाद्यवस्थानिर्णयम् .... ... प्रंगुलिज्ञानमाह जलाशयाद्यधिवासान् .... करतलग्रहस्थितिज्ञानम् धातुमुलादिज्ञानम् ... १५ पहायां चिह्नानि .. दीपाद्वस्थाक्रमम् .. करतलद्वादशराशिस्थि तिज्ञानम् ताम्रादिवर्ज्ञानम् १ ५ पादिनामानि द्रव्यांदीनि कालान मेपादीनां वासमाह माणिक्यादिज्ञानम् ... उदाहरणम् वस्त्नाणि, मागाद्यधीशान् मीनादिस्वरूपाएयाह .... विभादिजातिक्रमम् ... पेपादी नामधिवासानाह . ... पुरुपादिज्ञानमाह पेपादीनां हस्वादिसंज्ञानि मज्जाद्यधिपानाह ... पृष्ठोदयादिसंज्ञानि लवणादिरसादीनाह चतुष्पदादिसंज्ञानि उच्चादिज्ञानमाह ... UJ ... दिवारात्रिवलम् मूल त्रिकोखानि .. ... वातुमूलजीवचिन्ता ग्रहाणांफलविचारे विशेषम् ... ... Ww ... ग्रहायां विफलत्वमाह ... वर्णज्ञानम् वालादयवस्थाज्ञानम् ... अन्धवधिरादिज्ञानम् रव्यादिग्रहाणां स्वरूपाि क्ादिवर्णज्ञानम् चन्द्र-भौम-वुंध-गुरुस्व रूपम् दव्याणि भृगुशनिस्व रूपम् .... पादिचिह्नानि ग्रहवधमाह िपाधीशानाह ग्रहारणं मित्रादीन्याह ... .... हायां शरीरविभागमाइ स्थिरादिसंज्ञान्याह कालात्मादिज्ञानमाह ग्रहाणामीक्षणमाह जादिज्ञानम् रव्यादिग्रहेभ्यः फलविचारमाह ... वर्यादीनां नामानि कारकानाह वर्रज्ञानम् अरिष्टदायकानाह ... काशकादिज्ञानम् ग्रहाणं वर्षाएयांह नपादिज्ञानम् छोदयादिज्ञानम् रवि-चन्द्र-कुज-बुधकृतदोपानाह गुरुभगु कतदुःखान्पाह ...... विचया: पृष्ठाङ्का: दिपया: पृषाइ शनिराहुकेतुकृतदापानाइ पुत्रलाभार्थमुपायमाह .... आदिमध्यान्तफल दायकानाह पुनरपि पश्रदशलक्षणाङतकरतल- फलतारतम्बमाह .... .... फलमाइ ... करतलरेखाझालमाइ .. ... २८ पश्दशलक्ष खाङ्गितकरतलफलम् .... १८ करवल भग्नरेखामाह .... परमायुरेखादिफलमाह ... चसुर्दशलक्षणाङितिकरतलफलम् ....?? एकादशलक्षण युतकरतलफलमाइ .... ३० ....?? .... २४ .... ?३ त्रयोदशलक्षखाड्ितकरतलफलम् ·.·. १= पुनरपि पञ्चदशलक्षणयुतकरतलफलम् ४२ ... ? पोडशलक्षणाद्ितकरतलफलम् .... ४४ .... '3 .... पुनरपि

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 2)

चतुर्दशलक्षणाङ््तिकरतलफलम् ५५ दशलक्षणाङ्गितकरतलफलम् ... .१ पोडशलक्षणाद्गितकरतल फलम् एकादश लक्षणाङ्गितकरतलफलम् .... १ .... 4c अंग्रेजिमताज्जन्मवारमासादिज्ञानम् .... १४ .... ६१ महाराष्ट्राणां मते करतलफलमाह नखफलानि -.. ... .... १: .... ६६ नस्वस्थचिहरफलम् ... ... पुनरपि पोढशलक्षणास्तिकरंतलफलग् ७१ गुरुस्थानफलम् :-·. ...? आयुष्यरेखाफलम् .... सौभाग्यरेखाफलम् पोढशक्षणाङ्गितकरतल फलम् .... ७६ मातरेखाफलम् ... पश्चद्शलक्षणासतिकरतलफलम् .... ८२ ऊध्वरेखाफलम् सूर्यरेखाफलम् बलरेखाफलम् सशदशलक्षणाद्तिकरतल फलम् ..... ८७ वेलास्किवरेखाफलम् ... 9 ... द्रादरालससास्तकरतल फलम् .... ६३ गर्डलरेखाफलम् .... १ पूर्व चित्र नं० ९ (e) फनडिका ५ तजनीर चित्रकं.२ अङ्हे 0 उत्तर भू- मू० / मू सूम पर आामु देखा पासमा नटजा देकस्पोत मादरेखा चद पिट रेखाया झ्ापु रल भुक्र क. दे पियें पन्त चित्रनं: कक चित्रनं: मकर धममा संह कंभ पh मं. धुन कन्या मिर्भन चित नं. ५ चित्र नं:६ ब स- आपरखा मतान्तरमबगरखा मान्रा पित सवायाओ चित्रनं०9 चित्र नं ०८ संभोगररय माना भाग्य Fo (३ ) चित्र नं0 ६ कमााशिका चित्रनं. १० चित्रन नं-१९ चित्रमं०१२ 2P Pa m (४) चित्र नंग१३ चित्र नं०१४ चित्र नं. १५/ चित्र xx (श) चित्र नं. ९७ चित्रनं- ९८ ४- T चित्र नं ए६ चित्र नं-२० * (६) चित्र नं. २१ चित्र नं. २२ पताबारजा चित्र मं०२३ बिजनं०४ C चित्र नं० २५ चित्र नं१२६ e 1+1F

  • OJ चित्र नं०२७. चित्रनं०२८ p///* EL चिमनंoर६ चित्रनं-३' A u 28 चियनं-३१ वित्र नं. ३२ चर eil RUT c चिन्ननं-३३ चित्रनं३४ = चित्र नं-31 चित्र नं.३६ R चित्र नं.३७ चित्र नं-३८ चिमनं-३६ चित्रनं.४० IEX P& -चित्रनं ४१ चित्न नं -8न +1 DA चित्र नं. d २ चितनं- 83 x1 WEee वित्र नं-५४ चित्रन-४६ चित्र न.ण9 चित्र नं. ४८ ea चित्रनं86 चित्र नं .1० चित्रनं०९ अथ सामुद्रिकशास्त्रस्य पूर्वार्द्धे हस्तरेखालक्षणम् सोदाहरणं द्वितीयाङ्कमाह॥ मङ्गलाचरणम् ॥ शान्तं शान्तिकरं सदा सुखकरं सर्वाधिपं शर्मदं कान्तं कान्तिकरं कलाधरघरं धर्म्य धरेशं परय। नित्यानन्दकरं महाभयहरं सौन्दर्यरत्नाकर वन्देऽहं सकलेश्वरं सुरवरं सवार्थसिद्धचै शिवम् ॥ १॥ शान्तरूपी, शान्तिकारी, सदासुखकारी, सों के नायक, कल्यादायक, कमनीय- पधारी, कान्तिकारी, कलाधरधारी, धर्मी, धरेश, परेश, नित्यानन्दकारी, महाभयहारी, ुन्दरता के रत्नाकर, कलाओ समेत जनों के ईश्वर, देवताओं में प्रधान भगवान् शिवजी हीमैं सर्वार्थसिद्धि के लिये वन्दना करता हूं ।। १॥ आादौ पाणतलव्याख्या भरायते मुनिसंमता। · श्रूयतां देवि, देवेशि! समाधाय मनोमलम् ॥ २ ॥ पहले पाणितल की व्याख्या जोकि मुनियों के संमत है सो कही जाती है इसलिये हो देवि, देवेशि ! अपने अ्रप्रमल मनको सावधानकर सुनिये ॥२ ॥ अथ तावत्करतले अङ्कुलिज्ञानमाह- अङ्गुल्य: करशाखा: स्युः पुंस्यंगुष्ठः प्रदेशिनी। सामुद्रिकशास्त्रस्य मध्यमानामिका चापि कनिष्ठ चेतिताः कमात्॥३॥ अँगुलियां हाथों की शाखायें होती हैं उनमें अंगुष्ठ (अँगूठा) जोकि पुंलिङ्ग में रहताहै पहली अँगुली जानना चाहिये दूसरी प्रदेशिनी यानी तर्जनी अँगुली कहाती है व मध्य तीसरी अँगुली कहाती है व अनामिका चौथी अँगुली होती है और कनिष्ठा पाँचवीं अँगु कहाती है इस क्रम से उन पाँचों अँगुलियों को जानना चाहिये ॥३ ॥ (देखो चित्र नं० करतल ग्रहस्थितिज्ञानमाह- है भंगल कनिष्ठामूलगः सौम्यो ह्यनामामूलगो रविः। मध्यमामूलगो मन्दस्तर्जनीमूलगो गुरुः॥४ ॥ बहसदि मातृपित्रोरुपर्य्यारः शुक्रो ह्यंगुष्ठमूलगः। 2 शुक मातृपित्रोरधश्चन्द्रो ज्ञेया खेटस्थितिः क्रमात्॥५॥ कनिष्टा की मूल (जड़) में बुध रहता है व अनामा की मूल में सूर्य रहते हैं व मध्य की मूल में शनै्वर रहता है व तर्जनी की मूल में वृहस्पति रहते हैं व माता पिता की रे के ऊपर व मध्य में मङ्गल रहता है व अँगूठा की मूल में शुक्र रहते हैं और माता पि की रेखा के नीचे चन्द्रमा रहता है इस क्रम से ग्रहों के उच्चों की स्थिति (स्थान) नना चाहिये ।। ४। ५ ॥ (देखो चित्र नं० २) अथ ग्रहाणां चिह्नान्याह- वृत्ताकारं · रेश्रिह्नं चन्द्रस्याप्यर्द्धचन्द्रकम् एताहशं ऊ कुजस्यैव बुधस्या र पीदशंमतम् ॥ ६ ॥ गुरोश्चा पीद्ृशं ज्ञेयं भृगोश्चा पीद्शं स्मृतम्। शनैश्चा पीदृशं प्रोक्कं विद्वद्विर्वेदपारगैः।।७।। वत्ताकार सूर्य का चिह्न होता है व चन्द्रमा का अर्ध चन्द्राकार0 ऐसा चिह0 मङगलका होताहै व बुध का चिह्नए ऐसा मानागयाहै और बृहस्पति का ध ऐसा कि जानना चाहिये व शुक्र का भी ऐसा चिह्न मानागया है और शनैश्चर का रुऐ चिह्न वेदपारगामी विद्वानों को जानना चाहिये ॥ ६।७ ॥ (देखो चित्र नं० ३) १-इकलरडीय सामुद्रिकवतएां मते बुधस्य मर्करी संज्ञा,सूर्यस्य सनसंज्ञा, शनैश्चवरस्यस्था संज्ञा, गुरोर्जुपिटरसंज्ञा, मंगलस्य मार्ससंज्ञा, शुकरस्य वीनससंज्ञा, चन्द्रस्य मूनसंज्ञा कथितं करतलद्वादशराशिस्थितिज्ञानमाह- अङ्गुलीपु च सर्वासु पर्वत्रयमदाहतम्। तर्जनीपर्वके चादे मेपस्तिष्ठति सर्वदा॥८॥ द्वितीये च वृपो ज्ञेयस्तृतीये मिथुनं स्मृतम्। अरनामापर्वके चाद्ये सदा तिष्ठतति कर्कटः ॥ ६॥ द्वितीये सिंहको ज्ञेयस्तृतीये कन्यका स्थिता। कनिष्ठापर्वके चाद्ये तुला ज्ञेया मनीषिभिः॥१०॥ द्वितीये वृश्चिको ज्ञेयस्तृतीये धनुरुच्यते। मध्यमापर्वके मुख्ये मृगस्तिष्ठति सर्वदा ॥ ११ ॥ द्वितीये कुम्भको ज्ञेयस्तृतीये मीनको मतः । एवं द्ादशराशीनां स्थितिः प्रोक्का मया प्रिये॥ १२ ॥ अहो मिये ! समस्त अँगुलियों के बीच तीन २ परवै कही हैं उनमें तर्जनी की पहली पर्व में मेप सदैव रहता है व दूसरी पर्व में वृप जानना चाहिये व तीसरी पर्व में मिथुन कहा जाता है व अनामिका की पहली पर्व में हमेशा कर्क रहता है व दूसरी पर्व में सिंह जा- नना चाहिये व तीसरी पर्व में कन्या स्थित रहती है व कनिष्ठा की पहली पर्व में विद्वानों को तुला जानना चाहिये व दूसरी पर्व में वृश्चिक को जानना चाहिये व तीसरी पर्व में धन कहा जाता है व मध्यमा की पहली पर्व में मकर सर्वदा टिका रहताहै व दूसरी पर्व में कुम्भ जानना चाहिये और तीसरी पर्व में मीन याना जाता है इस प्रकार बारह राशियों का स्थितिक्रम मैंने कहा ॥ ८ । १२ ॥ (देखो चित्र नं० ४) मेषादिनामान्याह- मेषाजविश्वक्रियतुम्बुराद्या वृषोक्षगोतावुरगोकुलानि। दन्दं नृयुग्मं जुतुमं यमं च युगं तृतीयं मिथुनं वदन्ति ॥ १३ ॥ मेप, अज, विश्व, क्रिय, तुम्बुर और आद्य ये मेपराशि के नाम हैं तृष, उक्षा, गो, बातुर और गोकुल ये वृपराशि के नाम हैं-दन्द्, नृयुग्म, जुतुम, यम, युग, तृतीय और ममिथुन, ये मिथुनराशि के नाम आचार्यों ने कहे हैं।। १३।। सामुद्िकशास्त्रस्य कुलीरकर्काटककर्कटाख्या: करठीरव: सिंहभृगेन्द्रलेयाः। कुलीर, कर्काटक और कर्कट ये कर्कराशि के नाम हैं, कएठीरव, सिंह मृगेन्द्र और ये सिंहराशि के नाम हैं, पाथोन, कन्या, रमखी और तरखी ये कन्याराशि के नाम तौलि, वणिक, जूक, तुला और घद ये तुलाराशि के नाम हैं ॥ १४॥ अल्पष्टमं वृश्िककौर्पिकीटा धन्वी धनुश्चापशरासनानि। मृगो ृगास्यो मकरश्र नक्रः कुम्भो घटस्तोयधराभिधानः॥१ अल्पष्टभ, दृश्िक, कौर्पि और कीट ये वृश्िकराशि के नाम हैं, धन्वी, धनु, चाप शरासन ये धनराि के नाम हैं मृग, मृगास्य, मकर और नक ये मकरराशि के नाम हैं कु घट और तोयधर ये कुम्भराशि के नाम हैं॥ १५ ॥ मीनालिमत्स्यपृथुरोमभपा वदन्ति दसादिकर्क्षनवपादयुताः क्रियादाः। चक्स्थितादिविचरादिननाथसंख्या क्षेत्रर्क्षराशिभवनानि भसंस्थितानि॥ १६॥ मीन, अति, मत्स्य, पृथुरोम और रूप ये मीनराशि के नाम आचार्यो ने कहे हैं अशिविन्यादि नक्षत्रों के नव चरणों से संयुत व आकाश में चलनेवाले व चक्र में हुए मेपादिक वारह राशियाँ होती हैं व राशियों में भलीभाँति टिके हुए क्षेत्र, ऋक्ष, र व भर्वन ये स्थानों के नाम होते हैं ॥ १६ ॥ कालाङगे मेपादीनां वासमाह- कालात्मकस्य च शिरो मुखदेशबाहु हत्कुक्षिभागकटिवस्तिरहस्यदेशः। ऊरू च जानुयुगलं परतस्तु जछ्के पाददयं क्रियमुखावयवाः क्रमेण॥१७॥ कालात्मा के शीश में मेप रहता है व मुखदेश में छृप रहता है व वाहुओं में मिथुन पू व हृदय में कर्क व कोखियों में सिंह व कमर में कन्या व वस्तिदेश में तुला व गुदा में वृक्षिक व ऊरुओों में धन व जानुओं में मकर व जंघाओं में कुम्भ व पैरों में मीन रहता है ये क्रम से मेपादिकों के अवयव कहाते हैं ॥ १७ ॥ उदाहरगमाह- वाह मिशुन मेष मुख पुरुष रृष कोख पुरुष सिह ह्ृदय कर्क श्री जास्ति ब्राह्मण पदाष कमर गुदा वृशिक (गुदा में) ब्रा्मण पुरुष मीनन नकर (जानुमें) ब्राक्मण सामुद्विकशास्त्रस्य मीनादिस्व रूपाएयाह- व्यत्यस्तोभयपुच्छमस्तकयुतौ मीनौ सकंभो नर- स्तौलीचापधरस्तुरंगजघनो नक्रो मृगास्यो भवेत। वीणाढ्यं सगदं नृयुग्ममबला नौस्था ससस्यानला शेषा: स्वस्वगाणाभिधानसदशाः सर्वे स्वदेशाश्रयाः॥१८॥ उलटे पलटे दोनों तरफ पूंछ व मस्तक से संयुत दो मीन कहाते हैं कुंभ समेत तु नर कहाते हैं व धन जघनदेश से घोड़े का रूप धारता है व मकर मृग मुखवाला होता व मिथुन वीखा को धारे हुए रोगी रहता है व कन्या नौका में बैठी हुई धान्य स अनल से पूर्ण रहती है और जो वाकी हैं वे सब ही अपने २ गुण व नाम के सम होकर अपने २ देश का आश्रय रखते हैं ॥ १८ ॥ मेपादीनामधिवासानाह- गहो की वरसालान मेषस्य धातुकररत्नधरातलं स्यादुक्षस्तु सानुकृषिगोकुलकाननानि। द्यूतक्रियारतिविहारम ही युगस्यवापीतटाकपुलिनानि कुलीरराशे:॥१8 धातु व रत्नों की खानि व धरातल में मेप का अधिवास रहता है पर्वतों का किना या सम भूभाग, खेत, गोकुल व वन में तृप का अधिवास रहता है जुाँ, रति व विह करने की भूमि में मिथुन का अधिवास कहाजाता है और बावली, तालाब व पुलों कर्क का वास रहता है॥ १६ ॥। करठीरवस्य घनशैलगुहावनानि षष्ठस्य शाद्लवधूरतिशिल्पभूमिः। सर्वार्थसारपुरपरायम हीतुलायाःकीटस्य चाश्मविषकीटबिलप्रवेशाः॥२० घने पहाड़ों, गुहाओं व वनों में सिंह का अधिवास रहता है, हरी घास, बहुओं ह रतिस्थान व कारीगरी की भूमि में कन्या का अधिवास कहाता है, समग्र अर्थसार, व बाज़ार या दूकानों की भूमि में तुला का अधिवास होता है, पत्थर, विष, कीट विलमवेश में वृश्चिक का वास कहाजाता है॥ २० ॥ चापस्य वाजिसथवारणवासभूमि रेणाननस्य सरिदम्बुवनप्रदेशाः। कुम्भस्य तोयघटभाएडगृहस्थलानि मीनाधिवाससरिदम्बुधितोयराशिः२। घोड़े, रथ और हाथियों के रहने की भूमि में धन का वास रहता है, नदी, जल जंगलों में मकर का वास होता है जल, घट, भांडगृह व स्थलों में कुंभ का अधिवास क जाता है और नदी, समुद्र व जलराशियों में मीन का अधिवास होता है।। २१॥ मेपादीनां हस्वादिसंज्ञान्याह- प्रागादिक्रियगोनृयुक्कटकभान्येतानि कोणान्विता न्याडु: क्रूरशभौ चरस्थिरतरद्न्द्वानि तानि क्रमात्।।२२। टृप, मेप, कुम्भ ये हस्व संज्ञक हैं, मकर, मिथुन, धन, मीन और कर्क ये समसंज्ञक हैं, क्षिक, कन्या, सिंह और तुला ये दीर्घसंज्ञक हैं और मेपादिक राशियां पुरुप व स्त्रीसंज्ञक कहाती हैं यांनी मेप पुरुष, वृष स्त्री, मिथुन पुरुष, कर्क स्त्री, सिंह पुरुप, कन्या स्त्री, तुला पुरुष, वृश्षिक स्त्री, धन पुरुष, मकर स्त्री, कुम्भ पुरुष, मीन स्त्री संज्ञक कहाती है और मेप टप, मिथुन व कर्क ये चार २ पूर्वादि दिशाओं में रहती हैं यानी मेप पूर्व में रहता है व प दक्षिण में व मिथुन पथ्चिम में व कर्क उत्तर में रहता है और सिंह पूर्व में व कन्या द- क्षिण में व तुला पश्चिम में व वृश्चिक उत्तर में बसता है एवं धन पूर्व में व मकर दक्षिणमें व कुम्भ पश्चिम में व मीन उत्तर में बसता है और मेषादिक बारह राशियां फ्रूर व सौम्य संज्ञक होती हैं यानी मेप क्रूर, वृप शुभ कहाता है मिथुन क्रूर, कर्क सौम्य सिंह क्रर, कन्या सौम्य., तुला कूर व दृश्चिक सौम्य व धन कूर, मकर साम्य, व कुम्भ क्रूर व मीन सौम्य कहाजाता है और मेपादिक बारह राशियाँ चर, स्थिर, द्विस्त्रभावसंज्ञक कहाती हैं यानी मेप. चर,ृप. स्थिर, मिथुन. द्विस्वभाव, कर्क, चर, सिंह-स्थिर व कन्या.द्विस्वभाव,तुला. चर,ृश्चिक. स्थिर, धन. द्विस्वभाव, मकर, चर, कुम्भस्थिर और मीन.द्विस्वभावसंज्ञक कहाजाता है॥२२॥ पृष्ठोदयादिसंज्ञान्याह- वीर्योंपेतानिशिवृषनृयुक्कर्किचापाजनक्रा हित्वा युग्मं भवनमपरे पृष्ठपूर्वोदयाश्च। शेषा: शीर्षोदयदिनबला श्रेष्ठता राशयस्ते मीनाकारद्वयमुभयतः काललग्नं समेति ॥ २३॥ टृप, मिथुन, कर्क, धन, मेप और मकर ये राशियां रात्रिमें बलवान् कहाती हैं इनमें मेथुनराशि को छोड़कर अन्य राशियाँ पृष्ठोदयसंज्ञक होती हैं और सिंह, कन्या, तुला, श्चिक व कुम्भ ये राशियाँ दिनमें बली व श्रेष्ठ होकर शीर्षोदय कहाती हैं और मीन- रशि दिन व राति में बलवान् व उभयोदयी होकर काललग्न को प्राप्त होता है॥ २३॥ १-सौम्याधिलग्ने यदिवा स्ववरगे शीर्षोदये सिद्धिमुपैति कार्यम्। अतो विपर्यस्तमसिद्धि तुं कच्छ्ेणा संसिद्धिकरं विमिश्रम्।। १ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य मीनालिकर्कटमृगाः सलिलाभिधानास्तोयाश्रयाघटव धूयुगगोपसंज्ञाः। निस्तोयभूतलचराःक्कियचापतौलिकएठीरवाश्च बहवःप्रवदन्ति सन्तः२४ मौन, वथ्षिक, कर्क और मकर ये जलसंज्ञक कहाते हैं, कुंभ, कन्या, मिथुन और ये जलका आश्रय रखते हैं और मेप, धन, तुला और सिंह ये निर्जल भूतल में चरते ऐसा बहुत से सन्तलोग कहते हैं ॥ २४॥ चतुष्पदादिसंज्ञान्याह- चापापरार्धहरिगोमकरादिमेण मीनास्थिता बलयुताश्च चतुष्पदाख्याः। धनका परार्द्ध, सिंह, दप, मकर का पूर्वार्ध, मेप और मीन ये बलवान् होते हुए च षपद संज्ञावाले होकर टिकते हैं और कन्या, मिथुन, कुम्भ और धनका पूर्वार्ध ये नरख धारी द्विपद कहाते हैं और यदि लग्न में टिके हों तो बलवान् कहे जाते हैं॥ २५॥ मृगापरार्धान्त्यकुलीरसंज्ञा जलाभिधाना बलिनश्चतुर्थे। जलाश्रयो वृश्चिकनामघेयः ससप्मस्थानगतो वली स्यात् ॥ २६॥ मकर का परार्ध, मीन और कर्क ये जलचर कहाते हैं यदि चौथे घरमें टिके हों बलवान् कहे जाते हैं और वृश्षिक जलाश्रयी कहाता है यदि वह सतयें घरमें बैठा हो चलवान् होता है॥ २६ ।। दिवारात्रिवलमाह- केन्द्रं गतोहि द्विपदो बलाव्यश्चतुष्पदाः केन्द्रगता रजन्याम्। कीटास्तु सर्वे यदि कराटकस्थाः सन्धिद्वये वीर्ययुता भवन्ति ॥ २७। दिन के समय केन्द्र में बैठाहुआ दविपद बलवान् होता है व राजिके समय केन्द्र में टिे हुए चतुष्पद बलवान् होते हैं और समस्त कीटसंज्ञक यदि केन्द्र में टिके हों तो दोनों है न्धियों में वलवान् होते है॥२७ ॥ धातुमूलजीवचिन्ताज्ञानमाह- धातुर्मूलं जीवमित्याहुरार्या मेषादीनामोजयुग्मे तथैव। स्वर्णाद्धातुर्मृत्तिकान्तं तृणान्तं वृक्षान्मूलं जीवकूटः सजीवः।२८] मेपादिकों के सम व विपम में धातु, मूल और जीव इन चिन्ताओं को आयों ने का है वहां सोने से लेकर मृत्तिकापर्यन्त धातु कहाती है व वृक्ष से लेकर तिनुकापयर्य मूल कहाता हैं और जो जीव समुदाय देखा जाता है वह जीव कहाजाता है। २८। पूवार्द्धे द्ितीयाङ्क। मेषे च द्विपदां चिन्ता वृषे चिन्ता चतुष्पदाम्। मिथुने गर्भचिन्ता च व्यवसायस्य कर्कटे॥ २६ ॥ सिंहे च जीवचिन्ता स्यात् कन्यायां च स्तियास्तथा। तुले च धनचिन्ता च व्याधिचिन्ता च वृश्चिके। ३०॥ चापे च धनचिन्ता स्यान्मकरे शत्रुचिन्तनम्। कुम्भे स्थानस्य चिन्ता स्यान्मीने चिन्ता च दैविकी ॥ ३१ ॥ ग्रेप में दिपदों की चिन्ता होती है, वृप में चौपायों की चिन्ता, भिथुन में गर्भचिन्ता, कर्क में रोजगार की चिन्ता, सिंह में जीवों की चिन्ता, कन्या में लुगाइयों की चिन्ता, ुला में धनचिन्ता, ृश्चिक में व्याधिचिन्ता, धन में धनचिन्ता, मकर में शत्रुचिन्ता, कुम्भ में स्थानचिन्ता और मीन में दैवीचिन्ता जानना चाहिये ।। २६।३१ ।। मीनालिकर्कटा विप्राश्चापाजहरयो नृपाः। कुम्भयुग्मतुलाः शुद्रा वैश्या वृपमृगाङ्गनाः॥।३२।। माँन, वृक्षिक और कर्क ये ब्राह्मण कहाते हैं; धन, मेप औप्रर सिंह ये क्षत्रिय कहाते हैं; कुम्भ, मिधुन और तुला ये शूद्रवर्स होते हैं तथा छृप, मकर और कन्या ये वैश्यवर्स कहे जाते हैं ॥ ३२ ।। अन्धवधिरादिज्ञानमाह- महानिशान्धा: क्रियगोमृगेशा मध्यंदिने कर्कटयुग्मकन्याः। पूर्वाह्नकाले बधिरौ तुलाली धन्वी मृगाख्यश्च तथापराहे॥३३॥ मेप, वृष, मकर ये महानिशा में अ्र्पन्धे रहते हैं; कर्क, मिथुन और कन्या ये मध्याह्न में प्रन्धे कहाते हैं; तुला, वथिक ये पूर्वाह् में बहिरे होते हैं तथा धन और मकर ये अपराहए मबहिरे होते हैं ॥ ३३ ॥ मृगाननश्चापधरश्र पङ्टु सन्विद्धये नाशकरौ भवेताम्। स्यादृक्षसन्धिः कटकालिमीनभान्तं प्रगडान्तमिति ग्सिद्धम् ॥३४।। मकर व धन ये पंगुसंज्ञक कहाते हैं जोकि दोनों सन्धियों में नाशकारक होते हैं; कर्क, सामुद्रिकशास्त्रस्य वृश्चिक और मीन पर्यन्त ऋक्षसन्धि कहाती है जोकि भान्त व मगएडान्त इस ना विख्यात है॥ ३४ ॥ रक्कादिवर्सज्ञानमाह- रक्कगौरशुक कान्तिपाटला: पाएडुचित्ररुचिनीलकाचनाः। पिङ्गल: शवलवभ्रुपाएडरास्तूवरादिभवनेषु कल्पिताः॥३५ ॥ मेष रफ्, टृप गौर, मिथुन हरित, कर्क श्वेतरक्क, सिंह पाएडु, कन्या विचित्र, कृष्ण, दृक्षिक सुवर्णसदृश, धन पिंगल, मकर कर्बुर, कुम्भ वभ्रु और मीन स्वच्छ कहाता है ये मेपादि वारह राशियों में कल्पित होते हैं॥ ३५ ।। द्रव्याएयाह- वस्त्रादयं शालिमुख्यं वनफलनिचयः कन्दलीमुख्यधान्यं त्वकसारं मुद्गपूर्वं तिलवसनमुखं त्विक्षुलोहादिकं च । शस्त्राश्वं काञ्चनादं जलजनिकुसुमं तोयजातं समस्तं द्रव्यारायाहुः क्रियादिष्ववलवलयुतेष्वल्पताधिक्यभांजि ॥३६ वस्त्रादि मेप की द्रव्य है, शालि मुख्य हृप की व वन्यफलों का समुदाय मिथुन कन्दली मुख्यधान्य कर्क की व त्वक्सार सिंह की व मूंग आदि कन्या की, तिल तुला की, इक्षु लोहादि पथ्िक की व शत्त्राश्व धन की व सुवर्ण आदि मकर की व ज़ जातपुष्प कुम्भ की व जल से उपजी समस्त द्रव्य मीन की है औप्र यदि मेपादिक क व अबली हों तो पूर्वोक द्रव्य कम या अधिक होती हैं॥ ३६॥ करतले मेपादिचिह्नान्याह- मेपस्यैताहशं चिह्नं वृपस्यापीद्ृशं मतम्। दन्दस्यैतादृशं ज्ेयं कर्कस्यापीदशं स्मृतम् ॥ ३७ सिंहस्यैतादृशं ख्यातं कन्यायाश्चेद्दशं मतम्। घटस्यापीदशं व्यक्नं वृश्चिकस्य ततःपरम्॥ ३८ चापस्यैतादशं गीतं मृगस्यापीद्ृशं मतम्। कुम्भस्यैतादशं प्रोक्ं मीनस्यैतादश बुधैः॥ ३६ ेप राशि का अश ऐसा चिह्न होता है व ृप का ऐसा निशान माना। मिथुन का हित ऐसा निशान जाननाचाहिये और कर्क का ऐसा निशान का सिंहराशि का ्र ऐसा निशान विख्यात है व कन्या का मका ऐसा निशान मात व तुला का ऐसा निशान कहाता है तदनन्तर वृश्चिक का ऐसा निशान कहाता है व मकर का ऐसा निशान कहा जाता है व धन का ऐसा निशान माना व कुम्भ का ऐसा निशान कहा है और मीन का ऐसा निशान सामुद्रिक वत्तागस पस्डितों ने कहाहै॥३७॥देखो चित्र नं ५) मेपाधीशानाह- धराजशुकरज्ञशशीनसौम्यसितारजीवार्कजमन्दजीवाः। क्रमेष मेपादिषु राशिनाथास्तदंशपाश्वेति वदन्ति सन्तः ॥। ४०।। मेप राशि का स्वामी मङल, ट्वप का शुक्र, भिथुन का बुध, कर्क का चन्द्रमा, सिंह का सूर्य, कन्या का बुध, तुला का शुक्र, उश्षिक का मङल, धन का गुरु, मकर व कुम्भ का शनैश्वर और मीन का अर्प्रधिपति व अंशप वृहस्पति होते हैं ऐसा सन्तों ने कहा है॥४०॥ ग्रहासां शरीरविभागमाह- ग्रहाणां मएडलं चैव शृछ वक्ष्यामि पार्वति। नादचक्रे स्थितः सूर्यो बिन्दुचक्े च चन्द्रमाः ॥४१॥ लोचने मङ्गलः ग्रोक्को हृदि सोमसुतस्तथा। उदरे च गुरुश्चैव शुक्रे शुक्रस्तथैव च।। ४२॥। नाभिस्थितोथ मन्दो वै सुखे राहुस्तथा स्थितः। पादे पाणौ च केतुश्र शरीरे ग्रहमरडलम् ॥ ४३ ॥। अहो पार्वतीजी ! मैं ग्रहों का मण्डल कहूंगा उसको सुनिये कि सूर्य नादचक्रमें बैठा हव चन्द्रमा बिन्दुचक्र में विराजता है व मङल लोचनों में रहता है व बुध हृदय में टिका व बृह्स्पति उदरमें रहते हैं व शुक्र शुक्र (बीज) में रहता है व शनैशर नाभि (तोदी) में टिका रहता है व राहु मुख में राजता है और केतु हाथ व पैरों में वसता है यह शरीर मेंग्रहमएडल कहाता है।। ४१।४३॥ कालात्मादिज्ञानमाह- कालस्यात्मा भास्करश्चित्तमिन्दुः सत्त्वं भौमः स्याद्चश्रन्द्रमूनुः। देवाचार्यः सौख्यविज्ञानसारः कामः शुक्रो दुःखमेवार्कसूनुः॥४४॥ सूर्य कालका आत्मा दै, चन्द्रमा काल का चित्त (दिल) है, मङल वल है, बुध चन है, वृहस्पति सौख्य व विज्ञान का सार है, शुक्र कामदेव है और शनैश्चर दुःख- रप कहाता है।। ४४ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य राजादिज्ञानमाह- दिनेशचन्द्रौ राजानौ सचिवौ जीवभार्गवौ। कुमारो वित्कुजो नेता प्रेष्यस्तपननन्दनः॥ ४५॥ सूर्य व चन्द्रमा ये राजा कहाते हैं यानी सूर्य राजा व चन्द्रमा रानी कहाती है, वृह व शुक्र मन्त्री कहाते हैं, दुध कुमार व मझल नेता ( लेजानेवाला या सिखलानेवाल कहाता है और शनैश्र दास या धावन कहलाता है।। ४५॥ सर्यादीनां नामान्याह- हेतिः सूर्यस्तपनदिनकृद्धानुपूपारुणार्का: सोमः शीतद्युतिरुडुपतिग्लौर्मृगाह्वेन्दुचन्द्राः। हेति, सर्य, तपन, दिनकृत, भातु, पुपा, अरुण और अर्क ये सूर्य के नाम हैं-से शीतदुति, उदुपति, ग्लौ, मृगाङ्क, इन्दु और चन्द्र ये चन्द्रमा के नाम कहाते हैं; आर, क्षितिज, रुधिर, अङ्ारक और क्रूरनेत्र ये मङल के नाम कहाते हैं और सौम्प, तारात बुध, बित्, बोधन और इन्दुपुत्र ये बुध के नाम कहेजाते हैं ॥ ४६॥ मन्त्री वा चस्पतिगुरुसुराचार्यदेवेज्यजीवाः शुक्र: काव्य: सितभृगुसुताच्छास्फुजिद्दानवेज्याः। छायामूनुस्तराणितनयः कोणशन्यार्किमन्दा राहुस्सर्पासुरफितमः सैंहिकेयागवश्च ॥ ४७॥ मन्त्री, वाचस्पति, गुरु, सुराचार्य, देवेज्य और जीव ये बृहस्पति के नाम हैं; काव्य, सित, भृगुमुत, अच्छ, आस्फृजित् और दानवेज्य ये शुक्र के नाम हैं; छाया तरणितनय, कोण, शनि, आर्कि और मन्द ये शनैश्र के नाम हैं और राहु, सर्प, भ फरणी, तम, सैंहिकेय और अग ये राहु के नाम कहाते हैं। ४७॥ ध्वज: शिखीकेतुरिति प्रसिद्धा वदन्ति तज्ज्ञा गुलिकश्च मान्दिः। उपग्रहा भानुमुखग्रहांशा: कालादय: कष्टफलप्रदाः स्यः ॥४८॥ क्रमशः कालपरिधिधमार्द्धपहराह्वयाः। यमकस्टककोदरडमान्दिपा तोपकेतवः॥ ४६। ध्वज, शिखी, केतु, गुलिक और मान्दि ये केतु के नाम हैं ऐसा प्रसिद्ध परिडतों ने कहा है और रव्यादि ग्रहों के अंश कालादिक उपग्रह कहाते हैं जोकि कष्टकारी फल के देनेवाले होते हैं उनको क्रम से कहते हैं कि, काल, परिधि, धूम, अर्धमहर, यमकएटक, कोदएड, मान्दि, पात और उपकेतु ये उपग्रहों के नाम कहेजाते हैं ॥ ४८।४६॥ वर्सज्ञानमाह- दूर्वाश्यामलकान्तिरिन्दुतनयः संरक्तगौरः कुजः । मन्त्री गौरकलेवरः सिततनुः शुक्रोसिताङ्गः शनि- श्चानीलाकृतिदेहवानहिपतिः केतुर्विचित्रद्युतिः॥५० ॥ सूर्य श्याम व लाल वर्णवाला होता है व चन्द्रमा सफ़ेद अङ्गवाला होकर जवान रहता है व बुध दूब के समान श्याम अङ्गवाला कहाता है व मङ्ल लाल व गोरा कहा जाता है, बृह्दस्पति गोरे रंगवाला होता है व शुक्र सफ़ेद अङ्गवाला, शनैश्चर काला व राहु नीला और केतु विचित्र वर्णवाला कहलाता है॥ ५० ॥ पकाशकादिज्ञानमाह- प्रकाशकौ शीतकरप्रभाकरौ तारा ग्रहाः पञ्च धरासुतादयः। तमःस्वरूपौ शिखिसिंहिकासुतौ शुभाः शशिज्ञामरवन्द्यभार्गवाः॥।५१।। चन्द्रमा व सूर्य ये प्रकाशक कहाते हैं व मङल आदि पांच ग्रह तारा कहाते हैं व राहु, केतु ये दोनों तमोरूपी कहेजाते हैं चन्द्रमा, बुध, बृहस्पति और शुक्र ये शुभग्रह कहलाते हैं५१॥ पापादिज्ञानमाइ- क्षीणेन्दुमन्दरविराह्ुशिखिक्षमाजाः पापास्तु पापयुतचन्द्रसुतश्च पापः। नपगद तेषामतीव शुभदौ गुरुदानवेज्यौ क्रूरौ दिवाकरमुतक्षितिजौ भवेताम्॥५२॥ क्षीएचन्द्रमा, शनैश्वर, सूर्य, राहु, केतु और मङल ये पापग्रह कहाते हैं व पापग्रहों स- मेत बुध पापी कहाता है उनके वीच में बृह्दस्पति और शुक्र अत्यन्त शुभदायक होते हैं और शनैश्र, मङ्ल ये दोनों क्रूरग्रह कहलाते हैं॥ ५२॥ चन्द्रस्य वलाबलमाह- शुक्कादिकानि दशकेहनिमध्यवीर्य- १ मासस्य शुक्कप्रतिपत्प्रवृत्तेः पूर्व शशी मध्यबलो दशाहे । श्रेष्ठो द्वितीयेष्यबलस्तृतीये सौस्यैस्तु द्टो वलवान्सदैव ॥ १ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य शाली द्वितीयदशकेतिशभप्रदोऽसौ। चन्द्रस्तृतीयदशके बलवर्जितस्तु सौम्येक्षणादिसहितो यदि शोभनः स्यात्॥ ५३॥ शुक्कपक्ष की परेवा से लेकर दशमीतक चन्द्रमा मध्यम वीर्यवाला रहता है दशमी लेकर कृष्णपक्ष की पश्चमी पर्यन्त यह चन्द्रमा शुभदायक होता है और पश्चमी से ले अमावस पर्यन्त चन्द्रमा क्षीण वलवाला कहाता है यदि शुभग्रहों से दृष्ट व संयुत हो शुभदायक होजाता है।। ५३ ॥ पृष्ठोदयादिज्ञानमाह- रव्यारराहुमन्दाश्च पृष्ठेनोद्यन्ति सर्वदा। शिरसा शुक्रचन्द्रज्ञा जीवस्तूभयतो ब्रजेत् ॥ ५४॥ सूर्य, मङ्गल, राहु और शनैश्र ये ग्रह सदैव पीठ से उदय करते हैं व शुक्र, चन्द्र और बुध ये शीश से उदय करते हैं और वृहस्पति दोनों से उदय करते हैं॥ ५४॥ विहगादिस्वरूपाएयाह- दिवाकरजौ विहगस्वरूपौ सरीसृपाकारयुतः शशाङ्क। पुरन्दराचार्यसितौ द्विपादौ चतुष्पदौ भानुसुतक्षमाजौ॥ ५५॥ सर्य व बुध ये दोनों पक्षीरूप कहाते हैं व चन्द्रमा सरीसपरूपी होता है, बृहस्पति शुक्र ये दोनों द्विपद कहाते हैं और शनैश्वर व मङ्गल ये दोनों चतुष्पदसंज्ञक होते हैं॥५ बालो धराज: शशिजः कुमारकस्त्रिंशद्गुरुः पोडशवत्सरः सितः। पञ्चाशदर्को विधुर्दसप्ततिः शताव्दसंख्याः शनिराहुकेतवः ॥५६ मङ्गल वालक, वुध कुमार, बृहस्पति तीस वर्षवाला, शुक्र सोलह वर्षवाला, म पचास वर्वाला, चन्द्रमा सत्तरि वर्पवाला कहाता है और शनैश्र, राहु व केतु ये वर्पवाले होते हैं ॥ ५६॥ जलाशयाद्यधिवासानाह- जलाशयौ चन्द्रसुराखिन्द्यौ बुधालयग्रामचरौ गुरुजञौ। कुजाहिमन्दध्वजवासरेशा भवन्ति शैलाटविसंचरन्तः॥५७॥ चन्द्रमा व शुक्र ये जलाशयों में वास करते हैं; बृहस्पति व बुध ये पिडतों के घर व गांवों में घूमते हैं; मङल, राहु, शनैश्वर, केतु और सूर्य ये पहाड़ों व जङ्गलों में विचरते हुए रहते हैं॥। ५७ ॥ धातुमूलादिज्ञानमाइ- शाखाधिपा जीवसितारबोधना धातुस्वरूपौ युचरौ कुजारुणौ। मूलप्रधानौ तुहिनाकरार्कजौ जीवौ सितार्यौ तु विमिश्रमिन्दुजः॥।५=॥। बृहस्पति, शुक्र, मङल और बुध ये शाखाधिप कहाते हैं, आकाशचारी मङल व सूर्य ये धातुरूपी कहेजाते हैं, चन्द्रमा व शनैश्वर मूलप्रधान व शुक्र व वृद्दस्पति ये जीवरूप कहाते हैं औौर वुध विभिश्ररूप कहाता है॥ ५८ ॥ दीपाद्यवस्थाक्रममाह- दीस: स्वस्थः प्रमुदितः शान्तः शक्: प्रपीडितः। दीन: खलस्तु विकलो भीतोवस्था दश क्रमात्॥ ५६ ॥ दीस, स्वस्थ, प्रमुदित, शान्त, शक्क, मपीडित, दीन, खल, विकल और भीत ये क्रमसे रव्यादिग्रहों की दश अवस्थायें कहाती हैं॥ ५६ ॥ स्वोच्चत्रिकोणोपगतः प्रदीपः स्वस्थः स्वगेहे मदितः सुहृद्वे। शान्तस्तु सौम्यग्रहवर्गयातः शक्कोऽतिशुद्ध: स्फुटरश्मिजालैः ॥ ६०॥ जो ग्रह अपने उच्च व त्रिकोण में प्राप्त हुआ है वह प्रदीप् कहाता व जो अपने घर में चैठा है वह स्वस्थ कहाजाता है व जो अपने मित्रघर में बैठा है वह मुदित होता है व जो शुभग्रहों के वर्ग में पहुँचा है वह शान्त कहाता है और जो स्फुटकरणजालों से अति- शुद्ध होता है वह शक्क कहाता है ॥ ६० ॥ ग्रहाभिभूतस्त्वतिपीडितः स्यादरातिराश्यंशगतोतिदीनः। खलस्तु पापग्रहवर्गयोगान्नीचेति भीतो विकलोस्तयातः ॥ ६१॥ जो ग्रहों से तिरस्कृत हुआ है वह अति पीड़ित होता है व जो शत्रुके राश्यंश में प्राप्त है वह अतिदीन कहाता है व पापग्रहों के योग से खल होता है व नीचग्रह अतिभीत कहा जाता है और अस्तंगत ग्रह विकल होता है ॥ ६१॥। ताम्रादिवर्णज्ञानमाह- कृष्णकान्तिरिनादीनां नष्टदौ च प्रकीर्तिताः ॥६२।। सामुद्रिकशास्त्रस्य सूर्ध ताम्रवर्ण, चन्द्रमा सफ़ेदवर्ण, मङ्ल रक्वर्ण, वुध हरित, बृहस्पति पीतवर्ण, शु कर्बुरवर्ण और शनैश्चर कालावर्ण कहाता है ये सूर्यादिकों के वर्ण नष्ट आदिकों भी कहे हैं॥ ६२ ॥ द्रव्यादीन्याह- द्रव्याणि ताग्रमणिकाञ्चनशुक्किरौप्य- मुकान्ययश्च दिननाथमुखग्रहाणाम्। मुख्या दिवाकरमुखादिदेवता:स्युः॥६३॥ ताम्र, माण, कांचन, सीपी, रूपा, मोती और लोहा ये सर्यादि ग्रहों की द्र कहाती हैं यानी सूर्य का ताख्र, चन्द्रमाकी मधि, मङलका सुवर्स, बुध की सीपी, बृहस का रूपा, शुक्रका मोती और शनैश्वरकी लोह द्रव्य कहाती है और अग्नि, ज स्व्रामिकार्त्तिक, विष्णु, इन्द्र, शची और ब्रह्मा ये सर्यादिकों के अधिदेवता हैं॥६३॥ मागिक्यादिज्ञानमाह- माणिक्यं दिननायकस्य विमलं मुक्काफलं शीतगो- माहेयस्य च विदमं मरकतं सौम्यस्य गारुत्मतम्। देवेज्यस्य च पुष्परागमसुराचार्यस्य वञ्रं शने- नौलं निर्मलमन्ययोश्च गदिते गोमेदवड्र्य्यके।। ६४॥ सूर्यका मासिक्य, चन्द्रमा का अमलमोती, मङल का मूंगा वा मरकत, बुधका गा त्मत, बृहस्पति का पुखराज, शुक्रका हीरा, शनैश्र का नीलम, राहुका गोमेड और वे का वैड्यर्य कहाता है॥ ६४ ॥ वस्त्राएयाह- स्थूलाम्वरं नूतनचारु चेलं कृशानुतोयाहतमध्यमानि। दढांशुकं जीर्णमिनादिकानां वस्त्राणि सर्वे मुनयो वदन्ति॥ ६५ ।। सूर्य का मोटा कपड़ा, चन्द्रमा का नया कपड़ा, मङल का सुन्दर कपड़ा, वुध रेशमी कपड़ा, बृहस्पति का फटा कपड़ा, शुक्रका मज़बूत कपड़ा और शनैश्र का पुरा कपड़ा समग्र मुनियों ने कहा है॥ ६५ । मागाद्यधीशानाह- प्रागादिका भानुसितारराहुमन्देन्दुविद्देवपुरोहिता: स्युः । शुकारचन्द्रज्ञसुरेज्यमन्दा वसन्तमुख्यर्त्वधिपा दगाणैः॥ ६६॥ सूर्य पूर्वका स्वामी, शुक्र आग्नय का, मङ्गल दक्षिण का, राहु नैर्न्रत्व का, शनैशर पश्चिम का, चन्द्रमा वायव्य का, बुध उत्तर का और बृहस्पति ईशान का स्वामी कहाता है और शुक्र, मङ्गल, चन्द्रमा, वुध, बृहस्पति और शनैश्वर ये दृगाणों से वसन्तादि ऋतुओं के अधिपति कहाते हैं यानी वसन्त का स्वामी शुक्र, ग्रीष्मका मङ्गल, वर्पाका चन्द्रमा, शरत् का वुध, हेमन्त का बृहस्पति, शिशिर का अधिपति शानैश्वर कहाता है॥ ६६ ॥ विमादिजातिक्रममाह- विप्रौ जीवसितौ दिनेशरुधिरौ भूपालकौ वैश्यरा- डिन्दुःशद्रकुलाधिपः शशिमुतो मन्दोत्तराणां पतिः। आदित्यामरमन्त्रिशीतकिरणा: सत्त्वप्रधाना ग्रहाः शुकज्ञौ सरजोगृणौ शनिधरापुत्रौ तमः स्वामिनौ॥६७॥ बृहस्पति व शुक्र ये ब्राह्मण कहाते हैं, सर्य व मङ्गल ये क्षत्रिय हैं व चन्द्रमा वैश्य- राज कहाता है, बुध शूद्रोंका स्वामी है और शनैश्रर अन्त्यजों का अधिपति है और सूर्य, गुरु, चन्द्रमा ये गरह सत्वगुणवाले कहाते हें शुक्र और वुध ये रजोगुणी व शनैश्वर, मङ्गल तमोगुणी होते हैं ॥ ६७ ॥ पुरुपादिज्ञानमाह- नराकारा भानुक्षितिजगुखः शुक्शशिनौ वधूरूपौ परादौ प्रकृतिपुरुषौ मन्दशशिजौ। वियत्क्षोणीतेजः पवनपयसामेव पतयः सुराचार्यज्ञारघुमशिसुतदेवारिसचिवाः ॥ ६८ ॥ सूर्य, मङल और वृहस्पति ये पुरुपसंज्ञक कहाते हैं शुक्र व चन्द्रमा स्त्रीसंज्ञक होते बुध और शनैश्र ये प्रकृति पुरुष होकर नपुंसक कहे जाते हैं और आकाश, पृथ्वी, वेज, पवन और जलों के अधिपति बृहस्पति, बुब,मङल, शनैशर व शुक्र कहातेहैं॥ ६८ ॥ मज्जादयधिपानाह- कक्ष्यायां क्रमशो दिनेशतनयाज्ज्योतिर्भचक्राश्रिताः दारार्कीज्यदिनेशशुऋशशभृत्तारासुताः कीर्तिताः ॥६६॥ कक्षा में क्रमसे सर्यपुत्र के सकाश से शनैयर, गुरु, मङल, सर्य, शुक्र, चन्द्रमा और सामुद्रिकशास्त्रस्य बुध ये ज्योतिर्भचक्र में टिके हुए प्रतीत होते हैं और मज्जा, स्नायु, बसा, अस्थि, श रुधिर और त्वचा इन्होंके स्वामी क्रमसे मङल, शनैश्वर, बृहस्पति, सूर्य, शुक्र, चन्द्र और वुध कहाते हैं॥ ६६॥ लवणादिरसादीनाह- लवणकटुकषायस्वादुतिक़ाम्लमिश्राः शशिरविशनिजीवारामुरेज्यज्ञनाथाः। रविकुजसितसौम्या मन्दजीवेन्दवश्च ॥ ७०॥ लवण, कटु, कपाय, स्वादु, तिक्क, अम्ल और मिश्र इन रसोंके चन्द्रमा, सूर्य, शा गुरु, मङ्गल, शुक्र और वुध ये अधिपति कहातेहैं और अयन, दिन, पक्ष, ऋतु, शब्द (बा मास और क्षण इनके सूर्य, मझल,शुक्र, बुध, शनि,गुरु और चन्द्रमा ये स्वामी कहेजाते हैं ७० उच्चादिज्ञानमाह- मेषो वृषो मकरषष्ठकुलीरमीनास्तौली च कुम्भभवनानि तदस्तनीचाः। नित्यांगना हर्मया मनुसारनीरसंख्यादिवाकरमुखादतितुडनाथाः॥७१ ५ २७ २० मेप, तृप, मकर, कन्या, कर्क, मीन, तुला और कुम्भ ये भवन सूर्यादिकों के उ कहाते हैं और उनके सातवें २ भवन नीचसंज्ञक होते हैं यानी तुला, दृश्चिक, कर्क, मीन मकर, कन्या और मेप ये सूर्यादिकों के नीच होते हैं १०-३-२८-१५-५-२७-२० इन अरंशों से मेपादिक परमोच्च होते हैं और इन्हीं पूर्वोक अंशों से तुलादिक परम नीच कहते हैं।। ७१ ।। मूल त्रिकोणणन्याह- मूजत्रिकोणा हरितावरक्रिया वधूधनुस्तौलिघटादिवा करात्। सितासितार्काद्गिरसां नखांशकास्त्रिकोणमादौ परतः स्वमन्दिरम्॥७२। सिंह, ृष, मेप, कन्या, धन, तुला और कुंभ ये सर्य से मूलत्रिकोण होते हैं श्र शुक्र, शनैश्चर, सूर्य और बृहस्पति के वीस अंश आदि में मूलत्रिकोणण होकर पीछे से अ पने घर को जाते हैं॥ ७२॥ वृपादिभागत्रयमुचमिन्दो मूलत्रिकोएं परतस्तु सर्वम्। मेपादिका दादशभागसंज्ञाः कुजस्य कोएं परतः शुभं स्यात्॥७३॥ वृपादि के तान शेश चन्द्रमा का उच्च कदाता है और पीछे का सारा मूलत्रिकोर पूवाद्ध द्वितीयाङ्क:। होता है और मेपादि के बारह अंश मङ्ल का मूलत्रिकोण होता है और पाछे का अपना घर होता है।। ७३॥ कन्यार्धमुच्चं शशिजस्य कोणं दशांशका: स्वर्क्षफलं शरांशः। कुम्भस्त्रिकोएं फणिनायकस्य तुङ्ग नृयुग्मं रमणीगृहं स्यात्।।७४॥ कन्या का आधा बुध का उच्च होता है व दश अश मूलत्रिकोण होता है व पांच अंश अपने राशिफल को देता है और कुम्भ राहु का मूलत्रिकोणण व मिथुन उच्च व कन्या अपना घर कहाता है।। ७४ ॥ ग्रहाणां फलविचारे विशेपमाह- ॥स्वोचचे पूर्णं स्वर्क्षकेर्द्ध सुहृद्धे पादं द्विड्भेऽल्पं शुभ खेचरेन्द्रः । नीचस्थायी नास्तगो वा न किंचिन्ननं पादं स्वत्रिकोणे ददाति॥७५।। अपने उच्चमें बैठा हुआ ग्रह पूर्णफल को देता है व अपनी राशि में टिका हुआ आधा फल देता है व अपने मित्र के घर में चौथियाई फल को देता है व शत्रु के घर में टिका हुआ थोड़ा फल देता है नीच व अस्तंगत हुआ ग्रह कुछ फल नहीं देता है और अपने मूलत्रिकोणण में बैठा हुआ ग्रह चौथियाई फल को निश्चय कर देता है।।७५॥ ग्रहाणां स्थानविशेषेण विफलत्वमाह- सभानुरिन्दुः शशिजश्रतुर्थे गुरुः मुते भूमिसुतः कुटम्बे। भृगुः सपते रविजः कलत्रे विलग्नतस्ते विफला भवन्ति ॥७६॥ सूर्यसमेत चन्द्रमा व बुध लग्न से चौथे में बैठा हो व बृहस्पति पांचवें घर में हो व मङल दूसरे घर में टिका हो व शुक्र छठे में बैठा हो और शनैश्चर सातवें घरमें बैठा हो तो वि- फल होते हैं॥। ७६॥ वालाद्यवस्थाज्ञानमाह- वालाद्यवस्थाः क्रमशो ग्रहाणामोजेसमेतद्विपसीतमाहुः । बाल: कुमारोऽथ युवा च वृद्धो मृतोलवानामृतुभिःक्रमेण॥ वालाद्यवस्थानुगुएं त्रजन्ति तत्पाककाले दिननाथमुख्याः।७७॥ विषम राशि में ग्रहों की वालादि अवस्थायें क्रम से होती हैं और सम राशियों में वे अवस्थायें उलटे क्रमसे हो जाती हैं बाल, कुमार, युवा, दृद्ध और मृत ये अवस्थायें छः शंशों से विपम राशियों में क्रम से होती हैं और मृत, वृद्ध, युत्रा, कुमार और वाल इस क्रम से सम राशियों में कहाती हैं इसलिये सूर्यादिक ग्रह उक्क अवस्थाओं के पाककाल में वालादि अ्रवस्थाओं के अनुरूप (समान) फल को प्रदान करते हैं।। ७७,।। सामुद्रिकशास्त्रस्य रव्यादिग्रहाणं स्वरूपाएयाह- प्रतापशाली चतुरस्देहः श्यामारुणाङ्गो मधुपिङ्गलाक्षः। पित्तात्मकः स्वल्पकचाभिरामो दिवाकरः सत्त्वगुणप्रधानः॥७८॥ पतापशाली, चौकोण देहवाला, काला व लाल अंगवाला, मीठे व पीले नपत वाला, पित्त स्वभाव को रखता हुआ थोड़े वालों से अभिराम होकर सूर्य सतोगुख प्रधान होता है॥ ७८ ॥। चन्द्रस्वरूपमाह- संचारशीलो मृदुवाक् विवेकी शुभेक्षणश्चारुतरः स्थिराङ्ग: । सदैव धीमांस्तनुवृत्तकायः कफानिलात्मा च सुधाकरः स्यात्॥७६। संचारशाली, कोमल वाग्विलासी, विवेकी, शोभन दृष्टिवाला, वड़ा सुन्दर व मजबू अंगों को धारता हुआ सदैव बुद्धिमान् व सक्ष्म गोलाकार आकारवाला, कफी व बा भकृतिवाला चन्द्रमा कहाता है॥। ७६॥ भौमस्वरूपमाह- क्रूरेक्षणस्तरुणमूर्ति दारशील: पित्तात्मकः सुचपलः कृशमध्यदेशः। संरक्नगौर रुचिरावयवः प्रतापी कामी तमोगुणरतस्तु धराकुमारः॥=० क्रूरदृष्टिवाला, तरुणमूर्तिधारी, उदारशाली, पित्तमकृतिवाला, महाचपल, श्षी कटिवाला, लाल व गोरे अंगोंवाला, कामी व प्रतापी होकर तमोगृगा में लगा हुछ मङ्गल कहाता है॥। ८० ॥ बुधस्वरूपमाह- दूर्वादलयुतितनु: स्फुटवाक कृशाङ्ग: स्वामी रजोगुणवतामतिहासलोलः। हानिप्रियो विपुलवित्तकफानिलात्मा सद्ः प्रतापविभवः शशिजश्च विद्वान् ।८१ ॥' दूर्वादल के समान शरीरवाला साफ़ वाण: का बोलनेवाला व दुबले शरीर क रखनेद्दारा रजोगुण वालों का स्वामी व इसने में चपल व हानि में प्यार कर नेहारा महा धनी, कफी, वादी व शीघ्र विभव प्रतापशाली होकर विद्वान् बुध कहाजाता है॥ ८१॥ बृहस्पतिस्वरूपमाह- बृहदुदरशरीरः पीतवर्ण: कफात्मा सकलगुणसमेतः सर्वशास्त्राधिकारी। कपिलरुचिकचाक्ष: सात्त्विकोतीवधीमान् छलघुनृपतिचिह्नश्रीधरो देवमन्त्री ॥। ८२ ॥ महोदर शरीरवाला, पीला, कफी, सर्वगुणों वाला, सकल शास्त्राधिकारी, पीली मांखों व बालोंवाला, सतोगुणी, अत्यन्त वुद्धिमान् अल्पराजचिह्न वाला होकर शोभा को धारता हुआ बृहस्पति कहाता है ॥। =२ ।। भृगुस्वरूपमाह- असितकुटिलकेश: श्यामसौन्दर्यशाली अतिपवनकफात्मा राजसश्रीनिधानः श्याम व टेढ़े केशवाला, श्यामतनुधारी, सौन्दर्यशाली समान व सुन्दर अ्ंगोंवाला, होभन आंखोंवाला, कामी, अतिवादी व कफी व रजोगुण की शोभाका निधान व सुख, ल व गुरों की खानि होता हुआ शुक्र कहाता है।। ८ ३ ।। शनिस्वरूपमाह- काठिन्यरोमावयव: कृशात्मा दूर्वासिताङ्ग: कफमारुतात्मा। पीनद्विजश्चारुपिशङ्गदष्टिः सौरिस्तमो बुद्धिरतोलसः स्यात् ॥४॥ कर्कशरोमों व अंगोंवाला, दुबला, काला, कफी, वादी, बड़े दांतोंवाला व सुन्दर ले नयनोंवाला व तमोगुण में बुद्धि को रखता हुआ शनैश्चर आलसी कहाता है॥।=४।। ग्रहवधमाह- अर्केण मन्दः शनिना महीसुतः कुजेन जीवो गुरुणा निशाकरः। सौम्येन शुक्रो सुरमन्त्रिणा बुधो बुधेन चन्द्रः खलु वध्यते सदा॥८५ ॥ सूर्य से शनैश्चर, शनैश्चर से मङ्गल, मङ्ल से बृहस्पनि, बृहस्पति से चन्द्रमा व बुध शुक्र व शुक्र से वुध व बुध से चन्द्रमा हमेशा वध किया जाता है॥। ८५॥ ग्रहाणांमित्रादीन्याह- मित्राणि भानो: कुजचन्द्रजीवाः शत्रू सितार्की शशिजः समानः। चन्द्रस्य मित्रे दिननायकज्ञौ समा गुरुक्ष्माजसितासिता: स्युः ॥=६॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य मङ्गल, चन्द्रमा,बृहस्पति ये सूर्य के मित्र हैं, शुक्र व शनैश्चर ये शत्रु हैं और बु कहाता है और सूर्य व बुध ये चन्द्रमा के मित्र हैं द गुरु, मङल, शुक्र व शनैश्चर ये कहाते हैं ॥ =६ ॥ आरस्य मित्राणि रवीन्दुजीवाश्रान्द्रीरिपुः शुक्शनी समानौ। सर्यासुरेज्यौ मुहदौ बुधस्य समाः शनीज्यावनिज्यास्त्वरीन्दुः॥ सूर्य, चन्द्र व बृहस्पति ये मङ्गल के मित्र हैं और वुध शत्रु है व शुक्र, शनैश्चर रु हैं व सूर्य, शुक्र ये बुध के मित्र हैं व शनि, गुरु व मङ्गल ये समान हैं और चन्द्रमा कहाता है॥। ८७ ॥ सूर्यारचन्द्रा सुहृदस्तु सूरेः शत्रू सितज्ञौ रविजः समानः। मित्रे शनिज्ञौ भृगुनन्दनस्येन्द्िनावरी जीवकजौ समानौ॥= सर्य, मङ्गल, चन्द्रमा ये बृहस्पति के मित्र कहाते हैं व शुक्र और बुध ये शत्रु हैं शनैश्चर समान (उदासीन) कहाता है व शनैश्चर, बुध ये शुक्र के मित्र हैं, चन्द्र सूर्य शत्रु हैं और बृहस्पति व मङल ये समान कहाते हैं॥ ८८॥ मन्दस्य सूर्येन्दुकुजाश्च शत्रवः समः सुरेज्यः सुहदौ सितेन्दुजौ। तत्कालनैसर्गिकतश्च पञ्चधा पुनः प्रकल्प्यास्त्वतिमित्रशत्रवः॥ सूर्य, चन्द्र और मङ्ल ये शनैश्चर के शत्रु कहाते हैं और बृहस्पति सम यानी सीन होते हैं शुक्र और वुध ये मित्र कहाते हैं और तात्कालिक नैसर्गिक मित्रता से मित्र व अतिशत्रु पांच प्रकार कल्पना करना चाहिये।। ८६ ॥ स्थिरादिसंज्ञान्याह- रविः स्थिरः शीतकरश्ररः स्यादुग्रः कुजश्चन्द्रसुतस्तु मिश्रः। मृदुः सुरेज्यो भृगुजो लघुश्र शनिस्तु तीक्ष्णः कथितो मुनीन्द्रैः।। सूर्य स्थिर, चन्द्रमा चर, मङ्गल उग्र, वुध मिश्र, बृहस्पति मृद्ु, शुक्र लघु औरर श्चर तीक्ष्णसंज्ञक मुनियों ने कहा है॥ ६० ॥ ग्रहाणमीक्षणमाह- पादेक्षणं भवति सोदरमानराश्योरर्ध त्रिकोणयुगलेखिलखेचराणाम् पादोनदृष्टिनिचयश्चतुरस्रयुग्मे सम्पूर्णदृग्वलमनङ्गगृहे वदन्ति॥8 तीसरी व दशवीं राशि में समस्त ग्रहों की पाददृष्टि होती है पँचयें व नवयें भ होती है चौथे व अठयें पादोनदृष्टि कहाती है और सतयें घर में संपूर्ण दृष्टि अ लोग कहते हैं।। ६१ ॥ पूर्वारद्धें द्वितीयाङ्क: । शनिरतिबलशाली पाददृग्वीर्ययोगे सुरकुलपतिमन्त्री कोणदष्टै शुभः स्यात्। त्रितयचरण दृष्ट्या भूकुमारः समर्थः सकलगगनवासाः सप्मे दग्बलाढयाः ॥ ६२ ॥ पाददृष्टि बल के योग में शनैश्चर अतिबलशाली होता है व कोरदृट्टिमें बृहस्पति भदायक होता है व तीन चरण की दृष्टि से मङ्गल समर्थ होता है और संपूर्ण ग्रह सातयें में दृष्टिवलसे संपन्न रहते हैं ॥ ६२ ॥। अथोर्ध्वदृष्टी दिननाथभौमौ दृष्टिः कटाक्षेण कवीन्दुमून्वोः। सूर्य व मङल ये दोनों ऊर्ध्वदृष्टिवाले कहाते हैं शुक्र व बुध ये कटाक्ष यानी नेत्रों की र से दृष्टि रखते हैं चन्द्रमा व बृहस्पति ये दोनों समभाग दृष्टिवाले होते हैं और राहु शनैश्चर की दृष्टि नीचे रहती है ।। ६३ ।। रव्यादिग्रहेभ्यः फलविचारमाह- सूर्यादात्मपितृप्रभावनिरुजाशक्किश्रियश्चिन्तये- च्चेतोबुद्धिनृपप्रसादजननीसंपत्करश्रन्द्रमाः। विद्याबन्धुविवेकमातुलमुहद्धाक्कर्मकृद्बोधनः ॥६४॥ आत्मा व पिता का प्रभाव, नैरोग्य, शकति और संपत्ति या शोभा को सूर्य से विचार मन, बुद्धि, राजा की मसन्नता, माता और संपदा को चन्द्रमा से विचारै वल,रोग, , भाई, भूमि, पुत्र और कुटुम्बी को मङल से विचार करै और विद्या, वन्धु, विवेक, ग, मित्र और वाक्कर्म को बुध से विचारना चाहिये।। ६४।। प्रज्ञावित्तशरीरपुष्टितनयज्ञानानि वागीश्वरा- त्पत्रीवाहनभूषणानि मदनव्यापारसौख्यं भृगोः । आयुर्जीवनमृत्युकारण विपत्संपत्पदाता शनिः संपेशौव पितामहन्तु शिखिना मातामहं चिन्तयेत्॥। ६५ ।। पज्ञा,धन, तनुपुष्टि, पुत्र और ज्ञान को बृहस्पति से विचारै, पत्री (स्त्री) वाहन वारी) आभूपण, कामकेलि, रोजगार और सौख्य को शुक्र से विचार करै आयु सामुद्रिकशास्त्रस्य रदाय, जीवन, मरणकारख, विपदा और संपदा का दाता शनैश्वर कहाता है व वाबा राहु से और नाना का केतु से विचार करै ॥ ६५ ॥ कारकानाह- दुमिरमरमन्त्री भूसुतःसोमसौम्यौ गुरुस्नितनयारौ भार्गवो भानुपुत्रः। दिनकरदिविजेड्यौजीवभानुज्ञमन्दाः सुरगुरुरिनसूनु: कारका: स्युर्विलग्नात्॥ ६६ ॥। सूर्य तनुकारक, बृहस्पति धनकारक, मङ्गत सहजकारक, सोम व वुध सुखकारक स्पति पुत्रकारक, शनैश्वर व मङ्गल शत्रुकारक, शुक्र स्त्रीकारक, शनैश्वर मृत्युकारक, सू गुरु धर्मकारक, गुरु, सूर्य, वुध व शनैश्वर राजकारक, बृहस्पति लाभकारक और श व्ययकारक यानी खर्च को कराता है ये लग्न से कारक होते हैं ॥ ६६ ॥ अरिष्टिदायकानाह- कामावनीनन्दनराशिजाताः सितेन्दुपुत्रामरवन्द्यमानाः। रिष्टदास्तेखिलजातकेषु सदाष्टमस्थः शनिरिष्टदः स्यात् ॥६७ सातवें घरमें मेप, वृक्षिक राशि में शुक्र, वुध और बृहस्पति बैठे हों तो समस्त जा में अरिष्टदायक कहाते हैं और शनैश्वर अरष्ट्मने बैठा हुआ हमेशह अभीष्टदायक होताहै॥ह ग्रहाणां शुभाशुभविचारे वर्पाएयाह- आकृत्यो २२ जिन २४ संमिता गजकरा २८ नेत्राग्नयः ३२ पोडश तच्वा २५ न्यङ्गुण ३६ द्विवेद ४२ प्रमिताः सूर्यादिकानां समाः। यः खेटः स्वगृहे स्वतुत्तभवने पड्वर्गशुद्धश्र यस्तस्याव्दे हि नृ भवेदतिमुख भाग्योदयं निश्चितम् ॥६८ ॥ सूर्य २२ वर्ष में फल देता है, चन्द्रमा २४ वर्ष में, मङ्गल २८ वर्ष में, बुध ३२ वर्ष बृहस्पति १६ वर्ष में, शुक्र २५ वर्षमें, शनैश्वर ३६ वर्ष में, राहु ४२ वर्ष में और केतु ४८ में फल देता है जो ग्रह अपने घर व अपने उच्चमें बैठा हो और जो ग्रह पह्वर्ग से हो उसीकी वर्ष में मनुष्यों को अतिसुख और भाग्योदय निश्चय कर होता है।। ह८। राहुदोषं बुधो हन्यादुभयोस्तु शनैश्ररः। त्रयाणां भूमिजो हन्ति चतुर्णां दानवार्चितः ॥ ६६ ।। पञ्चानां देवमन्त्री च षष्यां दोषन्तु चन्द्रमाः। सप्दोषं रविर्हन्याद्विशेषादुत्तरायणे॥ १०० ॥ बुध राहुदोप को विनाशता है व शनैश्चर दोनों के दोपों को हरता है, मङल चारों के दोपों को हरता है, बृहस्पति पांचों के दोपों को विनाशता है, चन्द्रमा छः ग्रहों के दोपों को हरता है और सूर्य सात ग्रहों के दोपों को विनाशता है परन्तु उत्तरायण में विशेषता से सातों ग्रहों के दोषों को हरता है॥ ६६। २००॥ रव्यादिकृतकष्टान्याह- मन्दाग्निरोगज्वखवृद्धिदीपनक्षयातिसारादिकरोग संकुलैः । सूप्य वृ त ऐो। नृपालदेवावनिदेवकिङ्करैः करोति चित्तव्यसनं दिवाकरः ॥ १ ॥ अग्निरोग, ज्वर की बृद्धि, ज्वर का दीपन, क्षय व अतीसार आदि रोगसमूहों से तथा राजा, देवता, व्राह्मण और किंकरों द्वारा सूर्य सदा चित्त में दोप को करता है ॥। १॥ चन्द्रकृतरोगानाह- पाएडुदोषजलदोपकामिलापीनसादिरमणीकृतामयैः। चन्द्रवृत सोग कालिकामुरसुवासिनीगपैराकुलं च कुरुते तु चन्द्रमाः॥२।। पाएडुदोप, जलदोप, कामिला, पीनस आदि रोग व नारियों से किये रोग कालिका, देवता और सुवासिनीगणों से चन्द्रमा मनुष्य को व्याकुल करता है॥ २ ॥ मङ्गलकृतदोपानाह- मंज ल नृत सोग वीरशैवगणभैरवादिभिर्भीतिमाशु कुरुते घरामुतः ॥ ३॥ स्थूलता, बीजदोप, कफ, हथियार, अग्नि व गिलटियों से उपजे रोग घाव व दरिद्रसे दा हुए रोग तथा वीरगण, शैत्रगण व भैरवादिगणों से मङ्ल शीघ्रता से भय को करता है॥ ३ ॥ वुधकृतदोपानाह- ुध्व्हृत रोग गुह्योदरादृश्यसमीरकुषं मन्दाग्निशूलग्रहणीरुगादयैः। बुधादिविष्णुप्रियदासभूतैरतीवदुःखं शशिजः करोति॥४ ॥ · गुदरोग, उदररोग, दृष्टिरोग, वातव्याधि, कुष्ठरोग, मन्दाग्नि, शूल, संग्रहणी आदि ोग तथा वुधादि विष्णु के मियदास माणियों से वुध अत्यन्तदुःख को करता है ।। ४। २६- सामुद्रिकशास्त्रस्य गुरुभृगुकृतदुःखान्याह- पडुस्पात वहत रोग आचार्यदेव गुरुभूसुरशापदोपैः शोकं च गुल्मरुजमिन्द्रगुरु करोति। कान्ताविकारजनिमेहरुगासुरादैः स्वेष्टङ्गनाजनकृतैर्मयमासुरेज्यः॥ ५ आचार्य, देवता, गुरु और ब्राह्मणों से दिये शाप दोपों से वृहस्पति शोक और गु रोग को करता है तथा स्त्रियों के विकारों से उपजे प्रमेहरोग व असुरादिकों व अप चाही अङ्गनाओं से किये दोपों से शुक्र भय को उपजाता है॥ ५ ॥ शनिकेतुकृतदुःखान्याह- शलकतोग दारिद्र्यदोपनिज कर्मपिशाचचौरेः क्वेशं करोति रविजः सहसन्धिरोगैः। कराडूमसूरिरिपकृत्रिम कर्मरोगैः स्वाचारहीनलघुजातिगपैश्र केतुः॥ ६ दारिद्रयदोप, अपने कर्म, पिशाच, चोर और सन्धिरोगों से शनैश्चर केश को कर है तथा खाज, मसूरिका, शत्रु, कृत्रिम कर्मरोग और अपने आचार से हीन छोटी जा वाले जनों से केतु कष्ट को करता है ॥ ६ ॥ राहुकृतदोपानाह- अपस्मार (मिरगी), मसूरिका, रज्जु, क्षुत् (छींक या क्षुधा), दृष्टिरोग, कीड़े, परेत,दि शाच, भृत, उद्बन्धन, अरुचि और कुष्टरोगों से राहु मनुष्यों को बड़ाभय करता है।७ हरिवंशो रविणा शशी त्रिपुरहा भौमे च रुद्री क्रिया सौम्ये सम्पुटचारीडका च विधिवज्जीवे च पैत्री तिथिः। शुक्रे गोप्रतिपालनं च कथितं मन्दे च मृत्युअयः कन्यादानभुजङ्गकेतुकपिलासन्तानसौख्यप्रदा ॥८॥। जो पुत्र के लिये सूर्य अरिष्टदायक हो तो हरिवंश का श्रवण करै व चन्द्रमा अरिष्टा यक हो तो महादेव का आराधन करै व मङ्गल अरिष्टदायक हो तो रुद्राभिपेक की क्रिद करै व बुध अरिष्टदायक हो तो विधान से संपुट चएडी का आराधन करै व बृहस्पि अरिष्टायक हो तो पितरों की तिथि में आ्रमान्नदान करै व शुक्र अरिष्ट्दायक हो दे गौतों का प्रतिपालन करै व शनै्र अिष्ठदायक हो तो मृत्युज्जय का आराधन करें राहु अरिष्टदायक हो तो कन्यादान करै और जो केतु अरिष्टदायक हो तो संतानसौरूप- दायिका कपिला गौका दान करै ॥ ८ ॥ आधयन्तमध्यफलदायकानाह- इलातनूजश्च पतिर्नलिन्याः प्रवेशकाले फलदः किल स्यात्। राश्यर्धभोगे भृगुजामरेज्यौ प्रान्ते शनीन्दू च सदेन्दुसनुः ॥६॥ मङल और सूर्य प्रवेशकाल में

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 3)

