104. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — केशलक्षण
केशलक्षण
केशा अलिकलच्छाया: सूक्ष्माः स्निग्धाः सुकोमलाः। किश्चिदाकुञ्चिताग्राश्च कुटिलाश्रातिशोभनाः॥२३॥ परुषा: स्फुटिताग्राश्र विरलाश्च शिरोरुहाः। पिज्ला लघवो रूक्षा दुःखदारिद््यवन्घदाः ॥२४॥। जिनके केश भ्रमरसमूह के समान काले, पतले, चिकने व कोमल तथा अगरभाग चुँघुराले होकर टेढेसे प्रतीत हों तो उन स्त्रियों को अत्यन्त शुभदायक होते हैं और जि केश कठोर व अग्रभाग में टूटे व बिरले व पीले व छोटे होकर रूखेसे मतीत हों तो ख्रियों को दुःख, दारिद्रिय और वन्धन को देते हैं ॥ २३ ।२४॥। "एवं पट्पष्टीनामङ्गानां शुभाशुभलक्षं मोच्य प्रसंगान्मशकादीन्याह-" स्रवोरन्तर्ललाटे वा मशको राज्यसूचकः । वामे कपोले मशकः शोणो मिष्टान्नदः ख्िरियाः॥२५॥ तिलकं लाञ्छनं वापि हृदि सौभाग्यकारणम्। यस्या दक्षिणवक्षोजे शोणे तिलकलाञ्छने ॥ २६ ॥ कन्याचतुष्टयं सूते सूते सा च सुतत्रयम्। इस प्रकार छांछठ अंगों के शुभाशुभ लक्षणों को कहकर प्रसंग से मशकादिकों कहते हैं कि जिसके भौंहों के बीच या ललाट में मशेका चिह्न प्रतीत हो तो वह रा १ यस्या: कुटिलकेशाश्च नेत्रमुत्पलसन्निभम्। नाभिश्च दक्षिसाव्ता सा नारी मेधते॥ अतिनीला स्निग्धकेशी सुमुखी च सुमध्यमा। सुभ्नजह्वा सुनासा च सा कन्वा मेधते ॥ या सुवर्णा प्रसन्नाक्षी सुलोमा च मृदूदरी। पद्मपत्रसमाक्षी च पुत्रः सार्धे प्रवर्ध
हृदयम तिल पूर्वार्धः। सूचक होता है व जिसके वायें गाल में लाल मशा का चिह्न प्रतीत हो तो उस स्त्री को मिश्टानदायक होता है और जिसके हृदय में तिल का निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री को सौभाग्यदायक होता है और जिसके दाहिने स्तन में लाल तिल का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री चार कन्याओं को पैदा कर पीछेसे तीन पुत्रों को उपजाती है ॥२५/२६।३॥ तिलकं लाञ्छनं शोएं यस्या वामे कुचे भवेत् ॥ २७ ॥। एकं पुत्रं प्रमूयादौ ततः सा विधवा भवेत्। गुह्यस्य दक्षिणे भागे तिलकं यदि योपितः ॥ २८॥ तदा क्षितिपतेः पत्नी सूते वा क्षितिपं सुतम्। जिसके बायें कुच (दूध) पर लाल तिलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री पहले एक पुत्र को पैदाकर विधवा होजाती है और जिसकी गुदाकी दाहिनी तरफ़ तिलका निशान इं पतीत हो तो वह स्री राजाकी रानी होती है अथवा पृथ्वीपालक पुत्र को उपजाती है॥ २७। २८। ३।। नासाग्रे मशकः शोणो महिष्या एव जायते॥ २६ ॥ कृष्णः स एव भर्तृध्न्याः पुंश्रल्याश्र प्रकीर्तितः। नाभेरधस्तात्तिलकं मशको लाञ्नं शुभम्॥ ३०॥ नकक मशकस्तिलकं चिह्नं गुल्फदेशे दरिद्रकृत्। जिसकी नासिका के अग्रभाग में लाल मशा का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री पट- रानी होती है व जिसकी नासिका के अग्रभाग में काले तिलका निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री पतिको भारती हुई व्यभिचारिणी होजाती है व जिसकी नाभी के नीचे तिल या मशा का निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होता है और जिसके टखनों या गठों में मशा व तिल का निशान प्रतीत हो तो उस स्त्री के लिये दरिद्रकारी होता है।। २६। ३०।३।। करे कर्णों कपोले वा कराठे वामे भवेद्यदि। ३१॥ एषां त्रयाणामेकन्तु प्राग्गर्भे पुत्रदं भवेत्। भालगेन त्रिशूलेन निर्मितेन स्वयंभुवा ॥ ३२ ।। नितम्बिनीसहस्त्राणां स्वामित्वं योषिदापुयात्। जिसके हाथ, कान, कपोल व कएठ के वायें तरफ़ मशा या तिल का निशान प्तीत हो अथवा हाथ, कान व गाल इन तीनों में से किसी एक में मशा या तिल देख पड़ता सामुद्रिकशास्त्रस्य हो तो उस स्त्री को पहले गर्भमेही पुत्रको देता है और जिसके भाल में ब्रह्मा के हुए त्रिशूल का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री हज़ारों स्त्रियों की स्वामिनी होती है य हज़ारों स्त्रियों पै आज्ञा को चलाती है ॥ ३१ । ३२। ३॥। सुपा परस्परं या तु दन्तान् किटकिटायते ॥३३ ॥ मुलक्ष्मापि न सा शस्ता या किंचित्पलपेत्तथा। पाणौ प्रदक्षिणावर्तो धर्म्यो वामो न शोभनः॥३४॥ सोती हुई जो स्त्री परस्पर दांतों को किटकिटाती है तो वह अच्छे लक्षरणोंवाली होकर भली नहीं होती है वैसेही सोती हुई जो वका करती है वह भी शुभदायक होती है और जिसके हाथ में रोमों का दहिनावर्त प्रतीत हो तो धर्म को कराता है जिसके हाथ में रोमों का वामावर्त प्रतीत हो तो शुभदायक नहीं होता है।। ३३। ३४ नाभौ श्रुतावुरसि दक्षिणावर्त इंडितः । सुखाय दक्षिणावर्तपृष्ठवंशस्य दक्षिणे !३५॥ अन्तः पृष्ठ नाभिसमो बह्वायुः पुत्रवर्धनः। राजपत्न्याः प्रदृश्येत भगमौलौ प्रदक्षिणः ॥३६॥ जिसकी नाभि, कान और छाती में रोमों या रेखाओं का दहिनावर्त प्रतीत हो उस स्त्री को शुभदायक होता है और जिसके पृष्ठवंश की दाहिनी तरफ़ दहिनावर्त पती हो तो सुखदायक होता है और जिसकी पीठ के बीच में नाभी के समान गोलाकार शान प्रतीत हो तो उस स्त्री को बड़ी आयु देता हुआ पुत्रों को बढ़ाता है और जिस योनि के ऊपरले भाग में या योनि की जड़ में दहिनावर्त प्रतीत हो तो वह स्त्री राजा रानी होती है।। ३५ । ३६ ।। स चेच्छकटभङ्ग: स्याद्बह्वपत्यसुखप्रदः। कटिगो गुह्यवेधेन पत्यपत्यनिपातनः॥३७॥ स्यातामुदरवेधेन पृष्ठावर्तौ न शोभनौ। एकेन हन्ति भर्तारं भवेदन्येन पुंश्चली ॥३८॥ जिसकी योनिके ऊपरले या निचले भाग में रोमों या रेखों का निशान गाढ़ेक। भङ्ग होकर प्रतीत हो तो वह बहुतसे सन्तानों क्रो देकर सुखदायक होता है और उ7 शुदा को बेधकर यानी उदरपर्यन्त आकर कमर में प्ाप्त हो तो उस स्त्री के स्वा पूर्वारधेः। व सन्तानों को मारकर गिरा देता है और जिसकी पीठ में उदर को वेधन कर दो आवर्त प्ास हों तो शुभदायक नहीं होते हैं और यदि एकहीं आवर्त प्रतीत हो तो वह स्त्री स्वामी करो विनाशती है और जो दूसरा आवर्त प्रंतीत हो तो वह स्त्री व्यभिचारिणी होजाती है।। ३७। ३८।। कराठगो दक्षिणावर्तो दुःखवैधव्यहेतुकः। सीमन्तेथ ललाटे वा त्याज्या दूरात्मयत्नतः ॥३६॥ सा पति हन्ति वर्षेण यस्या मध्ये कृकाटिकम्। प्रदक्षिणो वा वामो वा रोम्णामावर्तक: स्त्ियाः॥४०॥ जिसके कएठ में दाहिनावर्त निशान प्रतीत हो तो वह उस स्त्री के लिये दुःख व वैधव्य का हेतु होता है और जिसके शिर में या ललाट में रोमों व रेखाओं का दाहिनावर्त पतीत हो तो उसको दूरसे ही बड़े यत्र के साथ त्यागना चाहिये और जिसके कुकाटिका (घांटी) के बीच में रोमों का दहिनावर्त या वामावर्त का निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री एकही साल में पति को विनाशती है॥ ३६।४० ।। एको वा मूर्दनि दौ वा वामे वामगती यदि। आदशाहं पतिन्नौ तौ त्याज्यौ दूरात्सुबुद्धिना ॥ ४१॥ क्यावर्ता च कुलटा नाभ्यावर्ता पतिव्रता। पृष्ठावर्ता च भर्तृन्नी कुलटा वाथ जायते ॥ ४२ ॥ जिसके मस्तक में बायें तरफ़ एक या दो वाम गतिवाले वामावर्त प्रतीत हों तो वें उस स्त्री के पति को दश दिन में ही मार डालते हैं व जिसकी कमर में वामावर्त पंतीत हो तो वह स्त्री कुलटा (छिनारि) होती है व जिसकी नाभी ( तोंदी) में वामावर्त प्र- ママ तीत हो तो वह स्त्री पतिव्रता होती है और जिसकी पीठ में वामावर्त परतीत हो तो वह स्त्री पति को विनाशती है अथवा व्यभिचारिणी होजाती है ।।४१।४२॥ स्कन्द उवाच- सुलक्षणापि दुश्शीला कुलक्षणशिरोमणिः। अलक्षणापि सा साध्वी सर्वलक्षणभूस्तु सा।। ४३॥। सुलक्षणा सुचरित्रा स्वाधीना पतिदेवता। विश्वेशानुग्रहादेव गृहे योषिदवाप्यते ॥४४॥ स्वामिकार्ततिकजी अगस्त्यजी से कहते हैं कि, अच्छे लक्षणोंवाली स्त्री भी वुरे स्वभाव सामुद्रिकशास्त्रस्य वाली होकर कुलक्षणों की शिरोमणि होजाती है और जो लक्षणों से हीन स्त्री पतिव्रता होजाती है और वह सर्वलक्षणों की भूमि (आश्रय) कहाती है अब मसंग ग्रन्थान्तर से लक्षणों व कुलक्षणों को कहते हैं कि "पझमिनी १ पद्मगन्धाच मीनगन चित्रिणी २। शङ्डिनी ३ क्षारगन्धा च मदगन्धा च इस्तिनी ४। हंसपुन्नागवर्णाभा या रक्कलोचना। अष्टौ जनयते पुत्रान्मान्नोति परमं सुखम्। काकस्वरा काकजङ्गा तथैवोर्ध्व तथा। लम्बोष्ठी लम्बवदना तां कन्यां परिवर्जयेत् । हंसतुल्यगतिर्नारी राजपत्री च भवेत्। यस्या गमनमात्रेण भूभिकम्प: मजायते। सा स्त्री दैन्यकरी ज्ञेया सामुद्रवचनं य आ्र्वर्तः पजने यस्या मध्ये चैव मदक्षिणः। एकं सा जनयेत्पुत्रं राजानं पृथिवीपतिम् (पद्मिनी पद्म की सुगन्धवाली होती है व चित्रिणी मछली कीसी गन्धवाल शक्धिनी क्षारगन्धवाली