108. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पुनरपि ख्रोपदतललक्षण
पुनरपि ख्रोपदतललक्षण
यस्या: पादतले रेखा सा भवेत्क्षितिपाङ्गना ।। २१ ।। यस्या: पादतले रेखा सा भवेत्क्षितिपाह्गना। भवेदखराडभोगा च या मध्याङ्कुलिसंगता॥। २२।। जिसके पादतल में चक्र, स्व्स्तिक, शङ्क, पत्म, धवजा, मछली और छाता का निशान पतीत हों तो वह रानी होती है व जिसके पादतल में मध्यमा अँगुत्ती पर्यन्त ऊर्ध्वरेखा वि- स्तीर्स होकर प्रतीत हो तो वह स्त्री राजरानी होकर अपरख.एडत भोगों को भोगंती है॥२१।२२।। निगूढगुल्फौ चरणौ पद्मकान्तितलौ शुभौ। पस्वेदिनौ मृदुतलौ मत्स्याङ्कमकराह़ितौ॥ २३ ॥ बञ्राब्जहलचिह्नं च दास्याः पादे सदा स्थितम्। राजपत्री तु सा ज्ेया राजभोगप्रदायकम्।। २४।। जिसके चरख छिपे हुए गएठोवाले व पद्मकान्ति के समान तल्वाले तथा पसीने से रहित होकर कोमल तलवेवाले प्तीत होते हुए मछली व मगर के चिह्न से अद्वित हों तो उस स्त्री के लिये शुभदायक होते हैं और यदि दासी के पादतल में बङ, कमल और इलका निशान प्रतीत हो तो भी वह राजपत्री जानना चाहिये और पूर्रोक वज़ादि चिद्व उस स्त्री के लिये राजभोगदायक होते हैं ॥ २३ / २४।। स्निग्धोन्नतौ ताम्रनखौ नार्याश्च चरणौ शुभौ। मत्स्याङ्गुशाव्जचिह्नौ च चक्रलाङ्गललक्षितौ॥। २५॥। जिसके चरण चिकने व ऊंचे होकर ताम्रसरीखे नखाँवाले प्रतीत हों वे जिनमें मछली, अङ्डश, कमल, चक्र और हल के निरान प्रतीत हों तो उस स्त्रीं को शुभदायक होते हैं॥। २५ ।। भवेदख एडभोगायोर्ड्ा मध्याङ्गुलिसंगताः। रेखाखसर्पकाकाभा दुःखदा्द्रचसूचकाः ॥ २ ६ ॥ स्निग्धा:समुन्नतास्तामा वृत्ता: पादनखा: शुभाः। ह२ सामुद्विकशास्त्रस्य वाणिज्यसूचकं स्त्रीणां पादपृष्ठसमुन्नतिः॥२७॥ प्रदेशिनी भवेद्यस्या अङ्गश्वादतिरेकिणी। कन्यैव कुलटा सा स्यादेप एव विनिश्चयः ॥ २८॥ जिसके पादतल में ऊर्ध्वरेखा मध्यमाअँगुली में मिली हुई प्रतीत हो तो उस सी अखएडभोग के लिये होती है और यदि मूपक, सर्प और कौवा के समान रेखा प्रती हों तो दुःख व दारिद्रय की जतलानेवाली होती हैं और जिसके पैरों के नख चिकने ऊंचे व ताम्रवर्ण होकर गोलाकार प्रतीत हो तो शुभदायक होते हैं और जिन ख्रिरियों पादपीठ ऊंचे प्रतीत हों तो वाशिज्य को बतलाते हैं और जिसके पैर की तर्जनी अँगु अँगूठा से बड़ी प्रतीत हो तो वह स्त्री कन्याकी दशा में ही व्यभिचारिणी होजाती है य सामुद्रिकशास्त्र ने निर्णय किया है ॥ २६। २८॥ राइ्याः स्निग्धौ समौ पादौ तलौ ताय्रनखौ तथा। श्लिष्टङ्गुली चोन्नताग्रौ ता प्राप्य नृपतिर्भवेत्॥ २६॥ समपार्ष्णी शुभा नारी पृथुपार्ष्णी सुदुर्भगा। कुलटोन्नतपार्ष्णी स्यादीर्घपार्ष्णी च दुःखभाक॥३०॥ जिसके पैर चिकने होकर समानाकार प्तीत हों व पैर के तलवे तथा नख ता सरीखे लालवर्ण प्रतीत हों व अँगुलियां सटीहुई प्रतीत हों व जिनके अ्ग्रभाग ऊंचे दीखते हों तो वह स्त्री रानी होती है उसको पाकर प्राणी राजा होता है व जिसकी एं समानाकार प्रतीत हों तो वह स्त्री शुभदायक होती है व जिसकी एंड़ी चकलीसी परत हों तो वह सत्री बुरे भागवाली होती है व जिसकी एंड़ी ऊंचीसी प्रतीत हों तो वह ह व्यभिचारिरी होती है और जिसकी एंड़ी दीर्घाकार प्रतीत हों तो वह स्त्री जन्मपर्षन दुःखको ही भोगती है ॥ २६। ३० ॥ यस्या: संचार्यमाणाया भूमिशव्दः प्रजायते। सा नारी विधवा जेया सामुद्रवचनं यथा ॥ ३१॥ यस्याः संस्पृशते भूमिमङ्गली न कनिष्ठिका। भर्तारं प्रथमं हन्ति द्वितीयं चैव विन्दति ॥३२ ॥ जिसके चलते हुए पृथ्वी में धम धम शब्द प्रतीत हो तो उस नारी को विधवा जान चाहिये यह सामुद्रिकशास्त्र का वचन है और जिसके पैरकी कनिष्ठा अ्रँगुली भूमिको पूर्वार्थः। हूती हो तो वह स्त्री पहले पतिको मारडालती है और दूसरे पतिको पाती है॥ ३१।१२। यस्यास्त्वनामिकाङ्गल्यौ पृथिव्यां नोपसर्पतः। पति नाशयते क्षिप्रं सा रक्का चिरजीविनी॥ ३३॥ यस्या गमनमात्रेण भूमौ कम्पः प्रजायते। वह्ाशिनी प्रलोभां च तां नारीं परिवर्जयेत्॥३४॥ जिसके पैर की दोनों अनामिका अँगुलियां भूमिको न छती हों तो वह स्त्री शीघ्र ही पति को मारती है और यदि अ्नामिकायें लालवर्ण गतीत हों नो वह स्त्री चिरजी- बिनी होती है और जिसके चलनेमात्र से पृथ्वी हिलने लगे तो वह स्त्री बहुत भोजन करती हुई महालोभिनी होती है उसको त्याग देना चाहिये।। ३३। ३४ ॥ चरणानामिका यस्याः क्षितिं न स्पृशते यदि। द्वितीया च तृतीया वा सा कन्या मुखवर्जिता॥३५ ॥ कनिष्ठिकानामिका वा यस्या न स्पृशते महीम्। अङ्रछठं वागतातीता तर्जनी कुलटा हि सा॥३६॥ जिसके पैरकी अ्र्परनामिका अँगुली यदि भूमिको नहीं स्पर्श करती हो अथवा तर्जनी व मध्यमा अँगुली यदि भूमिको न छूती हो तो वह कन्या सुखसे रहित होती है अथवा जिसके पैर की कनिष्ठिका व अ्र्परनामिका अ्रँगुली यदि भूमिको न छूती हो अथवा जिसके पैरकी तर्जनी अँगुली अँगूठे पै चढी हो अथवा आगे बढ़ी हो तो वह स्त्री कुलटा (व्यभिचारिणी) होती है॥। ३५ । ३६ ।। यस्या अनाभिकाङषौ पृथिव्यां नैव तिष्ठतः। पतिं मारयते सापि स्वतन्त्रेणैव वर्तते ॥३७॥ स्त्रीणां पादतलं स्निग्धं मांसलं मृदुलं समम्। आस्वेदमुष्णमरुएं बहुभोगोचितं स्मृतम् ॥३८॥ जिसके पैर की अनामिका व अँगूठा पृथिवी में नहीं ठिक्रते हों तो वह स्त्री पतिकों पारती हुई अपनी इच्छा के अनुसार वर्तती है यदि स्तियों के पैर के तलवे चिकने, मां- सल, कोमल, समानाकार, पसीनारहित व गरम होकर लालवर्ण पतीत हो तो घनें भोगों के लिये कहाते हैं॥ ३७। ३८ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य रूक्षं विवर्ण परुषं खसिडतं प्रतिबिम्बकम्। सूर्पाकारं विशुष्कं च दुःखदौर्भाग्यसूचकम् ॥ ३६॥ उन्नतो मांसलोइष्ठे वर्तुलोऽतुलभोगदः। वक्रो इस्वश्च चिपिटः सुखसौभाग्यभञ्जकः॥४०॥ अथवा जिसके पैर का तलवा रूखा, विवर्, कठोर व खण्डित प्रतिबिम्बवाला सूप के आकार होकर विशेपता से सूखासा प्रतीत हो तो वह दुःख व दौर्भाग्य को जन लाता है और जिसका अँगूठा ऊंचा व मांसल होकर गोलाकार प्रतीत हो तो वह अतुत भोग को देता है और जो अँगठा टेदा व छोटासा होकर चपठा प्रतीत हो तो वह सु व सौभाग्य को विनाशता है॥ ३६ ॥४० ॥ विधवा विपुलेन स्ाद्दीर्घाङ्गुषेन दुर्भगा। मृदवोडङ्कलयः शस्ता घना वृत्ताः समुन्नताः॥४१॥ दीर्घाङ्ुलीभि: कुलटा कृशाभिरतिनिर्धना। इस्वायुष्या च हस्वाभिर्भुग्नाभिर्युग्नवर्तिनी॥।४२॥। जिसका अ्रँनूठा चौड़ा हो तो वह स्त्री विधवा (रांड़) होती है व जिसका अँगू लम्बा हो तो वह स्त्री वुरे भागवाली होती है यदि अँगुलियां घनी व गोलाकार तथा ऊं होकर कोमलसी प्रतीत हों तो उस स्त्री को शुभदायक होती हैं व जिसकी अँगुलियां लम सी प्रतीत हों तो वह स्त्री व्यभिचारिणी होती है व जिसकी अँगुलियां पतली हों तो स््ी निर्धन होती है व जिसकी अँगुलियां छोटीसी प्रतीत हों तो वह स्त्री थोड़ी उमरवाल होती है और जिसकी अँगुलियां टेढी प्रतीत हों तो वह स्त्री कुटिलवर्तिनी यानी टेदे वती की वर्तनेवाली होती है ॥ ४१।४२॥ चिपिटामिर्भवेद्दासी विस्लासिर्दरिद्रियी। परस्परं समारूठाः पादाङ्गुल्यो भवन्ति हि। हत्वा बहूनपि पर्तीन्परप्ेष्या तदा भवेत्॥ ४३॥ दरिद्रा मध्यनग्रेष शिरालेन सदाध्वगा। रोमाव्येन भवेद्दासी निर्मांसेन च दुर्भगा ॥ ४४॥ पूर्वार्धः। ह५ू जिसके पैर की अ्रँगुलियां चपठी हा तो वह स्त्री दासी होती है व यदि अँगुलियां विरल प्रतीत हों तो वह स्त्री दरिद्रिणी होती है और यदि पैरों की अँगुलियां परस्पर चढी हो तो वह स्त्री बहुतसे पतियों को मारकर पराई दासी होती है व जिसका पैर वीच में लचासा गतीत हो तो वह स्त्री दरिद्रा होती है व जिसका पैर नसों से घिरा हो तो वह स्त्री सदैव मार्गगामिनी होती है व जिसका पैर रोमों से युत हो तो वह खत्री दासी होती है और जिसका पैर निर्मास प्रतीत हो तो वह स्त्री बुरे भागवाली होता है।। ४ ३। ४४ ।। गढौ गुल्फौ शिवायोक्कावशिरालौ सुवर्तुलौ। सुपुटौ शिथिलौ दृश्यौ स्यातां दौर्भाग्यसूचकौ।। ४५ ॥ यस्या न स्पृशते भूमिमङ्गलिश्च कनिष्ठिका। भर्तारं प्रथमं हन्ति मृतो भवति पुत्रकः ॥४६॥ जिसके पैर के गएठे ( टखने) नसों से रहित, गोलाकार व अच्छे पुटोवाले होकर छिपेसे प्रतीत हों तो उस स्त्री को कल्याणदायक होते हैं और जिसके गएठे ढीलेसे देख पड़ें तो बुरे भाग को वतलाते हैं और जिसके पैर की कनिष्ठा अँगुली भूमि को नहीं हूती कनिक हो तो वह पहले पति को मार डालती है पीछेसे उसका पुत्रभी मरजाता है॥ ४५/४६॥ अमुल नखारुणाश्च या नार्यो भोगिन्यः सुखसंयुताः। श्यामनख्यः स्त्रियो या वै कुशीलाः पापसंगताः॥४७॥ रंग श्वेतनख्यः स्त्रियो या वै महादुःखसमन्विताः। लाल पीतनख्यः प्रवासिन्यः पापिन्यश्च धनोज्भिताः ॥ ४८॥ सब्द हरिन्नख्यो हतघना दुराचारपरायणाः। पीला सुखसंतानरहिता सामुद्रेण यथोदितम्॥४६॥ जिनके नख रकवर्ण प्रतीत हों तो वे स्तियां भोगिनी होकर पुत्रपौत्रादि सुखों से संयुत होती हैं व जिनके नख काले प्तीत हों तो वे स्त्रियां वुरे स्वभाववाली ह.कर पापकर्म में परायण रहती हैं व जिनके नख सफ़ेद प्रतीत हों तो वे स्त्रियां बड़े दुःखों से संयुत होती हैं व जिनके नख पीले प्रतीत हों तो वे स्त्रियां परदेशिनी व पापिनी होकर निर्धन रहती हैं और जिनके नख हरे प्रतीत हों तो वे स्त्रियां दुराचारों में परायण होकर सुखों व सन्तानों से रहित होती हैं यह सामुद्रिकशास्त्र का वचन है । ४७ । ४६॥ हछ सामुद्रिकशास्त्रस्य अथ ललाटरेखालक्षणं व्याख्यायत- ललाटे यस्य दृश्यन्ते तिस्रो रेखाः समाहिताः । सुखी पुत्रसमायुक: स पष्टिं जीवते नरः॥५०॥ जिसके ललाट में तीन रेखा अच्छिन्न होकर प्रतीत हों तो वह माणी सुखी व पुत्रों से संयुत होकर साठिवर्ष पर्यन्त जीता है॥ ५० ॥ चत्वारिंशच्च वर्पाणि द्विरेखादर्शनान्नरः। विंशत्यव्दमेकरेखा आ्कर्णा च शतायुपः॥५१॥ सप्तत्यायुर्द्धिरेखे तु षष्ट्यायुस्तिसृभिर्भवेत्। जिसके ललाट में दो रेखायें देखीजावें तो वह माणी चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में एकमात्र रेखा प्रतीत हो तो वह माणी बीस वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में एक रेखा कानों पर्यन्त चलीगई हो तो वह प्राणी सौ वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में दो रेखा प्रतीत हों तो वह पाणी सत्तर वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में तीन रेखा प्रतीत हों तो वह प्राणणी साठि वर्ष पर्यन्त जीता है और जिसके ललाट में व्यक्त व अव्यक्त होकर बहुतली रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी बीस वर्ष पर्यन्त जीता है॥ ५१। ५२॥ चत्वारिंशच्च वर्षाणि हीनरेखस्तु जीवति। भिन्नाभिश्चैव रेखाभिरपमृत्युर्नरस्य हि॥ ५३॥ त्रिशूलं बडिशं वापि ललाटे यस्य दृश्यते। धनपुत्रसमायुक्कस्स जीवेच्छरदःशतम् ॥ ५४॥ जिसके ललाट में रेखायें नहीं प्रतीत हों तो वह प्राणी चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में रेखायें छिन्न भिन्न होकर प्रतीत हों तो उस माणी की अपमृत्यु होती है यानी वह पराणी अपमौत से मरता है और जिसके ललाट में त्रिशूल व मबली पकड़नेवाली बंसीका निशान प्रतीत हो तो वह माणी धनों व पुत्रों से संयुक् होकर सौ वर्ष पर्यन्त जीता है।। ५३। ५४ ॥ उन्नतैर्विपुलैः शङ्गैर्ललाटैर्विषमैस्तथा। निर्धना धनवन्तश्च अर्घेन्दुसदशैर्नसः॥ ५५॥ पूर्वार्धः । ह७ आचार्या:शुक्किविशालैः शिरालैः पापकारिणः। उन्नताभिः शिराभिश्च स्वस्तिकाभिर्धनेश्वराः ॥५६॥ जिनके ललाट ऊंचे, विशाल, शङ्गाकार व विपम होकर अरधचन्द्राकार पतीत हों तो वे प्राखी निर्धनी होकर धनवान् होते हैं और जिनके ललाट सीपियों के निशानों से विशाल प्रतीत हों तो वे प्राी आरचार्य (अध्यापक) होते हैं व जिनके ललाट नसों से व्याप्त हों तो वे पाखणी पापकारी होते हैं और जिनके ललाट में ऊंची नसैं प्तीत हों या स्वस्तिक (त्रिकोणकार) निशान देखे जावे तो वे पाणी धनेश्वर (महाधनवान्) होते हैं॥ ५५ । ५६॥ निम्नैरललाटैर्वधार्हा: क्रूरकर्मरतास्तथा। संवृतैश्च ललाटैश्च कृपणा उन्नतैर्नृपाः॥५७॥ ललाटोपसृतास्तिस्रो रेखाः स्युः शतवर्षिणाम्। नृपत्वं स्याच्चतसृभिरायुः पञ्चनवत्यथ ॥ ५८ ॥ जिनके ललाट निचले प्रतीत हों तो वे माणी बधके योग्य होकर क्रूरकर्मों में परायण रहते हैं व जिनके ललाट गोलाकार प्रतीत हों तो वे प्राणी कृपण होते हैं व जिनके ललाट ऊंचेसे प्रतीत हों तो वे माणी राजा होते हैं व जिनके ललाट में तीन रेखायें प्रतीत हो तो वे माणी सौ वर्ष पर्यन्त जीते हैं और जिनके ललाट में चार रेखायें प्रतीत हो तो वे माणी राजा होकर पंचानवे वर्ष पर्यन्त जीते हैं ॥ ५७। ५८ ॥ केशान्तोपगताभिश्च अशीत्यायुर्नरो भवेत्। नवतिः स्यादरेखा भिर्विच्छिन्नाभिश्च पुंश्चलः॥५६ ॥ पञ्चभिः सप्ततिः षड्भिः पञ्चाशद्बहुभिस्तथा। चत्वारिंशच रक्नाभिस्त्रिंशद्दतलगामिभिः। विंशतिर्वामवक्राभिरायुः शुद्राभिरल्पकम् ॥ ६०-॥ जिसके ललाट में रेखायें विस्तीर्ण होकर केशोंपर्यन्त चली गई हों तो वह पांणी अस्सी ८0 वर्ष की उमरवाला होता है व जिसके ललाट में रेखा नहीं प्रतीत हों तो वह पाणी नब्बे ६0 वर्ष की उमरवाला होता है व जिसके ललाट में रेखायें छिन्न भेल होकर प्रवीत हों तो वह प्राणी व्यभिचारी होता है व जिसके ललाट में पांच रेखा पतीत हों तो वह माखी सत्तर वर्षपर्यन्त जीता है व जिसके ललाट में छः, सात, आठ या बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी पचास ५० वर्ष पर्यन्त जीता है व जिसके . १३ सामुद्रिकशास्त्रस्य ललाट में रेखायें रक्रवर्ण प्रतीत हों तो वह प्राणी चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है वजिस ललाट में रेखाओं ने भौंहों तक आगमन किया हो तो वह प्राणी तीस वर्ष पर्यन्त जीत है व जिसके ललाट में बाई तरफ़ रेखायें टेदीसी प्रतीत हों तो वह प्राखणी धीस ब पर्यन्त आयु को पाता है और जिसके ललाट में टूटी फूटी छोटीसी रेखायें प्रतीत तो वह प्राणी अल्पायु होजाता है ॥। ५६। ६० ॥ ललाटे दृश्यते यस्य चक्ररेखाचतुष्ट्यम्। छशीत्यायुः समानोति पञ्चरेखाः शतं समाः ॥६१॥ यस्योन्नतं ललाटं च ताम्रवर्ण च दृश्यते। रेखाहीनं च रूक्षं च स चोन्मत्तो महीं भ्रमेत्॥ ६२ ॥ जिसके ललाट में चार रेखा टेढी होकर प्रतीत हों तो वह मांणी अस्सी वर्ष की त्र को पाता है और जिसके ललाट में पांच रेखा प्रतीत हों तो वह पाणी सौ वर्ष की त्र्प्र को पाता है व जिसका ललाट ऊंचा होकर ताम्रसरीखे वाला देखा जावे अथवा रखे।फ से हीन होकर रूखासा प्रतीत हो तो वह माणी पागल होकर पृथ्वी में घूमता हु फिरता है ॥ ६१ । ६२ ।। शुभमर्धेन्दुसंस्थानमन्जङं स्यादलोमशम्। नृपतीनां भवेिह्नं ललाटे शुभदर्शनम् ॥ ६३ ॥ उन्नतेन ललाटेन धनाव्यो जायते नरः। विषमेन ललाटेन दुःखितो दुर्जनो नरः। ललाटे, चार्धचन्द्राद्यैर्जायते पृथिवीपतिः॥ ६४ ।। जिसके ललाट में उच्चतारहित, लोमों से विहीन, शुभदायक दर्शनोंवाला होक अर्धचन्द्राकार चिह्न चमकता हो तो वे माणी राजा होते हैं व जिसका ललाट ऊंचार प्रतीत हो तो वह पाछी धनवान् होता है व जिसका ललाट विषप (कहीं ऊंचा व क खालीसा) प्रतीत हो तो वह प्राणी दुर्जन होकर दुःखित रहता है और जिसके ललाट अर्चन्द्राकार आदि निशान प्तीत हों तो वह पासी पृथ्वीपालक होता है॥ ६३६४ त्रिशलं कुलिशं चापं ललाटे यस्य दृश्यते। ईश्वरं तं विजानीयात्ममदाजनवल्लभः॥ ६५ ॥ रेखा: पञ्चललाटस्थाः समा: कर्णान्तलोचनः। भवेत्तं यस्य गंभीरं तं विद्यात्सफलायुषम् ॥।६६।। पूर्वार्धः । हह जिसके ललाट में त्रिशूल, वज्र व धनुप का निशान प्तीत हो तो उस प्राणी को सवों का स्वामी जानना चाहिये और वह प्रमदाजनों (लुगाइयों) का प्यारा होता है व जिसके ललाट में समानाकार होकर पांच रेखायें प्रतीत हो व जिसके दोनों लोचन कानपर्यन्त चलते हुए गहरेसे प्रतीत हों तो उस प्राणी को सफल आयुवाला जानना चाहिये ॥ ६५ । ६६ ।। पञ्चभि: शतमादिष्टो ह्यशीतिः षड्भिरेव च। भवेत्सप्ततिस्तिसृभिर्द्धाम्यां वै विंशतिद्वयम् ॥६७ ॥। रेखैकेन ललाटेन विंशत्यायुः प्रकीर्तितम। अरेखेण ललाटेन विज्ञेयं पञ्चविंशतिः॥ ६८॥ जिसके ललाट में पांच रेखायें प्रतीत हों तो उस प्राणी की आयु सौ वर्ष की आचार्यों ने कही है व जिसके ललाट में छः रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी अस्सी वर्ष की उमर वाला होता है व जिसके ललाट में तीन रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी सत्तर वर्ष की आयु को पाता है व जिसके ललाट में दो रेखायें प्रतीत हों तो वह चालीस वर्ष की आयु को पाता है व जिसके ललाट में एकमात्र रेखा प्रतीत हो तो उस प्राणी की बीस वर्ष की आयु कही है और जिसके ललाट में रेखा नहीं प्रतीत हों तो उस प्राणी को पचीस वर्ष की उमरवाला जानना चाहिये॥ ६७ । ६८ ॥ रेखाचतुष्ट्यं यस्य ललाटे च प्रदृश्यते। चिरायुश्चापि विद्धांश्र सुखभोगादिभिर्युतः॥ ६६॥ पञ्चरेखा भवेद्यस्य सुतसौख्यस्य कारणम्। हीनायुश्र त्रिरेखायां रेखैकेन नृपो भवेत् ॥७० ॥ जिसके ललाट में चार रेखायें देखी जावें तो वह प्राणी चिरजीवी, विद्वान्, सुखी व भोगी होकर सम्पत्तिशाली होता है व जिसके ललाट में पांच रेखा प्रतीत हों तो वह पाणी सुत व सौख्य का कारण होता है यानी वह माणी पुत्र पौत्रादिकों से संपन्न होकर सुखी रहता है व जिसके ललाट में तीन रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी आयुर्दाय से हीन होता है और जिसके ललाट में एक रेखा प्रतीत हो तो प्राणी राजा होतोहै॥ ६६। ७० ॥ न रेखा विपुलेन ललाटेन धनाव्यो जायते नरः। अल्पेन च ललाटेन चाल्पायुर्जायते नरः। सामुद्रिकशास्त्रस्य खरक्रयकरो नित्यं प्रामोति वधवन्धनम् ॥७१॥ जिसका ललाट विशाल प्रतीत हो तो वह पाणणी धनवान होता है व जिसका लला छोटासा प्रतीत हो तो वह पाणी अल्पायु होजाता है और गर्दभादिक्रय विक्रय द्वा अपने जीवन का निर्वाह करता हुआ वध बन्धन को पाता है।। ७१ ॥ ललाटे दृश्यते यस्य समरेखाचतुष्ट्यम्। ग्रीवारेखाः पञ्च यस्य शुभं तस्य विनिर्दिशेत्॥ ७२॥ दृश्यन्ते भालगा रेखाश्रतस्रः पाएडुरूपिकाः। अप्रविच्छिन्ना विवर्णास्स्युरशी त्यायुःप्रकीर्तितः।।७३।। जिसके ललाटमें चार रेखायें समानाकार प्रतीत हों और जिसकी ग्रीवामें पांच रेखायें मत हों तो उस भाणी को शुभफल कहना चाहिये व जिसके ललाटमें चार रेखायें पीली व त्रर च्छिन्न होकर मैलीसी प्रतीत हों तो वह प्राणी अस्सी वर्षकी उमरवाला कहाताहै।७२।७