फलदायक होते हैं शुक्र व बृहस्पति मध्य में फल- दायक होते हैं शनैक्वर व चन्द्रमा आखिरी में फलदायक होते हैं और बुध हमेशा फल को देता है।। ६ ।। यद्धातुकोपजनिताखिलरोगशान्त्यै तन्नाथमाशु जपतर्पणहोमदानैः। संपूज्य रोगभयशोकविमुक्कचिन्ताः सर्वे नराः सुखयशोबलशालिनः स्युः॥१०॥ जिन ग्रहों के धातुकोप से अखिल रोग उपजे हों उनकी शान्ति के लिये जप, तर्पण, होम और दानों से उन ग्रहों के स्वामी को भलीभांति पूजकर संपूर्ण मनुष्य रोग, भय और शोक से विमुक्चिन्तावाले होते हुए सुखी व यशस्वी होकर वलशाली होते हैं॥१०॥ इति जातकपारिजाते ग्रहस्वरूपादि:॥ करतले दिग्ज्ञानमाह- यत्र चाङ्कलयः सन्ति तां दिशं विद्धि पूर्विकाम्। यत्रास्ति मणिवन्धोहि पश्चिमां विद्धि तां दिशम् ॥ ११ ॥ वृद्धाङ्गुलिस्तु यत्रास्ति चोत्तरां विद्धि तां दिशम् । क्षपाकरस्तु यत्रास्ति तां दिशं दक्षिणां विदुः ॥ १२॥। जहां अ्रँगुलियां रहती हैं उसको पूर्वदिशा जानिये व जहां मणिबन्ध (कब्ज़ा) विद्य- न रहता है उस दिशा को पश्चिम जानिये और जहां अँगूठा रहता है उसको उत्तर दिशा हानिये और जहां चन्द्रमा रहता है उसको पण्डितों ने दक्षिणा दिशा कहा है॥११।१२॥ फलानां तारतम्यमाह- यत्र यत्र स्थितःखेटस्तत्रस्थोपि यदा भवेत्। तदा शुभं फलं वाच्यमित्युकं गणकोत्तमैः ॥१३ ॥ ये ग्रहा, दक्षिणस्थाः स्युस्ते यदा चोत्तरे स्थिताः। सामुद्रिकशास्त्रस्य ये ग्रहा: पूर्वभागस्थास्ते यदा पश्चिमांगताः ॥१४॥ तदा फलं ग्रहा: सर्वे विपरीतं दिशन्ति वै। तारतम्यं फलस्यैवं विज्ञेयं विदुषां ग्रिये। १५ ॥। अरहो मिये ! करतल में जहां जहां ग्रह बैठे हैं वहीं यदि टिकेरहैं तो शुभ फल कहना हिये ऐसा सामुद्रिकवेत्ता पणिडतों ने कहा है जो ग्रह दक्षिण तरफ़ टिके हों वे यदि में बैठे हों और जो ग्रह पूर्वभाग में बैठे हों वे यदि पश्रिम में चले जावें तो समस्त विपरीत फल को देते हैं इस भांति फलों का तारतम्य (कम या ज़्यादः) पिडतों जानना चाहिये ॥। १३ । १५ ।। करतले रेखाज्ञानवाह- सौम्यादघस्तिष्ठति या सुरेखा संपूर्णरूपा यदि मध्यमान्ता। आयुष्यरेखां कवयः कुवन्ति संभोगरेखां प्रवदन्ति चान्ये॥ १६॥ बुध ग्रह के नीचे तरफ़ जो रेखा टिकी है वह यदि पूर्णरूप होकर मध्यमा पर चली गई हो तो उसको कवियों ने आयुरेखा कहा है और मतान्तर में अन्य कविल उसको संभोगरेखा कहते हैं ॥ १६ ॥ आयुष्यरेखातलगास्ति रेखा तां मातृरेखां कथयन्ति धीराः। तस्यास्त्वधस्तिष्ठति पितृरेखा तां केपि सन्तो विवदन्ति चायुः॥१७ आयुरेखा के नीचे जो रेखा विद्यमान रहती है उसको पसिडतों ने मातृरेखा कहा उसके नीचे पितृरेखा टिकी रहती है उसको भी कितेक विद्वानोंने आयुरेखा वतलायाहै॥१ मध्यांगता या मणिबन्धनोत्था रेखा यदा पाणितले विभाति। तामूर्ध्वरेखां सुधियो भणन्ति साम्राज्यदात्रीं धनधान्यदां च॥ १८॥ माग्यई ा यदि करतलमें मिबन्धन (कब्ज़े) से उठी हुई जो रेखा मध्यमा पर्यन्त पहुँच सोहती हो तो उसको वुद्धिमान् सामुद्विकवेत्तागणों ने ऊर्ध्धरेखा यानी भाग्यरेखा कहा जोकि साम्राज्य को प्रदान करती हुई धन धान्य को देती है ।। १८ ।। कुजान्तिकं या प्रतिभाति रेखा समागता सा मणिवन्धनान्तम्। ददाति वित्तं परपूरुषाणामतः परस्वाप्तिरियं प्रसिद्धा ॥ १६ ॥ परस्ापि जो रेखा मंगल के समीप सोहती है वह यदि कब्ज़े पर्यन्त चली आवे तो पर धन को देती है इसलिये परस्वापि इस नाम से प्रसिद्ध रेखा कहाती है ॥ १६ ॥( दे चित्र नं० ६) आयूरखा करतल भग्नरेखामाह- भग्ना यदा स्यात्परमायुरेखा डासं प्रयायान्मनुजस्य चायु: 1 रव मातुः सुरेखा परिकर्तिता चेन्मानो विनाशं समियान्नितान्तम्॥ २०॥ जिसके करतल में परमायुरेखा यदि भग्नरूप प्रतीत होतो उस प्राणी की आयु हासता (अल्पता) को पाती है और यदि मातृरेखा भग्न होकर कटीसी प्रतीत हो तो उस प्रारणी का मान जाता रहता यानी प्रायः अपमान हुआ करता है ॥ २०॥ पितुः सुरेखा यदि कर्तिता स्यात्तदा पितानाशमुपैति नूनम्। यदा भवेद्धिन्नतमस्वरूपा भयं भवेत्ताततनौ सुगाढम् ॥ २१॥ यदि पिता की रेखा कटीसी प्रतीत हो तो पिता निश्चय कर नाश को माप्त होता है और यदि पूर्वोक् रेखा भिन्नरूप होकर प्रतीत हो तो पिताके शरीरमें बड़ा भय होता है॥२१॥ संभिन्नरूपा यदि भाग्यरेखा भाग्यस्य हासं मनुजः प्रयाति। भग्यराा भग्ना यदा स्यात्परस्वाप्तिरेखा नो पारवित्तं लभते मनुष्यः ॥२२॥ यदि भाग्यररेा भिन्नरूप से प्रतीत हो तो प्राणी भाग्य की अल्पता को पाता है और यदि परस्वाप्ति रेखा भिन्नरूप होकर प्रतीत हो तो पाणी पराये धन को नहीं पाताहै।।२२।। (देखो चित्र नं० ७) करत ले परमायुरेखादिफलमाह- पितुः सुरेखां परमायुरेखां शताब्दसंख्याकृतमानयुक्काम्। श्रुतिप्रमाएं हृदये निधाय वदन्ति विप्रा बहुशास्त्रविज्ञाः ॥२३॥ अनेकानेक शास्त्रों के विज्ञाता वुद्धिमान् लोग वेदों के पमाण "शतंजीवाभि शरदः" को हृदय में धारकर पितृरेखा को सौ वर्ष की संख्या से किये प्रमाण से संयुक्क परमायुरेखा कहते हैं ॥ २३ ॥ आयुष्यरेखा यवमात्रभागं काष्ठाव्दसंजं प्रवदन्ति सन्तः। तन्मानतः स्यान्ु वयोविभागे कष्टादिकं चेति समूहनीयम् ॥२४॥ आयुरेखा के यवमात्रभाग को पश्डित लोग दश वर्ष की संज्ञावाला कहते हैं उसी प्रमाण से अवस्था के विभाग में कष्टादिक होते हैं इसीप्रकार समस्त रेखाओं में विचार करना चाहिये अर्थात् १ जौभर आयुरेखा दश वर्ष की होती है उसी प्रमाण से जहां नहां रखा कटी हो वहां वहां पीड़ा आदिकों का विचार करै ॥ २४ ॥ मातुः सुरेखा मिलिता यदा स्यान्नोजारजातं मुनयो वदन्ति। मातरेखा पित्रा वियुक्ा यदि मातृरेखा जारोद्धवं तं मनुजं करोति ॥ २५ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिसके करतल में मातृरेखा यदि पितुरेखा से मिली हुई प्रतीत हो तो उस पाणी मुनिलोग जारजात नहीं कहते हैं और यदि मातृरेखा पिता की रेखा से जुदी हो प्तीत हो तो उस पाणी को जारजात करती है अथवा पिता माता में जुदाई रहती है फल कहना चाहिये ॥ २५ ॥ संभोगरेखा बहुकर्तिता चेत्पूर्वोक्कमानेन विचारणीया। तस्यास्त्वधस्तिष्ठति बालभावस्ततो ह्यधो यौवनमेव ज्ञेयम् ॥ २६॥ यदि संभोगरखा अ्रपनेक स्थलों में कटीसी प्रतीत हो तो पूर्वोक मानसे यानी दश के हिसाब से फल को विचारना चाहिये उसके नीचे वालभाव (वालपन) रहत और उसके नीचे यौवन (युवापन) जानना चाहिये यानी जवानीपन वालपन के सदैव टिका रहता है॥ २६॥ तस्मादधस्तिष्ठति वृद्धभावो नोभिन्नरूपो नहि कर्तितः स्यात्। तत्तत्सुकाले शुभदो जनानामेवं बुधैः सर्वफलं विचिन्त्यम्॥ २७॥ उसके नीचे दृद्धपन (वूढ़ापन) रहता है जो कि भिन्नरूप व कटा हुआ नहीं हो अपने अपने समय में मनुष्यों को शुभदायक होता है इस प्रकार पशडितों को सम फल विचारना चाहिये।। २७ ॥। (देखो चित्र नं० ८) एकादशलक्षणयुतकरतलफलमाह- ३सभोगरेखा यदि याति मध्यां शाखाविहीना नहि तत्र लग्ना। नैजेन दोषेण समाकुलात्मा यायाज्नो मृत्युमुखं नितान्तम्॥ २८॥ जिसके करतल में संभोग रेखा (आयुरेखा) यदि मध्यमा पर्यन्त चलीजावे जो शाखाओं से विहीन होकर उस मध्यमा में संलग्न न हो तो वह माणी अपने ही दो व्याकुल आात्मावाला होता हुआ अतिशय मृत्यु के मुख में जाता है ।। २८।। नही र मातुस्सुरेखा यदि खरिडता सा चापानुरूपा समियात्मुभोगाम्। मानापमानेन युतो जनः स्यादात्मापघाती कथितः सुधीभिः॥२६॥ यदि माताकी रेखा खएिडित होजावे और वही यदि धनुपाकार होकर भोगरेखा के रु मने पहुँच जावे तो वह प्राखी मान व अपमान से संयुक्त होता है और उसको परिडतों आत्मघाती कहा है ॥। २६॥। ३ छिद्रद्येनापि युता यदा स्यात्संभोगरेखा परिपूर्णदेहा। कट्यातियुक्ं मनुजं करोति दौर्वल्यगात्रं हयदरामयं तम् ॥ ३०॥ पूर्वार्धे द्वितीयाङ्क: । यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) परिपूर्णरूपवाली होती हुई दो छेदों से संयुक्क होवे तो रज पकर उस प्राणणी को कमर की व्याधि से युक्र, दुर्बलगात्रवाला व पेट का रोगी करती है ॥३०॥ ४ रेखाविहीना यदि मातृरेखा मिथ्याप्रलापी मनुजस्तदा स्यात। माहरल नैष्टर्यभावेन युतः सलोभो वासो भवेत्तस्य च दूरदेशे॥३१॥ यदि मातृरेखा रेखाओं से विहीन हो यानी शाखाओं से रहित हो तो वह प्ाणी मिथ्याभापीव लोभी होकर निघठुरता से संयुत रहता है और उसका बास दूर देश में होता है यानी वह माणी कठोर चित्तवाला होता हुआ परदेश में बसता है॥ ३१॥ ५. भाग्यस्य रेखा यदि स्वल्पगा स्यात्पितुः सुरेखा खलु वेत्ररूपा। प्राज्यरखा तदन्तरं यत्प्रतिभाति सम्यक तदा भवेन्मूढतमो व्ययी ना ॥ ३२ ॥ यदि भाग्यरेखा छोटीसी प्रतीत हो व पिता की रेखा निश्चय कर बेंत के समान देखी नावे और उन दोनों का अन्तर (मध्यभाग) भली भांति सोहता हो तो वह माणी वर्चीला होकर महामूर्ख होता है॥ ३२ ॥ यदा भवेन्मध्यमिकामुमूले रेखाद्यं कुद्रतरस्वरूपम्। तदा जनं चातिश्रमं करोति शोकाकुलं तापयुतं च खर्वम् ॥ ३३ ॥ यदिं मध्यमा के मूल में छोटे रूपवाली दो रेखायें प्रतीत हों तो उस प्राणी को परिश्रमी, शोक से व्याकुल, तापयुत व सर्वकार्य में अल्पता रखनेवाला करती हैं ॥ ३३ ॥ 9 यदा भवेत्तर्जनिकामुमूले रेखाद्रयं क्षुद्रतमं विभिन्नम्। तदा शिराघातयुतो जनः स्यात्पापाणकार्ये बहुलाभकारी।३४।। यदि तर्जनी अँगुली की मूल में छोटी व कटी होकर दो रेखायें प्रतीत हों तो वह पाणी त्थे के आघात से संयुत होकर पत्थरों के कार्य में पड़कर महालाभकारी होता है ॥३४॥ मातुः सुरेखा यदि मध्यभिन्ना वियुकरूपा खलु पितृरेखा। मानदेखना तदन्तरे भाति त्रिकोणचिह्नं संखरिडतं चेजनकस्य हन्ता॥ ३५॥ यदि माता की रेखा बीच में कटीसी प्रतीत हो व पिता की रेखा जुदी होकर टिकी हो र उन दोनों के बीच में खएिडत होकर त्रिकोणकार निशान सोहता हो तो वह माी पने पिता का मारनेवाला होता है यानी पितृहन्ता इस नाम से विख्यात होताहै॥३५॥ अनामिकामूलगतं सुचिहनं गकाररूपं नहि तत्र लग्नम्। चौर्ये रतं तं मनुजं करोति चित्ते कृतघ्नं चपलस्वभावम्॥ ३६॥ यदि गकाररूप होकर सुव्यक़ चिह्न अनामिका की मूल में प्राप्त हो परन्तु वहां लगा सामुद्रिकशास्त्रस्य हुआ न प्रतीत हो तो उस माणी को चौरकर्म में रत चित्त में. कृतन्नी व चपल स्वम वाला करता है॥ ३६॥ १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं कञ्जानुरूपं वसुपर्णगं स्यात। वाल्ये च मध्ये च तथा च वृद्धे वित्तस्य वृन्दं लभते मनुष्यः॥३७॥ यदि कमल के आकार, आठपत्तोंवाला, सुव्यक्न चिह्न चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त तो वह प्राणी वालापन, युवापन और वृद्धापन में धनसमूहों को पाता है॥ ३७ ॥। X ११ पितुः सुरेखोपरिगं विशुद्धं चिह्नं गुणाख्येन युतं यदा स्यात। कार्योन्नतं तं पुरुषं करोति संनष्टववित्तं विगतासनं च । ३८ ।। यदि गुणनामक निशान से संयुत होकर विशुद्ध (साफ़) चिह्न पिता की रेखा ऊपर विराजता हो तो उस माणी को कार्यों में उन्नत, भलीभांति नष्ट धनवाला व यत पदाधिकारवाला करती है ।। ३८ ॥। (देखो चित्र नं० ६) १ पित्रोः मुरेखे नहि संगते चेद्रेखाद्धयेनापि युते च खशिडते। कर्तव्यकार्ये सरलं सुबोधं धत्तो जनं तं विगताखिवृन्दय् ॥ ३६ ॥ मातृरेखा, पितृरेखा ये दोनों आपस में मिली न हों व दो रेखाओं से संयुत होकर रखाओं से खणिडत देखी जाबें तो उस प्राणी को कर्तव्य कार्य में सीधा व भला जान वाला व बिना शत्रु समूहोंवाला करती हैं ॥ ३६ ॥ २ कनिष्ठिका मूलगता यदा स्यूरेखाः सुक्षुद्रा बहुला विपूर्णाः। विश्वासहीनं पुरुषं करोति चौर्ये रतं घोरतरं दरिद्रम् ॥ ४० ॥ जिसके करतल में कनिष्ठा की मूल में यदि छोटी व कटी होकर अनेक रेखायें म्रती ही.तो-उसे माणी को विश्वाससे हीन, चौरकर्ममें परायण, भयंकरव दरिद्री करतीहैं॥४: ३ अनामिकामूलगता यदैका रेखा सुपूर्णा Sपविखरिडता स्यात्। व्युत्पन्नबुद्धिं विमलस्वभावं कुर्यान्नरं तं महदाश्रयं च् ॥४१॥ यदि एक रेरा पूर्ररूप व वज्र से नहीं खिडत होकर अनामिका की मूल में होती हुई देखी जावे तो उस माणी को शास्त्रों में व्युत्पन्नवुद्धि, उत्तम स्वभाववाल। राजा महाराजों के आश्रित रखती है और यदि पूर्वोक रखा वज्र से खलिडत हो उक् फल का अभाव होता है ॥ ४१॥ ४ अङ्गश्ठमध्ये विशदा सुरेखा रेखात्रयेणापि विखरिडतास्यात्। सद्वंशजातं मनुजं करोति सद्ंशहीनं यदि लम्बमाना । ४२ । यदि अँगूठा की मूल में स्पष्टरूपवाली एक रेखा तीन रेखाओंसे कटीहुई प्रतीत हो तो उस पाणी को अच्छे वंश में उपजा हुआ करती है और यदि पूर्वोक रेखा तीन रखाओं से लढकी हुई देखी जावे तो उस पाणी को अच्छे वंशवाला नहीं करती है ॥। ४२॥ ५. मातुः सुरेखा यदि नीचभागे संकर्तिता पुच्छयुता भवेनु। मात हाखवा धर्मेण हीनं मनुजं करोति पापे प्रवृत्तं पुरुषाधमन्तम् ॥४२ ॥ यदि माता की रेखा नीचे तरफ़ कटी व पूंछ से संयुत होकर प्रतीत हो तो उस माणी को धर्महीन, पापपरायख व पुरुषों में अधम करती है यानी वह पाणी अधर्मी व पापी होकर पुरुपों में महानीच गिना जाता है ॥ ४३॥ ६ संभोगरेखा यदि नीचदेशे संखिडता चत्पृथगा विभाति। सभोग रखा पुत्रैवियुक्ं पुरुषं करोति रक्ाधिकं रोगयुतं विमूढम् ॥४४॥ यदि संभोगरेखा (आ्ायुरेखा) नीचेकी ओ्र्प्रोर खसिडत व अ्र्प्न्तर (फ़ासिला) को माप्त होती हुई सोहती हो तो उस माणी को सन्तानहीन, अधिक रक़वाला, रोगी व विशपता से मूर्ख रखती है ॥ ४४॥ ७संभोगरेखोपरिंगं यदा स्याद्रेखाद्यं तर्जनिकामुमूले। संभोग व्याजेन युक्नं ध्रुववाक्यहीनं कर्याज्जनं चातिश्रमं सुदुःखम्॥ ४५ ॥ यदि संभोगरेखा के ऊपर मिली हुई दो रेखायें तर्जनी की मूल के सामने प्रतीत हों तो उस प्राणी को कपटी, स्थिर वाक्वहीन, महापरिश्रमी व दुःखी रखती हैं॥ ४५॥ ८ संभोगरेखा यदि मध्यभागे वज्रास्ययुक्का च गभीररूपा। संभोग कुर्यान्नरं तं परुपस्वभावं नीचेन साकं कलहे प्रवृत्तम् ॥ ४६।। यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) मध्यभाग (बीच) में वज्र के मुख से संयुत होकरं गहरीसी प्रतीत हो तो उस माणी को कठोर स्वभाववाला व नीचों के साथ लड़ाई लड़ने में लगाये रहती है यानी वह पाणी कठिन हृदयवाला होकर अधम जातियों से बखेड़ा रखता है।। ४६॥। ६पितु: सुरेखोपरिगं यदा स्यादेखाद्दयं रेखयुगेन भिन्नम्। भार्यासमूहेन युतं करोति भार्याविहीनं बहुखरिडतं चेत्॥। ४७ ॥ पिता की रेखा के ऊपर दो रेखाओं से खएिडत होकर दो रेखायें प्रतीत हों तो उस प्राणी को भार्यासमूहों से संयुक्त रखती हैं और यदि पूर्वोक् दोनों रेखायें अ्रपरनेक रेखाओं से खणडत होकर प्रतीत हों तो उस प्राणी को भार्याविहीन कर देती है॥ ४७॥ x सामुद्रिकशास्त्रस्य १० मातुः सुरेखा यदि मध्यदेशे वज्रास्ययुक्का च विभिन्नरूपा। वाग्वञ्रयुकं मनुजं करोति पौरोहितेनापि विवादवन्तम् ॥४८॥ यदि मातृरेखा मध्य भाग (बीच) में वज्रमुख के निशान से युक्त होकर कटीसी तीत हो तो उस पाखी को कठोरवाखी वाला व पुरोहित से झगड़ा रखनेवाला रस है यानी वह पाशणी अपने पुरोहित से लड़ाई रखता हुआ कठोर वाणी को बोलता है।४= ११ अङ्गश्ठमूले विशदं यदा स्याद्रेखाचतुष्कं च पृथकस्वरूपम्। चित्ते कृतन्नं मनुजं करोति व्यायामसक्कं विविधार्तियुक्कम्॥४६॥। यदि अँगूठे की मूल में चार रखायें स्पष्ट होकर अ्पलग अप्रलग देखी जावें तो उस मार्ग को चित्त में कृतन्नी व कसरती व अनेकानेक पीड़ाओं से संयुक्क रखती हैं यानी वह प्राए अकृतज्ञ होकर कसरत करता हुआ अनेक रोगों से घिरा रहता है ।। ४६॥। १२ स्यातां गते मध्यमिकासुमूले रेखे सुरेखाद्यखसिडते चेत्। शूलाख्यरोगेण युतं दधाते कारुरयहीनं विकल जनं तम् ॥ ५० ॥ यदि मध्यमा की मूल में दो रेखायें दो २ रेखाओं से खएिडत होकर गतीत हों तो उ माणी को शूलपीड़ा से युक्क दयाहीन व विकल रखती हैं यानी वह माणी विकल हो हुआ करुणारससे विहीन होकर शूलपीड़ा से पीड़ित बना रहता है॥ ५० ॥ १३ सर्वाङ्गलीनां प्रथमे परुष्के कुम्भाख्यलग्नं यदि राजते तु। तदा जनो मज्जति वारिराशौ विमुकसंगो विरहातुसश्र॥। ५१ ॥ यदि समस्त अँगुलियों की पहली पर्त में कुम्भराशि का स्वरूप सोहता हो तो व माणी संग से रहित होकर विरह से व्याकुल होता हुआ तालाव व नदी आदिकों में हु जाता है ॥ ५१ ॥ (देखो चित्र नं० १०) तरखा १ पित्रा वियुक्का यदि मातृरेखा रेखात्रयेणापि युता च भिन्ना। हत्यासहस्त्रेण युतो जनः स्याद्वीपान्तरं चैति कटम्बशञुः॥५२॥ यदि माता की रेखा पिता की रेखा से जुदी होकर तीन रेखाओं से संयोग करती हु कटीसी प्रतीत हो तो वह माणी हज़ारों हत्याओं से युक्त होता है और भाई वन्धुओं से विरो होकर निज देशको त्यागता हुआ दूसरे द्वीप को चला जाता है॥ ५२॥ २ मातस्मुरेखा यदि पर्वभागे रेखाद्येनापि विकर्तिता स्यात्। तदा जनो गच्छति दूरदेशं चान्यायकार्ये समुपैति घातम्॥ ५३ ॥ यदि माता की रेखा पूर्वभाग में दो रेखाओं से कटीसी प्रतीत हो तो वह प्राणी दूर देश को जाता है और अन्यायकार्य में आघात को पाता है यानी वह माणी दूर देश में जाकर अन्याय से मारा जाता है॥ ५३॥ ३ प्रदेशिनीमूलगतं विशुद्धं चिह्न धनाख्येन युतं यदा स्यात्। पदोन्नतिं वै लभते मनुष्य: शिल्पे प्रवीणो व्यवसायमान्य: ॥५४॥ + यदि धन नामक + निशान से युक् होकर साफ़ चिह्न तर्जनी की मूल में देखा जावे तो वह पाणी अपने अधिकार की उन्नति को पाता है और शिल्पकार्य में प्रवीण होकर रोज़गार से माननीय होता है॥ ५४ ॥ ४ मध्यापरुष्कं तृतयं विलङ्ध्य रेखा विमिश्रा यदि याति भोगाम्। कारागृहे वासमुपैति प्राणी श्यामा सुरेखा यदि चैति मृत्युम्॥ ५ ५॥ मध्यमा की तीसरी पर्व (पोर) को नांघकर कुद्ररेखा से मिली रेखा संभोगरेखा के सामने यदि प्रतीत हो तो वह माणी कारागार (जेलखाने) में वास करता है और यदि पूर्वोंक रेखा कालीसी प्रतीत हो तो मृत्यु को पाता है॥ ५५॥ ५ निशाकरस्थानगतं सुचिहं कुम्भस्वरूपं यदि शोभते तु। फफस्ंसाव तदा जनो मजति तोयराशौ श्लेष्मस्वभावो बहुपीडितश्च ॥५६॥ यदि कुम्भलग्न का स्वरूप होकर शोभन चिह्न चन्द्रमा के स्थान में सोहता हो तो वह माणी जलमें डूबता है और कफीला होकर अनेकानेक रोगों से पीड़ित होता है यानी वह पाणी घनी व्याधियों से घवड़ाता हुआ कफी होकर नदी आदिकोंमें डूब जाता है।५६॥ ६ पितु: सुरेखा मणिबन्धमेति पीना विशाखा परिपूर्णरूपा। पितरेखा मातापितृभ्यां परिवञ्चितस्सन्नापोति जन्तुर्विफलं समस्तम् ॥।५७॥ यदि पिता की रेखा मोटी व विगतशाखावाली होती हुई पूर्णरूप होकर मणिबन्ध (क्रब्जे ) पर्यन्त चली जावे तो वह पाी माता पिताओं से छला हुआ समस्त विफल को पाता है॥। ५७ ॥ ७ मातुस्सुरेखा निकटे यदा चेन्नाक्षत्रचिह्नं विशदं विभाति। तदा जनो भूपतिवल्लभस्स्यात्स्वज्ञातिव्रन्दे समुपैति मानम् ॥५८॥ जिस्न समय मातृरेखा के समीप साफ़ होकर नक्षत्रचिह्न यदि सोहता हो तो वह भाणी राजा का प्यारा होता है और अपनी जातिसमूह में मान को पाता है यानी वह भाशी अपने वंश में मतिष्ठित होता है॥ ५=॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य = अङ्गुप्ठपूले समकोणचिह्नं रेखाद्येनापि युतं यदा स्यात्। तदा जनो मज्जति वारिराशौ स्वल्पं धनं विन्दति सर्वकाले॥ ५६॥ यदि दो रेखाओं से संयुक्क होकर समकोग का निशान अँगूठा की मूल में देखा तो वह पाणी जल में डूबता है और सव कालों में थोड़ा सा धन पाता है॥ ५६॥ ६ मातुस्सुरेखा यदि नीचदेशे समानभावेन नतोभयत्र। मानेन युक्को मनुजस्तदा स्यात्पदाधिकारी जनवल्लमश्च॥ ६० ॥ यदि माता की रेखा नीचभाग में समानभाव से दोनों तरफ़ लचीसी प्रतीत हो वह प्राणी मान से संयुत व पदाधिकारी होकर जनों का प्यारा होता है यानी लोक उस प्राणी की बड़ी पतिष्ठा होती है और वह किसी ऊंचे अधिकार में नियत होता है उसको सर्वजन चाहते हैं ॥ ६० ॥ १० भाग्यस्य रेखा मिलिता जनन्यां संकोणचिह्ेन युता यदा स्यात। भाग्य रकाशुद्धया विहीनं मनुजं करोति वादे प्रवृत्तं बहुलामयं च । ६१। यदि भाग्यरेखा (ऊर्ध्बरेखया) माताकी रेखामें मिलकर कोणचिह्नसे संयुक्त देखी ज तो उस प्राण्ीको बुद्धिहीन बड़ा झगड़ाल् व अ्नेक रोगोंवाला बनाये रखती है॥ ६१ ११ भाग्यस्य रेखा निकटे विभाति चिह्नं चतुष्कोणयुतं त्रिपर्णम्। निर्वोधरूपो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा। ६२ यदि भाग्यरेखा के समीप चार कोनों से संयुत होता हुआ तीन दलोवाला निशा सोहता हो तो वह प्राशणी ज्ञानहीन होता है और यदि स्त्री के करतल में पूर्वोक निश देखा जावे तो वह व्यभिचारिणी होती है॥ ६२ ॥ १२ अनामिकामूलगता सुरेखा स्थूलस्वरूपा कुटिला यदा स्यात। प्रसूतिकाले रमणीगणानां मृत्युं प्रदद्याङ्गयदा जनानाम्॥ ६३ ।। यदि शोभनरेखा मोटी व टेढ़ी होकर अनामिका की मूल में प्रतीत होवे तो प्रसू काल में नारीगणों को मृत्यु देती है और यदि पुरुपों के करतल में पुर्वोक रेखा दे जावे तो उनको भयदायक होती है ॥ ६३ ॥। १३ कनिष्ठिका मूलगता यदा स्यू रेखा विशुद्धास्सरलाश्च तिसतरः। सर्वेषु कार्येष महाप्वीणो भत्वा च वित्तं लभते मनुष्यः ॥ ६४॥ यदि कनिष्टा की मूल में साफ़ व सीधी होकर तीन रेखायें प्रतीत हों तो वह पार समस्त कार्यों में बड़ा चतुर होकर धन को पाता है यानी वह ाणी सर्वकार्यों के करने में समर्थ होता हुआ धन का लाभ उठाता है॥। ६४ ॥ १४ प्रदेशिनीं चापि विलङ्च्य रेखा पूर्णा विशाखा यदि भाति भोगा। यावजनो जीवति जीवलोके हत्याप्ुतो भीतियुतश्र तावत् ॥ ६५ ॥ यदि प्रदेशिनी (तर्जनी) को नांघकर भोगरेखा पूर्णरूप होकर विगतशाखावाली पतीत हो तो वह पराणणी जब तक जीवलोक में जीता है तब तक हत्याओं से घिरा हुआ यभीत रहता है।। ६५ ॥ (देखो चित्र नं० ११) १ पित्रा वियुका यदि मातृरेखा प्रदेशिनीमूलगता विभाति। मात रेखं अर्थप्रणाशं लभते मनुष्यश्चानन्दहीनो भ्रमते नितान्तम् ॥६६॥ जिसके करतल में पिता की रेखा से वियुक् होकर मातृरेखा यदि तर्जनी की मूल में सोहती हो तो वह भाणी धन के नाश को प्राप्त होता है और आनन्द से हीन होकर भू-/ ल में बहुत ही घूमता है॥ ६६ ।। २ समुत्थिता चेन्मणिवन्धदेशाद्रेखा विभिन्ना समुपैति काव्यम्। तदा महात्मा मनुजः सुचेताः सत्ये रतः स्याद्यवहारहीनः॥६७॥ यदि मणिबन्ध (कब्ज़े ) के स्थान से उठी हुई रेखा कटीसी होकर शुक्र के समीप चली जावे तो वह पाी महात्मा व शोभन मनवाला होता हुआ व्यवहारों से हीन हो- कर सत्य में परायण रहता है।। ६७ ।। ३ भिन्नत्रिकोन युता सुपूर्णा भाग्यस्य रेखा यदि याति भोगाम्। तदा स्वदेशे मृतिमेति जन्तुः संखरिडता चेत्पतितो महोचात् ॥ ६८॥ कटेहुए त्रिको से युक्र व पूर्ण होकर भाग्य की रेखा यदि भोगरेखा में मिल जावे ते वह भाणी अपने देश में माँत को पाता है और यदि भाग्यरेखा भलीभांति खएिडत शोकर प्तीत हो तो वह पाणी बड़े ऊंचे स्थान से गिरकर मरजाता है॥ ६८ ॥ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशकात्पितु: सुरेखा यदि याति तर्जनीम्। पित् तदा जनो गच्छति दूरदेशकं नामोति वित्तं भ्रमते भयार्तकः ॥ ६६॥ यदि मणिबन्ध (करब्जे) की जगह से उठी हुई पिता की रेखा तर्जनी पर्यन्त ली जावे तो वह ाणणी दूर देश को जाता है परन्तु धन को नहीं पाता है इसलिये य से घघड़ाता हुआ घूमता है॥ ६६ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ५. अनामिकामूलगतं सुचिह्नं नक्षत्ररूपं विशदं विभाति। संपत्तिसङ्नैः सहितो नरः स्यादापोति वित्तं बहुबन्धुसौख्यस्।७। यदि नक्षत्ररूप (नखत के आकार) शोभन चिह्न साफ़ होकर अनाभिका की मू लगा हुआ सोहता हो तो वह माणणी संपदासमूहों से घिराहुआ बहुतसे धन व वन्धु सें को पाता है।। ७० ।। नश पनगरखा यदि याति तर्जनीं शाखाविहीना मिलिता च भाग्यक। दौर्भाग्यवन्तं मनुजं करोति सा तीक्ष्णास्त्रघातेन मृति ददाति वै॥७ यदि संभोगरेखा भाग्यरेखा से मिलाप करती हुई शाखाओं से विहीन होकर त पर्यन्त चली जावे तो उस पाणी को वुरे भागवाला बनाती है और तीक्ष्ण अ्रस्ाघा मौत को देती है।। ७? ॥ ७ मातु: सुरेखा यदि नीचदेशे समायुता चोर्मिकया विभाति। दारिद्र्यदोषेण युतो जनः स्याद्गुह्यामयो गौरवभावशन्यः।।७२।। यदि मातूरेखा नीचे तरफ़ मुँदरी के निशान से संयुक्त होकर सोहती हो तो वह प्र दारिद्रय दोष से घिरा व गुह्यदेश में रोगवाला होता हुआ गौरव (गुस्ता) से खा रहता है।। ७२।। = अनामिकामध्यमिकासुमध्यं हयणाख्यचिह्वेन युतं यदा स्यात्। तदा जनो निष्ठरतासमेतो दीर्घेष क्रोधेन परिप्तः स्यात् ॥७३॥ अरनामिका व मध्यमिका का बीच ऋण नामक चिह्न से संयुत होकर प्रतीत हो तो पाणी दीर्घ (बड़े भारी) क्रोध से घिरा हुआ निषठुरता से संपन्न रहती है।। ७३।। निशाकरस्थानगता गभीरा रेखा यदैका जननीमुपैति। तदा जनो निन्दनहासकारी धर्माधिपे वित्तधरो दयी चेत् ।।७४।। चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुई एक रेखा गहरी होकर यदि मातृरेखा के समीप च जावे तो वह प्राणी निन्दा को करता हुआ हँसता रहता है और यदि दो रेखायें म रेखा के समीप चली जावें तो वह प्राणी धर्माधिप में धनको धारता है॥ ७४॥ १० पितुस्सुरेखोपरिगं यदा स्याद्ृत्तार्धचिह्नं परिपूर्णरूपम्।४० तदा जनस्तिष्ठति स्वस्य गेहे भयप्रदः स्यात्परिवारवर्गे॥ ७५॥ यदि पिता की रेखा के ऊपर प्राप्त हुआ अर्धवृत्त का निशान परिपूर्णरूप से देखाज तो वह पराणी अपने घर में ही टिका रहता है और अपने परिवारसमूह में भयदा होता है।। ७५॥ ११ भाग्येन युक्का विशदा सरक्ा प्रदेशिनीं याति सुभोगरेखा। संभोगरर तदा जनो ब्रह्मविचारसारो जितेन्द्रियः स्यानु विरक्रचित्तः॥ ७६॥। यदि सुभोगरेखा भाग्यरेखा से संयुत, साफ़ व लाल होकर तर्जनी पर्यन्त चली जावे ो वह पाणी ब्रह्म का विचार करता हुआ जितेन्द्रिय होकर विरक्त चित्त रहता है॥७६॥ १२ महीसुतस्थानगतं सुचिह्नं खङ्गानुरूपं नहि याति मध्यम्। मिथ्याप्रलापी मनुजस्तदा स्याल्लोभी धनेप्मुर्धतिघर्महीनः॥७७॥ यदि मङ्ल के स्थान में पाप्त हुआ तलवार के समान होकर शोभन चिह्न करतल के बीच को नहीं नांघै तो वह माणी मिथ्याभापी, लोभी व धनाभिलापी होकर धारणा व र्म से हीन रहता है।। ७७ ।। ३ पितः सुरेखोत्थितचच्विरूपया संकर्तिता स्याज्जननी सुरेखया। वैयक तदा जनो दुर्वलदेहधारकः प्ीहादिरोगैर्नितरां प्रपीडितः॥७८॥ यदि पिता की रेखा से उठी हुई चूल्हे के समान आकारवाली शोभन रेखा से कटी अतुरेखा प्रतीत हो तो वह माणी दुर्बल देहधारी होकर सीहा व यकृत् आदि रोगों से अति- परिड़ित रहता है।। ७= ॥ (देखो चित्र नं० १२ ) १ संभोगरेखा यदि कर्तिता स्यात्तस्याः सुशाखा समुपैति मध्याम्। संभोगरव सन्तानग्रीतो मनुजस्तदा स्याद्धामी सुनामी व्यवसायपूर्ण:।।७६।। यदि संभोगरेखा (अस्मददेशीय आयुरेखा) कटीसी प्रतीत हो और उसकी शाखा व्यमा पर्यन्त चली जावे तो वह सन्तानों पै मसन्न रहता हुआ धामी व बड़ानामी हो- र रोजगार से पूर्ण होता है॥ ७॥ या प्रात् जा लेंनिर्क्ाप २ पितुः सुरेखोत्थितभाग्यरेखिका मध्ये गभीरा समुपैति मातरम्। अशीतिवर्षप्रमितं सुजीवनं लब्ध्वा जनश्रैति मृतस्य वित्तकम्॥८०।। पिता की रेखा से उठी हुई भाग्यरेखा (ऊर्ध्वरेखा) बीच में गहरी होकर यदि माता ोरेखा में मिल जावे तो वह आाणणी अस्सी वर्ष की आयु को पाकर मृतक पुरुष के नसमूह को पाता है॥। ८० ॥ ३ सम्भोगरेखा यदि नीचदेशे वृस्ताख्यचिह्वेन युता विभाति। संभरोग रेखना तदा जनी वालगणप्रियः स्यादाचारहीनो व्यभिचारशीलः।८१॥ यंदि संभोगरेखा नीचे तरफ़ वृत्त नामक निशान से संयुत होकर सोहती हो तो वह सामुद्रिकशास्त्रस्य भाणणी वालगणों का प्यारा होता हुआ आचार से हीन होकर व्यभिचार में परा रहता है।। =१ । ४ कनिष्ठिकामूलगते यदा स्तो रेखे सुक्षद्रे त्रयपर्वगे चेत्। तदा जन: स्याद्वडुभोगयुको नार्या यदा चेत्सुखकारिणी सा॥= यदि कनिष्ठा की मूल में पराप्त हुई छोटीसी दो रेखायें कनिष्ठा की तीसरी पो पहुँच जाबें तो वह माणी अनेकानेक भोगों से संयुक्त होता है और यदि पूर्वोक् रेखायें लोगों के करतल में देखी जावें तो वह सुखकारिणी होकर संभोगकारिणी होती हैं॥।= ा संभोगरेखा यदि मध्यमान्ता रेखाचतुष्कैः परिकर्तिता स्यात्। संभोग तदा जनो भूपगणैर्विभीतः संव्यस्तचित्तः परितः प्रयाति ॥=३॥ यदि संभोगरेखा मध्यमापर्यन्त पहुँचकर चार रेखाओं से कटीसी प्तीत हो तो वह म राजगणों से डरता व चित्त को डामाडोल करता हुआ चारों तरफ़ घूमता फिरता है ॥८ ६ मध्यापरुष्कं तृतयं विलङ्चय रेखा विभिन्ना यदि याति भाग्याम। वक्षिशिराघातयुतो जनः स्याद्वाघासमूहैः परिपीडिताङ्गः ॥ ४॥ मध्यमा की तीसरी पर्व को प्राप्त होकर एक रेखा भिन्न होकर यदि भाग्यरेखा समीप चली जावे तो वह माणी वक्षस्स्वलाघात व शिराघात से संयुत होकर वाधा मूहों से पीड़ित अ्रंगोंवाला रहता है॥ ८४ ॥ ७अङ्गष्ठमध्याद्यदि याति तर्जनीं रेखा यदैका चतुरस्रमध्यमा। तदा जनः स्याद्गुरुतः पुरोहितात्संपर्कहीनो बहुवादकारकः॥८५। ेजिस समय बीच में चौकोणवाली एक रेखा अँगूठा के मध्य से चलती हुई तई पर्यन्त पहुँच जावे तो वह पाणी अपने गुरु व पुरोहित से नहीं मिलाप करता हुआ बूम से वादों का करनेवाला होता है॥ ८५ ॥ र पपक सरखा यदि नीचमागे चिहेन गोलाकृतिना युता स्थान वामे च दक्षे च विनष्ट्चक्षश्रिह्ृद्रयं चेत्कथितः सदान्धः॥८६॥ :यदि माता की रेखा नीचे तरफ़ गोलाकार चिह्न से संयुत होकर प्रतीत होवे तो भारणी वायें व दाहिने तरफ़ काना होता है यानी यह गोलाकार निशान रेखा की ओर देखा जावे तो वह पाणी वाम आंख का क़ाना होता है और जो दाहिने तरफ़ गो कार निशान प्रतीत हो तो वह पाखी दाहिनी आंख का काना होताहै और जो रेसख दोनों तरफ़ निशान प्रतीत हों तो वह भाणी हमेशा अन्धा कहा जाता है॥। ८६ ॥ संभोगरेखा निकटे यदास्ति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालम्। संभोगरेखा तदा जनो बान्धवमृत्युहेतुः कठोरवादी कठिनस्वभावः॥८७॥ यदि संभोगरेखा के समीप वृत्तार्थ चिह्न साफ़ व विशाल होकर प्रतीत होवे तो वह णी अपने वान्धवों की मौत का कारण होकर कठोरवादी होता हुआ कठिन स्वभाव ला कहाजाता है॥ ८७॥ पितुः सुरेखा मिलिता जनन्यां मातुः सुरेखा नहि खरिडता स्यात्। पित्टरे खा तदा जनो वेदविचारशीलो ज्ञानी गुणी स्यादभिमानहीनः ॥ द८॥ यदि पिता की रेखा मातृरेखा में निल जावे और मातरेखा नहीं खसिडत होकर पतीत वे तो वह माशी वेद का विचार करता हुआ ज्ञानी व गुणी होकर अभिमान घमएड) से हीन रहता है।। ८८ ॥ X १ मातुः सुरेखा निकटे यदास्ति गुणाख्यचिह्नं परिपूर्ण रूपम्। तदा जन: स्याद्रमणीगणानां वाक्योत्तरे प्राप्तमहाधिकारः ॥ ८६॥ यदि माता की रेखा के समीप गुणनामक चिह्न (निशान) परिपूर्णरूपवाला कर प्रतीत होवे तो वह पराणी स्त्रीगणों के वाक्यों के उत्तर देने में बड़ा अधिकारी ता है ।। ८ह ।। २ क्षपाकरस्योपरिगा यदा स्यू रेखास्सुक्षद्रा बहुला: सुपूर्णाः। तदा जनो घोरतरं सुरोगं प्राम्ोति काये कमलाविहीनः॥६०॥ यदि बहुत सी छोटी छोटी रेखायें पूर्णरूप होकर चन्द्रमा के ऊपर प्रतीत होवें तो वह ी लक्ष्मी से विहीन होकर अपने शरीर में बड़े भयंकर रोग को पाता है॥ ६०॥ ३ समत्थिता चेन्मणिवन्धदेशात्पितुः सुरेखा बहुवक्ररूपा। तदा जनो वहिविदग्धगात्रो वैकल्यचित्तो विविधामयश्च ॥ ६१ ॥ यदि मशिबन्ध (कब्जे) से उठी हुई पिता की रेखा अनेक स्थानों में टेढ़ी सी प्रतीत तो वह प्ाी आगी से जली देहवाला होकर विकल चित्त होता हुआ अनेकानेक ौवाला कहाता है। ६१ ॥ ४ अङ्गुष्टमूले विशदाः सुपञ्च रेखा यदा भान्ति समान्तरालाः। तदा जनस्सौख्ययुतो धनी स्याद्रेखात्रयं चेत्फलताविनाशः ॥६२ ॥ यदि पांच रखायें साफ़ व समान अन्तरवाली होकर अँगूठा की मूल में सोहती हों तो माखी सुखी होकर धनी होता है और यदि तीन रेखायें प्रतीत हों तो फलसमूहों का नाश होजाता है॥। ६२ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ३ ५ समत्थिता चेन्मणिबन्धदेशादेखा गभीरा समुपैति चन्द्रम्। विश्वासयुको मनुजस्तदा स्यादिश्वासहीनो निजबन्धुवर्गे॥ ६ यदि मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई एक रखा गंभीर होकर चन्द्रमा के स चली जावे तो वह पाणी विश्वास से युक्त होकर अपने बन्धुनर्गों में विश्वास से रहता है।। ६३ ॥ ( देखो चित्र नं० १३) अथ पुनरपि पश्चदशलक्षणाङ्टितकरतलफलमाह- १ मातु: सुरेखोपरिंगं सुचिह्नं सर्पानुरूपं यदि याति पैत्रीम्। तदा जन: स्यात्सरलस्वभावो निर्लज्जरूपः सहसा समेतः॥६४॥ जिसके करतल में माता की रेखा के ऊपर प्राप्त सर्प के समान रूपवाला शो मान चिह्न यदि पिता की रेखा के पास चलाजवे तो वह भाणी सीधे स्वभाववाल निर्लज्जरूप (बेशर्म) होकर साहसिक होता है॥ ६४ ॥ २ कनिष्ठिकामूलगता विभाति रेखा सुरेखाद्धयखयिडता चेत। तदा नरः स्याद्यभिचारयुक्को नार्या यदा चेद्रिका भवेत्सा।। ६५ यदि कनिष्ठा की मूल में पाप्त हुई रेखा दो रेखाओं से खशडत होकर सोहती हो वह पाणी व्यभिचार में परायण रहता है और यदि पूर्वोक्क रेखा जिस स्त्री के करत देखी जावे तो वह वेश्यावृत्ति से निर्वाह करती है॥ ६५ ॥ ३ अनामिकामूलगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालय। तदा जनो बन्धुजनस्य घाती द्वेषी विषादी परनिन्दक: स्यात्॥६६ यदि अनामिका की मूल में पाप्त हुआ साफ़ व विशाल होकर दृच्तार्ध चिह्न विरा हो तो वह प्राणी बन्धुजनों का मारनेवाला, शत्रुता रखनेवाला व विपादी होकर की निन्दा करनेहारा होता है॥ ६६॥ ४ कनिष्ठिका मूलगतं सुचिहनं लतानुरूपं विशदं विभाति। तदा जन: स्यात्परिहासकारी जल्पाकरूपी विजयाभिलाषी॥६७ यदि कनिष्ठा की मूल में टिका हुआ साफ़ मकड़ी के आकारवाला शोभायमान चिह्न सो हो तो वह प्राणी बड़ा हँसनेवाला व वकनेवाला होकर विजय की अभिलापा रखताहै।। ५ आयुष्यरेखा यदि मध्यमान्ता अधःसुसूक्ष्मोपरितः सुपीना। तदा जनो वैरिगणाभिभूतो विपर्यये चेत्फलमन्यथा स्यात् ॥ ६८॥ सभोग यदि आयुष्य रेखा (संभोगरेखा) मध्यमा पर्यन्त पहुँची हुई नीचे तरफ़ पतल ऊपरले भाग में मोटीसी प्रतीत हो तो वह प्राणी वैरिगणों से अनादृत (हाराहु होता है और यदि ऊपरले भाग में पतली व निचले भाग में मोटी सी देखी जावे तो वह पारणी वैरियों को पराजित करता है॥। ६5 ॥ संभोगरेखा यदि नीचभागके संकर्तिता स्यानु सुसूक्ष्मरेखया। सं भोगर वा तदा नरः स्यान्नरनाशकारकः संव्यस्तचित्तो निजपितृघातकः॥६६॥। यदि संभोगरेखा (आयुरेखा) नीचे तरफ़ छोटी रेखा से कटी हुई प्रतीत हो तो वह ी नरहत्याकारी होकर चित्त को चलायमान करता हुआ अपने बाप का मारनेवाला होता है ।। ६६ ।। 9पितुः सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे क्षद्रा विभिन्ना विशदा सुपूर्णा। पित्ट रखा तदा जन: सर्वजनपियः स्याद्युत्पन्नबुद्धिर्विमलस्वभावः ॥। १०० ॥ यदि पिता की रेखा ऊपरले भाग में छोटी छोटी रेखाओं से कटी हुई साफ़ होकर र्रूप से प्तीत हो यानी भारी रेखा देखी जावे तो वह प्राणणी सर्वजनों का प्यारा होकर उत्पन्नवुद्धिवाला होता हुआ विमल स्वभाववाला रहता है॥ १०० ॥ भाग्यस्य रेखा मिलिता जनन्यां संकोषचिंह्नं विशदं विभाति। माग्य रेखा तदा जनो मज्जति वारिराशौ व्यायामसक्को व्यसनातुरश्च॥ १॥ यदि भाग्य की रेखा माता में मिल जावे व साफ़ होकर भलीभांति कोणका निशान ेहता हो तो वह भाणी कसरती होकर जूआ आदि व्यसनों में लगा हुआ नदी नाले शदिकों में डूबजाता है ॥ १ ॥ पितुः सुरेखा यदि मध्यभागे क्षुद्रा विभिन्ना मणिबन्धमुक्का। पित्टरे खा रोगाभिभूतो मनुजस्तदा स्यात्पूर्वोक्कमानेन विचारणीयः ॥ २॥ मशिबन्ध (कब्जे) से छूटी हुई पिता की रेखा यदि मव्यभाग (बीच) में छोटी छोटी वाओं से कटीसी प्रतीत हो तो वह माणी रोगों से पीड़िन होता है यह पूर्वोक्मान से चार करना चाहिये यानी एक जवभर का मान दशवर्ष का होता है उसी संकेत से वि- रना चाहिये ॥ २ ॥ भाग्यादघ: स्याच्छिबिकानुरूपं चिह्नं सुपूर्णं विशदस्वरूपम्। तदा नरो नादविचारशीलो मित्राभिभूतो मरणं प्रयाति॥ ३॥ यदि भाग्यरेखा के नीचे तरफ़ मियाना, पीनस आदिकों के समानरूपवाला चिह्न साफ़ र्षरूप से देखा जावे तो वह प्राणी नादविद्या (सांगीतशास्त्र) में परायण होता हुआ त्रों से अनादृटत होकर मौत को पाता है॥ ३ ।। १ भाग्येन भिन्ना यदि पितृरेखा संपूर्णरूपा मिलिता जनन्याम्। सामुद्रिकशास्त्रस्य आयुष्ययुक्ो मनुजस्तदा स्यायुद्धाभिलाषी विजये रतश्च॥।४॥ यदि: भाग्यरेखा से कटी हुई पिता की रेखा पूर्णरूप होकर माता की रेखा में जावे तो वह माणी शतायु होकर लड़ने की लालसा रखता हु विजयमें रत रहता है। १२ निशाकरस्थानगतं सुचिहनं चुल्लीसरूपं विशदं विभाति। सम्पत्तिपूर्ण: पुरुषः प्रकाशी पारुष्यहीनो धनतामुपैति॥५॥ यदि चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ चूल्हे के समान रूपवाला शोभायमान चिह्न रु रूप से सोहता हो तो वह प्राणी संपदाओं से पूर्ण होताहुआ पकाशमान व कठोरता से। होकर ठेकाआदिकों से धनसमूहों को पाता है॥। ५ ॥ १३ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैति भाग्याम। कारागृहं याति नरस्तदानीं नैजेन दोषेण समाकलात्मा॥ ६॥ यदि मशिबन्ध (कब्ज़े ) से उठा हुआ चिक्न (निशान) सर्प के समान होकर भा रेखा के पास चला जावे तो वह पाी अपने दोपसे बदुत व्याकुल मनवाला होता हु जेलखाने को जाता है यानी वह प्राणी अपने अपराध सेही जेल में डाला जाता है॥ ६ १४ काव्यान्तिके तिष्ठति शुद्धरूपं नाक्षत्रचिह्नं यदि भासमानम्। वेश्यामु सक्को मनुजस्तदा स्यान्निन्दान्वितो निन्दितलोकवासी॥७ • यदि नक्षत्र का चिह्न (निशान) प्रकाशमान होता हुआ शुद्धरूप होकर शुक्र के सभी टिका होवे तो वह माणी वेश्याओं में आसक़ होता हुआ निन्दित होकर निन्दितलो का सहवासी होता है।। ७॥ १५. आयुष्यशेषे यदि भाति चिह्नं तारानुरूपं युगलस्वरूपम्। नारीसमूहैः सहितो नरः स्यान्निन्दान्वितः कामकलाकलापी॥=॥ आ्््रयुष्यरेखा (पितृरेखा) के शेपभाग में तारा के समान जोड़ारूप निशान यदि सोह हो तो वह पाणी नारीसमूहों से घिराहुआ निन्दा से संयुत होकर कामकलाओं का समुदर वाला कहाता है ॥ ८ ॥। (देखो चित्र नं० १४) १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के विभान्ति रेखाः सरलाश्र तिस्रः। पुत्रत्रयं वै लभते मनुष्यः संवक्ररूपा बहुकन्यकाश्चेत्॥ ६॥ यदि कनिष्ठा की तीसरी पर्व में सीधी होकर तीन रेखायें सोहती हों तो वह प्राणी है पुत्रों को निश्चय कर पाता है यह उपलक्षणमात्र है यानी जितनी सीधी रेखायें मर्त हों उतने ही पुत्रों को भाणी पाता है और यदि भलीभांति टेदी रेखायें प्रतीत हों तो वह प्रारणी बहुतसी कन्याओं को पाता है।। ६।। २ अनामिकामूलगते यदास्तो रेखे मुक्षद्रे कुटिले विशुद्धे। कट्यार्तिभीतिं लभते मनुष्यः कामी कलावान्कमलासमेतः ॥१०॥ जिससमय छोटी, टेदी व साफ़ होकर दो रेखायें अनामिका की मूल में विद्यमान देखी जावें तो वह माणी कामी, कलावान् व लक्ष्मी से संपन्न होकर कमर की पीड़ा को पाता है ॥ १० ॥ ३ यदागतं मध्यमिकामुमूले रेखात्रयं चेत्कुटिलस्वरूपम्। वातार्तियुक्को मनुजस्तदा स्याद्वादी विषादी विषयानुरक़ः॥११॥ जिस समय टेढ़े रूपवाली तीन रेखायें मध्यमा की मूल में पाई जावें तो वह पराणी बातरोग से पीड़ित होता हुआ वादी व विपादी होकर विपयोंमें अनुरक होता है ॥ ११ ॥ ४ आयुष्यशाखा यदि याति तर्जनीं वृद्धाङ्गलिं चैति तथा द्वितीयिका सिभाग सौभाग्ययुक्ो मनुजो दयालको दाता प्रियः स्याद्बहुजन्तुपालकः॥१२॥ यदि आयुरेखा (संभोगरेखा) की पहली शाखा तर्जनी पर्यन्त चली जावे और दूसरी शाखा अँगूठा की ओर धावे तो वह पाणी सौभाग्यसंपन्न, दयावान, दाता व सवों का प्यारा होकर घने जीवों का पालक होता है ॥ १२ ॥ संभोगरेखा यदि नीचभागे गुपत्रयेणाप्यवकर्तिता स्यात्। + वातामयः स्यान्मनुजस्तदानीं वाणीविलासो वनितारतश्च॥ १३॥ यदि संभोगरेखा निचले भाग में तीन गुणों के x निशानों से कटी हुई प्रतीत होवे ोवह पाणी वादीरोग से पीड़ित होकर वाणी का विलास करता हुआ रमणियों में त रहता है। १३ । मातुः सुरेखा यदि नीचदेशे गोलाकृतिभ्यां च युता ह्यपूर्णा। तदा नरः स्यात्प्रथमे वयस्के हत्याकरो हानिपरो विशोकी॥ १४ ॥ यदि माता की रेखा नीचे के तरफ़ दो गोलाकार निशानों से संयुत होकर पूर्णरूप नहीं देखी जावे तो वह पाणी पहली उमर में हत्याओं को करता व हानि में परायण ता हुआ विशेपता से शोचनेवाला होता है यानी ये गोलाकार निशान यदि निचले ग में देखेजावें तो मध्य व वृद्धावस्था में वह पराणी हत्याकारी होता है और यदि :ा- १ हमारे देश में इसी का आयुरेखा मानते हैं। सामुद्रिकशास्त्रस्य रम्भदेश में गोलाकार निशान जितनी संख्यावाले प्रतीत हों तो पहली उमर में उतनेह आघात करता है ॥ १४ ॥ ७ पितुः सुरेखा यदि मध्यभागे क्षुद्रा विभिन्ना परिपूर्णरूपा। रागी विरागी मनुजस्तदा स्यात्पशस्त्रभावो बहुहिंसकश्च ।। १५ ।। यदि पिता की रेखा निचले भाग में छोटी छोटी रेखाओं से कटी हुई पूर्णरूप से मती होवे तो वह प्राणी रागी व विरागी होकर पशुओं का सा स्वभाव रखता हुआ अने जीवों का घातक होता है ॥ १५ ॥ = आरम्भदेशे यदि पितृरेखा स्थूला सुपूर्णा विशदा सरक्ा। तदा जनस्यात्समराभिलाषी रक्काभिपाती रिषुवंशघाती॥ १६॥ यदि पिता की रेखा आरम्भदेश में यानी शुरू होने में मोटी, बड़ी व साफ़ होक रक्तवर्णवाली देखी जावे तो वह पाणी युद्धाभिलापी होकर सामने खून को करता हुआ चैरियों के वंश को विनाशता है ॥ १६ ॥ ६अङ्गुष्ठकस्य प्रथमे परुष्के रेखा त्रिशाखा समुपैति पैत्रीय्। तदा जनोयं प्रथमे प्रसङ्के भूपादिवर्षे रमणीमुपैति॥१७॥ यदि अँगूठे की पहली पोर में तीन शाखावाली रेखा पितृरेखा के समीप चली जा तो यह प्राणी सोलह आदि वर्पों के आनेपा पहले प्रसंग में रमणी को पाता है यानी ती शाखाओं में से पहली शाखा पितृरेखा के सामने जावे तो सोलह वर्ष में व दूसरी शास जावे तो २० वर्ष में और तीसरी शाखा जावे तो १६ वर्ष में पहले पहल रमणी के सा रमण करता है ॥ १७ ॥। १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं रेखात्रयं वेदमिताविभिन्नम्। तदा जनों मज्जति वारिराशौ विद्याविहीनो विषयातुरश्च ॥।१८ ॥। यदि चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ तीन रेखाओंवाला शोभायमान चिह्न चार रेखाड से कटासा प्रतीत होवे तो वह प्राणी विद्या से विहीन होता हुआ विपयों में आतुर होक नदी नाले आदिकों में दूबजाता है॥ १८ ॥ ११ मातापितृम्यां सहितां सुभोगां भित्त्वा सुभाग्या यदि याति चान्द्रिम। तदा जनो मस्तकघातमेति शेषे विभिन्ना मरणं प्रयाति ॥ १६ ॥। यदि पिता माता की रेखा को व आयुरेखा को काटकर भाग्यरेखा बुध के स्थान र्यन्त चली जावे तो वह मागी मत्थे में आघात को पाता है और यदि शेपभाग में मा १ चन्द्रस्यापत्यं चान्द्रिस्तं चान्द्रिमिति॥ रेखा, पितृरेखा व आयुरेखा ये तीनों भाग्यरेखा से भिन्न देखी जावें तो वह प्राणी मौत को ही पाता है॥ १६ ॥ १२ चन्द्रादधस्तिष्ठति शुद्ध रूपं चिह्नं त्रिरेखं सरलस्वरूपम् । आद्ये नरो मन्दफलं प्रयाति मध्ये वयस्के शुभतामुपैति॥२०॥ यदि सीधा व साफ़ होकर तीन रेखाओंवाला चिह्न चन्द्रमा के निचले भाग में टिका हो तो वह पाणी पहली अवस्था में मन्दफल (थोड़ाफल) को पाता है और युवावस्था में शुभफल को यानी दौलत को पाता है ॥ २० ॥ १३ अधोविभिन्ना यदि पितृरेखा तदन्तिके स्यानु विसर्गचिह्नम। तदा नरो नारिनिमित्तवादी रक्ताभिपातं कुरुते रणेप्मुः॥२१॥ यदि पिता की रेखा निचले भाग में कटीसी प्रतीत हो और यदि उसके समीप में विसर्ग का निशान देखा जाये तो वह पराणणी स्त्री के निमित्त झगड़ा को मचाता हुआ युद्धा- भिलापी होकर सामने खून को गिराता है॥ २१॥ १४ अङ्गश्ठमूले विशदस्वरूपं वेदाङ्कव्यस्तं यदि भाति चिह्नम्। दौर्जन्ययुको मनुजस्तदा स्याद्रक्राभिपाती निजबन्धुघाती॥२२॥ यदि उलटे चारके अंक का सा निशान साफ़ होकर अँगूडा की मूलमें सोहता हो तो वह पाणणी दुर्जनतासे संयुत होकर अपने बन्धुओंको मारता हुआ सामने खूनको गिराता है।।२२।। १५ पितुः सुरेखा यदि नीचभिन्ना भाग्यस्य रेखा समुपैति चान्द्रिम। संकोणचिह्ने मनुजस्तदा स्यान्नेत्रामयो रोगचयाभिभूतः ॥२३॥। यदि पिता की रेखा निचले भाग में कटीसी देखी जावे और भाग्यरेखा (फेटलाइन) बुध पर्यन्त चली जावे उस समय यदि संकोण चिह्न देखा जावे तो वह पाणी नेत्ररोगी होकर रोगसमूहों से घिर जाता है ॥। २३॥ १६ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्रिकोणचिह्नं परिभाति भिन्नम्। तदा नरः स्यात्परदेशवासी त्रासी धनाशी मरणं प्रयाति ॥ २४॥ यदि मिचन्ध (कब्जे) से उठा हुआ कटासा त्रिकोण चिह्न पतीत हो तो वह माणी परदेश में वसता व डरता हुआ धनाभिलापी होकर मौत को पाता है॥ २४ ॥ (देखो चित्र नं० १५ ) १ अनामिकायास्तृतये परुष्के रेखाद्रयं चिह्नतमं चकास्ति। कुशाग्रबुद्धिर्मनुजस्तदा स्याज्जद्वार्तिभीतिं यदि चैति भिन्नम्॥ २५ यदि अनामिका की तीसरी पोर में दो रेखाओंवाला चिह्न ख़बही चमचमाता हो वह पराणी कुशाग्रवुद्धि (तीव्रबुद्धिवाला ) होता है औपर यदि पुर्वोक्क चिह्न कटासा पर् होवे तो वह पाणी जांघ की पीड़ाभय को पाता है॥। २५॥ २ कनिष्ठिकामूलगता विभान्ति रेखाश्र तिस्रः सरलस्वरूपाः। तदा नरो दक्षिणवाहुघातं प्रापोति वामे यदि वामपाणौ॥२६॥ सीधी होकर तीन रेखायें यदि कनिष्टिका (छोटी) अँगुली की मूल में सोहती हो वह पाणी दाहिनी भुजा में चोट चपेट को पाता है और यदि वायें हाथ में पूर्वों निशान सोहता हो तो वह प्राणी वाई भुजा में चोट को लहता है ॥ २६॥ ३ अनामिकामध्यमिकामुमूले रेखात्रयं चेत्सरलस्वरूपय्। पादाभिघातं पुरुषः प्रयाति पापी प्रतापी परुषस्वभावः॥।२७।। यदि अनामिका व मध्यमा की मूल में सीधा होकर तीन रेखाओंवाला निशान प्रका मान देखा जावे तो वह पाणी पापी व प्रतापी होकर कठोर स्वभाव को रखता हुआ पै में चोट को पाता है॥ २७ ॥ ४ यदागतं मध्यमिकासुमूले रेखाद्रयं क्षुद्रतरं विभाति। परिश्रमासक्मना मनुष्यः संखरिडतं चेच्छमताविहीनः॥२८॥ जिस समय मध्यमा की मूल में छोटा होकर दो रेखाओंवाला निशान भासमान हो हो तो वह माणी बड़ा मेहनती होता है और यदि पू्वोंक़ निशान खएिडत होकर भती होवे तो वह भाणी मेहनत से बचा रहता है यानी आलसी होकर खदगर्जू होता है।२ ५. प्रदेशिनीमध्यभिकासुमध्ये रेखा यदैका यदि याति घात्रीम। शीर्षाभिघातान्मृतिमेति जन्तुः संभोगभिन्ना यदि नैति मृत्युम्॥२६ यदि तर्जनी व मध्यमा के बीच में होकर एक रेखा मातृरेखा के समीप पहुँची हु देखी जावे तो वह माणी शीश में चोट लगने से मौत को पाता है और यदि पूर्वोक रेख भोगरेखा से कटी हुई देखी जावे तो वह प्राणी केवल शीश में चोट को पाता है परन मरता नहीं है॥। २६।। ६ बृहस्पतिस्थानगतं विशुद्धं रेखात्रयं चिह्नतमं चकास्ति। भूपादिकानां च सहायतः स्यात्सौभाग्यशाली मनुजो महात्मा॥३० यदि बृहस्पति के स्थान में पहुँचा हुआ साफ़ होकर तीन रेखाओवाला निशान काशमान होता हो तो वह प्राणी महात्मा होकर राजा व महाराजों की सहायता से है भाग्यशाली होता है॥ ३० ॥ ७ मातुः सुरेखा पितरं प्रयाति भिन्नं तदूर्ध्वं यतिसंख्यकाभिः। तावन्मितांश्चौरसजातपुत्रान् प्रामोति प्राणी परवित्तपूर्णः ।। ३१ ।। यदि माता की रेखा पितृरेखा में मिलजावे और उसका ऊपरला भाग छोटी छोटी जितनी रेखाओं से कटा देखा जावे तो वह पाणी पराये धनों से पूर्ण होकर उतनेही औरस- जात पुत्रों को पाता है॥ ३१ ॥ = क्षुद्रासमेता जननी सुरेखा स्वल्पा गभीरा समुपैति पैत्रीम्। मात रेखा मातुः मुमानं मनुजः करोति तन्मानतस्स्याद्धिरप्रपाती॥ ३२॥ यदि छोटी छोटी रेखाओं से संयुक्त होकर माताकी रेखा अल्परूपवाली व गहरी होती हुई पिता के पास पहुँच जावे यानी मिलाप कर लेवे तो वह प्राणी माता का बड़ा मान करता है यानी माता के ऊपर घना प्रेम रखता है उसी प्रेम से छयीरोगवाला होकर मुख से खून को गिराता है॥ ३२ ॥ ६पितु: सुरेखा मणिबन्धदेशात् संवक्रमध्या यदि याति घात्रीम। पित्ट रेख तदा जनश्चैकमना विलासी प्रामोति सौख्यं विपुलं विकासी।।३३। यदि मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई पिता की रखा बीच में टेढ़ी होकर मातृरेखा में मिल जावे तो वह भाी एकाग्र मनवाला होता हुआ विलासी व प्काशी होकर बड़े भारी सौख्य को पाता है।। ३३॥ भाग्यरेखा १० पितुः सुरेखोत्थितभाग्यरेखिका स्वल्पा सुवक्रा समुपैति मातरम्। आयुष्यमल्पं लभते स मानवः कुपत्थ्यभोजीद्विजदेवनिन्दकः । ३४॥। जिसके करतल में पिता की रेखा से उठी हुई भाग्यरेखा (फेटलाइन) छोटी व टेढ़ी होकर मातृरेखा के समीप चली जावे तो वह प्राणी कुपथ्य का भोजन करनेवाला होकर दवता व ब्राह्मणों की निन्दा करता हुआ अल्पायु को पाता है॥। ३४॥ १ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात् सर्पानुरूपं समुपैति काव्यम्। .तदा जनश्चौर्यपरः प्रतारी पापी प्रतापी परपक्षहारी।। ३५॥। यदि मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठा हुआ सांप के समान होकर निशान शुक्र के समीप ोहता हो तो वह माणी चौरकर्म में परायण होता हुआ छली, पापी व प्रतापी होकर पर- क्ष का हरनेहारा होता है॥। ३५ ।। २ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशाद्वेखाद्यं याति यदा सुपित्रोः। तदा जनोयं जलयानयायी धनाभिधायी

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 4)

धनतामुपैति॥३६॥ ெ सामुद्विकशास्त्रस्य यदि मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठा हुआ दो रेखाओंवाला निशान मातृरेखा व पि रेखा के बीच में चला जाने तो यह प्राणी जहाज़ या नावों के द्वारा यात्रा करता व थ को इकट्ठा धारता हुआ धनसमूहों को पाता है यानी समुद्र की सफ़र करता हुआ बहुत पैसे को जोरता है॥ ३६ ॥ (देखो चित्र नं० १६) १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के गुणाख्यचिह्नं विशदं विभाति। X चौर्ये रतः स्यान्मनुजस्तदानीं निर्बोधरूपो विगतप्रभावः॥३७॥ यदि कनिष्ठा की तीसरी पर्व में साफ़ होकर गुणणा का X निशान सोहता हो तो भाखणी अज्ञानी होकर विगत प्रभाववाला होता हुआ चोरी करने में लगा रहता है।। ३७ २ कनिष्ठिकायास्तृतयं परुष्कं संगम्य रेखा यदि याति सूर्यम्। तदा नरः स्यादपकारकारी चौर्यापहारी कृतसंशयश्च ॥। ३८॥ यदि कनिष्ठा की तीसरी पर्व (पोर) को भलीभांति पाकर एक रेखा गहरी होत्र सूर्य पर्यन्त चली जावे तो वह प्राणी सवों का बुरा करनेवाला होकर चोरी से धन हरता हुआ किये संदेहवाला होता है।। ३८॥ ३ अनामिकामूलगतं सुवङ रेखाद्यं चिह्नतमं चकास्ति। ज्ञानेन पूर्ण: पुरुषस्तदा स्यात् पदाधिकारी प्रमदाप्रसक्ः॥ ३६॥ यदि अनामिका की मूल में प्राप्त हुआ टेढ़ा होकर दो रेखाओंवाला निशान सो हता हो तो वह प्राखी ज्ञान से पूर्ण होकर पदाधिकारी होता हुआ रमरियों में आस रहता है॥ ३६ ॥ ४ प्रदेशिनीमूलगतं विभुग्नं चिह्नं दविरेखं यदि याति मन्दम्। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यः संभ्रान्तचित्तो विभुतासमेतः ॥। ४०॥ तर्जनी की मूल में प्राप्त हुआ टेढा होकर दो रेखाओंवाला निशान यदि शनैश्वर के पास पहुँच जावे तो वह प्राणी भ्रान्तचित्त होता हुआ विभुता से संपन्न होकर शीश चोट चपेट को पाता है।। ४०।। ५. बृहस्पतिस्थानगता सुभोगा अधस्सुपीनोपरितस्मुभिन्ना। तदा नरो दीनदशामुपैति दौर्भाग्यशाली बलताविहीनः॥ ४१॥ यदि बृहस्पति के स्थान में प्राप्त हुई सुभोगरेखा (आयुरेखा) नीचे के भाग में मोर्ड होकर ऊपरले भाग में रेखामात्र से कटी देखी जावे तो वह पाणी दौर्भाग्यशाली दुवला होकर दीनदशा को पाता है। ४१॥ ६ भोगाधरस्थं विशदस्वरूपं रेखात्रयं लक्ष्मतरं विभाति। वातार्तियुक्ो मनुजस्तदा स्याद्यायामशीलो विषयातुरश्च ।। ४२।। भोगरेखा के निचले भाग में टिका हुआ साफ़ रूपवाला होकर तीन रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह मागी वादी रोगवाला होकर कसरती होता हुआ विषयों में आतुर होता है ॥ ४२ ॥ ७ मातुस्सुरेखा मिलितोर्ध्वदेशके स्पृष्टा यदा स्यादतिक्षुद्ररेखया। दोषातुरो लोककृताभिचारकैर्विषादिना वा मृतिमेति मानवः॥४३॥ जिस समय माता की रेखा ऊपरले भाग में मिली व छोटी रखा से छूई हुई देखी जाबे तो वह पाणी दोपों से आतुर होकर सांसारिक जनों के किये मारणादिकों या विषा- दिकों से मौतको पाता है ।। ४३॥ = मातुस्समीपे प्रतिभाति चिह्नं नाक्षत्ररूपं विशदस्वरूपय्। लोहाभिघातं लभते मनुष्यो भिन्नं यदा चेद् बहुस्वल्पघातम्॥ ४४॥ साफ़ रूपवाला होकर नक्षत्र का सा चिह्न (निशान) मातृरेखा के समीप यदि सो- इता हो तो वह पाणी लोह से चोट चपेटको पाता है और यदि पूर्वोक्त निशान कटा हुआ मतीत होवे तो वह पराणी बहुत छोटे से घाव को पाता है॥। ४४॥ ६ स्पृष्टा सुधात्रीं यदि याति काव्यं रेखा गभीरा विशदा विक्षुद्रा। धन्वादिभिर्घातमुपैति प्राणी पारुष्यपूर्णः पिशनस्वभावः॥ ४५॥ गहरी व साफ़ होकर छोटी सी रखा मातृरेखा को छूकर यदि शुक्र के सामने चली जावे तो वह पाणी कठोरता से पूर्ण होकर चुगलखोरों का सा स्वभाव रखता हुआ धनुष, वाख और वन्दूक़ आदिकों से घायल होजाता है॥ ४५॥ १० पितुः सुरेखोपरिगा विभाति भग्नीसुरेखा भणिता सुधीभिः। दारिद्र्ययुक्को मनुजस्तदा स्यात्कान्ताभिलाषी कमलाविहीनः॥४६।। विद्वानों से कही हुई भग्नीरेखा यदि पितृरेखा के ऊपरले भाग में सोहती हो तो वह माणणी दरिद्रता से संपन्न होकर लुगाई की लालसा रखता हुआ लक्ष्मी से हीन रहता है।। ४६॥ ११ अङ्गष्ठमव्यं यदि वेष्ट्यन्ती फणानुरूपा परिभाति रेखा। व्यापारयुक्ो मनुजस्तदा स्यादाचोरहीनो व्यभिचारशीलः ॥। ४७॥ १ आचार: परमोधर्म इति॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य अँगूठ के मध्यभाग को लपेटती हुई फनके समान रेखा सोहती होतो वह प्राखी चार से हीन होकर व्यभिचार में लगा रहता हुआ व्यापार से सम्पन्न होता है यानी मनुष्य व्यापारी कहाता है।। ४७ ॥ १२ निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं वृत्तार्धरूपं विशदं विभाति। बुद्धया विबुद्धो मनुजस्तदा स्याद्ामाभिलाषी वनिताविलासी॥8 यदि चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ साफ़ शोभायमान होकर अर्धवृत्त का निर सोहता है तो वह पाणी बुद्धिद्वारा विशेष बोध को रखता हुआ वामाओं (सुन्दरियो का अखिलापी होकर रमणियों में विलास करता है॥। ४८॥ १३ मात्रा समेता जनकस्य रेखा क्षुद्राविभिन्ना यदि मध्यभागे। पराघातपूर्ण: पुरुषस्तदा स्यादानन्दहीनो दयिताविहीनः॥ ४६ पटरेख माता की रेखा से मिली हुई पिता की रेखा यदि मध्यभाग में छोटी छोटी रेखाओ कटीसी देखी जावे तो वह पाणी चोटों से घायल होकर आनन्द से हीन रहता ह दयिता (प्यारी) से विहीन होता है॥ ४६॥ १४ अङ्गष्ठमूले विशदा विकुद्रा भग्नीसुरेखा भणिता सुधीरैः। दीनो दरिद्रो मनुजस्तदा स्यादिद्याविहीनो विषयातुरश्च॥ ५०॥ विद्वानों से कही हुई भग्नी रेखा साफ़ व छोटीसी होकर यदि अँगूठा की मूल में हती हो तो वह पाणी दीन व दरिद्री होकर विद्या से विहीन रहता हुआ विपयों में तुर होता है॥ ५० ॥ १५ ससुत्थितं चेन्मणिवन्धदेशाद्रेखात्रयं क्षुद्रतमं विभाति। तदा जनोयं जलयानयायी सांयात्रिको वा मरणं प्रयाति॥ ५१॥ यदि मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठाहुआ छोटासा तीन रेखाओंवाला निशान सोहता तो वह पाणी जहाज़ की सवारी से सामुद्रकीय यात्रा को करता है अथवा जहाज़ी कर मरजाता है।। ५१ ॥ १६ पितुः सुरेखा यदि नीचदेशे संवक्ररूपा मिलिता जनन्याम्। दीर्घायुपं तं पुरुषं करोति विद्यान्वितं वैद्यवरं विनीतम्॥ ५२॥ मातृरेखा में मिली हुई पिता की रेखा यदि निचले देश में टेढ़े रूपवाली देखी तो उस माणी को बड़ी उमरवाला, विद्याओं से संपन्न, वैद्यों में प्रधान व विनयवा करती है॥ ५२ ॥ १ सांयात्रिक: पोतवशिगित्यमरः। ५.३ १७ भाग्यस्य रेखा मणिबन्धदेशात् पैत्रीं विभित्त्वा यदि याति मात्रीम। भव्यान्वितं तं मनुजं करोति बन्धुप्रियं बोधरतं वरेरायम् ॥ ५३॥ पिता की रेखा को काटकर भाग्य की रेखा यदि कब्ज़े से मातृ रेखा के समीप चली भाग्य रेव जावे तो उस माणणी को कल्याण से संपन्न, भाइयों का प्यारा, ज्ञान में रत व प्रधान वना देती है ॥ ५३ ॥ (देखो चित्र नं० १७ ) अथ चतुर्दशलक्षणङ्गितकरतल फलमाह- १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के ऋज्वी सुरेखा यदि याति मध्यम्। तदा नरो मानसिको महौजाश्चातुर्यचञ्चुश्चपलस्वभावः॥ ५४॥ कनिष्ठा की तीसरी पोर में सीधी रेखा यदि बीच के पोरतक चली जावे तो वह भाणी मानसिक गुणशाली व बलशाली होकर चातुर्य से संपन्न होता हुआ चपलस्वभाववाला कहाता है।। ५४॥। २ गुरूपरिस्थं यदि भाति चिह्नं रेखात्रयं भुग्नतरस्वरूपम्। पित्ताधिकोसौ पुरुषस्तदा स्यात् पाखएडकारी परुषस्वभावः॥५५॥। बृहस्पति के ऊपर ले भाग में यानी तर्जनी की तीसरी पोर में टिका हुआ टेढा व तीन रेखाओंवाला होकर चिह्न यदि सोहता हो तो वह पाणी अधिक पित्तरोगवाला होता हुआ पाखएडकारी हाकर कठोर स्वभाववाला होता है॥। ५५ ॥ ३ दिवाकरस्थानगतं सुचिह्नं तिर्यग्विभिन्नं सरलं दविरेखम्। संकोणभिन्नं यदि वामदक्षे तदा नरः शिल्परतः सुबुद्धिः॥५६॥ सूर्य के स्थान में यानी अनामिकाकी मूल में प्राप्त हुआ शोभायमान चिह्न सीधा व दो रेखाओंवाला होता हुआ तिरछी लकीर से कटा सा होकर बायें व दहिने तरफ़ कोणों से खएिडत देखा जावे तो वह प्राणी शिल्पकार्य में पवृत्त होकर सुबुद्धि होता है ॥ ५६॥ ४ यदा गतं मध्यमिकासुमूले रेखाद्यं क्षुद्रतरं चकास्ति। कष्टाधिकं वै लभते मनुष्यः पित्ताधिक: पापरतः कुवेषैः ॥५७॥ जबकि मध्यमा की मूल में पाप्त हुआ दो रेखाओंवाला होकर छोटा सा चिह्न चमकता हो तो वह पाणी पित्तरोग से पीड़ित व पाप में परायण होता हुआ वुरे वेषवाला होकर घने कष्ट को पाता है। ५७ ॥ ५. सुभोगशाखा विशदा विक्षुद्रा पैत्रीं विभित्त्वा यदि याति भौमम्। १ अमंगल वेशवाला कहाता है॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य वृथापलापी मनुजस्तदा स्याद्विश्वासयुको विभ्ुतासमेतः ॥५८॥ सुभोगरखा की शाखा साक व छोटी होकर मातृरेखा व पितृरेखा को काटकर मह के समीप यदि चली जावे तो वह पाणणी वृथावादी (वकवादी) होता हुआ विश्वास सम्पन्न होकर विभुता से पूर्ण रहता है।। ५८ ॥। ६ अङ्गप्ठशाखावृतशुद्धरूपं रेखाचतुष्कं समुपैति पैत्रीम। वृथाभिमानी मनुजस्तदा स्यान्मोहाभिभूतो मदनातुरश्च॥ ५६ ॥ अँगूठा की शाखा से घिराहुआ सीधा होकर चार रेखाओंवाला निशान यदि पि रेखा के समीप चला जावे तो वह पाणगी वृथाभिमानी होकर मोह से घबड़ाता हुआ का से पीड़ित होता है॥ ५६ ॥ ७ भोगाघरस्थं विशदस्वरूपं नवाङ्कपञ्चाङ्मयुतं गुणाख्यम्। रक्ताभिपाते निरतो मनुष्यो मान्यो वदान्यो बलतासमेतः॥ ६०॥ भोगरेखा के नीचे टिका हुआ साफ़ होकर नत व पांच के अंक से संयुत होता हु गुणा का निशान सोहता हो तो वह माखी रक्कमोक्षण (फ़स्त खुलाने) के कार्य में निपु होता हुआ.मान्य व वदान्य (बड़ा दानी) होकर बलवान् होता है ॥ ६० ॥ = क्षपाकरस्योपरिंगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं यदि चैकरेखम्। आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यः कृपथ्यसेवी सरलस्वभावः॥६१॥ चन्द्रमा के ऊपर यानी मातृरेखा के समीप प्राप्त हुआ एक रेखावाला निशान यी तिरछी रेखा से कटा हुआ देखा जावे तो वह पराणी कुपथ्यों को सेवन करता हुआ सी स्वभाववाला होकर अल्पायु को पाता है । ६१ ॥ स्वल्पा सशाखा यदि भाग्यरेखा पैत्रीं विभित्त्वा समुपैति मात्रीम। वाणादिभिर्घातमुपैति प्राणी विद्यान्वितो बन्धुविवर्जितश्च॥ ६२।। छोटी व शाखा समेत होकर भाग्येखा (फेटलाइन) पितृरेखा को काटकर यदि मा रेखा के पास पहुँच जावे तो वह माी विद्याओं से संपन्न होकर बन्धुओं से रहित हो हुआ वाणादिकों से घात (चोट) को पाता है ॥ ६२॥। प सवा पवल्पा सुपेत्री मिलिता धरित्र्यां क्षुद्रा विभिन्नश्च तदूर्ध्वदेशः। तदा जनः सर्वजनप्रियस्स्याद्विश्वासयुको विभुतामुपेतः ॥ ६३॥ पितर लांग छोटे रूपवाली पिता की रेखा मातृरेखा में मिल जावे और उसका ऊपरला भ १ छत्तीस ३६वर्ष पर्यन्त अल्पायु को आचार्यों ने माना है इसमें भी, तीन भेद होते हैं। पूप छोटी रेखा से कदा हुआ देखा जावे तो वह माणी विश्वास से संयुत होता हुआ प्रभुता से संपन्न होकर सर्वजनों का प्यारा होता है। ६३ ॥ ११ काव्यालये तिष्ठति वक्ररूपं रेखाचतुष्कं विशदस्वरूपम्। कान्तासमूहं लभते मनुष्यः कामी कलावान्कमलासमेतः ॥ ६४ ॥ टेढा व साफ़ होकर चार रेखाओंवाला निशान यदि शुक्र के स्थान में टिका हो तो वह माणणी कामी व कलावान् होकर लक्ष्मी से संपन्न होता हुआ कान्ता (लुगाइयों) के समुदाय को पाता है॥ ६४ ॥ २ निशाकेरस्थानगतं सुचिह्नं चल्लीसरूपं यदि मध्यभिन्नम्। तदा जनोयं पतितो महोच्ात संखरिडतं चेद्विपदाविमुक:॥ ६५ ॥ चन्द्रमा के स्थान में पाप्त हुआ चूल्हे के समान रूपवाला शोभायमान चिह्न यदि बीच कटासा प्तीत होवे तो यह माणी बड़े ऊंचे स्थान से लुदक पड़ता है और यदि पूर्वोक्क निशान कषुद्र रेखाओंसे कटा हुआ देखा जावे तो वह पाणणी विपदाओं से छूट जाता है॥६५॥ ३ शुक्राधरस्थं विशदस्वरूपं वैशृङ्धलं चिह्नतमं चकास्ति। मिथ्याप्रलापी पुरुषस्तदा स्यात् सुखाभिलाषी सुषमासमेतः ॥ ६६ ॥ साफ़ होकर विश्ृंखलनामक चिह्न शुक्र के नीचे चमकता हो तो वह माणी मिथ्या- रादी होकर सुखों की अभिलाषा (चाहना) करता हुआ परम शोभा से संपन्न होताहै ।६६॥। ४ समुस्थिता चेन्मणिबन्धदेशादका करेखा समुपैति मात्रीम्। तदा जनोयं जनतासमेतो द्यृणी गुणी स्यादभिमानहीनः ॥ ६७ ॥ यदि मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठी व टेदी होकर छोटीसी रेखा मातृरेखा के सामने चली शवे तो यह भाणणी जनसमूहों से सम्पन्न होता हुआ ऋणी (कर्जी) व गुी होकर भिमान से हीन होता है।। ६७ ।। (देखो चित्र नं० १८) कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के कोणदयं चिह्नतमं चकास्ति। चौर्यानुरक्ो मनुजस्तदा स्यादृथाभिमानी विषयातुरश्च ।। ६८ ।। कनिष्ठा की तीसरी पोर में दो कोरणोंवाला निशान यदि प्काशमान देखा जावे तो वह ाखी वृथाभिमानी (घमएडी) होकर विषयों में आतुर होता हुआ चोरी करने में परा- ख रहता है॥। ६८ ।। १ निशाकरश्चन्द्रमा इति ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य २ अनामिकायास्तृतये परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। दारिद्र्ययुक्को मनुजो मनीषी दुःखेन कालं नयते क्षुधालुः ॥६६॥ अनामिका की तीसरी पर्व (पोर) में साफ़ होकर अरधवृत्त का निशान यदि सो हो तो वह माणी वुद्धिमान् व दरिद्रता से संयुत होता हुआ भूंखा रहकर दुःख से तर समय को काटता है॥ ६६ ॥ ३ छायासुतस्योपरिंगं चकास्ति क्षुद्रं सुचिह्नं सरलं त्रिरेखम्। तदा नरः स्याद्विजयाभिलाषी योद्धा विवोद्धा कलहातुरश्च॥ ७०। छोटा, सीधा व तीन रेखाओंवाला होकर शोभायमान निशान शनैश्र के ऊपर हुआ यदि सोहता हो तो वह माणणी विजय की अभिलापा (चाहना) करता हुआ यो (बड़ा शूरमा) व विधोद्धा (विज्ञाता) होकर लड़ाई लड़ने में लगा रहता है।।७०।। ४ दिवाकरस्थानगतं सुरेखं तिर्यग्विभिन्नं युगरेखिकाभ्याम्। तदा जनोयं सुखदुःखमेति भुग्नं यदा चेच्छभतामुपैति॥७१॥ सूर्य के स्थान में म्ाप्त हुआ सीधी रेखावाला निशान यदि दो रेखाओं से तिर कटासा देखा जावे तो यह प्राणी समय समय पर सुख व दुःख को पाता है और पूर्वोक निशान टेढासा देखाजावे तो वह पारणी शुभता को पाता है।। ७१॥ ५ संभोगरेखा विशदा गभीरा पूर्णस्वरूपा यदि याति मन्दम्। सौभाग्यशाली पुरुषो विशाली संतोषकारी स्वजनापकारी॥ ७२॥ पूर्णरूपवाली सुभोगरेखा (आयुरेखा) साफ़ व गहरी होकर यदि शनैश्र पर्दन चली जावे तो वह भाणणी सौभाग्यशाली व विशाली होता हुआ संतोपकारी होकर अ जनों का वुरा चेतनेवाला होता है॥ ७२॥ ६ बृहस्पतिस्थानगतं त्रिशूलं चिह्नं यदा चेद्िशदं विभाति। संभोग रखा तदा जनोयं कृशतामुपैति मूर्च्छादिरोगैः परिपीडिताङ्गः ॥ ७३॥ जिस समय साफ़ होकर त्रिशूल का निशान यदि वृहस्पति के स्थान में प्ाप्त हु सोहता हो तो यह प्राणी मिरगी आदि रोगों से परिपीड़ित अंगवाला होता हुआ दुर्बल को पाता है।। ७३॥ ७ मातुः सुरेखा यदि नीचदेशे वेदाङवृत्तार्धयुता विभिन्ना। पदाभिलाषी पुरुषस्तदा स्याद्रर्वेण युक्को गुरुतामुपेतः ॥।७४॥ युग्मन्तु युगलं युगमित्यमरः ॥ मोत्ट रेखा यदि माता की रेखा निचले भाग में चार के अंक व तृत्तार्थ से संयुक्र होकर कटीसी देखी जावे तो वह पराणणी घमएडी होकर गुरुता से संपन्न होता हुआ ऊंचे पद का अ्भि- लापी कहाजाता है।। ७४॥। = मातुः सुरेखा यदि मध्यवक्रा धन्वाकृतिर्भग्नतरा विभाति। मान्रेखा चतुष्पदाघातयुपैति जन्तुर्जयाभिलाषी जनतासमेतः॥ ७५।। यदि माता की रखा बीच में टेही होकर धनुप के आकारवाली होती हुई अत्यन्त कटीसी सोहती हो तो वह माणी जय का अमिलापी होकर जनसमूहों से संयुक् होता हुआ चौपाये की चपेट से चोट को पाता है।। ७५॥ ६काव्यालयस्योपरिगा विभाति भग्नीसुरेखा यदि चायुषीया। सुखाभिलाषी मनुजस्तदा स्वाल्लज्जामुपेतो ललनासमेतः॥७६॥ आयुरेखा की भग्नीरेखा यदि शुक्र के ऊपरले भाग में प्राप्त होकर सोहती हो तो वह माणी लाज को पाता हुआ ललनाओं से संयुत होकर सुखों का अभिलापी (चाह रखनेवाला) होता है॥ ७६ ॥ १० अङ्गुष्ठपृष्ठे विशदस्वरूपं रेखाविभिन्नं यदि वृत्तचिह्रम्। तदा नरो मज्जति वारिशशौ व्यायामसक्ो व्यसनातुरश्च॥ ७७॥ अँगूठे की पीठपै साफ़ होकर रेखा से कटा हुआ वृत्त का निशान (यानी मोहर का सा चिह्न) यदि सोहता हो तो वह पाणी कसरती होकर जुआ आदि खेलों को खेलता हुआ नदी आदिकों में डूबजाता है।। ७७॥ ११ अङ्गष्ठमूले परितो विभाति नाक्षत्रचिह्नं विशदस्वरूपम्। वामासमेतो मनुजो मनस्व्री नानामुभोगं नितरां भुनक्ि। ७८॥। साफ़ रूप होकर नक्षत्र का चिह्न (स्टार) यदि अँगूठे की मूल में चारों ओर चमकता ताप्रतीत हो तो वह प्राणी मनस्वी होकर लुगाइयों (सुन्दरियों) से संयुत होता हुआ अनाभांति सुभोगों को अपधिकता से भोगता है॥ ७८॥ २ जैवातृकस्थानगतं विशालं विभाति चिह्नं यदि न्यूनकोणम्। नायं नरः स्यात्परिणामदर्शी स्वकीयदोषान्मरणं प्रयाति॥ ७६॥ विशालरूप होकर न्यूनकोण का निशान यदि चन्द्रमा के स्थान में विरोषता से गोहता हो तो यह पाणी अग्रशोची नहीं होता है वरन अपने ही दोप से मौत को ता है।। ७६ ॥ १ अध्जो जैवातृक: सोमो ग्लौर्मृगाङ्क: कलानिधिरित्यमरः॥ सामुदिकशास्त्रस्य १३ भाग्यस्य रेखोपरिंगं विभाति विदङ्धतुल्यं यदि शुद्धचिह्रम्। शूलार्तियुक्ो मनुजस्तदा स्याद्ामाकरे चेदुजताविशेषः॥८०॥ कबूतरों के दरवा के समान होकर साफ़ निशान यदि भाग्यरेखा (फेटलाइन) ऊपर माप्त हुआ विशेषता से सोहता हो तो वह मारणी शूलपीढ़ा से पीड़ित होता है या उस पाणी के पेट में मायः पीड़ा बनी रहती है और यदि पूर्वोक निशान वामाओं (सु रियों) के करतल में भाग्यरखा के ऊपर देखा जावे तो रोगों की विशेपता होती यानी शूलरोग की अधिकता होती है।। ८० ॥। १४ पितुः सुरेखा मणिबन्धमुक्का कौटिल्यरेखाद्यसंयुता चेत्। आद्ये वयस्के शुभमेति प्राणी रेखात्रये सप्ति वत्सर नो ॥ ८१॥ जिसके करतल में पिता की रखा मशिवन्ध (कब्ज़े ) से छुटी हुई टेदी दो रेखा से संयुक्न होकर प्रतीत होवे तो वह पाणी पहली अवस्था में शुभदायक फलं को प है और यदि तीन रेखाओं से संयुत देखी जाबे तो वह माणी सचरि वर्ष पर्यन्त शुभ यक फल को नहीं पाता है॥। ८१ (देखो चित्र नं० १६) अथ पोडशलक्षणाद्ितकरतलफलमाह- १ चन्द्रात्मजस्थानगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदस्वरूपम्। बुद्धया विहीनो मनुजस्तदानीं मासभ्यदोषान्मरएं प्रयाति ॥ ८२॥ चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ साफ़ होकर अरधवटत्तका निशान यदि सोहता हो तो पाणी बुद्धि से विद्दीन होता हुआ अपने हठदोप से मौत को पाता है।। =२॥ २ सौम्यालयान्ते दिनपालये वा रेखा यदैका सरला विभाति। सत्कर्मकारी मनुजो महात्मा धर्माधिकारी श्रमतासमेतः ॥८३॥ बुधस्थान के समीप या सूर्यके स्थानमें यदि एक रेखा सीधी होकर सोहती हो तो प्रारणी महात्मा होकर सत्कर्मकारी (भले कामों का करनेवाला) तथा धर्माधिकारी हो हुआ परिश्रमशाली होता है॥। ८३ ।। ३ अनामिकामध्यमिकासुमध्ये रेखा सुवक्रा यदि याति भानुम। महाभिमानी मनुजस्तदा स्थान्मौढ्येन युको, महसा विहीनः॥८४॥ अनामा और मध्यमा के विचले भाग में एक छोटी व मोटीसी रेखा टेढ़ी होकर रह सूर्य के समीप चली जावे तो वह माणी बड़ा अभिमानी होकर मूर्खता से संयुक्त होता ह तेज से विहीन रहता है।। =४ ।।