होती है तथा हस्तिनी मद की गन्धवाली कहाती है और जो हंस व नागकेसर के समान वर्णवाली होकर लाल लोचनोंवाली प्रतीत हो तो वह पुत्रों को उपजाती हुई परम सुख को पाती है और जो स्त्री काकस्वरवाली व काक वाली व ऊंचे स्वरवाली तथा लम्बे होठोंवाली होकर लम्बे दनवाली प्रतीत तो उस कन्या को त्याग देवे और जो स्त्री हंस के समान गमनवाली हो तो वह होती है और जिसके गमन से पृथ्वी कांपती हो तो वह स्त्री दुःखकारिणी जानना हिये यह समुद्र का वचन है व जिसके गर्भ में या कमर में रोमों या रेखाओं का दहि वर्त प्रतीत हो तो वह स्त्री राजरूप पृथ्वीपालक पुत्र को उपजाती है) इत्यादि लक्ष व कुलक्षणों को जानना चाहिये और अच्छे लक्षणोंवाली, शोभन चरित्रोंवाली अधीन रहनेहारी पतिदेवतावाली स्त्री विश्वेश्वर की दया से ही घरमें आनकर प्राह्त जाती है विना परमेश्वर की दया पूर्वोक़ लक्षणोंवाली स्त्री नहीं मिलसक्ी है।। ४३/४ अलंकृता: सुवोसिन्यो याभिः प्राक्नजन्मभिः। नानाविघैरलङ्कारैस्ताः सुरूपा भवन्ति हि॥ ४५ ॥ सुतीर्थेषु वपुर्याभिः क्षयितं वा विहायितम्। ता लावरयंतरङ्गिरायो भवन्तीह सुलक्षणाः॥ ४६॥ जिन्होंने पूर्वजन्म में सुवासिनी स्त्रियों को अनेकानेक अलंकारों से भूषित कि वे स्त्रियां सुन्दर रूपवाली होती हैं और जिन्होंने शुभदायक प्रयागाि तीर्थों में देहों को व्रतादिकों से क्षीण किया या छोड़ा है वेही स्ति्रियां इस लोक में लावप "सुन्दरता" की तरङ्गिणियां होकर सुलक्षणा(अच्छे लक्षणोंवाली) होती हैं।४५। १ ऊढाअनूढा वा पितृगेहे सयावनस्त्रियः सुवासिन्यः स्वेपु ज्ञातिषु वस्तुंशीलं यासा व्युत्पत्ते: स्वचासिनी चिरंटी स्याद् द्वितीयवयसि स्त्रियामिति रुद्रा, चिरंटीतु सुच नीति चामर: ॥ पूर्वार्धः। अर्चिता जगतां माता याभिर्मडवधूरिव। ता भवन्ति सुचारित्रा: योषा: स्वाधीनभर्तृकाः॥४७॥ स्वाधीनपतिकानां च सुशीलानां मृगदिशाम। स्वर्गापवर्गावत्रैव सुलक्षणफलं हि तत्॥४८ ॥। जिन्होंने जगन्माता मृडानी (शिवमिया) का ही पूजन किया है वेही स्त्रियां शोभन चरित्रोंवाली होकर स्वाधीनपतिका होती हैं कि जिन्होंने पति को अधीन कर लिया व भले स्वभाव को रक्खा है उन यृगनयनी रमणियों को यहां ही स्वर्ग और अपपवर्ग (मोक्ष) ये दोनों मिलते हैं क्योंकि वह फल सुलक्षणों का ही है॥ ४७। ४८॥ सुलक्षणैः सुचरितैरपि मन्दायुषं पतिम। दीर्घायुषं प्रकर्वन्ति प्रमदा: प्रमदास्पदम् ॥४६॥ अतः सुलक्षणा योषा परिणेया विचक्षणैः। लक्षणानि परीक्ष्यादौ हित्वा दुर्लक्षणान्यपि॥ ५० ॥ लक्षणानि मयोक्ानि सुखाय गृहमेधिनाम्। येषां विज्ञानमात्रेण विज्ञो भवति मानवः ॥५१ ॥ बड़े हर्पवाली स्त्रियां शोभन लक्षणों व शोभन चरितों के द्वारा अल्पायु पति को दी- र्घायु करती हुई हर्ष का घर बनाती हैं यही महाभारत वनपर्व में भी प्रसिद्ध है कि सावित्री ने अल्पायु सत्यवान् को दीर्घायु बनाया है इसलिये विद्वानों को आदि में ल- क्षणों की परीक्षा कर व वुरे लक्षणों को त्यागकर सुलक्षण स्त्री को व्याहना चाहिये मैंने गृहमेधियों (गृहस्थों) के सुख के लिये लक्षणों को कहा है जिनके विज्ञानमात्र से मनुष्य विशेपज्ञाता होजाता है ॥ १४६। १५१॥ इति स्कन्दपुराणकाशीखएडे स्त्रीणां लक्षणं समाप्तिमगादिति शम् । अथातः संप्रवक्ष्यामि कररेखाविचारणम्। श्रूयतां देवदेवेशि सज्जनानन्दकारणम्॥ १ ॥ वामभागे तु नारीणां दक्षिणे पुरुषस्य च। निर्दिष्टं लक्षणं तेषां समुद्रेण यथोदितम् ॥ २॥ अब इसके उपरान्त हस्तरेखा का विचार जोकि विद्वज्जनों के आनन्द का कारण है उस सामुद्रिकशास्त्रस्य को हे देवदेवोशी! सुनिये नारियों के वाम हाथ में और पुरुषों के दाहिने हाथ में रेस का लक्षण वतलाया है जैसाकि समुद्र ने उन नरनारीगणोंके विषय में कहा है॥१ पूर्वमायुः परीक्षेत पश्चाल्लक्षणमेव च। आयुर्हीनं नराणां चेल्क्षणैः किं प्रयोजनम्॥३॥ पहले आयु की परीक्षा करै पीछे से लक्षणों का विचार करै यदि मनुष्यों की हीन है तो लक्षणों से कौनता मयोजन सिद्ध होसक्ा है ॥ ३ ॥ अनामिका पूर्वमूले कनिष्ठादिक्रमेण चेत। आयु्ष दशवर्षाणि सामुद्रवचनं यथा ॥ ४ ॥ जिसके करतल में कनिष्ठा अँगुली की मूल से चलकर अनामिका की मूल के भाग में आयुरेखा प्रतीत हो तो उस भाणी की दशवर्ष की आयुर्दाय होती है जैस सामुद्रिकशास्त्र का वचन है॥ ४ ॥ अङ्गप्ठस्यायूर्ध्व रेखा वर्तते नृपतिः शुभा। सेनापतिर्धनेशश्र मध्यमायुर्नरो भवेत॥ ५ ॥ जिसके करतल में अँगूठा के ऊपर शुभलक्षणाङ्वित ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) प्रतीन तो वह प्राी राजा तथा सेनापति (फौजका सरदार) व धनशाली होकर मध्यम ६० ५० वर्ष की उमरवाला होता है ॥। ५॥ येषां पारायूर्ध्व रेखा स्यात्कनिष्ठ मूलसंस्थिता। कनिष्ठागंत ते नराः परदेशेषु शतमायुर्लभन्ति वै॥ ६॥ जिनके करनल में ऊर्ध्वरखा कनिष्ठा अँगुली की मूल में प्रतीत हो तो वे प्राण देश में बसते हुए सौ १०० वर्ष की आयु पाते हैं ॥ ६ ॥ आयुष्मती भवेद्रेखा तर्जनीमूलसंस्थिता। शतवर्ष भवेदायुः सुखमृत्युर्न संशयः ॥।७॥ तर्जनी गत अर्थ रेसा. जिसके करतल में आयुरेखा चलकर तर्जनी अँगुली की मूल में प्रतीत हो तो भाणी सौवर्ष जीता हुआ सुख से मरता है संशय नहीं करना चाहिये ।। ७।। मध्यमामूलपर्यन्तमायुरेखा च दृश्यते। पूर्वार्धः। ६ह जिसके करतल में आयुरेखा मध्यमा अँगुली की मूलपर्यन्त प्रतीत हो तो वह पाणी पदम अड़तीस वर्ष जीता है वाद आयुर्वल का विनाश होजाता है ॥ ८॥ आयुर्बलं भवेद्रेखा नामिकामूलसंस्थिता। त्रिदशं वा त्रिपष्टि वा आयुर्वलविनाशनम् ॥६॥ जिसके करतल में आयुरेखा अनामिका अँगुली की मूल में प्रतीत हो तो वह प्राणी "त अताम तीस वर्ष या तिरसठि वर्ष जीता है वाद उसके आयुर्वल का विनाश होता है।। ६।। आयुर्हीनं यथास्वल्पं बहुदीर्घं च दृश्यते। ते नराः सुखदुःखेन चाल्पमृत्युर्न संशयः॥ १०॥ जिसके करतल में आयुरेखा बहुत थोड़ी सी प्रतीत हो तो वह पाणी आयुहीन होता है और जिनके करतल में आयुरेखा बड़ी दीर्घ प्रतीत हो तो वे भाी सुख व दुःख से जाते हैं अथवा निस्संदेह उनकी अल्पायु नहीं होती है ॥ १० ॥ कनिष्ठामूलरेखा तु कुर्याच्ैव शतायुषम्। अ््नामिकामध्यमाभ्यामन्तरे संयुता सती ।। ११।। जिसके करतल में कनिष्ठा अँगुली की मूल की रेखा यानी आयुरेखा अनामिका व मध्यमा के बीच में संयुक्क होती हुई प्रतीत हो तो उस प्राणी को सौवर्ष की आयुवाला करती है यानी वह प्राणी सौवर्ष की उमरवाला होता है ॥ ११ ॥ ऊना ऊनायुषं कुर्याद्रेखाश्चाङ्गष्ठमूलगाः। बृहत्यः पुत्रदा: क्षीणाः प्रमदा: परिकीर्तिताः ॥१२॥ जिसके करतल में आयुरेखा अनामिका व मध्यमा के वीच कमती, पतीत हो तो उस पाणी को कम उमरवाला करती है और यदि अँगूठे की मूल में जो बड़ी रेखायें प्रतीत हों तो वे पुत्रदायक होती हैं और जो क्षीण रेखा प्रतीत हों तो कन्यायें कहाती हैं यानी अँगूठे की मूल में जितनी बड़ी रेखा प्रतीत हों उतनेही पुत्र पैदा होते हैं और जितनी रेखा छोटी प्तीत हों उतनीही कन्यायें जन्मती हैं और उन रेखाओं में छोटी या बड़ी रेखा जितनी .कटीसी पतीत हों उतनेही कन्याष पुत्र मरजाते हैं ॥ १२॥ कनिष्ठं हि समाश्रित्य मध्यमायामुपागता। षष्टिवर्षायुवं कुर्यादायुरेखा न संशयः।। १३।। जिसके करतल में आयुरखेा कनिष्ठा अ्रँगुली का आश्रय लेकर मध्यमा अँगुली के समीप सामुद्रिकशास्त्रस्य पहुँचगई हो तो उस पाणी को साठिवर्ष की उमरवाला करती है यानी वह भाी नि देह साठिवर्ष जीता है॥ १३ ॥ कनिष्ठाङ्कलिदेशात्तु रेखा गच्छति तर्जनीम्। अविच्छिन्ना भवेद्यस्य शतमायुर्विनिर्दिशेत्॥१४॥ जिसके करतल में आयुरेखा अविच्छिन् होकर कनिष्ठा अँगुली से चल तर्जनी गुली पर्यन्त पहुँच गई हो तो उस पाणणी की सौ वर्षकी आयु कहै यानी वह माणी वर्ष तक जीता है।। १४ ।। कनिष्ठाङ्गलिमध्यस्था रेखा चेदवतिष्ठति। ऊर्ध्वच्छिन्ना भवेद्यस्य विंशत्यायुर्विनिर्दिशेत्॥। १५॥ जिसके करतल में आयुरेखा यदि कनिष्टा अँगुली के बीच में विद्यमान हो औरे रखेा का ऊपरला-भाग कटासा प्रतीत हो तो उस पाणी की आयु बीस वर्पकी कहे या वह प्राखी बीस वर्ष पर्यन्त जीता है॥ १५ ॥ कनिष्ठाङ्गलिविमूलं वा रेखा गच्छति मध्यमाम्। अविच्छिन्ना भवेद्यस्याशीतिस्तस्य विनिर्दिशत्॥१६॥ जिसके करतल में आयुरेखा कनिष्ठा अँगुली की मूल से चलकर मध्यमा पर्यन्त प कर छ्िन् भिन्न नहीं प्रतीत हो तो उस पाी की आयु अस्सी वर्ष होती है यानी पागी अस्सी वर्ष पर्यन्त जीता है। १६ ।। कनिष्ठाङ्कलिदेशे तु रेखा गच्छति नान्यतः। अच्छिन्ना विरला चैव विंशत्यायुर्विनिर्दिशत्॥