Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

105. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — पुनरपि स्त्रीकरलक्षण

पुनरपि स्त्रीकरलक्षण

मृदुमध्योन्नतं रक्ं तलं पाएयोररन्ध्रकम्। प्रशस्तं शस्तरेखाढ्यमल्परेखं शुभप्रदम् ।। ७० ॥ १ "अङ्गष्ठमूलगा रेखा भ्रातृदाः सुखदायिका" (इति सर्माचीनःपाठः) कनिष्ठांगुलिमूलाधो- सागे वृहत्यः पुत्ररेखाः प्रतीयन्ते श्षुद्राः कन्यारेखान्र दृश्यन्ते तस्मान्मदुक्कपाठपवादर्तव्य इति॥ द२ सामुद्रिकशास्त्रस्य विधवा बहुरेखेण विरेखेण दरिद्रिणी। भिक्षुकी मुशिराढ्येन नारीकरतलेन वै ॥ ७१॥ जिसका करतल कोमल, वीचमें ऊंचा, लालवर्ण व छेदरहित होकर प्रशस्त रेख से संयुक्त हो तो उस नारी का करतल प्रशस्त होता है और जो अल्परेखाओं से पित हो तो शुभदायक होता है व जिसके करतल में बहुतसी रेखायें पतीत हों तो स्त्री विधवा होती है व जिसके करतल में रेखायें न प्रतीत हों तो वह स्त्री दरिद्िणी है और जिसका करतल बहुतसी नसों से घिरा हो तो वह स्त्री भिक्षुकी (भीख वाली) होती है।। ७० । ७१ ।। मत्स्येन सुभगा नारी स्वस्तिकेन च सुप्रजाः। पद्मेन भूपतेः पत्नी जनयेळ्कपति सुतम्॥७२ ॥ चक्रवर्तिस्तियाः पाणौ नन्दावर्तपदक्षिपः। शङ्कातपत्रकमठा राजमातृत्वसूचकाः ॥।७३ ॥ जिसके करतल में मछलीका चिह्न प्रतीत हो तो वह स्त्री बड़े भागवाली होती जिसके करतल में त्रिकोरणकार निशान प्तीत हो तो वह स्त्री अच्छे सन्तानों होती है व जिसके करतल में पद्मका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री रानी होकर पालक पुत्रको उपजाती है व जिसके करतल में दक्षिणणावर्त मएडल प्रतीत हो तो स्त्री चक्रवर्ती (शाहंशाह) की रानी होती है व जिसके करतल में शङ्क, छाता धनुप का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री राजकुमारों की माता कहाती है॥ ७२।७ कृषीवलस्य पत्नी स्याच्छकटेन युगेन वा। चामराङ्कशकोदरडै राजपत्री भवेद् ध्रुवम्ं।।७४॥ अङ्गष्ठमूलान्निर्गत्य रेखा याति कनिष्ठिकाम्। यदि स्यात्पतिहन्त्री सा दूरतस्तां त्यजेत्मुधीः॥७५ जिसके करतल में गाड़े व जुर्वे की रेखा प्रतीत हो तो वह स्त्री किसान की पन्नी है और यदि करतल में चमर, अंकुश और धनुष का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्र रचयकर रानी होती है और जिसके करतल में अँगूठा की मूल से निकलकर ए कनिष्ठाके समीप चली जावे तो वह स्त्री पतिके मारनेवाली होती है इसलिये पषि उसको दूरसेही त्याग करैं।। ७४। ७५॥ पूर्वार्धः । त्रिशलासिगदाश क्िदुन्दुम्याकृतिरेखया। नितम्बिनी कीर्तिमती करेण पृथिवीतले ॥७६॥ जिसके करतल में त्रिशूल, तलवार, गद़ा, शेल और नगाड़े की आकार रेखा प्रतीत ोतो वह़ स्त्री पृथ्वीतलमें कीर्तिवाली यानी बड़ी यशस्विनी होती है॥ ७६॥ वाजिकुञरश्रीवृक्षयूपेषुयवतोमरैः। ध्वजचामरमालाभिः शैलकुएडलवेदिमिः॥७७॥ शङ्गातपत्रपद्मैश्र मत्स्यस्वस्तिकसदथैः । लक्षणैरक्कशादैश्र स्त्रिय: स्ू राजवंलमाः॥७ ॥ जिसके करतल में घोड़ा, हाथी, विल्वदृक्ष, यज्ञस्तम्भ, यव, गुर्ज, ध्वजा, चमर, माला, द्रपर्वत, कर्णभूपण, वेदी, शङ्ञ छाता, कमल, मछली, त्रिकोणकाररेखा, उत्तमरथ गैर अंकुशादि ये लक्षण पतीतहों तो वे स्त्रियां राजाओं की रानियां होती हैं।। ७७|७=॥ अल्पायुवे लघुच्छिन्ना दीर्घच्छिन्ना महायुषे। शुभं तु लक्षएं स्त्रीणां प्रोक्नं तु शुभमन्यथा ॥ ७६॥ अद्रुशं कुराडलं चक्रं यस्याः पाणितले भवेत्। पुत्रं प्रमूयते नारी नरेन्द्रं लभते पतिम् ॥८० ॥ अँगूठा के निचलेभाग में छोटी २ रेखा छ्विन्न भिन्न प्रतीत हों तो अल्पायु करती हैं गैर यदि दीर्घ रेखायें छिन्न भिन्न पतीत हों तो दीर्घायु करती हैं स्त्रियों का शुभदायक नक्षण कहा गया अन्यथा लक्षण अशुभ होता है व जिसके करतल में अंकुरा, कुए डल गौर चक्र का निशान प्रतीत हो तो वह सत्री राजपति को पाकर राजकुमार को उप- नाती है॥ ७६ै। ८० ॥ यस्याः पाितले रेखाप्राकारतोरणं भवेत्। अपि दासकुले जाता राजीत्वमधिगच्छति ॥८१॥ रक्का व्यक्का गभीरा च स्निग्धा पूर्णा च वर्तुला। कररेखाङ्नायाः स्याच्छमा भाग्यानुसारतः ॥८२॥ जिसके करतल में प्राकार (घेर) व तोरशा के आकार रेखा प्रतीत हों तो वह स्त्री दि दासकुल में उपजी हो तो भी रानी होती है व जिस स्त्री के करतल में रेखा लाल, सामुद्रिकशास्त्रस्य मकट, गंभीर, चिकनी व पूर्ण होकर गोलाकार प्रतीत हो तो भाग्यानुसार शुभदायक होती है॥। ८१ । ८२ ।। तुलामानाकृतीरेखा वणिक्पत्नीत्वहेतुका। गजवाजिवृषाकारा करे वामे मृगीद्टशाय् ॥। ८३॥ पाणिपादतले रेखा ताम्रवर्णा नखानि च। यदि मृगनयनियों के करतल में तुला (तराजू) तथा दएडाकति रेखा प्रतीत हों और वायें करतल में हाथी, घोड़ा तथा बैलके आकार रेखा प्रतीत हों तो वे स्तिरियां बिना कारण वनियों की रमखियां होती हैं और जिसके करतल व पादतल में तांघे समान रेखा व नख प्रतीत हों तो वह स्त्री जीवद्वत्सा होकर चिरजीवी पुत्र पौत्रों से संयुत होती है॥=३८४।। रेखा प्रासादवज्राभा सूते तीर्थकरं सुतम्। कृषीवलस्य पत्नी स्याच्छकटेन मृगेन वा ॥ द५ ॥ यस्या: करतले पद्मं पूर्णकुम्भं तथैव च। राजपत्रीत्वमामोति पुत्रपौत्रः प्रवर्तते ॥८६॥ जिसके करतल में देवमन्दिर, राजमहल व वज्राकार निशान प्रतीत हो तो वह त्ी तीर्थकारी पुत्र को उपजाती है और जिसके करतल में गाड़ा व हिरन का निशान पतीत हो तो वह स्त्री किसान की पत्नी होती है व जिसके करतल में पद्म व पूर्णकुम्भ का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री राजपननी होकर पुत्र पौत्रों को पाती है ।। ८५ । ८६ ।। वृद्धामूले च या रेखा भ्रातृभग्नीप्रदायिकाः । कृष्णा: सूक्ष्मा: क्रमेणैव हीनाश्छिद्रपदायिकाः॥न७॥ अङ्कशं कुरडलं यानं यस्याः पाणितले भवेत। दीर्घायुषं पतिं प्राप्य पुत्रवृद्धिर्भवेद्धुवम् ॥ ८८ ॥ अँगूठा की मूल में जो रखायें प्रतीत हों वे भाई व वहिनियों को देती हैं और जो काली व क्रम से पतली होकर हीन रेखा प्रतीत हों तो भाई व भगिनियों को विनाशती हैं और जिसके करतल में अङ्कश, कुएडल और यानका निशांन प्तीत हो तो वह ख्ी दीर्घायु पति को पाकर निश्चय कर पुत्रवृद्धि को पाती है ॥ ८७ । ८८ ॥ अङुश्ठमूलाद्यदिवैतु रेखा स्थूला तथा चक्रकृता च नारी। पूर्वार्धः । अवारिता पराडप्रचएडता च परान्विता शून्यहदा च खरिडता॥८2 ॥ जिसके करतल में अँगूठा की मूल से मध्यभाग पर्यन्त रेखा मोटी होकर चक्राकार प्रतीत हो तो वह स्त्री कुलटा, नष्ट स्वभाववाली व परपुरुषों में आसक़ व सांड़ के नांई प्रचएडा होकर अपने आधीन रहती है।। ८६ ।। यस्या: करतले पादे चोर्ध्व रेखा च दृश्यते। यदि नीचकले जाता राजपत्नी भवेद ध्रुवम् ॥ ६० ॥ जिसके करतल या पादतल में ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) प्रतीत हो तो वह स्त्री यदि नाच कुल में उपजी हो तो भी निश्चयकर राजपत्री होती है॥ ६० ॥ अनामिका भवेच्छिन्ना सा भवेत्कलहप्रिया। मध्यमा च भवेच्छिन्ना सा नारी कुलटा स्मृता । ६१ ।। तर्जनी च भवेच्छिन्ना विधवा सा प्रकीर्तिता। कनिष्ठ च भवेच्छिन्ना सा नारी दुःखभागिनी ॥ ६२ ॥ जिसके करतल में अनामिकास्थित रेखा छिन्न प्रतीत हो तो वह स्त्री बड़ी लड़ाका होती है व मध्यमास्थित रेखा कटीसी प्रतीत हो तो वह स्त्री व्यभिचारिणी होती है व यदि तर्जनी स्थित रेखा टूंटीसी प्रतीत हो तो वह स्त्री विधवा कहाती है और यदि कनिष्ठास्थित रेखा भिन्नसी प्रतीत हो तो वह स्त्री दुःखभागिनी होती है ॥ ६१ । १२।।