  • १ कपोतपालिकायां तु बिटङ्गं पुन्नपुंसकमित्यमर: ॥ ५ूह 8 मार्तराडपुत्रालयगा विभान्ति रेखाः सुक्षुद्रा रससंमिताश्चेत। उद्योगशाली पुरुषस्तदा स्यात् सौख्यादिहीनः श्रमताविहीनः॥८५॥ शनैथर के स्थान में म्राप्त हुई छोटीसी छः रेखायें यदि सोहती हों तो वह पराणणी उद्योगशाली (रोज़गारी) होकर परिश्रम से रहित होता हुआ सौख्यादिकों से विहीन कहाता है॥। ८५ ॥ ५ संभोगरेखा गुरुमन्दिरस्था तस्याः सुशाखा यदि चैति मन्दम्। वित्तार्जकः स्यात्पुरुषः पवित्रो नारीविहीनो नयतासुपेतः ॥८६॥ संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आ्रयुरेखा) यदि तर्जनी पर्यन्त चली जाने और उसकी साखा शनैश्वर की तरफ़ चली जावे तो वह पाणी धनों को इकट्ठा करता हुआ यानी दौलत को बटोरता हुआ लुगाई से रहित होकर नीति से संयुत होता है ॥ ८६ ॥। ६ सुरेन्द्रपूज्यालयगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं दिरेखम् । धर्मी जनोयं शुभताभुपैति भिन्नं यदा चेच्छ्रघातमेति॥८७॥ बृहस्पति के स्थान में प्राप्त हुआ तिरीछा कटा व सीधा होकर दो रेखाओंवाला नि- शन यदि सोहता हो तो यह पाी धर्मी होकर शुभदायक फल को पाता है और यदि वूर्वोक निशान आन रेखाओं से कटा हुआ देखा जावे तो वह प्राी शीश में चोट चपेट को पाता है॥ ८७ ।। 9 बृहस्पतिस्थानगता सुवक्रा रेखा यदैका यदि याति मात्रीम्। उग्रस्वभावो मनुजस्तदा स्यादुन्मत्तरूपी मदनातुरश्र ॥८८॥ बृहस्पति के स्थान में प्राप्त हुई टेढ़ी होकर एक रेखा यदि मातृरेखा के सामने चली शावे तो वह भाणी उग्रस्वभाववाला होकर मतताला होता हुआ कामदेव से पीड़ित ोता है॥। ८८ ॥ संभोगरेखा यदि नीचदेशे भिन्ना यदा स्याद्यगरेखिकाभ्याम्। सं मोगरेखा शूरार्दितोयं समरे मनुष्यः प्रामोति मृत्युं सहसा सहिष्णुः ॥८६॥ जिस समय भोगरेखा (आयुरेखा) निचले भाग में दो रेखाओं से कटी हुई यदि म- त होवे तो वह माणी लड़ाई में शूरों (वीरों) से सताया हुआ सहनशील होकर एका- की मौत को पाता है॥ ८६ ॥ संभोगरेखा संभोगरेखा यदि मध्यभागे खज्ञेन भिन्ना विशदा विभाति। द्रव्यावने घातमुपैति प्राणी शेषे विभिन्ना स्वघने क्षयाप्तिम् ॥ ६० ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य संभोगरेखा साफ़ होकर यदि बीच में खद्गाकार (तलवार के समान) निशान से क हुई सोहती हो तो वह पाणी दौलत की रखवारी करने में घात को पाता है यानी घाप होजाता है और यदि पूर्वोक निशान शेपभाग में कटा हुआ देखा जावे तो वह प्राग अपने माल की रखवारी करने में मारा जाता है॥। ६० ॥ १० मातुः सुरेखा यदि नीचभागे गुणत्रयेाप्यवखसिडता स्यात्। स्वमानरक्षानिरतः सदुःखी इस्वा प्रशंसी द्विगुणावतंसी॥।६१।। माते ां यदि माता की रेखा निचले भाग में तीन गुणों के निशानों से कटी हुई देखी जावे वह पाणी अपने मान की रक्षा करने में परायण होता हुआ बड़ा दुःखी होता है और य पूर्वोकक रेखा छोटीसी प्रतीत होवे तो वह पाणणी बड़ाई पाता है और यदि पूर्वोक निर दूना प्रतीत हो तो वह पाणी गौरव से संपन्न होता है ।। ६१ ।। ११ अङ्गुश्वशाखावृतमध्यभागं रेखात्रयं पर्वयुगे विभाति। तदा नरो बन्धनभीतिमेति दीर्घं यदा चेत्फलमन्दता स्यात्॥ ६२ अँगूठे की शाखाओं से घिरे मध्यभागवाले तीन रेखाओं का निशान यदि अँगूठे दूसरी पोर में सोहता हो तो वह माणी कैद होने की भय को पाता है और यदि पूररो निशान दीर्घाकार सोहता हो तो फल की अल्पता होजाती है । ६२ ॥ १२ अङ्गप्ठपृष्ठे पथमे परुष्के रेखात्रयं क्षुद्रतरं चकास्ति। तदा मनुष्यो वधतायुपैति पाशेन विद्धो निजबन्धुहीनः ॥ ६३ ॥ अँगूठे की पीठपर पहली पोर में छोटासा तीन रेखाओं का निशान यदि सोहता हो वह प्राणी अपने बन्धुओं से विहीन होकर फांसी से विंधा हुआ वध को पाता है।ह? १३ क्षपाकरस्योपरिंगं विभाति नाक्षत्ररूपं विशदस्वरूपय्। विश्वासदानैः प्रथितो मनुष्यो दीनो दरिद्रो धनतामुपैति॥६४॥ चन्द्रमा के ऊपरले स्थान में प्राप्त हुआ साफ़ होकर नक्षत्र कासा निशान यदि से हता हो तो वह पाणी विश्वास और दानों से विख्यात होता है और जो दीन होक दरिद्री हो तो: धनसमूहों को पाता है यानी पूर्वोंक्क निशान दरिद्री के हाथ में देखा जा तो वह दौलत को पाता है ।। ३४ ॥ १४ पितुः सुरेखा मिलिता जनन्या मध्ये सुकोएं यदि भाति चिह्नम्। अल्पायुर्व तं मनुजं करोति नीचाश्रयं निन्दिंतकर्मकारम्॥ ६५ ॥ यदि पिता की रेखा मातरेखा के बीच में मिली हुई देखी जावे और वहां शोभायमान कोखका निशान सोहता हो तो उस प्राणी को अल्पायु व नीचों का साथी था बुरे कामों का करनेवाला बनाता है॥ ६५ ॥ १५ पित्रा वियुक्ा मणिबन्धदेशे वक्रा सुभाग्या यदि याति भोगाम्। बुद्ध्या विहीनो मनुजो विवादी हासी विलासी कलहातुरश्च ॥६६॥ जिसके मणिवन्ध (कब्ज़े) में पितृरेखा से छुटी व टेढ़ी होकर भाग्य की रेखा यदि मोगरेखा के सामने चलीजावे तो वह प्राणी बुद्धि से विहीन होता हुआ विवादी, हासी व विलासी होकर लड़ाई लड़ने में लगा रहता है। ६६ ॥ १६ पितुस्सुरेखोपरिगा विभाति रेखा गभीरा विशदा विक्षुद्रा। भयंकरः स्यान्मनुजस्तदानीं दर्शी विमर्शी विषयारतश्र ॥६७॥ पिता की रेखा के ऊपर माप्त हुई रेखा गहरी, साफ़ व छोटी होकर यदि सोहती हो तो वह प्राणी भयंकर होता हुआ अशुभों का देखनेवाला व विचारनेव्राला होकर विषयों में फसा रहता है॥ ३७ ॥ (देखो चित्र नं० २० ) १ कनिष्ठिकायास्सकले परुष्के मध्ये त्रिरेखं सरलं विभाति। तदा नरो दर्शनशास्त्रवेत्ता विचारशीलो बुधवृन्दवन्द्यः ॥ ६८ ॥ कनिष्ठा अँगुली की तीनों पोरों के बीच में सीधा होकर तीन रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह पराणी दर्शनशास्त्र का वेत्ता (जाननेव्राला) होकर विचारशील होता हुआ पणिडतगणो से वन्दनीय होता है॥ ६८ ॥ २ पैत्रीं सुमात्रीं च तथा सुभोगां भित्त्वा पताका यदि याति चान्द्रीम्। पता का रेखा बाल्ये सुमध्ये च शुभाभिलाषी वार्द्धे प्रवृद्धिं पुरुषः प्रयाति ॥६६ ॥ पितृरेखा, मातृरेखा तथा सुभोगरेखा को काटकर पताका नाम रेखा यदि बुध पर्यन्त वली जावे तो वह प्राणी वाल्यावस्था व युवावस्था में शुभाभिलापी होकर वृद्धावस्था में बड़ी बढ़ती को पाता है।। ६ै६ ।। ३ शनैश्चरस्थानगतं विक्षुद्रं चिह्नं त्रिरेखं सरलं विभाति। वक्षस्स्थलाघातमुपैति प्राणी सम्पत्तिशाली विपदाविहीनः ॥ १०० ॥ शनैश्चर के स्थान में माप्त हुआ छोटा व सीधा होकर तीन रेखाओंवाला निशान दि सोहता हो तो वह पाणी संपत्तिशाली व विपदाओं से विहीन होकर वक्षस्स्थल में वोट को पाता है॥ १०० ॥ द र रखबा सामुद्रिकशास्त्रस्य सभोग ४ संभोगरेखाधिषणालयस्था कोऐन युक्का यदि चोर्ध्वभागे। स्वार्थी सुमानी मनुजस्तदानीं प्रासभ्यदोषान्निधनं प्रयाति ॥ १॥ बुध से चली बृहस्पति के स्थान में टिकी हुई संभोगरखा यदि ऊपरले भाग में को के निशान से संयुक्र होकर पतीत होवे तो वह माणी स्वार्थी (मतलवी) होकर बड़ा मा होता हुआ हठदोष से मौत को पाता है ।। १।। मुभोगरेखा गुरुगा विभाति त्रिकोणयुकश्र तदूर्ध्वदेशः। तदा जनोयं जनतामुपैति विनष्टवित्तो विविधामयश्च॥२॥ सुभोगरखा (आयुरेखा) यदि बृहस्पति के स्थान में सोहती हो और उसका ऊपर भाग त्रिकोणकार निशान से संयुत हो तो वह भाणणी द्रव्यों से हीन होकर अ्नेक रो संभोगरेखा वाला होता हुआ जनसमूहों को पाता है । २॥ ६ भोगाघरस्थं विशदं विभाति चिह्नं यदा चार्द्धविसर्गतुल्यम्। संपूर्णकार्ये श्रमतामुपैति नार्या यदा चेत्मसवेऽतिकष्टम ॥ ३॥ साफ़ व आधी विसर्ग के समान होकर निशान भोगरेखा के निचले भाग में सोहता हो तो वह प्राणी समस्त कार्यों में परिश्रमी होता है और यदि पूर्वोक्क निशान खि के करतल में सोहता हो तो वे स्त्रियां मसवकाल में 4यानी बच्चा जनने में" बड़ा पाती हैं।। ३।। ७ काव्यालयादुत्थितवक्ररेखा भोगां विभित्त्वा यदि याति चान्द्रिम। तदा नरोयं शिरसा विभिन्नः पाशाग्रविद्धो मरणं प्रयाति ॥४॥ शुक्र के स्थान से चली हुई टेढी रेखा भोगरेखा को काटकर बुध के पास च जावे तो यह माणी शिर से विभिन्न होकर फाँसी के अग्रभाग से विंधा हुआ मौत पाता है।। ४ ।। ८ मातुस्सुरेखोपरिंगं विभाति चिह्नं विश्ुद्रं यदि पञ्चरखम्। सौशील्ययुक्ो मनुजो महात्मा कार्ये स्वकीये निरतो विवेकी॥ ५ ॥ विशेप कर छोटा सा होकर पांच सीधी रेखाओंवाला निशान मातरेखा के ऊपर हुआ यदि सोहता हो तो वह पाणी बड़ा शीलवान् व महात्मा होकर अपने कार्य में ल हुआ विचारवान् होता है॥। ५॥ मांत रेखा को पास ६ पितुस्सुरेखोपरिगा सुवका रेखा विक्षुद्रा यदि याति मात्रीम्। तदा नरः सन्नपमृत्युभीतो विषप्रयोगान्मरणं प्रयाति ॥ ६॥ १ बृहस्पतिः सुराचार्यो गीप्पतिर्धिपणो गुरुरित्यमरः ॥ पितृरेखा के ऊपर पराप्त हुई टेढ़ी व छोटी सी रेखा मातरेखा के पास चली जावे तो ह पाणी अपमृत्यु (अकाल मौत) से डरता हुआ विप के पयोग से माँत को पाताहै यानी उस प्राणी को विष खिला देने से मौत होजाती है ॥ ६ ॥ १० जैवातृकस्थानगतं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदं विशालम्। तदा जनोयं जनयूथभिन्नो विभीतचित्तो निधनं प्रयाति ॥।७॥ चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ साफ़ व विशाल होकर अर्ववृत्त का निशान यदि सोहता हो तो यह भाणणी जनसमूहों से पीटा हुआ डरे चित्तवाला होकर मरणा को गता है।। ७ ।। ११ बुघालयस्था विशदा विश्ुद्रा रेखा सुवक्रा यदि याति भोगाम्। तदा नरो यौवनस्वस्थचित्तः क्रेरः सुलोभी परकार्यकारी॥८॥। बुध के स्थान में टिकी हुई साफ़, छोटी व टेढी सी रेखा भोगरेखा पर्यन्त चली नावे तो वह माणी यौवनकाल (ज्वानी) में स्वस्थचित्त होता हुआ निर्दयी व बड़ा लोभी होकर पराये काम का करनेवाला होता है॥ ८ ॥ १२ भाग्योत्थिता या मणिबन्धमेति रेखा गभीरा विशदा सुवक्रा। पापानुसारी मनुजो मनस्वी प्रापोति मृत्युं निजकर्मदोषात्॥ ६ ॥ भाग्यरखा (फेटलाइन) से उठी जो रेखा गहरी, साफ़ व टेढी होकर मणिबन्ध (कब्ज़े) के पास चली जावे तो वह प्राणी मनमौजी (यथेच्छाचारी) होकर पापों का अनुसरण करता हुआ यानी पापकारी होता हुआ अपने कर्मों के दोप से मौत को पाता है। ६ ॥ (देखो चित्र नं० २१) L १ कनिष्ठिकायास्त्रितये परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। स्वीयापराधान्मृतिमेति प्राणी पाशेन विद्धश्शिरसा विभिन्नः ॥१०॥ कनिष्ठा अँगुली की तीसरी पोर में साफ़ होकर अर्धवृत्तका निशान सोहता हो तो वह पाता है॥ १० ॥ पाणी फाँसी से बिंधा हुआ फूटे हुए शीशवाला होकर अपने अपराध से ही मौत को २ भोगाधरस्था विशदा विक्ुद्राश्चुल्लीसरूपा यदि भान्ति रेखाः। शैथिल्यकायो मनुजो मलाक्को मन्दस्वभावो ममतामुपैति॥११॥ १ फ्ूर: कठिननिर्दयावित्यमर:॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य भोगरेखा के नीचे टिकी हुई साफ़ व छोटी सी होकर चूल्हे समान रेखायें यदि हती हों तो वह पाणी ढीले अंगवाला व मल से भरा हुआ होकर नीच स्वभावत होता हुआ ममता को पाता है॥। ११॥ ३ ऋज्वी सुभोगा धिषणालयान्ता तस्याः सुशाखा समुपैति शौरिम। परिश्रमासक्रमना मनुष्यः कष्टेन कालं नयते करालम् ॥ १२ ॥ सुभोगरेखा (आयुरेखा) सीधी होकर बृहस्पति के स्थानपर्यन्त चलीजावे और की शाखा शनैश्वर के पास पहुँच जाबे तो वह प्राणी मेहनत करने में मनको लगाता कराल काल को बिताता है ॥ १२ ॥ ४ भोगाधरस्थं विशदं विभाति जिह्वामुमूलीयसमानरूपम्। वित्तं मनुष्यो लभते ह्यचिन्त्यं पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम् ॥१३॥ जिहांमूलीय के समानरूपवाला निशान साफ़ होकर भोगरेखा के नीचे टिका सोहता हो तो वह प्राी अचिन्तनीय धन को पाता है यह विचार पूर्वोक़ प्रमाण से क चाहिये॥ १३ ॥ र पाट: सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखाद्याभ्यामुपसंगता स्यात्। विश्वासयुको मनुजस्तदानीं दानी सुमानी धनतासमेतः॥१४॥ माता की रेखा यदि ऊपरले भाग में दो शाखाओं से संयुत होकर प्रतीत होवे तो पाणी विश्वासी, दानी और सुमानी होकर धनसमूहों से सम्पन्न होता है॥ १४॥ ६ मातु: सुरेखा यदि शेषभागे क्षद्रा विमिश्रा विशदा विभाति। व्याजापदेशो मनुजो विकाशी हासी विलासी विषयारतश्र॥१५ रेखा माता की रेखा यदि निचले भाग में छोटी रेखा से मिली हुई साफ़ होकर सोहती म तो वह प्राणी छल से बहाना करता हुआ प्रकाशी, हासी तथा विलासी होकर विपयो आसक़ रहता है॥ १५॥ पित्रा वियुक्ा यदि मातृरेखा क्षुद्रा समेता नितरां चकास्ति। भविष्यवक्ा मनुजस्तदा स्यात प्रज्ञासमेतो बहुशास्त्रविज्ञः॥ १६॥ पिता की रेखा से अलग हुई माता की रेखा क्षुद्ररेखाओं से संयुक्र होकर यदि श्रा कता से सोहती हो तो वह प्राणी होनहार का कहनेवाला होता हुआ प्रतिभाशालि बुद्धि से संपन्न होकर अ्रपरनेक शास्त्रों का विज्ञाता होता है ॥ १६ ॥ =मात्रा वियुका यदि पितृरेखा क्षुद्रा विमिश्रं च तयोस्सुमध्यम्। विरोधकारी कलही मनुष्यो विवादशाली जनयूथभिन्नः॥१७॥ भाता की रेखा से छुटी हुई यदि पिता की रेखा हो और उन दोनों का मध्यभाग कोटी छोटी रेखाओं से मिला हुआ देखा जावे तो वह प्राणी विरोधकारी वे लड़ाका होता हआ विवादशाली होकर जनसमूहों से पीड़ित किया जाता है ।। १७ । पितुः सुरेखोत्थितरेखिकाम्यां मातुः सुरेखा यदि संयुता स्यात। चाञ्चल्यबुद्धिर्मनुजो मनस्व्ी वृथाभिमानी भ्रमते नितान्तम् ॥१८।। माता की रेखा यदि पिता की रेखा से उठी हुंई दो रेखाओं से संयुत होकर देखी जावे तो वह प्राणणी चश्चलबुद्धिवाला व मनमौजी होता हुआ वृथाभिमानी होकर हमेशा घूमा करता है । १८ ॥ ०पित्रोस्सुमध्ये यदि याति चिह्नं रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। गर्भस्य पातं लभते मनुष्यो नार्या यदा चेत्पसवेतिसौख्यम् ॥ १६॥ मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में दो रेखाओंवाला निशान यदि दो रेखाओं से ख- एिडत हुआ देखाजावे तो वह माणी अपनी भार्या में गर्भस्ाव को पाता है और यदि पूर्वोक् निशान स्त्री के करतल में प्रतीत होवे तो वह प्रसवकाल में बड़े सौंख्य को पाता यानी वह लुगाई सुखसे बच्चे को जनती है ॥ १६ ॥। ११ पितुः सुरेखा यदि कुञ्चिताग्रा मध्ये सुपीना मणिबन्धहीना। असत्यवादी पुरुषः प्रमादी कुवेषधारी मलिनस्त्रभावः ॥ २० ॥ पिता की रेखा यदि अ्रग्रभाग में टेढ़ी हो और वीच में मोटी होकर क़ब्ज़े से छुटी हुई देखी जावे तो वह माणी ूंठा व जिद्दी होताहुआ वुरे वेश का धारनेवाला होकर मैले स्वभाव से रहता है ॥ २० ॥ भाग्यररजा १२ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद् भाग्या सुरेखा समुपैति सौम्यम्। 66- क्षणे प्रवृद्धिं लभते मनुष्यः क्षणे क्षयासिं परदेशवासी॥ २१॥ यदि मशिबन्ध (क़ब्ज़े) से उठी हुई भाग्यरेखा बुधके पास चली जावे तो वह माणी परदेशनिवासी होताहुआ क्षणमें बड़ी बढती व क्षणमें क्षयको पाता है ॥ २१॥ १३ चन्द्रालयस्थं कुटिलं द्विरेखं विभाति रेखान्वितवामभागम्। निजव्ययेनापि युतो मनुष्यो देशे सुदूरे निकटे भ्रमेच ॥ २२ ॥ चन्द्रमा के स्थान में टिकाहुआ टेढा व दो रेखाऑवाला निशान यदि वामभाग में रेखासे जुड़ा हुआ देखा जाये तो वह पाखी अपने खर्चे से ही दूरदेश व निकट (नगीची) देश में घूमता है॥। २२ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य १४ मित्त्वा यदेयं मणिबन्धदेशं रेखा गभीरा यदि याति काव्यम्। चञ्नत्भावो मनुजो विलासी चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावः॥२३॥ जिस समय मशिबन्य (कब्जे) को भेदन कर यह रेखा गहरी होकर यदि शुद्र पास चलीजावे तो वह भाणी बड़े पभाववाला व विलासी होकर चतुरता से संप होताहुआ चपलस्वभाववाला कहा जाता है।। २३ ॥ (देखो चित्र नं० २२) १ चन्द्रात्मजस्थानगतं सुचिहनं कुद्रं त्रिरेखं सरलं चकास्ति। चौर्य्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदा स्यान्मिथ्यापवादी मदनातुसश्र॥ २४॥ बुध के स्थान (जगह) में पहुँचाहुआ शोभायमान निशान छोटासा तीन रेखाओंवा व सीधा होकर यदि सोहता है तो वह गाी चोरी करने में लगाहुआ मूंठा हो कामातुर होता है॥ २४॥ २ संभोगरेखोपरिंगं विशुद्धं रेखात्रयं ुद्रतरं चकास्ति। बाह्लो: सुघातं लभते मनष्यो मन्दस्वभावो ममतायुपेतः।।२५।। सुभोगरेखा के ऊपरले भागमें पापहुआ तीन रेखाओोंवाला निशान साफ़ व छोटा होकर यदि चमकता हो तो वह माखी नीच स्व्भाववाला होकर ममता से संपन्न हो हुआ भुजाओं में आघात को पाता है॥ २५॥। ३ बुधालयान्ते दिनपालये वा रेखाद्यं वै कटिलं विभाति। गाम्भीर्यशालीहपुरुषः सुनोध: स्थूलं यदा चेत्कटिघातमेति॥२६॥ घुधकी आखिरी जगह में या सूर्यके स्थान में दो रेखाओंवाला निशान यदि टेढा होकर सोहता हो तो यह पाखी महाज्ञानी होकर गाम्भीर्यशाली होता है और यदि पूवों निशान मोटासा प्रतीत होवे तो वह भाणी कमर में आघातको पाता है ॥२६ ॥ ४ अरनामिकामध्यमिकासुमूले रेखाद्यं वै सरलं विभाति।' मनस्मुशक्किर्मनुजस्सुबुद्धि: संकर्तितं चेत्फ़लमन्यथा स्यात्॥ २७॥ अरप्रनामा व मध्यमा अँगुली की मूलमें दो रेखाओंवाला निशान सीधा होकर यदि से हता. हो तो वह प्राखी मानसी शक्तिका रखनेवाला होकर वड़ी बुद्धिवाला होता है श्र यदि पूर्वोक्क निशान तिरछी रेखाओं से कटा हुआ देखाजावे तो कहे हुए फल अल्पता होती है॥ २७ । ५. देवेन्द्रवन्द्यालयगा विभान्ति रेखा विक्षुद्राः सरलाश्र पञ्च। प्राप्ोति मृत्युं हठतो मनुष्यो मत्या विहीनो ममतासमेतः॥ २८॥ · ६७ बृहस्पति की जगह में पहुँची हुंई छोटीसी होकर सीधी पांच रेखायें यदि सोहती हों े वह माणणी बुद्धि से विहीन होकर ममता से सम्पत्ष होता हुआ अपने हठ से मौँत. हो पाता है।। २८ ।। माग्यर खा मात्रीं सशाखां च सुभोगरेखा भाग्या विभित्वा यदि याति मन्दमू। वक्त्राभिघातं लभते मनुष्यो नायी यदा चेत्सवेऽतिकष्टम॥ २६॥ मातृरेखा और शाखासमेत भोगरेखा (अस्मदेशीय आयुरेखा) को काटकर भाग्यरेखा फेटलाइन) यदि शनैक्षर पर्यन्त चलीजावे तो वह भागी मुख में आघात को पाता और यदि पूर्वोक निशान स्त्री के करतल में भवीत होवे तो वह बच्चा जनने के समय ड़ा कष्ट पाती है।। २६ ॥! 9 पितुस्समत्था कुटिला सुरेखा सविन्दुकोणदयसंयुता चेद। तदा नरो दर्शनशास्वेत्ता विपर्यये चेत्फलमन्यथा स्यात्॥ ३०॥ पिता की रेखा से उठीहुई टेढ़ी रेखा बिन्दु समत दो त्रिकोण निशानों से संयुक्त देखी बे तो वह माणी दर्शनशास्त्र का ज्ञाता होता है और यदि पूर्वोक निशान उलटा होकर पतीत होवे तो उक्र फल का ह्रास होता है॥ ३० ॥ भोगाधरस्था विशदा विश्ुद्रा विभान्ति रेखाः सरलाश्च पद्काः। भोगक्षयं वै लभते मनुष्य: पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम्॥ ३१॥ भोगरेखा के निचले भाग में टिकी हुंई साफ़ व सीधी होकर छोटी सी छह रेखायें दि सोहती हों तो वह प्राणणी भोगों के क्षयको पाता है यह विचार पूर्वोक़ मानसे करना चाहिये ।। ३१ ॥ मातुस्मुरेखाधरगं विभाति गुणेन युक्नं यदि कोणयुग्मय्। तदा नरो दर्शनपारगामी नामी सुधामी धनतामुपेतः॥३२॥ मातृरेखा के निचले भागमें प्राप्त हु गुग्पाके x निशान से संयुक्त होकर दो त्रिकोणों काचिह्न चमकता हो तो वह प्राणी नामी व सुधामी होकर धनसमूहों से संपन्न होता हुआ दर्शनशास्त्रका पारगामी होता है।। ३२।। ० पितुः सुरेखा मिलिता जनन्यां रेखात्रयेणापि युतं तदूर्ध्वम्। परस्त्रियं वै भजते मनुष्यो विहाय नारीं सुभगां स्वकीयाम् ॥ ३३ ॥ पिता की रेखा माता की रेखा में मिलगई हो और उनका ऊपरला भाग टेढी तीन खाओ्ंसे जुड़ाहुआ देखाजावे तो वह पराणी वड़भागिनी अपनी भार्या को छोड़कर परभार्या को भजता है।। ३ ३॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य पितरखिा ११ पितुस्सुरेखा यदि दीर्घरूपा मातुस्सुरेखा बहुस्वल्पगा स्यात्। तदा नरो जीवति दीर्घकालं विश्वासघाती म्रियते प्रवासे ॥३४। यदि पिताकी रेखा दीर्घाकार होकर प्रतीत हो और माताकी रेखा बहुतही छोटी प्रतीत होवे तो वह भाणणी बहुत काल पर्यन्त जीता बना रहता व विश्वासघाती होत परदेश में मरजाता है॥। ३४ ।। भाग्याधरस्थ विशदं विभाति नन्दाङ्कचिह्नं यदि भासमानम्। सन्तुष्टचित्तो मनुजस्तदा स्यादाता दयालुर्निजवंशघाता॥ ३५ ॥ भाग्यरेखा के निचले भागमें टिकाहुआ साफ़ होकर नवके अङ्कके समान निश यदि भासमान होता हुआ देखाजावे तो वह प्राणी सन्तुष्टचित्त होता हुआ दाता व दया होकर अपने वंश का बाता होता है॥ ३५॥ १३ काव्यालयोत्था यदि याति रेखा पैत्रीं सुमात्रीं च विभिद्य भोगाम् भा शूरो मनुष्यो द्विपतो विजित्य सौभाग्यशाली लभते सुवित्तम्॥३६ शुक्रके घरसे उठी हुई रेखा यदि पितुरेखा व मातरेखा को काटकर भोगरेखा पर्पन चली जावे तो वह पाणी शत्रुवोंका विजयकर शूरमा व सौभाग्यशाली होता हुआ बड़े को पाता है॥ ३६ ॥ १४ अ्ङ्गष्ठसीमाचलिते गभीरे रेखे विभुग्ने पितरं विभिन्तः । स्वेच्छानुसारी पुरुषो विहारी देशे सुदूरे भ्रमते नितान्तम् ॥३७॥ अँगूठे की सीमा (हद) से चलीहुंई दो रेखायें गहरी व टेढ़ी होकर पितृरेखा को काट · हों तो वह माणी अपनी चाहकी चाहना करनेत्राला होकर विहार करता हुआ बड़े देश में जाकर हमेशा घूमा करता है॥ ३७ ॥। १५ अङ्गष्ठमूलाच्चलिते विशुद्धे रेखे गभीरे मणिबन्धमेतः। लावराययुक्को मनुजो मनस्वी लोभाभिभूतो ललनासमेतः॥ ३८॥ अँगूठे की मूल से चली हुई दो रेखायें साफ़ व गहरी होकर मणिबन्ध (कब्जे) सामने आजावें तो वह माणी सुन्दरता से संयुत व मनमौजी होकर ललनागणों से स होताहुआ लोभ करने से आदर नहीं पाता है।। ३८ ॥ (देखो चित्र नं० २३) १ सर्वाङ्गलीनां युगरामैपर्वके संभाति रेखा सरला गभीरिका। आत्मापघातान्मृतिमेति मानवो दुष्टस्वभावो निजदोषदर्पितः ॥ ३६ समस्त अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में सीधी व गहरी होकर रेखा भली भांति सोहती हो तो वह पराणी बुरे स्वभाववाला होकर अपने दोपों से घमएडी होता हुआ आत्मा के अपघात सेही मौत को पाता है॥ ३६॥ २ कनिष्ठिकामूलगतं विभुग्नं रेखाचतुष्कं विशदं विभाति। संभोगशाली मनुजस्तदानीं भोगाभिलाषां रमणीमुपैति॥४०॥ कनिष्ठा की मूलमें प्राप्तहुआ चार रेखाओंवालानिशान टेढा व साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह भाणी बड़ा भोगशाली होकर भोगकी चाहनावाली रमणी को पाताहै ॥ ४० ॥ ३. मध्यासुमूले यदि भाति रेखा आचारहीनः शुचमेति प्राणी। वह्वीपु रेखामु च वन्धमेति म्लानासु पीडामधिकां भुनक्कि ॥ ४१ ॥ यदि छोटी सी एकरेखा मध्यमा अँगुली की मूल में सोहती हो तो वह प्राणी आचार से हीन होकर शोक को पाता है और यदि बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी कारागार (जेलखाने) में वन्धन को पाता है और यदि पूर्वोक रेखायें मैली सी प्रतीत हों तो वह माणी अधिक पीड़ा को भोगता है । ४१ ॥ ४ संभोगशाखा विशदा गभीरा प्रदेशिनीमूलगता विभाति। सभभोग रखा सत्यस्वभावो मनुजस्तदानीं लोकाभिमान्यो ललनामुपैति॥४२॥ सुभोगरेखा की शाखा साफ़ व गहरी होकर तर्जनी अँगुली की मूलमें यदि सोहती हो तो वह माणी सच्चे स्वभाववाला होकर लोगों से माननीय होताहुआ ललना (दुलारी प्यारी) को पाता है॥ ४२॥ ५ संभोगरेखा विशदा सुपीना संरक्रवर्णा सरला विभाति। संभोगरेखा संक्रामरोगी पुरुषः सुभोगी शोथेन युक्को भ्रमते भयार्तः ॥४३ ॥ सुभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) साफ़, मोटी, लाल तथा सीधी होकर यदि सोहती हो तो वह माशी संक्रामक रोगवाला व बड़ा भोगवाला व सूजनसे संयुक्क होकर भयसे घवड़ाता हुआ घूमता है।। ४३ ॥। ६ संभोगरेखोभयतो विभान्ति सूक्ष्मस्वरूपा बहुविन्दवश्च। सं सोगरेवा क्कीवस्वभावो मनुजो मनीषी धातुक्षयं वै लभते नितान्तम् ॥ ४४ ॥ सुभोगरखा की दोनों तरफ़ छोटेरूपवाले बहुतसे बिन्दु (नुक्े) यदि सोहते हों तो वह पराणी नपुंसक कासा स्वभाववाला होकर बुद्धिमान् होताहुआ धातुकी क्षीणता को हमेशा पाता है।। ४४ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ७ बृहस्पतिस्थानगतं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं कुरेखम्। प्रज्ञाविहीन: पुरुषस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा।। ४५।। बृंहस्पति के स्थान में प्राप्तहुआ एक रेखावाला निशान सीधा होकर तिरीछा कटाहुअ यदि सोहता हो तो वह पाणी वुद्धिसे हीन होता है और यदि पूर्वोंक निशान जिस स्ी करतल में पतीत हो तो वह व्यभिचारिणी (वेश्या ) होती है।। ४५ ॥ एयानाए ससुरखा यदि चोर्ध्वभागे नतस्वरूपा नितरां विभाति। अनिष्टकारी पुरुषो नराणां निर्बोधरूपो नयताविहीनः॥४६॥ माता की रेखा यदि ऊपरले भाग में लचेरूपवाली होकर अधिकता से सोहती हो तो वह मारणी पुरुषों के लिये अनिष्टकारी होकर अज्ञानी होताहुआ नयता (नीति) से विहीन रहता है॥ ४६॥ ६ मातुस्समुत्थं सरलं त्रिरेखं चिह्नं सुभोगाभिमुखं प्रयाति। विश्वासयुक्क: पुरुषः सुशीलः सत्ये रतः शान्तिपरो दयालुः॥४७॥ मांता की रेखा से उठाहुआ तीन रेखाओंवाला निशान सीधा होकर सुभोगरेखा के सामने चलाजावे तो वह मागी विश्वासी, सुशील व सत्य में रत होकर शान्ति में परायस होताहुआ दयालु बना रहता है।। ४७।। १०पित्रा वियुका यदि मातृरेखा स्थूलस्वरूपा गुरुगा विभाति। जारोद्धवो वै मनुजस्तदा स्याच्चातुर्यशाली चपलस्वभाव ः ॥ ४ पिता की रेखा से छुटी हुई माता की रेखा मोटी होकर बृहस्पति के स्थान में यदि मातोखा सोहती हो तो वह प्राखी जारजात (दोगला) होताहुआ चातुर्यशाली होकर चपल स्वभाववाला होता है॥। ४८ ॥ १ १ पित्रोस्सुमध्ये विशदं विभाति गुणाख्यचिह्नं यदि रक्नवर्णम्। उत्पातवृन्दं लभते मनुष्यो मायाविहीनो ममतासमेतः ॥४६॥ मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में गुणाका निशान X साफ़ लालवर्सवाला होकर यदि सोहता हो तो वह माणी मायाओं से विहीन होकर ममता से संपन्न होताहुआ उत्पात- समूहों को पाता है।। ४६॥ १२अङ्गप्वशाखावृतरेखयुग्मं सकोणचिह्नं प्रयुतं चकास्ति। तदा मनुष्यः शिरसा विभिन्नः पाशाग्रविद्धो मरणं प्रयाति ॥ ५० ॥ अँगूठे की शाखाओं से घिराहुआ दो रेखाओंवाला निशान यदि को समेत दित से संयुत होकर चमकता हो तो वह प्राखी शीशसे विभिन्न होकर फांसी के अग्रभाग से बिंधाहुआ मौत को पाता है॥ ५० ॥ संमोगरेखा १३ संभोगरेखा यदि नीचभागे क्षुद्राविमिश्रा विशदा विभाति। उत्पातयुक्ो मनुजस्तदानीं क्वेशाभिभूतो भयतामुपैति ॥५१॥ सुभोगरेखा निचले भागमें छोटी रेखा से संयुत होकर साफ़ होती हुई यदि सोहती हो तो वह पाणी उत्पातों से युक्र होकर कष्टों से दुःखी होताहुआ भय को पाता है ॥ ५१॥ ४ मातुस्सुरेखोभयतो विभाति बिन्दुत्रयं वै विरलं विकुद्रम्। तदा जनो दुर्वलगात्रयष्टिर्व्ययाधिकं वै लभते नितान्तम्॥५२॥ मातृरेखा के दोनों तरफ़ छोटे व विरल होकर तीन बिन्दु (नुके) यदि सोहते हें तो वह माणणी दुर्बल शरीरवाला होकर खर्च की अधिकता को हमेशा पाता है॥ ५२॥ १५ पितुस्सुभग्नी विशदा सुरेखा संवक्ररूपा समुपैति शौरिम। संक्षीणकायो मनुजो मलाक्नो मन्दस्वभावो ममतामुपैति॥५३ ॥ पितृरेखा की भग्नीरेखा साफ़ व टेढ़ी होकर यदि शनैश्वर पर्यन्त चलीजावे तो वह ाखी मलसे भरा व दुबले शरीरवाला होकर नचस्वभाव को रखता हुआ ममता को पाता है।। ५३। १६ मातुस्समुत्था मणिबन्धमेति सर्पानुरूपा विशदा सुरेखा। कारागृहं याति नरस्तदानीं स्वीयेन दोषेण समाकुलात्मा ॥। ५४॥ माता की रेखा से उठी हुई रेखा साफ़ व सर्पके समान आकारवाली होकर मणिबन्ध कब्ज़े) के सामने चली जावे तो वह पाणी अपने दोपसेही व्याकुल मनवाला होता आ जेलखाने को जाता है॥। ५४ ॥ (देखो चित्र नं० २४) कनिष्ठिकामूलतलाचलन्ती सार्धा सुरेखा परुरेति चाद्यम्। चातुर्ययुक्को मनुजस्तदा स्यात् सर्वेषु शास्त्रेषु महाप्रवीणः॥ ५५॥ कनिष्ठा अँगुली के मूलतल से चलती हुई डेदरेखा पहली पोरको पहुँचजावे तो वह, णी चातुरीकलासे संपन्न होता हुआ सकलशास्त्रों में बड़ा प्रवीश होता है॥ ५५ ॥ चन्द्रात्मजस्थानगतं विकषुद्र रेखाचतुष्कं सरलं चकास्ति। तदा जनो विन्दति जारजातान् पुत्रान्गुणढ्यान्गुरुतागतांश्च।। ५६॥ बुध के स्थान में पाप्तहुआ चार रेखाओंवाला निशान छोटा व सीधा होकर सामुद्रिकशास्त्रस्य यदि चमकता हो तो वह प्राणणी गुणों से संपन्न गुरुता को पाप्त जारजात (दोगले पुत्रोंको पाता है।। ५६ ॥ ३ मार्तएडपुत्रालयगं विभाति चिह्नं विक्षुद्रं सरलं त्रिरेखम्। वक्षस्स्थलाघातमुपैति प्राणी मान्यो वदान्यो विभुतासमेतः॥५७। शनैश्रर के स्थान में प्राप्त हुआ तीनरेखाओंवाला निशान छोटा व सीधा होकर य सोहता हो तो वह माणी मान्य व वहान्य (दाता) होता हुआ विभुता से संयुक्र हो छाती में चोटको पाता है॥। ५७॥ ४ मातुस्समुत्था विशदा सुरेखा भोगां विभित्त्वा यदि याति चान्द्रिम्। धर्मेण युक्को मनुजो धनाव्यो धन्यो धरित्र्यां क्षमतामुपैति॥५८॥ माताकी रेखासे उठीहुई साफ़ शोभायमान रेखा भोगरेखा को काटकर यदि वु समीप चलीजावे तो वह पराणी धनाव्य व धर्मसे संयुक्र होकर धरामएडल में धन्यव देने के योग्य होता हुआ क्षमता (सहनशीलता) को पाता है॥। ५८ ॥ भोगासमुत्था विशदा विक्षुद्रा मध्यासुमूलं समुपैति रेखा। सम्पत्तिवृन्दं लभते मनुष्यः सौभाग्यशाली सुषमासमेतः॥५६॥। भोगरेखा से उठीहई रेखा साफ व छोटीसी होकर मध्यमा अँगुलीकी मूलके पहुँच जावे तो वह ाणणी सौभाग्यशाली होताहुआपरमशो से संपन्न होकर ंप समूह को पाता है॥ ५६ ।। ६ भोगासुभग्नी विशदा विभिन्ना रेखा गभीरा यदि याति मन्दम्। संभोग (खास निकस मन्दस्वभावो मनुजो मलाक्ो दीर्घा यदा चेन्मलिनस्वभावः॥ ६०॥ भोगरेखा की भग्नीरेखा गहिरी होतीहुई साफ़ व भिन्न होकर यदि शनैश्र पड चली जावे तो वह प्राी मलसे भराहुआ नीचे स्वभाववाला होता है और पूर्वोक रो दीर्घाकारवाली प्तीत होवे तो वह प्रागणी मैले कुचैले स्वाभाववाला होता है॥ ६०॥ मातुस्सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे रेखात्रयेणाप्यवकर्तिता स्यात्। मिथ्याप्रलापी मनुजस्तदानीं कार्यें प्रतारे निरतो नितान्तम्॥ ६१ माता की रेखा ऊपरले भागमें तीन रेखाओं से कटी हुई यदि देखी जावे तो प्राणी मिथ्याभाषी होता हुआ छल के कार्य में हमेशा लगा रहता है॥ ६१॥ ८ शीर्षे सुपैत्री यदि मातृवृक्णा क्षद्राविभिन्ने च तयोः सुरेखे। विषप्रयोगे निरतो मनुष्यो मन्दे च कार्ये ममतामुपैति॥६२॥ पिता की रेखा ऊपरले भाग में यदि मातृरेखा से कटी हो और उन दोनों (पिता मा- ओं) की रेखायें छोटी रेखा से भिन्न होतें तो वह भाखी विपप्रयोग में यानी विप वलादेने में निरत होताहुआ मन्दकार्य (नीचकार्य) में ममता को पाता है॥ ६२॥ मध्ये विभिन्ना सरला गभीरा मातुः सुरेखा शशिगा नता चेत। मात्ट रखा आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यो वृद्धे वयस्के श्रमतामुपैति॥६३ ॥ माताकी रेखा बीचमें कटीहुई सीधी, गहरी व लची

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 5)

होकर चन्द्रमा के स्थान में पहुँचजावे वह माणणी अल्पायु को पाता है और वृद्धावस्था में परिश्रम को करता है॥ ६३॥ • पितुस्मुशेषाच्चलिता सुरेखा भाग्यां विभित्त्वा यदि याति मात्रीम्। दीर्घायुषं तं पुरुषं करोति सुतीन्रबुद्धि सरलस्वभावय्।६४॥बह पितृरेखा के शेपभाग से चली हुई रेखा भाग्यरेखा को भेदन करं यदि मातूरेखा निकल न्त चली जाने तो उस मागी को दीर्वायु, तीक्ष्णवुद्धि व सीधे स्व्रभाववाला रती है॥। ६४ ।। पित्ट रेखाका १ पितुस्मुरेखा विशदा सुवक्रा भागदये चास्ति विभक्करूपा। दोमाशों मे तदा नरोयं निधनं प्रयाति पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम्॥ ६५ ॥ पिता की रेखा साफ़ व टेढ़ी होकर दो भागों में बटी हुई देखी जावे तो वह पाणी तयुको पाता है इसका विचार पूर्वोक्क मानसे करना चाहिये ॥ ६५ ॥ २ वेपाधरस्थं विशदं विभाति वज्रानुरूपं यदि भासमानम्। वार्द्धे मनुष्य: शुभतामुपैति पूर्णं यदा चेच्छुभताधिकं च ॥ ६६ ॥ पिताकी रेखा के नीचे टिकाहुआ वज्राकार निशान साफ़ व शोभायमान होता हुआ म- त हो तो वह प्राणणी वृद्धावस्था में शुभता को पाता है और यदि पूर्वोक निशान पूर्णल्प प्रतीत हो तो बड़े शुभ को पाता है॥ ६६ ।। भाश्य का माता में ३ भाग्या समुत्था मणिबन्धदेशात कोएं सरन्ती समुपैति मात्रीय। मिलना सुगुप्तविद्यो मनुजस्सुवैद्यो रसायनज्ञो रमणीरतश्र ॥६७।। मणिबन्ध (क्रब्जे ) से उठीहुई भाग्यरेखा (ऊर्ध्वरेखा) कोयको करती हुई मातृ- ला के समीप पहुँच जावे तो वह माणी गुप्विद्यावाला व अच्छा वैद्य होकर रसा- नका ज्ञाता होता हुआ रमियों में रत रहता है॥। ६७ ।। ४ सुभोगरेखोपरिंगं विशुद्धं गर्तानुरूपं यदि भाति चिह्नम। १ "वप्रस्ताते पुमानस्त्री रेगौ क्षेत्रे चये तटे"( इति विश्वः)॥ तदा नरोयं कटिघातमेति कलामु पूर्ण: कमलालयश्र ॥६८॥ सुभोगरखा (अस्मद्देशीय आयुरेखां) के ऊपरले भाग में प्राप्त हुआ गड़हे के सम निशान साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह प्राणी चौसठि कलाओं में परिपूर्ण हो हुआ लक्ष्मीवान् होकर कमर में आघात को पाता है॥ ६८ ॥। १५ सर्वाङ्गलीनां त्रितये परुष्के यवानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। तदा जनो मजति वारिराशौ विद्याविहीनो विषयारतश्च॥ ६६ ॥ समस्त अँगुलियों की तीसरी पोर में यदि यवाकार निशान सोहता हो तो वह प्रा विद्या से विहीन व विपयों में आ्सक होता हुआ जल में डूदता है॥ ६६ ॥ V १६समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात् स्वल्पा सुरेखा समुपैति पैत्रीम। कान्ताभिलापी पुरुषस्तदानीं मातापितृम्यां शुभतासुपैति॥७०॥ मणिबन्ध (कब्ज़े) से बठी छोटीसी रेखा पिताकी रेखा के पास पहुँचजावे तो प्राणगी लुगाई की चाहना करता हुआ माता पिता के द्वारा शुभता को पाता है॥ ७० (देखो चित्र नं० २५ ) १ सर्वाङ्गलीनां त्रितये परुष्के तिर्यग्विभिन्नं सरलं करेखम्। रोगेण युक्को मनुजस्तदानी नारोग्यभोगं लभते कदापि।। ७१। समस्त अँगुलियों की तीसरी पर्व (पोर) में तिरीछी रेखाओं से कटाहुआ सी होकर एकरेखावाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी रोगसे संयुत होकर आरो समेत भोग को कदापि नहीं पाता है।। ७१ ॥ २ संगर्तगध्यं गुरुगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलं दविरेखम्। पुत्राञ्जनो विन्दति जारजातानूर्ध् यदा चेद् बहुकन्यकाश्च॥ ७२॥ भलीभांति बीच में गड़हे का निशान रखनेवाला बृहस्पति के स्थान में प्राप्त व तिरी रेखाओं से कटाहुआ सीधा होकर दो रेखाओंवाला निशान यदि भासमान देखाजावे वह पाणी जारजात (दोग़ले) पुत्रों को पाता है और यदि पूर्वोक्क निशान तर्ज्जनी के ऊपरले भाग में देखाजावे तो बहुक्ती जारजात कन्याओं को पाता है॥ ७२॥ ३ शरात्मजस्थानगता विभान्ति क्षुद्रस्वरूपाः कुटिलास्सुरेखाः। आलस्ययुक्ो मनुजस्तदा स्यान्निष्कामकार्ये निरतो नितान्तम्॥७ शनैयर के स्थान में प्राप्त हुईै साफ़ छोटी छोटी टेढ़ी रेखायें यदि सोहती हों तो पाखी आलस्य से संयुक्त होता हुआ बिना चाहनावाले कार्यमें हमेशा लगा रहता है॥७३॥ ४ संभोगरेखा यदि मध्यपान्ता भाग्येन मिन्रा ग्रतिभाति कोपम्। संभाडा दौर्जन्ययुको मनुजस्तदानीं संक्षीणकायो ममतासुपैति॥७४॥ भाग्यरेखा (दौलत की रेखा) से कटी हुई सुभोगरेखा (हार्टलाइन) यदि मध्यमा पर्यन्त पहुँचकर कोएचिह्र को घनाती हुई देखीजावे तो वह भाणी दुर्जनता से संयुत होकर क्षीणकायावाला होताहुआ ममता को पाता है।। ७४॥ ५ संभोगरेखोपरिंगं त्रिरेखं गेर्तेन युक्नं यदि भाति चिह्नय्। गुदामयं वै लभते मनुष्यो गर्भस्य घातं निजधर्मपत्याम्॥७५॥ सुभोगरेखा के ऊपरले भाग में पासहुआ गड़हे से संयुक्क होकर तीन रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह भाणी गुदा में रोग और अपनी धर्मभार्या में गर्भघात को पाता है।। ७५॥ ६ मातुस्सुरेखा यदि नीचमागे रेखाद्येनाप्यवखरिडता स्यात। मातुस्सुमानं कुरुते मनुष्यो देपी जनानां जनताविहीन: ॥ ७६॥ माताकी रेखा निचले भागमें दो रेखाओं से कटी हुई यदि देखी जावे तो वह पाणी सर्वजनों का देपी होकर जनसमूहों से विहीन होताहुआ अपनी माता का बड़ा मान सम्मान करता है॥। ७६ ॥ ७ भोगाधरस्थं चतुरसयुक्कं त्रिकोणरूपं यदि भाति चिह्नम्। आात्मम्भरिस्स्यान्मनुजस्तदानी लोभेन युक्को ललनासमेतः॥७७॥। भोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) के निचले भागमें टिकाहुआ चतुष्कोण से संयुत होकर त्रिकोण का निशान यदि सोहता हो तो वह पाखी लोभी व ललना (दुलारी प्यारी) से संयुक्त होताहुआ पेद कहलाता है॥ ७७॥ = मातुस्मुरेखोपरिंगं द्विरेखं चिह्नं गभीरं यदि याति भोगाम्। तदा नरोयं द्विपतां विजेता जायासमेतो जनतामुपैति॥७८॥ मातृरेखा के ऊपर प्ाप्तहुआ गहिरा दो रेखाओंवाला निशान यदि भोगरेखा के समीप चलाजावे तो वह पाणी शत्रुओं का विजेता होकर जाया से संयुत होताहुआ जनता को पाता है।। ७८ ॥ ६ पित्रोः सुमध्ये विशदं विभाति गुणत्रयेणापि युतं सुचिह्रय्। १ गर्त्तावटौ भुवि श्वभ्र इत्यमरः॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य उत्पातकारी मनुजो विकारी वेश्याविहारी परवितहारी।। ७६ ।। मातृरेखा व पितुरेखा के बीच में तीन गुणों के निशानों से संयुत होकर शोभायमा निशान यदि सोहता हो तो वह माणी विकारी व वेश्याविहारी होकर परवित्तहारी हो हुआ उत्पातकारी होता है।। ७६॥। १० मात्रा वियुक्ा यदि पितृरेखा कौटिल्यरूपा मणिबन्धमेति। चतुष्पदाघातमुगैति प्राणी दन्द्ाख्ययुद्धे विपदां विवेति॥८०॥ मातृरेखा से छुटी (अलग) हुई पिताकी रेखा टेढ़ी होकर यदि मरिबन्ध (क्ब्जे के पास पहुँच जावे तो वह माणी चौपये के आघात को पाता हुआ द्वन्द्युद्ध में विपन (विपत्ति) को विशेपता से पाता है॥ ८० ॥ ११ काव्यालयोत्या समुपैति रेखा पैत्रीं सुमात्रीं च विभिद्य भोगाम्। तदा नरः सप्तिवत्सरान्ते सौभाग्यशाली सुखतां समेति ॥।८१॥। शुक्र के स्थान से उठी हुई रेखा पितृरेखा व मातृरेखा को काटकर भोगरेखा के सभी चली जाये तो वह मासी सत्तर वर्ष के बाद सौभाग्यशाली होता हुआ सुखसमूहों क पाता है।। ८१ ॥। १२ मिन्ना सुभाग्या यदि याति रेखा मात्रीं सुभोगां च विभिद्य मन्दम्। मृत्योर्विशक्की मनुजो वितङ्की दौर्वल्यगात्रो गुणतामुपैति॥८२।। छोटी रेखा से कटी हुई भाग्यरेखा (फेटलाइन) मातृरेखा व भोगरेखा को भेदनकग शनैश्वर के स्थान में यदि चलीजावरे तो वह माणी मौत से डरता हुआ पितही होकर दुबला होताहुआ सुखसमूहों को पाता है॥। ८२ ॥ १३ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात् सञ्छिन्नमस्ता समुपैति सौम्यम्। तदा नरोयं रमणीसमूहाद्धानि भयं वै लभते नितान्तम् ॥। ८३ ।। मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई कटे मस्तकवाली रेखा बुधके समीप यदि चलीजावे तो चर माणी रमशियों (लुगाइयों) के सकाश से हानि व भय को हमेशा पाताहै॥ =३ १४ अङ्छ्ठमूले विशदं विभाति रेखाचतुष्कं यदि तुर्यभिन्नय्। तदा भविष्ये समये मनुष्यो महाधिकारी विषये रतश्र ॥८४॥ अँगूठे की मूल में साफ़ होकर चाररेखाओं से कटा हुआ चाररेखाओं वाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी भविष्यकाल में महाधिकारी होकर विपयमें रत रहता है॥ ८४ (देखो चित्र नं० २६) १ भागुरिमते टाप् द्वितीयान्तं पद्मिति बोध्यम्।। पूर्वार्धे द्वितीयाङ्क:। सर्वांङ्गुलीनां युंगरामपर्वके भूपक्षरेखं यदि भाति लक्ष्मकम्। चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावको ह्येकाक्षरूपो मनुजो विभरयते ॥८५॥ समस्त अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में यथासंख्य एक व दो रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी चातुरीकला से संपन्र होकर चपलस्वभाववाला होता हुआ काना कहाजाता है॥। ८५॥। १ व्रध्नालयस्थं विशदं विभाति चिह्न दिरेखं विततस्वरूपम्। तदा मनुष्य: कटिघातमेति कामी कलावान्कलहातुरश्र॥८६॥ सूर्य के स्थान में टिका हुआ साफ़ व लचे रूपवाला होकर दो रेखाओंवाला निशान दि सोहता हो तो वह माणी कामी व कलावान् होकर लड़ाई करने में आतुर होता आ कमर में आघात (चोटचपेट) को पाता है।। =६ ।। सं भोगर ववा सुभोगरेखा गुरुगा विभाति तस्याः सुशाखा यदि याति शौरिम। तदा नरः शत्रुगणाद्िमक्क: सम्पत्तिशाली सुखतामुपैति॥८७॥ सुभोगरेखा (अस्मद्देशीय आ्रयुरेखा) बृहस्पति के स्थान में पाप्त हुई यदि सोहती हो और उसकी एकशाखा शनैथर के स्थान में यदि चली जावे तो वह माणी शत्रगणों से टा हुआ संपत्तिशाली होकर सुखसमूह को पाता है।। ८७ ।। शुक्रालयाच्चेचवलिता सुरेखा सञ्चिन्नमस्ता गुरुगा विभाति। महाधिकारी मनुजस्तदानीं मान्यो वदान्योSभयतामुपैति॥८८॥ शुक्र के स्थान से चली हुई रेखा कटे मस्तकवाली होकर बृहस्पति के स्थान में प्राप्त ती हुई यदि सोहती हो तो वह माणणी महाधिकारी (बड़े तहदेवाला) होकर मान्य वदान्य (दाता) होता हुआ अभयता को पाता है॥। ८८ ॥ मातुस्मुरेखोपरिंगं विशुद्ध मिन्नं त्रिकोणं यदि भाति चिह्म्। मात्ऐेवा प्रामोति प्राणी जननीविरागं तदास्य माता मृतिमेति जन्तोः॥ ८६॥ माता की रेखा के ऊपर प्ाप्त हुआ साफ़ होकर कटा फटा तीन कोणोंवाला निशान दे सोहता हो. तो वह पाणी माता के विराग को पाता है उसीसे इस प्राणी की माता ले मौतको पाती है॥। ८६ ॥ मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे स्वल्पस्वरूपा वितता तथोर्ध्वें। दौर्भाग्ययुक्ो वयसि प्रवृद्धे संवक्रगा चेदतिलोभशाली॥ ६० ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य माताकी रेखा यदि निचलेभाग में पतलेरूपवाली प्रतीत हो तथा ऊपरले भाग यदि फैली हुई देखीजावे तो वह पराणी वृद्धावस्था में दौभाग्यसे संचुत होता है यदि पूर्वोक रेखा टेडीसी प्रतीत हो तो वह पाणी बड़ा लोभी होता है ( यानी वड़ लालची) कहाता है॥ ६० ॥ ७ पितुस्सुरेखोपरिंगं विभाति तिर्यग्विभिन्नं समकोणयक्रम्। . मानस्य हानि लभते मनुष्यस्तथा विनाशं विषयस्य नूनम्॥ ६१ पिताकी रेखाके ऊपरले भागमें प्राप्त व तिरीछा कटाहुआ समकोरसे संयुक् होकर। यदि सोहता हो तो वह प्राी मानहानि को तथा विषयविनाशको निश्चयकर पाताहै॥ ६ ८ भाग्याधरस्थं विशदं विभाति चिह्नं विशालं सरलं दविरेखम्। दौर्जन्ययुको मनुजस्तदानीं विश्वासघाती विषयानुपैति॥६२॥ भाग्यरेखा के निचले भाग में टिका, साफ़, विशाल व सीधा होकर दो रेखाओंवा निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी दुर्जनता से संयुत होकर विश्वासघाती होता हु विषयों को पाता है। ६२ ॥ ६ पितुस्ससुत्था यदि याति भाग्या मात्री सुभोगां च विभिद्य सूर्यम्। क्षपार्तियक्ो मनुजस्तदा स्यात क्षीणो दरिद्रो दयिताविहीनः॥६३ पिताकी रेखा से उठीहुई भाग्यरेखा (दौलत की रेखा) मातृरेखा व भोगरेखाको कि पता से भेटान कर यदि सूर्य के समीप चलीजावे तो वह प्राणी क्षयरोग (कंजम्यशन्) संयुत होता हुआ दुबला व द्ररिद्री होकर दिता (पाणप्यारी)से विहीन रहताहै॥ ६ १० अङ्गप्ठशाख।वृतमध्यभागा रेखा सुचक्रा यदि याति चोर्ध्वम्। तदा जनो मजति वारिराशौ रामौभिभूतो रसिको रसायाम्॥ ६४ अँगूठे की शाखाओं से घिरी मध्यभागवाली रखा टेढ़ी होकर यदि ऊपर को चह जावे तो वह प्राणी सुन्दरियों से अनाद्टत होता हुआ पृथ्वीमएडल में रसज्ञाता हो नदी व नाले आदिकों में डूबजाता है॥। ६४ ॥ ११ निशाकरस्थानगतं विशुद्धं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। कुशाग्रबुद्धिर्मनुजस्तदानीं महाधिकारी विषयान्भुनक्कि॥६५॥ चन्द्रमा के स्थान में प्राप्तहुआ साफ़ होकर तारा के समान निशान यदि सोहता हो १ सुन्दरी रमणी रामेत्यमरः॥. ह माणी बुद्धिमान् या तीक्ष्ण बुद्धिवाला होकर महाधिकारी (बड़े ओहदेवाला) होता आ भोगों को भोगता है॥ ६५ ॥ २ क्षपाकरस्थानसमीपवर्ति त्रिकोणचिह्नं विशदं चकास्ति। महाधिकारी मनुजो मनस्वी मायामयोयं ममतामुपैति॥ ६६ ॥ चन्द्रस्थान के समीपवर्ती होकर साफ़ होताहुआ त्रिकोख का निशान यदि चमकता हो वह पराणी महाधिकारी व मनमौजी होताहुआ मायावी होकर ममता को पाता है । ६६॥ ३ समृत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैति भाग्याम्। तदा नरः क्षीणकलेवरोसौ दुःखाभिभूतो नितरां दुनोति॥६७॥ मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठाहुआ सांप के समान निशान यदि भाग्यरेखा (दौलत की रेखा) के पास पहुँचजावे तो वह पाणी दुबले शरीरवाला होकर दुःखों से पीड़ित होताहुआ अधिकता से शोकित होता है।। ६७ ।। १४ पैत्री सुवक्रा मणिबन्धगा चेत्तदन्तिके स्यात्सरलं द्विरेखम्। तदा मनुष्यो मृतिमेति पूर्व पश्चात्स्वमाता मरणं प्रयाति ॥६८ ॥ पिताकी रेखा टेढ़ी सी होकर यदि मणिबन्ध (कब्ज़े) के पास पहुँच जावे और उसी केसमीप सीधा होकर दो रेखाओंवला निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी पहले हीसे मरजाता है और पीछे से उसकी माता मरजाती है॥ ६८ ॥ (देखो चित्र नं० २७) १ सौम्यालयाच्चेचलिता सुरेखा सर्पानुरूपा समुपैति चोर्ध्वम्। भार्याविहीनो मनुजस्तदानी यज्वा परस्त्रीं भजते नितान्तम्॥६६ ॥ बुध के स्थान से चली हुई शोभायमान रेखा सर्प के समान होकर यदि ऊपर को वलीजावे यानी कनिष्ठा की तीसरी पोर में पहुँच जावे तो वह माणी भार्या से रहित होकर विधान से यज्ञ करता हुआ सदैव परनारी (उपपत्री) का सेवन करता है॥ ६६ ।। २ अनामिकामूलगतं विभाति च्छिदस्वरूपं विशदं सुचिह्रम्। प्रणष्टदृष्टिर्मतुजो विशोकी विनष्टवित्तो विषयाद् विभेति॥ १००॥ अनामिकाकी मूल में प्राप्तहुआ साफ़ होकर छिद्र के समान शोभायमान निशान यदि सोहता हो तो वह माणी बड़ा शोच करनेवाला व विनाशहुए धनत्राला होताहुआ अन्धा होकर भोगों से डरताहै यानी जिसकी दृष्टि जातीरहती है इसीसे वह विशोकी होकर गवाँये धनवाला होताहुआ विषयों से विभीत होता है॥ १०० ॥ सामुद्रिकशासस्य ३ अनामिकामध्यमिकासुमध्यं मातुस्समुत्था यदि याति रेखा। तदा नरो दीनदशामुपेतः प्रामोति मृत्युं निजकर्मदोषात् ॥१॥ माताकी रेखा से उठी हुई रेखा यदि अनामा व मध्यमा के बीच में पहुँचजावे तो प्राणी दीनदशा (बुरी हालत) को माप होताङुआ अपने कर्मदोपसेही मौत को पाताहै।। ? ४ भोगात्समुत्थं विशदस्वरूपं चन्द्रार्धचिह्नं यदि याति मन्दम्। कारागृहं याति नरस्तदानीं कारुणयहीनः कलहे रतश्च॥ २॥ भोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) से उठाहुआ स्पष्टरूपवाला होकर अर्चन्दर कार निशान शनैश्रर के स्थान में यदि देखा जाबे तो वह माणी दयासे विहीन व लड़ में रत होताहुआ जेलखाने में जाता है॥ २॥ ५ संभोगरेखा यदि नीचदेशे पीना सुहीना गुरुगा विभाति। चरडाभिघातान्मृतिमेति प्राणी स्थूला यदा चेच्छिरघातपाताद ॥ ३ ॥ मोग संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) निचले भाग में मोटी व ऊपरले भाग पतली होकर बृहस्पति के स्थानमें प्राप्त हुई यि सोहती हो तो वह माणी बड़ी भारी चो चपेट के लगने से मौत को पाता है और यदि पूर्वोक रेखा मोटी सी देखी जावे तो प्राणी शीश में चोट आजाने से मौतको पाता है॥ ३ ॥ ६ भोगाधरस्थं विशदं विभाति रेखासमेतं यदि सपमाङय। तदा जनः स्वीयजनाभिभूतो नीचोर्ष्वगा चेद्रिपुतृन्दपूर्ण:।।४।। भोगरेखा के निचले भाग में टिकाहुआ साफ़ व रखा से संयुत होकर सात के अं के समान निशान यदि सोहता हो तो वह पाणी अपने कुटुम्बीवर्गों से अनादत हो यानी आदर नहीं पाता है और यदि पूर्वोक़ निशान निचले या ऊपरले भाग में देखाजा तो वह पाणी शत्रुगणों से पूर्ण रहता है॥। ४ ॥ ७ मातुस्सुरेखोपंरिंगं सुचिह्नं गुणाख्यचिह्नेन युतं त्रिरेखम्। द्वीपान्तरं याति नरस्तदानीं दाता दयालुर्दयिताविलासी॥। ५ ॥। मातृरेखा के ऊपरले भाग में माप्त हुआ गुणा X के निशान से संयुक्क होकर ती रेखाओंवाला शोभायमान निशान यदि देखाजावे तो वह प्राणी दाता व दयालु होक दयिताओं में विलास (ऐश) करता हुआ द्वीपान्तर (दूसरे द्वीप) में चलाजाता है॥५ X ८ भोगाधरस्थं विशदं विभाति गुणानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। तदा नरो धर्मपदावलम्बी धन्यो धरित्र्यां धनतामुपैति॥ ६॥ भोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) के निचलेभाग में टिकाहुआ साफ़ होकर णा के समान निशान यदि सोहता हो तो वह भाणी धर्मपदका अवलम्बन करने X ला होकर धरामएडल में धन्यवाद देने के योग्य होता हुआ धनसमूह को पाता है॥ ६ ॥। पितुस्सुरेखोपरिगा विभाति ह्यङ्गुप्ठशाखासहिता सुरेखा। तदा नरो नीचनराभिलाषी ब्रीडाविहीनो वनिताविलासी।।७।। पितृरेखा के ऊपरले भाग में माप्त हुई अ्रँगूठे की शाखाओं से संयुक्त होकर शोभाय- सन रेखा यदि सोहती हो तो वह माणी निर्लज्जरूप होकर रमणियों में रमण करता हआ नीच नरों की चाहना रखता है।। ७ ॥। ० मातुस्सुरेखाधरगं विशुद्धं त्र्यङ्कानुरूपं यति भाति चिह्नम्। विश्वासहीनो मनुजो विलासी संधारणाशक्कियुतोऽमिषाशी॥८॥ माहरेखा के निचले भाग में माप्त हुआ साफ़ होकर तीन अंक के समान निशान दि सोहता हो तो वह भाणी विलासी व भलीभांति धारखशक्ति से युक्र होता हुआ मांसभक्षी होकर विश्वास से हीन होता है॥ ८ ॥। ११ मातुस्सुरेखाधरगं विभाति गुणत्रयेणापि युतं सुचिह्रम। XXX तदा परस्त्रीं हरते मनुष्यो नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा ।। ६ ।। मातृरेखा के निचले भाग में माप्त हुआ तीनगुणों के निशानों से संयुक्त होकर शोभाय- परान निशान यदि सोहता हो तो वह पाणी पराई भार्या (लुगाई) को हरता है और यदि पूर्वोक निशान स्त्री के करतल में प्रतीत हो तो वह व्यभिचारिणी होती है।। ६ै ।। १२ पितुस्सुरेखा यदि नीचभागे चिह्नेन गोलाकृतिना युता स्यात। नेत्राभिघातं लभते मनुष्यो मन्त्रे सुतन्त्रे निरतो नितान्तम् ॥१० ॥ पिताकी रेखा निचले भाग में गोलाकार निशान से संयुक्त होकर यदि प्रतीत होवे तो वह पाखी मन्त्रशास्त्र व तन्त्रशास्त्र में हमेशा निरत होता हुआ नेत्रों में चोट चपेट को पाता है यानी नेत्ररोगी होता है॥ १० ॥ १३ मातुस्सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे स्थूलस्वरूपा भिलिता च वगे। मातु रेखा निर्बोधरूपो मनुजस्तदानीं व्याजेन युक्ो व्यवसायपूर्णः।।११।। माता की रखा ऊपरले भाग में मोटी होकर पिता की रेख़ा में यादि मिलज़ावे तो वह पाखी अज्ञानी होकर छल से संयुक्त होता हुआ रोजगार से परिपूर्ण बना रहता है।।११॥ १४ अङ्गष्ठमूले विशदं विशालं वृत्तार्घचिह्नं नियतं चकास्ति। सामुद्रिकशास्त्रस्य लोहाग्निघातं लभते स्वनेत्रे मानी मनुष्यो ममताविहीनः॥१२ अँगूडे की मूल में साफ़ व विशाल होकर अर्धवृत्तका निशान निश्चित होता हुआ चमकता हो तो वह पाणी मानी व ममता से विहीन होकर अपने नेत्रों में लोह व छ के द्वारा आयात को पाता है ॥ १२ ।। १५ पितुस्सुरेखा मणिबन्धहीना कौटिल्यरूपा मिलिता जनन्याम। पित् ख जल्पाकरूपो मनुजस्तदानीं स्वल्पेन कालेन मति प्रयाति॥१३। पिताकी रेखा मणिबन्ध (करब्ज़े ) से हीन होकर टेढ़ेरूपवाली होती हुई यदि रेखा में मिली देखीजावे तो वह प्राणी बकवादी (वड़बड़िया) होता हुआ थोड़े क मेंही मौतको पाता है ॥ १३ ।। १६ पितुस्समुत्था यदि भाग्यरेखा वृत्तार्धयुक्का जननीमुपैति। आयुष्यहानिं लभते मनुष्यो ह्यानन्दहीनो निधनं प्रयाति॥१४। पितृरेखा से उठी हुई भाग्यरेखा (दौलतकी रेखा) अर्धव्टत्त निशान से संयुक्र हो मातृरेखा के समीप यदि चली जावे तो वह पाणी आयुर्दायकी हानि को पाता हु आनन्द से हीन होकर मरणको प्राप्त होता है ।। १४ ॥ (देखो चित्र नं० २८) १ अनामिकायास्त्रितये परुष्के नन्दाङ्करूपं यदि भाति चिह्नम्। अनामिका अ्रँगुली की तीसरी पोर में नौके अङ्ककासा निशान यदि सोहता हो वह पाणी चौपाये जानवर (घोड़े आदिकों) से काटे श्ंगवाला होता हुआ चश्चलता संयुक्त होकर पैरों का रोगी होता है।। १५.।। २ भोगासमृत्था सरजासुरेखा सौम्यालयं याति गभीररूपा। सत्पात्रशीलो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्तु भवेत्सती सा ॥१६। भोगरेखा से उठी हुई रेखा सीधी वं गहरी होकर बुधके स्थान में चली जाबे तो व प्राखी सत्पात्रशाली होता है और पूर्वोक रेखा जिस स्त्री के करतल में देखी जावे तो क पतित्रता होती है॥ १६ ॥। ३ चगडालयस्थं विशदं चकास्ति चिह्नं यदैकं यदि न्यूनकोणम। तदा जनोयं जनयूथभिन्नः प्रापोति मृत्युं सहसा सुभीतः॥ १७॥ सूर्यके स्थान में टिकाहुआ साफ़ होकर एक न्यूनकोणवाला निशान यदि चमकताो तो वह माणणी जनसमूहों से पीटा हुआ बहुतही डरकर एकाएक (अचानक) हीं माँत को दाता है॥ १७ ॥ 8 अनामिकामध्यमिकामुमध्यं भोगासमुत्था यदि याति रेखा। तापी सुशोकीमनुजो विदुःखी स्वल्पा यदा चेत्फलताल्पता स्यात्॥१=॥। अनामिका व मध्यमिका अँगुली के बीचमें भोगरेखा से उठी हुई रेखा यदि चली न.वे तो वह माशी सन्ताप को करताहुआ बड़ा शोकी होकर विशेपता से दुःखी होता और यदि पूर्वोक रेखा छोटी सी प्रतीत होवे तो फलकी अल्पता होती है॥ १८ ॥ बृद्धाङ्गलीतश्चलिते मुरेखे बृहस्पतिस्थानगते यदास्तः। तदाग्निदग्धो मनुजो विभीत: संमुग्धचित्तो भ्रमते नितान्तम् ॥ १६ ॥ अँगूठे से चली हुंई दो रेखायें यदि बृह्स्पति के स्थानमें पहुँच जावें तो वह माणी आगी से जला व डरा हुआ भलीभांति मोहित चित्तवाला होकर हमेशा घूमा करताहै ॥ १६ ॥ भोगाधरस्थं विशदं विभाति वृत्तार्धचिह्नं यदि चोर्ध्ववक्कम्। तदा नरो वह्िविदग्धगात्रो विभ्रान्तचित्तो भयतामुपैति॥ २०॥ भोगरेखा के निचले भाग में टिकाहुआ साफ़ होकर अर्धवृत्त का निशान ऊर्ध्वपुख. वाला यदि सोहता हो तो वह प्राणी आगी से जले शरीरवाला होकर विभ्रान्तचित्त होताहुआ भयसमूहॉ को पाता है॥ २०॥ 9 भोगाधरस्थं विशदं निभाति चिह्नं त्रिकोणं यदि क्षुल्लरूपम्। चतुष्पदाघातमुपैति प्राणी चञ्चत्पभावश्चपलस्वभावः ॥२१॥ भोगरेखा के निचले भा. में टिका हुआ साफ़ होकर छोटा सा त्रिकोए का निशान दि सोहता हो तो वह पराणी बड़े प्रभाववाला होकर चपलस्वभाववाला होताहुआ बौपाये के आघात को पाता है ॥ २१ ॥ संभोगरेखा मिलिता जनन्यां क्षुद्राविभिन्ना यदि चोर्ध्वभागे। समोगरखा मिथ्याप्रलापी मनुजः प्रमादी संयोगहीना यदि वा सशाखा॥२२॥ सुभोगरेखा माताकी रेखा में मिलजावे और ऊपरले भाग में छोटी रेखा से वटी हुई दि देखी जावे तो वह पाणणी मिथ्याभापी होता हुआ ममादी होता है और यदि पर्वोक़ रेखा योग से हीन होकर शाखासमेत प्रतीत होवे तो भी कहाहुआ फल होता है॥ २२॥ पितुरसुरेखा मणिबन्धहीना संचिन्नमस्ता कुटिला विभाति। पित्टरेखवा तदा नरो मस्तकघातमेति मूर्च्छादिरोगै: परिपीडिताङ्गः ॥२३॥ सामुद्रिकशास्रस्य पिता की रखा मणिबन्ध (क्रब्जे) से हीन होकर कटे मस्तकवाली व टेदी है हुई यदि सोहती हो तो वह माणी मूर्च्छादिरोगों से पीड़ित अरंगवाला होता हुआ म में आघात (चोट चपेट) को पाता है।। २३ ।। १० निशाकरस्थानगतं सुचिह्नं संलग्नमस्तं सरलं दिरेखम। चतुष्पदाघातमुपैति प्राणी वामाभिलाषी वनिताविलासी॥२४। चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुआ मिले मस्तकवाला व सीधा होकर दो रेखाओंव शोभायमान निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी सुन्दरियों की चाहनावाला है वनिताओं में विलास (ऐश) करता हुआ चौपाये के आघात को प्राप्त होता है॥। २६ ११ मातुम्सुरेखोपरिगा विभान्ति रेखा विक्षुद्ाः सरलाश्च पट्काः। जङ्घाभिघातं प्रतिपद्य सद्यः पादाभिघातं लभते मनुष्यः ॥ २५ ॥ माता की रेखा के ऊपर प्राप्त हुई छोटी व सीधी होकर छःरेखायें यदि सोहनी तो वह माणी जघाओं में आघात को पाकर शीघ्रही पातों में आघात को पाता है॥ २ १२ पितुस्सुरेखानिकटे विभाति ह्यङ्गष्ठशाखा सहित त्रिकोणम। संभ्रान्तचित्तो निजमानहीनो नरो भवेद्ध्वस्तपदाधिकारः॥२६ पितृरेखा के समीपही अँगूठे की शाखाओ समेत त्रिकोश का निशान यदि सो हो तो वह पाणी संभ्रान्तचित्तवाला होता हुआ अपने मान से हीन होकर ओहदे पतित होता है॥ २६॥ १३ मातुस्सुरेखा यदि सर्वदेशे क्षुद्राविभिन्ना विशदस्वरूपा। वातार्तियुक्को मनुजो महौजा: पीडां कठोरां लभते दिनान्ते॥ २७ वैयरू माताकी रेखा साफ़ होकर सर्वदेश में छोटी छोटी रेखाओं से कटी हुई यदि देखी तो वह पाणी महावलवान् होकर वातरोग से पीड़ित होता हुआ सन्ध्यासमय में क पीड़ा को पाता है। २७ ॥। १४ पितुः सुरेखाधरगं विभाति रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। शोकाकुलोयं पुरुषस्तदानीं पाशाग्रविद्धो मरणं प्रयाति।।२८।। पिताकी रेखा के निचले भाग में प्राप्त हुआ दो रेखाओंवाला निशान यदि दो रे से कटा हुआ प्रतीत होवे तो वह माणी शूली में टँगाहुआ मौतका को पाता है॥२=॥ ५ काव्यालयान्ते यदि भाति चिह्नं वृत्तार्धरूपं विशदं गभीरम्। वेश्याविहारी मनुजो विकारी मित्रापकारी परवित्तहारी॥। २६/ शुक्र के स्थान में यानी अँगूठे की मूल में अर्धव्टत्त का निशान साफ़ व गहरा होकर नदि सोहता हो तो वह पाणी वेश्याओं में विहार करता हुआ विकारी व मित्रों का अप- कारी होकर परद्रव्य का हरनेहारा होता है॥ २६॥ (देखो चित्र नं० २६) १ सर्वाङ्गुलीनां युगरामपर्वके एका विक्षुद्ा सरला च रेखिका। असाध्यरोगी मनुजः प्रकीर्तितो दौर्बल्यगात्रो बहुकोपकोपितः॥३०॥ समस्त अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में एकरेखा छोटी व सीधी होकर सोहती हो तो वह माणी असाध्य रोगी कहाता है व दुबला होकर घनेकोप से कोपित होता है।। ३०॥ २ कनिष्ठिकामूलगता विभान्ति रेखा विक्ुद्राः कुटिलाश्च तिसः। तदा कुकाले जननं प्रयातो मानी मनुष्यो ममतामुपैति॥३१॥ कनिप्ठा अँगुलीकी मूल में माप्तहुई तीन रेखायें छोटी होकर टेदीसी प्रतीत होवें तो वह प्ाखी कुसमय में जन्म को पाता हुआ मानी होकर ममता को पाता है ॥ ३१॥ ३ सोमात्मजस्य सदने यति भान्ति रेखा- स्तावन्मिता विकथिता: शुभदा विवाहाः। पाणिग्रहै्विरहिता यदि गर्तयुक्का भिन्ना यदा मृतिगताः प्रथमं नृनार्यः ॥३२॥ वुध के स्थान में यानी कनिष्ठा के मूलतल में जितनी टेढ़ी व गंभीर रेखायें प्रतीत हों उतने ही नरनारीगणों के शुभदायक विवाह कहेजाते हैं और यदि पूर्वोक् रेखायें छिद्र से संयुत होकर प्रतीत होवें तो नरनारीगण व्याहसे विहीन होते हैं यानी उनका ब्याहही नहीं होता है और यदि पूर्वोक्क रेखायें भिन्न हों तो नरनारीगण प्रथमही मृत्युगत होते हैं यानी स्त्रं पुरुपों के करतल में उक्क रेखायें मध्य में भिन्न हों तो पहले पुरुष मरजाते हैं और यदि पार्श्व में कटीसी प्रतीत हों तो पहले स्त्रियाँ मरजाती हैं ॥ ३२॥ ४ संभोगरेखोपरिगं विभाति वृत्तार्धचिह्नं विशदस्वरूपम्। मातापितृभ्यां रहितो मनस्त्री प्रामोति प्राणी बहुदूरदेशम्॥३३ ॥ संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) के ऊपरले भागमें प्राप्त हुआ साफ़ होकर अर्ध- छृत्तका निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणणी मनमौजी होकर बड़े दूरदेश को जाता है॥३३॥ ५ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद भाग्या सुरखा समुपैति शौरिम। पाह्य तदा नरो दुःखशतानि भुङक़े संस्पृष्टमूला यदि याति काराम् ॥३॥74 सामुद्िकशास्त्रस्य। मशिबन्ध (कब्जे) से उठीहुई भाग्यरेखा शनैश्रर पर्यन्त चलीजावे तो वह प्रासणी सैंफ दुःखों को भोगता है और यदि पूर्वोक रेखा मध्यमा की मूल को स्पर्श करती हुई है जावे तो वह माणी जेलखाने को जाता है।। ३४ ।। ६ संभोगरेखा यदि मध्यमान्तं गम्भीररूपा कुटिला प्रयाति। कष्टेन कालं नयते मनुष्यः साहाय्यतो वित्तमुपैति नूनय् ॥३५॥ संभोगरेखा गहिरी होकर टेढ़ी होतीहुई यदि मध्यमा के समीप चलीजावे तो पाणणी कष्टसे अपने समयको बिताता है और सहायतासे निश्चयकर धनको पाता है॥ ३ ७ सुभोगरेखाधरगं त्रिरेखं वामेन मध्येन च भिन्नरूपम्। तदा नरो वह्निभयाद्विमीतो वित्तक्षयं वै लभते नितान्तम्॥३६॥ सुभोगरेखा के निचले तरफ़ प्राप्त हुआ तीन रखाओंवाला निशान वामभाग और म भाग से कटाहुआ प्रतीत होवे तो वह माणणी आगी की भय से डरता हुआ हमेशा धन को पाता है॥ ३६ ॥ = भोगात्समुत्था यदि वक्ररेखा मात्रीं विभित्वा समुपैति पैत्रीय्। तेअक तदा जनो वैरिगणाभिभूतः क्षयार्तियुक्को भयतामुपैति॥३७॥ भोगरेखा से उठी हुई टेढी रेखा मातृरेखा को काटकर पितृरेखा के पास यदि जावे तो वह माणी शत्रुगणों से सताया हुआ क्षयीरोग से संयुक्त होकर भयर को पाता है।। ३७।

