107. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — नरनारीणां पदाद्यङ्गादिलक्षणं
नरनारीणां पदाद्यङ्गादिलक्षणं
चन्द्रार्घ कलशं त्रिकोणधनुषी खं गोष्पदं प्रोष्ठिकं शङ्धं सव्यपदेऽथ दक्षिणपदे कोणाष्टकं स्वस्तिकम्। चक्ं छत्रयवाङ्डुशं ध्वजपवीजम्बूर्ध्वरेखाम्बुजं विभ्राणो हरिरूनविशति महालक्ष्म्यार्चिताडगिर्भवेत् ॥१७॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य जिसके वामपाद में अर्धचन्द्र, कलश, त्रिकोण, धनु, शून्य, गोष्पद, मत्स्य और शङ्त ये आठ चिह्न प्रतीत हों और दक्षिणपाद में अष्टकोण, स्वस्तिक, चक्र, छाता, जव, अ्बुरा, ध्वज, वज्र, जामुन, ऊ्ध्वरेखा और कमल ये ग्यारह चिह्न प्रतीत हों तो वह पाणी महालक्ष्मी सेवित चरणोंवाला होता है जैसेकि इन्हीं उन्नीस लक्षणों को धारे हुए श्रीहरि (नारायणजी) महालक्ष्मीजी से पूजित चरणोंवाले हुए हैं ।। १७ ।। यस्य पादतले पझ्मं चक्रं वाप्यथ तोरणम्। अद्कशं कुलिशं वापि स राजा भवति ध्रुवम् ॥१८ ॥ जिसके पादतल में पद्म, चक्र, तोरण, अंकुश और वज्र का निशान प्रतीत हो तो वह पाखी निश्चयकर राजा होता है ।। १८ ॥। यस्य वृद्धाङ्गुलेर्मूलात्पादे रेखा च दृश्यते। स राज्यं लभते नूनं भुङ्के निष्कराटकां महीम् ॥ १६॥ असमं मूलदेशे तु वञ्रं यस्य तु दृश्यते। अविच्छिन्नं पदं चैव कुलश्रेष्ठे भवेन्नरः। अपरं पर्वरेखायां राज्यं च परिकीर्तितम् ॥२०॥ जिसके पैर में अँगूठा की मूल से चलकर ऊर्ध्वरेखा पादतल में विस्तीर्ण होकर देखी जावे तो वह माणी निश्चयकर राज्य को पाता हुआ निष्कपटक मह्दी को भोगता है जिसके पादमूल में वज्र का चिह्न जोकि असमानाकार होकर अ््प्रविच्छिन्न प्रतीत हो तो पूर्वार्थः। वह माखणी अपने वंश में प्धान होता है और यदि पैर की पोरों की रेखाओं के बीच अपर रेखा प्रतीत हो तो उसको राज्य मिलता है ऐसा आ्चार्यों ने कहा है॥ १६/२०।।