106. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पुनरपि पुरुपकरलक्षण
पुनरपि पुरुपकरलक्षण
अङ्गछ्ठेदरमध्ये तु यवो यस्य विराजते। उत्पन्नावधिभोगी स्यात्स नरः सुखमेधते॥६३ ॥ मध्यमातर्जनीूले यवो यस्य प्रदृश्यते। धनवान्मुखभोगी स्यात्पुत्रदारगृहादिमान् ॥ ६४ ॥ जिसके करतल में अँगूठा के मध्यभाग में जत का निशान विराजता हो तो वह प्राणी जन्मपर्यन्त भोगी होकर सुख को पाता है तथा मध्यमा व तर्जनी अँगुली की मूल में जव का निशान प्रतीत हो तो वह प्राणणी धनी व सुखभोगी होकर पुत्र, स्त्री व घरवाला होता है॥। ६३ । ६४ ॥ अङ्गष्ठोदरमध्ये तु रेखा यस्य यवाकृतिः। पद्मरेखा भवेद्यस्य स नरः सुखमेधते॥ ६५ ॥ सामुद्रिकशास्रस्य अङ्गष्ठोदरमध्ये तु कुरडलं यस्य दृश्यते। भोज्यमुत्पाद्यते तस्य प्रचुरं च सुखं भवेत् ॥ ६६ ॥ जिसके करतल में अँगूठा के बीच यवाकार रेखा प्रतीत हो या कमल का निशान देखा जावे तो वह प्राणी सुख को पाता है और अँगूठा के बीच में कुएडलका निशान प्रतीत हो तो उस प्राखी को भोग भिलता व बड़ा सुख होता है ॥ ६५ । ६६॥ दीक्षादानं यथाधर्म पदवीसुखमेव च। विद्यामानोपमानं च अङ्गल्यामूलसंस्थिताः।।६७।। कनिष्ठामूलसंयुक्का त्रिरेखा यस्य दृश्यते। एकं युग्मं तृतीयं च चतुर्थ बाएसम्मितम्। युग्मं वापि पृथग्वापि विपुलं भोगदायकम् ॥ ६८ ॥। जिसके करतल में कनिष्ठा के मृलदेशमें जितनी रेखायें प्रतीत हों उनका फल यह है कि जो एक रेखा प्रतीत हो तो वह पाणी दीक्षा देता है व जो दो रेखा हों तो दानी व तीन रेखों से धर्मी चार रेखों से चौधरी, पांच रेखों से सुखी, छः रेखों से विद्वान्, सात रेखों से मानी और आठ रेखों से साधारण जन होता है और जिसके करतल में कनिष्ठा की मूल से संयुक् आयुरेखा के वाम भाग में तीन रेखा हों या एक, दो, तीन, चार व पांच तथा दो ही रेखा प्रतीत हों यानी जितनी रेखायें देखी जावें उतनी ही रमणियों के साथ वह माणी विहार करता है ऐसेही यदि स्त्रियों के करतल में जितनी रेखायें प्रतीत हों उतने ही पुरुपों के साथ वे स्ति्रियां भोग कराती हैं॥ ६७। ह८॥ अङ्गष्ठानां पृथगरेखा त्रितयं गरायते पृथक्। रेखाद्वादशकं सौख्यं धनधान्यप्रदायकम् ॥ ६६ ॥ अङ्रुलीनां पृथग्रेखा गणने चेत्त्रयोदश। महादुःखंमनौक्केशं सामुद्रवचनं यथा॥ १०० ॥ अँगूठे की रेखाओं को अलग कर अँगुलियों की पर्वोंकी तीन २ रेखायें गिनी जाबें यदि गिनने में वारह रेखा प्रतीत हों तो उस पराणी को सौख्य, धन व धान्य को देती हैं और अँगुलियों की पर्वों की रेखा गिनने में तेरह प्रतीत हों तो वह प्राणी महादुःख को पाता है और यदि चौदह रेखा प्रतीत हों तो वह पाणी क्रेश को भोगता है यह सामुद्रिक शास्त्रका वचन है॥ ६६ । १०० ।। पूर्वार्धः। रखापञ्चदशे चौरः पोडशे द्यूतवञ्चकः। पापी सप्तदशे ज्ञेयो धर्मात्माष्टदशे भवेत् ॥ १ ॥ ऊनविंशे भवेन्मान्यो गुणज्ञो लोकपूजितः। तपस्वी विंशतौ ज्ञेयो महात्मा चैकविंशतौ॥ २ ॥ यदि पन्द्रह रखा ग्रतीत हों तो वह प्राणी चोर होता है यदि सोलह रेखा प्रतीत हों तो वह जुबारी होकर छलकारी होता है यदि सत्रह रेखा प्रतीत हों तो वह प्राखी पापी जानना चाहिये यदि तट्ठारह रेखा प्रतीत हों तो वह प्राणी धर्मात्मा होता है यदि उन्नीस रखा प्रतीत हों तो वह प्राणी मान्य व गुरज्ञ होकर लोक में पूजित होता है यदि वीस रेखा प्रतीत हों तो वह प्राणी तपस्व्री जानना चाहिये और यदि अँगुलियों की पोरों की रेखायें इककीस प्रतीत हों तो वह माणी महात्मा होता है ॥ १। २ ॥ ताम्रैरभूपो धनाव्यश्र अङ्गश्ठैः सयवैस्तथा। अङ्गष्ठमूलजैः पुत्री स्याद्दीर्घाङ्गलिपर्वकः ॥ ३ ॥ दीर्घायुः सुभगश्रैव सधनो विरलाङ्कुलिः। घनाङ्गुलिश्च अधनस्तिस्रो रेखाश्र यस्य वै। अ्ङ्रुछ्ठमूलगा रेखाः पुत्राश्र सुखदायकाः॥४ ॥. जिसके करतल में जवों समेत अँगूठा ताम्रवर्ण प्रतीत हो तो वह प्राणी धनशाली हो- कर राजा होता है व जिसके करतल में अँगुलियों की पोरैं दीर्घाकार प्रतीत हों तो वह माणी घने पुत्रोंवाला होता है व जिसके करतल में अँगुलियां बिरली प्रतीत हों तो वह प्राखी धनशाली व बड़भागी होकर दीर्घायु होता है व जिसके करतल में अँगुलियां घनी प्रतीत हों व उनमें तीन २ रेखायें देखी जावें तो वह पाणी निर्धनी होता है और यदि अँगूठा की मूल में जितनी बड़ी २ रेखायें प्रतीत हों तो पुत्रदायक व सुखदायक होती हैं।। ३ । ४।। अङ्गछ्ठोदरमध्ये तु यवो यस्य विराजितः । उन्नतं शोभनं तस्य शतं जीवति मानवः ॥ ५ ॥ मध्यमायां यदि जवा दृश्यन्तेत्यन्तशोभनाः। तदान्यसंचितं वित्तं प्रामोत्यङ्गुष्ठगे यवे ॥ ६ ॥ जिसके करतल में अँगूठा के बीच जब का निशान प्रतीत हो तो वह प्राखी ज्ञान, सामुद्रिकशास्त्रस्य ध्यान व मान आदिकों में ऊंचा व शोभन होकर सौ वरस जीता है और जिसके करतत् में मध्यमा व अँगूठे में जब के निशान अत्यन्त सोहते हों तो वह माणी आन के जोरे हु धन को पाता है॥ ५।६॥ चक्र यस्याथ चक्रमङ्गष्ठे यव: पझ्म च दृश्यते। तदा पितामहादीनामर्जितं धनमामुयात्॥।७॥ अंगूठा मे भक्र जिसके अँगूठा में चक्र, जब और पद्म का निशान देखा जाने तो वह पाणी पितामहा दिकों के जोरे हुए धन को पाता है।। ७। तर्जन्यामथ चक्रं च पितृद्धारा धनं लभेत्। तनैव विपरीतन्तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥८॥ जिसके करतल में तर्जनी की पहली पर्व में चक्र का निशान प्रतीत हो तो वह प्राए मित्रद्वारा वा पितृद्वारा धनको पाता है और यदि तर्जनी में चक्र का निशान नहीं प्रती हो तो उस माणी के धन का खर्चा पितृद्वारा या मित्रद्वारा निश्चयकर होता है॥ ८ ॥ मध्यमायां स्थिते चक्रे देवद्वारा धनं लभेद। तेनैव विपरीतं तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ ६ ॥ पप्रनाभिकायां चक्रे तु सर्वद्धारा धनं लभेत। तेनैव विपरीतं तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ १०॥। जिसके करतल में मध्यमा की पहली पोर में चक्र का निशान प्रतीत हो तो वह प्राए देवद्वारा धन को पाता है और यदि चक्र का निशान नहीं प्रतीत हो तो उस प्राणी के ध का खर्चा देवद्वारा निश्चयकर होता है और यदि अ्नामिका में चक्र का निशान प्रतीत ह तो वह प्रागी सर्वजन द्वारा धनको पाता है और यदि चक्र का निशान नहीं प्रतीत तो उस पाणी के धन का खर्चा सर्वजन द्वारा निश्चय कर होता है ॥ ६। १०॥ कनिष्ठायां भवेचकं वाणिज्येन धनं लभेत्। तेनैव विपरीतन्तु व्ययो भवति निश्चितम् ॥ ११ ॥ अङ्गष्ठे कुलिशं चिह्नं यस्य पाणितले भवेत्। तोरणं पुएडरीकं च राज्यं तस्य भविष्यति॥ १२।। जिसके करतल में कनिष्ठा की पहली पर्व में चक्र का निशान प्रतीत हो तो वह प्रायी पूर्वार्थः॥ चाखिज्य (वनियों के व्यापार) से धनको पाता है और यदि चक्र का निशान नहीं पतीत हो तो उस माी के धन का खर्चा वाणिज्य से निश्चय कर होता है और जिसके करतल में अँगूठा के वीच वज्र, तोरण व कमल का निशान प्रतीत हो तो उस भाणी को राज्य मिलता है यानी वह प्राणी राजा होता है ॥ ११ । १२॥ मत्स्येनैकेन चैश्वर्य सहस्रं लाभसंपदम्। पझ्मं शङ्गं विजानीयाद् व्यजनं चक्रमेव च ॥ १३॥ पद्मे कोटिर्भवेच्छत्रे शङ्गे कोटिशतानि च। लक्षाधिपश्च व्यजने चक्रे राजा न संशयः॥१४॥ जिसके करतल में एकमात्र मछली का निशान प्रतीत हो तो वह माणी ऐश्वर्य को पाता है ऐसेही पद्म, शङ्, व्यजन (पंखा) और चक्रका निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी हज़ारों की संपदा पाता है यदि छाता व पद्म का निशान प्रतीत हो तो वह प्रारणी 'कोंटी- श्वर' होता है यदि शङ्का निशान प्रतीत हो तो वह 'शतकोटीश्वर' होता है यदि व्यजन का निशान प्रतीत हो तो वह 'लक्षेश्वर' होता है और यदि चक्र का निशान प्रतीत हो तो वह प्राखी निस्सन्देह राजा होता है ॥ १३ । १४।। समस्ताङ्गलिकानान्तु कोष्ठरेखा भवेद्यदि। तदा स्वर्णाङ्गरीं दिव्यां चिरं स लभते ध्रुवम् ॥१५ ॥ पञ्चभिः सव्यकरगा नृपाक्षैः पूरिताङ्गलीः। नृपाधिकारमाप्ोति बहुलाभकरः पुमान् ॥१६॥ जिसके करतल में सारी अँगुलियों के बीच यदि प्रकोष्ठ रेखा प्रतीत हो तो वह पाणी बहुत समय तक दिव्य, स्वर्णमयी मुँदरी को निश्चय कर पाता है जिसके बायें हाथ की अँगुलियों में पांच नृपाक्ष चिह्न प्रतीत हों तो वह प्राणी राजाधिकारको पाता हुआ बहुत सा लाभ करता है ॥ १५ । १६ ।।