६ पितुस्सुशीर्षोपरिंगं विभाति रेखाद्यं रेखयुगेन भिन्नम्। तदाश्वपृष्ठात्पतितो मनुष्यः क्षुद्रं यदा चेत्फलमन्दता स्यात् ॥ ३=। पितृरेखा के शीशपै प्राप्त हुआ दो रेखाओंवाला निशान दो रेखाओं से भिन्न ह यदि सोहता हो तो वह पराणी घोड़े की पीठ पर से गिर कर मरजाता है और यादे पृ निशान छोटासा प्रतीत हो तो फलकी अल्पता होती है॥ ३८ ॥ १० क्षपाकरस्योपरिंगा विभान्ति रेखा विक्षुद्रा यदि यान्ति मात्रीम। ॥ तदा नरो दुर्बलगात्रयष्टिः संक्रुद्धचित्तो धननाशमेति॥ ३६॥ चन्द्रस्थान के ऊपरले भागमें पाप्त हुई छोटी छोटी बहुतसी रेखायें यदि मातरेखा के पहुँच जावें तो वह माणी दुबला व दिलमें बड़ा क्रोधी होताहुआ धनक्षयको पाता है।३ ११ बृहस्पतिस्थानगता कुरेखा गम्भीररूपा यदि याति मन्दम्। शीतज्वरान्मृत्युमुपैति मर्त्य: सूक्ष्मा यदा चेत्फलताल्पता स्यात्॥।8 बृहस्पति के स्थान में प्राप्तहुई छोटीसी रेखा गहिरी होकर शनैश्रर के स्थान में पहुँच वे तो वह प्राणी शीतज्वर (जूड़ी व बुखार) से मौतको पाता है और यदि पूर्वोक रेखा जली सी प्रतीत हो तो फल की अल्पता होती है॥ ४०॥ २ काव्यालयोत्था समुपैति रेखा पैत्रीं सुभाग्यां च विभिद्य मात्रीम्। आघातवृन्दं लभते मनुष्यश्चानन्दहीनो दयिताविहीनः ॥४१॥ शुक्र के स्थान से उठीहुई रेखा पितृरेखा व भाग्यरेखा को काट कर मातृरेखा के पास हुँचजावे यानी मिलजावे तो वह पाणी आनन्द से हीन होताहुआ प्राणप्पारी से विहीन कर बहुतसी चोट चपेटों को पाता है । ४१॥ ३ भाग्यान्तिकस्थं धटदएडतुल्यं सप्ताङभिन्नं यदि भाति चिह्नम्। स्त्रैणो मनुष्यो निरपत्रपः स्यान्नार्या यदा चेद्रणिका भवेत्सा ।।४२।। भाग्यरेखा के समीप टिकाहुआ तराजकी डएडी के समान होकर सात के अङ्क से भिन्नहुआ निशान यदि सोहता हो तो वह पाणी स्त्रीलम्पट होकर निर्लज्ज होताहै और दि पूर्वोक्क निशान स्री के करतल में प्रतीत हो तो वह वेश्या होती है।। ४२॥ ४ निशाकरस्थानगता सुरेखा क्षद्राविभिन्ना कुटिलस्वरूपा। लज्जाकरस्स्यान्मनुजस्मुखेप्मुर्नार्या यदा चेदुपपत्रिका स्यात् ॥४३॥ चन्द्रमा के स्थान में प्राप्त हुई रेखा टेढी होकर छोटी छोटी रेखाओं से भिन्न होती हुई तीत होवे तो वह पाणी सुख की चाहनावाला होता हुआ लज्जाकारी होता है और यदि र्वोक रेखा स्त्री के करतल में प्रतीत हो तो याजक की उपपत्री होती है।। ४३ ।। देखो चित्र नं० ३० ) कनिष्ठिकायास्त्रितये परुष्के रेखा विक्षद्राः सरला यति स्युः। तावन्मिता बोधयुताः सुपुत्राः संवक्रगाश्चेत्तति कन्यकाश्च ॥। ४४।। कनिष्ठा अँगुली की तीसरी पोर में छोटी व सीधी होकर जितनी रेखायें प्रतीत हों तो तनेही ज्ञानी सुपुत्र पैदा होते हैं और यदि पूर्वोक़ रखायें टेदी सी देखी जावें तो उतनीही न्या पैहा होती हैं ॥ ४४।। कनिष्ठिकाया दितये परुष्के रेखाद्यं चेद्गुरुणा समेतम्। पुत्रादिहीनं मनुजं करोति विद्याविहीनं वचसा विहीनम् ॥ ४५॥

  • याजकुस्येति शेपः॥ सामुद्रिकशास्रस्य कनिष्ठा की दूसरी पोर में 5गुरुसमेत ॥ दो रेखाओंवला यानी भगण का सा नि यदि सोहता हो तो उस पाणणी को विद्याविहीन व वचनविहीन तथा पुत्रादिकों से करता है।। ४५ ।। ३ शनैश्चरस्थानगता कुरेखा कौटिल्यरूपा विशदा विभाति। श्लेष्मेप्रधानो मनुजस्तदा स्यात् कासादिरोगैः परिपीडिताङ्गः॥। ४६ शनैश्रर के स्थान में माप्तहुई छोटीसी रेखा टेढ़ी व साफ़ होकर यदि सोहती हो Athma वह पाणी कास व श्वास आदि रोगोंसे पीड़ित होताहुआ कफरोगवाला होता है॥। ४ ४ चन्द्रात्मजस्थानगतं गभीरं चिह्न त्रिरेखं सरलं चकास्ति। सोयं जन: सज्जनसंगकारी संवक्रगं चेदधमानुगः स्यात्।४७।। चन्द्रमा के स्थान में पाप्तहुआ गहरा तीनरेखाओंवाला निशान सीधा होकर यदि सो हो तो दह प्राणी सज्जनों का साथ करता है और यदि पूर्वोक़ निशान टेढ़ा सा प्तीत तो वह भारणी अधमोंका अनुगामी होता है।। ४७॥ ५ संभोगरेखा यदि मध्यमान्ता संभिन्नरूपा कुटिला विभाति। ररवाधुस्वभावो मनुजस्तदानी सत्कर्मशाली सतत सुखी स्यात्।। ४ संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) मध्यमातक पहुँची हुई कटी व टेढ़ी होकर सोहती हो तो वह प्राणी साधुस्वभाववाला होताहुआ सत्कर्मशाली होकर निर सुखी रहता है।। ४८ ॥। ६ प्रदेशिनीमध्यभिकासुमध्ये रेखा यदैका सरला विभाति। आघातपातान्मृतिमेति प्राणी संकर्तिता चेत्फलमन्यथा स्यात्॥ ४६ जिससमय तर्जनी व मध्यमा के बीच में एकरेखा सीधी होकर यदि सोहती हो वह प्राणी चोटचपेट के लगजाने से अचानक मौतको पाता है और यदि पूर्वोक्क रेखा कटी प्रतीत हो यानी भोगरेखा से कटी देखीजावे तो फल अन्यथा होता है।। ४६॥ ७ भोगाधरस्थं सरलं त्रिरेखं चिह्नं गभीरं विशदं विभाति। तदा जनश्शत्रुगणाभिभूतो शान्त्या विहीनो भयतामुपैति॥५०॥ भोगरेखा के निचले भागमें टिका हुआ सीधा व तीन रेखाओंवाला निशान गहरा साफ़ होकर सोहता हो तो वह माणी वैरिगणों से अनादत होताहुआ शान्ति से र होकर भयको पाता है॥ ५० ॥ १श्लिप्यति 'श्लिप् आलिंगने' (दि. प.अ्.) सर्वधातुभ्यो मनिन श्लेष्मेति सिद्धधति मातु: सुरेखोपरिंगं गभीरं वृत्तार्धिह्नं विशदं विभाति। गुदामयं वै लभते मनुष्यश्चोध्वं यदा चेत्पशुघातमेति ॥ ५१॥ भगन्द मातृरेखा के ऊपरले भागमें माप्तहुआ गहरा व साफ़ होकर अर्धतृत्तका निशान यदि हता हो तो वह माणी गुदारोग (भगन्दर ववासीर आदि) को पाता है और यदि बोक निशान ऊर्ध्वमुख होकर प्रतीत हो तो वह पाणी पशुघात को पाताहै ॥ ५१॥ मासुस्सुशीर्पोपरिंगं विभाति गर्ताख्यचिह्नं विशदं गभीरम्। नक्कान्ध्यरोगी मनुजः सुभोगी विद्योविशेषो विभ्युतामुपैति॥५२॥ मातृरेखा के शीश के ऊपर मासहुआ गड़हे का निशान गहिरा व साफ़ होकर यदि गोहता हो तो वह प्राणी रतौंधीवाला व बड़ा भोगवाला होकर विद्याओं में विशेष होता आ विभुताको पाता है॥ ५२॥ ० मातुस्सुशीर्षोपरिगा सुरेखा गम्भीररूपा यदि याति मन्दम्। उद्दन्धयुक्को मृतिमेति जन्तुर्जायासमेतो जयतामुपेतः ॥५३॥ मातुरेखा के शीशपर मासहुई शोभायमान रखा गहरी होकर शनैश्ररपर्यन्त चलीजावे वह पाी जायासमेत जयताको माप्त हुआ उद्बन्धन (फांसी आदिकों) से मौतू को ता है॥ ५३ ॥ १ स्वल्पा सुमात्री विशदा सुरेखा संवक्ररूपा यदि याति वक्र्। मात रे खा चतुष्पदाघातमुपैति प्राणी चञ्चत्पभावश्चपलस्वभावः॥ ५४ ॥ माताकी रेखा छोटी व साफ़ होकर टेदी होती हुई यदि महल के समीप चलीजावे वह पाणी बड़े प्रभाववाला होकर चपलस्वभाववाला होता हुआ चौपये से चोट पेट को पाता है॥। ५४ ॥ २ वक्रा सुपैत्री मिलिता जनन्यां कोपेन युका मणिबन्धगा चेत्। सोयं जन: शत्रुगणादिभिन्नः कारागृहं प्राप्य मैतिं प्रयाति॥ ५५ ॥ पिताकी रेखा टेढी व मातृरेखा में मिली हुई कोण के निशान से संयुक्क होकर कब्जे र्न्त चली जावे तो वह प्राणी वैरिगणों से ताड़ित होता हुआ जेलखाने में जाकर तत को पाता है।। ५५ ।। ३ अङ्गष्ठशाखासहितं गभीरं कोणद्यं चिह्नतमं चकास्ति। श्लेष्माधिकोयं मनुजस्तदानीं दौर्वल्यगात्रो दयितामुपैति॥५६॥ १अङ्गानि वेदाश्चत्वारो मीमांसा न्यायविस्तरः । धर्मशासत्रं पुरारं च विद्या होताख्तुद्दश।। मरणं मृतिस्ताम्मृतिम्।। सामुद्रिकशास्त्नस्य अँगूठेकी शाखाओं समेत गहरा दो कोणों का निशान यदि सोहता हो तो वह म कफीला होकर दुबला होता हुआ दयिता (प्राणप्यारी) को पाता है॥ ५६ ॥ १४ वृद्धाङ्गुलेवैंनिकटे नखस्य मध्ये विभिन्नं यदि भाति वृत्तम्। चौर्ये प्रवृत्तो मतुजस्तदानी त्नैणो महाव्याधियुतो विभेति॥५७ अँगूठे के नख के समीप बीच में सरल छोटी रेखा से कटाहुआ गोलांकार नि . यदि सोहता हो तो वह माणी चौरकर्म में परायण व स्त्रीलम्पट होताहुआ महाव्याि से युक्क होकर डरता है॥ ५७॥ १५ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्स्वल्पा सुभाग्या समुपैति मात्रीम। तदा जनो जीवति दीर्घकालं दाता दयालुर्दयिताविहीनः॥ ५८ Fale माणीबन्धन (करब्ज़े) से उठीहुई छोटी सी भाग्यरेखा यदि मातृरेखा के पास च eesel जावे तो वह माणी दाता व दयालु होकर माणप्पारी से विहीन होता हुआ समयतक जीता है॥। ५८ ॥ १६ अङ्ुश्ठमूले विशदं विशालं कीटानुरूपं यदि भाति चिह्नम। कफोर्तियुको मनुजस्तदा स्यात्कान्ताविहीन: कलहे रतश्च॥ ५६ अँगूठेकी मूल में साफ़ व विशाल होकर बीछू के समान निशान यदि सोहता हो वह पाणी सत्री से विहीन होकर लड़ाई करता हुआ कफरोग से घिरा रहता है।। ५६ १७ पित्रोः सुमध्ये परिदृश्यमानं सर्पानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। तदा कलङ्ी मनुजो विशङ्गी नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा॥ ६० मातृरखा व पितृरेखा के बीच में देखा हुआ सांप के समान निशान यदि भासता तो वह पराणी कलककी होकर विशक्की होता है और यदि पूर्वोक्क निशान स्त्री के करवल सोहता हो तो वह व्यभिचारिणी होती है॥ ६० ॥ (देखो चित्र नं० ३१) १ कनिष्ठिकायास्तृतये परुष्के रेखाद्यं चेत्सरलं विभाति। जङ्गार्तिभीति लभते मनुष्यो जायाभिलापी जनतासमेतः ॥ ६१॥ कनिष्ठा अँगुली की तीसरी पोर में सीधा दो रेखाओंवाला निशान यदि सोहता तो वह माखी जाया की अभिलापा करता हुआ जनसमूहों से घिर कर जंघापीदा भय को पाता है॥ ६१ ।। १ फेन जलेन फलति 'फलनिष्पतौ' (भ्वा.प. से.) अन्येभ्योपीति डः यहा के शिरसि फा फक्कतीतिया। १ अनामिकायास्त्रितये परुष्के रेखाद्यं चेत्कुटिलं चकास्ति। चतुष्पदादष्टतनुर्मनुष्यो दीनो दरिद्रो दमतामुपैति॥६२॥ अनामिका की तीसरी पोर में टेढा दो रेखाओं का निशान यदि सोहता हो तो वह ाणी दीन व दरिद्री होकर चाँपाये से डसा हुआ दमता को पाता है॥ ६२॥ ३ चन्द्रात्मजस्थानगता विक्षुद्रा स्थूलस्वरूपा यदि भाति रेखा। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदा स्याच्चञ्चत्पभावश्चपलस्वभावः॥६३॥। बुधके स्थान में प्राप्त छोटी व मोटी होकर रेखा यदि सोहती हो तो वह माणी दीप पभाववाला होता हुआ चपलस्वभाववाला होकर चोरी करने में लगा रहता है।। ६३ ।। ब्रघ्नालये चेद्धिशदे विक्षुद्रे स्यातां सुरेखे विरलस्वरूपे। कट्यार्तिभीति भजते मनुष्यों भाग्येन हीनो भ्रमतासमेतः ॥६४॥ सूर्य के स्थान में साफ़ व छोटी होकर सीधी दो रेखायें यदि विरलरूप से सोहती े तो वह पाणी भाग्य से हीन होकर भ्रमसमूहों सें घिरा हुआ कमरपीड़ा की भयको जता यानी सेवन करता है॥। ६४ ।। प्रदेशिनीमूलतलाचलन्ती रेखा यदैका यदि याति चान्द्रिम्। व्युत्पन्नबुद्धिर्मनुजस्तदा स्याद्वेदान्तभाषी व्यवसायपूर्ण:॥ ६ ५ ॥ तर्जनी अँगुलीकी मूल से चली हुई एक रेखा यदि बुध के स्थान में विराजमान. ह तो वह माणी वेदान्तभाषी होकर उद्यम से पूर्ण होता हुआ व्युत्पन्न वुद्धिवाला होता । यह रेखा प्रायः अरप्रखवारसंपादकों के हाथों में पाई जाती है ॥ ६५ ॥ संभोगरेखा यदि नीचभागे रेखाद्वयेनाप्यवखरिडता स्यात्। तदा नरे बन्धुजनोपकारी प्रामोति वित्तं वनिताविहारी ।। ६.६ ।। संभोगरेखा (अस्मदेशीय आयुरेखा) निचले भाग में दो रेखाओं, से. खाएडत.देखी. ती हो तो वह पाणी बन्धुज़नों का उपकारी होकर बनिताओं में विहार करता हुआः नको पाता है॥ ६६ ।।: अम्बोत्थरेखा युतशीर्षदेशा संभोगरेखा गुरुगा विभाति। तदा नरो मृत्युभयाद्विभीतो व्यासक्रचित्तः परितः प्रयाति ॥६७॥' मातृरेखा से उठी हुई सेवा से संयुत शीशवाली भोगरेखा यदि बृह्स्पति के स्थान में हुच कर सोहती हो तो वह भाणी मौतके डरसे.डरता हुआ विशेपता से आसकचित्त ला होकर घारों तरफ घूमता हैं॥ ६७॥ हर = गुर्वालयोत्था विशदास्मुरेखा यावन्मिता मातृपद प्रयान्ति। तावद्विवाहान्कुरुते मनुष्यो मान्यो वदान्यो धनतासमेतः॥ ६८॥ बृहस्पति के स्थान से उठी हुंई साफ़ शोभायमान जितनी रेखायें मातृरेखा के पहुँच जायें तो वह पाणी मानी व अतिदानी होकर धनसमूहों से सम्पन्न होता हुआ उत विवाहों को करता है॥ ६८ ॥ ६ मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे शाखासमेता गुरुगा विभाति। दाता दयालुर्मनुजस्तदानीं मुखामिलाषी ललनासुपैति॥ ६६॥ माताकी रेखा निचले भाग में शाखाओं से संयुत होकर यदि बृह्स्पति के स्थ। पहुँची हुई सोहती हो तो वह प्राणी दाता व दयावान् होकर सुखाभिलापी होता ललना (दुलारी प्यारी) को पाता है ॥ ६६ ॥ १० मातुस्सुरेखा यदि मध्यभिन्ना गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। कट्यार्तिभीति लभते मनुष्य: पूर्वोक्कमानेन विचारणीयम्॥ ७० माताकी रेखा बीच में भिन्न व गहरी होकर बृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई सोहती हो तो वह प्राणी कमरपीड़ा की भयको पाता है यह पूर्वोक्कमान से विच चाहिये॥। ७० ॥ ३१ मात्रा वियुका यदि पितृरेखा सञ्छिन्नमस्ता कुजगा विभाति। तदा नरः स्याद्बहुजग्धिकारी प्रमत्तचित्तः प्रमदाविहारी॥७१। माताकी रेखा से अलग होकर पिताकी रेखा कटे सस्तकवाली व मंगल के प पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह पाणी मतवाला होकर पमदाओं में विहरता हुआ से भोजनों का करनेवाला होता है॥ ७१॥ १२ वृद्धाङ्गलेवैं निकटे नखस्य चापानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। शस्त्रास्त्रविद्धो मनुजो मनस्वी मानी धनी स्याज्जनतासमेतः।७ अँगूठे के नाखन के पास धन्वाकार निशान यदि सोहता हो तो वह माी मनमै मानी व धनी होता हुआ जनसमूहों से संपन्न होकर शस्त्रास्त्रों से वेधाजाता है॥ ७२ १३ मातुस्मुरेखाघरगं गभीरं त्र्यङ्धानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। तदा नरस्स्याच्छ्रजालबद्धो वामी सुकामी खलधामगामी॥७३ मातृरेखा के निचले भाग में प्राप्त हुआ गहिरा होकर तीन के आंक कासा नि यदि सोहता हो तो वह पाखी वामी व बड़ा कामी होकर खलधामगामी होतां! बारसमूहदों से बांधा जाता है।। ७३। १४ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानुरूपं समुपैति मात्रीम्। तदा नरः स्याद्व्यभिचारशीलो नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा।।७४।। मणिबन्ध (क्रब्जे) से उठा हुआ सर्प के समान निशान मातरेखा के समीप यदि चलाजावे तो वह पाखी व्यभिचारशाली होता है और यदि पूर्वोक निशान स्त्री के कर- तल में विराजता हो तो वह व्यभिचारिणी होती है॥। ७४॥ १५ पैत्री सुरेखा यदि मध्यदेशे वृत्तार्धयुक्का कुटिला विभाति। प्रापोति प्राणी हृदयाभिघातं पूर्वोक्कमानेन विदोहनीयम्॥७५॥ पिता की रेखा मध्यभाग में गोलाकार या अर् गोलाकार निशान से संयुत होती हुई टेदी होकर यदि सोहती हो तो वह माणी हृदय में चोट चपेट को पाता है यह विद्वान् को पूर्वोक मान से विचारना चाहिये।। ७५॥ १६ निशोकरस्थानगतं सुचिह्नं चुल्लीसरूपं विशदं विभाति। तदा नरो मज्जति वारिराशौ व्यायामसको विषयातुरश्र ॥ ७६॥ चन्द्रमा के स्थान में पाप्त हुआ चुल्ही के समान साफ़ शोभायमान निशान यदि सो- हता हो तो वह पाणी कसरती होता हुआ विपयों से आतुर होकर नदी या नाले आदि कों में डूब जाता है॥ ७६ ॥ १७ पैत्रीसुरेखा यदि नीचभागे संखरीडता भुग्नतरा विभाति। तदा महोच्चात्पतितो मनुष्यो मानी महौजा ममतामुपैति॥७७॥ पिता की रेखा निचले तरफ़ भलीभांति खएिडत होकर टेढी होती हुई यदि सोहती हो तो वह माणी मानी व महावलवान् होकर बड़े ऊंचे से गिरता हुआ ममताको पाताहै।।७७॥। (देखो चित्र नं० ३२) १ सर्वाङ्गुलीनां युगरामपर्वके रेखाद्यं वै सरलं विभाति चेत्। तदा जनोसौ निजवाक्यपालकः पारुष्यपूर्ण: परमार्थशालकः॥७८॥ समस्त अँगुलियों की दूसरी व तीसरी पोर में सीधी दो रखायें यदि सोहती हो तो वह माणी अपने वाक्यका पालनेवाला होकर कठोरता से पूर्ण रहता हुआ परमार्थ का शालनेवाला होता है॥ ७८ ॥ १ निशाकरम्रन्द्र: २ "ओोजी दीप्तौ बल इत्यमरः" महदोजो बलं यस्मिभ्निति महाबलवा मिति यावत्।।' सामुद्रिकशास्त्रस्य २ सौम्यालयाच्चेच्चलिता सुरखा चापानुरूपा यदि याति सूर्यम्। तदा नरोऽसौ वयसः क्रमेण प्रामोति वृद्धिं बलवीर्ययुक्काम्॥ ७६॥ बुधके स्थान से चली हुई शोभायमान रेखा धनुप के समान होकर यदि सूर्य के पा पहुँचजावे तो वह पाखी अवस्था के क्रमसे बल व वीर्य से युक्र वृद्धि को पाता है या बाल्यावस्था से युवावस्था में व युवावस्था से वृद्धावस्था में उन्नतिको पाता है॥ ७६ ३ वक्रालयाच्चेच्चलिता सुरेखा पित्रोर्विभित्त्वा यदि याति भोगाम्। रक्कार्तियुक्को मनुजो मनीपी सौजन्यपूर्णो मृतिमेति सद्यः ॥८०॥ मफुल के स्थान से चली हुई शोभायमान रेखा मातरेखा व पितृरेखा को काटकर भो रखा पर्यन्त चलीजावे तो वह माणी बुद्धिमान् व सुजनता से पूर्ण होकर रक्पीड़ा संयुक्क होता हुआ वेगही मौतको पाता है।। ८० । ४ संभोगरेखोपरिंगं विभाति वृत्तार्धयुग्मेन युतं सुचिह्रय। तदा नरोसौ गुणगौरवाढ्यो गुदार्तियुको गुरुतामुपैति॥८१॥ सुभोगरेखा के ऊपर प्राप्त हुआ दो अर्धगोलाकारों से संयुत शेभायमान निशान य सोहता हो तो वह पराएी गुणों की गौरवता से सम्पन्न होकर गुदारोग से पीड़ित हो हुआ गुरुता को पाता है।। ८१।। ५. मातुस्मुरेखा यदि मध्यभागे धन्वाकृतिभ्यामवखिडता स्यात्। दौर्बल्यगात्रो विकलस्वभाको मानेन हीनो मनुजो विभेति॥८२॥ माता की रेखा यदि मध्यदेश में दो धन्वाकार निशानों से खएिडत देखीजावे तो पाणी दुर्बल शरीरवाला व विकल स्वभाववाला होकर मान से विहीन होता हु डरता रहता है॥। ८२॥ ६ पित्रा समेता यदि मातृरेखा कोपन युक्ा कुटिला विभा.ते। विश्वासयुको मनजो मनस्वी स्यात्तीक्ष्णबुद्धिविषयस्य गोप्षा॥ ८ ३। पिता की रेखा से मिली मातृरेखा टेढी होकर कोंग के निशान से संयुंत होती। यदि सोहती हो तो वह माणी मनमौजी, तीखी बुद्धिवाला व विपयका छिपानेहा होकर विश्वासयुक् रहता है॥। =३ ॥ ७ पितुः सुरेखोपरिगं सुचिह्नं भिन्नत्रिकोएं यदि वञ्रिन्नम्। तदा नरो वहिविदग्धगात्रो व्यासक्चित्तः परितः प्रयाति॥८४॥ पिताकी रखा के ऊपरले भाग में प्राप्त हुआ वज्र से कटे हुए भिन्रत्रिकोण ६५ू निशान यदि देखा जावे तो वह प्राशणी आगी से जली देहवाला होकर विशेषता से प्रासक्चित्त होता हुआ या ककि सवोंसे अलग चित्तको रखता हुआ चारोंतरफ़ घूमता है॥८४।। काव्योलयाच्चेच्चलिता सुरेखा नतस्वरूपा यदि याति चोर्ध्वम्। तदा नरो भिक्षुकवृत्तियुक्रो नीचप्रवृत्तिर्नितरां विभाति॥८५॥ शुक्र के स्थान से चली हुई रेखा लचेरूपवाली होकर यदि ऊपरको चली जावे तो वह माणी नीचों में पवृत्ति रखता हुआ भिक्षुकों की जीविका से संयुत होकर बहुत ही सोहता है।। ८५ ॥ आरालयोत्थं कुटिलं गभीरं रेखाद्वयं भ्रातृपदं प्रयाति। शीर्षच्छिदाभीतियुतो मनुष्यो मायामयोयं ममतामुपैति॥८६॥ मंड्रल के स्थान से उठाहुआ टेढ़ा व गाहिरा होकर दो रेखाओं का निशान भ्रातृ स्थानको यदि चलाजावे तो वह प्राणी मायावी होकर शीशकाटने की भय से संयुत होता हुआ ममता को पाता है ॥। ८६ ॥। १० चन्द्रालयस्थं सधनं गभीरं रेखात्रयं चिह्नतरं चकास्ति। तदा नरोसौ शठतामुपैति सम्पत्तिपूर्णो नितरामस्यः॥८७॥ चन्द्रमा के स्थान में टिकाहुआ+धनममेत गहिरा तीन रेखाओंवाला निशान यदि चमकता हो तो वह प्राणणी सम्पत्तियों से पूर्ण रहता हुआ बहुत ही असभ्य होकर शठता को पाता है।। ८७ ।। ११ भाग्या सुरेखा खल स्वल्परूपा शाखासमेता शशिनं प्रयाति। तदा जनोयं जठरामयात्तों जाज्वल्यमानो ज्वरतामुपैति॥द८॥ भाग्यरेखा (फार्चूनलाइन) शाखा समेत छोटेरूपवाली होकर यदि चन्द्रमा के सामने वली जाबे तो वह पराणी उदररोग से पीड़ित होकर बहुत ही जलता हुआ ज्वरसमूहों हो पाता है॥ ८८ ॥ २ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्का सुरेखा यदि याति मात्रीम। तदा नरो घूर्णितशीषदेशो दौर्बल्यगात्रो भयतामुपैति॥द६ ॥ मशिबन्ध (कब्जे) से उठी रेखा टेढ़ी होकर मातृरेखा के पास यदि चलीजावे तो वह ासी शिरोभ्रान्ति (घुमनी) रोग से पीड़ित होता हुआ दुबली देहवाला होकर भयता भयसमूह) को पाता है यानी उस प्राणणीका शीश हमेशा चकर खाया करता है इसी से चला रहता हुआ डरा करता है ।। ८६ ।। (देखो चित्र नं० ३३). १ शुक्रो दैत्यगुरुः काव्य उशना भार्गवः कविरित्यमरः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य अथ पश्चदशलक्षणाङ्गितकरतलफलमाह- १ मध्याङ्गलेवैं द्वितये परुष्के वक्रा सुरेखा विशदा विभाति। तदा नरोSनिष्टतरं प्रयाति विषाद्यपायै्विषयाभिभूतः॥।६०॥ मध्यमा अँगुली की दूसरी पोर में रेखा साफ़ व टेढ़ी होकर यदि सोहती हो तो पाशणी विषयों से टूटे अ्हंकारवाला होता हुआ विपादि उपायों द्वारा अनिष्टताको पाताहैह २ सौम्यार्कमध्ये विशदं विभाति तिर्यक्स्वरूप यदि युग्मरेखम्। नेत्राभिघातं लभते मनुष्यो नारीविहीनो नयतासमेतः॥ ६१॥ बुध व सूर्य के मध्य में यानी कनिष्ठा व अनामा के नीचे तरफ़ विचले भाग में स होकर दो रेखाओंवाला निशान तिरीछे रूपवाला होता हुआ यदि सोहता हो तो भाणी प्राखप्यारी से विहीन होकर नीति से संपन्न

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 6)

होता हुआ लोचनों में चोट चपेट पाता है।। ६१ ।। ३ मन्दालयस्थं विशदं विभाति तिर्यकृत्रिमिन्नं यदि युग्मरेखय। कारागृहं याति नरः कदापि ज्वरेण भग्नश्रतुराहिकेण॥ ६२ ॥ शनैश्र के स्थान में टिकाहुआ साफ़ व तिरीदी तीन रेखाओं से भिन्न होकर रेखारऑंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी चतुराहिक ज्वर से पीड़ित हं हुआ कभी जेलखाने को जाता है।। ६२।। ४ गुर्वालयस्था कुटिला कुरेखा तिर्यग्विभिन्ना यदि याति भोगाम्। पदाधिकारं लभते मनुष्यो ऋज्वी यदा चेद्धठतः पदाप्िम्॥ ६३ वृहस्पति के स्थान में टिकी हुई टेदी व छोटी सी रेखा तिरीछी रेखा से भिन्न हो यदि भोग रेखा पर्यन्त चली जाने तो वह माणी पदाधिकार को पाता है और पूर्वोक़ रेखा सीधी सी प्रतीत हो तो वह प्राी हठ से पदको पाता है॥ ६३ ॥ ५. गुर्वालयान्ताचलिता सुरेखा पित्रोर्विभित्त्वा यदि याति भौमम्। रक्कार्तियुको मनुजो मनीषी मान्यो वदान्यो ज्वरतामुपैति॥६४ बृहस्पतिस्थान के समीप से चली हुई शोभायमान रेखा मातृरेखा व पितरेखा काटकर यदि मङलपर्यन्त चली जावे तो वह पाणी बुद्धिमान्, मान्य व वदान्य (भ्र दानी) होकर रक्पीड़ा से संयुत होता हुआ ज्वरसमूह को पाता है ।। ६४ ।। ६ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाङ्ग्ना सुरेखा समुपैति सौम्यम्। दीर्घायुषं तं मनुजं करोति विद्याधरं बोधवरं वरेरायम्॥ ६५॥ १ आत्तगर्वोभिभूतस्स्यादित्यमरः ॥ पूवॉर्द्धे द्वितीयाङ्क: । जिस माखी के करतल में मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई रेखा टेढ़ी होकर यदि ुध पर्यन्त चली जावे तो उस भाी को दीर्घ उमरवाला, विद्या का धारनेवाला, वड़े गोधवाला तथा सवों में प्रधान बना देती है॥ ६५ ॥ 9 संभोगरेखा गुरुगा गभीरा शाखासमेता यदि नीचभागे। वाह्ये गुदे रोगगुतो मनुष्य: संखयिडता चेद् गुदमध्यरोगी॥६६॥ भोगरेखा (हार्टलाइन) बृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई गहरी होकर यदि निचले स्थान में शाखा समेत देखी जावे तो वह माणी गुद़ा स्थान में वाहिरी तरफ़ रोगों से संयुत इता है और यदि पूर्वोक रेखा निचले भाग में खरिडत पाई जावे तो वह पाणणी गुदा के बीच में रोगवाला होता है॥ ६॥ = संभोगमात्रोर्यदि नीचदेशे चिह्नं चतुष्कोणयुतं चकास्ति। तदा विवादी मनुजो विषादी महाप्रतापी खल्ु विभलापी॥ ६७॥ संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आ्रायुरेखा) व मातृरेखा के निचले भाग में चौकोणसंयुक्र निशान यदि भासमान हो तो वह माणी विषाद का करनेवाला, बड़े प्तापवाला व छल सेभापखकर आशाभंग का करनेहारा होकर झगड़ालू होता है।। ६७ ।। मातुससुरेखा गुरुगा गभीरा क्षुद्राविभिन्ना यदि मध्यदेशे। तदा मनुष्यः सुविचारशाली काले भविष्ये कुविचारपाली ॥ ६८ ॥ माता की रेखा वृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई गहरी होकर यदि बिचले भाग में सुद्ररेखाओं से कटी देखी जावे तो वह प्राणी वर्तमानकाल में बड़ा विचारशाली होता है तथा भविष्यकाल में निन्दित विचार का पालनेवाला होता है यानी वुरा विचार किया करता है।।ह८ ॥ १० मातुस्सुरेखा यदि नीचदेशे क्षुद्राविभिन्ना गुरुगा विभाति। अल्पायुषं तं परुष करोति ह्यानन्दहीनं मतिमन्दपीनम्॥ ६६ ॥ वृहस्पति के स्थान में पहुँची माता की रेखा यदि निचले भाग में छोटी रेखा से कटी हुई सोहती हो तो उस माणी को आनन्द से हीन, मोटी बुद्धिवाला तथा थोड़ी उमर वाला करती है यानी वह माणी आनन्द से रहित होकर मतिमन्दों में मोटा होता हुआ अल्पायु होजाता है॥ ६६ ॥ ११ आरालयान्ताचलिते सुरेखे अङ्गष्ठपृष्ठाभिसुखं प्रयातः। तदा जनो मजति वारिराशौ कर्तव्यकार्ये बहुंतर्ककारी॥ १००॥ १ विप्रलापो विसंवाद इत्यमरः ॥ I5 सामुद्रिकशास्त्रस्य मजलस्थान के निकटदेश से चली हुंई शोभायमान दो रेखायें अँगूठे की पी सामने यदि पहुँच जाबें तो वह पाणगी करने योग्य कार्य में बहुतसा तर्क करनेहाराह नदी व नाले आदिकों में डुबजाता है ॥ १०० ॥ १२ वृद्धाङ्गलेवैं निकटे नखस्य रेखाद्यं चेद्ग्रथितं मिथः स्यात्। तदा नरो नास्तिकतामुपैति पाखरडकारी परवित्हारी।।१।। अँगूठ के नख के पास टेढ़ी फनाकार दो रेखाओंवाला परस्पर (५) गुँथा हुआ नि सोहता हो तो वह पाणी पाखएडकारी होकर परधन का हरनेवाला होताहुआ नास्त को पाता है॥ १॥ १३ मन्दालयाचेचवलिता सुरेखा स्वल्पस्वरूपा समुपैति पैत्रीम्। तदा नरस्तूचपदं प्रयाति राज्यात्मतिष्ठां पतिपद्य सम्यक् ॥ २॥ शनैश्र के स्थानसे चली हुई शोभायमान रेखा छोटे रूपवाली होकर पितृरेखा के प पहुँच जाचे तो वह प्राी भलीभांति किसी राज्य से प्रतिष्ठा को पाकर ऊंचे पढ अंधिकारी होता है यानी बड़ी पतिष्ठा के साथ ऊंचेपद को पाता है॥ २ ॥ १४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद् वक्रा सुरेखा पितरं प्रयाति। ज्वरार्दितः क्षीणतनुर्मनुष्यो दीनो दरिद्रो दयितासमेतः ॥ ३॥ मशिबन्ध (कब्जे) से उठी हुई शोभायमान रेखा टेडी होकर पितृरेखा के पास पढ़े जावे तो वह पाणी क्षीणकायावाला, दयितासमेत, दीन व दरिद्री होकर बुखार व्याकुल रहता है ।। ३ ।। १५ काव्यालयस्थं परिभाति चिह्नं वाणर्विभिन्नं यदि षदकरेखम्। हासी विलासी रतिरङ्गेलासी ह्यानन्दराशी पुरुषः प्रकाशी॥।४॥ शुक्र के स्थान में टिका व पांच तिरीछी रेखाओं से कटा हुआ छः रेखाओवाल निशान यदि सोहता हो तो वह माी हँसनेवाला, पयाश व रतिरंगमें लसाहुआ आन की राशिवाला होकर प्रकाश का करनेवाला कहाता है।। ४ ॥ (देखो चित्र नं० ३४) अथ चतु ईशलक्षणङ्कितिकरतल फलमाह- १ प्रदेशिनी चन्द्रमिते परुष्के रेखाद्यं चेत्कुटिलं चकास्ति। उग्रस्वभावो मनुजस्तदा स्यात्क्रोधातुरः क्षीणकलेवस्श्र॥ ५ ॥ तर्जनी अँगुली की पहिली पोर में दो रेखाओवाला निशान टेढा होता हुआ १ रतिरङ्गे लसितुं शीलमस्येति। हट सोहता हो तो वह गाणी कठोर चित्तवाला होकर कोप से घबड़ाया हुआ क्षीण काया बाला होता है॥ ५ ॥ २ मन्दालयाच्चेच्चलिते कुरेखे सन्तर्जनी मूलगते यदा स्तः। सम्पत्तिहीनो मनुजो विशोकी प्रासभ्यदोषान्मरणं प्रयाति ॥ ६ ॥ शनैश्चर के स्थान से चलीहुई छोटीसी दो रेखायें टेदी होकर तर्ज्जनी अँगुली पर्यन्त यदि चलीजावें तो वह माणी बड़े शोचका करनेवाला होकर संपत्तियों से हीन होता हुआ अपने हठतादोप से मौत को पाता है॥। ६ ॥ ३ संभोगशाखा गुरुगा गभीरा स्वल्पस्वरूपा कुटिला विभाति। तदा ह्यपस्मारयुतो मनुष्यो जलाग्निभीतो जडतामुपैति॥।७॥ संभोगरेखाकी शाखारेखा बृहस्पति के स्थान में पहुँचो गहरी व टेढी होकर छोटेरूप वाली होती हुई यदि सोहती हो तो वह माणी मिरगीरोग से संयुत होकर पानी व आगी सडरता हुआ जड़ता को पाता है।। ७।। ४ संभोगरेखा निजमध्यदेशे क्षुद्राविभिन्ना सरला विभाति। संभोग रेख मानी मनुष्यो ममतासमेतो मन्दाग्निरोगं लभते नितान्तम् ॥८॥- संभोगरेखा (अस्मदेशीय आयुरेखा) सीधी होकर अपने विचले भाग में छोटी छोटी रखाओं से कटी हुई यदि सोहती हो तो वह पाणी मानी व ममता से संपन्न होकर हमेशा मन्दाग्निरोग को पाता है॥ = H ५ संभोगरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखाविहीना शनिगा विभाति। संभागरखा द्वीपान्तरं याति नरस्तदानीं सम्भ्रान्तचित्तः परितो भ्रमेच॥ ६ ॥ सुभोगरेखा (आयुरेखा=हार्टलाइन) ऊपरले भाग में शाखा से विहीन होती हुई रनैश्चर पर्यन्त पहुँचकर यदि सोहती हो तो वह प्राली संभ्रान्तचित्त होता हुआदूसरे हपको चला जाता है और चारों तरफ़ घूमता रहता है ।। ह।। ६काव्यालयाच्चेचलिता सुरेखा पित्रोविभित्वा भजते सुभोगाम्। सोयं नरो वह्िविदग्धगात्रो ह्यामोति मृत्युं सहसासमेतः ॥१०॥ शुक्र के स्थान से चली हुई शोभायमान, रेखा मातृरेखा व पितृरेखा को काटकर भोग रखा को सेवती हो तो वह भाणी बल से संपन्न होकर आगी से जली कायांवाला होता हुआ मौतको ही पाता है॥ १० ॥ 9 मातुः सुरेखा सरला गभीरा शाखासमेता यदि चोर्धदेशे। १ सम्भ्रमत्रयमिच्छृन्ति भयमुह्ेगमादरम्॥ सामुद्रिकसालस्थ तदा जनो वैरिगयान्विजित्य विश्वासपात्रो विभ्ुतामुपैति॥११॥ माताकी रेखा सीधी व गहरी होकर यदि ऊपर ले भाग में शाखाओं समेत हे जावे तो वह प्राणणी विश्वासशाली होकर वैरिगणों (शत्रुसमूहों) को विजयकर वि् को पाता है॥ ११ ॥ = वृद्धाङ्गलेर्वै निकटे नखस्य रेखात्रयं चेत्सरलं विभाति। विश्वासशाली मनुजस्तदा स्याद्रेखादयं चेतु फलं तदेव ॥। १२ ।। अँगूठे के नह के निकट देश में तीन रेखाओंवाला निशान सीधा होकर यदि सो हो तो वह पाशी विश्वासपात्र होता है और यदि पूर्तोक निशान दो रेखाओंव्वा पतीत होता हो तो फल वही होता है जो कि पहले कहा गया है ॥ १२ ।। हसंभोगरेखाधरगं विभाति तिर्यक्स्वरूपं यदि युग्मरेखम्। तदा नरो रोगगणाभिभूतो रक्कातिसारं लभते रसज्ः॥१३ ॥ संभोगरेखा (हार्टलाइन) के निचले भाग में प्राप्त हुआ दो रेखाओंवाला निश् टेदेरूपवाला होकर यदि सोहता हो तो वह पाणणी रोगसमूहों से व्याकुल होता हु रसज्ञाता होकर रक्रातिसार (पित्तातिसार में गर्मवस्तु के खाने से होताहै) को पाता है॥१ १० मातुः सुरेखा यदि नीचभागे शाखासमेता सरला विभाति। निर्वोधरूपो मनुजस्तदा स्यात्सत्येन हीनो ह्यनभिज्ञमुख्यः॥१४ माता की रेखा सीधी होकर यदि निचले भाग में शाखासमेत सोहती हो तो पाखी सत्य से हीन होकर मूर्खों में मुखिया होता हुआ अयोधरूप से रहता है।। १४। ११ पैत्री सुरेखा मणिवन्धहीना वक्रा सकोणा मिलिता जनन्याम्। दीर्घायुषं तं पुरुषं करोति पारुष्यहीनं परमार्थलीनम्॥ १५ ॥ पिता की रेखा मशिबन्ध (कब्ज़े) से हीन, टेदी व कोख समेत होकर मातरेखा मिली हुई देखी जावे तो उस पाणी को कठोरता से हीन व परमार्थ में लीन हुआ ब उमरवाला बनादेती है॥ १५ ॥ कम रखवा लिरपा सुभाग्या कटिला चकास्ति क्षद्राविभिन्ना यदि मध्यदेशे। अल्पायुष तं पुरुषं करोति ह्यानन्दहीनं वसुधाविहीनम्॥ १६॥ भाग्यरेखा (ऊर्ध्वरेखा) छोटे रूपवाली व टेदी होकर यदि विचले भाग में बो छोटी रेखाओं से कटी हुई देखी जावे तो उस प्राणी को आनन्द से हीन व बसुपा विहीन बनाकर अन्पायु करती है॥ १६ ॥ १३ भाग्या सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे शाखासमेता जननीं प्रयाति। माग्य तदा नरो रोगचयाभिभूतो भोगाभिभूतो भयतामुपैति ॥१॥रेला भाग्यरेखा (फेटलाइन) यदि ऊपर ले भाग में शाखाओं समेत होती हुई मातृरेखा कपास जावे या सामने ही रहै तो वह माी रोगसमूहों से पीड़ित व भोगों से व्याकुल आ भय (डर) समूह को पाता है॥ १७॥ ३४ काव्यालये चेद्विशदं विभाति भिन्नोर्ध्वभागं गुणितस्य चिह्नम्। सोयं जन: स्याद्निताविलासी हासी विघासी चसदा सुखाशी॥१८॥l शुक्र के स्थान में गुखित x का निशान साफ़ होकर ऊपरले भाग में कटा हुआ यदि X सोहता हो तो वह माणी वनिताओं में विलास करता व हँसता व बहुत खानेवाला होता आ हमेशा सुख की आशावाला होता है ॥ १८ ॥ (देखो चित्र नं० ३५) प्रदेशिनीभूमियुगे परुष्के धनाख्यचिह्नं विशद विभाति। तदा नरः स्वं लभतेवलाया नार्या यदा चेत्कुलटा भवेत्सा ।। १६ ।। तर्जनी अ्रँगुली की पहली व दूसरी पोर में यदि धन का + निशान साफ़ होकर ोहता हो तो वह भाणणी किसी स्त्री के पास से धन को पाता है और यदि पूर्वोक् निशान व्री के करतल में प्रतीत हो तो वह व्यभिचारिणी होती है ।। १६ ।। अनामिकामध्यमिकासुमूले रेखाचतुष्कं यदि भाति स्वल्पम्। दाता दयालुर्मनुजस्तदा स्याद्विश्वासशाली विषयैर्विरकः ॥ २०॥ अनामिका व मध्यमा अँगुली की मूल में छोटासा चार रेखाओंवाला निशान यदि ोहता हो तो वह भाणी दाता व दयावान् होकर विश्वासपात्र होता हुआ भोगों से वेरक़ रहता है॥ २० ॥ मन्दालयाचेच्चलिता सुरेखा गम्भीररूपा समुपैति सर्यम्। पापाधिकारी पुरुषस्तदा स्यात्पारुष्ययुक्क: पशतुल्यबुद्धिः ॥ २१॥ शनैश्वर के स्थान से चली हुई शोभायमान रेखा गहरी होकर यदि सर्यपर्यन्त चली नावे तो वह प्राणी पापाधिकारी होकर कठोरता से संयुक्त होता हुआ पशुकी समान द्धिवाला होता है॥। २१ ॥ सौम्यालयान्ताच्चलिता सुरेखा कौटिल्यरूपा यदि याति मन्दम्। मन्दस्व्रभावो घृणया समेतः पापे प्रवृत्तः पुरुषोधमः स्यात् ॥ २२॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य चुधके स्थान से चली हुई शोभायमान रेखा टेढ़ी होकर यदि शनैश्वरपर्यन्त च जावे तो वह माणी मन्दस्वभाववाला व घृणण (घिन) से संयुत होकर पाप में परा होताहुआ निन्दित होता है॥ २२॥ ५ गुर्वालयस्थं विशदं विभाति रेखात्रयं चेत्सरलस्वरूपम्। सोयं जनो मस्तकघातमेति राज्याधिकारी रमणीविहारी।।२३।। बृहस्पति के स्थान में टिकाहुआ साफ़ व सीधा होकर तीन रेखाओंवाला नि यदि सोहता हो तो वह पाशी किसी महाराजा की राज्य में अधिकारी होकर रमशिये विहार करता हुआ मस्तक में चोट चपेट को पाता है ।२३॥ ६ सौम्यालये चेत्सरला सुरेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। मान्यो वदान्यो मनुजस्तदा स्यान्नार्या यदा चेत्सुरता भवेत्सा। २४ वुधके स्थान में सीधी, गहरी व साफ़ होकर शोभायमान रेखा यदि सोहती हो वह माणणी मान्य होकर वदान्य (बड़ादानी) या बोलनेवाला होता है और यदि पू रेखा स्त्री के करतल में प्रतीत हो तो वह बड़ी रमनेवाली होती है॥ २४ ॥ ७ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे गम्भीररूपा भगिनीसमेता। तदा नरः स्याद्दृढगात्रयष्टिः संभोगशाली सुषमासमेतः ॥ २५॥ संभोगरेखा (हार्टलाइन) गहरी होकर यदि निचले भागमें भगिवीरेखा स प्रतीत होवे तो वह पाणी मज़वूत कायावाला होकर बड़ा भोगी होता हुआ परमरोे वाला होता है॥ २५। = संभोगरेखा यदि मध्यदेशे क्षद्राविभिन्ना कुजगा विभाति। कामातुरः कार्यरतो मनुष्यो ब्रीडाविहीनो वनितामुपैति॥२६॥ मङ्गल के स्थान में पहुँची संभोगरेखा यदि बिचले भागमें छोटी छोटी रेखाओं से हुई सोहती हो तो वह प्राणी कामातुर व कार्य में परायण होताहुआ निर्लज्ज हो वनिता (लुगाई) को पाता है ॥ २६॥ ६संभोगरेखा यदि चोर्ध्वदेशे मातापितृभ्यां सहिता सकोणा। सत्येन हीनो विपदा समेतः संकष्टशाली मरणं प्रयाति ॥ २७। संभोगरेखा यदि ऊपरले भाग में कोणसमेत होकर मातृरेखा व पितृरेखा से मि हुई देखी जावे तो वह माणी झूठा व विपदा से घिराहुआ महाकष्ट का भोगनेवा होकर मौतको पाता है॥ २७॥ १ सुपमा परमा शोभेत्यमरः॥ ० अङ्ष्ठशाखानिकटे विभाति रेखात्रयं रेखयुगेन भिन्नम्। धूर्त: कुशीदी मनुजो मिथश्चेद्धिन्नं मृर्ति चैत्यधनी सचक्रम् ॥ २८ ॥ अँगूठे की शाखाओं के समीप ऊपरल भागमें तिरीछी दो रेखाओं से कटाहुआ तीन खिाशंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह पाणी जुआरी होकर व्याजखोर होता है औौर यदि पूर्वोक निशान परस्पर रेखाओं से कटाहुआ देखाजावे तो वह प्राणी मौत को ाता है और यदि पूर्वोक निशान चक्राकार देखाजावे तो वह धनरहित होता है॥ २८ ॥ १ शुक्रालये चेद्िशदस्वरूपं चिह्नं त्रिशलानुमितं विभाति। सोयं नरो वहिविदग्धगात्रो यज्ञादिकार्य करुते नितान्तम् ॥ २६॥ शुक्र के स्थान में त्रिशल के समान निशान साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह भाखी प्रागीसे जलेहुए गात्रवाला होकर हमेशा यज्ञादि कार्यो को करता है॥ २६ ॥ २ समुत्थिता चेन्मणिवन्धदेशाद्वेखा गभीरा समुपैति सौम्यम।भागय रखवा सोयं नरः स्याद्िनयी जयी च संक्षीणचेता यदि कर्तिता स्यात्॥३०॥ मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी हुई रेखा गहरी होकर यदि वुध पर्यन्त चलीजावे तो ह मारणी विनयी होकर वैरियों का जीतनेव्राला होता है और यदि पूर्वोक्क रेखा कटीहुई तीत हो तो वह क्षीणचित्तवाला होता है ॥ ३॥ ३ समुत्थिता चेन्मशिबन्धदेशाङ्ाग्या सुरेखा यदि याति शौरिम। आाम ा औत्करठ्ययुको मनुजस्तदा स्याद्रेखा नता चेत्फलताविशेषः॥३१॥ मशिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी हुई भाग्यरेखा (फेटलाइन) यदि शनैश्रर पर्यन्त चली सत्रे तो वह माणी उत्कएठा से संयुक्त होता है और यदि पूर्वोक् रेखा लचीहुई प्रतीत हो विशेष उत्कएठावाला होता है॥ ३१ ॥ ४ अङ्गश्ठमूले विशदस्वरूपं वज्रानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं नरः स्यात्कुविचारशाली ह्याचौरहारी व्यभिचारकारी।।३२।। अँगूठे की मूलमें वज्र के समान निशान साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह वुरे विचार विचारनेवाला व आचारका हरनेवाला होकर व्यभिचारका करनेव्राला होताहै॥ ३२॥ ५ पित्रोः सुमध्ये परिदृश्यमानं वस्वङ्कतुल्यं यदि भाति चिह्नम्। दुःखाकरः स्यान्मनुजो जनानामुद्बन्धतों मृत्युमुखं प्रयाति ॥३३ ॥ १ धूर्तोक्षदेवी कितवोSक्षधूत्तों द्यतकृत्समा, इत्यमर: २ आचाराल्लभते हयायुराचारादीप्सि- जा आचाराद्वनमक्षय्यमाचारो हन्त्यलक्षणमिति मनुः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य मातृरेखा व पितृरेखा के बीचमें देखाहुआ आठत्रङ्क के समान निशान यदि सो हो तो वह प्राणी मनुष्योंके लिये दुःखकारी होता हुआ फांसी से मौत को पांताहै।। ३! (देखो चित्र नं० ३६ ) १ मध्याङ्गलेवैं प्रथमे परुष्के चिह्नं त्रिरेखं यदि वेदभिन्नम्। औपत्करठ्ययुक्ो मनुजस्तदा स्यादौदास्यपूर्णों नितरामुदारः॥३१ मध्यमा अँगुली की पहली पोर में तिरीछी चार रेखाओं से कटा हुआ सीधी रेखाओंवाला निशान यदि भासमान होता हो तो वह माणी उत्कएठा से संयुक्ध कर उदासीनता से पूर्ण रहता हुआ बहुतही उदार होता है॥। ३४॥ २ प्रदेशिनीचन्द्रमिते परुष्के वक्रं त्रिरेखं यदि भाति चिह्नम। सोयं नरो धर्मपरो नितान्तं धन्यो धरित्र्यां धनतामुपैति॥३५॥ तर्जनी अँगुली की पहली पोर में टेढा होकर तीन रेखाओंवाला निशान यदि हता हो तो वह माणी हमेशा धर्म में परायण रहता हुआ पृथ्वीमएडल में धन्य हो धनसमूहों को पाता है॥। ३५ ॥। ३ मातु: सुरेखाधरतश्चलन्ती भिन्ना सुरेखा दिनेपं प्रयाति। द्रव्यादिहेतोः पुरुषान्निहन्ति इस्वा यदा चेत्तनुघातमेति॥३६॥ मातृरेखा के निचले भाग से चली हुई रेखा छोटी रेखा से कटकर सूर्यपर्यन्त च जावे तो वह पाणी द्रव्यादिकों के लिये पुरुपों का वध करता है यानी डाकेजनी करत और यदि पूर्वोक रेखा छोटीसी प्रतीत होकर सुद्ररेखाओं से कटी फटी देखी जावे वह पाणी अपने शरीर में चोट चपेट को पाता है। ३६॥ ४ संभोगरेखानिकटे विभाति भग्नीमुरेखा वितता गभीरा। सोयं जनः स्याद्निताविलासी संमोदराशी बहुधा प्रहासी। ३७ सुभोगरेखा के समीप भग्नीरेखा फैली व गहरी होकर यदि सोहती हो तो वह म ममदाओं में विलास करनेवाला होकर बड़े आनन्द की राशि होता हुआ प्रापः हँसनेवाला होता है॥ ३७ ॥ ५ संभोगरेखा यदि नीचभागे क्षुद्राविभिन्ना कृशतासमेता। वक्षस्थलाघातमुपैति जन्तुर्जायाविरोधी जनतासमेतः॥३८॥ १ दिनपं दिनपति सूर्यमितियावत्।। संभोगरेखा (अस्मद्देशीय आयुरेखा) यदि निचले भाग में पतली होकर छोटी छोटी खाओं से कटी हुई सोहती हो तो वह पाणी लुगाई (अपनी प्यारी) का विरोधी होकर नसमूहों से संपन्न होता हुआ छाती में चोट चपेट को पाता है।। ३=॥ भोगा गभीरा मिलिता सुवप्रे तन्मध्यगा स्वल्पतरा च माता। रोगाभिभूतो मनुजस्तदानीं भूतादिदोपैरपपृत्युमेति ॥ ३६ ॥ भोगरेखा "ऊपर ले भाग में" यदि गहरी होकर पितुरेखा में मिली हुई देखी जावे र उन दोनों रेखाओं के बीच में पहुँची हुई मातरेखा छोटीसी प्रतीत होते तो वह णी रोगों से पीड़ित होता हुआ भतादि दोपों से अकालमौत को पाता है।। ३६ ।। पितुः मुशीर्पोपरिगं विभाति तारानुरूपं यगलस्वरूपम्। तदा नरोसौ यशसा समेतो मान्यो वदान्यो वलतासमेतः ॥४०॥ पितृरेखा के मत्ये के ऊपरले भाग में प्राप्त हुए नक्षत्र (नखत) के समान आररकार गले दो निशान यदि सोहते हों तो वह माणी चली व यशस्वी होकर माननीय होता आ दानी होता है॥ ४० ॥ अङ्गष्ठशाखोपरिंगं विभाति रेखाचतुष्कं यदि स्वस्परूपम् । श्लेष्मार्दितोऽसौ मनुजः कृशाङ्गी भामाभिभृतो भ्रमतासुपैति॥४१॥ अँगूठे की शाखा रेखा के ऊपरले भाग में प्राप्त हुआ छोटासा चार रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह परासी कफरोग से पीड़ित व दुर्बल देहवालां होकर ुगाइयों से अनादत होता हुआ भ्रमसमूहों को पाता है।। ४१॥ भोगाधरस्थं विशदं विभाति चिह्नं त्रिकोणं यदि दृश्यमानय्। कान्ताभिलाषी कलही मनुष्यः प्रामोति मृत्युं द्विषैतः करेण ॥ ४२ ॥ भोगरेखा के निचले भाग में टिका व देखा हुआ त्रिकोश का निशान साफ़ होकर दि सोहता हो तो वह माणी कामिनी की अभिलापा करता हुआ लड़ाई लड़नेवाला कर दुश्मन के हाथ से मौत को पाता है॥ ४२॥ पितु: सुरेखोरिंगं चकासस्त िंहं त्रिला नु मि यदा चेत तदा नरो वहिविदग्धगात्रो व्यासक्चित्तो व्ययतामुपैति॥४३॥ पितृरेखा के ऊपरले भाग में प्राप्त हुआ त्रिशूल के समान निशान यदि सोहता हो गनी चमकता हो तो वह पाणी आगी से जले हुए अ्गवाला होकर घचड़ाये मनवाला हता हुआ घने खर्च को पाता है यानी वढ़ा खर्चीला होता है॥ ४३॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ११ पेत्री समुत्था विशदा गभीरा रेखा यदा भ्रातृपदं प्रयाति। सोयं जनः शत्रुपराजितः स्यात्संकर्तिता चेदरिवृन्दमुक्ः॥४४॥ पितृरेखा से उठी रेखा साफ़ व गहरी होकर यदि भ्रातृस्थान पर्यन्त पहुँच जाबे वह प्राणी शत्रुओं से पराजित होता है और यदि पूर्वोक़ रेखा कटी हुई देखी जाबे वह पाथी वैरिसमूहों से छूट जाता है ॥ ४४॥ १२ चन्द्रालयस्थं विशदस्वरूपं तिर्यकत्रिरेखं यदि भाति चिह्नम्। सोयं जनः स्याजलयानयायी मायाविधायी ममतापहायी॥४५॥ चन्द्रमा के स्थान में टिका हुआ तिरीछा तीन रेखाओंवाला निशान साफ़ होकर या सोहता हो तो वह पागी माया का विधान करनेवाला होकर ममता को त्यागता हु जहाज़ की सवारी से गनन करता है यानी जलपथ में परिभ्रमण करता है।। ४५॥ १३ भाग्यासमुत्था विशदा सुरेखा वक्रा गभीरा मिलिता जनन्याम्। जङ्गास्थिभङ्गं लभते जनो वै जाज्वल्यमानो ज्वरजार्तियुक्कः॥ ४६ भाग्यरेखा से उठी हुई साफ़ शोभायमान रखा टेढी व गहरी होकर मातूरेखा मिल जावे यानी मिली हुई पतीत होवे तो वह माणी ज्वर से उपजी पीड़ा से संयुक्र है कर बहुत ही जलता हुआ जङ्गा की हड्डी के भङ को पाता है यानी उस माणी की जा की हड्डी टूट जाती है।। ४६॥ १४ समत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्भाग्या सुरेखा समुपैति शौरिम। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदा स्यादुष्टस्वभावो विगतप्रभावः॥।४७॥। मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई भाग्यरेखा यदि शनैश्चरपर्यन्त चली जावे तो ब माी दुष्टस्वभाववाला होता हुआ विशेपता से गतमभाववाला होकर चौरकर्म परायण रहता है यानी चोरी करता है।। ४७ ।। १५. समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्का सुरेखावरजं प्रयाति। तदा जनो बन्धुगणाभिभूतः प्रामोति दुःखं देयितासमेतः॥४८॥ मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठी हुई शोभायमान रेखा टेढी होकर यदि भ्रातृस्थान चलीजावे तो वह माणी बन्धुगणों से अनाहत होता हुआ यानी क्षति को पाता हु भार्यासमेत दुःख को पाता है॥ ४८ ॥ (देखो चित्र नं० ३७) १ अभोप्टेमीव्सितं हयं दाितं व्रल्ममं प्रियमित्यमरः ॥ अथ पश्चदशलक्षणङितकरतलफलमाह- १ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के वृत्तार्धचिह्नं विशदं विभाति। राज्याभियोगे नियतो नरः स्यादिवादशाली विषये रतश्र॥४६॥वकील कनिष्ठा अँगुली की पहली पोर में अरध्वृत्त का निशान साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह मागी झगड़ालू होकर विपयों में रत होता हुआ राज्य के मुकददमा फ़ैसल कराने में नियत रहता है यानी वैरिस्टर या वकील कहाता है।। ४६॥ २ सौम्यालये चेद्िशदस्वरूपं चिह्नं द्विरेखं सरलं चकास्ति। वाहौ विघातं लभते मनुष्यो विद्याविवेकी प्रथितः पृथिव्याम् ॥५०॥ बुधके स्थान में दो रेखाओं वाला निशान साफ़ व सीधा होकर यदि सोहता हो तो वह माखी विद्वान् व विवेकी होकर पृथ्वीमएडल में विख्यात होता हुआ भुजाओं में चोट चपेट को पाता है॥ ५० ॥ ३ अनामिका मध्यमिकासुमध्ये वक्रा कुरेखा समुपैति सूर्यम्। जङ्काभिघातं लभते जनो वै जञ्जप्यैमानो जनतासमेतः॥ ५१॥ अनामिका व मध्यमा के बीच में छोटी सी रेखा टेढ़ी होकर यदि सूर्य के स्थान को चली जावे तो वह माणी निन्दित को जपताहुआ जनसमूहों से सम्पन्न होकर जङ्गामें आघात (चोट) को पाता है ।। ५१॥ ४ मन्दालये चेद्धिशदं विभाति गुणाख्यचिह्नं युगलस्वरूपम्। संपत्तियक्को मनुजस्तदा स्यात्सौभाग्यशाली सुषमासमेतः॥५२ ॥ शनैश्रर के स्थान में दो गुखाकें XX निशान साफ़ होकर यदि सोहते हों तो वह पाणी सम्पदाओं से संयुक्त होता हुआ सौभाग्यशाली होकर बड़ी शोभावाला होताहै॥ ५२॥ ५. संभोगशाखा विशदा गभीरा संतर्जनीमूलगता विभाति। सोयं जनो मध्यमवित्तशाली संरक्मध्या यदि वित्तपाली॥ ५३॥ संभोगरेखा (हार्टलाइन) की शाखारेखा साफ़ व गहरी होकर भलीभांति तर्जनी अँगुली की मूल में पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह पाणी साधारण धनी होताहै और यदि पूर्वोक्क रेखा बीचमें लाल वर्णवाली होकर प्रतीत हो तो वह पाखी बड़ा धनवान् होकर धनकी रखवारी करताहुआ खा नहीं सक्ा है।। ५३। ६ वक्रा सुभोगा शनिगा विभाति क्षुद्राविभिन्ना यदि गर्तयुक्का। लाभं विना भ्राम्यति दूरदेशे दारिद्रययुक्ो मनुजो भयार्तः॥५४॥ १ गर्हितं जपति जञ्प्यते इति जअ्प्यमानः॥ १०= सामुद्रिकशास्त्रस्य सुभोगरेखा (अरमदेशीय शायुरेखा) टेही व शनै्र के स्थान में पहुँची व छोटी छे रेखाओं ले कटी हुई गड़हे से संयुक्र होकर यदि सोहती हो तो वह माणी दरिद्रिता सम्पन्न होकर भयसे घवड़ाताहुआ लाभके विनाही दूरदेश में घूमता है॥ ५४॥ ७ संभोगरेखाधरगं चकास्ति चन्द्राङ्नन्दाङ्गयुतं सुचिह्रम्। सोयं नरस्स्यान्नरघातकारी पापाधिकारी परवित्तहारी॥। ५ ५।। संभोगरेखा (हार्टलाइन) के निचले भागमें माप्तहुआ एकाड् व नवाङ्क से संयुत हो शोभायमान निशान यि चमकता हो तो वह माणी पार्पोका अधिकारी होकर पर का हरनेहारा होताहुआ मनुष्यों का बात करनेवाला होता है॥ ५५॥ = मातुस्सुरेखा यदि नीचभागे भग्नीसमेता कुटिला चकास्ति। गर्वी गुणज्ञो मनुजस्तदास्यादष्टशयश्रौर्यरतो नितान्तम्॥।५६॥ मातृरेखा निचले भागमें टेढी होकर यदि भग्नीरेखा समेत सोहती हो तो वह मा बुरमतलघवाला व हमेशा चोरी करने में लगाहुआ गुणों का ज्ञाता (जाननेवाला) हो घमएडी बना रहता है॥ ५६ ॥ ६ संभोगशाखा सरला गभीरा भग्नीसमेता गुरुगा विभाति। सोयं नरो धर्मपरो मनस्वी दानी सुमानी घनतासमेतः॥५७।। संभोगरेखा (हार्टलाइन) की शाखारेखा सीधी, गहरी व भग्नीरेखा से संयुत हो बृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह प्राणी धर्मपरायण, मनमौ दानी व बड़ामानी होकर धनसमूहों से संपन्न होता है॥ ५७॥ १० पितु: सुरेखोपरिंगं विशुद्धं चिह्नं द्विरेखं सरलं चकास्ति। तदा जनो वन्धुविरोधकारी व्यासक्चित्तः प्रमदाविहारी।। ५८॥। पितुरेखा के ऊपरले भाग में माप्तहुआ साफ़ व सीधा होकर दो रेखाओंवाला निर यदि सोहता हो तो वह प्राणी बन्धुर्गों से विरोधरखनेवाला होकर घवड़ाये मनत्रा होताहुआ पमढाओं में बिहार करनेवाला होता है।। ५८॥ ११ पैत्री सुचका मिलिता सुमात्र्यां स्वल्पा गभीरा विशदा विभाति। आायुष्यमल्पं लभते मनुष्यो भग्नीसमेता यदि दीर्घमायुः॥५६॥ पिताकी रेखा टेढ़ी, छोटी, गहरी व साफ़ होकर यदि मातृरेखा में मिली हुई सो हो तो वह भागी अल्पायु को पाताहै और यदि पूर्वोक् रेखा भग्नीरेखा समेत देखीज तो वह माखी दीर्घायु को पाता है यानी छानवे वर्षपर्यन्त जीता है॥ ५६॥ २ चन्द्रालयाच्चेचलिता सुरेखा वक्रा सशाखा यदि याति भाग्याम्। आरातिभीतः स्वजनैर्विहीनः क्रान्ता यदा चेन्मनुजो विजेता ॥ ६० ॥ चन्द्रमा के स्थान से चलीहुई शोभायमान रेखा टेढ़ी व शाखासभेत होकर यदि भाग्य खा (फेटलाइन) पर्थन्त चलीजावे तो वह पाणी बैरियों से डरताहुआ अपने वन्धुवर्गो रहित होताहै यानी उस प्राणी के कुटम्बीलोग शत्रु होजाते हैं और यदि पूर्वोक़ रेखा कसी रेखा से अतिक्रमख की जावे तो वह माखी वैरियों को विजय करता है ॥ ६० ॥ ३ भाग्या समुत्था मणिबन्धदेशान्मध्ये विभिन्ना शनिगा विभाति। माग्य वातार्तियुक्को मनुजस्तदानीं जङ्माभिघातं लभते ज्वरार्तः ॥ ६१ ॥ मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी भाग्यरेखा वीचमें कटी व शनैश्र पर्यन्त पहुँची हुई दि सोहती हो तो वह माणी ज्वररोग से पीड़ित होकर वातव्याधि से संयुक्त होताहुआ नांवों में चोट चपेट को पाता है॥ ६१। ३४ चन्द्राधरस्था कुटिला सुरेखा भाग्यां विभित्त्वा यदि याति काव्यम्। कौतूहलासक्रमना मनुष्यः कल्याणयुक: सुभगः मुशीलः ॥६२॥ चन्द्रमा के निचले भागमें टिकी व टेढी शोभायमान रेखा भाग्यरेखा (फेटलाइन) को काटकर शुक्रस्थान के पास पहुँचजावे तो वह प्राणी खेलमें आसक मनवाला व ल्याण से संयुक्त होताहुआ डे श्वर्यवाला होकर ड़ा शीलवान् कहाजाता है ॥६२। १५ पित्रोस्सुमध्ये विशदस्वरूपं शैलाङ्कतुल्यं यदि भाति चिह्नम्। दौर्जन्ययुक्ो मनुजो मलाको हुद्बन्धतो मृत्युमुखं प्रयाति ॥६३॥ मातृरेखा व पितृरेखा के विचलेभाग में साफ़ स्वरूपवाला होकर सातके आ्रंक कासा नशान यदि सोहता हो तो वह पराणी दुर्जनता से संयुक्त होकर मलसे भराहुआ फांसी मौतको पाता है यानी मौत के मुख में जाता है॥ ६३ ॥ (देखो चित्र नं० ३८) अथ पोडशलक्षणङितकरतलफलमाह- सौम्यालये चेद्िशदास्सुवक्राः सुद्रास्सुरेखा बहुशो विभान्ति। चौर्ये प्वृत्तो मनुजस्तदा स्याचञ्चत्पभावश्चपलस्वभावः ॥६४॥ बुधके स्थान में साफ़, टेढी व छोटी होकर बहुतसी रेखायें यदि सोहती हों तो वह पाणी पस प्रभाववाला होकर चपल स्वभाववाला होता हुआ चोरी करने में लगा रहता है।।६४।। चएडांत्मजस्थानगतं सुचिह्नं संमध्यभिन्नं वृजिनं दिरेखम्। सम्पत्समेतो मनुजो विलासी सौभाग्यशाली मणिरत्रमाली ॥ ६५॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य शनैक्षर के स्थान में पाप्त होकर टेढा व दो रेखाओंवाला निशान यदि बीच में रखा से कटा हुआ सा प्रतीत होवे तो वह प्राणी सम्पदाओं से सम्पन्न होताह विलासी व सौभाग्यशाली होकर मखिरनोंकी मालावाला होता है॥ ६५ ॥ ३ संभोगरेखा यदि चोर्ध्वभागे क्षुद्राविभिन्ना गुरुगा विभाति। मस्ताभिघातं लभते मनुष्यो मानी मनीषी ममतासमेतः ॥ ६६॥ संभोगरेखा (हार्टलाइन) ऊपरले भाग में छोटी छोटी रेखाओंसे भिन्न होकर वृह के स्थान में पहुँची हुई यि सोहती हो तो वह पाणी मानी व बुद्धिमान् होकर ममन संपत्र होता हुआ मस्तक में आघात को पाता है॥ ६६ ॥ ४ प्रदेशिनीमूलगतं सुचिह्नं ध्वजस्वरूपं विशदं विभाति। सोयं जनः सज्जनसङ्गकारी धर्मी धरित्र्यां धनताविधारी॥६७।। तर्जनी अ्रँगुलीकी मूलमें माप्त हुआ ध्वजा (झएडी) के समान रूपवाला शोभाय निशान साफ़ होकर यदि सोहता हो तो वह माणी सज्जनों का संग करनेवाला हं पृथ्वीमएडल में धर्मी होता हुआ धनसमूहों का धारनेवाला होता है॥ ६७ ॥ ५ मातुः सुरेखा यदि चोर्ध्वभागे संभिन्नशीर्षा गुरुगा विभाति। शोकाकलस्स्यान्मनुजो गदारतो गम्भीरभावो विगताभिमानः॥६: माताकी रेखा (ह्डलाइन) ऊपरले भाग में भलीभांति कटे शीशवाली होकर स्पति के स्थान में पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह माणी रोगों से पीड़ित हो गम्भीर आशयवाला व निरभिमानी होता हुआ शोक से व्याकुल होता है॥ ६८॥ ६ भोगा सुरेखा यदि शरृङ्धलाङ्गा गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। भार्याविहीनो मनुजस्तदानीं गत्वा विदेशं समुपैति मृत्युम्॥६६ भोगरेखा (हार्टलाइन) सांकलके समान अङ्गवाली व गहरी होकर बृहस्पकि स्थान में पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह माणी लुगाई से रहित होता हुआ परदेश जाकर मौतको पाता है॥ ६६ ॥। ७ संभोगमात्रोर्यदि मध्यदेशे गुणाख्यचिह्नं विपुलं विभाति। चिन्तातुरः स्यान्मनुजो मनस्वी पदाभिलाषी श्रमतासमेतः॥ ७० संभोगरेखा व मातरेखा के बिचले भाग में बड़ाभारी गुणकासा निशान यदि सो हो तो वह पाणी चिन्ताओं से आतुर व मनमौजी होकर पदकी अभिलापा करता बड़ा परिश्रमी होता है॥। ७० ॥ मातुःसुरेखा यदि नीचभागे भिन्ना सुभोगाभिमुखं प्रयाति। आयुष्यमल्पं लभते मनुष्यो ह्याचारहीनो व्यभिचारशीलः॥ ७१॥ माताकी रेखा यदि निचले भाग में कटी हुई सुभोगरेखा के सामने चली जावे तो वद णी अनाचारी होता हुआ व्यभिचारी होकर अल्पायु को पाता है। ७१॥ भाग्यासुपित्रोर्यदि मध्यदेशे भिन्ना सुरेखा कुटिला विभाति। विश्वासघाती मनुजो विवादी दुष्टस्वभावो नृपदएडमेति॥ ७२॥ भाग्यरेखा व पितृरेखा के विचले भाग में कटी हुई रेखा टेदी होकर यि सोहती हो वह पाी विश्वासघाती व विवादी होकर वुरे स्वभाववाला होता हुआ राजदएड पाता है।। ७२॥। • मातुस्सुरेखाधरगं विभाति मध्ये विभिन्नं कुटिलं दिरेखम्। सोयं महोच्चात्पतितो मनुष्यो मानी महौजा मदनातुरश्र ॥७३ ॥ मातृरेखा के निचले भाग में प्राप्त व बीच में कटाहुआ दो रेखाओंवाला निशान टेढा कर यदि सोहता हो तो वह माणणी मानी व महावली होकर कामातुर होता हुआ बड़े चि स्थान से लुदकपड़ता है यानी गिरकर बड़ी चोट को पाता है॥ ७३॥ १ पैत्री सुवक्रा मणिबन्धहीना वृत्तार्धमध्या गुरुगा विभाति। सोयं जनो विन्दति नेत्रघातं नारीविहीनो नयतासमेतः।।७४॥ पिताकी रेखा टेड़ी व मशिबन्ध (करब्जे) से छुटी तथा मध्य में अर्धवृत्त से संयुक् कर वृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह पाणी स्त्री से विह्ीन कर नीतिसमूहों से संपन्न होता हुआ नेत्रों में चोटको पाता है॥ ७४॥ बृद्धाङ्गलेवैं निकटे नखस्य वेदाङ्कतुल्यं यदि भाति चिह्नम्। चौर्ये रतः स्यान्मनुजः कुसङ्ी धर्मादिभङ्गी भयदो जनानाम्॥ ७५॥ अँगूठे के नह (नाखून) के निकट चारके आंक कासा निशान यदि सोहता हो तो माणणी बुरे लोगों का साथी वन धर्मादिकों को भङ्ग करता हुआ जनोंको भयदायक कर चोरी करने में परायण रहता है।। ७५ ॥ ३ वृद्धाङ्गलेवैं द्वितये परुष्के वक्रकं द्विरेखं विरलं विभाति। विज्ञानहीनो मनुजो बलिष्ठो बालादिलीनो मृतिमेति पाशात्॥७६॥ अगूठे की दूसरी पोर में टेढ़ा होकर दो रेखाओंवाला निशान विरल होता हुआ यदि हता हो तो वह प्राणी विज्ञान से विह्वीन व बलवान् होकर वालादिकों में लीन होता भा फांसी से मौत को पाता है।। ७६॥। १४ भाग्याचलन्ती मणिवन्धदेशात्सञ्छिन्नमस्ता समुपैति सूर्यम्। सौख्यान्वितोऽसौ सुभगो मनुष्यो व्यापारशाली वसुधासुपाली॥७ मणिबन्ध (कब्जे) से चली हुई भाग्यरेखा (फेटलाइन) खुद्ररेखाओं से कटे शु पाली होकर सूर्यके पास पहुँच जाबे तो वह माणी सुखता से संपन्न व बड़ा भाग्य होता हुआ व्यापारी (रोजगारी) होकर पृथ्वी का पालक होता है।। ७७॥ १५ वक्रा सुवप्राधरतश्चलन्ती क्षुद्रासमेता यदि याति मात्रीम्। संभ्रान्तमस्तो मनुजो भयारतो हुविग्नचित्तो विफलं विवेति॥७= पितृरेखा के निचले भागसे चलीहुई छोटीरेखाओं समेत रेखा टेढ़ी होकर मातृरेखा समीप पहुँच जावे तो वह गाणी डरा हुआ भलीभांति घूमे शीशबाला व ऊपेदिलना होकर सबकामों में विफलता को पाता है॥। ७८ ॥ १६ चन्द्रालयस्थं सरलं ध्वजाङ्कं तिर्यग्विभिननं ग्रथितं मिथश्रेत्। दुष्टस्वभावोऽघमतासमेतो ह्यामोति मृत्युं जनतापकारी॥ ७६।। चन्द्रमा के स्थान में टिका व सीधा होकर ध्वजा (झएडी) कासा निशान तिरीछा कटा व परस्पर गुथाहुआ प्रतीत होवे तो वह माणी दुष्टस्बभावचाला व नीचपना सम्पत्र होताहुआ जनसमूहों का अपकारी होकर मौतको पाता है।७६॥ (देखोचित्र नं०म १ भोगासमुत्था सरला गभीरा रेखा यदैका यदि याति चान्द्रिम्। ज्ञानी गुणी स्यादुपदेशदाता मानी महौजा: परवृत्तगोपा ॥८०॥ भोगरेखा ( हार्टलाइन) से उठीहुई सीधी व गहरी होकर एकरेखा यदि वुधपरन चलीजावे तो वह माखी ज्ञानी, गुणी व उपदेशदाता होकर मानी व बलवान् होताहु परकथा का प्रकाशक नहीं होता है यानी सवों के चरितों को छिपाये रहता है॥ ८॥ २ संभोगरेखोपरिगा गभीरा वक्रा सुरेखा समुपैति सूर्यय्। सोयंजनो विज्ञतमो गुणज्ञो नामी सुधामी धनतामुपैति॥८१॥ संभोगरेखा (आयुरेखा) के ऊपरले भागमें पहुँचीहुई गहरीव टेदी होकर शोभाय रखा यदि सर्य के समीप चलीजावे तो वह प्राणी महाज्ञाता व गुखज्ञाता होकर ना व सुधामी होताहुआ धनसमूहों को पाता है ।। =१ ॥। ३ पैत्रीसमुत्था विशदा सुरेखा स्वल्पा गभीरा यदि याति मन्दम्। साँव्वत्सरो ना खलु पारदर्शी दैवज्ञंवर्यो यदि दीर्घगा चेत्॥ ८२ । पिताकी रेखासे उठी हुई साफ़, छोटी व गहरी होकर शोभायमान रेखा यदि शनैश्वर- र्यन्त चलीजावे तो वह माणी ज्योतिर्वेत्ता होकर निश्चय कर पारदर्शी होताहै और यि र्वोक्क रखा भारी देखीजावे तो वह माणी दैवज्ञों में प्रधान कहाता है॥। ८२ ॥ 8 पैत्रीसमुत्थं विशदं गभीरं केतुस्वरूपं गुरुंगं विभाति। पैमीसमुत्या शास्ता जनानां मनुजस्तदा स्याद्दाता दयालुर्दयितासमेतः ॥८३॥ पैत्रीरेखा से उठा साफ़ व गहरा होकर ध्वजा (झएडी) के समान निशान बृहस्पति के स्थान में पहुँचाहुआ यदि सोहता हो तो वह प्ाणी माणप्यारी समेत दयालु व दाता होकर सर्वजनों का शासन करनेव्राला होता है ॥ ८३ ॥

  1. देवेन्द्रवन्द्यालयगं विभाति चिह्न त्रिकोणं विशदस्वरूपम्। V सोयं जनः सर्वजनप्रधानः प्रख्यातैकीर्ति लभते नितान्तम् ॥८४॥ वृहस्पति के स्थान में पहुँचाहुआ त्रिकोण का निशान यदि साफ़ होकर सोहता हो ो वह प्राणी सर्वजनों में प्रधान होताहुआ हमेशा विख्यात कीर्तिको पाताहै यानी किसी रियासत का एजएट होता है ॥ ८४ ॥ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे वक्रा द्विशाखा खल मध्यमान्ता। विंशाव्दमायुर्लभते मनुष्यः शाखात्रयं घेत्खगुणन्दमायुः ॥८५॥ भोगरेखा (हार्टलाइन) निचले भागमें दो शाखाओंवाली होकर यदि टेढी होतीहुई ध्यमातक चलीजावे तो वह पाणी बीस वर्ष की आयुको पाता है और यदि पूर्वोक़रेखा में ीन शाखायें प्रतीत होवें तो तीस वर्षकी आयुको पाता है॥ ८५ ।। 9 मातुः सुरेखा यदि नीचभागे शूलाख्यचिह्नेन युता यदा स्यात्। मात रेल सोयं विनीतो मनुजो महात्मा यज्ञादिधर्माङ्गयुतो जनानाम् ॥८६॥ माताकी रेखा निचलेभागमें त्रिशूल के समान निशान से संयुक्त होकर यदि प्रतीत वे तो वह माणी शिक्षित व मनुष्यों में महात्मा होकर यज्ञादिधर्मसम्बन्धी अर्पङ्रों से युत होता है॥ =६ ।। मात्ट रखा मात्री सुरेखा मिलिता सुपैत्र्यां संमध्यभिन्ना शशिगा विभाति। व्याजी विवादी मनुजो विलासी सम्पत्तिराशी च महाप्रकाशी॥८७।। पिताकी रेखा में मिली व बीचमें कटी फटी हुई माता की रेखा यदि चन्द्रमा के स्थान पहुँचकर सोहती हो तो वह माणी छली, वहसी व विलासी होकर संपदाओं की शिवाला होताहुआ महापकाशी होता है॥। ८७ ॥। १ धिषएं प्रयाति २ राज्याधिकारमिति पाठान्तरम् ।। सामुद्विकशास्त्रस्य पैत्रीसमुत्था मिलिता सुमात्र्यां रेखा सकोणा कृशगा विभाति। विश्वासशाली मनुजो विशोकी वेदान्तभाषी विदुषां वरेरयः ॥ ८ पिताकी रेखा से उठी व माताकी रेखा में मिलीहुई रेखा त्रिकोण समेत होकर सी सोहती हो तो वह पाणी विश्वासी व विशोकी होकर वेदान्तवेत्ता होताहुआि में पधान कहाता है॥। ८= ॥। १० मातुस्सुरेखोपरिगा सुभोगा संभुग्नमध्या समुपैति शौरिम। अल्पायुप तं पुरुष करोति सौभाग्यवन्तं बहुभोगवन्तम्॥=६ ॥ मातृरेखा के ऊपर ले भागमें प्राप्तहुई भोगरेखा (हार्टलाइन) बीचमें टेड़ी शनैश्चरपर्यन्त पहुँचजावे तो उस पाणी को सौभाग्यवान् व महाभोगवान् बनाकर अ करदेती है॥। ८६ ॥ ११ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशात्साप्यं द्विरेखं जननीमुपैति। दौर्भाग्ययुक्को मनुजो दुराशो दीनो दरिद्रो दुरितान्युपैति॥६०॥ मरिणबन्ध (कब्ज़े) से उठा हुआ सर्प के समान दो रेखाओंवाला निशान यदि रखा के पास पहुँचजावे तो वह पाणी बुरी आशावाला, दीन व दरिद्री होकर दौभीग संयुत होता हुआ पापों को पाता है॥ ६० ॥ १२ वक्रा सुपैत्री मिलिता जनन्यां संमध्यभिन्ना भगिनीसमेता। सोयं जनो विन्दति देहघातं कराडूसमेतो ज्वरजार्तियुकः॥ ६१॥ माताकी रेखा में मिली पिताकी रेखा टेढ़ी होकर बीच में कटीहुई भगिनीसमेत देखी तो वह माणी खजुली से संपन्न होकर ज्वर से उपजी पीड़ा से संयुक्र होता हुआ दे चोट चपेट को पाता है।। ६ै१ ॥ १३ रे। समुत्था मणिबन्धदेशाद्का गभीरा पितरं प्रयाति। संतीक्ष्ण बुद्धिर्मनुजः मुकर्मा सौभाग्यशाली सुखतामुपैति॥६२॥ मिबन्ध (कब्ज़े) से उटी हुई रखा टेढ़ी व गहरी होकर पितृरेखा के पास पहई जावे तो वह पाणी भलीभांति तीव्र बुद्धिवाला व शोभन कर्मोवाला होकर सौभा शाली होता हुआ सुखसमूहों को पाता है।। ६२॥ १४ अङ्गष्ठमूले विशदं सुवकं रेखाचतुष्कं यदि याति काव्यम्। सोयं मनुष्यः प्रथमे वयस्के प्रापोति सौख्यं शुभतासमेतः ॥ ६३ ॥ १ सर्पसमानाकारम्॥। अँगूठे की मूलमें चार रेखाओंवाला निशान साफ़ व टेढा होकर यदि शुक्रके पास चलाजावे तो वह माणी शुभसमूहों से संपन्न होकर पहली उमर में सौख्यको पाता है ।६३।। (देखो चित्र नं० ४० ) १ सुतर्जनीपर्वयुगे विभाति तिर्यग्विभिन्नं सरलैकरेखम्। सोयं जनः स्याद्बुधवर्गबन्धुः प्रधानलोकानुगतः सहिष्युः ॥ ६४ ॥ तर्जनी अँगुली की पहिली व दूसरी पर्व में तिरीछी रेखासे कटाहुआ सीधी एक रेखा बाला निशान यानी धनका चिह्नसा प्रतीत हो तो वह पाणी परिडतसमूहों का बान्धव होकर प्रधानलोगों का अपरनुगामी होता हुआ क्षमाशील होता है॥। ६४॥ २ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के संकर्तिता वै यति सन्ति रेखाः। तावत्पमाणा मनुजस्य नूनं नश्यन्ति गर्भा गदपीडिता वा ॥ ६५ ॥ कनिष्ठा अँगुली की पहिली पोर में जितनी रेखायें कटीहुई प्रतीत हों तो उस माणी के उतनेही गर्भ निश्चय कर नष्ट होजाते हैं याकि रोगसे पीड़ित होते हैं ॥ ६५ ॥ ३ सौम्यालये चेत्सरलं त्रिरेखं तिर्यग्विभिन्नं श्रतिसंमिताभिः। नार्या पिशाच्या परिवश्चितो ना दारिद्र्यदुःखाभिभवं प्रयाति॥६६ ॥ बुधके स्थान में चार रेखाओंसे तिरीछा कटाहुआ तीन रेखाओंवाला सीधा निशान यदि प्रतीत हो तो वह पराणी पिशाचरूपिणी नारी से छला हुआ दारिद्रय व दुःख के तिरस्कार को पाता है।। ६६ ।। ४ सरालये चेद्िशदं विशालं विभाति चिह्नं सरलं द्विरेखम्। दाराभिभूतो मनुजो मदान्धो ज्ञानेन मानेन धनेन हीनः ॥ ६७॥ सूर्य के घर में साफ़ सीधा विशाल दो रेखाओंवाला निशान यदि प्रतीत होता हो े वह पाणी भार्या से अनादत होताहुआ मदान्ध होकर ज्ञान, मान व धन से हीन होजाता है॥। ६७ । भाग्या सुरेखा समुपैति सौरिं सञ्छिन्नमस्ता सरला गभीरा। कष्ार्दिताङ्गो मनुजस्तदानीं कारालयं याति करालरूपः ॥६८ ॥ भाग्यरेखा (फेटलाइन) गहरी व सीधी होकर कटे शीशवाली होती हुई यदि शन- वर के समीप पहुँचजावे तो वह प्राणी कष्टों से पीड़ित अङ्गोंवाला होताहुआ कराल रूप- पारी होकर कारालय (जेलखाने) को जाता है।। ६= ।। ६भोगा सुरेखा जननीमुपैति कौटिल्यमस्ता यदि मध्यभिन्ना। सामुद्रिकशास्त्रस्य सोयं जन: स्याद्यभिचारशाली नार्या यदा चेत्कुलटा तदा सा॥६६ भोगरेखा बीच में कटीहुई टेढ़े शीशवाली होकर मातृरेखा के पास पहुँच जावे वह प्राणी व्यभिच.रशाली होताहै और यदि पूर्वोक रेखा रमखी के करतल में प्र हो तो वह कुलटा होजाती है ।। ६६ ॥। ७ भोगा सुरेखा यदि नीचदेशे क्षुद्राविभिन्ना कृतचुल्लिरूपा। तदा सुतानां प्रसवे जनस्य प्रभूतपीडा स तु भोगशाली॥ १००॥ यदि भोगरेखा निचले भागमें श्षुद्ररेखाओं से कटीहुई चूल्हों कासा रूप वनालेवे उस माणी के सन्तानों के प्रसवकाल में अधिक वेदना होती है और वह भोगशा कहाता है॥ १०० ॥ = क्षुद्रा गभीरा जननीमुरेखा संभिद्य भोगां यदि याति मन्दम्। स यौवने मृत्युमुखं प्रयाति स्पर्शेन हीना खलु पानसकः॥१॥ छोटी व गहरी होकर मातृरेखा यदि भोगरेखा को काटकर शनैश्र के पास चली तो वह पाणी युवावस्था में ही मौत को पाता है और यदि पूर्वोक रेखा भोगरेखा स्पर्श न करे तो वह प्राणणी मद्यपायी होजाता है॥ १ ॥ ६पित्रा वियुक्ा यदि मातृरेखा तदन्तरे कुद्रतरा विभान्ति। विश्वासहीनो मनुजो महौजा वेश्यारतः स्याद्विषयाभिभूतः॥ २॥ यदि पैत्रीरेखा से जुदी मातृरेखा प्रतीत हो और उन दोनों के बीच छोटी छोटी बहुत रेखायें सोहती हों तो वह प्राणी महाबलवान् व विश्वासहीन होताहुआ वेश्याओं में होकर विपयों से अनादत होता है॥ २॥ १० काव्यालयाच्चेच्चलिता सुरेखा संभिद्य पैत्रीमभियाति भाग्याम्। कापट्यसक्ो मनुजो हि लम्पटो दौर्भाग्ययुको दयया विहीनः॥३ शुक्रके घरसे चलीहुई एक रेखा यदि पैत्रीरेखा को काटकर भाग्यरेखा के सम पहुँच जावे तो वह प्राणी छलबन्दी व लम्पट होकर दौर्भाग्य से युक्त होता हुआ दर विहीन होता है॥ ३ ।। ११ पैत्री सुरेखा यदि मध्यदेशे क्षुद्राविभिन्ना कुटिला विभाति। चिन्ताभिभूतो मनुजस्तदा स्यादौदास्ययुंक्को दयितासमेतः ॥४॥ पैत्री रेखा यदि विचले भागमें छोटी छोटी रेखाओं से कटीहुई टेढ़ी होकर सोहती हो तो मागी नारीसमे चिन्तासे व्याकुल होताहुआ उदासीनतासे युक् बना रहता है॥ ४॥ १२ वृद्धाङ्गलेरूर्ध्वगतं सुचिह्नं तिर्यि्द्िरेखं सरलं दिरेखम्। चौ्यें प्रवृत्तो मनुजो मनस्वी विश्वासहीनो वनिताविहीनः ॥ ५ ॥ अँगूठा के ऊपरले भागमें यानी नहके पास तिरीछी दो रेखाओंवाला व सीधी दो रेखाओंवाला निशान यदि प्रतीत हो तो वह माी चोरकर्मकारी व मनमौजी होकर विश्वास रहित होताहुआ वनिता से विहीन होजाता है॥ ५॥ १३ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्क्षद्राविभिन्ना यदि याति चान्द्रिम्। स्यान्मन्दभाग्यो मनुजो जनानां मत्या विहीनो मदनातुरश्च ॥ ६॥ मशिबन्ध (क्रब्जे) से उठी व छोटी छोटी रखाओं से कटी हुई रेखा यदि वुधालय के पास चलीजावे तो वह प्राणी मनुष्यों के बीच मन्दभागी होता हुआ निर्वुद्धि होकर कामातुर होजाता है॥ ६ ॥ १४ पित्रा वियुक्ा यदि चोर्ध्वरेखा तदन्तरे वाणसमा विभाति। माग्यरेखा सोयं जनः स्याद््यवसायशाली विश्वासहीनो बलतासमेतः॥७॥ यदि पैत्रीरखा से जुदी ऊर्ध्वरेखा (भाग्यरेखा) प्रतीत हो और उन दोनों के बीचमें वाणणकारसी एक रेखा सोहती हो तो वह माणी रोज़गारी होकर अविश्वासी होता हुआ बलसमूहों से संपन्न बना रहता है।।७॥ १५पैत्री सुरेखा यदि नीचदेशे शाखाप्रशाखासहिता विभाति। बुद्धया विहीनो मनुजो गदार्तो मस्तिष्कपीडां लभते नितान्तम्॥८॥ पैत्रीरेखा यदि निचले भाग में शाखा पशाखाओं समेत सोहती हो तो वह पागी नि- वुद्धि होकर रोगों से पीड़ित होता हुआ गादी माथेकी पीड़ाको पाता है ॥। ८ ॥ १६अङ्गुश्ठमूले विशदं विशालं चिह्नं त्रिकोणादियुतं यदा स्यात्। प्रवञ्चको ना जगतो जनानां मायारतो मानववृन्दवन्द्यः ॥ ६॥ अँगूठेकी मूल में साफ़ व विशाल निशान यदि त्रिकोण आदिकों से संयुक् होता हुआ पतीत हो तो वह प्राणी जगत् के जनों का छलनेहारा होकर माया में रत होता हुआ मानवसमूहों से वन्दनीय होता है॥। ६ ॥। (देखो चित्र नं० ४१) १ सौम्यालये चेदयुगपङ्क्िसंस्थाः श्ुद्राः सुरेखाः सरला विभान्ति। सोयं जनः स्याज्जनघातकारी हत्यासमूहैः सहितो ऽपकारी ॥ १०॥ १ "मदनो मन्मथो मार:" ((त्यमरवाक्यम्)। ११= सामुद्रिकशास्त्रस्य दो पांतियों में टिकी, छोटी व सीधी बहुतसी रेखायें यदि बुधालय में सोहती ह वह प्राणी पाखियों का घातुक होकर हत्यासमूहों से संयुत होता हुआ अपकार (चुर का करनेवाला होता है ॥ १०॥ २ ब्भ्ालये चेद्विशदं विशालं चिह्नं त्रिरेखं सरलं विभाति। संस्थापकोयन्तु विना परीक्षां मतस्य नारीकृतहानिमेति ॥११॥ सूर्यके स्थान में साफ़ सुथरा सीधा व तीन रेखातवाला निशान विशाल होकर सोहता हो तो वह भाणी बिना परीक्षा मतका चलानेवाला होकर रमणीगलों से हुई हानि को पाता है।। ११ ।। ३ भोगाद्यशाखा यदि याति मन्दं तथा द्वितीया धिषएं प्रयाति। मातापितृभ्यां घृणितोSरिभीतो दीर्घा न चेन्नारिकृता विपत्तिः ॥१ सौभाग्यरेखा (फेटलाइन) की पहिली शाखा शनैश्र के स्थान में व दूसरी श बृहस्पति के घरमें पहुँच जावे तो वह प्राणणी माता पिता से घृखित होकर बैरियों से डरन और यदि पूर्वोक़रेखा फैली हुई न हो तो वह नारी से की विपदा को भोगता है॥१ ४ सौम्यालयान्ते विशदस्वरूपं चिह्नं त्रिकोएं यदि भाति भिन्नम। सोयं श्रमासक्मना मनुष्यो नारी तदीया मृतिमेति सूतौ॥ १३॥ वुधालय के समीप साफ़ सुथरा त्रिकोण का निशान भिन्न होकर यदि प्रतीत हो वह पाणी बड़ा परिश्रमी होता है और उसकी भार्या सन्तान उपजाने के समय मौँ पाती है।। १३ ।। पैत्रीसमुत्था जननीं विभित्त्वा भोगां च रेखा समुपैति सूरम। भूपालवन्द्यो मनुजो महात्मा मायारतः स्यान्ममतासमेतः॥१४॥ पैत्रीरेखा से उठी हुई रेखा मातरेखाऔर भोगरेखा को काटकर सूर्य के पास चली तो वह पराणी राजाओं से वन्दनीय व महात्मा होकर माया में रमता हुआ ममता से से रहता है॥ १४ ।। ६ चिह्नं सकोएं सरलं द्विरेखं तिर्यक्त्रिरेखं गुरुगं विभाति। आचारहीनो मनुजस्तदानीं वित्तस्य हानि लभते नितान्तम्॥ १५ कोणसमेत सीधा दोरेखाओंवाला व तिरीछी तीन रेखाओवाला निशान यदि बृहस के स्थान में सोहता हो तो वह प्राणी आचार से हीन होताहुआ धनकी बड़ीमारी ह को पाता है। १५॥ १ निकृत: इत्यपपाठः २ सोमस्यापत्यम् ३ मरराम्॥ भोगा सुरेखा यदि नीचभागे भग्नस्वरूपा विशदा विभाति। विश्वासहीनो मनुजो महौजा मत्या विहीनो मदनातुरः स्यात् ॥१६॥ सौभाग्यरेखा यदि निचले भागमें भग्न होकर साफ़ सोहती हो तो वह माखी महा- लवान् व विश्वास हीन होकर निर्बुद्धि होता हुआ कामी होता है ॥। १६ । 5 भोगा सुरेखा भगिनीसमेता कुविन्दुमध्या शनिगा विभाति। सन्तानहीनो मनुजस्तदा स्याददौरबल्ययुको देयितो दयालुः ॥१७॥ भोगरेखा भगिन समेत होती हुई बीचमें छोटे विन्दुओंवाली होकर शनैश्वर के पास पहुँचकर प्रतीत हो तो वह माणी अपुत्री व दुर्बल होकर सबोंका प्यारा होता हुआ दयावान् होता है ॥ १७ ।। पैत्रीमुखे चेद्विशदं विशालं जालस्वरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं जनः सज्जननिन्दकः स्यादाचारहीनो व्यभिचारशाली ॥१८॥ पैत्रीरेखाके मुखके समीप साफ़ व विशाल

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 7)

जालरूपसा चिह्न यदि प्रतीत हो तो वह पाणी सज्जनों का निन्दक होकर आचार से विहीन होता हुआ व्यभिचारी होता है॥ १८॥ १० मात्री विभिन्ना यदि नीचभागे क्षुद्राः समीपे कुटिला विभान्ति। माल रेखा नापोति सौख्यं पुरुषः कदापि संक्षीणबुद्धिः सरलस्वभावः ॥ १६॥। मातृरेखा यदि निचले भागमें कटी हो और पासही छोटी छोटी तिरीछी बहुतसी रेखायें सोहती हों तो वह प्राणणी कभी सौख्य को नहीं पाता है और क्षीणवुद्धि होकर सीधे स्वभाववाला वना रहता है॥ १६।। ११ वप्रस्य रेखा यदि कराठदेशे शाखात्रयेणापि युता यदा स्यात्। सोयं मतालम्बनतो हि पीडां प्रामोति जन्तुर्जनताविहीनः॥ २०॥ पितृरेखा यदि कएठदेश में तीन शाखाओं से संयुत होकर प्रतीत होवे तो वह पाणी ननसमूहों से विहीन होता हुआ मतके आलम्बन से पीड़ाको पाता है॥ २०॥ १२ चन्द्रालये भाति मिथो विभिन्नं गुणस्वरूपं यदि चिह्नयुग्मम्। सोयं जनः कृत्रिमबन्धुयुको भुग्नं न चेत्स्यादुपकारहीनः ॥ २१॥ चन्द्रमा के स्थान में परस्पर कटे, गुणा केसे रूपवाले दो निशान यदि परतीत हों तो दद पाखी बनाये भाइयों से संयुक होता है अथवा पूर्वोक निशान क्रमसे गमन करें तो वह ाखी अनेक भाइयोंवाला कहाता है और यदि दोनों निशान टेढे न हों तो वह पुरुष उप- कार से हीन रहता है यानी किसीकी भलाई नहीं करता है ।। २१॥ '११ दयितं बल्भं प्रिंयम् (इत्यमरः ) २ घग्रः पितरि केदारे चेति कोषः ॥ सामुद्विकशास्त्रस्य १३ पैत्रीसमुत्था भगिनीसमेता रेखा गभीरा यदि याति चान्द्रिम। सोयं नरः स्याचपलस्वभावो भग्ना यदा चेत्फलमन्यथा स्यात्॥२ पैत्रीरेखा से उठीहुई रेखा भगिनीसहित हाकर यदि गहरी होतीहुई बुध के चलीजावे तो वह माणी चपलस्व्रभांववाला होता है और यदि पूर्वोक रेखा क प्रतीत होवे तो फल अन्यथा होजाता है।। २२,॥ १४ मात्रा वियुक्का कुटिला सुपैत्री ह्यधो दविशाखा मणिबन्धमेति। स मन्दभाग्य: पुरुषस्तदानीं दारिद्र्यदुःखाभिभवं प्रयाति॥२३। मातृरेखा से जुदी व टेढ़ी पैत्रीरेखा निचले भागमें दो शाखाओंवाली होती हुई बन्ध (क्रब्ज़े) के पास पहुँचजावे तो वह पाणी मन्दभागी होता हुआ दारिद्रय से दुःख के अनादर को पाता है । २३॥ १५ सञ्छिन्नमस्तं मणिबन्धगं चेिह्नं दविरेखं समुपैति मात्रीम्। मिथ्याभ्रमेणापि युतो मनुष्यो दारिद्र्ययुक्को विगताभिमानः॥ २६ कटेशीशवाला व मशिबन्धगामी दो रेखाओवाला निशान यदि मातृरेखा के पहुँचजावे तो वह माणी मिथ्याभ्रम से युक् होताहुआ दरिद्री होक़र घमएड से होजाता है ॥ २४ ॥ ( देखो चित्र नं० ४२) १ कनिष्ठिकानामिकपर्वयुग्मे रेखाद्यं चेत्सरलं विभाति। सोयं जनो विन्दति बाहुघातं भ्रात्रा विहीनो भ्रमतासमेतः॥ २५॥ कनिष्ठिका और अनामिका अँगुली की पहली व दूसरी पोर में सीधा दो रेखाओंवा निशान यदि प्रतीत होता हो तो वह पराणी भुजाओं में चोट चपेट को पाताहै और समूहों से संपन्न होताहुआ भाइयों से विहीन रहताहै॥ २५ ॥ २ सुतर्जनीपर्वयुगे द्विरेखं मध्यापरुष्के यदि द्वित्रिरेखम् । शोफार्दितोयं मनुजस्तदा स्याज्ज्वरादिरोगैः परिपीडिताङ्गः ॥ २६। तर्जनी अँगुली की पहली व दूसरी पोर में सीधा दो रेखाओंवाला और म अँगुली की पोरों में दो तीन रेखाओंवाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी ज्वर तथरोगों से व्याकुल अङ्ञवाला होकर शोथरोग से पीड़ित होता है॥ २६॥ ग३ सौम्यालयान्तेऽसरलैकरेखं तिर्यग्विभिन्नं यदि भाति चिह्नम्। ज्ञानी सुमानी पुरुपस्तदानीं स्याद्दौत्यकारी दयितापहारी।।२७॥ वुधालय में असरल एकरेखावाला तिरीछा कटाहुआ निशान यदि सोहता हो तो वह गखी ज्ञानी व सुमानी होकर दूतकर्म को करता हुआ किसी विजातीय प्राी की प्यारी हरनेवाला होता है। २७। समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशात्सर्पानना वै समुपैति मध्याम्। धूर्तस्वभावो मनुजो धनाव्यः धन्यो धरित्रयां धरयासमेतः ॥ २८॥ L मशिवन्धदेश से उठीहुई रेखा सर्प के समान मुँहवाली होकर यदि मध्यमा अँगुलीकी हली पोर में पहुँचजावे तो वह प्राणणी धूर्तस्वभाववाला व धनी होकर धरासमेत होता आ पृथ्वीमएडल में धन्य गिनाजाता है॥। २८ ॥ भोगाद्यशाखा समुपैति सौरि तथा द्विशाखे जननीमुपेतः। सोयं मनुष्यः शुभकर्मकारी दानी सुमानी तु महोपकारी॥ २६ ॥ भोगरेखा की पहली शाखा शनैयर के पास चलीजावे तथा दो शाखायें मातृरेखा के मरामने सामने होषें तो वह माणी शुभदायक कर्मो का करनेहारा होताहुआ दानी व मानी होकर वड़ाभारी उपकारी होता है ॥ २६ ॥ लूतामुजालं विशदं विशालं चिह्नं यदा चेद्गरुगं विभाति। सोयं जनो मजति वारिवाहे वाल्ये वयस्के बलतासमेतः॥३०॥ बृहस्पति के स्थान में माप्तहुआ साफ़ सुथरा मकड़ी जाल के समान विशाल होकर निशान यदि प्रतीत होता हो तो वह भाणी वाल्यावस्था में ही वलसमूहों से संपन्न होता आ जल में डूबजाता है॥ ३०॥ 9 चन्द्रालयान्ते परिभाति चिह्नं भिन्नत्रिकोएं यदि वाहुभिन्नम। सोयं नरःस्यान्निगमार्गेमज्ञः सत्यप्रवक्का सरलस्वभावः॥३१॥ चन्द्रालय के समीप मिन्न त्रिकोणवाला निशान यदि भिन्नवाहुवाला होताहुआ सोहता ोतो वह माणी वेद व शास्त्रों का ज्ञाता होकर सत्यवक्ता होताहुआ सरलस्व्रभाववाला ददाजाता है॥ ३१ ॥ वृद्धाङ्गलेवैं द्वितये परुष्के वेदाङ्कतुल्यं यदि भाति व्यस्तम्। सोयं जनःस्याद्व्यभिचारशाली ह्याचारहीनः कुविचारपाली॥ ३२ ॥ अँगूठे की दूसरी पोरमें चार ४ अङ्क के समान निशान यदि उलटा होकर सोहता हो तो ह प्राणणी व्यभिचारशाली होकर आचार से हीन रहताहुआ निन्दित विचारों का पालने- गाला होता है॥ ३२ ॥ १ शनैश्रम् २ मर्कदक: ३ वेद: ४ शास्त्राणि॥

सामुद्रिकशास्त्रस्य ६ मात्रीस्वशीर्षे मिलिता सुपैत्र्या तदन्तरे चापसमा विभाति। दुःखार्दितोयं पुरुषस्तदानीं मृत्युं स्वतो वाञ्छति सर्वदैव॥३३॥ मातुरेखा अपने शिरोभाग में पैत्रीरेखा से मिलाप करती हो और उन दोनों रेखा के बीच में धन्वाकारसी एक और रेखा यदि प्रतीत हो तो वह मारणी दुःखों से घबड़ हुआ आपही से हमेशा माँतको चाहता है।। ३३॥ १० भोगासमीपेहि मिथो विभिन्नं गुणानुरूपं यदि लक्ष्मयुग्मम्। दारिद्र्ययुक्को मनुजो विबन्धुश्रिह्नपमाणैरपि बन्धुता वा ॥३४ ॥ सौभाग्यरेखा के पासही परस्पर कटेहुए गुणा के आकार वाले दो निशान य प्रतीत होते हों तो वह प्राणी भाइयों से रहित या सहायता से हीन होता हुआ दरि बनारहता है अ्थवा जितनेही चिह्न प्रतीत होते हों उतनेही भाई होते हैं॥ ३४॥ ११ समुत्थितं चेन्मणिबन्धदेशाचचिह्नं द्विरेखं यदि याति चान्द्रिम्। सोयं जनःस्यात्परदास्ययुक्को भग्नं यदा चेत्परवन्दिमेति॥३५॥ मणिबन्ध से उठाहुआ दो रेखाओं वाला निशान यदि बुधालय में चलाजावे तो प्राखणी पराई दास्यता को करता है यानी परपुरुषों का सेवक होता है और यदि पूतरं निशान कटा हुआ प्रतीत हो तो वह माणी परवन्धनको पाता है॥ ३५ ॥ १२ उङ्गष्ठमूले यदि भाति चिह्नं रेखासुपद्कं कुटिलं विशुद्धम्। सोयं नरः स्यात्पमदाविलासी ह्यानन्दराशी महतामुपासी॥३६॥ अँगूठेकी मूलमें साफ़ सुधरा छःरेखाओं वाला निशान यदि देढा होकर सोहता तो वह प्राणी प्रमदाओं में विलास करनेवाला होकर आनन्द की राशिवाला होता हु महात्मालोगों का सेवक बनारहता है। ३६॥ १३ अब्जालयान्ते विशदं गभीरं घनस्वरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं निमग्नो हि जलप्रवाहे वाधिर्ययुक्को विधुरस्वभावः ॥३७॥ चन्द्रालय के पासही साफ़ सुथरा व गहरा निशान हथौड़े के समान रूपवाला घएटा बजाने की मुगरी के समान होकर यदि सोहता हो तो वह प्राणी बहिरा हो हुआ टेढ़े स्वभाववाला होकर जलमें डूबजाता है।। ३७ ॥ १४ तिस्त्रःसुरेखा मणिबन्धसंस्थास्तासां विभिन्ना यदि चाद्यरेखा। सोयं यशस्वी मनुजो नराणां प्राज्ञः प्रशंसी परमायुषाढ्यः॥३८॥ शोयन तीनरेखायें जो मग्िबन्ध (कब्ज़े) में बनी रहनी हैं उन्हींके बीच पहने खवा कटीसी प्रतीत होवे तो वह मारगी मनुष्यों के मध्य में यशस्त्री होकर पाज्ञ प्रशंसापात्र ता हुआ परमायु से संयुक्त होता है।। ३= ॥। (देखो चित्र नं० '४३) अथ पश्चदशलक्षणाङितकरतलफलमाह- भोगासमुत्था सरलैकरेखा संमध्यभिन्ना यदि याति सूरम्। सूर्य रेखा मान्यो वदान्यो मनुजस्तदानीं सद्धर्मशाली धनतामुपैति॥३६ ॥ भोगरेखा से उठी, सीधी एकरेखा वीचमें कटी हुई यदि सूर्यालय में पहुँचजावे तो वह ाखी मानी व दानी होकर सद्धर्भशाली होता हुआ धनसमूहों को पाता है। ३६ ॥। मन्दालये चेदिशदं गभीरं चिह्नं त्रिरेखं सरलं विभाति। शान्तस्वभावो मनुजो हि नूनमुद्धेगहीनः समयं समेति ॥४०॥ शनैश्वर के स्थान में साफ़, गहरा, सीधा होकर तीनरेखाओं वाला निशान यदि सोहता ोतो वह माणी निश्चयकर शान्तस्व्भाव वाला होता हुआ व्याकुलता से रहित होकर पपने समय को व्यतीत करता है।। ४० ॥ पूज्यालये चेत्सरलं त्रिरेखं रेखाचतुष्कैस्तु तिरो विभिन्नम्। सोयं मनुष्यो विधनो विदीनो हीनो जनैर्गच्छति सर्वदेशम् ॥४१॥ बृहस्पति के स्थान में सीधा तीनरेखा वाला व तिरीछी चाररेखाओं से कटाहुआ, नेशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी अधनी व दरिद्री होकर सर्वजनों से विहीन होता आ सवदेशों में जाता है ।। ४१॥ सौम्यालयान्ताच्चलिता सुभोगा रेखा गभीरा गुरुगेहमेति। कोपान्वितोऽयं पुरुषस्तदानीं पारुष्ययुक्तः खलु साहसी स्यात्॥४२॥।: वुधके स्थान से चलीहुई भोगरेखा गहरी होकर बृहस्पति के स्थान पर्यन्त, चलीजाके वह भाणी कोपशाली होकर कठोरता से संयुक्त होताहुआ साहसी होता है।। ४२॥ देवेन्द्रवन्द्यालयगा सुभोगा संकर्तिता चैद्यदि कराठदेशे। धर्मेण हीनो हि नरो नराणां भूपादिभीत्या नितरां विभेति॥४३ ।। बृह्दस्पति के स्थान में पहुँची हुई भोगरेखा यदि कएवदेशंमें कटी फटीसी मतीत हो तो- ह माणी नरोंके वीचमें अ्र्रधर्मी होताहुआ रांजा, आगी और चोरके, डरसे बहुतही रता रहता है॥। ४३ ॥ चन्द्रालये चेत्सरलं द्विरेखं चिह्नं सुभोगाभिमुखे प्रयाति। विश्वासहीनो मनुजो विबन्धुर्वेश्याविलासी वनिताविहीन:॥।४8।। सामुद्विकशास्त्रस्य चन्द्रमा के स्थानमें सीधा व दो रेखाओं वाला निशान यदि भोगरेखा के सामने जावे तो वह पाणी अविश्वासी व भाइयोंसे रहित होकर वेश्यागामी होता हुआ निज से विहीन होजाता है॥ ४४॥ ७ मात्री सुरेखा यदि नीचभागे क्षुद्राविभिन्ना मिलिता सुपैत्र्याम्। मात्रानिरस्तो मनुजो हि त्रस्तो विध्वस्तमानो ममतासुपैति॥४५ मात्रीरेखा यदि निचलेभाग में छोटीरेखाओं से कटीहुई पैत्रीरेखा में जाकर मिल तो वह माखी मातासे निकाला व घवड़ाताहुआ दूटेमानवाला होकर ममताको पाता है।।४ = भोगासमीपे करवालचिह्नं मित्त्वा सुमात्रीं समुपैति पैत्रीय। सांघातिकं मृत्युमुपैति मर्त्यो मत्याविहीनो मदनातुरात्मा॥ ४६॥ भोगरेखा के पास टिकाहुआ तरवारका निशान यदि मातृरेखाको भेदनकर पैत्रीरेरे सामने चलाजावे तो वह प्राणी निर्वुद्धि होकर कामदेव से पीड़ित होताहुआ सांघा मौतको पाता है। ४६ ॥ पैत्रीस्वशीर्े मिलिता सुमात्र्या चिह्नं विधत्ते यदि कोणरूपम्। सोयं जन:स्याद्रणितागमज्ञो गौरस्वरूपो ह्यतिगौरवाढ्यः॥। ४७॥ शिरोभाग में पैत्रीरेखा मात्रीरेखा के साथ मिलाप करती हुई कोणरूप चिह्नको था हो तो वह भाणी गणितशास्त्रका ज्ञाता होताहुआ गौराङ होकर अति गौरवता से सं बना रहता है।। ४७ ।। १० संमध्यभिन्ना मिलिता जनन्यां भाग्यासुरेखा कुरुते हि कोणम। सोयं विवादी मनुजो विषादी कष्टप्रदायी तु महज्नानाम्॥ ४८ धीचमें कटी होकर भाग्यरेखा मातृरेखामें मिलती हुई कोणरूप निशान को बनाती हो वह माखी विवादी होकर विपादी होता हुआ महज्जनलोगों को वड़ाकष्टदायक होता है४ ११ करठत्रिशाखा विनता गभीरा पैत्री सुरेखा समुपैति भाग्याम्। सोयं जनो विन्दति वित्तर्वेन्दं संस्थोंसमेतः सरलस्वभावः॥४६। कएठमें तीन शाखाओंवाली, लचीहुई गहरी होकर पैत्रीरखा भाग्यरेखा के पास च जावे यानी मिलजावे तो वह प्राणी मर्यादासमेत सीधेस्वभाववाला होताहुआ धनस को पाता है॥। ४६॥ १ २अङ्गष्ठसूले च पितुः समीपे त्रिपुराड्ररूपं यदि भाति चिह्नम्। १ निष्कासितः २ खङ्गचिह्नम् ३ गशितशास्त्रवेत्ता ४ समूद्दम् ४ मर्यादा ॥ सोयं मनुष्यो बलवीर्यहीनो दीनो ह्यधीनो लेलनाविहीनः ॥५० ॥ अँगूठे की मूल व पैत्रीरेखा के पास त्रिपुएड्ररूपवाला निशान यदि सोहता हो तो वह पाणी बल व वीर्य से हीन होकर दीन व अधीन होताहुआ विशेषता से रमणीविहीन होता है॥। ५० ।। १३ चन्द्रालयान्ते विशदं गभीरं तारीनुरूपं यदि भाति लक्ष्म। सोयं नरो मज्ति नीरमध्ये मानापमानेन युतो यविष्ठेः ॥ ५१॥ चन्द्रालय के पास साफ़ सुथरा व गहरा होकर ताराके समान आकारवाला निशान यदि सोहता हो तो वह माणी जल में डूबजाता है और उसका छोटा भाई मान व अपमान से संयुक्र होता है॥। ५१ ॥। १४ विद्योतते चेन्मणिवन्धदेशे गुणानुरूपं यदि लक्ष्मयुग्मम्। सत्येन हीनो मनुजो मलाव्यो मान्योऽघमोनां धनंतासमेतः॥५२॥ मणिबन्ध (करब्जे) के ऊपरले भागमें गुणाके आकारवाले दो निशान यदि सोहते हों तो वह भाणणी धनाढ्य व मैला होकर अधमजनों का माननीय होताहुआ सत्यसे हीन होजाता है॥ ५२ ॥ १५ सर्पानुरूपं मणिबन्धसंस्थं वक्रं सुचिह्नं सुतरां विभाति। सोयं नरः स्यात्परिणॉँमदर्शी ज्ञानाधिकारी परकार्यकारी॥ ५३॥ सर्पके समान आकारवाला, टेदा निशान मणिबन्ध (क्रब्ज़े ) में टिकाहुआ अधि- कता से यदि सोहता हो तो वह प्राणी ज्ञानाधिकारी व परकार्यकारी होकर परिणामदर्शी होता है॥ ५३ ॥ ( देखो चित्र नं० ४४) १ कनिष्ठिकापर्वयुगे विभाति कोणार्धरूपं यदि लक्ष्म शुद्धम्। चौर्ये प्रवृत्तः पुरुषस्तदा स्याच्चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावः॥५४॥ कनिष्ठा अँगुली की पहली व दूसरी पौरमें अरधकोय निशान यदि शुद्ध होकर सोहता हो तो वह प्राणी चतुरता से संयुत होता हुआ चपलस्वभाववाला होकर चौरकर्म में लगा. हता है।। ५४॥। २ सुमध्यमायाः प्रथमे परुष्के त्रिकोणरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यः सकले स्वकार्ये प्रापोति हानिं न सुखं कदापि।। ५५ ।। १ निजरमणीरहित: २ नक्षत्ररूपम् ३ जलमध्ये ४ तस्यकनिष्ठोभ्राता X नीचजनानां मान- नीयः ६ धनानां समूहः ७ "परियामो विकारो दे समे" (इत्यमरः) = चोरकर्मखि॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य मध्यमा अँगुली की पहली पोरमें त्रिकोणरूपवाला निशान यदि सोहता हो तो माणी समस्तकार्यों में हानि को पाता है और सुखको कभी नहीं पाता है।। ५५। ३ पूज्यालयस्योपरिंगं विभाति पाश्वत्रिरेखं सरलद्धिरेखम्। पित्तार्दितोयं लभते सुशोथं दीर्घापरा चेद्रमणीकृतार्थम्॥ ५६॥ बृहस्पति के स्थान के ऊपरलेभाग में प्राप्तहुआ पार्श्वमें तीनरेखावाला होकर सी दो रेखावाला निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी पित्तरोग से पीड़ित होताहुआ सूजनको पाता है और यदि पूर्वोक्क दो रेखाओं में से कोई रेखा दीर्घ होकर प्रतीत हो किसी नारीकृत धनको पाता है। ५६ ॥ ४ सूरालये चेत्कुटिला सशाखा भोगां विभित्त्वा जननीं प्रयाति। सोयं जन: संशयसक्रचित्तो भूपादिकोपाद्वहुहानिमेति॥५७॥ सूर्यके स्थान में टेढ़ी होकर शाखा समेत रेखा भोगरेखाको काटकर मातृरेखा के मने पहुँचजावे तो वह प्राणणी सन्देह में मनको लगाता हुआ राजा महाराजा आदि लोगों के कोपसे घनी हानिको पाता है।। ५७। ५ भोगा सुरेखा यदि नीचभागे संकर्तिता चेन्मिलिता जनन्याम्। सोयं श्रमासक्रमना मनुष्यो विश्रामहीनो विपदामुपैति॥५८॥ भोगरेखा यदि निचलेभाग में कटीहुई मातरेखा में मिलजावे तो वह प्राणी विश्रा रहित होकर परिश्रम में मनको लगाता हुआ विपदाको पाता है॥। ५८॥ ६. संभोगरेखा सरला गभीरा शीर्षे नता चेन्मिलिता सुमात्र्याम्। उग्रस्वभावो मनुजो महौजा विख्यातकीर्तिर्विजितारिपक्षः॥। ५६ ।। भोगरेखा सीधी व गहरी होकर शिरोभागमें लचीहुई यदि मातृरेखा में मिलाप कर हो तो वह प्राणी उग्रस्वभाववाला व बड़ा बलवान् होताहुआ विख्यातकीर्तिदाला होक शत्रुपक्षका विजय करनेवाला होता है॥ ५६ ॥ ७ चन्द्रालयान्ताचलिता मुमात्री भोगासुशीषे मिलिता यदा चेत। सोयं जनो विन्दति वित्तनाशं शाखायुता चेत्खलु साहसी स्यात-॥६० चन्द्रालय के समीप से चलीहुई मातृरेखा भोगरेखा के शिरोभाग में यदि मिली तो वह पाणी घननाश को पाता है और यदि पूर्वोक रेखा शाखाओं से संयुत हो तो र साहसी होता है॥ ६० ॥ ह. चन्द्रालये चेन्मिलितं स्वशीषे रेखादयं वै विरेलं विभाति। १ "पेलवं विरलं तनु" ( इत्यमर:) ॥. तत्पाणनाशं कुरुते विपक्षो दीर्घापरा चेत्खलु वैरिजेता ॥ ६१ ।। चन्द्रमा के स्थान में दो रेखाओंवाला निशान यदि शिरोभागमें मिलाहुआ विरल कर प्रतीत हो तो वैरीलोग उस प्राणी के प्राण को हरते हैं और यदि पूर्वोक रेखाओं से कोई रखा दीर्घ हो तो वह पराणी वैरियों को विजय करता है । ६?॥ वृद्धाङ्गुलेवैं द्वितये परुष्के रेखाद्यं चेत्सरलं सशाखम् । सोयं ह्यगम्यागमनं करोति गम्भीरुद्धिर्गणितागमज्ञः ॥६२॥ अँगठे की दूसरी पोरमें दो रेखाओंवाला निशान यदि सीधा होकर शाखासहित प्रतीत वे तो वह माणी गंभीर बुद्धिशाली होकर गणितशास्त्र का ज्ञाता होताहुआ अगम्या रम- यों में गमन करता है ॥। ६२ ॥। • रेखाचतुष्कं सरलं विभाति रेखाचतुष्कैस्तु तिरोविभिन्नम्। सोयं निमग्नो मनुजो जलौघे जायाजितो जल्पति जन्तुवादम्॥६३। चाररेखावाला सीधा और चार रेखाओं से तिरीछा कटाहुआ निशान यदि सोहता हो वह माणणी निजनारी से पराजित होकर माणियों का झगड़ा वकताहुआ जलसमूह में बजाता है॥ ६३ ॥ १काव्यालयान्ते विशद सकोणं गुणानुरूपं यदि भाति चिह्नम। सोयं मनुष्यो धनधान्ययुक्को मायारतो मानवतृन्दमुख्यः ॥६४॥ शुक्रालय के पास यदि साफ़ सुथरा होकर कोणों समेत गुण के आकारवाला निशान दि सोहता हो तो वह माणी धन धान्य से संयुक् होकर माया में रत होताहुआ मानव समूहों मुखिया गिनाजाता है॥ ६४ ॥ २ भुग्ना चलन्ती मणिवन्धदेशाद्भाग्यां सपैत्रीं प्रविभिद्य याति। प्रेमास्पदो वै पुरुषस्तदानीं प्राोति पारं भवसागरस्य ॥ ६५ ॥ मशिबन्ध (क्रब्ज़े) से चलीहुई रेखा टेढ़ी होकर भाग्यरेखा और पितृरेखा को काट र शुक्रके पास पहुँचजावे तो वह प्राणी प्रेमका धाम होताहुआ भवसागर के पारको नता है। ६५ ।। ३समत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्रेखा गभीरा समुपैति सौम्यम्। नारीकृतापत्तियुतो मनुष्यो मित्राभिभूतो हि समेति काराम् ॥ ६६ ॥ मशिबन्ध (क्रब्ज़े) से उठीहुई रेखा गहरी होकर बुधालय पर्यन्त चलीजावे तो वह रणी मित्रों से अनादत होकर स्त्रीकृत विपदा से संयुत होता हुआ्र कारालय (जेल- गाने) में जाता है ॥ ६६ ॥ (देखो चित्र नं० ४५) सामुद्रिकशास्त्रस्य अथ पञ्चदशलक्षणङितकरतलफलमाह- १ ब्रध्नालयस्योपरिंगं विभाति रेखाद्यं चेत्सरलं सुदीर्घम्। सोयं महात्मा मनुजस्तदा स्याज्ज्ञानेन मानेन धनेन धन्यः॥६७॥ सर्यालय के ऊपरले भागमें प्राप्तहुआ यानी अनामिका अ्रँगुली की पहली पोरसे उठ दूसरीपोर के मध्य में पहुँचाहुआ लम्बा दो रेखाओंवाला सीधा निशान यदि प्रतीत तो वह पाणी महात्मा होकर ज्ञान-मान और घनसे प्शंसनीय होता है॥ ६७ ॥ २ सौम्यालये चेद्धिशदं च सूक्ष्मं रेखाचतुष्कं सरलं विभाति। सोयं निमग्नो हि जलप्रवाहे वृद्धे वयस्के बहुसौख्यमेति ॥ ६८ ॥ बुधालय में साफ़ सुथरा व छोटासा होकर चार रेखाओंवाला सीधा निशान प्रतीत होता हो तो वह माणी जलमें ड्वाहुआ दृद्धावस्था में घने सौख्यको पाता है॥ ६ ३ सूरालये चेत्सरलं विभाति रेखाचतुष्कं खलु स्वल्परूपम्। पुत्रप्रपौत्रादियुतो मनुष्यो महामनीपी ममताविहीनः ॥ ६६॥ सूर्यालय में सीधा चाररेखाओंवाला छोटासा निशान यदि सोहता हो तो भाणी पुत्र व प्रपौत्र आदिकों से संपन्न होताहुआ बड़ावुद्धिमान् होकर ममता से वि रहता है। ६६ ॥। ४ देवेन्द्रवन्द्यालयगं विभाति चिह्नं त्रिकोणं विशदस्वरूपम्। संस्थासमेतो मनुजो धनाव्यो धन्यो धरायां सरलस्वभावः॥।७०।। बृहस्पति के स्थानमें पहुँचा हुआ साफ़ सुथरा त्रिकोणका निशान यदि मकाशम होता हो तो वह पराणी मर्यादा समेत धनाढ्य होकर धरामएडल में पशंसनीय होताहु सीधे स्वभाववाला होता है॥। ७० ॥ तारशूस पूज्यालये चेद्विशदस्वरूपं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनोव्याधियुतो मनुष्यो मस्तिष्कपीडां लभते सशोकः॥ ७१॥ बृहस्पति के स्थान में यानी भोगरेखा के कएठदेश के पास तारा के समान निर यदि चमकता हो तो वह पाणी मानसी पीड़ा से पीड़ित होताहुआ शोकसमेत मा्फेड पीड़ाको पाता है।। ७१ ॥ ६ पैत्रीसुशीर्षोपरिंगं विशुद्धं गुणानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। पुरोहिताचार्यनिपीडिताङ्गो बाघासमेतो बहुदुःखमेति॥७२॥ १"संस्था तु मर्यादा धारणा स्थितिः" (इत्यमरः) २ मन्त्रव्याख्यारुदाचार्यः॥ पूर्वारद्धे द्वितीयाङ्क: । पैत्रीरेखा के शिरोभाग के ऊपरले भागमें माप्तहुआ साफ़ सुथरा होकर गुगाके आकार ाला निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी पुरोहित और आचार्य या गुरुसे पीड़ित पङ्वाला होताहुआ वाघासमेत बहुतसे दुःखोंको पाता है॥ ७२॥ 9 भोगासुशीषे मिलिता सुपैत्री भोगा मुखं चैति यदा सुमात्री। धूर्तस्वभावो मनुजो नराणां कार्यं विधत्ते सततं समस्तम्॥७३। भोगरेखा के शिरोदेश में पितृरेखा यदि मिलाप करती हो और यदि भोगरेखा के सुख मीप में मातृरेखा चलीगई हो तो वह भाणणी मनुष्यों के बीच धूर्तस्वभाववाला (छलछन्दी) ता हुआ समस्तकार्यों को हमेशाही किया करता है॥ ७३॥ मिन्ना सुमात्री यदि नीचभागे गोलार्धरूपं कुरुते हि चिह्नन। सोयं नरः स्यान्निजवन्धुवर्गे विश्वासहीनो बहुसेवकाढ्यः ।।७४।. मात्रीरेखा यदि निचलेभाग में छ्िन्नभिन्न होकर अरधगोलाकार निशानको बनाती हो वह प्राणी अपने बान्धववर्गों में अविश्वस्त होताहुआ अनेकानेक दासगणों से सेव्य- न होता है।। ७४ । मन्दालये चेत्खलु भोगरेखा क्षुद्राविभिन्ना समुपैति सौम्यम्। नानापदार्थे: सहितो मनुष्यो भूपादिभीत्या बहुहानिमेति॥७५॥ शनैश्वरके स्थान के पासही यदि भोगरेखा छोटी २ रेखाओं से कटीहुई वुघालय प- त चलीजावे तो वह पाणी नानावस्तुओं से संयुत होता हुआ राजा महाराजा आादिकों डरसे घनी हानिको पाता है।। ७५॥ ० मात्रीसुरेखा यदि मध्यदेशे क्षुद्राविभिन्ना विनता विभाति। छल्पायुषं तं पुरुषं करोति सौभाग्यवन्तं बहुपुत्रवन्तम् ॥ ७६॥ मातरेखा यदि मध्यभागमें यानी शनैश्वरालय के सामने छोटी २ रेखाओं से कटीहुई चीसी प्रतीत होवे तो उस भाणी को सौभाग्यवाला व अ्र्नेक पुत्रोंवाला बनाकर पायु करदेती है यानी वह पाणणी छत्तीस वर्ष के भीतरही मरजाता है॥ ७६॥ १ पैत्रीसमुत्था खलु चोर्ध्वरेखा शेषे सशाखा शशिनं प्रयाति। सांघातिकं मृत्युमुपैति मर्त्यों मत्या विहीनो ममतासमेतः।७७॥ पैत्रीरेखा से उठीहुई ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) शेपभांगमें शाखासमेत चन्द्रालय में धली वे तो वह माणी निर्वुद्धि होकर ममतासमेत होताहुआ सांवातिक मौतको पाता है। ७9।। १ पापो धूर्तस्तु वश्कः २ स्वकीयवन्धुसम्हे ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य १२ भौमालयान्ते मिलितं गभीरं तिर्यक्किरेखं समुपैति काव्यम्। अपव्ययेनापि युतो मनुष्यः शेषेनुतापं कुरुते सदैव।।७= ॥ मङ्गल के स्थान में मिलाहुआ गहरा होकर तिरीछी तीन रेखाओंवाला निशान शुक्रालय के पासही पहुँच जावे तो वह पाणणी बुरेकामों में पैसे को खर्चताहै और धन चुकजाता है तो सदैव पछितावा किया करता है॥। ७८॥ १३ भाग्यासुरेखा मिलिता सुपैत्र्यां तदन्तरे चेत्समकोणचिह्रम। साधारणोयं पुरुषस्तदा स्यान्नार्या यदा चेतनयं पसूते ॥७६ ॥ भाग्यरेखा पैत्रीरेखा में मिली हो यानी ऊर्ध्बरेखा पितृरेखा से मिलाप करती हो। उन रेखाओं के बीच में समकोणकासा चिह्न यानी बीछी के डङ्ककासा निशान यदि होता हो तो वह प्राणी साधारणपुरुप होताहै और यदि पूर्वोक् निशान रमणी के करत सोहता हो तो वह पुत्रों को पैदाकरती है॥ ७६॥ १४ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशाद्वेखा गभीरा सम्ुपैति भाग्याम्। सर्वप्रियो वै पुरुषस्तदानीं विजित्य बन्धुं सुखता समेति ॥८०॥ मशिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी हुई रेखा गहरी होकर भाग्यरेखा के पास पहुँच तो वह पराणी सर्वजनों का प्यारा होताहुआ चैरीभाई का विजयकर सुखस को पाता है।। ८० ।। १५ चन्द्रालये चेद्विशदस्वरूपं चिह्नं चतुष्कोणयुतं विभाति। सोयं यशस्वी मनुजो मनस्वी विश्वासशाली बहुवित्तमेति॥८। चन्द्रालय के निकटवर्ती साफ़ सुथरा होकर चारकोनों से संयुत होताहुआ नि यदि सोहता हो तो वह पाणी यशस्वी व मनमौजी होताहुआ विश्वासशाली होकरर धन को पाता है ॥। ८१ ॥ (देखो चित्र नं० ४६) १ सौम्यालयान्ते सरलैकरेखं संमध्यगोलं यदि भाति चिह्नम्। दुर्द्टष्टियुक्ो विकलो मनुष्यो विक्षीणवीर्यो विषयानुरागी॥८२॥ वुधालय के पास सीधी एकरेखावाला व बीच में गोलाकार यानी मौहरवाजी समान होकर निशान यदि सोहता हो तो वह ाणी विशेपता से क्षीणवीर्यवाला व में अनुराग करनेवाला होकर दुर्बलदृष्टिसे संयुक्त होताड्गुआ व्याकुलही बनारहताहै॥ १ तदन्तरे चेदलिंदंशनाव्यमिति वा पाठः॥ २ भोगा गभीरा गुरुगा विभाति शाखा तदीया यदि याति मन्दम्। सोयं मनुष्यो वनिताविलासाद्दौर्भाग्ययुको धनहानिमेति ॥८३॥ सौभाग्यरेखा गहरी होकर वृहस्पति के घरमें पहुँची हुई यदि सोहती हो और यदि उसकी शाखा शनैथ्र के स्थान में चलीगई हो तो वह प्राणी रमणियों में आ्रपरसक़ होनेसे दौर्भाग्यशाली होताहुआ धनहानि को पाता है॥ =३ ।। ३ मात्रीसमुत्था विशदा विभुग्ना रेखा यदैका धिषएं प्रयाति। स मन्दभाग्यो मनुजस्तदानीं प्रामोति सौख्यं चरमे वयस्के॥ ८४॥ मातृरेखा से उठी हुई साफ़ सुथरी व टेढ़ी होकर एकरेखा यदि वृहस्पति के स्थान पर्यन्त चलीजावे तो वह पाणणी मन्दभागी होताहुआ अन्तिम अवस्थामें सौख्यको पाता है॥ ८४ ॥ 8 आरम्भदेशे खलु भोगमात्र्योस्तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं गतो वै मनुजो विदेशं प्रामोति भद्रं भयताविहीनः ॥८ ५॥ भोगरेखा व मातृरेखा के आरम्भदेश में तारा के समान निशान यदि प्रकाशमान होताहो तो वह ाणी विदेशको गयाहुआ भयसमूहों से निडर होकर कल्याण को ाता है॥ ८५ ॥ भोगासुमध्ये सरलं त्रिरेखं तिर्यग्विभिन्नं खलु चन्द्रमित्या। सोयं मनुष्यो रिपुतासमेतो मातापितृम्यां कुरुते विवादम् ॥८६॥ भोगरेखा के मध्यभाग में एकरेखा से तिरीछा कटाहुआ सीधा तीन रेखाओंवाला नैशान यदि सोहता हो तो वह पाणी माता पिता के साथ विवाद (गड़ा) रता है॥ =६ ।। चिह्नं गभीरं जठरे जनन्या वृत्तार्धरूपं विशदं विभाति। त्यक्त्वा स्वकीयौ पितरौ मनुष्यो ह्यात्मम्भरिवैभ्रमते विदेशम्॥८७॥ माताके उदरस्थल में साफ़ सुथरा व गहरा होकर वृत्तार्धरूप यानी अर्ध गोलाकार नैशान यदि सोहताहो तो वह पारगी अपने मातापिताको छोड़कर आत्मा को पालताहुआ दिश में घूमता है॥। ८७ ।। मात्रीसुरेखा शशिनं समेति पैत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति। एवं विधे गर्ततरे प्रयाते करोति चौर्यं चपलस्वभावः ॥ ८८॥ मात्रीरेखा चन्द्रालयके पास चलीजावे और पैत्रीरेखा टेढ़ी होकर मणिबन्ध (कब्ज़े) १ सहयोगं विनापि तृतीया बृद्धो यूनेत्यादिनिर्देशात्॥ सामुद्विकशास्त्रस्य में मिलगई हो जबकि ऐसा गड़हेकासा निशान प्रतीत होवे तो वह माणी चा स्व्रभाववाला होताहु चोरीको करता है ॥ ८८ ॥ ८ पैत्रीगले चेत्सरलं त्रिरेखं रेखाचतुष्कैस्तु तिरोविभिन्नम्। सोयं जनो वै करुते कुर्ळृत्यं विषप्रयोगैर्विषयानुरकः ॥८६॥ वैश्रीरेखा के कएठदेश में सीधा तीन रेखाओंवाला और चाररेखाओं से तिरीड कटाहुआ निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी विषयों में लगाहुआ विपमयोगों निन्दित कार्य को करता है।। ८ह॥ ६ पित्रा वियुका यदि मातृरेखा द्विधा विभक्का खल्ु चाग्रभागे। सोयं नरो भिन्नतरस्वभावो ह्यामोति खञ्जं खलतासमेतः ॥६०॥ पैत्रीरेखासे वियोग करतीहुई मातृरेखा यदि अग्रभाग में दो पकार से बटगई हो वह माणी खलतासमेत भिन्नस्वभाववाला होताहुआ खञ्जरोग को पाता है यानी पैर लँगड़ा होजाता है॥ ६०॥ १० नतद्विरेखं मणिबन्धसंस्थं तद्कूतचिह्नं सरलद्धिरेखम्। सांघातिकं मृत्युमुपैति मर्त्यो मन्दस्वभावो मदनाकुलात्मा ॥ ६१। मणिबन्ध (क्रब्ज़े) में टिका हुआ लची दो रेखाओंवाला और उनसे उपजा हु निशान सीधी दो रेखाओंवाला होकर यदि प्रतीत होवे तो वह प्राखी नीच स्वभाववाल होता हुआ काम से पीड़ित आत्मावाला होकर सांघातिक माँत को पाता है। ६१॥ ११ अङ्गष्ठमूले विशदं विभाति कोषस्वरूपं यदि युर्ग्मेचिह्रम। सोयं दरिद्रः परिवारयुक्को भिक्षामुव्ृत्तिं कुरुतेऽप्यजेसम्॥ ६२॥॥ अँगूठे की मूल में साफ़ सुथरे होकर कोणरूपवाले दो निशान यदि प्रतीत होवें से वह माणी परिवार से संयुत होता हुआ दरिद्री होकर हमेशा भीख को मांगता है यारन भिक्षावृत्ति से निर्वाह करता हुआ जीता है।। ६२।। १२ पैत्रीसुरेखा यदि नीचभागे वृत्तार्धभिन्ना मणिबन्धमेति। सोयं हठान्मृत्युमुपैति मर्त्यों मत्या विहीनो विपदासमेतः ॥ ६३ ॥ पैत्री रेखा यदि निचले भाग में अर्धव्टत्ताकार निशान से कटी हुई मरिबन्ध (कब्ज़े के पास पहुँच जाबे यानी अँगूठे की मूल में समा जावे तो वह मागी विपदासमेत निवु होता हुआ हठ (ज़िद) से मौत को पाता है।। ६३ ।। १ निन्दितकार्यम् २ सोड़ेखक्ः ३ खलानां समूहः ४ चिहडयम् ४ नित्यम्।। १३ सर्पाननाभा मणिबन्धसंस्था ह्येवंविधाश्चेदति सन्ति रेखाः । तावन्मितं वै भ्रमते विदेशं व्यापद्ग्रहग्रस्तमना मनुष्यः ॥ ६४॥ मगिबन्ध (क्रबज़े) के ऊपरले भाग में टिकी हुई सर्प के समान मुखवाली रेखा यदि रोहती हो अथा ऐसीही जितनी रेखायें प्रतीत होवें तो वह प्राणी उतनेही बार विशिष्ट पापदारूप ग्रह से ग्रसे हुए मनवाला होता हुआ निश्चयकर त्रिदेश में घूमता है ॥६४॥ ४ सर्वाङ्गलीनां त्रितये परुष्के साप्यं दविरेखं यदि भाति चिह्नम्। वाल्याद्यवस्थाङ्गुलिककमेण नूनं नरो मज्जति वारिवाहे॥ ६५ ॥ समस्त अँगुलियों की तीसरी पोर में सर्प समान वक्राकार दो रेखाओंवाला निशान दि सोहता हो तो वह माी वाल्यादि अवस्था और कनिष्ठादि अँगुलियों के अनुक्रम निश्चयकर जलसमूह में डूबता है यानी पूर्वोक निशान यदि कनिष्ठा में हो तो ल्यावस्था में व अ्र्पनामिका में हो तो युवावस्था में व मध्यमा में हो तो मध्यावस्था में र्नी में हो तो वृद्धावस्था में और यदि अँगूठे में हो तो अतिव्ृद्धावस्था में जल निमग्न ता है॥ ६५ ॥ (देखो चित्र नं० ४७) अथ पञ्चदशलक्षणङ्गितकरतलफलमाह- सर्वाङ्गुलीनां त्रितये परुष्के वक्रं दिरे खं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यो बलवीर्यहीनो दौर्बल्ययुक्को दयितो दयालुः॥६६॥ समस्त अँगुलियों की तीसरी पोर में वक्राकार दो रेखाओंवाला निशान यदि प्रतीत ता हो तो वह प्राणी वल व वीर्य से हीन तथा दुर्बल शरीरकाला होता हुआ प्यारा कर दंयालु होता है।। ६६ ॥ सौम्यालये चेत्सरलं सकोणं संमध्यरेखं विशदं विभाति। सोयं नरो नीतिपरो भयार्तो भिक्षासुवृत्ति कुरुते ऽप्यजसम् ॥ ६७॥। वुधालय में सीधा कोण समेत बीच में रेखावाला व साफ़ सुथरा होकर निशान यदि इता हो तो वह प्राणी नीतिपरायण होकर भय से व्याकुल होताहुआ निरन्तर भिक्षा तति को करता है॥ ६७ ॥ भोगामुरेखा खलु नीचभागे शाखाद्येनापि युता यदा स्यात्। सोयं विवादी मनुजो विषादी व्यासकचित्तो व्यवसायशाली ॥६८ ॥ भोगरेखा यदि निचले भाग में दो शाखाओं से संयुत होकर प्रतीत होवे तो वह १ निरेखमिति ता पाठः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य पाणी वित्रादी व विषादी होकर विपयों में आसक मनवाला होता हुआ रोज़ग होता है॥। ६ ॥। ४ भाग्यामुरेखा रविगा विभाति त्वर्धार्धतृत्तेन युता मुशीषे। दौष्कर्म्यदोषान्मनुजस्तदानीं कारालयं याति करालरूपः ॥ ६६॥ भाग्यारेखा यदि गहरी होकर सूर्यालयपर्यन्त चली जावे और यदि शिरोभाग अर्धार्धवृत्त से संयुत होकर प्रतीत होवे तो वह प्राणी वुरे कर्मों के दोप से कराल होता हुआ जेलखाने को जाता है ।। ६६ ।। ५. भोगासमुत्था गुरुगेहमेति संकर्तिता चेत्खलु करठदेशे। सोयं जनो वै भ्रमते विदेशं प्रापोति मृत्युं ममतासमेत:॥3। भोगारेखा से उठी हुई शाखारेखा यदि बृहस्पति के स्थानपर्यन्त चली जाये यदि कएठभाग में कटी फटीसी प्रतीत होवे तो वह प्राणी विदेश में घूमता है और म समेत मौत को पाता है॥ १०० ॥ ६ द्विधा विभक्का खलु शेषभागे सौभाग्यरेखा गुरुगा विभाति। प्रवञ्चयित्वा पितरौ स्त्रकीयौ ह्यनारतं कुप्यति कोपशाली ॥ १॥ शेपभाग में दो प्रकार से बटीहुई सौभाग्यरेखा बृहस्पति के स्थान में पहुँचकर यदि हती हो तो वह माणी अपने माता पिताओं को अत्यन्त छलकर कोपशाली होताहु सदैव कोपित होता है॥ १॥ ७ भाग्या विभिन्ना खलु भोगरेखा कोएं विघत्ते यदि मध्यदेशे। वित्ताभिलाषी मनुजो विलासी प्रामोति कामं कलयासमेतः॥२॥ भाग्यरेखा (फेटलाइन) से कटीहुई भोगरेखा यदि मध्यभाग में कोणको बनाती। तो वह माणी धनाभिलापी होकर कलासमेत विलासी होताहुआ कामको पाता है।२ = मात्रीसुरेखा मिलिता सुपैत्र्यां वृत्तार्धयुक्ा खलु कराठदेशे। सोयं विदीनो दयिताविहीनो भङ्क्त्वा स्ववाटिं भयतामुपैति॥३ पैत्रीरेखा में मिलीहुई मात्रीरेखा कएठदेशमें अर्धगोलाकार निशान से संयुक्क हो यदि प्रतीत होवे तो वह प्राणणी दरिद्री होकर दयिता से विहीन होताहुआ अपनी वार्ड विनाशकर भयसमूहों को पाता है॥ ३ ॥ ६ भौमालयान्ते सरलं द्विरेखं संवृक्णमध्यं यदि भाति चिह्नम्। उच्चस्थलाद्वै पतनं जनस्य नो कर्तितं चेन्मरणं प्रयाति ॥ ४॥ १"मोगाद्यशाखा गुरुगा विशुद्धा" इति वा पाठः॥ भौमालय के पास सीधा व दो रेखाओंवाला निशान बीचमें कटाहुआ.यदि प्रतीत होवे तो उस प्राणी का ऊंचे से गिरना होता है और यदि पूर्वोक़ निशान वीचमें कटाहुआ नहीं प्तीत होवे तो वह प्राणी मरणको पाता है यानी गिरकर मरजाता है ॥। ४॥ १० पैत्रीसमुत्था मिलिता सुमात्र्यां कोएं विधत्ते विशदस्वरूपम्। दौर्जन्ययुक्ो मनुजोतिलुब्धो लावरायहीनो ललनां समेति ॥५॥ पैत्रीरेखा से उठी व मात्रीरेखा में मिलीहुई रेखा यदि साफ़ सुथरा कोणरूप निशान को बनाती हो तो वह पाणी दुर्जनता से संयुक्त व सुन्दरता से हीन होता हुआ बड़ालोभी होकर रमखी को पाता है॥ ५ ॥ ११ समुत्थिता चेन्मणिवन्धदेशात्सर्पानुरूपा जननीमुपैति। विना प्रयासं लभते हि वित्तं विश्वासघाती जनवञ्चकश्र ॥ ६॥ मशिबन्ध (कब्ज़े) से उठीहुई सर्पाकार रेखा यदि मातृरेखा के पास पहुँचजावे तो वह माणी जनोंका छलनेवाला होकर विश्वासघाती होताहुआ बिना परिश्रम धनको पाता है ॥ ६ ॥ १२ मातुःसमीपे विशदस्वरूपा रेखा यदैका भगिनी विभाति। संलव्धवित्तो मनुजोऽधिकारी दीर्घा यदा चेद्बहुवित्तमेति॥७॥ साफ़ सुथरी एक भगिनीरेखा मातृरेखा के पास यदि सोहती हो तो वह माणी अधि- कारी होकर धनको पाता है और यदि पूर्वोक रेखा दीर्घाकार होकर प्रतीत होवे तो वह पाखणी बहुतसा धन पाता है।। ७।। १३ पूज्यालयाच्चेच्चलिता सुरेखा चौपस्वरूपा शशिजं समेति। धूर्तस्वभावो मनुजो हि लम्पटो दान्यो वदान्यो ध्वजभङ्गमेति॥॥ बृहस्पति के स्थान से चलीहुई रेखा धनुषाकारवाली होकर यदि वुधालय पर्यन्त चलीजावे तो वह प्राणी धूर्तस्वभाववाला व व्यभिचारी होकर बड़ादाता व बड़ावक्का होता हुआ ध्वजभङ्गताको पाता है॥ ८ ॥ १४ मात्रीसमुत्था कुटिला सुपैत्री ह्यधोद्विभिन्ना मणिबन्धमेति। सोयं जन: स्यात्परिमाणभोजी प्रमाणपायी दयितानुयायी ॥६॥ मात्रीरेखा से उठीहुई टेदी होकर पैत्रीरेखा यदि निचले भागमें छोटी दो रेखाओं से कटतीहुई मणिबन्ध (क्ब्जे) में समाजावे तो वह पराणी परिमाणभोजी व परिमाणपायी होकर प्यारी का अनुगामी होताहै ॥ ६।। १ बृद्दस्पतिगेह्ात् २ धनुषाकृतिः ३ द्वाभ्यां छ्विन्नेति यावत्। सामुद्रिकशास्त्रस्य १५ सर्वाङ्गलीनां द्वितये परुष्के कोणस्वरूपं यदि भाति चिह्नम्। ना नातियुक्ो मनुजोऽतिदुर्बलो मूर्च्छीमयं वै लभतेऽलसाङः॥ १० समस्त अँगुलियों की दूसरी पोर में कोणरूपवाला निशान यदि सोहता हो तो प्राणी नानाव्याधियों से संयुक्त होता हुआ बड़ा दुबला व आलसी होकर मूर्च्छारोग पाता है ॥ १० ॥ (देखो चित्र नं० ४८) अथ त्रयोदशलक्षणाङितकरतलफलमाह- १ इज्यालयाच्चेच्चलिता कुरेखा भित्त्वा सुभोगां समुपैति सौरिम। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यो लावरायलीलालसितोऽलसाङ्ग: ॥ ११। बृहस्पति के स्थान से चलीहुई एक छोटीसी रेखा सौभाग्य रेखा को काटकरय शनैश्चरालय पर्यन्त चली जावे तो वह माणी सुन्दरता की लीला से विलसित होताहु मुस्तदेहवाला होकर शीशकी पीड़ा को पाता है॥ ११ ॥ २ भोगाविभुग्ना शनिगा विभाति क्षुद्रा विभिन्ना यदि नीचभागे। विसूचिकाक्रान्तवपुर्ज्वरार्तो जम्भायुतो याम्यपदं प्रयाति॥ १२।। भोगरेखा टेढी होकर शनैश्वर के स्थान में पहुँची व निचले भागमें एक छोटी रेखा से कटती हुई यदि सोहती हो तो वह मागी हैजेरोगसे ग्रसा शरीरवाला व ज्य से पीड़ित होकर जँयुवाई लेताहुआ यमालय को जाता है । १२॥ ३ मात्रीसुरेखा भगिनीसमेता स्वल्पस्वरूपा पितरं समेति। तदास्थिभङ्गं लभते नरो वै त्वन्या यदा चेदधिकाङ्कनःस्यात्॥१३॥ भगिनीसमेत मात्रीरेखा छोटीसी होकर पैत्रीरेखा में समाजावे यानी पैत्रीरेखाने मिलाप करती हो तो वह पाणी हड्डीटूटनेकी पीड़ाको पाताहै और यदि दूसरी भगिन रेखा प्रतीत होतीहो तो वह नाना अङ्गनाओंवाला होताहै यानी अनेकानेक रमणियों रमता है॥ १३ । ४ पैत्रीसमुत्थां शनिगां स्वशीर्षे संयुज्य भाग्या मणिबन्धमेति। सोयं मनुष्यः कलहानुरक्तः प्रामोति कारां कमलाविहीनः॥ १४॥ अपने शिरोभाग में पैत्रीरेखा से उठी व शन्यालय में पहुँची हुई रेखासे मिलक भाग्यरेखा मखिबन्ध (कब्ज़े ) के पास आजावे तो वह माणी लड़ाका होता हु लक्ष्मी से विहीन होकर जेलखाने को जाता है ॥ १४ ॥ १ अनेकव्याधिपीडितः २ मूर्च्छारोगम् ३ कुरेखा स्वल्पारेखेति यावत्।। अङ्गुष्टशाखा यदि सन्तु तिसत्रस्तासां सुमध्या खलु कर्तिता चेत। सोयं जनो वैरिगणान्विजित्य सत्यप्रतिज्ञः क्षमतामुपैति॥१५॥ अँगूठे की शाखायें यदि तीन होवें उन्होंमें से बीचवाली शाखा कटी हुई प्रतीत होवे वह पाणी सत्यसंकल्पवाला होताहुआ वैरिगणों का विजयकर क्षमाको पाताहै ॥ १५॥ समुत्थितं चेन्मणिवन्धदेशाचिह्नं द्विरेखं यदि याति चन्द्रम्। सोयं नरो मूढतरो नराणां विश्वासघाती वनितारतः स्यात्॥ १६॥ मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठाहुआ दोरेखाओंवाला चिह्न यदि चन्द्रालय में चलाजावे वह पाणी मनुष्यों के मध्य में महामूर्ख होताहुआ विश्वासघाती होकर वनिता में रहता है॥ १६ ॥ पैत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति शाखाचतुष्केन युता स्वमध्ये। सोयं जनः स्याजिजन्धुवर्गे विश्वासहीनो विषमस्वभावः॥१७॥ पैत्रीरेखा टेढ़ी होकर अपने विचलेभाग में चार शाखाओं से मिलती हुई मणिबन्ध कब्ज़े) के पास चलीजावे तो वह पाणी अपने वन्धुवर्गों में अवविश्वासी होताहुआ क- न स्वभाववाला होता है।। १७ ॥। वृद्धाङ्गुलेवैं द्वितये परुष्के तिरोद्विभिन्नं सरलं द्विरे म । विश्वासराहित्यमुपैति जन्तुर्जाज्वल्यमान: खलु नास्तिकश्च ॥ १८॥ अँगूठे की दूसरी पोर में तिरीछी दोरेखाओं से कटाहुआ सीधा दो रेखाओंवाला शान यदि ग्रतीत होता हो तो वह भाणणी कोपसे अ््पतीव जलताहुआ नास्तिक होकर श्वासहीनता को पाता है॥ १८ ॥। बृद्धाङ्गुलेवैं नखतः समुत्थं द्विपर्वगं चेत्सरलं दिरेखम्। विश्वासशाली मनुजो रसाली प्रजामुपाली जनदुःखदाली॥ १६॥ अँगूठेके नाखून से उठा व दूसरी पोरतक गया हुआ सीधा दो रेखाओंवाला निशान दि सोहता हो तो वह ाणी विश्वासी व मिष्टभाषी होकर सन्तानों का पालनेवाला ताहुआ जनोंके दुःखों का विदारक होता है॥ १६ ॥ •सुतर्जनी चेद्वितये परुष्के धत्ते सकोएं यदि बाहुभिन्नम। सोयं मनुष्यो रसनारसज्ञो रामारतो घयतयुतो दयालुः ॥२०॥ यदि तर्जनी अ्रँगुलीही दूसरे पोर में कोश समेत व भुजाभिन चिह्न को धारती हो तो वह खी जिह्ाके स्वादका ज्ञाता व दयालु होकर सुन्दरियोंमें रत होताहुआ जुवाड़ी होता है२०॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य १ १ सुमध्यमाया द्वितये परुष्के चिह्न सकोएं यदि मध्यकोणम्। दुरोदराक्रान्तमना मनुष्यो मान्यो वदान्यो बलतामुपैति॥२१॥ मध्यमा अँगुलीकी दूसरी पर्वमें कोण समेत व बीच में कोका रखनेवाला नि यदि प्रतीत होवे तो वह माणगी जवा खेलने में मनको लगाता हुआ माननीय व बड़ा होकर वलसमूह को पाता है यानी महावलवान् बना रहता है ॥ २१॥ १२ अनामिकाया द्वितये परुष्के चिह्नं सकोएं यदि बाहुभिन्रम ध्ूते रतो वै मनुजो विलासी ह्यानन्दराशी खलु सुद्धयुपासी॥२ अपरनामिका अ्रँगुली की दूसरी पोर में यदि कोणसमेत व भुजाभिन्न होकर चिद्न म होवे तो वह प्राणी जुवाड़ी होकर भोगी व आनन्दकी राशि होताहुआ विद्वानों उपासक होता है ॥ २२ ॥ १ ३ कनिष्ठिकाया द्वितये परुष्के चिह्नं सकोएं यदि मध्यकोणम्। सोयं नरो द्यूतपरोऽप्युदारो ह्यामोति शङ्ां निजजीवनेप्मुः॥२३॥ कनिष्ठा अँगुली की दूसरी पोर में कोणसमेत व वीच में कोणका रखनेवाला नि यदि प्रतीयमान होता हो तो वह पाी जूवा खेलताहुआ उदार व अपने जीवन में त्र लापावान् होकर सन्देह को पाता है ॥ २३ ॥ (देखो चित्र नं० ४६) १ पैत्री विभुग्ना मणिबन्धमेति वृत्तार्धयुक्का खलु चोर्ध्वभागे। श्वासादिरोगान्मृतिमेति मर्त्यो न्यूना यदा चेद्यसोऽनुमानाद्॥२ यदि पैत्रीरेखा टेढ़ी होकर मशिगबन्ध (कब्ज़े) के समीप चली जावे और यदि ऊप भाग में वृत्तार्थसे संयुक्त होकर प़तीत होवे तो वह प्राणी श्वासरोग व क्रमिरोग आररहि से मौतको पाताहै और यदि पूर्वोक रेखा स्वल्परूप होकर सोहती हो तो वह अवस्था अनुमान से मौतको पाता है ॥ २४ ॥ २ पैत्रीसमीपाच्चलितं सरेखं वेत्रस्वरूपं शशिजं समेति। सोयं नरो मूढतरो बलीयान् वामाजितो वै भ्रमते विदेशम्॥ २५ ॥ पैत्रीरेखा के निकटदेश से चलाहुआ रेखा समेत वेत के समान प्रकाशमान निशान वुधालयपर्यन्त चलाजावे तो वह प्राणणी महामूर्ख व बड़ा बलवान् होकर वनिता से जित होताहुआ विदेश में बूमता है॥ २५॥ ३ चन्द्रालयाच्चेच्चलितं द्विरेखं भित्त्वा सुमात्रीं गुरुमभ्युपैति। सोयं सुभाग्यो मनुजो मनस्वी धन्यो यदा चेन्मणिबन्धसंस्थम्॥२६ चन्द्रालय से चलाहुआ दो रेखाओंवाला निशान यदि मात्रीरखा को काटकर वृहस्पति स्थान के सामने पहुँच जावे तो वह प्राणी वड़ाभाग्यशाली होताहुआ मनमौजी होता है र यदि पूर्वोक् चिह्न कब्ज़े के पास टिकाहुआ प्रतीत होता हो तो वह पाणी धन्य ता है॥। २६ ।। समुत्थितं चेन्मणिवन्धदेशाचचिह्नं द्विरेखं बुधमभ्युपैति। गाम्भीर्यशाली गणको गरिष्ठे ज्येष्ठे वरिष्ठे जनतामुपैति॥२७॥ मणिबन्ध (कब्ज़े) से उठाहुआ दो रेखाओंवाला निशान यदि बुधालयपर्यन्त लाजावे तो वह पाणी गाम्भीर्यशाली, ज्योतिर्वेत्ता, गरिष्ठ, ज्येष्ठ व श्रेष्ट होताहुआ नसमूह को पाता है॥ २७ ॥ शेषे सुभागे खलु मातृकाया मध्ये विभिन्नं यदि भाति सार्प्यम्। आत्माभिमानी पुरुषोऽतिलुब्धो मन्दो मलाव्यो मदनातुरश्र ॥ २८॥ मातृरेखा के शेपभाग में यदि बीच में कटाहुआ सर्पांकार निशान प्रतीत होता हो तो हमाखी आत्माभिमानी, वड़ालोभी, मूर्ख व मलिनस्वभाववाला होताहुआ काम से बाकुल रहता है ॥। २८ ।। मात्रीसमीपे विशदं विभाति सर्पानुरूपं यदि युग्मचिह्नम्। सोयं नरो मज्जति वारिवाहे मध्ये वयस्के सुखतामुपैति॥ २६॥ मात्रीरेखा के समीपवर्ती साफ़ सुथरे सर्पसमान आकारवाले दो निशान यदि सोहते तो वह पाणी जल में डूवता है और मध्यावस्था में घने सुखको पाता है॥ २६॥ सुमध्यमायास्तृतये परुष्के चिह्नं त्रिशलं वृजिनं विभाति। श्वासावरोधात्खलु पाशतो वा प्रामोति मृत्युं भुवि चौरमुख्यः ॥३० ॥ मध्यमा अँगुली की तीसरी पर्वमें त्रिशूल का चिह्न टेढा होकर यदि सोहता हो तो वह णी पृथ्वीमएडल में मुखिया चोर होकर श्वासारोध या फ़ांसी से मौतको पाता है॥३०॥ अनामिकायास्तृतये परुष्के संमध्यगोलं वृजिनैकरेखम्। सोयं नरश्रौरवरोऽतिलम्पटो विसंकटो वै विकटो नराणाम् ॥ ३१ ॥ अनामिका अँगुलीकी तीसरी पर्वमें टिकाहुआ बीचमें गोलाकार व तिरीछी एकरेखा ला निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणणी चोरोंमें मुखिया होकर व्यभिचारी व मनुष्यों विकट होताहुआ घने संकटवाला होता है॥ ३१॥ सौम्यालयाच्चेच्चलिता गभीरा भोगा सुरेखा गुरुगा विभाति। सामुद्रिकशास्त्रस्य जैवातृकोयं मनुजो जवाब्यो ह्यामोति नित्यं ललनासुभोगम्॥ ३ यदि वुधालय से चलीहुई गहरी होकर भोगरेखा बृहस्पति के स्थानपर्यन्त सोहनी तो वह पाणी वेगवान् होकर दीर्घजीवी होताहुआ नित्यही रमणियोंमें भोगको पाता है।। १० चन्द्रालयाच्चेचलिता विभुग्ना मात्रीसुरेखा पितरं परैति। सोयं मनुष्यो निजवमजातो मान्यो वदान्यो विभ्ुतामुपैति॥३३ चन्द्रालय से चलीहुई टेढ़ी होकर मातृरेखा यदि पितृरेखासे मिलाप करती होतं पाणी अपने पितासे जन्माहुआ मान्य व वदान्य (वक्का) होकर विभुताको पाता है।। (देखो चित्र नं० ५० ) १ सौम्यालये चेद्धिशदं विशालं यवानुरूपं यदि भाति चिह्नय। नैजे कुटम्बे कुरुते विवाहं त्वन्यालये चेत्फलसुक्कमेव॥ ३४॥ बुधालय में साफ़ मुथरा व विशालरूप यवके आकारवाला निशान यदि सोह तो वह पराणी अपने कुटुम्ब या वन्धुगणों में व्याहको करता है और यदि अन्य घ होतो भी कहाहुआ ही फल होता है।। ३४ ॥। २ समुष्टिका चेत्करवालरूपा भोगा सुरेखा गुरुगा विभाति। सोयं ह्यगम्यागमनं करोति चेत्थं सुपैत्री तु फलं तदेव॥ ३५। मुठिया समेत तरवार के समान आकारवाली होकर भोगरेखा बृहस्पति के स्थ पहुँची हुई यदि सोहती हो तो वह प्राणी मौसी, चाची, दादी, बेटी व बहू आदि गमन करता है और यदि ऐसेही पैत्रीरेखाभी प्रतीत होवे तो भी अगम्यागमन करता है।। ३ भाग्या सशाखा शनिगा विभाति वृत्तेन युक्का खलु नीचभागे। नीचाङ्गनां वै भजते मनुष्यो वाशी यदीत्थन्तु फलं तदेव॥३६॥ भाग्यारेखा (फेटलाइन) शनैश्चर के स्थान में पहुँची व निचलेभाग में शाखा चृत्ताकार निशान से संयुक्क होतीहुई यदि प्रतीत होवे तो वह माणी नीचरमणी को से है औौर यदि ऐसेही पैत्रीरेखा भी प्रतीत होवे तो भी पूर्वोक़ फल होता है॥ ३६॥ ४ अङ्गप्ठमूले विशदस्वरूपं वेदाङ्कतुल्यं यदि भाति भिन्नम्। संतापशाली मनुजो विशोकी दीर्घ यदा चेद्धहुशोकमेति॥३७॥ १ जवातृक: स्यादायुष्मान्.।। अँगूठेकी मूल में शुद्धरूपधार चारत्र्पङ्ग के समान भिन्न होकर निशान यदि प्रतीत होता हो तो वह माणणी विशोकी होकर सन्तापशाली होता है और यदि पूर्वोक चिह्न लम्बायमान होकर प्रतीत होवे तो घने शोक को पाता है॥ ३७ ॥ 4 अङ्गप्ठशाखा यदि सन्तु तिस्रो वृत्तार्धयुक्का प्रथमा हि तासाम्। लोके भ्रमन्वै मनुजस्तदानीमुद्धाह्य पत्नीं पितरं समेति ॥३८॥ अँगूठेकी शाखायें तीन हों उन्हों में से पहली शाखा अर्धवृत्ताकार से युक्र होती हुई यदि प्रतीत होवे तो वह पाणी लोक में भ्रमण करताहुआ विजातीय रमणी के साथ व्याहकर पिताके पास पहुँचता है॥। ३८ ॥। ६ मात्रीसमीपे सरलं त्रिरेखं रेखाचतुष्कैस्तु तिरोविभिन्नम। सोयं नरो मज्जति वारिवाहे प्रामोति मृत्युं मदनातुरश्र ॥ ३६ ॥ मात्रीरेखा के पास सीधा तीनरेखाओंवाला व तिरीछी चाररेखाओं से कटाहुआ निशान यदि सोहता हो तो वह पाणणी जल में डूबजाता है और कामातुर होकर मौतको पाता है॥। ३६ ॥। ७ रेखाचतुष्कं सरलं विभाति रेखाचतुष्कैस्तु तिरोविभिन्नम्। सोयं निमग्नो हि जलप्रवाहे नानार्तियुक्को मरणं प्रयाति॥ ४०॥ चन्द्रालय के समीप सीधा चाररेखाओंवाला व तिरीछी चाररेखाओं से कटाहुआ निशान यदि सोहता हो तो वह प्राणी जलमें दूवा व अनेकानेक व्याधियों से घिरा हुआ मरख को पाता है॥। ४० ॥ = चिह्नं यदा चेन्मणिवन्धसंस्थं तिर्यकत्रिभिन्नं सरलं त्रिरेखम्। सोयं जनो वै पतितो जलौघे जायाजितो याम्यपदं प्रयाति ॥ ४१ ॥ मखिबन्ध (क़ब्ज़े) में टिका व तिरीछा तीन रेखाओं से कटाहुआ सीधा तीन रेखाओं वाला निशान यदि सोहता हो तो वह भाणी भार्या से पराजित होकर जलसमूह में गिराहुआ यमालय को जाता है। ४१॥ ६ कनिष्ठिकायाः प्रथमे परुष्के समद्धिकोएं यदि भाति चिह्म्। चौर्याभियोगे लभते हि शास्तिं न मन्यते ना निजदोषजालम् ॥४२॥ कनिष्ठा अँगुली की पहली पर्वमें समद्विकोणवाला निशान यदि सोहता हो तों वह मारणी चोरी के मुकदमा में सजा को पाता है परन्तु वह अपने दोपजालको नहीं मानता है॥ ४२ ॥। १ चन्द्रालये इति शेषः। सामुद्िकशास्रस्य १० चन्द्रालयाच्ेच्चलिता सुमात्री संयुज्य पैत्रीं कुजमभ्युपैति। भ्रात्रा युतो वै मनुजो धनाढ्यो धन्यो धरायां धरया समेतः॥४३ यदि चन्द्रालय से चलीहुई मात्रीरेखा पैत्रीरेखा से मिलापकर मङ्लालय में प गई हो तो वह भारणी धरा समेत व भाई से संयुत होकर धनात्य होताहुआ पृथ्वीमए में धन्य होता है ।। ४३॥ ११ मात्रीसमुत्था कुटिला सुपैत्री संवृत्तकराठा मणिबन्धमेति। सोयं मनुष्यो वनितावियक्ो रामे रतो रामपदं प्रयाति ॥ ४४॥ मात्रीरेखा से उठी व टेढी होकर पैत्रीरेखा कठमें वृत्ताकार निशान को धारती यदि मणिबन्ध के पास चली जावे तो वह पाणी रमणी से वियोगी होकर राममें पराय होताहुआ रामालय को जाता है ।। ४४॥ (देखो चित्र नं० ५१) अथ अंग्रेज़िमतानुसाराज्जन्मवारमासादिज्ञानमाह- सुतर्जनी निम्नतलाचलन्ती रेखा गभीरा मणिबन्धमेति। तां वै सुपैत्रीं प्रवदन्ति सन्तो ह्यायुष्यरेखां कथयन्ति केपि ॥ ४५॥ तर्जनी अँगुली के निचले भागसे चली हुई गहरी रेखा यदि मणिवन्ध के पास पहुँ जावे तो उसको पिडतों ने पैत्रीरेखा कहा है और कितेक इंगलिशवेसा

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 8)

विद्वान्लो आयुष्य रखा (लाइफ़लाइन) भी कहते हैं॥। ४५॥ तन्निम्रदेशाचचलिता गभीरा रेखा यदा चन्द्रमसं प्रयाति। तां मातृकां वै प्रवदन्ति प्राज्ञा विज्ञा महान्तो नितरामुदाराः॥४६॥ पैत्रीरेखा के निचले देश से गहरी रेखा यदि चन्द्रालयपर्यन्त चली जावे तो उ रेखा को अतीब उदार व बड़े प्राज्ञ विज्ञलोगों ने मातृरेखा (हयडलाइन) कहाहै॥४६ एषा सुरेखा खलु दर्शनीया कुत्र स्थले वै गमनं करोति। तदन्तिके चेत्कति सन्ति वज्राश्छिन्ना न भिन्ना बहुरेखिकाभिः॥४७ निश्चयकर यह मातृरेखा किस स्थल में गमन करती है और उसके समीपवर्ती कितने से वज्राकार चिह्न प्रतीत होते हैं और यदि वे बहुतसी रेखाओं से दिन्न व मिन्न होक प्रतीत न होवें तो वक्ष्यमाण जन्म वारादि कहना चाहिये। ४७। रेखास्वरूपं सकलं विचार्य ध्यात्वा सुदेवं गणपं गुरुं च। वारं वदेद्ें जनुषो विपश्चिद्ब्ूयात्सुमासं तु तथा तिर्थींश्चै॥ ४८॥ मिति वा पाठ:।। १ गोत्राकु: पृथिवी पृथ्वीत्यमरः । कुःपृथ्वी ततो जातं भौममिति यावत् २ तराव देवाधिप गणनायक और गुरुदेव का ध्यानधर व रेखाका सारारूप विचार कर विद्वान् को वार, महीना व तिथि या तारीख को बताना चाहिये ॥ ४८ ॥ पैत्रीसमुत्था विशदा गभीरा मात्री सुरेखा शशिनं समेति। तत्रस्थले चेत्खलु चैकवज्रं ज्येष्ठं सजूनं प्रवदेत्ससोमम् ॥४६॥ पैत्रीरखेा से उठी व साफ़ सुथरी व गहरी होकर मात्रीरेखा यदि चन्द्रालयपर्यन्त चलीगई हो और यदि उसी स्थान में एकला वज्राकार निशान प्रतीयमान होता हो तो उपेष्ठमास वा चन्द्रवार समेत जूनमास कहना चाहिये । ४६॥ वज्रैकचिह्ने विशदे प्रयाते दिनानि ब्रूयाद्दशसंख्यकानि। वज्रद्धये चेत्खलु विंशकानि वञ्रत्रये स्युः सति त्रिंशकानि॥ ५०॥ यदि शुद्धरूप होकर एकही वज्राकार चिह्न प्रतीत होता हो तो दश दिन व दो वज्र हो तो वीस दिन व तीन वज्र हों तो तीस दिन कहना चाहिये ॥ ५० ।। मात्रीसुरेखा विशदा गभीरा भौमालयं चेद्धजते यदानीम्। आक्टूरं चैव तथा सुमार्च ब्रूयात्सुमासं सह भौमवारम् ॥ ५१॥ यदि मात्रीरेखा साफ़ सुथरी व गहरी होकर मङ्लालय पर्यन्त चलीजावे तो भौमवार सभेत आक्टूवर या मार्च मास कहना चाहिये ।। ५१।। सौम्यालयान्तं यदि याति मात्री रेखा गभीरा विशदस्वरूपा। इरागस्टमासं सबुधं मयं वा ब्रूयान्न वज्राः खलु चेद्विविभिन्नाः॥५२॥ साफ़ सुथरी व गहरी होकर माताकी रेखा यदि वुधालय पर्यन्त चलीजावे और यदि ज्राकार चिह्न भिन्न होकर नहीं प्रीत होें ोुे आगसमास या मई मास हना चाहिये॥ ५२॥ मात्रीसुरेखा विशदाऽविभिन्ना गंभीररूपा धिषैएं प्रयाति। नवम्बरं वा खलु फ़ेळ्रुआरिं बृहस्पतिं वारमुदाहरन्ति॥ ५३ ॥ यदि मात्रीरेखा साफ़ सुथरी व गहरी होकर अन्यरेखाओं से नहीं कटती हुई वृहस्वति स्थानपर्यन्त पहुँचजावे तो आचार्यलोग गुरुवार समेत नतम्बर मास या फ़रवरी मास हते हैं ॥ ५३ ॥ रेखा जनन्या विशदस्वरूपा शुक्रालयं याति गभीररूपा। एप्रेलमासं भृगुवासराव्यं सेप्टेम्बरं वा प्रवदन्ति विज्ञाः ॥५४॥ १ बृहस्पति २ शुक्रवारसंयुक्कम्। सामुद्रिकशास्त्रस्य माताकी रेखा साफ़ सुथरी व गहरी होकर यदि शुक्रालय पर्यन्त चलीजावे तो शु वार समेत अपरैल मास या सितम्बरमास परिडतों ने कहा है॥ ५४॥ घात्रीसुरेखा धवलस्वरूपा मन्दालयस्याभिमुखं प्रयाति। डिसेम्बरं वा खलु जानुवारिं सूरात्मजं वै कथयन्ति घल्म्॥५५॥ यदि मात्रीरेखा निर्मलरूप होकर शन्यालय पर्यन्त चलीजावे तो शनिवार समे दिसम्बर या जनवरी मास कहते हैं॥ ५५ ॥ मात्रीसुरेखा विशदस्वरूपा सूरालयस्याभिमुखं प्रयाति। जौलाइमासं रविवासराव्यं वदन्ति विज्ञा वदतां वरेएयाः।।५६।। यदि मात्रीरेखा उज्ज्वलरूप होकर सूर्यालय के सामने आ्रकर प्राप्त होजावे तो कह वालों में प्रधान होकर विज्ञलोगों ने रविवार समेत जुलाईमास कहा है॥ ५६॥ मासदयं चेत्कथितं तु यत्र कथं विचार्य विदुषा च तत्र। एषा सुरेखा विशदा यदा स्यादाद्यो हि मासो भणितः सुधीभिः॥५७ जिस स्थान में दोमास कहे गये हों वहांपर विद्वानों को कैसे विचार करना चाहिये कहते हैं कि यदि यह पूर्वोक्क मात्रीरेखा उज्जवलरूप होकर मरतीत हो तो परिडतों पहिलामास कहा है॥। ५७।। रेखा सुमात्री मलिना यदा चेन्मासो द्वितीयो विदुषा विचार्यः। एषा यदा चन्द्रमसं प्रयाति मातुः स्वरूपं लभते हि माणी ॥ ५८॥ यदि मात्रीरेखा मैली होकर प्रतीत होवे तो पलिडितों को दूसरा मास कहना चाहि और यदि यह पूर्वोक मात्रीरखा चन्द्रालयपर्यन्त चलीजावें तो वह पाणी माता का र रूप पाता है॥। ५८॥ रक्ना सुमात्री धवलस्वरूपा रेखा गभीरा समुपैति सूरम्। वप्रस्वरूपं भजते हि जन्तुर्जाज्वल्यमानो जडताविहीनः॥ ५६ ॥ यदि मात्रीरेखा लाली व उजली होकर गहरी होती हुई सूर्यालय पर्यन्त चजो जावे तो वह प्राणी जड़ता से विहीन होकर निजतेज से प्रकाशमान होता हुआ पिकान रूप पाता है॥। ५६॥ तिस्र: सुरेखा मणिबन्ध संस्था एकैकशश्चेत्खलु त्रिंशदव्दम्। वयःक्रमं वै मुनयो वदन्ति संकर्तिताश्चेत्खलु चोनत्रिंशत्॥ ६०॥ १ शन्यालयाभिमुखम् २ सूर्यालयस्य ।। मणिबन्ध (कब्जे ) में टिकी हुंई जो तीन रेखायें प्रतीयमान होती हैं उन्होंमें से त्येक रखा का वयःक्रम मुनियों ने तीस तीस वर्ष का कहा है और यदि पूर्वोंक तीनों खवायें कटी हुई पतीत होवें तो उनतीस वर्षका वयःक्रम जानना चाहिये॥ ६० ॥ अथ महाराष्ट्राणां मते करतलफलमाह- सुकोमलं पाणितलं च यस्य नरो भवेत्कामिजनप्रधानः । कोमल कलाप्रवीण: कलहेन हीनः कान्ताविलासी कमनीयकायः ॥ १॥ दथली जिसकी हथेली बहुतही कोमलसी प्रतीत हो तो वह भाणणी कामी जनों में मुख्य, लाओं में चतुर व कलह (लड़ाई) से हीन होकर कान्ताविलासी होता हुआ न्दर शरीरवाला होता है।। १॥ कठोरकं पाणितलं च यस्य नरो भवेत्कार्यकरो वलाव्यः। परिश्रमासक्कमना मनस्व्री मन्दो मदार्तो ममतासमेतः ॥२॥ फड़ी हथे लो जिसका हस्ततल कठोरसा प्रतीत होता हो तो वह प्राणणी कार्यकारी व बलवान् होकर रिश्रम में मनको लगाये हुए मनमौजी व मूर्ख तथा मदार्त होता हुआ ममता से संपन्न ता है॥। २ ।। यदा महत्योङ्गलयो हि सन्ति मनुष्यपाणेस्तु तलात्तदानीय्। सोयं जन: शिल्परतः कलाव्यः कुशाग्रबुद्धि: कृतकृत्यकः स्यात्॥३॥ जिस मनुष्य की हथेली से जब अँगुलियां बड़ीसी प्रतीत होती हों तो वह माणी कारी- री में रत व कलाओं से युक्र होकर कुशागरबुद्धिवाला होता हुआ कृतकृत्य कहलाताहै ।।३॥ मनुष्यपाणेस्तु तलाद्यदानीं करस्य शाखाः खलु सन्ति इस्वाः। सोयं नरः संसृतिलाभकारी बाल्ये स्ववृत्तं नितरां प्रवेत्ति ॥ ४ ।। यदि मनुष्य के करतल से अँगुलियां छोटीसी प्रतीत होवें तो वह पाणी दुनिया का भ उठाता है और बाल्यावस्था में ही अपनी हालत को समझता है॥। ४॥ संक्षेपतः सप्ँविधा हि सन्ति नारीनराणां कथिताः कराश्र। आद्यो हि मुख्यो मुनिसम्मतोपि तथा द्वितीयः श्रुंतिकोणयुक: ॥ ५ ॥ स्त्री पुरुपों के हाथ संक्षेप से सात प्रकार के कहे हैं उनमें से पहला मुख्य कहाजाता कि जिसको मुनियों ने माना है उसी प्रकार दूसरा चौकोण कहलाता है॥ ५ ॥ वक्रस्तृतीयो भणितो हि शास्त्रे कोटीस्वरूप: कथितश्चतुर्थः । १ गदिता: शयाश्व्ेत्यपि पाठ:। सामुद्रिकशास्नस्य कोणस्वरूप: शरसंमितश्र ज्यौतिष्यरूपः खलु षष्ठकोयम् ॥ ६ ॥ सामुद्रिकशास्त्र में तीसरा टेढेरूपवाला कहाता है चौथा नोकीला कहलाता है पां कोनीला और छठा ज्यौतिष्यरूप कहा है ॥ ६ ॥ प्रोक्त: पुराणैः खलु सप्तमश्च मिश्रस्वरूपो मिलिताङ्गलीकः। आरक्रवर्णों मृदुतासमेतो सौमांसलो लोमशवृन्दहीनः॥७॥ मिश्रस्वरूप,मिली अँगुलियोंवाला सातत्रां हाथ पुरातन पण्डितों ने कहा है जोकि कुं लालवर् व कोमलतासमेत होकर बड़ा मांसल होता हुआ लोमसमूहों से हीन होताहै॥। १ स्थौल्येन युक्ो दृढतासमेतो वृद्धाङ्गलीको यदि भाति पाणिः। सोयं नरः शूरतरः सुधीरः प्रोक्तो हि मल्ो विदितो घरायाम्॥८॥ यदि मोटा-मज़बूत बड़ी अँगुलीवाला हाथ सोहता हो तो वह माखी बड़ा सूरमा सुधीर होकर धरामएडल में विख्यात होता हुआ मद् (पहलवान) कहलाता है॥ ८ २ गोलाङ्गलीको मनुजस्य यस्य विभाति पाणिर्मृदुतासमेतः। सोयं जनः शुद्धतरस्वभावो भेदस्य वेत्ता खलु गुप्तकस्य ॥ ६॥ जिस मनुष्य का हाथ कोमलता समेत गोल अँगुलीवाला होता है तो वह मा सीधे स्वभाववाला होकर गुप्तभेद का ज्ञाता होता है।। ६ै ।। गोलाङ्गुलीको यदि नास्ति पाणि: पारुष्ययुक्लो मनुजस्तदानीम्। कामी कलावान्कलहेन युक्ो मन्दो मलाढ्यो ममताविहीनः॥ १० यदि गोल अँगुलीवाला हाथ न हो तो वह प्राणी कठोर, कामी, कलावान् व कल तथा मन्द व मलान्य होकर ममता से विहीन होताहै ॥ १० ॥ ३ वकाङ्गुलीको यदि भाति पाणिश्चारक्तवर्णो मलिनः कठोरः। परिश्रमासक्रमना मनुष्यस्त्वारामसक्ो रमया समेतः ॥ ११॥ यदि कुछेक लालवर्ण, मैला, कठोर होकर टेढी अँगुलीवाला हाथ सोहता हो तो भाखी मेहनती, आरामतलव व लक्ष्मीवान होता है । ११ ॥ पांलीस्वरूपो यदि भाति पाणि: प्रीत्यायुतो दिव्यतनुर्दयालुः। नानांशुकालंकरणै: समेतो मानी महौजा मदनातुरश्र ॥ १२ ॥ यदि नोकीला हाथ सोहता हो तो वह प्राखी प्रीतिमान्, दिव्यशरीरी, दयावा अ्रनेक वस्त्र व अप्रलंकारोंवाला, मानी व महावलवान् होकर कामी होताहै॥ १२ ॥ १ कोटिस्वरूप: २ कामातुर: ॥। पूर्वार्धें दितीयाङ्क: 1 कोणस्वरूपो यदि भाति पाषि: प्रसंन्नताहीनव पुर्मनुष्यः। धनाभिलाषी भ्रमतेप्यजसं भ्रान्तो भयार्तो धनतामुपैति॥१३॥ यदि कोनीला हाथ सोहता हो तो वह प्राणी प्सन्नता से हीनतनुवाला होकर धना- मलापी होताहुआ निरन्तर घूमताहै और भ्रान्त व भयार्त होकर धनसमूहोंको पाताहै। १३॥ ज्यौतिष्यरूपो मनुजस्य यस्य विभाति पाणि: खल शुद्धरूपः । सोयं नरः स्यान्निगमागमज्ञः सत्यप्रवक्ा निजदेवभक्कः॥१४॥ जिस पाणी का हाथ शुद्धरूप व ज्यौतिष्य रूपवाला होकर सोहता हो तो वह मनुष्य द व शास्त्र का ज्ञाता व सत्यवक्का होकर अपने इष्टदेव का भक्र होता है ।। १४।। मिश्राङ्गलीको मलताविहीनो विभाति पाणिः: पुरुषस्य यस्य। सोयं मनुष्यो धनतासमेतो विपत्तिमल्पां लभते कदापि॥ १५ ॥ जिस पुरुप का हाथ मलसमूहों से हीन व मिली अँगुलीवाला होकर सोहता हो तो हमाणी धनसमूहोंसे संपन्न होताहुआ किसी समय थोड़ीसी विपदाको पाताहै। १५। नखफलान्याह- लम्वायमानानि तथायतानि संरक्ववर्णानि नखानि यस्य। सोयं जनः स्यात्कविवृन्दमुख्यः सा्वत्सरो वेदविदां वरेरयः॥ १६॥ जिसके नख लम्बे व चौड़े होकर लालवर्णवाले प्रतीत हों तो वह माणी कविसमूहों प्रधान होकर ज्योतिःशास्त्र का ज्ञाता होताहुआ वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ होताहै ॥ १६ ॥ वक्रस्वरूपाणि नखानि सन्ति दीर्घायमाणानि जनस्य यस्य। सोयं नरो वक्रतरस्वभावो वेश्याप्रसक्ो वनिताविहीनः॥१७॥ जिस जन के नख टेढे व लम्बे होकर पतीत हों तो वह माणी टेदेस्वभाववाला व रयागामी होकर रमणी से विहीन होता है।। १७ ।। स्वल्पस्वरूपा मनुजस्य यस्य आपीतवर्णाश्र पुनर्भवाः स्युः। पीला सोयं जनः स्यात्सभिको हि धूर्तों मिथ्याप्रभाषी ममतासमेतः ॥१८॥ नाब जिस मनुष्य के छोटे व पीलेसे नख प्रतीत होते हों तो वह पाणी फड़वाज या दगा- ज, छलछन्दी और भूठा होकर ममतासे सम्पन्न होता है॥ १८ ॥ श्यामायमाना नखरा हि सन्ति क्षुद्रस्वरूपाः पुरुषस्य यस्य। धूर्तस्वभावो मनुजस्तदानीं व्याजेन युक्को विदितो धरायाम् ॥ १ ६ ॥ १ "प्रसादस्तु प्रसन्नता" (इत्यमर:) ॥ जिस पुरुपके नख काले व छोटेसे प्तीत होते हों तो वह मायी धूर्तस्वभाव व होकर पृथ्वीतल में मख्यात होता है।। १६ ।। पुनर्भवाश्चेच्चिपिटा हि यस्य श्यामायमानाः पृथुताविहीनाः। सोयं मनुष्यश्छलतासमेतो निर्लज्रूपो नितरां विलासी॥२०॥। जिसके नख चौड़ाई से विहीन व काले वर्णवाले होकर चपठेसे प्रतीत होतेहं वह पाणी छली व निर्लज्जरूप होकर वड़ाभोगी होता है ॥ २० ॥ लम्बायमानानि तथा सितानि नखानि शुद्धानि भवन्ति यस्य। सोयं नरः स्यादुपकारकारी मान्यो वदान्योऽवनिराजवन्द्यः॥२१ जिसके नख लम्बे, सफ़ेद होकर स्वच्छता से पतीत होते हों तो वह प्राणी उपन मान्य और वदान्य होकर राजाओं से वन्दनीय होता है ॥ २१॥ आरक्वर्णा नखरा यदानीं भवन्ति कार्श्या मनुजस्य यस्य। व्युत्पन्नबुद्धिश्चपलः कृशाङ्गो व्याख्याकरः स्यादुपदेशकारी॥२२ जिस मनुष्य के नख पतले व रक्तवर्णावाले मतीत होतेहों तो वह माणी व्यु बुद्धिवाला व चलते पुर्जेवाला व दुबला होकर व्याख्याकारी होताहुआ उपदे कहाता है॥ २२ ॥। गोलस्वरूपा नखरा हि सन्ति श्वेतेन हीनां मनुजस्य यस्य। चिन्तासमूहेन युतो मनुष्यो धनाभिलाषी भ्रमते भयार्तः ॥२३॥ जिस पुरुष के नख सफ़ेद होकर गोलाकारसे प्रतीत होते हों तो वह मनुष्य चि समूहों से घिराहुआ व धनाभिलाषी होकर डरसे डरताहुआ घूमाकरता है॥ २३॥ नखस्थचिह्नफलमाह- बृद्धाङ्गुलेश्चेन्नखरोपरिस्थ विभाति चिह्नं धवल स्व रुप म् । प्रेमी मनुष्यो रमणीसमेतो धन्यो धरायां धनतामुपैति॥२४॥ यदि अँगूठे के नख पर टिकाहुआ सफ़ेद निशान सोहता हो तो वह प्रायी प्रेमी, दर परायण व धरामएडल में धन्य होकर धनसमूहों को पाता है॥ २४॥ वृद्धाङ्गुलेश्चेन्नखरोपरिस्थं श्यामायमानं यद्दीि ाि िह्य् सोयं जनो मन्दमतिर्महौजा मानेन हीनो ममतां प्रयाति॥ २५॥ १ श्वेतेन युक्का :- सपाटलाभा वेत्यपि पाठः॥ यदि अँगूठे के नखपर टिकाहुआ काला निशान प्रतीत होता हो तो वह प्राखी मन्द- मति, महावलवान् व मानहीन होकर ममताको पाता है॥ २५॥ आद्याङ्गलेश्चेन्न रोपरिस्थं श्वेत्वूपं यदि भाति चिह्रम्। सम्पत्समूहं लभते नितान्तं श्यामे तु चिह्ने धनहानिमेति॥२६॥ यदि तर्जनी अ्रँगुली के नखपर टिका हुआ सफ़ेदसा कोई दाग़ देख पड़ता हो तो वह प्राखणी बड़ी दौलत को पाता है और यदि वह निशान कालासा भासता हो तो वह प्राखणी धनहानि को पाता है॥ २६॥ मध्याङ्गलेश्चेन्नखरोपरिस्थं गौरस्वरूपं यदि भाति चिह्नम। सांयात्रिकःस्यान्मनुजस्तदानीमोकस्मिकं भृत्युमुपैति नीले ॥२७॥ यदि मध्यमा अँगुली के नखपर टिका हुआ सफ़ेद निशान प्रतीत होता हो तो वह प्राणी जहाज़ी होता है और यदि वह निशान काला दीखता हो तो वह मनुष्य अचा- नक मौत को पाता है॥ २७॥ अनामिकाया नखरोपरिस्थं चिह्नं यदानीमवदातरूपम्। कीर्ति च वित्तं लभते नितान्तं श्यामायमाने त्वपकीर्तिमेति॥२८॥ यदि अनामिका अँगुली के नखपर टिका हुआ सफ़ेद दार देख पड़ता हो तो वह प्राणी नामवरी व बड़ी दौलत को पाता है और यदि काला निशान भासता हो तो वह बुराई को पाता है।। २८ ॥ कनिष्ठिकाया नखरोपरिस्थं शुक्कस्वरूपं यदि भाति चिह्रम्। साव्वत्सैरः कीर्तियुतो धनाव्यो व्यापारवृन्दाद्बहुवृद्धिमेति॥२६॥ यदि कनिष्टिका अरँगुली के नखपर टिका हुआ सफ़ेद निशान सोहता हो तो वह पाणी ज्योतिषी, कीर्तिमान्, धनवान होकर व्यापारसमूहों से घनी वृद्धिको पाता है॥२६॥ श्यामायमानं यदि भाति चिह्नं पीतस्वरूपं यदि वा विभाति। सोयं नरो व्याधिपरो नितान्तमल्पे वयस्के मरणं प्रयाति ॥ ३०॥ यदि कनीनिका अँगुली के नख पै काला निशान सोहता हो या पीला निशान-भा- सता हो तो वह पाणी अत्यन्त रोगी बना रहता है और थोड़ीही उमर में मरजाता है ॥३०॥ गुरुस्थानफलसाह- प्रदेशिनीमूलगतं विशुद्धं बृहस्पतेः स्थानमुदाहरन्ति। १ नीले तु मृत्युं सहसा समेति इत्यपि पाठः २ ज्योतिर्वेत्ता ३ व्यापारसमूहादिति॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य समुन्नतं यस्य करे विभाति सुखी सुविद्यो विपयी नरः स्यात्॥३१ तर्जनी अँगुली की मूल में प्राप्त साफ़ सुथरा बृहस्पति का स्थान कहते हैं जिसके हाथ में ऊंचा होकर सोहता हो तो वह पाणी सुखी व विद्वान् होकर विप् होता है।। ३१ ॥ अधोनतं चेन्मनुजस्य यस्य गुरुस्थलं वै विशदं विभाति। महालसी स्यात्पुरुषो धनाशी सुसाहसी काव्यकरो विवादी॥३२ जिस प्राणी के पाखितल में बृहस्पति का स्थान साफ़ नीचा होकर भासता हो वह पुरुप महालसी, सुसाहसी व बहसी होता हुआ धनाशी होकर कविता का कर वाला होता है॥। ३२॥ देवेन्द्रवन्द्यालयगा यदानीमृज्वी सुरेखा विशदा विभाति। सोयं मनुष्यो महतामुपासी सर्वेषु कार्येषु च सिद्धिमेति ॥३३ ॥ यदि बृहस्पति के स्थान में साफ़ सीधीसी रेखा सोहती हो तो वह प्राखी आदमियों का अनुथायी होकर सब कामों में सिद्धिको पाता है॥ ३३ ॥ पूज्यालयस्था विशदा यदानीं क्षुद्राः सुरेखा बहुशो विभान्ति। सोयं नरो धर्मपरो नितान्तं सिद्धिं स्वकार्ये लभते कदापि॥ ३४॥ यदि बृहस्पति के स्थान में टिकी हुई बहुतसी छोटी २ रेखायें सोहती हों तो व पाणी अत्यन्त धर्मपरायख होकर कभी अपने कार्य में सिद्धिको पाता है ॥ ३४ ॥ एका कुरेखा गुरुगा यदानीं पारंगता स्यान्मनुजस्य यस्य। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यो मन्दस्वभावो ममतामुपैति॥३५॥ जिस मनुष्य के करतल में यदि बृहस्पति की जगह में एक छोटीसी रेखा आरपा हो गई हो तो वह प्राणी शीश में चोट चपेट को पाता है और मन्दस्वभाववाला हो हुआ ममता को पाता है। ३५ ।। रक्कस्वरूपा विशदैकरेखा पूज्यालयस्था विरला विभाति।5H वामां मनोज्ञां लभते मनुष्यो धर्मानुयायी धनतासमेतः ॥ ३६॥ बृहस्पति के स्थान में टिकी हुई साफ़ एक रेखा चटकीले रहवाली विरल होक सोहती हो तो वह माखी सुन्दरी रमखी को पाता है और धनसमूहों से संपन्न होते हुए धर्मानुयायी होता है॥ ३६ ॥ देवेशवन्द्यालयगं विशुद्धं तारास्वरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं कुलीनो मनुजो महेच्छो धन्यो धरायां धनदानुगः स्यात्॥३७॥ यदि बृहस्पति के स्थान में प्राप्त साफ़ तारा के समान निशान सोहता हो तो वह प्राणी कुलीन व महाशय होकर धरामएडल में धन्य होता हुआ धनेश (कुबेर) का अनुगामी होता है।। ३७ ।। नार्या यदा चेन्महतां जनानां तारानुरूपं गुरुगं विभाति। सा नष्टकीर्तिर्विधनाभिमाना स्वच्छन्दरूपा विचरेत्नितान्तम् ॥३८ ॥ यदि बड़े लोगों की रमणियों के करतल में तारा के समान निशान बृहस्पति के स्थान में पहुँचकर सोहता हो तो वह नारी कि जिसकी नामवरी जाती रहती है धन व अभिमानभी चला जाता है और जोकि स्वेच्छाचारिणी होकर अत्यन्त विचरती है ॥३८॥ गुर्वालयस्थं विशदस्वरूपं चिह्नं चतुष्कोणयुतं विभाति। वाधाविसुक्को मनुजस्तदानीं सौभाग्यशाली मुखतासमेतः ॥ ३६॥ यदि वृहस्पति के स्थान में साफ़ सुथरा चार कोनोंवाला निशान सोहता हो तो वह ाखी बाधाओं से विमुक् व सौभाग्यशाली होकर सुखसमूहों से संपन्न होता है॥ ३६॥ इज्यालयस्थं विरादस्वरूपं बिन्दुप्रयुक्क यदि भाति चिह्नम। आत्मम्भरिःश्यान्मनुजस्तदानीं नैजे कुटुम्बेत्वपकीर्तिमेति॥ ४०॥ यदि वृहस्पति के स्थान में टिका हुआ साफ़ सुथरा बिन्दु (नुक्ेवाला) निशान सोहता हो तो वह प्राणी पेदू होकर अपने कुटुम्ब में बुराई को पाता है॥ ४० ॥ चिह्नं त्रिकोणं धिषणालयस्थं भिन्नं त्वधोगं यदि दृश्यते चेत। सोयं जनो दीपशलाकिकाव्यो दौर्भाग्यशाली जनतापकारी॥ ४१॥ यदि बृहस्पति के स्थान में टिका हुआ त्रिकोणकार निशान दवा हुआ देखा जाता ो तो वह पाणणी दियासलाई के बनाने से धनाढ्य होकर दौर्भाग्यशाली होता हुआ नसमूहों का अपकारी होता है।। ४१॥ समुन्नतं चेद्धिषणालयस्थं चिह्नं त्रिकोएं विशद विभाति। सोयं नरो मन्त्रिवरो महौजा विख्यातकीतिर्विमलस्वभावः ॥ ४२ ॥ यदि बृह्दस्पति के स्थान में टिकाहुआ साफ़ सुथरा त्रिकोण का निशान ऊंचासा तीत होताहुआ सोहता हो तो वह प्राणणी प्रधानमन्त्री व बलवान् तथा प्रख्यातकार्तिवाला किर अमल स्वभाववाला होता है॥ ४२॥ पूर्वोक्कचिह्नं विशदं विशालं गम्भीररेखं यदि भ्राजमानम्। १ भासमानमिति वा पाउ: । सामुद्रिकशास्त्रस्य गर्वी धनाव्यो मनुजस्तदानीं स्वार्थी सहायी विमना विरोधी॥४३ यदि पूर्वोक्क निशान साफ़ सुथरा, बड़ा व गहरी रेखावाला होकर सोहता हो तो प्राखी गर्वी, धनाढ्य, स्वार्थी, सहायी और विमन होकर विरोधी होता है॥४३॥ आयुष्यरेखाफलमाह- प्रदेशिनीमूलतलाचलन्ती चाकरान्तशुक्रा मणिवन्धमेति। आयुष्यरेखां कथयन्ति सन्तः पैत्रीं सुरेखां प्रवदन्ति केपि॥४४॥ तर्जनी अँगुली के मूलतल से चलती व शुक्रालय को तैं करती हुई मशिबन्ध के पहुँचजावे तो उस रेखाको आयुरेखा कहते हैं और कितेक आचार्य पैत्रीरेखा कहतेहैं॥ ४ एषा सुरेखा विशदा यदानीं छिन्ना न भिन्ना खलु लम्विता चेत्। शुद्धस्वभावो मनुजोऽतिधन्यो जैवातृकः स्याद्विपदाविहीनः॥ ४५ .यह रेखा साफ़ कटी, फटी न होकर यदि लम्बी भासती हो तो वह प्राणी शुद्धस्त्रम वाला व महाधनवान् तथा आयुष्यवान् होकर विपदाओं से विहीन होता है॥ ४५॥ श्यामायमाना वित्तेता विभाति पैत्री सुरेखा पुरुषस्य यस्य। मात्सर्ययुक्ो मनुजो मलाव्यो दौर्जन्यशाली कृशतासमेतः॥४६। जिस पुरुष के हाथ में पैत्री रेखा चौड़ी होकर कालीसी सोहती हो तो वह प्रा डाहयुक् न मलाळ्य होकर दौर्जन्यशाली होता हुआ दुबला बना रहता है।। ४६॥ पैत्री सुरेखा यदि लम्बमाना संरक्तवर्णा विशदा विभाति। सोयं जनः क्रोधयुतो नितान्तं वन्यस्य वुद्धिं भजते बलाव्यः॥ ४७ यदि पैत्रीरेखा लम्बी, साफ़ व लाल वर्णवाली होकर सोहती हो तो वह प्राणी क्रोधी व बलवान् होकर वनेचर की बुद्धि को भजता है॥ ४७ ॥ वप्रस्य रेखा मिलिता जनन्यामन्यासमेता विशदा विभाति। सोयं जनो दुर्बलतासमेतो दान्तस्वभावो दैयितारतश्र ॥४८॥ यदि पैत्रीरेखा मात्रीरेखा में मिलगई हो और अन्य रेखाओं से संयुक् होकर साफ़ सो हो तो वह माखी दुबला व दान्तस्वभाववाला होता हुआ दयिता में रत रहता है।। ४= हस्तद्ये चेन्मनुजस्य यस्य मध्ये विवर्णा यदि भाति पैत्री। आर्जेन्मरोगी मनुजस्तदानीं नीचस्वभावः कृशतामुपैति॥४६॥ १ विस्ती्णी २ दुर्बलत ३ पैत्रीरेखा ४ प्रियासक्ः ५ जन्मपर्यन्तमिति यावत्॥ जिस मनुष्य के दोनों हाथों के बीच में यदि पैत्रीरेखा फीके रंगवाली होकर सोहती हो तो वह भराणणी जन्मपर्यन्त बीमार बना रहता है और नीचस्वभाववाला होकर दुर्बलता को पाता है।। ४३ ॥ गुर्वालयाच्चेच्चलिता सुपैत्री चाक्रम्य शुक्रं मणिबन्धमेति। सोयं कुलीनो धनतासमेतश्चातुर्ययुक्कश्चपलस्वभावः॥५०॥ यदि बृहस्पति के स्थान से चली हुई पैत्रीरेखा शुक्रालय को तै करती मणिबन्ध (कब्ज़ें) के पास पहुँच जावे तो वह माणी कुलीन, धनवान् व चतुर होकर चश्चलस्व- भाववाला होता है॥ ५० ॥ वप्रोपरिस्था विशदस्वरूपा भौमी सुरेखा पुरुषस्य यस्य। व्यापद्विहीनो मनुजस्त्वरोगी संपत्तिशाली सुखतामुपैति।।५१॥ जिस पुरुप की पैत्रीरेखा के ऊपर टिकी हुई साफ़ सुथरी महल की रेखा म्रतीयमान होती हो तो वह पाणणी विपदाओं से विहीन व नीरोगी होकर सम्पत्तिशाली होता हुआ मुखसमूहों को पाता है।। ५१॥ पैत्रीसुमध्याच्चलिता यदानीं शुक्रोचगा चेद्िशदा विभाति। सोयं जनो गच्छति सर्वदेशं सौभाग्यशाली सरलस्वभावः ॥ ५ू२॥ यदि पैत्रीरेखा के मध्यभाग से चली हुई साफ़ सुथरी रेखा शुक्रालय के ऊपर सो- ती हो तो वह माणी सब मुल्कों की सफ़र करता है और सौभाग्यशाली होकर सीधे वंभाववाला होता है॥ ५२॥ पैत्रीसमुत्था सरलैकरेखा देवेन्द्रवन्द्योपरिगा विभाति। सोयं नरः कीर्तियुतः सुविद्यः सर्वार्थसिद्धिं लभते धनाव्यः॥५३॥ यदि पैत्रीरेखा से उठी हुई सीधी एक रेखा बृहस्पतिस्थान के ऊपर सोहती हो तो वह णी यशस्वी, विद्वान् व धनवानु होकर सर्वार्थसिद्धि को पाता है ॥ ५३॥ पैत्रीसमुत्था यदि भाग्यरेखा मन्दालयं याति विशुद्धरूपा। सोयं जनो ग्रामधनादियुक्ो भूम्यश्वयानादिभिरावृतः स्यात्॥५४।। यदि पैत्रीरेखां से उठी हुई भाग्यरेखा साफ़ सुथरी होकर शन्यालयपर्यन्त चली वे तो वह पराणी गांव, धन आदिकों से संयुक्र होता हुआ ज़मीन, घोड़ा व याड़ी आदि वारियों से घिरा रहता है॥ ५४ ॥ सामुद्िकशास्नस्य आ्ररम्भदेशे मिलिता यदानी चित्तादि रेखा निखिला विभान्ति। रोगाभिभूतो मनुजस्तदानीमाकस्मिकं मृत्युसुपैति नूनम्॥ ५५॥ यदि आ्ररम्मदेश में सौभाग्य आदि सारी रेखायें आपसमें मिली हुई सोहती है तो वह पाणी वीमार रहता हुआ अवश्य ही एकाएकी मौत को पाता है॥ ५५॥ बृद्धाङ्गुलेवैं निकटाच्चलन्ती पैत्री सुरेखा रविजं प्रयाति। सन्तानहीनो मनुजस्तदानीं संतापशाली सुखतावियुक्ः॥ ५६। यदि अँगूठे के समीपवर्ती देशसे चलती हुई पैत्री रखा शन्यालयपर्यन्त चली जावे वह पाखी सन्तानरहित होकर संतापशाली होता हुआ सुखता से विहीन बना रहता है॥।५६ सौम्यालयाच्चेच्दलिता यदानीं रेखा गभीरा गुरुगा विभाति। सौभाग्यरेखां प्रवदन्ति सन्तश्वित्तस्य रेखां कथयन्ति केपि॥ ५७॥ यदि वुधालय से चली हुई रेखा गहरी व गुरुगेहगामिनी होकर सोहती हो तो उसे विद्वानों ने सौभान्यरेखा कहा है और कितेक आचार्य चित्त की रेखा कहते है॥ ५७॥ एषा सुरेखा विशदा यदानीं विस्तीर्णरूपा धिषएं प्रयाति। वित्ताभिलापी मनुजोतिलुब्ध: स्वार्थी सुशंकी भ्रमतेऽप्यजस्रम्॥५द यह सौभाग्यरेखा साफ़ सुथरी व चौड़ी होकर बृहस्पति के स्थान को चली जा तो वह मासणी घनाभिलाी व अतिलोभी तथा मतलवी होकर बड़ी शङ्का करता हुआ हमेशा घूपता है॥ ५८ ॥ सौभाग्यरेखा विशदा यदानीं पीतस्वरूपा गुरुगा विभाति। सोयं नरो धूर्ततरस्वभावो दौर्भाग्यशाली प्रथितो धरायाम्॥५६॥ यदि सौभाग्यरेखा साफ़ व पीली होकर गुरुगेह को माप्त हुई सोहती हो तो वह माएं घूर्तस्वभाववाला व दौर्भाग्यशाली होता हुआ पृथ्वीमएडल में मख्यात होता है॥ ५६॥ आपीतवर्ण यदि चित्तरेखा गम्भीररूपा गुरुगेहमेति। सोयं मनोव्याधियुतो मनुष्यो रोगाभिभूतो रमयाविहीनः ॥ ६० ॥ यदि चित्त की रेखा (हार्टलाइन) कुछेक पीली व गहरी होकर बृह्स्पति के स्थान १ आयुम्यरेखामिति वा पाठ:।। को पहुँच जावे तो वह प्राशणी मानसीव्याधि से संयुक्त व रोगी होकर लक्ष्मी से विह्दीन होता है॥। ६० ।। स्वान्तस्य रेखा किल रक्तवर्णा गुर्वालयस्था मनुजस्य यस्य। दौर्जन्यहीनोऽधमताविहीनः सौभाग्यशाली सुखतामुपैति॥ ६१॥ जिस प्राी के करतल में सौभाग्यरेखा लालवर्णवाली होकर बृहस्पति के स्थान में टिकी हुई सोहती हो तो वह प्राणी दुर्जनता व अधमता से विहीन होकर सौभाग्यशाली होता हुआ सुखता को पाता है॥ ६१ ॥ सूर्यालयाच्चेच्छनिगेहतो वा चित्तस्य रेखा चलिता यदानीम्। आजन्मरोगी मनुजस्तदानीं जीवेच्छइृत्या भयतासमेतः ॥ ६२॥। यदि सूर्यालय या शन्यालय से चली हुई चित्त की रेखा (हार्टलाइन) सोहती हो तो वह माणी जन्मपर्यन्त रोगी बना रहता है और डरता हुआ श्वद्टत्ति से जीता है॥६२।। सौभाग्यरेखा यदि सर्वदेशे छिन्ना विभिन्ना गुरुगेहगा चेत। भार्यावियुक्को मनुजस्तदानीमप्रीतिकारी धनतापहारी॥ ६३॥ यदि सौभाग्यरेखा सर्व देश में कटी-फटी हुई कृहस्पति के स्थान में पहुँच गई होता है॥ ६३ ॥ हो तो वह पराणी भार्या से वियुक् व अपीतिकारी होकर धनलमूहों का विनाशक शाखाद्वयेनापि युता यदानीमेका गुरुस्था शनिगाऽपरा चेतू। रामासमेतः पुरुषस्तदानीमानन्दयुक्को रमते रसायाम्॥ ६४॥ यदि सौभाग्यरेखा दो शाखाओं से संयुक्त हो उन्होंमें से एक शाखा वृहस्पति के स्थान में गई हो और दूसरी शाखा शनैश्वर के स्थान में पहुँची हो तो वह म खी पृन्दरी समेत व आनन्दयुक्त होता हुआ पृथ्वी में रमता है।। ६४ ।। शाखाविहीना विशदा यदानीं गम्भीररूपा गुरुगा विभाति। दौर्भाग्यशाली विधनो मनुष्यो दारिद्र्ययुक्को भ्रमते भयार्तः ॥ ६५ ॥ यदि सौभाग्यरेखा साफ़ सुथरी व गहरी होकर गुरुस्थान में पहुँची हुई सहनी ह। तो वह पाखी दौर्भाग्यशाली, अधनी व दरिद्री होकर डरता हुआ छूमता है॥ ६५॥ मन्दालये चेन्मनुजस्य पाणौ सौभाग्यमात्र्यौ मिलिते यदानीय्। नानार्तियुक्को मनुजस्तदानीमाकस्मिकं मृत्यमुपैति नूनम् ॥ ६६ ॥ जिस पाणी के पाशितल में शनश्वर के स्थान में सौभाग्यरेखा और मातृरेखा कि हुई प्रतीत होवें तो वह मनुष्य नानाव्याधियों से संयुक्त होताहुआ निश्चयकर एका मौतको पाता है॥ ६६ । मातरेखाफलमाह- iead lne चन्द्रालय।चेचलिता सुरेखा गंभीररूपा पितरं प्रयाति। v तां शीर्षरेखां कवयो वदन्ति मात्रीं तु रेखां प्रवदन्ति केपि॥ ६७ चन्द्रालय से चलीहुई रेखा गहरी होकर पैत्रीरेखा के पास पहुँचजावे तो कवियोंने शीर्षरखा (हाडलाइन) कहाहै और कितेक आचार्य मातरेखा कहते हैं॥६७॥ एषा सुरेखा यदि नास्ति भिन्ना शाखाविहीना विशदा विभाति। सोयं नरो बुद्धिवरो वलाढ्यो विख्यातकीर्तिर्विदितो धरायाम्॥ ६ यदि यह 'मातरेखा' कटी फटी न हो व शाखाओं से हीन होकर उज्जवल रूप सोहती हो तो वह पारी बुद्धिमान् व बलवान् व बड़ी नामवरीवाला होकर धरामए में मसिद्ध होता है॥। ६ ८ ।। मात्री सुरेखा यदि पीतवर्णा विस्तीर्ण रूपा जनकान्तिके चेत्॥। सोयं जनः स्यात्कृशतासमेतः स्मृत्या विहीन: सरलस्वभावः॥६६ यदि मातरेखा पीली व चौड़ी होकर पैत्रीरेखा के पास सोहती हो तो वह मा दुबला व स्मरणशक्ति से रहित होताहुआ सीधे स्वभाववाला कहाता है॥ ६६ ॥ शीर्षस्य रेखा कृशगा यदानीं लम्बायमाना मनुजस्य पाणौ। सोयं नरः स्यात्सभिको हि धूर्तो नाज्ञाकर: कर्मकरः कृशाङ्ग:॥७० जिस मनुष्य के करतल में मातृरेखा पतली व लम्बी होकर सोहती हो तो वह म फड़वाज़ या दग़ाबाज़, छलबन्दी, कार्यकारीव दुबला होकर आज्ञाकारी नहीं होता है।।S विस्तीर्ण रूपा यदि मातृरेखा श्यामायमाना पुरुषस्य यस्य। सोयं जनो वै जठरस्य रोगं प्रामोति नित्यं सुखताविहीनः॥ ७१ ॥ वैचक जिस पुरुपके पाखितल में यदि मातरेखा चौड़ी व काली होकर सोहती हो को भाणी सुखसमूहों से हीन रहतांहुआ इमेशा पेटकी बीमारीको पाताहै ॥ ७१॥ मात: सुरेखोपरिंगं विशुद्धं संरक्तवर्णं यदि भाति चिह्नम । पूर्वारद्धें द्वितीयाङ्कः। शीर्षाभिघातं लभते मनुष्यो गौरे तु वैद्यो विदितो धरायाम् ॥ ७२॥ यंदि मातुरेखा के ऊपरले भाग में माप्तहुआ निशान साफ़ सुथरा व लालवर्णवाला होकर सोहता हो तो वह भाणी शीश में चोट चपेट को पाता है और यदि पूर्वोक निशान सफ़ेद होकर प्रतीत हो तो वह वैद्य-डाक्टर या हक्ीम होताहुआ पृथ्वीमएडल में पख्यात होता है।। ७२ ॥ ऊर्ध्वरेखाफलमाह- रेखा चलन्ती मणिवन्धदेशान्मध्याङ्गलिं याति गभीररूपा। तामूर्ध्वरखां प्रवदन्ति सन्तो वित्तस्य रेखां कथयन्ति केपि॥७३॥ मणिबन्ध देश से चलती हुई रेखा गहरी होकर मध्यमा अँगुली के पास जाती है तो उसको विद्वान् लोग ऊर्ध्जरेखा कहते हैं और कितेक आचार्य दौलत की रेखा बतलाते हैं ।। ७३ ॥ भाग्यस्य रेखा मणिबन्धदेशाद्गम्भीररूपा यदि याति मन्दम्। सोयं धनाव्यो मनुजो मनीषी संपत्तिशाली सुखतामुपैति॥७४॥ मशिबन्ध (कब्ज़े) से चली हुई यह भाग्यरखा गहरी होकर यदि शन्यालय पर्यन्त चलीजावे तो वह पाणी धनवान, बुद्धिमान् व सम्पत्तिशाली होकर सुखसमूहं को पाता है।। ७४॥ आक्रम्य चन्द्रं यदि भाग्यरेखा मन्दालयं याति विशुद्धरूपा। सोयं जनो मध्यघनो हि लोके लावराययुकां ललनामुपैति॥७५ ॥ यदि विशुद्धरूपवाली भाग्यरेखा चन्द्रालय को आ्रक्रंमण कर मन्दालय पर्यन्त चली जाती है तो वह माणी लोक में मध्यम धनवाला होकर सुन्दरतासंपन्न सुन्दरी को पाता है। ७५॥ पैत्रीसमृत्था यदि भाग्यरेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। नैजात्कुटुम्बात्मुखतां समेत्य संपत्तिशाली सरलस्वभावः॥ ७६ ।। यदि पैत्रीरेखा से उठी हुई भाग्यरेखा गहरी व साफ़ होकर सोहती हो तो वह माणी अपने कुटुम्ब से सुखसमूहों को पाकर संपत्तिशाली होता हुआ सीधे स्वभाववाला कहलाता है॥ ७६.॥ भाग्यस्य रेखा विशदा यदानीं देवेन्द्रवन्द्यालयगा विभाति। सामुदिकशास्त्रस्य सोयं नरो नीतिपरो नराणां सर्वाधिकारी प्रभुतासमेतः॥७७॥ यदि भाग्यरेखा साफ़ सुधरी होकर बृहस्पति के स्थान में पहुँची हुई सोहती हो तो वह पराणी नरों के मध्य में नीतिपरायण होकर सर्वाधिकारी होता हुआ भभुता संपन्न होता है।। ७७॥ भौमात्समुत्था यदि भाग्यरेखा मध्याङ्गुलिं याति विशुद्धरूपा। भाग्येन हीनो मनुजस्तदानीं कार्ये समस्ते न हि सिद्धिमेति॥७८ भौमालय से उठी हुई भाग्यरेखा साफ़ सुथरी होकर यदि मध्यमा अँगुलीपर्यन्त चली जावे तो वह माणी भाग्यहीन होता हुआ सम्पूर्ण कार्यों में सिद्धिको नहीं पाताहै ।७: प्रारम्भदेशे वृजिना विभाति प्रान्ते तु भाग्या सरला यदानीय। महादरिद्रोपि भवेद्धनाढ्यो वृद्धे वयस्के सुखतामुपैति॥७६॥ यदि प्रारम्भदेश में भाग्यरेखा टेढी हो और आखिरी में सीधी होकर भसती हो तो वा प्राखी महादरिद्री हो तो भी धनवान् होता हुआ दृद्धावस्था में सुखसमूहों को पाताहै॥७६। आरम्भदेशे सरला च रक्ना भिनत्ति भाग्या यदि चित्तरेखाम्। सोयं जन: स्याचरमे वयस्के सौभाग्यशाली घनतामुपैति॥०॥ यदि आरम्भदेश में सीधी व लालवर्णवाली भाग्यरेखा चित्तरेखा (सौभाग्यरेखा) को भेदती है तो वह पाणणी आखिरी अवस्था में सौभाग्यशाली होता हुआ धनता को पाता है॥ ८० ॥ नो भाति पाणौ मनुजस्य यस्य भाग्यस्य रेखा विशदा यदानीम्। सोयं नरः स्याद्बलवीर्यहीनो दीनो धरायां न तु मांसभक्षी।। ८१॥ जिस मनुष्य के पाणितल में यदि भाग्यरेखा साफ़ सुथरी होकर नहीं सोहती हो नो वह पाणगी वल व वीर्य से हीन होता हुआ पृथ्वीमएडल में दीन बना रहता है परन मांस को नहीं खाता है।। =१ ॥ सूर्यरेखाफलमाह- चन्द्रारगेहात्खलु भाग्यतो वा रखा यदैका दिनपं प्रयाति। तां मूर्यरेखां कथयन्ति सन्तो ह्यप्नो सुरूपां प्रवदन्ति चान्ये।। =२॥। चन्द्रमा व मह्ल के घरसे या भाग्यरेखा से उठीहुई एक रेखा जब सूर्य के पास जानी तो उसको विद्वान्लोग सूर्यरेखा कहते हैं और आचार्यलोग (अप्ोलाइन ) हते हैं ॥ =२ ।। एपा सुरेखा विशदा यदानीं विभाति पाणौ पुरुषस्य यस्य। सोयं जन:स्यान्निपुणो Sतिविज्ञो विख्यातकीर्तिर्विदितो धरायाम्॥=३॥ जिस पुरुपके पाशितल में यह सूर्यकी रेखा साफ़ सुथरी होकर यदि सोहती हो तो वह शी निपुणा, अतिविज्ञ व बड़ी नामवरीवाला होकर धरामएडल में प्रसिद्ध होता है॥।=३।। भाग्यात्समुत्था दिनपस्य रेखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। सोयं मनुष्यो हि महायशस्वी विद्वान्धनाव्यो गणितागमज्ः ॥८४॥ यदि भाग्यरेखा से उठीह्ुई सूर्यकी रेखा गहरी व साफ़ सुथरी होकर सोहती हो तो माणी बड़ायशस्द्री, विद्वान् और धनवान् होताहुआ गणितशास्त्र का ज्ञाता होताहै॥।=४।। भौमात्समुत्था तपनस्य रेखा रक्ता विशुद्धा यदि भाति पाणौ। सोयं महौजा मनुजो मनस्वी नैजाद्गुणात्संलभते हि वित्तम् ॥ ८५॥ यदि भौमरेखा से उठीहुई सूर्य की रेखा लाल व साफ़ होकर हाथ में सोहती हो वह पाणी बलवान् व मनमौजी होकर अपने गुण से धन को पाता है।। ८५॥। शैर्षीसमुत्था सवितुः सुरेखा विद्योतते चेत्पुरुषस्य पाणौ। सोयं धनाढ्यो मनुजो हिलोके विख्यातकीर्तिःकृषिकारक:स्यात॥=६॥ यदि शैपीरेखा (मातूरेखा) से उठीहुई सूर्यकी रेखा जिस पुरुपके पाखितलमें सोहती तो वह माणो लोकमें धनवान व विरूयातकीर्तिवाला होकर खेती किसानीका करने ता होता है॥ =६ ॥ वकाङ्गले पाणितले गभी रे ऋज्वी सुरेखा दिनपस्य भाति। सोयं मनुष्यः सकले स्वकार्ये नामोति सिद्धिं सरलस्व्रभावः॥८७॥ यदि ठेढी अँगुलीवाले गहरे पाशितल में सीधी सूर्यकी रेखा सोहती हो तो वह प्राणी मे स्वभाववाला होकर सारे अपने कामों में सिद्धि को नहीं पाता है॥।=७ ।। व्रघ्नस्य रेखा यदि द्वित्रिशाखा गम्भीररूपा विशदा विभाति। नाना सुकार्य कुरुते मनुष्यो नामोति सिद्धिं चरमे च कार्ये।। दद॥ यदि सूर्यकी रेखा दो तीन शाखाओवाली व साफ़ सुथरी होकर चटकीले रंगवाली सामुद्रिकशास्त्रस्य प्रतीयमान होती हो तो वहं प्राणणी अनेकानेक कार्यों को करता है परन्तु आखि्रिरी कार्य सिद्धि को नहीं पाता है।। ८८ ॥ सूर्यस्य रेखोपरिंगं विशुद्धं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। सोयं मनुष्यः सरलस्वभावः सख्युः सकाशाल्लभते हि वित्तम् ॥ ८६ यदि सूर्यकी रेखा के ऊपर विराजमान साफ़ सुथरा तारा के समान निशान सोहत हो; तो वहवमासी सीधे स्वभाववाला होकर मित्र के द्वारा धन को पाता है।। =६॥ चित्तार्कयोगे यदि बिन्दुरूपं श्यामायमानं विशदं विभाति। नेत्रामयं वै लभते मनुष्यो हस्तदये चेजनुपान्धकः स्यात्॥६० ॥ चित्तरेखा (हार्टलाइन) और सूर्यरेखा (अप्लोलाइन) के योगमें काल। व साफ़ होकर बिन्दुरूपवाला निशान यदि प्रकाशमान होता हो तो वह माणी नेत्ररोग को पाता है और यदि दोनों हाथों में पूर्वोक़ निशान भासता हो तो वह माणी जन्म ही से अन्या होजाता है॥। ६० ॥ वलरेखाफलमाह- : रेखाचलन्ती मिबन्धदेशात्संयुज्य पैत्रीं यदि सौम्यमेति। वीर्यस्य रेखां प्रवदन्ति तज्ज्ञा हैप्टिक्यरूपां कथयन्ति चान्ये।। ६?। यदि मिबन्धदेश से चली हुई रेखा पैत्रीरखा से मिलकर वुधालयपर्यन्त चली जावे तो उसे व्रिद्वानलोग वीर्यरेखा कहते हैं और कितेक आचार्य (हिप्टिकलाइन) कहते हैं ।। ६ १ ।। एपा. सुरेखा पुरुषस्य पाणौ संरक्तवर्णा विशदा विभाति। सोयं मनुष्यो बलतासमेतस्त्वारामसक्: सुखतां प्रयाति ॥६२॥ जिस पुरुष के पाशितल में यह वीर्यरेखा साफ़ सुथरी होकर लालवर्णवाली पतीन होवे तो वह पाणणी बलसमूहों से संपत्र होता हुआ आरामतलब होकर अनेक सुखा को पाता है॥। ६२ ।। आरम्भदेशे मिलिता सुपैत्रयां वीर्यस्य रेखा धवला विभाति। सोयं मनो व्याधियुतो मनुष्यो दौर्वल्ययुक्को दयितारतश्र॥ ६३ ॥ यदि आरम्भदेश में वीर्यरेखा पैत्रीरेखा से मिलाप करती हुई उजली होकर सोहती हो तो वह मागी मानसीव्याधि से पीड़ित व दुबला होकर प्यारी में परायय बना रहता है।। ६३ H. श्यामायमाना यदि वीर्यरेखा विद्योतते चेन्मनुजस्य पाणौ। सोयं जनो व्याधियुतो नितान्तं वृद्धे वयस्के विपदामुपैति॥६४॥ जिस मनुष्य के पाशितल में यदि वीर्य रेखा काली होकर सोहती हो तो वह पाणी इमेशा रोगी होता हुआ वृद्धावस्था में विपदा को पाता है।। ६४ ॥। एषा सुरेखा विशदा गभीरा संरक्तवर्णा यदि भाति पूर्णा। गर्वी गुणाव्यो मनुजस्तदानीं व्यापारयुक्ो व्ययतासमेतः ॥ ६५ ॥ यह वीर्यरेखा साफ़ सुथरी, गहरी व लालवर्णवाली होकर यदि पूर्णरूप से सोहती हो तो वह प्रायी गर्वीला, गुणी व व्यापारी होकर खर्चीला होता है।। ६५ ॥ एपोर्ध्वशाखा यदि चैकशाखा संस्पृश्य शैषी कुरुते त्रिकोणम्। सोयं मुकीर्तिः सुखतासमेतः सौन्दर्यशाली लभते धनौघम्॥६६ ॥ यह वीर्यरेखा ऊपरले भाग में शाखावाली हो और यदि एक शाखा मात्रीरेखा को छ्कर त्रिकोणकार निशान को बनाती हो तो वह प्राणणी वड़े नामवाला व सुखसमूहों से संपन्न होता हुआ सौन्दर्यशाली होकर घने धन को पाता है ।। ६६ ।। संस्पृश्य शैपी तु तथा च भाग्यामेषा सुरेखा कुरुते त्रिकोणम्। सोयं जनो भाविफलस्य वक्का चाकृष्टशक्कि समवैति नूनम् ॥ ६७॥ यह वीर्यरेखा मातृरेखा तथा भाग्यरेखा (फेटलाइन) को छूकर त्रिकोणकार निशान को बनाती हो तो वह प्राणी भविष्यद्वक्क होता हुआ मिसमेरेजम को निश्चयकर जानता है।। ६७।। एषा सुरेखा विनता यदानीं छिन्ना न भिन्ना शशिनं समेति। दौर्वल्ययुक्नो मनुजस्तदानीं धातुक्षयं वै लभतेप्यजस्रम् ॥ ६८ ॥ यह वीर्यरेखा लची हुई कटी फटी न होकर यदि चन्द्रालय को चली जावे तो वह प्राणणी दुवला होकर हमेशा धातुक्षीखता को पाता है॥ ६८ ॥ वेलास्किवरेखाफलमाह- भाग्यासमाना विशदस्वरूपा रेखा यदैका समुपैति सौम्यम्। वेलास्किवाख्यां प्रवदन्ति तां वै महानुभावा वदतां वरेरायाः ॥६ह ।। यदि भाग्यरेखा के बरावर साफ़ सुथरी एक रेखा वुधालय पर्यन्त चली जातरे तो उसे महानुभाव बोलनेवालों में मुखिया विद्वान लोग वेलास्किध कहते हैं । ६६ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य काव्यालयाचेच्चलिता सुरेखा वक्रस्वरूपा यदि याति चान्दिरिम्। चौर्ये प्रवृत्तो मनुजस्तदानीं हत्याप्रकाएडैः सहितो नराणाम्॥ १०० यदि शुक्रालय से चली हुई वेलास्किव रेखा टेढ़ी होकर बुधालय पर्यन्त चली जावे े वह प्राखी चोरी करने का आदी होता हुआ मनुष्यों के बीचमें हत्यारा होता है॥ १०० एषा मुरेखा ऋजुतासमेता सौम्यालयं याति गभीररूपा। सौभाग्यशाली मनुजो मनीषी विख्यातकीतिर्विदितो धरायाम्॥ १ यह वेलास्किव रेखा सीधी व गहरी होकर वुधालय पर्यन्त चली जावे तो वह मार्ए सौभाग्यशाली, विद्वान् व विख्यातकीर्तिवाला होकर धरामएडल में प्रसिद्ध होता है॥? गर्डलरेखाफलमाह- रेखा चलन्ती शशिसूनुगेहाद्गोलार्धरूपा घिषएं प्रयाति। तां गर्डलाख्यां कवयो वदन्ति वृत्तार्धरूपां प्रवदन्ति चान्ये॥ २॥ यदि वुधालय से चली हुई रेखा गोलार्धरूप होकर बृहस्पति के स्थान में चलीजा तो उसे कविलोग 'गर्डल' कहते हैं और अन्याचार्य 'वृत्तार्धरूप' चतलाते हैं ॥२॥ एषा सुरेखा विशदा सरका चिन्ना न भिन्ना यदि भाति पाणौ। सोयं नरस्तूचपदाधिकारी सौन्दर्यशाली मुखतामुपैति॥३॥ यदि पाणितल में यह 'गर्डलरेखा' साफ़ सुथरी व लालवर्णवाली होकर क्ट फटी न होती हुई सोहती हो तो वह प्राणी ऊंचेपदका अधिकारी होताहुआ सौन्दर्यशाल होकर सुखसमूहों को पाता है।। ३ ॥ श्यामा च पीता खलु घूसरा वा छिन्ना च भिन्ना यदि भाति चैपा। सोयं बलिष्ठे हि पदाधिकारी स्वार्थी सहायी लभते धनौघम्॥४॥ यदि यह पूर्वोक् रेखा काली, पीली व भूरी होकर कटी फटी होतीहुई सोहती हो को वह पाणी बड़ावली, पदाधिकारी, मतलवी व सहायी होकर घने धनको पाता है॥४॥ मन्दालयाच्चेच्चलिता यदानीं वृत्तार्धरूपा समुपैति सौम्यम्। सोयं जनो धूर्ततरो हि दम्भी मिथ्याप्रभाषी मदनातुरश्च॥। ५ ॥ मन्दालय से चलीहुई गोलार्धरूप रेखा यदि वुधालय पर्यन्त चलीजावे तो. वह माखी बढ़ाधूर्त, छली व झूंठा होकर कामी होता है॥ ५ ॥ एपा सुरेखा विशदा यदानीं व्रध्नेन भिन्ना शशिजं समेति। सोयं मनुष्यो व्यभिचारयुक्को दुष्टस्वभावो धनतामुपैति॥ ६॥ यदि पाशितल में यह पूर्वोक रखा साफ़ सुथरी होकर सूर्य की रेखा से कटी फटी हुई वुधालय पर्यन्त चली जावे तो वह भाणी व्यभिचारी व बुरे स्वभाववाला होता हुआ धनसमूह्ों को पाता है॥ ६ ॥ क्षुद्राविभिन्ना यदि गर्डलाख्या काव्येन्दुरेखे विशदे विभातः। सोयं ह्यपस्मारयुतो मनुष्यो मान्यो वदान्यो ममताविहीनः॥।७॥ यदि गर्डलाख्या रेखा छोटी छोटी रेखाओं से भिन्नहुई प्रतीत होती हो और यदि शुक्र व चन्द्रमा की रेखायें साफ़ सुथरी होकर सोहती हों तो वह पाखी मिरगी रोगवाला होकर मान्य व बदान्य होकर ममता से विहीन रहता है।। ७॥ एपा विशुद्धा यदि भाति पाणौ चारक्तवर्णा पुरुषस्य यस्य। सोयं सुकीर्तिर्मनुजो धनाव्यो नान्दीकरो नीतिपरो नितान्तम्॥८॥ जिस पुरुपके पाशितल में यह 'गर्डलाख्या' रेखा साफ़ सुथरी व कुछेक लालवर्ण वाली होकर यदि सोहती हो तो वह प्राणी बड़ी कीर्तिवाला व धनवान् होकर नान्दी, वादी व बड़ा नीतिपरायण होता है।। ८ ॥ आध्यापिकीवृत्तिपराः प्रवीण: संपादका ये किल पत्रकाणम। तेषां हि पाणावियमेव भाति रेखा गभीरा विशदा सदैव ॥। ६॥ जो लोग पढ़ाने की जीविका करते हैं व जो प्रवीण हैं और जो अखवारों के संपा- दक हैं उन्हीं लोगों के पाशितल में यह पूर्तोक रेखा साफ़ सुथरी व गहरी होकर सदैव सोहती है।। ६ ।। नार्या यदा पाणितले विभाति रेखा विशुद्धा वितता हि यस्याः। भूतादिबाधापरिपीडिताङ्गा सांगीतरका प्रमदा तदा स्यात् ॥ १०॥ जिस नारी के पाशितल में गर्डलाख्या रेखा साफ़ सुथरी व चौड़ी होकर यदि सोहती हो तो वह रमणी भृत-प्रेत आदि की वाधाओं से पीड़ित अङ्गवाली व गानेवाली होती है॥ १० ।। १ आशीर्वचनसं युक्का स्तुतिर्यस्मात्मव्नर्तते। देवद्विजनपादीनां तस्मान्नान्दीति कीर्त्यते (इति भरत:) ॥। सामद्विकशास्त्रस्य मणिबन्धस्थरेखाफलमाह- तिस्रो हि रेखा मणिबन्धदेशे वित्तस्य चाद्या गदिता सुधीभिः। प्रोक़ा द्वितीयाखिलशास्त्रकाणामेवं तृतीया भणिता हि भक्के: ॥ ११॥ मणिबन्धदेश (करब्ज़े) में तीन रेखायें तिरीछो होती हैं उन्होंमें से पहली रेखे धनकी पणिडतों ने कही है, दूसरी शास्त्रों की रेखा और तीसरी भक्ति की रख कहलाती है। ११॥ मतान्तरमाह- रेखांश्चतस्रो मणिबन्धदेशे द्रव्यस्य मुख्या द्वितयी च शास्त्री। भक्केस्तृतीया भणिता बुधेन्द्रैर्दारिद्र्ययुक्का श्रतिसंमिता स्यात् ॥१२॥ मशिवन्ध देश में तिरीछी चार रेखायें होती हैं उन्होंमें से पहली धन की रेखा है और दूसरी शास्त्री रेखा कहाती है व तीसरी भक्ति की रेखा पलिडतों ने कही है औौ चौथी दरिद्र की रेखा कहलाती है ॥ १२ ॥ पुनरप्याह- हेल्थस्वरूपा प्रथमा हि रेखा प्रोक्का द्वितीया किल वेल्थरूपा। प्रास्पेरिटी वै भणिता तृतीया रेखा कवीन्द्र्वुधसंमता च॥ १३॥ पहुँचे में पहली आरोग्य की रेखा होती है व दूसरी धन दौलत की कहलाती है श्र तीसरी बढ़ती की रेखा कबीन्द्रों ने कही है कि जिसको पलडितों ने माना है॥ १३॥ एतास्तु तिस्रो मणिबन्धदेशे गम्भीररूपा विशदा विभान्ति। सोयं बलिष्ठो मनुजो धनाढ्यो गभीरुद्धिर्विदितो धरायाम् ॥१४॥ जिसके पहुँचे ( कब्ज़े) में ये तीनों रेखायें गहरी व साफ़ सुथरी होकर यदि सोहनी हों तो वह पाणी वलवान् व धनवान् होता हुआ गम्भीर बुद्धिवाला होकर पृथ्वीमएडल में मसिद्ध होता है ॥। १४ ।। आद्या तु रेखा मिलिता यदानीं विद्योतते चेत्खलु स्वल्परूपा। यत्नेन जीवेन्मनुजस्तदानीमुद्धिग्नचित्तो भ्रमतेप्यजस्रम् ॥ १५ ॥ यदि पहली रेखा कम या ज़्याद: जुड़ी हो और छोटे रूपवाली होकर प्रतीत होवे के वह माखी बड़े उपाय से जीता है और उद्विग्न चित्तवाला होकर हमेशा घूमा करताहै।।११॥ १ पहुँचे रेखा पकधन, डिवये पािडत जान । तोन सुरेखा भकतर, चार दरिद्र वसान। ओरोग्यरेखा मणिबन्धदेशे गम्भीररूपा यदि भाति भिन्ना। दौर्भाग्ययुक्को मनुजस्तदानीमल्पं च वित्तं लभते कदापि॥ १६ ॥ यदि पहुँचे में आरोग्य वा धनकी रेखा गहरी व भिन्न होकर सोहती हो तो वह पाणी र्भाग्यशाली होकर कभी थोड़े धन को पाता है ॥ १६-।। रेखात्रयीणां यदि मध्यदेशे चिह्नं त्रिकोएं विशदं विभाति। सोयं जनो हृष्टमना महौजा वृद्धे वयस्के सुखतामुपैति॥१७॥ यदि पहुँचे में टिकीहुई तीनरेखाओं के बिचले देश में साफ़ सुथरा होकर त्रिकोण का शान सोहता हो तो वह माणी हर्पित मनवाला व महावलवान् होकर वृद्धावस्था में खता को पाता है॥ १७ ।। संचिन्नकाया यदि भाति चाद्या रेखा गभीरा विशदस्वरूपा। सोयं वलिष्ठो मनुजो मदान्धो मन्दस्वभावो ममतामुपैति ॥१८॥ यदि कब्ज़े में पहली रेखा गहरी व साफ़ सुथरी होकर कटी फटीसी प्रतीत होवे तो हपाणी महावलवान् व मदान्ध होकर नीच स्वभाववराला होता हुआ ममता को ता है॥ १८ ॥ रेखात्रयीतश्चलिता यदानीं भाग्यस्य रेखा तनुतासमेता। मिथ्याप्रभाषी मनुजस्तदानीं संस्थाविहीनोऽप्यधमो नराणाम् ॥ १६॥ यदि तीनों रेखाओं से चली हुई भाग्य की रेखा पतली होकर सोहती हो तो वह ी भूंठा व बेमर्याद होकर मनुष्यों के बीच अधम होता है ॥ १६ ॥ रेखात्रयस्थं विशदस्वरूपं तारानुरूपं यदि भाति चिह्नम्। प्रापोति वित्तं मनुजोप्यलभ्यं भूमिस्थितं वा लभते धनौघम् ॥ २० ॥ यदि तीनों रेखाओं पर टिकाहुआ साफ़ सुथरा तारा के समान निशान सोहता हो तो माखी अलभ्य धन को पाता है या भूमि में गड़ेहुए धनसमूह को पाता है॥ २०॥ पूर्वोक्कचिह्नं मणिबन्धदेशे नो भाति सम्यङ्मनुजस्य यस्य। सोयं मनुष्यो व्यभिचारशाली प्रामोति वित्तं गणिकौदिकेम्यः ॥२१॥ जिस मनुष्य के कब्ज़े में पूर्वोक निशान भली भांति नहीं सोहता हो तो वह प्राी भिचारी होकर वेश्या आदिकों से धनको पाता है ॥ २१॥ १ द्रव्यस्य रेखा इति वा पाठः २ वेश्यादिकेभ्यः॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य आक्रम्य शुक्रं यदि भाग्यभग्नी संभिद्य पैत्रीं शेशिनं समेति। सांयात्रिकःस्यान्मनुजस्तदानी व्यापारशाली व्ययतासमेतः॥ २२ यदि शुक्रालय को आक्रमण कर भाग्यरेखा की भगिनी रेखा पैत्रीरेखा (लाइफ़लाड को भेदनकर चन्द्रमा के पास पहुँचजावे तो वह भाखी जहाज़ी व व्यापारी हो खर्चीला होता है॥ २२॥ समुत्थिता चेन्मणिबन्धदेशादज्वी सुरेखा यदि याति चान्द्रिम। प्राज्यं धनं वै लभते मनुष्य: संपत्तिशाली सरलस्वभावः॥२३॥ यदि मरिबन्ध (कब्ज़े) से उठीहुई सीधी भाग्यभगिनी रेखा बुधालय पर्यन्त च जावे तो वह प्राणी सम्पत्तिशाली होकर सीधे स्वभाववाला होता हुआ महाधन पाता है।। २ ३।। एपा सुरेखा विशदा यदानी गम्भीररूपा दिनेंपं प्रयाति। सोयं जनो वित्तवतां सहायात्मरापोति वितं सुखदो नराणाम्॥ २४ जब यह रेखा साफ सुयरी व गहरी होकर सर्यालय पर्यन्त चली जावे तो वह शार घनवानों की सहायता से धन को पाता है और मनुष्यों को सुखदायक होता है॥२४ पूर्वार्द्धयुग्माङ्कमिमं मनोजं संकीतयन्तां सुधियो नितान्तम्। ते लोकवश्याः किल सन्तु भूमो चित्तं समायन्तु विदांगधानाः॥ २५ इस सुन्दर पूर्वार्ध के द्वितीयाङ्क को जो बुद्धिमान् अत्यन्त कीर्तन करते हैं, उनके वश लोग हो जाते हैं और परिडतों में मुखिया दोकर धनको पाते हैं॥ २५ ॥ एषा पाशितलव्याख्या कीर्तिता देवि दुर्लभा। य इमांपठन्तु विद्वांसो भूयामुर्भृपवल्लमाः॥२६।। अहो देवि ! यह दु्लभ करतल की व्याख्या मैंने कही है जो पलडित लोग पद़ें वे राजाओं के प्यारे होवेंगे ॥ २६ ॥ १ चन्द्रमसम् २ "सांयाध्रिक: पोतवरिक्" (इत्यमरः ) ३ अधिकम् ४ दिवाकरम्॥ सामुद्रिकशास्त्रम् उत्तरार्घ: प्रथमोडङ्कः सटीकः। लक््पणधरे अथ सामुद्रिकशास्त्रस्योत्तरार्डे प्रथमाङ्कस्य सूचीपत्रम्। विपया: पृष्ठाक्क: विपया: पृष्ठाङ्ा :- महलाचरणम् .... चित्रनम्बर पचीसवां .... .. भालरेखातो वयक्रमाब्दनिर्णयमाह चित्रनम्बर छब्बीसवां चित्रनम्बर

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 9)

सच्ताईसवां- .... चिहद्वारा, जन्मलग्नमाह .... ... चित्रनम्र अ्र्प्ट्ठाईसवां ... माल स्यमेषादिस्व रूपज्ञानमाह ... चित्रनम्बर उन्तीसवां .... ... भालेमेपादिवासज्ञानमाह चित्रनम्यर तीसवां ... .... र्यादिग्रहाणां स्वरूपज्ञानमाह .... ललाटे सूर्यादिवासज्ञानमाह चित्रनम्बर इकतीसवां चित्रनम्बर बत्तीसवां .... भालस्थरखाज्ञानमाह ..- चित्रनम्वर तेतीसवां · ... ... ... चित्रनम्घर तीसरा चित्रनम्बर चौंतीसवां .... .... चित्रनम्बर चौथा चित्रनम्बर पैंतीसवां ... चित्रनम्बर पांचवां ... .. चित्रनम्वर छत्तीसवां ... चित्रनम्वर छठां चित्रनम्बर सैंतीसवां .... चित्रनम्घर सातवां चित्रनम्बर अड़तीसवां .... .... चित्रनम्घर आाठवां चित्रनम्वर उन्तालीसवां ... .. चित्रनम्बर चालीसवां .... चित्रनम्बर नववां .... चित्रनम्बर इकवालीसवां चित्रनम्बर दशवां ... .... चित्रनम्बर बयालीसवां चित्रनम्बर ग्यारहवां ... चित्रनम्बर तेंतालीसवां चित्रनम्बर बारहवां ... चित्रनम्बर चवालीसवां चित्रनम्बर तेरहवां चित्रनम्बर पैंतालीसवां .... ... चित्रनम्बर चौदहवां .... चित्रनम्बर छियालीसवां चित्रनम्बर पंद्रहवां चित्रनम्बर सैंतालीसवीं ... ... ... २६ चित्रनम्बर सोलहवां .... चित्रनम्बर अड़तालीसवां चित्रनम्बर उञ्ासवां .... चित्रनम्बर सत्रहवां ... चित्रनम्बर अट्ठारहवां .. चित्रनम्बर पचासवां .... २७ .... २७ चित्रनम्वर उन्नीसवां ... ... चित्रनम्बर इक्यावनवां .... चित्रनम्बर बावनवां .... .... २७ चित्रनम्वर वीसवां चित्रनम्बर तिरपनवां .... चित्रनम्बर इक्कीसवां .... .... चित्रनम्बर वाईसर्वा ... चित्रनम्वर तेईसवां लादिज्ञानमाह इति सामुद्रिकशास्त्रस्योत्तरार्द्धे प्रथमाङ्कस्य चित्रनम्बर चौबीसवां ... .... सूचीपत्रम्। 沙开 II NY 郷 ม पुर २५०- सामुद्रिकशास्त्रम् उत्तरार्धः द्वितीयोऽङ्कः सटीकः। प्रयागनारायणभार्गवेष सर्वसुखाय स्व्कीयव्ययेन प्थमावृत्तौ लक्ष्मणापुरे बाबू मनोहरलाल भार्गव बी. ए., सुपरिटेंडेंट इत्युपाधिधारियः प्रबन्धेन मुंशी नवलकिशोर सी. आई. ई., नुद्रणाजये मुद्राप- यित्वा प्राकाश्यं नीतम्। सन् १६१६ ई० । अस्याधिकारः सर्वथास्वाधीन एव रक्षितः । अथ सामुद्विकशास्त्रस्योत्तरार्द्धे प्रथमाङ्कं सोदाहरणमाह- मङ्लाचरणम् ॥ यो देवः सकलाधिपः सुरवरः सर्वार्थसिद्धिप्रदः कान्त्या विश्वविमोहनः कविपतिः कल्याणकल्पद्डुमः । देव्याराधितपादपड्ायुगलो हेरम्बतातो हर- स्तं वन्दे सुखृन्दवन्दितपदं स्व्ाभीष्टसिद्धयै शिवम् ॥ १॥ अथोत्तरार्धे वक्ष्यामि भालरेखा सुलक्षणम्। यस्य विज्ञानमात्रेण विज्ञो देवि ! नरो भवेत् ॥ २ ॥ भालरेखातो वयः क्रमाच्दनिर्णायमाह- भाले विशाले खलु सप्त सन्ति रेखा विशुद्धा मुनिभि: प्रदिष्टाः । तासां स्वरूपं हृदये निधाय बूयुः प्रमाणं वयसो बुधेन्द्राः ॥ १ ॥ विशाल भाल में मुनियों से वतलाई हुई निर्मलरूप सात रेखायें होती हैं उनका वरूप हृदय में धर बुधवरों को वयःक्रम का प्रमाण कहना चाहिये ॥ १॥ केशस्य निम्ने प्रथमां हि रेखां सौराधिनाथां कवयो वदन्ति। ततो द्वितीयां धिषणाधिपालां ततस्तृतीयां क्षितिमूनुनाथाम् ॥ २॥ केशों के निचले भाग में कवियों ने पहली रेखा को शनिस्वामिनी कहा है और दूसरी गुरुस्वामिनी व तीसरी को मङ्लस्वामिनी कहते हैं ॥ २ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ततश्चतुर्थी दिननाथनाथा शुक्राधिपा पञ्चमिका प्रसिद्धा। बुधाधिनाथा खलु पष्ठिका सा या सप्तमी सा क्षणदाघिपेशा। ३॥ तदनन्तर चौथी रेखा को सूर्यस्व्रामिनी, पांचवीं को भृगुस्वामिनी, छठी को वुधस्वामिनी और सातवीं को चन्द्रस्वामिनी मैंने कहा है ।। ३ ॥ वयःक्रमस्याब्दनिरूपणेडयं संप्रोच्यते वै नितरामुपायः। एका कुरेखा यदि कर्णयुग्मस्नायुं समेतीह तदा विचार्यम्॥।४ ॥ वयःक्रमसम्बन्धी वर्षों के निरूपण में अ्र्प्रतिशयिता से यह उपाय कहा जाता है कि एकक्षुद्रा रेखा जबकि कानों की नस (रग) को प्राप्त होजाती है उस समय पएिडतों को विचारना चाहिये॥४ ॥ एषा कुरेखा यदि वामकर्णस्नायोः समुत्था समुपैति सीमाम्। भालस्य वामां निगदेद्दशाब्दं वयःक्रमं वा रविवर्षसम्मितम्॥ ५ ॥ यदि यह सुद्रारेखा वायें कानकी रग से उठी हुई भालकी वाम सीमा को म्राप्त होती है तो दशवर्ष या वारहवर्ष का वयःक्रम कहना चाहिये ।। ५॥। आस्पष्टरूपा परिदृश्यमाना ह्वेषा करेखा यदि भालमध्यम्। संभेदयित्वा खलु विस्तृता चेदेकोनत्रिंशच्छरदं वदन्ति॥ ६॥ यदि कुछेक स्पष्टरूप होकर परिदृश्यमान होती हुई यह सुद्रारेखा कपाल का मध्यभाग भेदनकर फैलजावे तो उनतीस वर्ष का वयःक्रम कहते हैं ॥ ६ ॥ एपा कुरेखा यदि इस्वरूपा वयःकरमं इस्वतरं वदन्ति। दीर्घा यदानीं खलु दीर्घरूपं न्यूनाधिकं वै स्वधिया विचार्यम्॥७॥ यदि यह सुद्रारेखा हस्त्ररूप से प्रतीत होवे तो अल्पवयःक्रम और यदि दीर्घरूप से पतीत होवे तो बड़ा वयःक्रम कहते हैं इस प्रकार विद्वानों को अपनी बुद्धि से न्यूनता या अधिकता का विचार करना चाहिये।। ७।। यस्यास्ति चक्षुः खलु कालवर्णं रात्रौ द्वियामं जनने जनस्य। आश्यामवरणं तदपेक्षया चेद्घटीमितं वै समयं समीयात्॥८॥ जिस प्राणी का नेत्र कालावर्ण प्रतीत होता हो तो उसका जन्मसमय रात्रिके दौपहर का कहना चाहिये और जो उसकी अपेक्षा कुछेक कालावर्ण प्रतीत होता हो तो एकदी का जन्म संमय जानना चाहिये।। ८ ।। उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्कः । मधुत्रताभं यदि चेच चक्षुस्तारासमेतं यदिवा हि कृष्णम्। तदा जनन्यां जनने जनस्य दिष्टं वदेद द्वित्रिघटीप्रमाणम्॥ ६ ॥ जिसका चक्षु मौरे के समान वर्णवाला होकर यदि पतीत होता हो या तारा समेत कालावर्ण देखपड़ता हो तो उस पराणी का जन्मसमय दो घड़ी या तीन घड़ी का कहना चाहिये ।। ६।। यन्नेत्रतारा परितः सिताब्या सा केवला वा विशदा सनीला। रात्रौ वदेद्ेदघटीप्रमाणं निरूपयेद्वाणघटीमितं वा॥१०॥ जिसके नेत्रकी तारा चारों तरफ़ सफ़ेद होकर प्रतीत होती हो या केवल नील वर्ण होकर सफ़ेद ही देखपड़ती हो तो उस पाणी का जन्मसमय रात्रि में चार या पांच घड़ी का कहना चाहिये ॥ १० ॥ यह्वोचनस्था खलु चार्धनीला तारा भवेदै ससिता सपीता। प्रातर्वदेच्छास्त्रघटीमितं वा प्रकाशयेत्सप्घटीप्रमाणम्॥ ११॥ जिसके लोचनों में टिकी हुई तारा आधी नीलवर्णवाली होकर सफ्ेद या पीली प्रतीत होती हो तो उस माणी का जन्मसमय पातःकाल छः घड़ी या सात घड़ी का कहना चाहिये ।। ११ ।। यस्याक्षितारामणिरेव नीलो ह्येको हि मिश्रो मणिभागको वा। रात्रौ वदेदष्टघटीप्रमाएं निरूपयेन्नन्दघटीभितं वा॥ १२।। जिसके नेत्र की तारामशि ही नीलवर्ण होकर प्रतीत होती हो या केवल मणिभागही मिलेवर्णवाला होकर प्रतीत होता हो तो उस माणी का जन्मसमय रात्रि में आठ घड़ी या नव घड़ी का कहना चाहिये ।। १२ ।। चक्षः समस्तं खलु नीलवणं क्षद्रं सुचिह्नं यदि वा समीपे। रात्रौ वदेदिग्घटिकाप्रमाएं तथादिशेदीशघटीमितं वा ॥१३॥ जिसका सारा नेत्र कालावर्ण होकर प्तीत होता हो या नेत्र के समीप छोटे २ से चिह्न मतीत होते हों तो उस माणी का जन्मसमय रात्रि में दश घड़ी या ग्यारह घड़ी का बताना चाहिये ।। १३ ।। नेत्रं यदेषद्धरितं च यस्य दिष्ट वदेत्मूर्यघटीमितं वै। अर्ध पलाशं यदिवार्धनीलं कालं वदेद दयेकघटीमितं वा ।। १४॥ जिसका नेत्र कुछेक हससा प्रतीत होता हो तो उस प्राणी का जन्मसमय वारह घड़ी सामुद्विकशास्त्रस्य का कहना चाहिये या जिसका नेत्र आधा हरा या आधा कालावर्स होकर प्रतीत होता हो तो उसका जन्मसमय एक घड़ी या दो घड़ी का कहना चाहिये ।। १४ ।। ईषत्पलाशं मलिनं च यस्य विलोक्यते चेन्मनुजस्य चक्षः। दिवा वदेद वंहिघटीपमाएं निरूपयेद्वेदघटीमितं वा॥ १५॥ जिसका नेत्र कुछेक हरा या मैलासा देखा जाता हो तो उस पाणी का जन्मसमय दिन में तीन या चार घड़ी का निरूपण करना चाहिये ॥ १५ । नेत्रस्य तारामणिरेव नीलो विदृश्यते वा हरितो Sपराहे। ज्रूयात्तदा बौणघटीप्रमाणं बुधो वदेच्छास्त्रघटीमितं वा ॥ १६॥ जिसके नेत्रकी तारामखिही नील या हरितवर्ण होकर देखी जाती हो तो उस पाखी का जन्मसमय पिडतको अपराह्ण में पांच या छः घड़ी का बताना चाहिये ॥ १६ ॥। विडालनेत्रप्रतिमं च चक्षुः प्रतीयते यस्य जनस्य नूनम्। रात्रौ वदेत्सप्घटीप्रमाएं विचारयेन्नागघटीमितं वा ॥ १७॥ जिसका नेत्र विलार की आंखों के समान प्रतीयमान होता हो तो उस प्राणी का ज़न्मसमय रात्रि में सात या आठ घड़ी का विचारना चाहिये ॥। १७। मार्जारदृष्टिप्रभमेव चक्षुः संरक्रमध्यं यदिवा विभाति। रात्रौ नदेन्नन्दघटीप्रमाणं विज्ञो वदेहदिग्घटिकामितं वा ॥१८॥ जिसकी आंख विलार की आंखों के समान कान्तिवाली होकर सोहती हो या आंस का विचला भाग लालवर्णवाला होकर सोहता हो तो उस माणी का जन्मसमय विद्वान् को नव या दश घड़ी का बताना चाहिये ।। १८ ॥ आरक्कवर्णं यदिवा हि कृष्णं प्रतीयते यस्य नरस्य नेत्रम्। रात्रौ वदेदीशघटीप्रमाणं विचार्य सर्वं हृदये निदेशम्॥ १६॥ जिसका नेत्र, लाल या कालावर्ण होकर प्रतीयमान होता हो तो उस प्राणी का जन्मसमय पडत को सारा निदेश हृदय में विचारकर ग्यारह घड़ी का कहना चाहिये॥ १६ ॥ अथ चिह्द्वारा जन्मलग्नमाह- नार्या यदा वा पुरुषस्य भाले संदृश्यते चेद्विशदं च चिह्नम्। दशांशमध्ये खलु मेषकस्य जन्मं वदेत्तस्य जनस्य नूनम्॥२०॥ १ घटीत्रयम् २ क्रथयेत् ३ पश्चघटीप्रमाएम् ४ पिडतः ॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क: । जिस नारी या पुरुष के ललाट में साफ़ सुथरा निशान यदि देखा जाता है तो उस पाखी का जन्म मेपलग्नगत दश अंशों के बीच में यानी पहले द्रेष्काए में कहना चाहिये ॥ २० ॥ भाले विशाले वदने' च नेत्रे दक्षाक्षिनिम्ने ह्यथवोर्ध्वभागे। शष्ठेचदेशे यदि भाति चिह्नं कलायैसाम्यं बहुलोमशं वा ॥२१॥ विशालभाल, मुख, वामनेत्र, दाहने नेत्र का निचला भाग अथवा ऊपरला भाग और ओोठों का ऊर्ध्व भाग इनमें यदि मटर समान या घने लोमोंवाला निशान सोहता हो॥२१॥ दशांशमार्य नखांशमध्ये मेषस्य ज्ञेया जैनिरेव जन्तोः। अधःस्थले वै वदनस्य यस्य विभाति चिह्नं चित्रुकेथ वा स्यात् ॥२२॥ तो उस पाणी का जन्म मेष लग्न के दश अंश से लेकर बीस अंश के बीच में जानना चाहिये और जिस प्राणी के मुख के निचले भाग में अथवा ठोड़ी में निशान सोहता हो ॥ २२॥ नखांशमारम्य तदैडकस्य त्रिंशांशमध्ये पुरुषस्य जन्म। वदन्ति विश्राः खलु शास्त्रनिष्ठः साँव्वत्सैरा वेदविदां वरेरयाः ॥२३॥ तो शास्त्रों में निष्ठा रखते हुए वेदवेत्ताओं में प्रधान होकर ज्योतिर्वेचा ब्राह्मणों ने मेप लग्नगत बीस अंश से लेकर तीस अंश के भीतर उस पाणी का जन्म कहा है। २३॥ रीत्या यदानीं खलु सूक्ष्मया चेद्िचारणां कर्तुमिहाभिवाञ्छेत्। आरम्य भालाचितुकान्तमेवं कुर्याच्तु भागत्रयमेव धीरः ॥ २४ ॥ जबकि पाए्डतलोग सूक्ष्म रीति से विचार करना चाहें तो भाल से लेकर ठोडी पर्यन्त तीन भाग करें॥ २४ ॥ आद्यं च भागं प्रवदेदगंशं विशांशतुल्यं खल युग्मभागम्। त्रिंशांशसाम्यं प्रवदेत्त्रिभागं विज्ञाय चेत्थं क्रियतां विचारः॥२५।। दश अंशवाला पहला भाग बीस अंशवाला दूसरा भाग और तीस अंशवाला तीसरा भाग कहना चाहिये इस भांति जानकर विचार किया जावे॥ २५॥ होरादिकान्वै सकलान्विचार्य ब्रूयात्फलादेशमिहैव धीमान्। ध्यात्वा हि रामं कुजया समेतं न तं विना को भणितुं समर्थ:॥२६॥ होरा-दरष्का-नवांशा आदि समस्त पद्दगों का विचार कर बुद्धिमान् फलादेश को १ मुखे २ मटरप्रमाणम् ३ विशांशमध्ये ४ उत्पत्तिः ५ मेपलग्नस्य ६ ज्योतिवत्तार:।। सामुद्रिकशास्त्रस्य कहे और यहां पर सीताराम का ध्यान घर कहना उचित है क्योंकि उनके बिना कोई कहने के लिये समर्थ नहीं होसका है॥ २६ ॥ कराठप्रदेशे यदि भाति चिह्नं क्षुद्रस्वरूपं यदिवा हि कोलम्। संरक्तवरणं यदिवा बिडालं जनिं वदेदुक्षदिगंशमध्ये॥ २७॥ यदि कएठभाग में छोटासा या बेर के बरावर निशान सोहता हो अथवा लाल विलार के समान आकारवाला निशान यदि भासता हो तो वृपलग्नगत दश अंशों के बीच में जन्म कहना चाहिये ॥ २७ ॥ गलैकदेशे यदि भाति चिह्नं प्रागुक्तरूपं ह्यथवा किमन्यत्। द्रेष्काणयुग्मे वृषलग्नकस्य ब्रूयाज्जनिं वै मनुजस्य तस्य ॥ २८॥ यदि कएठ के एक देश में पूर्वोक़ िशान अथवा कोई आनही निशान सोहता हो ते टृपलग्नगत दूसरे द्रेष्काण में उस प्राखी का जन्म कहना चाहिये।। २८ ॥। करठोपरिस्थं जलबुद्बुदाभं किंवा सरकं पिटैकासमानम्। त्रिंशांशमध्ये वृषलग्नकस्य विद्याज्नुर्वै पुरुषस्य तस्य ॥ २६॥ यदि कएठके ऊपरले भाग में टिका हुआ जल वुल्ले के समान या लाल फोड़े के स मान निशान सोहता हो तो दृपलग्नगत तीसरे द्रेष्काण में उस पराणी का जन्म जानन चाहिये ॥ २६॥ विद्योतते चेत्खलु दक्षवाहौ स्कन्धद्ये वा यदि भाति चिह्नम। दशांशमध्ये मिथुनस्य यस्य जनिं वदेत्तस्य नरस्य नूनम्॥३०। जिसकी दाहिनी भुजा या दोनों कन्धों में यदि कोईसा निशान प्रतीत होता हो ते मिथुन लग्नगत दश अंशों के बीच में उस प्राणी का जन्म कहना चाहिये॥ ३० ॥ विभाति चिह्नं यदि वामबाहौ तथांसयोर्वा निकटे विभाति। द्रेष्काणयुग्मे खलु युग्मकस्य ब्रूयाज्नुर्वै मनुजस्य तस्य॥३१ यदि चाई भुजा या कन्धों के समीपवर्ती निशान सोहता हो तो मिथुनलग्नगत दूस द्रेष्कांण में उस प्राणी का जन्म कहना चाहिये।। ३१ ॥ मध्ये यदानीं खलु दक्षवाहोर्विराजते चेद्विशदं च चिह्नम्। विंशांशतो वै शरविंशभागे युग्मस्य जन्मं प्रवदेजनस्य ॥ ३२॥ १ विस्फरोट: पिटकित्रवु ₹ जानीयात् २ मिथुनस्य ४ पञ्चविशांशभागे॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क। जिसकी दाहिनी भुजा के बीच में साफ़ सुयरा निशान प्रतीयमांन होता ही तो मिथुन तग्नगत वीस अरंश से लेकर पचचीस अंश के भीतर उस प्राणी का जन्म बताना चा- हये ॥ ३२ ॥ विद्योतते चेत्खलु वामवाहोर्भध्ये सुचिह्नं विशदं च यस्य। आरम्य विंशं सशेरं तदानी त्रिंशांशमध्ये मिथुनस्य जन्म॥३३॥ जिसकी बाई भुजा के बीच में यदि कोईसा निशान सोहता हो तो मिथुन लग्नगत पीस अंश से लेकर तीस अंश के भीतर उस प्राणी का जन्न कहना चाहिये॥ ३३॥ वक्षःस्थले चेच्छशकाङ्गिसाम्यं चिह्नं सपुष्पं ससितं विभाति। आद्ये हकाण खलु कर्कटस्य जनिं वदेद् बुद्धिवरो जनस्य ।३४॥ जिसके वक्ष:स्थल में यदि खरगोश के पैर के समान या फूल के समान सफ़ेद निशान नोहता हो तो कर्क लग्नगत पहले द्रेष्काण में उस प्राणी का जन्म पणिडत को बताना हिये॥ ३४ ॥ चिह्नं यदा चेत्कैचयोः समीपे कोलस्वरूपं कुसुमप्रभं वा। दशांशमारभ्य नखांशमध्ये कर्कस्य जन्मं प्रवदेजनस्य ॥ ३५॥ जिसके स्तनों के निकट देश में यदि बेर के समान या फून के समान निशान सो- ता हो तो कर्क लग्नगत दश अंश से लेकर बीस अंशों के भीतर उस माणी का जन्म ना चाहिये।। ३५ ।। उरोजनिम्ने यदि भाति चिह्नं पुष्पप्रभं वा खलु फेनिलाभम्। वैह्नौ हकाण सति कर्कटस्य धीरो वदेजन्म जनस्य तस्य ॥३६॥ जिसके स्तनों के निचले भाग में यदि फूल के समान या बेर के समान निशान शेहता हो तो कर्क लग्न के तीसरे द्रेष्काण में उस पाएी का जन्म पणिडत को बताना हिये॥ ३६॥ वत्सोपरिस्थं यदि वामगं चेचिह्नं विशुद्धं नितरां विभाति। आद्ये हकाण मृगराजकस्य ब्रयाजनुर्वै मनुजस्य तस्य ॥ ३७॥ यदि वामभाग में गया व वक्षःस्थल के ऊपर टिका हुआ विशुद्ध होकर चिह्न अतीव. तमकता हो तो सिंहलग्न के पहले द्रेष्कांण में उस प्राणी का जन्म बताना चाहिये॥ ३७॥ वत्सस्य निम्ने यदि भाति चिह्नं प्रागुकरूपं ह्यथवा किमन्यत्। १ पञ्चभिःसमेतम् २ स्तनयोर्निकटे ३ विशांशमध्ये ४ बदरसन्निमम् ५ तृतीये ६ परिंडता॥ युग्मे दकाऐो खतु सिंहकस्य विचारयेद्ै जननं जनस्य ॥ ३८॥ यडि वक्षःस्थल के निचले भाग में पूर्वोक्क चिह्न अथवा आनही कोईसा चिह्न सोहता हो तो सिंहलग्न के दूसरे द्रेष्काण में उस ाखी का जन्म विचारना चाहिये॥। ३८ ॥। संप्रेक्ष्यते चेत्खलु पार्श्वभागे सातीलकाभं यदि वा कुरूपम्। कराठीरवस्यान्तिंमिके हकाणे जनिं प्रतीयांत्पुरुपस्य तस्य॥३६॥ पार्श्वभाग में यदि मटरसमान या छोटासा निशान देखा जाता हो तो सिंहलग्न के तीसरे द्रेष्काण में उस माणी का जन्म जानना चाहिये।। ३६ ॥ मध्योदरे वा कुचैयोः समीपे बिन्दुस्वरूपं यदि नीलरक्रम्। औंद्ये हकाणे खलु कन्यकाया धीरो वदेदै जननं जनस्य॥४० जठर (पेट) के बीच में या स्तनों के निकट देश में काला या लाल विन्दुरूप धारी निशान प्रकाशमान होता हो तो कन्यालग्न के पहले द्रेष्काण में उस माणी का जन्म पएिडत को वताना चाहिये ॥। ४० ॥ कुचोदरे चेद्यदि नीचदेशे रक्ं सनीलं खलु बिन्दुयुक्कम्। युग्मे दृकाण सति कन्यकाया विद्याजनिं वै मनुजस्य तस्य ॥४१॥ यदि स्तन या पेटके निचले भाग में लाल या काजेरंगवाला होकर बिन्दुयुक् होता हुआ निशान सोहता हो तो कन्यालग्न के दूसरे द्रेष्काणा में उस पाणी का जन्म जानना चाहिये ।। ४१ ॥ तुन्दस्य निम्ने यदिवा सुनाम्याश्रिह्नं किमन्यद्विशदं विभाति। वह्नौ दकाणे सति कन्यकाया ब्रयाज्जनुर्वे खलु मानवस्य ।.४२ ॥ यदि तोंद (पेट) या तोंदी (तुएडी) के निचले भाग में कोईसा आनही निशान सोहता हो तो कन्यालग्न के तीसरे द्रेष्काण में उस पाणी का जन्म बताना चाहिये॥।४२॥ नाभौ कटौ वा यदि लोमयुकं क्षुद्रस्वरूपं मृदुतासमेतम्। आद्ये दकाण खलु तौलिकस्य विद्याद्विदीशो मनुजस्य जन्में॥४३ यदि तोंदी या कमर में लोमसंयुक्क होकर कोमल होता हुआ छोटासा निशान भासता हो तो तुलालग्न के पहले द्रेष्काण में उस पाणी का जन्म पसिडत को जानना चाहिये ।। ४३ ॥ -१ तृतीये २ जानीयात् ३ स्तनयोः ४ प्रथमे ५ जन्मशब्दो नान्तोSदन्तो वेति कोषाद वगम्यते।' उत्तरार्द्े प्रथमाङ्क: । प्रागक्चिह्नं यदि वामगं चेद्धिभाति शुद्धं खलु नाभिनिम्ने। युग्मे हकाणे सति तौलिकस्य बुधो वदेजन्म जनस्य तस्य । ४४॥ यदि पूर्वोक निशान वामभाग में गया हुआ निर्मल होकर नाभी के निचले भाग में सोहता हो तो तुला लग्न के दूसरे द्रेष्काण में उस प्राणी का जन्म पएिडत को बताना वाहिये ॥ ४४॥ शलोच्यते चेदुदरस्य प्रान्ते चिह्न सनीलं बहुलोमशं वा। वहौ दकाणे सति तौलिकस्य जनिं वदेत्तस्य जनस्य मैरिः॥ ४५ ॥ यदि उदर के प्रान्तभाग में काला या घने लोमोंवाला निशान देखा जाता हो तो तुला तग्नगत तीसरे द्रेष्काण में उस माणी का जन्म पएिडत को बताना चाहिये ।। ४५॥ श्रोणीप्रदेशस्य तु वामभागे विभाति चिह्नं विशदस्वरूपम। आद्ये टकाऐ खलु वृश्चिकस्य विद्याजनिं वै पुरुषस्य तस्य । ४६।। यदि कमर के वामभाग में निर्मल होकर निशान सोहता हो तो दृथ्चिक लग्नके पहले काण में उस पराणीका जन्म जानना चाहिये । ४६॥। कटप्रदेशस्य च दक्षभागे कर्लोयसाम्यं खल भाति चिह्नम्। युग्मे हकाणे सति वृश्चिचिकस्य ब्रूयाजनिं वै मनुजस्य तस्य ॥४७॥ यदि कमरके दाहिने भागमें मटरसमान निशान प्रतीयमान होता हो तो दृश्चिकलग्न के दूसरे द्रेष्काण में उस पराणी का जन्म वताना चाहिये।। ४७॥। अपोननिश्ने यदि भाति चिह्नं हरेणँरूपं विमलस्वरूपम्। वह्नौ दकाणे सति वृश्चिकस्य वँदेद् बुधेशो जननं जनस्य ॥ ४८॥ यदि गुदाके निचले देशमें मटरसमान होकर निर्मल निशान प्रतीयमान होता हो तो श्िकलग्न के तीसरे द्रेष्काण में उस प्राणीका जन्म वुधवरको बताना चाहिये॥ ४८॥ वामोरुसंस्थं विशदस्वरूपं विभाति चिह्नं जलबुदबुदाभम्। आद्ये हकाऐ खलु चापकैस्य जनिं वदेदबुद्धिवरो जनस्य ॥ ४६॥ यदि वांई ऊरु में टिका हुआ निर्मल होकर जलबुलले के समानं निशान सोहता हो वो धनलग्न के पहले द्रेष्काण में उस पाणी का जन्म पणडित को बताना चाहिये ॥४६॥ १ संप्रेक्ष्यते २ परिडतः ३ निर्मलरूपम् ४ मटरप्रमाएम् ५ गुदाया नीचभागे ६ मटर- समानम ७ कथयेत् = धनुर्लग्नस्य।। सामुद्रिकशास्त्रस्य दक्षोरुसंस्थं विमलस्वरूपं प्रागुक्चिह्नं नियतं विभाति। युग्मे दकाऐो हि धनुर्धरस्य नूयाज्जनुर्वै मनुजस्य तस्य ॥। ५०॥ यदि दाहिनी ऊरु में टिका हुआ निर्मल होकर पूर्वोक निशान निश्चयकर सोहता हो ते धन लग्न के दूसरे द्रेष्काण में उस मानुप का जन्म कहना चाहिये ।। ५० ।। ऊरुद्धयस्यापि च तूर्ध्वभागे चिह्नं यदानीं विशदं विभाति। वहौ दकाणे खलु कार्मुकस्य समुद्धवं वै कथयेज्जनस्य ।। ५ १ ॥ यदि दोनों ऊरुओं के ऊपरले भाग में निर्मल होकर निशान सोहता हो तो धनलग के तीसरे द्रेष्काण में उस पाणी का जन्म कहना चाहिये ॥ ५१॥ उच्चस्थले चेत्खलु दक्षजानोरनुच्चतारासममेव भाति। आध्ये हकाण सति नक्रकस्य विद्याज्जनुर्वै मनुजस्य तस्य ॥५१ यदि दाहिने घुटनू के ऊपरले भाग में उँचाई रहित ताराके समान निशानही सोहन हो तो मकरलग्न के पहले द्रेष्काण में उस प्राणणी का जन्म जानना चाहिये॥ ५२॥ ऊर्ध्वस्थले चेत्खलु वामजानो: प्रागुक्कचिह्नं विशैद विभाति। युग्मे दकाणे मकरस्य पुंसी ब्रूयाजनिं बुद्धिमतामधीशः॥५३॥ यदि बायें छुटनूके ऊपरले भागमें पूर्वोक निशान निर्मल होकर सोहता हो तो मक लग्नके दूसरे द्रेष्काण में उस पुरुपका जन्म वुधेन्द्रों को बताना चाहिये ॥ ५३॥ अष्ठीवतश्रेत्खलु निम्नेदेशे प्रागुक्रचिह्नं यदि भाति शुद्धम्। वह्नौ हकाणे सति नककस्य विद्याद् बुधेशो जननं जनस्य॥ ५४॥ यदि जानुओं के निचलेभाग में पूर्वोक निशान शुद्ध होकर सोहता हो तो मकरने तीसरे द्रेष्काण में उस प्राणणी का जन्म वुधेशों को जानना चाहिये ।। ५४॥ उच्चप्रदेशे खलु दक्षजङ्दा दीर्घ त्वनुचं भजते हि भङ्गँय्। आाद्ये हकाण सति कुम्भकस्य विज्ञो वदेद्ै पुरुषस्य जन्म॥।५५॥ यदि दाहिनी जांघ ऊपरले भागमें फैलाहुआ उच्चतारहित तरङ्गाकार निशानको भजत हो तो कुम्भलग्नगत पहले द्रेष्काण में उस प्राखीका जन्म विज्ञोंको बताना चाहिये॥।॥ वामा मुजङ्ा खलु चोर्ध्वभागे प्रागुक्चिह्नं लभते यदानीम। युग्मे दृकाणे घर्टलग्नकस्य विद्याजनिं वै मनुजस्य तस्य॥ ५६ ॥ १ धनुंष: २ मकरस्य ३ निर्मलम् ४ पुरुषस्य ५ नीचभागे ६ मकरस्य ७ तरङ्गाकार 5 कुम्भलग्नस्य ।। उत्तरार्द्धे प्रथमाङ: । यदि वांई जङ्गा ऊपरले भाग में पूर्वोक निशान को पाती हो तो कुम्भलग्न के दूसरे द्रेकाण में उस प्राणी का जन्म जानना चाहिये ॥ ५६॥ जङ्गाद्यस्योपरिंगं विभाति चिह्नं यदानी बदेरप्रमाणम्। वह्नौ दकाण सति कुम्भकस्य ब्रूयाज्जनुर्वै खलु मानुपस्य ॥।५७॥ यदि दोनों जङ्गाओं के ऊपरले भाग में बेरके प्रमाण निशान सोहता हो तो कुन्भ ग्नके तीसरे द्रेष्काण में उस माणीका जन्म कहना चाहिये॥ ५७ ॥ अनुन्ञतं चैद्यदि मांसलग्नं चोद्धाति चिह्नं खलु वामपादे। आंद्ये हकाण सति मीनकस्य वदेत्सुधीरो जननं जनस्य ॥ ५८ ॥ यदि ऊँचाई रहित मांस में लगाहुआ निशान वामपाद के ऊपरले भाग में सोहता हो वो मीनलग्न के पहले द्रेष्कार में उस प्राणणीका जन्म सुधीरको कहना चाहिये ॥ ५८॥ ऊर्ध्वस्थले चैद्यदि दक्षपादे प्रागुक्चिह्नं विशदं विभाति। युग्मे दकाण पृथुलोमकस्य जनिं विपश्चित्पवदेज्जनस्य॥५६॥ यदि दाहिने पादके ऊपरले भागमें पूर्वोक निशान निर्मल होकर सोहता हो तो मीन लग्नके दूसरे द्रेष्काण में उस माणीका जन्म पलिडितको बताना चाहिये॥ ५६॥ अधःस्थलस्थं पदयोर्यदानीं संप्रेक्ष्यते चेद्धिशदं च चिह्नम्। वह्नौ हकाणे सेषलग्नकस्य ब्रूयाज्जनुर्वुद्धिवरो जनस्य ॥ ६० ॥ यदि दोनों पैरों के जिचले भाग में टिकाहुआ साफ़ सुथरा होकर निशान देखा जाता हो तो मीनलग्न के तीसरे द्रेष्काण में उस पराणी का जन्म बुद्धिमान् को कहना चाहिये ॥ ६० ॥ भाले मुखे वा यदि लक्ष्म मेषं वृषं च कराठे मिथुनं च बाह्योः। कर्क च चित्ते जठरे च सिंहं कट्यां च कन्यां कथयन्ति धीराः॥ ६१॥ यदि ललाट या मुख में कैसाही निशान मतीयमान होता हो तो मेष व कएठ में हो तो छृप और भुजाओं में हो तो मिथुन तथा हृदय में हो तो कर्क व पेट में हो तो सिंह और यदि कमर में हो तो कन्या जन्मलग्न धीरों ने कहा है ॥ ६१-॥ नाभेरधःस्थं प्रवदेत्तुलाख्यं गुह्यप्रदेशे खतु वृश्चिकाख्यम्। ऊरुस्थलस्थं धनुरेव विद्याज्जानुस्थितं वै मकरं बुधेशः ॥ ६२ ॥ १ वेरीफलसमानम् २ मीनलग्नस्य ३ परिडतः ४ मीनस्य ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य यदि नाभी के निचले भाग में टिका हुआ निशान प्रतीयमान होता हो तो जन्मलग्न तुला कहना चाहिये और यदि गुह्यप्देश में निशान हो तो वृ्चिक व ऊरुओंमें हो तो धनलग्न व घुटनुओं में हो तो मकरलग्न बुधवरों को जानना चाहिये ॥ ६२॥ जङ्वास्थितं वै कथयन्ति कुम्भं पादस्थितं चेत्खलु मीनमाह्डः। स्थूलां सुरीतिं हृदये निधाय व्याख्यायि लग्नं जनुषो जनानाम्॥६३॥ यदि जांघों में टिका हुआ निशान सोहता हो तो पल्डितों ने कुम्भ को जन्मलग्न कहा है और यदि पादतलों में टिकाहुआ चिह्न भासता हो तो आचार्यों ने मीन को जन्म- लग्न बतलाया है इस भांति स्थूलरीति को हृदय में धारण कर जनों का जन्मलग्न कहा गया । ६३ ॥ अथ भालस्थमेपादिस्वरूपज्ञानमाह- चिह्न यदानीं विशदाङ्कशाभंम्नपोक्कं पुराणैः खलु मेषकस्य। · वेदाङसाम्यं वृपभस्य चिह्नं गायन्ति विप्रा वरबुद्धिमन्तः॥ ६४ ॥ यदि निर्मल अङ्कश के समान निशान सोहता हो तो उसे पुराने परिडतों ने मेप लग्न का चिह्न कहा है और बुद्धिवर ब्राह्मोंने टटपलग्न का चिह्न चार अङ्कके समान गायाँहै।६४॥ कोपन युक्ं सरलं द्विरेखं युग्मस्य चिह्नं कविभिः प्रयुक्कम्। सप्ताङ्कयुग्मं यदि व्यस्तरूपं प्रकाशितं वै खलु कर्कटस्य॥ ६५॥ कोख से युक् सीधा दो रेखाओंवाला मिथुन का हव्रे चिह्न कियों ने कहा है और यदि सात अङ्क का जोड़ा उलटे रूप से प्रतीत होता हो ल तो उसे कर्कलग्न का चिह्न पएिडतों ने प्रकाशित किया है॥ ६५ ॥ ऋमातृकायुकपदं यदानीं विद्योतते चेत्खलु वृत्तकायम्। छ सिंहस्य चिह्नं विशदीकृतं वै साव्वत्सरैर्वेंदविदां वरिष्ठैः ॥६६॥ यदि ऋकारकी मात्रा से जुड़े हुए पैरोंवाला वृत्ताकार निशान सोहता हो तो उसे वेदवेत्ताओं में प्रधान, ज्योतिर्वेत्ता लोगों ने सिंह का चिह्न मकट किया है॥ ६६॥ यन्पीस्वरूपं सरलं विशुद्धं प्रोक्कं हि चिह्नं खलु बालिकायाः। नीचप्रदेशे कुटिलैकरेखं विज्येनयुकं धनुषा यदोघ्वें। ६७।। सीधा व साफ़ यन्पी ुके समान रूपवाला कन्या का चिह्न पशिडतों ने कहा है और जिसके निचले देश में टेढी एक रेखा हो व ऊपरले भाग में रोदारहित धन्वाकार नि शान सोहता हो ॥ ६७ ॥ १ ऊध्वभागे विगुरोन धनुषा समेतम् ॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्कः । वदन्ति चिह्नं खलु तौलिकस्य यमस्वरूपं द्रुशिकस्य ज्ञेयम। खर्जूरशाखासममेव रूपं चापस्य चिह्नं भणितं प्रवीणैः ॥६८ ॥ तो उसे तुला का चिह्न कहते हैं और यम के स्वरूपवाला वृश्चिक का निशान जानना चाहिये और जिसका रूप खज़ूर की शाखा समानही भासता हो तो उसे नष्डितों ने धनलग्न का चिह्न कहा है ॥ ६८ ॥ एOव्ीपीस्वरूपं कवयो वदन्ति नक्रस्य चिह्नं गदितं सुधीभिः। वक्र द्विरेखं खलु कुम्भकस्य पद् त्रिंशसाम्यं पृथुलोमैकस्य॥६६।। वीपी समान रूपवाला पणिडतोंसे कहा हुआ मकर का चिह्न पसिडतोंने कहा है ही दो रेखाओंवाला कुम्म का चिह्न कहाहै और सुछत्तीस अङ्क सम रूपवाला निशान पीन लग्न का कहा जाता है॥ ६६ ॥ एतानि चिह्नानि मयोदितोनि मेषादिकानां खिलराशिकानाम्। विज्ञाय चेत्थं सुधिया विचार्य शुभाशुभं वै मनुजस्य नूनम् ॥७०॥ मेप आदि समस्त राशियों के ये चिह्न मैंने कहे हैं इस भांति उन सवों को जानकर पानवगणों का शुभाशुभ पडतों को विचारना चाहिये॥। ७० ॥ अथ भाले भेपादिवासज्ञानमाह- भालोचदेशे वसतीह कर्को मध्यस्थले वै वृषभो विभाति। दक्ष्रकुट्यां भ्रमतीह सिंहो वामभ्रकुट्यां खलु कुम्भकोऽपि।७१॥ ललाट के ऊपरले भाग में कर्क बसता है व भाल के मध्यभाग में दृष सोहता है व दाहिनी भौंह पर सिंह घूमता है और बाई भौंह पर कुम्भ रहता है।। ७१॥ दक्षाँम्बकोध्वें धनुरेव भाति दक्षश्रुतोर्ध्वे घटको विभाति। वामश्जतोर्ध्वे मिथुनं च मेषो नासोच्चदेशे खलु वृश्चििकोपि ॥ ७२॥ दाहिने नेत्र के ऊपरले भाग में धनही विराजता है व दाहिने कान के ऊर्ध्वभाग में ला सोहती है व बायें कान के ऊपरले भाग में मिथुन और मेष भासता है और ना- सका के ऊर्ध्वदेश में वृश्षिक रहता है॥ ७२॥ दक्षे तु गरडे वसतीह बाला वामे च गएडे खलु मीनकोऽपि। नक्रस्थितो वै चिबुकोर्ध्वदेशे वासो हि ज्ञेयोऽखिलराशिकानाम्॥७३। १ खर्जूरशाखासदशं यदानीमिति वा पाठ: २ मकरस्य ३ मीनस्य ४ कथितानि ५ ललाटो- र्षदेशे ६ दक्षिएंभ्रकुटौ ७ दक्षिणनेत्रोध्वें। सामुद्रिकशास्त्रस्य दाहिने गाल पर कन्या सोहती है और बायें गाल पर मीन और ठोदी के ऊपरले भाग में दृश्षिक टिका रहता है यह समस्त राशियों का वास जानना चाहिये॥ ७३॥ (देखो चित्र नं० १ ) अथ रव्यादिग्रहाणं स्वरूपज्ञानमाह- वृत्तस्वरूपं खल्ु बिन्दुमध्यंमार्तएडचिह्नं मुनयो वदन्ति। चापानुरूपं विशदस्वरूपं चन्द्रस्य चिह्नगदितं सुधीभिः॥॥ मध्य में विन्दुवाला वृत्ताकार सूर्य का चिह्न मुनियों ने कहा है और निर्मलरूप धन्वाकार चन्द्रमा का चिह्न पसिडतों ने कहा है।। ७४॥ शीर्षत्रिशाखं क्षितिजस्य चिह्न ठस्यानुरूपं कवयः कुवन्ति। धनाङ्कयुक खलु वृत्तमध्यं मस्तद्विशाखं भणितं बुधस्य॥७५॥ शीश में तीन शाखाओंवाला ठकार के अनुरूप मङल का चिह्न कवियों ने कहा है और धनाङ् से युक् व बीच में गोलाकार होता हुआ मस्तक में दो शाखाओंवाला बुध का चिह्नछुपसिडतों ने कहा है।। ७५।। रेखाविभिन्नं विशदस्वरूपं युग्माङसाम्यंव धिषणस्य चिह्रम्। धनाङ्कयुक्नं यदि नीचदेशे सुवृत्तकायं खलु भार्गवस्य ॥७६॥ सरल रखासे कटाहुआ साफ़ दो अंकके समान रूपवाला निशान वृहस्पति का चिह १ कहा जाता है और यदि निचले भाग में धनाङ्क से युक होकर गोलाकार निशान प्रतीत होता हो तो उसे शुक्र का चिह्न कहते हैं॥ ७६॥ क इकारसाम्यं विशदस्वरूपं चिह्नं सेतोक रविजस्य नूनम्। विज्ञाय रूपं निखिलग्रहाणां संस्थापयेद्ै वदने बुधेशः॥७७॥ विशुद्धरूप इकार के समान आकारवाला शनैश्चर का चिह्न ु परिडतों ने कहा इस भांति समस्तग्रहोंका रूप जानकर पणिडतों को वदनमें स्थापित करना चाहिये॥ ७ अथ ललाटे सूर्यादिवासज्ञानमाह- भाले विशाले वसतीह भौमो दक्षाम्बके वै दिनपो विभाति। वामे सुनेत्रे क्षणर्दोधिपेश: श्रोत्रे च दक्षे सुररोजवन्दः॥ ७८॥ इस विशाल भाल में मङल बसता है व दाहिने लोचन में सूर्य सोहते हैं व वार्यें नेत्र में चन्द्रमा विराजता है और दाहिने कान में बृहस्पति रहते हैं। ७८ ॥। १ मयोक्रमिति वा पाठ: २ दक्षिणनेत्रे ३ सूर्य: ४ चन्द्रः ५ बृहस्पतिः ॥ उत्तराद्धे प्रथमाङ्क: । वामे च कर्णे रविजं वदन्ति नासास्थितं वै कथयन्ति काव्यम्। चन्द्रात्मजं वेदविदो मुखौव्जे वासो हि ज्ञेयोऽखिलखेचराणाम्॥ ७६॥ वेदवेत्ता पडतगण वायें कानमें शनैश्चर को बतलाते हैं व नाकमें टिकेहुए शुक्रको और मुखकमल में बुध को कहते हैं इसभांति समस्तग्रहों का वास जानना चाहिये।। ७६॥। (देखो चित्र नं० २) अथ भालस्थरेखाज्ञानमाह- भाले विशाले खलु सप्त सन्ति रेखा विशुद्धा मुनिभिः प्रदिष्टा। तासां स्वरूपं हृदये निधाय ब्रेयात्फलादेशमिहैव धीमान्॥८०॥ विशाल भाल में मुनिप्रणीत विशुद्ध होकर सात रेखायें विद्यमान हैं उनका स्वरूप हृदय में धारकर बुद्धिमान् को फलादेश कहना चाहिये॥ ८० ॥ केशस्य निम्ने रविजस्य रेखा जेया ततो वै धिषएस्य धेया। तन्नीचभागे खलु भौमकस्य तन्निम्रतोथो दिर्वसाधिपस्य ॥८१॥ बालों के निचले भाग में शनैश्चर की रेखा जानना चाहिये उसके बाद बृहस्पति की रेखा धारना चाहिये उसके नीचले भाग में मङ्गल की व उसके नीचे सूर्य की रेखा जा- नना चाहिये ।। ८१ ॥ ततो ह्यधःस्थां किल भार्गवीयां तन्नीचदेशे विवदेद बुधस्य। तन्निम्रदेशे क्षणदीधिपस्य रेखां वदेयुः खल परिडतेन्द्राः ॥८२॥ उसके निचले स्थान में शुक्र की रेखा व उसके अधःस्थल में बुध की रेखा और उसके निचले देश में प्रधान पणडतलोग चन्द्रमा की रखा कहते हैं ॥। ८२ ॥ (देखो चित्र नं० ३) सूक्ष्मे विचारे दिनपस्य रेखां दक्षे च नेत्रे शशिनश्च वामे। भ्ूमध्यदेशे खलु भार्गवस्य ब्रूयात्सुधीरो विधुजस्य वक्रे ॥ ८ ३॥ सूक्ष्म विचार करने पर दाहिने नेत्रके ऊपरले भाग में सूर्य की रखा, बायें नेत्र के ऊर्ध्वस्थल में चन्द्रमा की रेखा, भौंहों के विचले भाग में शुक्र की रेखा और वदन में या नासिका के अग्रभाग में बुधकी रेखा पल्डित को कहना चाहिये ॥८३॥ (देखो चित्र नं० ४) १ शनैश्चरम् २ शुक्रम् ३ बदनसरोजे ४ व्याख्याताः ५ कथयेत् ६ शनैश्चरस्य ७ वृद्ध- स्पतेः = सूर्यस्य ६शुक्कस्य १०. चन्द्रस्य ११. कथयेयुः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य यस्यास्ति भाले धिषणस्य रेखा संभुग्नमध्या विशदा विभाति। ज्ञानी धनी स्यान्मनुजस्तदानीं सहृत्तशाली सरलस्वभावः।।=४।। जिसके भाल में बृहस्पति की रेखा बीच में टेढ़ी होकर विशुद्ध होतीहुई सोहती हो तो वह प्राी ज्ञानी व धनी होताहुआ महायशस्त्री होकर सीधे स्वभाववाला होता है।। ८४ ॥। (देखो चित्र नं० ५) वृत्तेन युक्ा सुरराजमन्त्रिरेखा विशुद्धा कुटिला विभाति। वित्तस्य नाशं लभते मनुष्यो भ्रान्तो भवार्तो भयतामुपैति॥८्५॥ बृहस्पति की रेखा वृत्ताकार निशान से संयुक्र व विशुद्ध होकर टेढी होती हुई सोहनी हो तो वह माणी भ्रान्त होकर सांसारिक दुःखों से पीड़ित होता हुआ भयसमूह को पाता है।। ८५ ॥ (देखो चित्र नं० ६) मन्दस्य रेखा कटिला विभाति भौमस्य रेखा धनुपाकृतिश्रेत। दुष्टामवस्थामवलम्व्य जन्तुर्जायाविहीनो जडतामुपैति॥८६॥ शनैश्वर की रेखा टेढ़ी होकर सोहती हो और मङलकी रेखा धन्वाकार होकर प्रतीय मान होती हो तो वह पराणी वुरी दशाका अवलम्बनकर जायारहित होता हुआ जड़ता को पाता है ॥ ८६ ॥ (देखो चित्र नं० ७) भाले विशाले सरला हि तिस्रो रेखा विशुद्धा नितरां विभान्ति। सौभाग्यशाली सरलस्वभावो नीतौ रतः स्यात्सकलत्रियश्च ॥७॥ प्रवञ्चनाशून्यवपुर्विलासी प्रशंसनीयो महतामुपासी। सतां चरित्रेण युतो मनस्वी सुती सुविद्यः सुखतामुपैति॥ दद ॥ जिसके विशालभाल में तीन रेखायें विशद होकर अतीव चमकती हों तो वह प्राखी सीधेस्वभाववाला व सवों का प्यारा होकर नीति में परायण होता हुआ सौभाग्यशाली होता है वं प्रतारणा से रहित तनुवाला, विलासी, मशंसनीय, महात्माओं का उपासक, सचचरित्र से संयुक्त, मनमौजी होताहुआ पुत्रत्ान् व विद्यावान होकर सुखसमूह को पाता है।। ८७ । ८द ॥ (देखो चित्र नं० ८) मध्ये विभिन्ना यदि मन्दरेखा स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। भिन्ना यदानीमवनीसुतस्य सूर्याव्जयोश्रेत्खलु स्वल्परूपा ॥ ८६ ॥ सोयं नरः स्याद् बहुकार्यकारी संमानितो मानसशक्किधारी। सौभाग्यहीनो हि यदा कदापि चिन्तान्वितो वै चपलस्वभावः॥ ६०॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क: । यदि शनैश्वर की रेखा वीच में छिन्नभिन्न हो व बृहस्पति की रेखा छोटीसी हो व मङल की रेखा भिन्न हो और सूर्य तथा चन्द्रमा की रेखा स्वल्परूपवाली होकर प्रतीत हो तो वह पराणी घने कामों का करनेवाला व भलीभांति मानित होकर मानसगुणशाली व जवकव सौभाग्यहीन व चपलस्वभाववाला होता हुआ चिन्ता से युक् रहता है॥। ८६।६०।। (देखो चित्र नं० ६) मन्दाररेखा सरलस्वरूपा तन्मध्यगा चेत्कुटिला गुरोश्र। सौभाग्यशाली मनुजस्तदानीं मानी महौजा धनतामुपैति॥ ६१ ॥ यदि शनैश्चर व मङ्गल की रखा सीधी होकर प्रतीत हो और उन दोनों के बीच में गई हुई बृहस्पति की रेखा टेदी होकर भासती हो तो वह प्राणी सौभाग्यशाली होता हुआ मानी व महावली होकर धनसमूह को पाता है । ६१॥ (देखो चित्र नं० १०) सौरी सुरेखा विशदा विभाति सर्पानुरूपा सुरवन्दितस्य। सोयं नरः स्याद्यवसायशाली वित्ताभिलाषी जनवञ्चकश्च॥ ६२॥। यदि शनैश्चर की रेखा साफ़ सीधी हो व बृहस्पति की रेखा सर्पाकार होकर प्रतीयमान होती हो तो वह भाणी रोज़गारी होकर धनाभिलापी होता हुआ जनवश्चक होताहै।।६२॥ (देखो चित्र नं० ११ ) भान्तीह भाले मनुजस्य यस्य छिन्ना विभिन्ना बहुशो हि रेखाः। पीडाकराघातमुपैति देहे दौर्भाग्यशाली दयिताविहीनः ॥६३॥ जिस भाणी के भाल में बहुतसी रेखायें छ्िन्नभिन्न होकर सोहती हों तो वह दौर्भाग्य- शाली होकर प्यारी से विहीन होता हुआ देह में कष्टकारक आघातों को पाता है ।।६३ ।। (देखो चित्र नं० १२) नीचोर्ध्वभिन्ना वृजिना हि सौरी द्विच्छिन्नकरठा धिषणाधिपा स्यात। कौजी कुरेखा यदि भाति भाले प्राप्त्वा त्वनिष्टं धननाशमेति॥६४॥ यदि शनैश्वर की रेखा निचले तथा ऊपरले भाग में भग्न होकर टेदी सोहती हो व वृहस्पतिकी रखा टेढ़ी व तीन खएडवाली होकर मतीत होती हो तथा मङल की रेखा छोटी होकर जिसके ललाट में सोहती हो तो वह माणी अनिष्ट को पाकर धनक्षय को पाता है ॥। ६४ ॥ ( देखो चित्र नं० १३ ) द्विच्छिन्नमध्या सरलार्कमूनोर्मध्ये विभिन्ना गुरुभौमयोश्र। सम्पत्तिनाशं लभते मनुष्यस्तथाधिकारीकृतवस्तुहानिम्॥६५ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य यदि शनैश्चर की रेखा सीधी होकर विचलेभाग में छोटीसी दो रेखाओं से कटी हुई पतीत होवे और बृहस्पति तथा मङ्गल की रेखा मध्यभाग में भग्न देखपड़ती हो तो वह माखी सम्पत्तिनाश व अरधिक्कृतवस्तु की हानिको पाताहै।।६५॥। (देखो चित्र नं० १४) मन्दस्य रेखा धनुषाकृतिश्चेद्वीर्वाणवन्द्यस्य तथा विभाति। भौमी गभीरा विनता यदानीं दौर्जन्ययुको मनुजोघमः स्यात्॥६६ ॥ यदि शनैथर व बृहस्पति की रेखा धन्वाकार होकर प्रतीत हो और महल की रेखा गहरी होती हुई लचीसी भासती हो तो वह पाी अधम होकर दुर्जनता में परायख रहता है।। ६६ ॥ ( देखो चित्र नं० १५) रेखा गभीरा विशदा हि सौरी विभाति वक्रा बृहतां पतेश्च। दुषटामवस्थामवलम्व्य जन्तुर्जायाभिभूतो भयतामुपैति॥६७॥ यदि शनैश्चर की रेखा विशद होकर गहरी प्रतीत हो और बृहस्पति की रखेा वक्रा कार होकर सोहती हो तो वह माणी दुष्ट अवस्था का अवलम्बनकर निज नारी से अनाद्टत होता हुआ भयसमूह को पाता है। ६७ ॥ (देखो चित्र नं० १६) भाले विशाले मनुजस्य यस्य मध्ये विभग्ना यदि भाति मान्दी। नीचोर्ध्वभग्ना वृजिना गुरोश्च साप्या सुभग्ना कुटिला हि कौजी॥६॥ सोयं मनुष्यो नरघातकारी वेश्याविहारी वनितापहारी। दुरोदराक्रान्तमना मनस्वी प्रामोति मृत्युं स्वयमेव भीत्या॥ ६६॥ जिसके विशाल भाल में यदि शनैश्चर की रेखा बीचमें कटीहुई सोहती हो व निचले तथा ऊपरले भाग में बृहस्पति की रेखा भग्म होकर टेढ़ी प्रतीत हो और मङ्ल की रखा सर्पसमान व भग्न होती हुई टेंदी होकर प्रतीयमान होती हो तो वह परायी नरहत्या कारी, वेश्याविहारी, वनितापहारी होकर जुआड़ी व मनमौजी होताहुआ डरसे आपही मौत को पाता है॥। ६८ । ६६ ॥ (देखो चित्र नं० १७) यस्यास्ति भाले विशदा गभीरा रेखा यदैका धनुषाकृतिश्चेत्। सोयं जघन्यो मनुजो जनानां नीचस्वभावो भ्रमते ऽप्यजस्रम्॥ १००॥ जिसके भाल में उज्ज्वल व गहरी होतीहुई एकही रेखा धन्वाकार होकर प्रतीत होवे तो वह पराणी मनुजों में अधम होताहुआ नीच स्वभाववाला होकर हमेशा ही ूमता रहता है।। १०० ॥ (देखो चित्र नं० १८) संमध्यभग्ना रविजस्य रेखा वामत्रिशाखा घिषणस्य भाति। सोयं मनुष्यश्चपलस्वभावश्चञ्चत्पभावोऽनृतभावमेति॥ १ ॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्ग: । यदि शनैश्चर की रेखा वीचमें भग्न होकर प्रतीयमान होती हो और यदि बृहस्पति की रेखा वामभाग में तीन शाखाओंवाली होकर सोहती हो तो वह माखी चपलस्वभाववाला व प्रदीप्त प्भाववाला होकर असत्यता को पाता है यानी भूंठा होता है॥ १ ॥ (देखो चित्र नं० १६) रेखाश्चतस्त्रो यदि भान्ति भाले संमध्यभग्ना प्रथमा चतुर्थी। सोयं नरः स्यात्सरलस्वभावः सतां चरित्रेण युतो मनीषी ॥२ ॥ यदि भाल में चार रेखायें सोहती हों उन्होंमें से पहली व चौथी बिचले भाग में कटीहुई प्तीत हो तो वह पाणी सीधे स्व्रभाववाला व बुद्धिमान् होकर सज्जनों के च- रित्रों से युक्क रहता है ॥ २ ॥ (देखो चित्र नं० २० ) सर्पाननाभा यदि भाति मान्दी कुजेज्ययोश्रेत्कुटिला विभाति। उच्चस्थलाद्ै पतितो मनुष्यो देहाभिघातं लभते नितान्तम्॥ ३॥ यदि शनैश्चर की रखा सर्वफरणकार होकर सोहती हो और मङल व बृहस्पति की रेखा टेढीसी भासती हो तो वह माणी ऊंचे स्थान से गिरता हुआ देहमें अत्यन्त चोट चपेट को पाता है ।। ३ ॥ (देखो चित्र नं० २१) मान्दी विशुग्ना यदि मध्यभग्ना नीचे विभग्नाधिपणस्य चाल्पा। मिन्ना यदोर्घ्वे सरला हि भौमी संमध्यभग्ना कुटिला रेश्च ।।४॥। दैत्योर्चिताल्पा क्षणदोधिपस्य दाम्यां विभिन्ना यदि भाति भाले। सौभाग्यहीनो हि यदा कदापि पुनर्दरिद्री पुनरेव भोगी॥ ५ ॥ यदि शनैश्चर की रखा टेढी होकर विचले भाग में भग्न हो व बृहस्पति की रेखा निचले भाग में भग्न होकर छोटीसी हो व मङल की रेखा ऊपरले भाग में भिन्न होकर सीधी हो व सूर्य की रेखा बीचमें कटीहुई टेढी सोइती हो व शुक्र की रेखा छोटीसी और चन्द्रमा की रेखा दो रेखाओं से कटी हुई प्रतीत होवे तो वह पारी जब कब सौभाग्यहीन होताहुआ फिर दरिद्री व फिर भोगी होता है ॥ ४।५ ॥ ( देखो चित्र नं० २२) अर्ेन्दुसाम्याः खलु केशनिम्ने क्षुद्रस्वरूपा यदि सप्त सन्ति। भाले विशाले गुरुभौमयोश्र सोप्ये दिरेखे विशदे विभातः ॥ ६ ।। विशाल भाल में वालों के नीचे अर्धचन्द्रसमान छोटीसी सात रखायें प्रतीत हों और वृहस्पति व मङ्गल इन दोनों की रेखायें विशद होकर सर्पाकार सोहती हों॥ ६ ॥ सोयं नरो मज्जति वारिवाहे कीलालगर्ते पतितोऽथवा स्याद्। १ शुक्कस्य २ चन्द्रस्य ३ अर्धचन्द्रसमानाकारा: ४ सर्पाकारे ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य भ्रान्तो भवार्तो भयतासमेतश्चिन्तान्वितो वै चपलस्वभावः॥।७॥ तो वह प्राखी जल में डूबता है अथवा पानी के कुएड में गिरता हुआ भ्रान्त, दुःखार्त, भयसमूहसे युक्क व चिन्तासमेत होकर चपलस्वभाववाला होता है ॥ ७॥ (देखो चित्र नं० २३) मन्दाररेखा यदि मध्यभग्ना तदन्तरे चेद्िनतागुरोश्च। सौभाग्यशाली मनुजस्तदानीं व्युत्पन्नबुद्धिर्धनतामुपैति॥८॥। यदि शनैश्चर व मङ्गल इन दोनों की रेखायें वीच में भग्न हुई प्रतीयमान होती हों और उन दोनों के वीच में बृहस्पति की रेखा लचीहुई सोहती हो तो वह पाखी सौभाग्यशाली होताहुआ व्युत्पन्नबुद्धि होकर धनसमूहाँ को पाता है।। ८ ॥ (देखो चित्र नं० २४) लग्ने मिथश्चेद्यदि मध्यभग्ने मन्देज्यरेखे कुटिले विभातः। पाशेन मृत्युं लभते मनुष्यो हत्याप्रकाएडैः सहितो नराणाम् ॥६॥ यदि शनैश्चर व बृहस्पति की दोनों रखायें परस्पर लगी या सटीहुई बीच में भग्न होकर टेढी सोहती हों तो वह प्राणी हत्यासमूहों से संयुक्क होताहुआ फांसी से मौत को पाता है।। ६ ॥ (देखो चित्र नं० २५) मान्दी गभीरा विनता विभाति स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। भौमी विसुग्ना जडुलेन युक्का हत्याकरो वै पुरुषः कठोरः॥ १०॥ यदि शनैश्चर की रेखा गहरी होकर लचीसी सोहती हो, वृहस्पति की रेखा छोटीसी हो और मङ्ल की रेखा टेढी होकर मसा से संयुक प्रतीयमान होती हो तो वह पाखी कठोर होकरं हत्याकारी होता है॥ १० ॥ (देखो चित्र नं० २६) सौरी सुरेखा सरला विभाति सुरेन्द्रवन्द्यस्य च नीचभुग्ना। स्वल्पस्वरूपा धरणीसुतस्य सौभाग्यशाली धनतासमेतः ॥११॥ यदि शनैश्ररकी रेखा सीधीसी भासती हो व बृहस्पति की रेखा निचले भाग में टेदी हो और मङ्गल की रेखा छोटीसी प्रतीयमान होती हो तो वह भाखी धनवान् होकर सौभाग्यशाली होता है ॥ ११ ॥ ( देखो चित्र नं० २७) सर्पाननाभा यदि भाति भाले भ्रूमध्यदेशे सरला विभान्ति। सोयं मनुष्यो बहुभाषणाढ्यो वामाप्रसक्को बलतासमेतः॥१२॥ यदि भालमें सर्पसमान होकर एकही रेखा सोहती हो और भौंहों के बिचले भाग में उत्तरार्द्धे प्रथमाङ:। सीधी बहुतसी रेखायें भासती हों तो वह माणी बड़ा वक्का होकर रमणियों में रत होता हुआ वलसमूहों से संपन्न होता है।। १२ ॥ (देखो चित्र नं० २८) भाले विशाले मनुजस्य रेखाश्छित्ना विभिन्ना बहुशो विभान्ति। सोपं महेच्छो बहुकार्यकारी सामान्यमात्रोऽखिलमानवानाम् ॥ १३ ॥ जिसके विशाल ाल में बहुतसी रेखायें छिन्न भिन्न होकर प्रतीत होवें तो वह प्राणी बड़ी चाहनावाला व घने कार्यों का करनेहारा होकर समस्त मनुष्यों में सामान्यमात्र होता हं॥ १३ ॥ ( देखो चित्र नं० २६) नीचोर्ष्वभग्ने कुजमन्दरेखे दक्षे च वामे भुजगानने स्तः। तदन्तरं चेत्पविलाञ्छनाव्यं पाशेन मर्त्यों मृतिमेति नूनम् ॥ १४॥ मङल और शनैश्चर की रेखायें निचले तथा ऊपरले भागमें सर्पानन के समान होकर मासती हों और उन दोनों के मध्य में वज्जाकारसा निशान प्रतीयमान होता हो तो वह पाणी निश्चयकर फांसी से मौतको पाता है ॥ १४ ॥ (देखो चित्र नं० ३०) सौरी सुरेखा विनता यदानीं भुग्नस्वरूपा धिषणस्य भाति। संमध्यभग्ना धरणीसुतस्य दीर्घा गभीरा कुटिला खेश्र।। १५॥ महाधनाढ्यो मनुजो मनीषी सौभाग्यशाली सुखदो जनानाम्। दाता दयालुर्दयितानुरक्ो धन्यो धरायां धरया समेतः ॥ १६॥ यदि शनैश्चर की रखा बड़ीभारीं होकर लचीसी प्रतीत हो व बृहस्पति की टेदी होकर सोहती हो व मङ्गल की रेखा बीचमें भग्न होकर भासती हो और सूर्यकी रेखा दीर्घाकार व गहरी होकर टेढीसी दीखती हो तो वह पाणी महाधनवान, बुद्धिमान्, सभाग्यशाली, जनसुखदायक, दाता, दयालु व दयिता में अनुरक् होकर धरासमेत रामएडल में पशंसनीय होता है॥ १५ । १६ ॥ ( देखो चित्र नं० ३१) मन्देज्यरेखे यदि मध्यभग्ने कौजी सुरेखा सरला विभाति। स्वल्पस्वरूपा दिनपस्य भाति वामे विभुग्ना किल भार्गवीया ॥१७॥। व्युत्पन्नवुद्धिर्मनुजो हि शास्त्री सौभाग्ययुक्को धनतासमेतः । प्रवश्चनाशन्यवपुर्विलासी सदृत्तशाली चतुरोतिकोपी ॥ १८ ॥ यदि शनैश्चर व बृहस्पति की रेखा बीच में भग्न होकर भासती हो व मङ्गल की खा दीर्घाकार होकर सीधी सोहती हो व सूर्यकी छोटीसी व शुक्रकी रेखा बायें तरफ़ सामुद्रिकशास्त्रस्य रेदीसी देख पड़ती हो तो वह प्राणी शास्त्री, व्युत्पन्नबुद्धि, सौभाग्यवान्, धनवान्, छलरहि व अच्छे चरित्रोंवाला व चतुर होकर महाकोपी होता है ॥ १७। १८ ॥। (देखो चि् नं० ३२ ) स्वल्पा विभुग्ना रविजस्य रेखा सर्पाननाढ्या घिपणस्य भग्ना। शाखासमेता विनता हि भौमी मूढो मनुष्यो नरघातकारी॥ १६॥। यदि शनैश्चर की रेखा छोटीसी होकर टेदी व बृहस्पति की रेखा बीचमें भग्न होक सर्पानन से संयुक्त हो और मङ्गलकी रेखा शाखा समेत होकर लचीसी भासती हो तो वह माी महामूर्ख होकर नरहत्याकारी होता है॥ १६ ॥ (देखो चित्र नं० ३३) मान्दी गभीरा विनता विभाति स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। पृथ्वीतनूजस्य तनुस्वरूपा दीर्घाद्विभिन्ना युमऐोर्नता चेत्॥ २० । सोयं जन: स्यात्कलहानुरको महाप्रकोपी मदनातुरात्मा। खङ्गप्रहारेण हतस्समीके शस्त्रपहारैरुत खयिडतश्च ।। २१।। यदि शनैश्चर की रेखा गहरी होकर लचीसी सोहती हो, बृहस्पति की रेखा छोटी सी हो, मङलकी रखा गहरी होकर सूक्ष्मरूप से प्रतीयमान होती हो और सूर्य की रेखा गहरी व दो रेखाओं से कटी हुई लचीसी भासती हो तो वह पाणी कलही, कोपी कामी होकर समर में तलवार से माराजाता है या शख्तों के महारों से काटाजात है॥ २० । २१ ॥ ( देखो चित्र नं० ३४ ) मोन्दी विभुग्ना यदि नीचभग्ना बृहस्पतेश्चेद्विनता विभाति। भौमी सुदीर्घा वृजिना यदानीं संमध्यभग्ना कुटिला खेश्च॥ २२।। सोयं नरः स्यात्कलहानुरक्तो रूक्षस्वभावः शठतासमेतः। उपद्रवाक्रान्तमना मनस्वी मन्दो मलाव्यो जनवञ्चकश्च ॥ २३॥ यदि शनैश्चर की रेखा टेढ़ी होकर निचले भाग में भग्न होती हुई सोहती हो व बृहस्पति की रेखा लचीसी भासती हो व मङल की रखा दीर्घाकार होकर टेडी हो और सूर्य की विचले भाग में भिन्न होकर वक्राकारसी सोहती हो तो वह प्राखी कलही, कठोर स्वभाववाला, शठतासंपत्र, उपद्रवी, मनमौजी, मूर्ख व मैला होकर जनों का छलनेवाल होता है॥। २२ । २३ ।। ( देखो चित्र नं० ३५) मान्दी विभुग्ना परितो विभग्ना दीर्घा विभिन्ना सरला गुरोश्र। मध्ये च भग्ना कुटिला कुजस्य चापानुरूपा युमपेर्यदानीम्॥२४॥ १"मन्दो मूर्खें शनैश्चरे" (इति विश्वः)॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क: । यदि शनैश्चर की रेखा चारों तरफ़ भग्न होकर टेदीसी भासती हो व बृहस्पति की खा दीर्घाकार होकर सीधी सोहती हो व मङ्गल की रेखा विचले भाग में कटी फटी हुई टेढीसी प्रतीत होवे और सूर्य की रखा धन्वाकार होकर भासती हो॥ २४॥ संमध्यभग्ना किल भार्गवीया रामारतो वै रसिको मनुष्यः। सत्यप्रवक्का सरलस्वभावो नग्रो हि वेत्ता विनयी जयी च ॥ २५॥। यदि शुक्र की रेखा विचले भाग में कटी हुई भासती हो तो वह माणी रमणीरत, सज्ञाता, सत्यवक्वा होकर सीधे स्वभाववाला नम्र, वेत्ता और विनयी होता हुआ जीतनेवाला होता है।। २५ ॥ (देखो चित्र नं० ३६) दक्षे विभग्ना वृजिना हि मान्दी दीर्घा गभीरा विनता गुरोश्र। स्वल्पा विभ्ुग्ना धरणीसुतस्य व्याजेन व्याप्ः सरलस्वभावः॥२६॥ यदि शनैश्चर की रेखा दाहिने भाग में भग्न होकर टेदी सोहती हो व बृहस्पति की खा गहंरी होकर लचीसी भासती हो और मङलकी रेखा छोटीसी होकर टेदी देख पड़ती हो तो वह पाणी कपटसे घिरा हुआ सीधे स्वभाववाला होता है॥ २६ ॥ ( देखो चित्र नं० ३७ ) मध्ये विभिन्ना कुटिला हि मान्दी दक्षे च भग्ना बृहतां पतेश्र। वक्रार्कयोश्रेत्खलु दक्षसार्प्या

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 10)

व्युत्पन्नबुद्धिर्धननाशमेति ॥ २७ ॥ यदि शनैश्चर की रेखा बीच में भिन्न होकर टेढी सोहती हो व बृहस्पति की रेखा बिचले भाग में कटी व टेढ़ी होकर दाहिने भाग में भग्न होती हुई भासती हो एवं मझल व सूर्य की रेखा दाहिनी तरफ़ सर्पाकार प्रतीयमान होती हो तो वह प्राणी व्युत्पन्नवुद्धि वाला होकर धनक्षय को पाता है।। २७ ॥। (देखो चित्र नं० ३८) सौरी सुदीर्घा विनता गभीरा दक्षे च भागे जेडुलेन युक्का।. ऊर्ध्वे विभिन्ना कुटिला गुरोश्र सर्पानुरूपा यदि भाति भौमी॥२८॥ संभ्रान्तचित्तो मनुजोऽतिखिन्नो वेत्ता विशुद्धो विगताभिमानः। उच्चस्थलाद्वै पतितो भयार्तः सांघातिकार्ति लभते नितान्तम्॥२६॥ यदि शनैश्चर की रेखा दीर्घाकार, लची व गहरी होकर दाहिने भाग में मसा से संयुक्क दोकर भासती हो व बृहस्पतिकी रेखा ऊपरले भाग में भिन्न होकर टेढ़ी सोहती हो और यदि मङल की रेखा सर्पसमान रूपवाली होकर प्रतयिमान होती हो तो वह पाणी संभ्रान्त १ मशकेन युक्त: २ वृहस्पतेः ३ भौमस्य ४ जञाता ॥ सामुद्विकशास्त्रस्य मनवाला, महाखिन्न, ज्ञाता, पवित्रात्मा, अभिमानरहित होकर ऊंचे स्थल से गिरा व भन से घवड़ाता हुआ गाढी सांघातिक पीड़ा को पाता है ।२=।२६॥ (देखो चित्र नं० २६) अर्धेन्दुयुके खलु चोर्ध्वभागे मन्देज्यरेखे सरले विभातः। सूर्येन्दुयोगो यदि भाति भाले सौभाग्यशाली पुरुषो नितान्तम्॥ ३०॥ यदि शनैश्चर व बृहस्पति की रेखा ऊपरले भाग में अरधचन्द्राकार निशान से संयुक् होकर सीधी सोहती हो और यदि भाल में सूर्य व चन्द्रमा की रेखा का योग भासता हो तो वह पाी बड़ा सौभाग्यशाली होता है॥ ३० ॥ (देखो चित्र नं० ४०) ऊर्ध्वे विभिन्ना विनता हि मान्दी दीर्घा विनम्रा धिपणस्य रेखा। संमध्यभिन्ना कुटिला हि कौजी भमध्यदेशे लसित त्रिशलम्॥३१॥ देहाभिघातं लभते मनुष्यः पातस्य हेतोरतिहानिमेति। प्रेमास्पदो वै वनिताविलासी प्रसन्नमूर्तिर्जनरञ्जकश्र॥३२॥ यदि शनैश्र की रेखा ऊपरले भाग में कटकर लचीसी भासती हो व बृहस्पति की रखेा दीर्घाकार होकर लचीसी देख पड़ती हो व मङल की रेखा वीच में कटी हुई टेही सी प्रतीत हो और यदि भौंहों के बीच में त्रिशुलाकार निशान सोहता हो तो वह मार्ए देह में आघात को पाता है व गिरने के कारण बड़ी हानि को पहुँचता है व प्रेम का घ होकर वनिताओं में विलास करता हुआ प्रसन्नमूर्ति होकर जनों का मनोरख्जक होता है।। ३१।३२ ।। ( देखो चित्र नं० ४१) सर्पारयमाना यदि भाति सौरी स्वल्पस्वरूपा सुरपूजितस्य। दक्षत्रिशाखा धरणीमुतस्य वामैकशाखा विशदा यदानीम्॥३३॥ यदि शनैश्चर की रेखा सर्पाकार के समान होकर भासती हो व बृहस्पति की रेख छोटीसी पतीत हो और मङलकी रेखा दाहिनी तरफ़ तीन शाखावाली व बायें, भाग एक शाखावाली होकर साफ़ सोहती हो ॥। ३३॥ ऐश्वर्यहीनो मनुजोऽतिलोलो विश्वासघाती बलदर्पितश्र। प्रवञ्चकोऽयं जगतो जनानां घूर्तस्वभावो ह्यतिगौरवाढ्यः॥३४॥ तो वह माणी ऐश्वर्यहीन, अतिचश्चल, विश्वासघातक व बलगर्वित होताहुआ संसारी जनों का छलनेवाला व धूर्त स्वभाववाला होकर अति गौरवता से संपन्न होता है॥३४॥ (देखो चित्र नं० ४२) १ सर्पसमाना २ शनैश्चरस्य रेखा ३ बृहस्पतेः ४ महाचञ्चलः ॥ उचरार्द्धे प्रथमाङ्क। धन्वाकृतिश्ववेद्विनन्दनस्य सर्पानुरूपा सुरवन्दितस्य। वामे विभग्ना महिजस्य भुग्ना स्यान्मानवो वै नरघातकारी॥ ३५। यदि शनैश्चरकी रेखा धन्वाकार होकर प्रतीत होने व बृहस्पतिकी रेखा सर्पाकार ोकर भासती हो और यदि मङलकी रेखा टेढी होकर ामभाग में कटीफटीसी सोहती हो तो वह पराणी नरघातक होता है। ३५ ॥ (देखो चित्र नं० ४३) सर्पाननामां विशदस्वरूपां गुरोश्र स्वल्पा समुपैति सौरीम। वक्रा यदानीं शशिजस्य रेखा हिंसो विवादी कलही नरः स्यात्॥३ ६॥ यदि छोटीसी बृहस्पति की रेखा सर्पसमान मुखवाली विशदस्वरूप शनैश्चर की रेखा के पास पहुँच गई हो और यदि बुध की रेखा वक्राकार होकर प्रतीत हो तो वह पाणी इंसाशाली व विवादी होता हुआ लड़ाका होता है ॥ ३६ ॥ ( देखो चित्र नं० ४४) मन्देस्वरूपा यदि भाति मान्दी दक्षे विभिन्ना धिषणस्य दीर्घा। करठे विभग्ना कुटिला हि कौजी नीचे गभीरा श्रेंतिमेति वामाम्॥३७॥ यदि शनैश्चरकी रेखा मन्दस्वरूपवाली होकर प्रतीत होवे तथा बृहस्पति की रेखा हाहिने भागमें विभिन्न होकर दीर्घाकार सोहती हो और यदि मङल की रेखा कएठ- भाग में विभिन्न होतीहुई टेदी व निचले भाग में गहरी होकर बायें कान के पास पहुँच ई हो॥ ३७ ॥ सोयं मनुष्यो नरघातकारी ह्यनिष्टकारी प्रमंदाविहारी। व्यूताभिलाषी भ्रमते नितान्तं क्रोधाभिभूतो मदनाकुलश्च ॥३८॥ तो वह माखी नरघातक, अनिष्टकारक, प्रमदाविहारी व जुआड़ी होकर क्रोध से भुंभ- नाता व काम से घवड़ाता हुआ हमेशा घूमा करता है।। ३८ ॥ (देखो चित्र नं० ४५) स्वल्पस्वरूपा यदि भाति सौरी संमध्यभिन्ना विशदा गुँरोश्र। दीर्घा विनग्रा कुटिला हि कौजी छिन्ना विभिन्ना किल भार्गवीया॥३६। यदि शनैश्चर की रेखा छोटीसी होकर सोहती हो व बृहस्पति की रेखा विचले भाग में कटती हुई साफ़ भासती हो और यदि मङल की रेखा दीर्घ, लची व टेड़ी होकर पतीत होती हो तथा शुक्र की रखा दाहिने भाग में कटी व विचले भाग में भग्न होकर सोहती हो ॥ ३६ ॥ सोयं नरः स्यात्सरलस्वभावो दानी च मानी च महाभिमानी। क्रोधी परस्त्रीं भजतेप्यजसं मित्राभिभूतो मदनातुरश्र ॥ ४०॥ १ स्वल्पस्वरूपा २ बृह्दस्पते: ३ मङ्कलस्येयम् ४ कर्राम् ४ रमएरितः ६ शनैश्चरस्य ७ बृहस्पतेः ८ मङ्गलस्य ६ शुकस्य रखेति यावत् ।। सामुद्िकशास्त्रस्य तो वह पाणी सीधे स्वभाववाला, दाता, मानी व महाभिमानी होता हुआ क्रोधी, मित्रों से तिरस्कृत व कामातुर होकर परस्त्री का सेवन करता है ।। ४० ॥ (देखो चित्र नं० ४६) मान्दी गभीरा यदि भाति स्वल्पा वेत्रस्वरूपा बृहतांपतेश्र। भ्रमध्यदेशो बहुकेशयुक्: संपत्तिशाली धनिक: सुभार्य:॥ ४१॥ यदि शनैश्चर की रेखा गहरी व छोटी होकर सोहती हो व वृहस्पति की रेखा वेत्र रूपा होकर भासती हो और यदि भौहों का मध्यदेश बहुत वालों से युक्र होताहुआ प्रतीयमान होता हो तो वह माणी संपत्तिशाली व धनवान् होकर अ्रनेक भार्याओरंवाला होता है ॥। ४१ ॥ ( देखो चित्र नं० ४७ ) सौरस्य रेखा यदि भाति चाल्पा भुग्ना गुरोवै निकटार्धवृत्ता। दक्षभ्रकुव्यां लसितैकरेखा भ्रूमध्यदेशो बहुकेशयुक्क:॥४२॥ यदि शनैश्चरकी रेखा छोटीसी भासती हो व बृहस्पति की रेखा टेढ़ी होकर निकटवर्ती अ्र् छृत्ताकार से युक्क हो व दाहिनी भृकुटी पर छोटीसी एक रेखा शङ्गाकार प्रतीत हो और यहि भौहों का बिचला भाग घनेवालों से संयुक्त होकर सोहता हो॥४२॥ मस्ताभिघातं लभते मनुष्यो विदंशितः स्यात्खलु कुक्कुरादैः। विषप्रयोगैरतिशङ्गितश्र क्रोधाभिभूतो अयतामुपैति॥४३॥ तो वह माी मस्तक में चोट चपेट को पाता है व कूकुर आदि दुष्टजीवों से डसा विषप्रयोगों से अत्यन्त डरा व क्रोधसे घबड़ाता हुआ भयसमूहों को पाता है॥ ४३ (देखो चित्र नं० ४८) भुग्ना गभीरा यदि भाति मान्दी दीर्घा विनय्रा विशदा गुरोश्र। सर्पाननाभा विनता हि कौजी संमध्यभिन्ना झुमणोर्यदानीम् ॥ ४४॥ यदि शनैश्चर की रेखा टेढ़ी व गहरी होकर सोहती हो व बृहस्पति की रेखा दीर्घा कार होकर लची व विशद होती हुई प्रतीत हो तथा मङ्ल की रेखा सर्पानन के समान होकर लचीसी भासती हो और यदि बीच में भग्न हुई सूर्य की रेखा सोहती हो॥४४ सौभाग्यशाली सुषमासमेतः सौन्दर्ययुको नितरामुदारः। सुखी सुविद्यो महतामुपासी मान्यो जनानां सुखदोऽनुजानाम्॥४५ तो वह प्राखी सौभाग्यशाली व शोभासमेत व सुन्दरता से युक् बड़ा उदार, सुखी अच्छी विद्यावाला होकर महात्माओं का उपासी व जनों का माननीय होता हुआ भाइयों को सुखदायक होता है।। ४५ ॥ (देखो चित्र नं० ४६) उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क: । स्वल्पा गभीरा विनता हि सौरी संमध्यभिन्ना वृजिना गुरोश्च। दीर्घा विशुद्धा विनता हि कौजी त्यागी धनी साहसिको नरःस्यात्।४६।। यदि शनैश्चर की रेखा छोटी व गहरी होकर लचीहुई भासती हो व बृहस्पति की खा बीच में भग्न होती हुई टेढ़ी सोहती हो और मङ्लकी रेखा दीर्घाकृति व विशद होकर लचीसी प्रतीयमान होती हो तो वह पाणी त्यागी व धनत्रान् होकर साहसिक होता है॥। ४६ ॥ ( देखो चित्र नं० ५०) नीचोर्ध्वभिन्ना यदि भाति मान्दी संकर्तिताल्पा सुरपूजितस्य। छिन्ना विभिन्ना वृजिना बुधस्य भूमध्यदेशो विशदो द्विशूलः॥ ४७॥ यदि शनैश्चर की रेखा निचले तथा ऊपरले भाग में भिन्न होकर सोहती हो व बृहस्पति की रेखा कंटती हुई छोटीसी प्रतीत हो और यदि दुध की रेखा छिन्न व भिन्न हकर टेढी भासती हो तथा भौहोंका विचला भाग विशुद्ध होकर दो रेखाओंवाला भासता हो॥ ४७ ॥ सोयं मनुष्यश्चतुरोऽतिविज्ञो मिष्टपभाषी परिणामदर्शी। क्ान्त्याविहीनो Sखिलकार्यदक्षो व्युत्पन्नबुद्धिःखलु साहसी स्यात्॥४=।। तो वह पाणी चतुर, अतिविज्ञ, मधुरभापी, परिणामदर्शी, ग्लानिहीन व समस्त कायोंमें प्वीण होकर व्युत्पन्नवुद्धि होता हुआ साहसी होता है।। ४८ ॥ (देखो चित्र नं० ५१) चापानुरूपा रविजस्य रेखा सर्पायमाना सुखवन्दितस्य। भौमी सुदीर्घा खलु वामभुग्ना चाएडी सशाखा यदि सव्यभुग्ना।।४६।। यदि शनैश्चर की रेखा धन्वाकार होकर प्रतीत होवे व बृहस्पति की रेखा सर्पसमान होकर भासती हो व मङल की रेखा दीर्घाकार होकर वामभाग में टेढी हो और यदि सूर्य की रेखा शाखा समेत वायें तरफ कुटिलरूप से भासती हो॥४६॥ संमध्यभिन्ना किल भार्गवीया शान्त्या विहीनो मनुजोतिलुब्धः। नामोति सिद्धिं सकले सुकार्ये परिश्रमं वै कुरुते नितान्तम्॥ ५० ॥ और यदि शुक्र की रेखा बिचले भाग में कटी हुई प्रतीयमान हो तो वह पाणी शान्ति- हीन, अतिलोभी होकर समस्त कार्यों में सिद्धि को नहीं पाता व बड़ा परिश्रम करता है यानी दिन रात उद्योग में ही लगा रहाता है॥ ५० ॥ (देखो चित्र नं० ५२) सामुद्विकशास्त्रस्य नीचे विभग्ना सेरला हि सौ'री वामप्रचापा धिषणस्य भग्ना। कौजी सशाखा यदि नीचभिन्ना सॉप्या विभिन्ना दिनपंस्य भाति॥५१॥ यदि शनैश्चर की रेखा निचलेभाग में भग्न होती हुई सीधी होकर प्रतीत हो व बृहस्पति की रखा कि जिसके वामभाग में धन्वाकार चिह्न भासता हो व निचले विचले तथा ऊपरले भाग में भग्न होकर प्रतीत हो व मङ्गल की रेखेा शाखासमेत निचले भाग में भिन्न हो और यदि सूर्य की रेखा सर्पसमान होकर भिन्न होती हुई भासती हो॥५१॥ ऊर्ध्वेगभीरा यदि मध्यभग्ना काव्यँस्य रेखा नितरां विभाति। सोयं नरःस्यात्सकलप्रधानः सच्छीलयुको गुणभूषितश्च।। ५२॥ यदि शुक्र की रेखा ऊपरले भाग में गहरी होकर विचले भाग में कटती हुई अत्यन्त सोहती हो तो वह प्राणी समस्त मनुष्यों में मुखिया होकर भले स्वभाव से संयुत होता हुआ गुणों से भूषित होता है॥। ५२ ॥ विद्धान्विदेशी खलु धार्मिकश्च दाता धनी स्यादुपदेशकर्ता। मान्यो वदान्यो ममताविहीनो विध्वस्तवाघोभ्रमतेऽव्यजस्रम्॥५३॥ विद्वान्, विदेशवासी, धार्मिक, दाता, धनवान्, उपदेशक, माननीय व बड़ा वक्रा होकर ममता से रहित व वाधाविहीन होता हुआ निरन्तर विचरा करता है।। ५३ ॥ (देखो चित्र नं० ५३) अथ आलस्थतिलादिलाञछ्नादन्याङ्गेपु तिलादिज्ञानमाह- नार्या यदा वा पुरुषस्य भाले दक्षे च मध्ये च तथा हि वामे। तिलादि चिह्नं यदि दृश्यते चेदन्यत्र चिह्नं विदुषा विचिन्त्यम्॥५४॥ यदि नारी या नरके भाल में दाहिने, विचले, तथा वामभाग में विल आदि का चिह्न प्रतीयमान होता हो तो विद्वान् को अन्य अङ्गों में भी तिल आदि का चिह्न विचारना चाहिये ॥ ५४ ॥ (देखो चित्र नं० ५४) १-दक्षे च भागे खलु मन्दनिश्ने चन्द्राङ्कपार्श्वें तिलको विभाति। स्पृशेन्न मन्दं यदि दक्षभागे ब्रैयादुरस्थं तिलकं तदानीम्॥ ५ ५॥ यदि शनैश्चर की रेखा के नीचे दाहिने भाग में एक अङ्क के समीप तिल का चिह्न १ सीधी २ शनैश्वरस्य ३ गुरो: ४ मङ्गलस्य ५ सर्पसमाना ६ सूर्यस्य ७ शुक्रस्य म शनैश्वर निम्ने ६ एकाङ्कसमीपे १० कथयेदिति॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क:। सोहता हो और यदि शनि रेखा को छूता न हो तो दाहिनी ओर वक्षस्थल में टिके हुए तिलको कहना चाहिये।। ५५ ॥ २-गुरोश्र निम्ने खलु दक्षभागे युग्माङ्कपार्श्वे तिलकादिकं स्यात। नो स्पृश्यते चेन्ु गुरुर्न भौमो दक्षे च पार्श्वे प्रवदेत्तिलाद्यम्॥ ५६।। यदि बृहस्पति की रेखा के नीचे भाग में दाहिनी ओर दो २ अङ्क के समीप तिलक आदि सोहतेहों और यदि गुरुरेखा व भौमरेखा को छूते न हों तो दाहिने पार्श्व में तिल आदि को कहना चाहिये । ५६॥ ३-दक्षे च भागे खलु भौमनिम्ने वह्यङ्पारश्वें यदि भाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते चेद्धरणीतनूजो दक्षे च वाहौ भणितं तिलाद्यम्॥। ५७।। यदि मङ्लरेखा के नीचे दाहिने भाग में ३ अङ्कके निकट तिल आदिका चिह्न सोहता हो और यदि वह भौमरेखा को छूता न हो तो दाहिनी भुजाके ऊपर तिल आदि का चिह्न कहाजाता है॥ ५७ ॥ 8-सूरस्य निम्ने खलु दक्षभागे वेदाङपार्श्वें यदि भाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते चेह्दिनपस्य रेखा पृष्ठस्य दक्षे तिलकं वदन्ति ॥ ५८॥ यदि सूर्य की रेखा के नीचे दाहिनी ओर ४ अङ्ग के निकट तिल आदि का चिह्न सोहता हो और यदि वह सूर्यरेखा को स्पर्श न करता हो तो पीठके दाहिने भाग में तिल को कहते हैं॥। ५८ ॥ ५-काव्यस्य निम्ने खल दक्षभागे बाणाङ्कपार्श्वे यदि भाति चिह्हम्। नो स्पृश्यते चेद्ृगुजस्य रेखा विद्यात्तिलादं जठरस्य दक्षे॥ ५६॥ यदि शुक्र की रखा के निचले भाग में दाहिनी ओर पांच ५ अङ्क के पास तिल आदि सोहता हो और यदि पूर्वोक़ रेखा को छूता न हो तो पेटकी दाहिनी ओर तिल आदि जानना चाहिये॥। ५६ ।। ६-दक्षे च भागे खलु सौम्यनिम्ने शास्त्राङ्पाश्वे यदि भाति चिह्नम्। नो स्पृश्यते चेच्छाशीजस्य रेखा वत्सस्य दक्षे प्रवदेत्तिलाद्यम् ॥ ६०।। यदि बुधरेखा के निचले भाग में दाहिनी तरफ़ छः अङ्कके समीप तिल आदिका चिह्न प्रतीत होता हो और यदि पूर्वोक्क रेखा को छूता न हो तो वक्षस्थल के दाहिनी ओर तिज़ आ्रादिको कहना चाहिये ॥ ६० ॥ ७-दक्षे च भागे खलु चन्द्रनिम्ने शैलोङ्कपाश्वें तिलको विभाति। १ बुधस्यनीचे २ षडङ्कपाश्वे ३ बुधस्य ४ सप्तमाङकपाश्यें। सामुद्रिकशास्त्रस्य नो कर्तिता चेत्किल सोमरेखा तुन्दस्य दक्षे तिलकं भणन्ति॥ ६१॥ यदि चन्द्ररेखा के निचले भाग में दाहिनी ओर ७ अङ्क के समीप तिल आदि का चिह्न सोहता हो और यदि उक्करेखा का स्पर्श नहीं करता हो या कटा हुआ नहीं प्रतीत हो तो पेट के दाहिने तरफ़ तिल आदि को कहते हैं ॥ ६१ ॥ द-वामे च भागे खलु सौरिनिम्ने नागाङ्कपार्श्वें यदि भाति चिह्नम्। स्पृशेन्न मन्दं न गुरुं यदानीं पृष्ठस्य वामे तिलकं वदन्ति ॥ ६२॥ यदि शनिरेखा के निचले भाग में वांई तरफ़ - अङ्क के समीप तिल आदि का चिद्व सोहता हो और यदि शनैश्चर व बृहस्पति रेखा को स्पर्श नहीं करता हो तो पीठके बाई और तिज् आदि को कहते हैं ॥ ६२ ॥ ह-वामे च भागे धिषणस्य निम्ने नन्दाङ्गपार्श्वे यदि भाति चिह्नम्। जयात्मुधीरो जठरस्य वामे तिलादिचिह्नं भषतं सुधीभिः॥६३.॥ यदि गुरुरेखा के नीचे वामभाग में E नव अङ्क के समीप तिल आदिका चिह्न सोहता हो तो पणडत को पेट के बाई ओर तिल आदि का चिह्न कि जिसको सामुद्रिकवे ताओं ने बतलाया है कहना चाहिये ।। ६३ ॥ १०-भालस्य वामे कुजकस्यनिम्ने दिशाङ्कपार्श्वे यदि लाञ्बनं चेत। वदेत्तदानीं खल वामवाहौ चिह्नं तिलादं मुनिभिः प्रणीतम्॥ ६४॥ जिस प्राखी के विशाल भाल में वांई ओर भौमरेखा के नीचे दश शङ्क के समीप यदि तिलादि का चिह्न प्रतीत होता हो तो उसकी बाई भुजा में तिलादिका चिह्न कि जिसको मुनियों ने कहा है उसे बताना चाहिये।। ६४ ॥ ११-व्रश्नस्य वामे यदि नीचभागे रुद्राङ्गपार्श्वें तिलकादिकं चेत्। वत्सस्य वामे प्रवदेत्तिलादं वेत्ता विपश्चित्पुरुषस्य नूनम् ॥ ६५॥ यदि सूर्य के वाम भाग में नीचे तरफ़ ११ अङ्क के समीप तिल आि का चिह्न प्रवीत होता हो तो उस प्राणी के वक्षस्थल में बाई ओर ज्ञाता परिडतों को निश्चयकर तिनादि का चिह्न कहना चाहिये॥ ६५ ॥ १२-वामे च भागे भृगुजस्य निम्ने सूराङपारश्वें तिलको विभाति। नो स्पृश्यते चेच्छैशिजो न शुक्रो वामांसके वै प्रवदेत्तिलाद्यम्॥६ ६।। यदि शुक्ररेखाके वामभाग में नीचे तरफ़ १२ बारह अङ्कके समीप तिज्ञ आादिका निशान १ भीमस्यनिस्ने े बुधः ॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क । सोहता हो और यदि वुधरेखा व शुक्ररेखा को छूता न हो तो वायें स्कन्ध के ऊपर तिलादि को कहना चाहिये ॥ ६६ ॥ १३-सौम्यस्य निम्ने खलु वामभागे विश्वाङ्कपार्श्वें तिलकादिकं चेत्। वदेद्विपश्चिन्मनुजस्य तस्य पार्श्वे च वामे विशदं तिलाद्यम् ॥ ६७।। जिस माखी के भाल में वुधरेखा के नीचे वांई तरफ़ तेरह अङ्क के समीप की जगह में यदि तिल आदि का निशान सोहता हो तो उसके वामपार्श्व में पणिडत को तिल आदि का चिह्न कहना चाहिये॥ ६७ ॥ १४-शैकाङ्कपार्श्वे खलु वामभागे चन्द्रस्य निम्ने तिलको यदानीम्। स्पृशेन्न भिन्द्यान्न हि चन्द्ररेखां ब्रूयात्तिलादं जठरे च नाम्याम् ॥६८॥ जिसके भाल में चन्द्ररेखा के नीचे बाई ओर चौदह अङ्क के समीप तिल आदि का चिह्न सोहता हो और यदि पूर्वोक़ रेखा को छूता न हो और न भेदन करता हो तो उसके पेट और तोंदी में तिलादि कहना चाहिये।। ६८ ॥ १५-भाले विशाले यदि मध्यदेशे मन्दस्य निम्ने तिलको विभाति। नो स्पृश्यते चेत्खलु मन्दरेखां विद्यात्तिलादं जठरस्य मध्ये॥६६॥ यदि विशाल भाल में शनिरेखा के नीचे मध्यभाग में तिल आदि का चिह्न पतीत होता हो और यदि मन्दरेखा को न छूता हो तो पेट के वीच में तिल आदि का निशान कहना चाहिये॥ ६६॥ १६-कपालमध्ये धिर्षेणस्य निम्ने चिह्नं तिलादं खलु दृश्यते चेत्। स्पृशेन्न रेखां सुरवन्दितस्य वक्षस्थले वै प्रवदेत्तिलाद्यम्॥ ७०॥ ललाट के मध्यभाग में बृहस्पति की रखा के नीचे यदि तिल आदि का चिह्न देखा जाता हो और यदि पूर्वोकरेखा का स्पर्श नहीं करता हो तो वक्षस्थल में तिलादि का चिह्न कहना चाहिये।। ७० ॥ १७-चिह्नं यदानीमलिकस्य मध्ये भौमस्य निम्ने विशदं विभाति। स्पृशेन्न रखां धरेणीसुतस्य प्रोच्यात्तिलादयं जठरस्य वामे ॥७१॥ यदि ललाट के मध्यभाग में भौमरेखा के नीचे उज्जवलरूप तिल आदि का चिह्न मतीयमान होता हो और यदि मङल की रेखा का स्पर्श नहीं करता हो तो पेट के वाम भाग में तिल आदि का चिह्न कहना चाहिये।। ७१ ॥ १ विद्ान् २ चतुर्दशाङ्कसमीपे ३ शनिरेखाम् ४ बृह्दस्पतेः ५ भौमस्य ६ कथयेदिति॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य १८-लालटमध्ये दिनपस्य नि्ने तिलादि चिह्नं यदि दृश्यते चेत। स्पृशेन्न रेखां दिननायकस्य ब्रूयात्तिलादयं जठरस्य मध्ये॥७२॥ यदि कपाल के बीच में सर्यरखा के नीचे तिल आदि का चिह्न देखाजाता हो और यदि पूर्वोक्करेखा को छूता न हो तो उस प्राखणी के पेट के मध्य में तिलादि कहना चाहिये। ७२॥ १६-भालस्य मध्ये भृगुजस्य निम्ने तिलादि चिह्नं यदि लक्ष्यते चेत। स्पृशेन्न रेखां खल्तु भार्गवस्य वर्त्सैस्य मध्ये प्रवदेत्तिलाद्यम्।। ७३ ।। यदि ललाट के मध्य में शुक्र के नीचे तिल आदि का चिह्न प्रतीयमान होता हो और यदि पूर्वोक़रेखा को छूता न हो तो उस माणी के वक्षस्थलमें तिलादिको कहना चाहिये।।७३।। २०-सौम्यस्य निम्ने हि कपालमध्ये चिह्नं तिलादं यदि दृश्यते चेत्। स्पृशेन्न रेखां किल भार्गवीयां वत्सस्य निश्ने तिलकं वदन्ति॥७४। यदि कपाल के मध्य में बुधके नीचे तिल आदि का चिह्न देखा जाता हो और यदि शुक्र- रेखा का स्पर्श नहीं करता हो तो वक्षस्थल के नीचे तिल को कहते हैं॥ ७४॥ २१-चिह्नं यदाचेदलिकोन्तराले चन्द्रस्य निम्ने विशदं विभाति। स्पृशेन्न रेखां क्षणंदाधिपस्य बयादपाँने तिलकं तदानीम्॥ ७५॥ यदि ललाट के मध्यभाग में चन्द्ररेखा के नीचे उज्ज्वलरूप चिह्न सोहता हो और यदि पूर्वोकरेखा का स्पर्श न करता हो तो उस माणी के गुदादेश में तिलादि चिह्न कहना चाहिये। ७५॥ २२-भाले विशाले खलु दक्षभागे मन्दस्य शेषे यदि भाति चिह्म्। संस्पृश्यते चेत् खलु सौरिरेखा दक्षोरुसंस्थं प्रवदेत्तिलाद्यम्॥ ७६॥ यदि विशाल भाल में दाहिनी तरफ़ शनिरेखा के शेपभाग में तिलादि का चिह्न सोहता हो औरै यदि सौरिरेखा को भलीभांति छूता हो यानी मिलाप करताहो तो दाहिनी ऊर में तिलादि का निशान कहना चाहिये॥ ७६॥ २३-भालस्य दक्षे िषणस्य शेषे चिह्नं तिलादं यदि दृश्यते चेत्। दक्षोरुसन्धौ मनुजस्य तस्य बूयात्मुधीरो विशदं तिलाद्यम्॥ ७७॥ ललाटकी दाहिनी तरफ़ 'गुरुरेखा के शेषभाग में य.दे तिलादि का निशान देखा जाता हो तो उस माणी के दाहिनी ऊरु की सन्धि के ऊपर उज्जवल तिलादि का चिद् पणिडतको कहना चाहिये।। ७७॥ १ सूर्यस्य २ शुक्रस्य ३ चक्षस्थलस्य ४ बुधस्य ५ कपालमध्ये ६ चन्द्रस्य ७ गुदायाम्। उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क:। १४-ललाटदक्षे खत्तु भौमशेषे तिलादिचिह्नं यदि लक्ष्यते चेत्। वदेद्विदीशो मनुजस्य तस्य दक्षे च बाहावमलं तिलाद्यम्॥ ७८ ॥ यदि कपाल की दाहिनी तरफ़ मङलरेखा के शेषभाग में तिलादि का चिह्न लखाजाता हो तो उस माणी की दाहिनी भुजा के ऊपर निर्मल तिलादि का चिह्न विद्वान् को कहना चाहिये।। ७८ ॥। २५-शूरस्य शेषे यदि भालदक्षे चिह्नं तिलादं विशदं विभाति। कटस्य दक्षे भणितं तिलादं प्राजैः सुधी रैः खलु मानवस्य ॥ ७६॥ यदि ललाटकी दाहिनी तरफ़ सूर्यरेखा के शेषभाग में अमलरूप तिलादिका निशान सोहता हो तो उस माणी की कमर के दाहिनी ओर तिलादिका निशान बड़े धीर प- रिडतों ने कहा है।। ७६ ॥। २६-भालस्य दक्षे भृगुजस्य शेषे चिह्नं तिलादं यदि दीप्यते चेत् ! वत्सस्य मध्ये मनुजस्य तस्य धीरो वदेदै तिलकादिचिह्नम् ॥८०॥ यदि भाल की दाहिनी तरफ़ शुक्ररखा के शेषभाग में तिलादि का चिह्न चमकता हो तो उस प्राणी के वक्षस्थल के बीच में तिलादिका चिह्न परिडत को कहना चाहिये ॥ ८० ॥ २७-कपालदक्षे खलु सौम्यशेषे तिलादिचिह्नं यदि दृश्यते चेत्। वत्सस्य दक्षे पुरुषस्य तस्य ब्रूयात्तिलादं विदुषामधीशः ॥८१॥ यदि कपाल की दाहिनी तरफ़ बुधरेखा के शेषभाग में तिलादिका चिह्न देखाजाता हो तो उस प्राणी के वक्षस्थल की दाहिनी तरफ़ वुधेश को तिलादि चिह्न बताना चाहिये ।। ८१ ॥ २८-दक्षे ललाटे खलु चन्द्रशेषे विदृश्यते चेत्तिलकादिचिह्नम्। बूयाद्विदीशो मनुजस्य तस्य दक्षे तिलादं जठरे च नाभ्याम् ॥८२॥ यदि ललाट की दाहिनी तरफ़ चन्द्ररेखा के शेषभाग में तिल आदिका चिह्न देखा जाता हो तो उस भाणी के पेट की दाहिनी ओर या तोंदी के समीप तिलादिका चिह्न कहना चाहिये ॥। ८२ ॥ २६-भालस्य वामे खलु मन्दशेषे चिह्नं तिलादं यदि लक्ष्यते चेत्। प्रोक्नं कवीन्द्र्मनुजस्य तस्य पृष्ठस्य वामे विशदं तिलाद्यम् ॥।८३॥। यदि भाल की बांई तरफ़ शनिरेखा के शेषभाग में तिलादिका चिह्न लखाजाता हो सामुद्रिकशास्त्रस्य तो उस माखी की पीठ के वामभाग में उज्ज्वलरूप तिलादिका चिह्न कवीन्द्रों ने कहा है॥। ८३ ।। ३०-भाले विशाले यदि वामभागे देवेज्यशेषे तिलको विभाति। धीरो वदेद्े पुरुषस्य वामे वत्सस्य निम्ने तिलकं विशालम्॥ ८४॥ यदि विशालभाल में बाई तरफ़ गुरुरेखा के शेपभाग में तिलादिका चिह्न भासना हो तो उस पाणी के वक्षस्थल के नीचे वामभाग में विशाल तिल का चिह्न पएिडत को बताना चाहिये॥ ८४ ॥ ३१-वामे कपाले खलु भौमशेषे तिलादिचिह्नं यदि दृश्यते चेत्। बूयात्मुधीरो मनुजस्य तस्य पृष्ठस्य वामे रुचिरं तिलाद्यम् ॥ ८ ५ ॥ यदि कपाल की बाई तरफ़ भौमरेखा के शेषभाग में तिलादिका चिह्न देखाजाता हो तो उस पराणी की पीठ की वाई ओर सुन्दर तिलादिका चिह्न पशडत को कहना चाहिये ॥ ८५ ॥ ३२-वामे ललाटे दिनपस्य शेषे चिह्नं तिलादं यदि लक्ष्यते चेत्। बयाद् बुधेन्द्रो मनुजस्य तस्य वामांसनिम्ने ललितं तिलाद्यम्॥=६॥ यदि भाल के बायें तरफ़ सूर्यरेखा के शेपभाग में तिल आदिका चिह्न लखाजाता हो तो उस मराणी के बायें कन्धे के नीचे ललितरूपी तिलादिका चिह्न बुधेश को बताना चाहिये॥ ८६॥ ३३-भालस्य वामे भृगुजस्य शेषे संलक्ष्यते चेत्तिलकादिचिह्नम्। प्रोक्कं सुधीभिर्मनुजस्य तस्य तुन्दस्य वामे विशदं तिलादम् ॥८७॥ यदि ललाट के वाम ओर शुक्रेखा के शेषभाग में तिलादिका चिह्न भलीभांति लखा जाता हो तो उस प्राणी के पेट के बायें तरफ़ उज्ज्वल तिलादिका निशान पएिडतों ने कहाहै॥। ८७ ।। ३४-भाले विशाले यदि वामभागे सौम्यस्य शेषे तिलकादिकं चेत। वत्सस्य वामे खलु पञ्जरे वा चिह्नं तिलादं ध्वनितं कवीन्द्रैः ।। दद। यदि विशालभाल में बायें तरफ़ बुधरेखा के शेपभाग में तिलादिका चिह्न प्रतीय- मान होता हो तो उस माणी के वक्षस्थल के वामभाग में या पांजर में तिलादिका चिह्व कबीन्द्रों ने कहा है।। ८८ ॥। ३५-भालस्य वामे खल चन्द्रशेषे चिह्नं तिलादं यदि दृश्यते चेत्। उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्कः । प्रोक्कं तिलादं पुरुषस्य तस्य नाभौ च पार्श्वें जठरस्य वामे ॥८६॥ यदि ललाट के बायें तरफ़ चन्द्ररेखा के शेपभाग में तिलादि का चिह्न देखा जाता हो तो उस भाणी के तोंदी, पार्श्व और पेट के वामभाग में तिलादि का चिह्न मुनियों ने कहा है।। =६ ॥। ३६-दक्षे कपालस्य च नेत्रचुल्ल्यां संदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। गीतं तदानीं खलु मानवस्य चिह्नं तिलादं जठरस्य दक्षे ॥ ६० ॥ यदि कपाल के दाहिने तरफ़ नेत्र के ऊपर चूल्हे के निकट तिल आदि का चिह्न भली भांति देखा जाता हो तो उस प्राणी के पेट के दाहिने तरफ़ तिलादि का चिह्न महर्पियों ने गाया है॥। ६० ॥। ३७-पाश्वें च दक्षे पुरुषस्य भाले ख्ुवः समीपे तिलको विभाति। पोक्कं तदानीं खलु परिडतेन्द्रैश्रिह्नं तिलादं कटकोपरिस्थम् ॥ ६१ ॥ जिस प्राणी के विशालभाल में दाहिने तरफ़ भौंह के निकट तिल आदिका निशान यदि सोहता हो तो उसकी कमरके ऊपर टिके हुए तिलादि का चिह्न पणिडतों ने कहा है।। ६१ ।। ३८-भाले विशाले खलु दक्षपार्श्वे नेत्रान्तिके चेत्तिलकादिकं स्यात्। नितम्बदक्षे पुरुवस्य तस्य चिह्नं तदानीं मुनिभिःप्रणीतम् ॥ ६२॥ यदि विशालभाल में दायें तरफ़ नेत्र के समीप तिलादिका चिह्न प्रतीत होता हो तो उस प्राणी के चूतड़ों के दाहिनी ओर तिलादिका चिह्न मुनियों ने कहा है ।। ६२ ।। ३६-मालस्य निम्ने खलु दक्षपार्श्वें चक्षस्समीपे तिलकालकः स्यात्। दक्षे च पार्श्वें किल पञ्जरस्य प्रोक्कं तिलादं पुरुषस्य धीरैः ॥ ३॥ यदि भाल के नीचे दाहिने तरफ़ नेत्र के समीप तिल आदिका चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस मराणी की पांजर के दाहिने भाग में तिलादि का निशान धीरों ने कहा है।। ६३ ।। ४०-ललाटनिम्ने खल् दक्षपार्श्वे नेत्रान्तिके चेत्तिलको विभाति। दक्षोरुनिम्ने लसितं तिलादं प्रोक्कं पुरौणैः पुरुषस्य तस्य ॥६४ ॥ यदि ललाट के नीचे दाहिने तरफ़ नेत्र के समीप तिलादिका निशान सोहता हो तो उस माणी की दाहिनी ऊरु के नीचे लसते हुए तिलादिका चिह्न पुराने कवियों ने कहा है।। ६४ ।। १ लोचनसमीपे २ पुरातनैः परिडतैः ॥ सामुद्विकशास्रस्य ४१-वामे कपाले खलु नेत्रकोण संदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। वामोरुनिम्ने कटिदेशके वा चिह्नं तिलादं कथितं कवीन्दैः ॥! ६५॥ यदि कपाल के वामभाग में नेत्रकोण के ऊपर तिलादिका निशान देखा जाता हो तो उस पाशी की वाई ऊरु के नीचे या कमर पर तिलादिका चिह्न कवीन्द्रों ने कहा है।। ६५ ।। ४२-वामे ललाटे खलु नेत्रपाते संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम्। नितम्बवामे मनुजस्य तस्य चिह्नं तिलादं भणितं सुधीभिः॥६६॥ यदि ललाट के वामभाग में नेत्रपात के समीप तिलादिका चिह्न भलीभांति लखा जाता हो तो उस माणी के चूतड़ों के वायें तरफ़ तिलादिका चिह्न पणिडतों ने कहा है।। ६६ ॥ ४३-भाले विशाले खलु वामनेत्रे विदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। वामे नितम्बे पुरुषस्य तस्य ज्ञेयं तिलादं कथितं कवीन्द्रैः।।६७।। यदि विशालभाल में बायें नेत्र के ऊपर तिलादिका चिह्न देखाजाता हो तो उस माणी के वायें चूतड़ के ऊपर कवीन्द्रों से कहे हुए तिलादिका चिह्न जानना चाहिये।।है७।। ४४-वारमोम्बकोणे खलु निम्नभागे कर्णस्य चुल्ल्यां तिलको विभाति। पृष्ठे च भागे कटकस्य तस्य ख्यातं तिलादं विदुषामधीशैः ॥६८॥ यदि वायें नेत्रकोण के निचलेभाग में कर्णचूल्हे के ऊपर तिलादिका चिह्न सोइता हो तो उस माणी की कमर के पीछे तिलादिका निशान परिडतेन्द्रों ने कहा है।। ६८।। ४५-गएडोपरिस्थं खलु वामभागे कर्णस्य निन्ने तिलकादिकं चेत्। वामोरुनिम्ने पुरुषस्य तस्य चिह्नं तिलादं प्रवैदेत्सुधीरः॥६६॥ जिसके बाई ओर कान के नीचे गाल के ऊपर टिके हुए तिलादिका निशान यदि भासता हो तो उस प्राणी की वाई ऊरु के नीचे तिलादिका चिह्न पसिडतों को कहना चाहिये।। ६६॥ ४६-ऊध्वे च भागे खलु दक्षकर्णे प्रतीयते वै तिलको यदानीम्। प्रोक्कं तिलादं मनुजस्य तस्य दक्षे च देशे जैठरस्य नूनम्॥ २००॥ यदि दाहिने कान के ऊपर तिलादिका चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस पराणी के पेट के दाहिने तरफ़ तिलादिका चिह्न कतियों ने कहा है॥ २००।। १ चामनेत्रकोएस्य २ कथयेत् ३ उदरस्य । उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क:। १७-विद्योतते चेद्िशदे कपाले दक्षे च कर्णों तिलको यदोर्ध्वें। वदन्ति विप्राः पुरुषस्य तस्य दक्षे च पारश्वें तिलकं तदानीम्॥१॥ यदि विशदकपाल में दाहिने कान के ऊपर तिलादिका निशान सोहता हो तो उस पाणी की दाहिनी पार्श्व के नीचे तिलादिका चिह्न बुद्धिमानों ने कहा है ।। १। ४८-दक्षस्य कर्णास्य च कोणदेशे संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम। दक्षस्य पार्श्वस्य च निम्नभागे प्रोक्नं तिलादं पुरुषस्य तस्य ॥२।। यदि दाहिने कान के कोणदेश में तिलादिका निशान भलीभांति लखाजाता हो तो उस माणणी की दाहिनी पार्श्व के नीचे तिलादिका चिह्न पणिडितों ने कहा है ॥ २॥ १६-ऊर्ध्वे च भागे खलु वामकरणें प्रतीयते चेत्तिलको यदानीम्। ख्यातं तिलादं पुरुषस्य तस्य वामे च भागे जठरस्य चिह्नम् ॥ ३ ॥ यदि वामकर्ण के ऊपरले भाग में तिलादिका चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस माी पेट के वामभाग में तिलादिका चिह्न मुनियों ने कहा है ॥ ३॥ •- वामस्य कर्णस्य च मध्यदेशे संलक्ष्यते चेत्तिलकालको वै। वामस्य पार्श्वस्य च निम्रभागे चिह्नं तिलादं भणितं प्रवीपैः।।४।। यदि वायें कान के बिचले भाग में तिलआदि का चिह्न लखाजाता हो तो उस प्राणी ीबाई पार्श्व के नीचे तिलादि का चिह्न प्रवीणोंने कहा है।। ४। १-वामस्य कर्णस्य च निम्नेदेशे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। वामस्य पार्श्वस्य च निम्नदेशे चिह्नं तिलादं मुनयो वदन्ति॥ ५॥ यदि वायें कान के निचलेदेश में तिलादिका चिह्न भासता हो तो उस प्राणी की ाई पार्श्व के नीचे तिलादिका चिह्न मुनियों ने कहा है ॥। ५॥ २-दक्षाम्बमध्ये खलु निम्नभागे संलक्ष्यते चेत्तिलको हि यस्य। ब्रूयात्तिलादं पुरुषस्य तस्य दक्षे च पार्श्वें किल गुह्येंकस्य॥ ६॥ जिसके दाहिने नेत्र के मध्यदेश में नीचे तरफ़ तिलादिका निशान यदि लखाजाता तो उस माणणी की गुदा की दाहिनी ओर तिलादिका चिह्न पएिडतों को कहना हहिये ॥ ६ ।। १ प्रकाशते २ नीचभागे ३ संदृश्यते ४ नीचभागे ५ अरपानदेशस्य ॥' सामुद्रिकशास्रस्य ५ ३-दक्षाम्वकोण मनुजस्य यस्य नासाविलग्नं यदि भाति चिह्नम्। तदा शरीरस्य च मध्यमाङ्के प्रोक्कं तिलादं वदतां वरेरायैः ॥७॥ जिसके दाहिने नेत्रकोणमें नासिकालग्न तिलादि का चिह्न यदि सोहता हो तो उस पाणी के मध्यमाङ्गमें तिलादिका निशान कहनेवालों में प्रधान परिडतों ने कहाहै॥ ७॥ ५४-दक्षे च भागे खलु नासिकायाः संदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। गुह्यप्रदेशे मनुजस्य तस्य प्रोक्कं तिलादं मुनिभिस्तदानीम्॥॥ यदि नासिका के दाहिनेभाग में तिलादिका चिह्न भलीभांति देखाजाता हो तो उम प्राणी की गुदामें तिलादिका चिह्न मुनियों ने कहा है॥ ८॥ ५५-वांमाम्बनिश्ने पुरुषस्य यस्य घ्रोणस्य मध्ये तिलको विभाति। वामे च देशे खलु गुह्येकस्य चिह्नं तिलादं मुनयो वदन्ति॥६॥ जिस पाणी के वामलोचनके नीचे नासिकाके बीचमें तिलआदि का चिह्न सोहता हो तो उसकी गुदाके वामभागमें तिलादिका चिह्न मुनिलोग कहते हैं ॥ ६ ॥ ५६-वांमाम्वपातस्य च मध्यदेशे विद्योतते चेत्तिलको यदानीम्। अपानद्वारे मनुजस्य तस्य वामे च भागे तिलकं वदन्ति ॥ १०॥ वामलोचनके पातस्थलके मध्यदेश में यदि तिलादिका चिह्न सोहता हो तो उस प्रास के गुदाद्वारपर वामभागमें तिलादिका चिन्न पणडतलोग कहते हैं ॥ १० ॥ ५७-वामस्य नेत्रस्य च निम्नदेशे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। गुदस्य द्वारे खलु वामभागे चिह्नं तिलादं त्वपरं भणन्ति॥ ११॥ यदि वामलोचन के निचले भागमें तिलादिका चिह्न भासता हो तो उस पाणी के गुद्ा द्वार के वार्येभाग में पशिडतलोग अपर तिलादि का चिह्न कहते हैं ॥ ११ ॥ ५८-कपालपाश्वे खल दक्षनेत्रपातस्य रम्भे ह्यथवा च मध्ये। विद्योतते चेत्तिलकालको वै तुन्दस्य दक्षे त्वपरं तिलाद्यम्॥ १२।। यदि कपाल के पार्श्व में दाहिने नेत्ररत के आरम्भ में अथवा मध्य में तिल आदिक निशान प्रकाशता है तो पेट के दाहिने भाग में अपर तिलादि का निशान कहा है॥ १२॥ ५६-दक्षाम्तपातो परितोऽथवा चेदारम्भदेशे खल नासिकायाः। १ दक्षिएनेत्रकोणे २ प्रधानैः ३ वामनेत्रनीचे ४ नासिकामध्ये ५ गुदाया: द वामलोचर पातस्य।। उत्तराद्धे प्रथमाङ्क । संलक्ष्यते वै तिलको हि तस्य नाभ्याश्र दक्षे तिलकं वदन्ति ॥ १३॥ यदि दाहिने नेत्रपात के ऊपर अथवा नार्सिका के आरम्भदेश में तिलादि का निशान लखाजाता हो तो उस माणी की नाभि के दाहिनेभाग में तिलादि को कहते हैं ॥ १३॥ ६०-वामाम्बपातस्य च मध्यदेशे आरम्भके वा तिलकादिकं चेत्। तुन्दस्य वामे पुरुषस्य तस्य चिह्नं तिलादं कवयो भणन्ति ॥ १४ ॥ यदि दाहिने या बायें नेत्रपात के मध्यदेश या आरम्भदेश में तिल आदि का चिह्न पतीयमान होता हो तो उस माणी के पेट के वामभाग में तिलादि का चिह्न कवियों ने हहा है । १४ ।। ६१-सव्याम्यपातस्य च मध्यभागे किंवा च शेषे तिलको विभाति। ब्रूयात्मुर्धीरो मनुजस्य तस्य वामे च पाश्वें कटकस्य चिह्नम् ॥ १५॥ यदि वामलोचन के पातस्थल के बिचलेभाग में अथवा शेषभाग में तिलादिका निशान सोहता हो तो उस प्राखी की कमरके वायें तरफ़ तिलादिका चिह्न पएिडितको हना चाहिये । १५ । २-नार्या यदा वा पुरुषस्य वक्रे दक्षाम्बपातोपरितस्तिलाद्यम्। वदेत्सुचिह्नं मनुजस्य तस्य मुष्कस्य पार्श्वे कटिदक्षपाश्वें॥ १६ ॥ जिस नारी या नरके वदन में दाहिने नेत्रपात के ऊपर तिलादिका चिह्न प्रतयिमान ोता हो तो उस पराणी के गलहरी या कमर के दाहिने तरफ़ तिलादिका चिह्न कहना हिये ॥ १६ ॥ ३-दक्षाम्वपातस्य च मध्यदेशे संदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। दक्षाङ्गमध्ये विशदं तिलादं विद्वद्विराद्यैर्भणितं तदानीम् ॥ १७॥ यदि दाहिने नेत्रपात के मध्यदेश में तिलादिका चिह्न भलीभांति देखाजाता हो उस माणी के दाहिने अङ् के बीच विशद तिलादि का चिह्न आद विद्वानों ने हा है॥ १७ ॥ ४-दक्षाम्बपातस्य च शेषदेशे नासान्तिके चेत्तिलको विभाति। कटिप्रदेशस्य च निम्नभागे चिह्नं तिलादं कथितं नरस्य । १८ ।। यदि दाहिने नेत्रपात के शेषदेश में नासा के समीप तिलादिका चिह्न सोहता हो उस माखी की कमर के निचलेभाग में तिलादिका चिद्न मुनियों ने कहा है।। १८ ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ६५-वामाम्चपातस्य च निम्नदेशे चिह्नं यदानीं विशदं विभाति। कुचस्य वामे मनुजस्य तस्य विद्यात्तिलादं विदुषामधीशः॥१६॥ यदि वामनेत्रपात के नीचेभाग में विशद तिलादि का निशान सोहता हो तो उस प्राणी के कुचके वामभाग या गलहरी के बायें तरफ़ तिलादि का चिह्न वुधेशों को जानना चाहिये ॥ १६ ॥ ६ ६-वामाम्बपातस्य च मध्यदेशे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। ब्रूयाद्विपश्रित्पुरुषस्य तस्य गुदान्तिके वै विशदं तिलाद्यम्॥ २०॥ यदि वामनेत्रपात के मध्यदेश में तिलादि का चिह्न विराजता हो तो उस पाणी की गुदाके निकट विशद तिलादि का निशान पण्डित को कहना चाहिये॥ २० ॥ ६७-आरम्भदेशे खल सव्यनेत्रे घ्राणस्य मूले यदि भाति चिह्नम्। ब्ूयात्तदानीं मनुजस्य तस्य कटेश्च वामे त्वपरं तिलाद्यम्॥ २१॥ यदि वामनेत्र के आरम्भदेश में या नासिका की मूल में तिलादि का चिह्न सोहता हो तो उस पाणी की कमर के वामभाग में अपर तिलादि को कहना चाहिये ॥ २१॥ ६८-दक्षाम्वकोणस्य च निम्नदेशे समीक्ष्यते चेत्तिलको हि यस्य। वदेद बुधेशः खलु पञ्जरस्य दक्षे च पार्श्वे विशदं तिलाद्यम् ॥ २२ ॥ जिस प्राणी के दाहिने नेत्रकोण के निचलेभाग में यदि तिलादि का निशान देखा जाता है तो उसके पांजर के दाहिने तरफ़ विशदतिलादि का चिह्न वुधेशों को कहना चाहिये ॥ २२ ॥ ६६-दक्षस्य नेत्रस्य च मध्यदेशे विदृश्यते चेत्तिलको यदानीम्। विज्ञा महान्तो मनुजस्य तस्य गुदाप्रदेशे तिलकं वदन्ति ॥२३॥ यदि दाहिने नेत्र के मध्यभाग में तिलआदि का निशान देखाजाता हो तो उस आाणी के गुदाप्रदेश में तिलादि का चिह्न बड़े विज्ञोंने कहा है यानी महात्मा विज्ञलोग कहते हैं ॥ २३॥ ७०-वामाम्बनिम्रस्य च मध्यदेशे प्रतीयते चेत्तिलको यदानीम। प्राज्ैः सुधीरैः पुरुषस्य तस्य कुचस्य वामे भणितं तिलाद्यम्॥२४।। यदि वामलोचन के नीचे मध्यदेश में तिलादिका चिह्न मतीयमान होताहो तो उस माखी के कुच के वामभाग में सुधीर प्राज्ञलोगों ने तिलादि का चिह्न कहा है॥ २४॥ ७१-वामाम्तपातस्य च निम्नदेशे संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम्। उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क: । गुदाप्रदेशस्य च वामपार्श्वें चिह्नं तिलादं भणितं सुधीभिः॥२५॥ यदि वामनेत्रपात के नीचेभाग में तिलादि का निशान लखा जाता हो तो उस प्राखी की गुदा के वायें तरफ़ तिलादि का चिह्न परिडतों ने कहा है ॥ २५॥ ७२-वामाम्बपातस्य च कोणदेशे तथा च मध्ये तिलको विभाति। गुह्याङ्गमध्ये मनुजस्य तस्य चिह्नं तिलादं मुनयो वदन्ति ॥ २६॥ यदि वामनेत्रपात के कोणदेश में एवं नेत्रपात के निचले भाग में तिलादि का चिह्न प्रतीत होता हो तो उस माणी की गुदा के विचले भाग में तिलादि का निशान मुनि- लोग कहते हैं ॥ २६ ॥ ७३-वामाम्बनिस्ने खलु पातमध्ये नासान्तिके वा तिलको विभाति। बूयात्तदानीं पुरुषस्य तस्य मुष्कस्य वामे त्वपरं तिलाद्यम्॥ २७॥ यदि वामलोचन के नीचे पात के मध्य में या नासा के निकट तिलादि का चिह्न सोहता हो तो उस माणी की गलहरी के वामभाग में अपर तिलादि का चिह्न परिडत को कहना चाहिये ॥ २७ ॥ ७४-मालस्य पार्श्वे पुरुपस्य यस्य दक्षाम्बमध्ये यदि भाति चिहम। वत्सस्य दक्षे जठरान्तिके वा प्रोक्कं तिलादं विशदं मुधीभिः॥२८॥ जिसके भाल के पार्श्व में दाहिने लोचन के बीच में यदि चिह्न सोहता हो तो उस पराणणी के वक्षस्थल के दाहिने तरफ़ या पेट के पास विशद तिलादि का चिह्न पएिडतों ने कहा है॥। २८ ।। ७५-दक्षाम्यकोणे खलु नेत्रमध्ये नासान्तिके वा तिलको विभाति। वत्सस्य दक्षे पुरुषस्य चाग्रे संकीर्तितं वै विशदं तिलाद्यम्॥ २६ ।। यदि दाहिने नेत्रकोण यानी नेत्र के मध्य में या नासिका के समीप तिलादि का नि- शान सोहंता हो तो उस भाणी के वक्षस्थल के दाहिने भाग व अग्रभाग में विशद तिलादि का चिह्न कहा है।। २६ H ७६-वामाम्बकोणे पुरुषस्य भाले विद्योतते चेत्तिलको यदानीम। वत्सस्य वामे विशदं तिलादं संभाषितं वै वदतां वरेरायैः ॥ ३०॥ जिसके भाल में वामलोचन के कोण में तिलादि का चिह्न यदि प्रतीयमान होता दो तो उस प्रारी के वक्षस्थल के बायें तरफ़ विशद तिलादि का चिह्न कहनेवालों में से पधान पएिडतों ने कहा है॥ ३० ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य ७७-वामाम्बकोणस्य तु चाग्रभागे संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम। वामे च पाश्वें खलु वत्सकस्य संवर्षितं वै त्वपरं तिलाद्यम्॥ ३१।। यदि वामलोचनकोण के अग्रभाग में तिलादि का चिह्न लखाजाता हो तो उस माणी के वक्षस्थल के वायें तरफ़ अपर तिलादि का चिह्न मुनियों ने कहा है॥ ३१ ॥ ७८-वक्कस्य दक्षे खलु नासिकाया रन्ध्रस्य निम्ने तिलको विभाति। ऊर्ध्वे च भागे किल दक्षिणांसे चिह्नं तिलादं मुनयो भणन्ति॥ ३२॥ यदि मुख के दाहिने नासिकारन्ध्र के नीचे तिलादि का निशान सोहता हो तो उस प्राणी के दाहिने कन्धा के ऊपर तिलादि का चिह्न मुनिलोग कहते हैं ॥ ३२॥ ७६-शष्ठस्य शेषे खलु दक्षनासाशेपे च भागे तिलको यदानीम। ब्रूयात्तदानीं पुरुषस्य तस्य कुचोर्ध्वदेशे विशदं तिलाद्यम्॥३३ ॥ यदि ओष्ठ के शेपभाग या दक्षिण नासा के शेपभाग में तिलादि का निशान सोहता हो तो उस पाखी के कुच के ऊपर या गलहरी के ऊपर विशढ तिलादि का चिह्न कहना चाहिये ॥ ३३ ॥ ८०-दक्षे च भागे खलु नासिकाया ऊर्ध्वस्थितश्रेत्तिलको विभाति। विद्यादवुधेन्द्रो मनुजस्य तस्य ग्रुह्याङ्गदक्षे त्वपरं तिलाद्यम्। ३४।। यदि दाहिने तरफ़ नासिका के ऊपर तिलादि का निशान भासता हो तो उस माखी की गुदा के दाहिने तरफ़ अपर तिलादिका चिह्न बुधेन्द्र को जानना चाहिये।। ३४ ।। ८१-वामे च भागे खलु नासिकायाः शेषे च देशे यदि लाञ्धनं चेत। वत्सस्य वामे त्वपरं तिलादं गायन्ति विप्रा गुणगौरवाढ्याः।।३५॥ यदि वायें तरफ़ नासिका के शेप देश में तिलादि का चिह्न देखा जाता हो तो उस प्राणणी के वक्षस्थल के वामभाग में अपर तिलादि का चिह्न गुणगौरवसंपन्न ब्राह्मणें ने गाया है।। ३५ ।। ८२-घ्राणस्य निम्ने खल्ु वामभागे वक्कस्य मध्ये ह्यथवा तिलश्रेत्। त्ूयात्तिलादं पुरुपस्य तस्य गुह्यस्य मेद्रस्य च मध्यदेशे॥३६॥ १ मुष्कोर्ध्वदेशे इति वा पाठः ॥ उत्तरार्धे प्रथमाङ्क । यदि नासिका के नीचे वामभाग में अथवा वदन के बीच में तिलआदि का चिद्न प्रतीयमान होता हो तो उस माणी की गुदा व लिङ के बीच में तिलादि का निशान क- हना चाहिये। ३६ ॥ ८३-वामे च भागे खलु नासिकाया मध्यस्थले चेत्तिलको विभाति। गुह्यस्य मेठ्रस्य च मध्यदेशे विद्वद्विराद्यैर्भणितं तिलाद्यम् ।। ३७ ।। यदि वायें तरफ़ नासिका के विचले भाग में तिल आदि का चिह्न सोहता हो तो उस प्राणी की गुदा या लिङ्र के मध्यभाग में तिलादि का चिह्न आदि के विद्वानों ने कहा है।। ३७ ।। ८४-भाले विशाले मनुजस्य यस्य नासाग्रभागे तिलको विभाति। वदेत्तदानीं वदतां प्रधानो गुह्याग्रभागे त्वपरं तिलाद्यम्॥ ३८॥ जिसके विशालभाल में नासिका के अग्रभाग में तिलादि का चिह्न सोहता है तो उस प्राणी की गुदा के अग्रभाग में अपर तिलादि का निशान वुधेशों को कहना चाहिये॥ ३८॥ ८५-दक्षे च भागे खलु नासिकाया नासापुटे चेत्तिलको यदानीम्। विद्यात्तदानीं पुरुपस्य तस्य गुह्याङ्गदक्षे त्वपरं तिलाद्यय् ॥ ३६ ॥ यदि नासिका के दाहिने तरफ़ नासापुट के बीच में तिलादि का चिह्न भासता हो तो उस प्राणी की गुदा के दाहिने भाग में अपर तिलादि का चिह्न जानना चाहिये ॥ ३६॥ =६-वामे च पारश्वे खलु नासिकाया मध्ये च नासापुटकस्य किंवा। विद्योतते चेत्तिलको यदानीं लिङ्गस्य वामे भणितं तिलाद्यम् ॥४०॥ यदि नासिका के वामपार्श्व में या नासापुट के मध्य में तिलादि का चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस पराणी के लिङ्र के वामभाग में तिलादिका चिह्न पएिडतों ने कहा है॥४०॥ ८७-दक्षे च भागे खलु नासिकायाः पुटोपरिस्थस्तिलको विभाति। विज्ञां मैहान्तो मनुजस्य तस्य गुह्याङ्गदेशे तिलकं वदन्ति ॥ ४१ ॥ यदि दाहिने तरफ़ नासापुट के ऊपर टिका हुआ तिलका निशान सोहता हो तो उस राणी के गुह्याङ्देश में तिलादि का चिह्न पूज्य पणिडतलोग कहते हैं ॥ ४१ ॥ =८-नासोपरिस्थस्तिलको विभाति दक्षे च भागे पुरुषस्य यस्य। गुह्यस्य लिङ्गस्य च मूलमध्ये दक्षे तिलादं भणितं सुधीभिः॥४२॥ १ प्रकाशते २ विशेषज्ञातारः ३ पूज्याः॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिसके दाहिने तरफ़ नासिका के ऊपर टिका हुआ तिलआदि का चिह्न सोहता हो तो उस प्राणी के गुदा व लिङ्ग की मूल के मध्य में दाहिनी ओर तिलादि का निशान पणडतों ने कहा है।। ४२ । ८६-घ्राणोपरिस्थः खलु वामभागे विराजते चेत्तिलको यदानीम्। गुदस्य मेदस्य च मूलमध्ये वामे तिलादं कवयो गदन्ति। ४३।। जिसके वायें तरफ़ नासिका के ऊपर टिका हुआ तिलादि का चिह्न यि विराजता हो तो उस माणी की गुदा व लिङ् की मूल के मध्य में वाई ओर तिलादिका निशान कविलोग कहते हैं । ४३॥ ६०-प्रान्ते यदानीं खलु वामगएडे प्रतीयते चेद्विशदं तिलाद्यम्। गुह्याङ्गनिम्ने किल दक्षभागे चिह्नं तिलादं कथितं कवीन्दैः ॥।४४।। यदि वामगएड के प्रान्तदेश में उज्जलरूप तिलादि का चिह्न प्रतीत होता हो तो उस प्राी के दाहिने तरफ़ गुदा के नीचे तिलादि का चिह्न कबीन्द्रों ने कहा है।। ४४।। ६१-वामे च भागे वदनस्य यस्य चिह्नं तिलादं यदि लक्ष्यते चेत। ऊर्ध्वे च भागे किल वामपाणौ वदेत्सुधीरो विशदं तिलाद्यम्॥ ४५॥ जिसके वदन के वामभाग में तिलादि का चिह्न यदि लखाजाता हो तो उस पराणी के बायें हाथ के ऊपर विशद तिलादि का चिह्न कहना चाहिये।। ४५।। ६२-ऊर्ध्वस्थले चेदधरंस्य मध्ये संलेक्ष्यते वै तिलको यदानीम। गीतं तदानीं मनुजस्य तस्य गुह्या्रभागे त्वपरं तिलाद्यम्॥ ४६।। यदि ओष्ठके ऊपर विचले भाग में तिलादि का चिह्न लखा जाता हो तो उस माणी की गुदा के अग्रभाग में अपर तिलादि का चिह्न परिडतों ने कहा है ।। ४६॥ ६३-निम्नौष्ठैमध्ये यदि भाति चिह्नं दक्षे च जानौ भएतं तिलाद्यम्। नो मध्यदेशे खलु वामजानौ दक्षे च दष्टे किल दक्षजानौ॥।४७।। यदि निचले तष्ठ के मध्य में तिलादि का चिह्न सोहता हो तो उस पाणी की दाहिनी जानु में तिलादि का चिह्न परिडतों ने कहा है और यदि मध्यदेश में न हो तो बांई जानु में तिलादि को कहना चाहिये और यदि दाहिनी तरफ़ देखा जाता हो तो दाहिनी घुटतू में तिलादि चिह्न चतुरों ने कहा है॥ ४७ ॥ १ शष्ठस्य २ दृश्यते ३ गुदाग्रभागे ४ नीचाघरोष्ठमध्ये ४ कथितम् ॥ उत्तरार्द्धे प्रथमाङ्क:। ६४-मध्यस्थले चेचिवुकस्य यस्य प्रतीयते वै तिलको यदानीम्। पादोपरिस्थं तिलकं तदानीमाहुर्मुनीन्द्रा मनुजस्य तस्य ॥ ४८॥ जिसकी चिबुक (ठोढ़ी) के बीच में तिलादि का चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस पाणी के पाँचों के ऊपर टिके हुए तिलादि का चिह्न मुनीन्द्रों ने कहा है॥ ४८॥ ६५-चक्रे विशाले चिबुकस्य मध्ये संदृश्यते चेत्तिलकालको वै। जङ्घोपरिस्थं त्वपरं तिलादं वदन्ति विप्रा वदतांवररयाः ॥। ४६।। विशाल वदन में ठोढ़ी के बीच में यदि तिलादि का चिह्न देखा जाता हो तो कहने वालों में प्रधान ब्राह्मलोग जांघके ऊपर टिके हुए अपर तिलादि को कहते हैं॥ ४६॥ ६६-दक्षे च भागे चिवुकस्य शेपे संलक्ष्यते चेत्तिलको यदानीम्। चूयात्तदानीं पुरुषस्य तस्य ऊरोश्च संधावपरं तिलाद्यम् ॥ ५० ॥ यदि दाहिने भाग में ठोढी के शेष देश में तिलादि का चिह्न लखा जाता हो तो उस पाखणी की ऊरु की संधि में अपर तिलादि का निशान कहना चाहिये॥ ५० ॥ ६७-वामे च भागे चिबुकस्य यस्य प्रतीयते चेत्तिलको यदानीम्। सन्धिस्थलस्थं खलु सक्थिनोश्र चिह्नं तिलादं त्वपरं वदन्ति ॥ ५१॥ जिसकी ठोढी के वामभाग में यदि तिलादि का चिह्न प्रतीयमान होता हो तो ऊरु (निर्रोह) की सन्धि में टिके हुए अपर तिलादि चिह्न को कहते हैं॥ ५?॥ ६द-ऊर्ध्वस्थले चेत्खलु करठनल्या विराजते वै तिलको हि यस्य। गुह्याङ्गमध्ये किल नाभिदेशे गायन्ति चिह्नं त्वपरं तिलाद्यम्॥५२।। जिसकी कएठनली के ऊपरले भाग में यदि तिलादि का चिह्न सोहता हो तो गुदा के मध्य में या तोंदी के ऊपर अपर तिलादि का चिह्न कविलोग कहते हैं॥ ५२॥ हहगलस्य नल्याः खलु दक्षपोरश्वें चिह्नं तिलादं विशैदं विभाति। वैदेत्तदानीं मनुजस्य तस्य ऊरोश्र दक्षे* भणितं तिलाद्यम्॥ ५३ ॥ यदि गले की नली के दाहिने तरफ़ विशद तिलादि का चिह्न सोहता हो तो उस प्ाखणी की ऊरु के दाहिने भाग में तिलादि का चिह्न पणिडितों ने कहा है ॥ ५३॥ १ वदन्ति २ दक्षिसभागे ३ उज्ज्वलवर्णम् ४ कथयेत् ५ दक्षिे॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य १००-करठस्य नल्याः खलु वामपारश्वे प्रतीयते चेद्विशदं तिलाद्यम्। बयात्मुचिह्नं पुरुषस्य तस्य ऊरोश्र सन्धेः किल सैव्यदेशे॥५४॥ यदि कएठनली के वामभाग में उज्जलरूप तिलादि का चिह्न प्रतीयमान होता हो तो उस माणी की ऊरु सन्धि के वायें तरफ़ तिलादि का चिह्न कहना चाहिये॥ ५४॥ इति तिलादिज्ञानम्॥ भालाङविज्ञानमिदं मयोक्कं नारीनराणां शुभदं शिवेशे!। अभ्यासमात्रेण नराः सुपूज्या: भूयामुरुव्यां सकलतियास्ते॥ ५५॥ अ्रहो शिवेशे ! यह भालरेखा के सुलक्षणों का विज्ञान हमने कहा है, जो कि नर नारी गणों को शुभदायक है कि जिसके अभ्यासमात्र से मनुष्य लोग महापूजनीय होते हैं और वेही लोग भूमएडल में सवों के प्यारे होंगे॥ ५५॥ कल्याएं कलयत्वीशः पठतस्सादरात परिये। लोके धन्यतरो भूयान्मङ्गलानां च मङ्गलः ॥ ५६ ॥ अहो मिये ! आदर समेत पढ़ते हुए मनुष्य को मझलों का मङलरूप होकर ईश नामक परमेश्वर कल्याण को देवे और वह, पुरुप लोक में धन्यवाद देने योग्य होवेगा॥ ५६॥ इति श्रीमद्द्विजवर शक्किधरसंकलित सामुद्विकशास्त्रस्योत्तरार्द्धे भालरेखासुलक्षण- वर्णनंनाम प्रथमोऽङ्कः समाप्ति पफाखेति शम् ॥ समास्ोऽयं प्रथमोङ्ग: ।। १ चामभागे २ लक्ष्यते ३ वामदेशे ॥ अथ सामुद्रिकशासत्रस्योत्तराव्टेंद्विती याङ्कस्य

स्त्रीणां ललाटलक्षणं (Part 11)

सूचीपत्रम्। विपया: पृष्ठाद्धा: विपया: पृष्ठाङ्का: मालाचरणम् ... अथ सुपुन्ना ... सामुद्रिकस्वमाध्याये सुस्वमानाह स्थानपरत्वात्तत्त्वज्ञानम् अ्रथ दुस्मानाह स्वाद्गत्या तत्त्वज्ञानम् .... ... ... मृत्युसूचक सामुद्रिकमाह ... वशीकरणम् .. ....