१७॥ जिसके करतल में आयुरेखा कनिष्ठा अँगुली के मूलदेश में होकर अन्यदेश में न हो अथवा छिन्न भिन्न नहीं होकर विरल प्रतीत हो तो वह माणी बीस वर्ष प जीता है।। १७ ।। कनिष्ठाङ्गुलिमूले तु रेखा गच्छत्यमामिकाम्। अविच्छिन्ना भवेद्यस्य चत्वारिंशत्स जीवति॥१८॥ १ जिसके करतल में आयुरेखा कनिष्ठा अँगुलीकी मूल से अ्पनामिका पर्यन्त गई हो यदि वह रेखा छ्िन्न भिन्न नहीं प्रतीत हो तो वह पाणी चालीस वर्ष पर्यन्त जीता है। पूर्वार्धः । यस्यास्तर्िकनिष्ठ च तर्जनी मध्यमा समा। कनिष्ठायां शतायुः स्यात्तर्जन्यां नृपतिर्भैवेत्॥ १६॥ जिसके करतल में आयुरेखा कनिष्ठा अँगुली की मूल में विस्तृत होकर तर्जनी व म- ध्यमा की मूल में समानाकार प्रतीत हो अथवा आयुरेखा कनिष्ठा की मूल से चलकर मध्यमा की मूल पर्यन्त विस्तीर्ण हो तो वह माणी सौ वर्षकी उमरवाला होता है और यदि आयुरेखा कनिष्ठा की मूल से चलकर तर्जनी के मूल पर्यन्त विस्तार से पहुँची हो तो वह पारणी राजा होता है ॥ १६ ॥ तर्जन्या मध्यमाङगल्या आयुरेखा तु मध्यतः। संप्राप्ता या भवेच्चैव स जीवेच्छरदः शतम् ॥२०॥ जिसके करतल में आयुरेखा जोकि तर्जनी व मध्यमा अँगुली के बीच में भलीभांति पहुँची हो तो वह गाी सौवर्ष पर्यन्त जीता है॥ २० ॥ प्रदेशिनीगता रेखा कनिष्ठामूलगामिनी। शतायुषं च कुरुते छ्िन्नया तरुतो भयम् ॥ २१॥ जिसके करतल में आयुरेखा कनिष्ठा की मूल से गमन करती हुई तर्जनी की मूल पर्यन्त विस्तृत होकर पाप्त हो तो उस पराणी को सौवर्ष की उमरवाला करती है और यदि आयुरेखा चिन भिन्न होकर प्रतीत हो तो उस प्राणी को वृक्ष से गिरने की भय होती है।। २१ ।। कनिष्ठिका मूलभवा रेखा कुर्याच््तायुषम्। प्रदेशिनीमध्यमाभ्यामन्तरेण गता सती॥ २२ ।। जिसके करतल में कनिष्ठा की मूल में उपजी हुई रखा तर्जनी व मध्यमा के बीच में मास हो तो उस भाखी को सौवर्ष की उमरवाला करती है ॥। २२।। कनिष्ठ तर्जनी यावद्रेखा भवति चाक्षता। विंशत्यव्दाधिकशतं नरो जीवत्यनामयः ॥२३॥ जिसके करतल में आयुरेखा अच्छिन् होकर कनिष्ठा अँगुली की मूल से आरम्भ कर ९२८ तर्जनी की मूल पर्यन्त परतिक्रमण करती हो तो वह माणी नीरोग होकर एकसा बीसवर्ष वर्ष र्यन्त जीता है।। २३ ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य कनिर्ष्ठ मध्यमां यावद्रेखा भवति चाक्षता। शताब्दं वाथ चाशीति नरो जीवेन्न संशयः॥२४॥ जिसके करतल में आयुरेखा द्विन्न भिन्न न होकर कनिष्ठा अ्ँगुली की मूल से म अँगुली की मूल पर्यन्त प्राप्त हो तो वह माणी सौवर्ष या अस्सीवर्ष पर्यन्त निस्स जीता है।। २४।। कनिष्ठानामिकायां चेद्रेखा भवति चाक्षता। षष्टिं पञ्चाशदव्दंवा नरो जीवत्यसंशयः ॥२५॥ जिसके करतल में आयुरेखा छिन्न भिन्न न होकर कनिष्ठा अँगुली की मूल से कर अनामिका अँगुली की मूल में जा मिली हो तो वह माखी निस्सन्देह साठि या प वर्ष पर्यन्त-जीता है॥ २५॥ रेखया भिद्यते रेखा स्वल्पायुश् भवेन्नरः। यत्संख्या भिद्यते रेखा अपमृत्युश्र तद्गवेत् ॥ २६॥ जिसके करतल में आयुरेखा किसी सुद्ररेखा से कटी हो तो वह भाणणी थोड़ी वाला होता है और जितनी छोटी रेखाओं से आयुरेखा कटी हो उतनीही उस म की अल्पायु होती है॥ २६ ॥। यस्य मीनसमा रेखा कर्मसिद्धिश्च जायते। धनाढ्यश्र स विज्ञेयो बहुपुत्रो न संशयः॥२७॥ जिसके करतल में मछली के समान रेखा प्रतीत हो तो उस प्राणी के कर्मों की होती है और वह प्राखी निस्संदेह धनाव्य व धन पुत्रोंवाला जानना चाडिये॥ २४ तुला ग्रामं तथा वज्चं करमध्ये च दृश्यते। तस्य वाषिज्यसिद्धिः स्यात्पुरुषस्य न संशयः ॥२८॥ जिसके करतल में तुला (तराजू) ग्राम (चतुष्कोणचिंह्न) तथा वज् का चि तीत हो तो उस मारी के वािज्य की सिद्धि निस्संदेह होती है यानी वह पायी का व्यापार (रोजगार) करता है॥। २८ ॥ पद्मचापादिखङ्गश्च अष्टकोणादि दृश्यते। स्त्रियाश्च पुरुषस्यापि धनवान्स सुखी नरः॥ २६ ॥ पूर्वार्धः। जिसके करतल में पद्म, धनुप आदि, खज्ग और अष्टकोणादिचिन्न प्रतीत हों तो वह प्राणी धनवान् होकर सुखी होता है और यदि स्त्रियों के करतल में पूर्वोक पद् आदि निशान पतीत हो तो वह स्त्री धनवती होकर सुखशालिनी होती है परन्तु विशेपता से जिस स्त्री पुरुपके करतल में पद्म काही निशान प्रतीत हो तो वह स्त्री रानी व पुरुप राजा होता है और जिसके करतल में धनुप का निशान प्रतीत हो तो वह पुरुष महावीर होता है व तलवार का निशान प्रतीत हो तो वह पुरुप महायोद्ा होता है और यदि अष्टकोण का निशान पतीत हो तो वह पाणगी भूपति या ग्रामपति होता है॥ २६॥ शङ्गचक्रध्वजाकारो नासाकेरश्र दृश्यते। सर्वविद्याप्रदानेन बुद्धिमान्स भवेन्नरः॥३०॥ जिसके करतल में शंख, चक्र, ध्वजाकार या नासाकार निशान प्रतीत हों तो वह आाी समस्त विद्या के पदान से बुद्धिमान् होता है यानी वह प्राणी सकल शास्त्रपार- दर्शी होकर ज्ञानी कहाता है॥ ३० ॥ त्रिशूलं करमध्ये तु तेन राजा प्रवर्तते। यज्ञे धर्मे च दाने च देवद्विजप्रपूजने ॥ ३१ ॥ जिसके करतल के बीच त्रिशूल का निशान प्रतीत हो तो वह पाखी राजा होकर यज्ञ, धर्म, दान व देवता तथा ब्राह्मणों के पूजन में परायण रहता है यानी अ्हर्निश पू- र्वोक कर्मों मेंही लगा रहता है।। ३१ ।। स्थचक्रध्वजाकारः स च राज्यं लभेन्नरः ॥३२॥ जिसके करतल में शक्ति (बरछी, सांग, भाला या यष्टिनामक अस्त्रविशेष) तोमर (गुर्ज या अ्र्प्रस्त्नविशेष) वाण, रथ, चक्र और ध्वजा ( पताका, झएडी) के आकार निशान प्रतीत हों तो वह पाखी राज्य को पाता है॥ ३२ ॥। अङ्कशं कुराडलं छत्रं यस्य पाणितले भवेत्। तस्य राज्यं महाश्रेष्ठं सामुद्रवचनं यथा॥३३ ॥ जिसके करतल में अङ्कश, कुएडल और छाता इन तीनों का निशान प्रतीत हो तो उस पारणी को बड़ा श्रेष्ठ राज्य होता है यानी वह माणी चक्रवर्ती (शाहंशाह) महाराजा होता है जैसाकि सामुद्रवचन है यानी क्षीरसमुद्रवासी भगवान् नारायण ने कहा है। ३३ ॥। १ मायाकारश्च दृश्यते इति क्त्िदपपाठः ॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य गिरिकङणयोनीनां नरमुएडघटस्य च। करे वै यस्य चिह्नानि राजमन्त्री भवेन्नरः ॥३४॥ जिसके करतल में पर्वंत, कक्ण, योनि, नरमुएड और घट (घड़ा) इन्हों के नि प्रतीत हों तो वह प्राणी राजमन्त्री होता है ॥ ३४ ।। सूर्यचन्द्रलता नेत्रमष्टकोणत्रिकोणकम्। मन्दिराश्वगजेन्द्राणां चिह्ने स्यात्स सुखी नरः॥३४॥ जिसके करतल में सूर्य, चन्द्र, लता, नेत्र, अष्टकोण, त्रिकोण, मन्दिर, घोड़ा और राज इन्हों का निशान प्रतीत हो तो वह प्राखणी सुखी रहता है॥। ३५ ॥। तर्जनीमूलपर्यन्तमूर्ध्वरेखा च दृश्यते। राजदूतो भवेत्तस्य धर्मनाशो हि जायते ॥ ३६॥ माग्यर ा जिसके करतल में ऊर्ध्वरेखा ( फेटलाइन) तर्जनी की मूल में देखी जावे तो भाखी राजों का दूत होता है और उसके धर्म का विनाश भी होजाता है॥ ३६॥ मध्यमामूलपर्यन्तमूर्ध्वरेखा च दृश्यते। पुत्रपौत्रादिसम्पन्नो धनवान्स सुखी नरः ॥३७॥ मात्यरेखा जिसके करतल में ऊर्ध्वरेखा (भाग्यरेखा) मध्यमा अँगुली की मूलपर्यन्त देखीज तो वह पराणी पुत्र पौत्रादिकों से संपन्न होकर धनवान् होता हुआ सुखी रहता है। २ अरनामिकोर्ध्वरखायां व्यवसायधनागमः। मुखदुःखेन जीवेत पुत्रपौत्रगृहादिमान् ॥३८॥। जिसके कस्तल में ऊर्ध्बरेखा (भाग्यरेखा) अपरनामिका की मूल में प्रतीत हो तो पाणी रोजगार से धन को पाता है और पुत्रों व पौत्रों से सम्पन्न होता हुआ गृहादिवा होकर सुख व दुःख से जीता है।। ३८ ।। करमध्ये स्थिता रेखा पितु्वंशसमुद्धवः । पूर्णरेखा पितुर्वंशो ऽर्धरेखा परवंशकः ॥ ३६॥ जिसके करतल में पितृरेखा पूर्णरूप से अङ्गित हो तो वह प्राणणी पिता के वंश से हुआ जानना चाहिये और जिसके करतल में पितृरेखा आधेरूप से प्रतीत हो तो वह मा पराये वंश से उपजा हुआ होता है।। ३६ ।। पूर्वार्थः। मातृरेखा करे चैव एकैकं युग्भमेव च। एकैकमंशमादाय युग्मरेखा च दृश्यते॥ ४० ॥ करतल के मध्य में मातृरेखा व पितृरेखा ये दो रेखायें एक में या अलग होकर विद्य- मान रहती हैं मातृरेखा तर्जनी से उतरती हुई आयुरेखा के निचले भाग में प्रतीत होती है और पितृरेखा तर्जनी की मूल से उतरती हुई अँगूठा की मूल के मध्यभाग में रहती है एक एक का अंश लेकर दो रेखायें देखी जाती हैं यानी माता का रज व पिता का बीज इन दोनों से सारा संसार उपजा है इसलिये माता व पिता की दोनों रेखायें एकही पास रहती हैं ॥ ४०॥ बहुरेखा भवेत्क्केशः स्वल्पाभिर्धनहीनता। रेखायां वा मनःसौख्यं सामुद्रवचनं यथा ॥ ४१॥ यदि करतल के मध्य में यानी मातृरेखा व पितृरेखा के बीच में बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो क्रेश होता है और यदि थोड़ीसी रेखा प्रतीत हों तो धन की हीनता होती है और यदि साधारण रेखा यानी न बहुत बड़ी न बहुत छोटी अथवा न बहुत ज़्याद: न बहुत कपती रेखायें प्रतीत हों तो मनको सुख होता है यह सामुद्रिकशास्त्र का वचन है। ४१॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य गता पाणितले या च सोर्ध्व रेखा स्मृता बुधैः। स्त्रीणां पुंसां तथा चैव राज्याय च सुखाय च।। पुत्रपौत्रादिसम्पन्ना चोर्ध्वरेखा शुभप्रदा ॥४२॥ मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी जो रेखा करतल में प्रतीत हो उसको सामुद्रिकश वेत्ता पलिडतगणों ने ऊर्ध्वरेखा (फेटलाइन) कहा है यदि स्त्रियों व पुरुषों के करतत ऊर्ध्वरेखा देखी जावे तो राज्य और सुख के लिये होती है और पुत्र पौत्रादिको सम्पन्न करती हुई शुभदायक होती है॥ ४२॥ रक्राभिः श्रियमापोति कृष्णाभिः प्रेष्यतां त्रजेत् ॥४३॥ जिसके करतल में बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो वह माणी दुःखको पाता है जिसके करतल में थोड़ी सी रखायें प्रतीत हों तो वह पाणी निर्धनता को पाता है व जि करतल में रक्वर्ण रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणणी सुखी होकर लक्ष्मी को पाता है जिसके करतल में काली रेखायें प्रतीत हों तो वह प्राणी केशभागी होकर दासत्व पाता है॥। ४३ ॥ पङ्कशं कुलिशं छत्रं यस्य पाणितले भवेत्। तस्यैश्वर्यं विनिर्दिष्ट्मशीत्यायुर्भवेद्धुवम् ॥ पुत्रं प्रमूयते नारी नरेन्द्रं लभते पतिम् ॥४४॥ जिसके करतल में अङ्कश, वज्र और छाते का निशान प्रतीत हो तो उस पाणी ऐश्वर्य मिलता है और निश्चय कर वह माणी अस्सीवर्ष की उमरवाला होता है यदि खनीके करतल में पूर्वोक निशान प्रतीत हों तो वह नरेन्द्रपति को पाती हुई राजकु को उपजाती है॥। ४४॥ धनुर्यस्य भवेत्पाणौ पङ्कजं वाथ तोरणम्। तस्यैश्वर्यं च राज्यं च अशीत्यायुर्भवेद्धुवम् ॥४५॥ जिसके करतल में धनुष, कमल और तोरण का निशान प्रतीत हो तो उस माए ऐश्वर्य व राज्य भापत होता है और वह माणी निश्चय कर अस्सीवर्ष की उमरव होता है।। ४५॥ पूर्वार्धः ॥ कनिष्ठयां स्थिता रेखा संख्या यावतिका: स्मृताः। तावत्यः पुरुषाणां च नार्यः सन्ति विनिश्चितम् ॥। ४६॥ जिनके करतल में कनिष्टा अँगुली के नीचे जितनी संख्यावाली रेखायें प्रतीत हों उतनी ही उन पुरुषों की स्त्रियां निश्चय होती हैं और यदि स्त्रियों की कनिष्ठा में जितनी रखायें प्रतीत हों तो उतनेही पुरुप होते हैं॥ ४६॥ करमध्यगता रेखा ध्रुवा ऊर्ध्वम्भवेद्यदि। नृपो वा नृपतुल्यो वा चिरंख्यातोर्थवान्भवेत्।४७॥शगय रेख जिसके करतल में मणिबन्ध (कब्ज़े ) से उठी रेखा ध्रुव (पूर्ण) होकर ऊपरले भाग में चली जावे तो वह पाणणी राजा व राजा के समान तथा बहुत कालपर्यन्त वि- ख्यात होकर धनवान् होता है।। ४७॥ मत्स्यपुच्छप्रकीर्णेन विद्यावित्तसमन्वितः । पितुः पितामहादीनां धनं स लभते नरः॥ पितामहस्य वा किश्चिद्धनं च लभते ध्रुवम् ॥४८॥ जिसके करतल में मछली की पूंछ का निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी विद्या व धन से संयुक्त होकर 'पिता वा पितामहादिकों का धन पाता है अथवा निश्रय कर पितामह के ही कुछेक धन को पाता है॥ ४८॥ छयवस्य कुतो विद्या मत्स्यहीने कुतो धनम्। अपुच्छस्य कुतो विद्या अयवस्य कतो धनम्॥ ऊर्ध्वरेखाविहीनस्य कुतो राज्यं कुतो यशः ॥४६॥ जिसके करतल में यव का निशान नहीं प्रतीत हो तो उस पराणी को विद्या कहां से मिलसकी है व जिसके करतल में मत्स्यरेखा न हो तो उसको कहां से धन मिलसक़ा है व जिसके करतल में मछली की पूंछ का निशान नहीं प्रतीत हो तो उसको कहां से विद्या मिलसकी है व जिसके करतल में यव (जौ) का निशान नहीं हो तो उसको कहां से धन मिलसका है और जिसके करतल में ऊ्ध्वरेखा नहीं प्तीत हो तो उसको कहां से राज्य व कहां से यश मिल सका है॥ ४६ ॥ एकमुद्रो भवेद्राजा द्विमुद्रो धनवान्नरः । त्रिमुद्रो रोगसंपन्नो बहुमुद्रो बहुप्रजः ॥ ५०॥ सामुद्विकशास्त्रस्य जिसके करतल में एक मुद्रा का निशान प्रतीत हो तो वह पराण्ी राजा होता है जिसके करतल में दो मुद्राओं का चिह्न प्रतीत हो तो वह पराणी धनवान् होता है जिसके करतल में तीन मुद्रायें प्रतीत हों तो वह प्राणणी रोगों से सम्पन्न होता है जिसके करतलमें बहुतसी मुद्रायें प्रतीत हों तो वह प्राणी घनी सन्तानोंवाला होताहै।। तर्जनीमूलगामिन्यां रेखायां दिद्रता यदि। श्वाविन्मूषिकमार्जारसर्पदष्टो भविष्यति॥। ५१॥ जिसके करतल में तर्जनी की मूल में गमन करती रखा में यदि छेदसा प्रतीत ह वह माखी शाही, मूसा, विलार व सांप से डसा जाता है।। ५१॥ यस्य पाणितले रेखा पीवरा दृश्यते यदि। अविच्छिन्ना पादसौख्यं संपूर्णा च सुशोभनम्॥ ५२॥ जिसके करतल में रेखा मोटी होकर यदि छिन्न भिन्न नहीं प्रतीत हो तो वह पादस। (पदोन्नति ) को पाता है और यदि सम्पूर्ण रेखा प्रतीत हो तो वह माणी सुख व सम को पाता है॥ ५२॥ कनिष्ठाङ्गलिमूले तु रेखा यावतिका: स्थिताः। तावद्विवाहं जानीयाद यथोक्कं दानिभाषितम्॥ ५३ ।। जिसके करतल में कनिष्ठा अँगुली के मूल में जितनी रखायें स्थित हों उतनेही पाणी के ब्याह होते हैं यह दानिभापित सामुद्रिकशास्त्रवेत्ता पिडतने कहा है॥ ५३। कनिष्ठाङ्गलिमूले तु रेखा चोद्धाहनिश्चिता ! कनिष्ठाधोरेखासंख्या यावती युवती तथा॥ तावती तेन तस्यैव नारीणां स्व्रज्यते ध्रुवम् ॥ ५४ ॥ कनिष्ठा अँगुली के मूलदेश में विवाहरेखा निश्चित है इसलिये जिसकी कनिष्ठा श्रँ्ध के मूलदेश से अधोभाग में जितनी रेखायें स्थित हों उतनीही उस प्राखी की ख्त्रियां हैं ऐसेही स्त्रियों के करतल में कनिष्ठा के नीचे जितनी रेखायें प्रतीत हों उतनेही उन के पति होते हैं॥। ५४ ॥ कनिष्ठामूलरेखायाः परतश्च तथाहि वै। भवन्ति रेखास्तावत्यः पुत्राः कन्याश्च निश्चिताः॥ कन्या द्विमुखरेखायां एकास्यायां तथात्मजः॥।५५॥ पूर्वार्थः। कनिष्ठा की मूल के अधोभाग में (यानी व्याह रेखा के अधोदेश में) जितनी रेखायें पुत्र तीत हों उतनेंही पुत्र व कन्यायें निश्चित होती हैं द्विमुखी रखाओं में कन्या उपजती हैं व पुत्र कमुखी रेखा में पुत्र पैदा होते हैं ॥ ५५॥ मत्स्यपुच्छे शतं ज्ञेयं कुलिशे तु सहस्रकम्। पद्मे लक्षेश्वरश्रेति शङ्के कोटीश्वरो भवेत्॥ मत्स्ये शतं विजानीयान्मकरे तु सहस्रकम्॥ ५६ ॥ जिसके करतल में मछली की पूंछ का निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी शतपति होता हव यदि वज्र का निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी सहस्रपति (हज़ारिया) होता है दि पदमका निशान प्रतीत हो तो वह माणी लक्षपति (लखपती) होता है यदि शंख का निशान प्रतीत हो तो वह प्राणी कोटिपति (करोड़पती) होता है यदि मछली का निशान पतीत हो तो उस प्राणी को शतपति जानना चाहिये और यदि मगर का निशान प्रतीत हो तो वह माखी हज़ारिया होता है॥ ५६॥ रेखाभिर्वहुभिः क्वेशो रेखाहीनैर्दरिद्रता। रक्काभिः सुखमामोति कृष्णाभिः क्केशतां ब्रजेत्॥५७॥ जिसके करतल में बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो उस माणी को क्ेश होता है यदि रखायें हीन हों यानी बहुतही कम रखायें प्रतीत हों तो वह प्राणणी दरिद्री होता है यदि लाल रखायें प्रतीत हों तो वह पाशणी सुख को पाता है और यदि काली रखायें पतीत हों तो वह पाशी पीड़ा को पाता है॥। ५७।। अङ्कुशं कुराडलं चक्रं यस्य पाणितले भवेत। चामरं पुएडरीकं च तस्य राज्यं विनिर्दिशेत् ॥। ५८॥। जिसके करतल में अङ्डश, कुएडल, चक्र, चमर और कमल इन्होंके निशान प्रतीत हों तो उस प्रासी को राज्य कहना चाहिये यानी वह प्राणी राज्य को पाता है।। ५८ ॥। ज्ञानरेखा च प्रथमा अङ्गष्ठादनुवर्तते। मध्यमायां करे रेखा आयूरेखा प्रकीर्तिता॥ ५६ ॥ अँगूठां के मूलदेश में टिकी हुई पहली ज्ञान रेखा होती है इसके बाद कनिष्ठा की मूल से चली मध्यमामूलपर्यन्त जो रेखा विस्तीर्ण प्रतीत होती है उसको परिडतों ने आयु- ररखा कहा है॥ ५६।। सामुद्रिकशास्रस्य घनाङ्गुलिश्र सधनस्तिस्रो रेखाश्र यस्य वै। नृपतेः करतलगा मणिबन्धे ससुत्थिताः ॥ ६०॥ जिसकी अँगुलियां घनी मतीत हों तो वह पराणी धनी होता है और जिसके करत मणिबन्ध (कब्जे) से उठी तीन रेखायें प्तीत हों यानी तीन ऊर्ध्वरेखायें देखपड़ते तो वह प्राणी नरपाल (राजा) होता है ॥ ६० ।। युगमीनाङितो यो वै भवेन्मन्त्रप्रदो नरः। वज्राकाराश्च धनिनां मत्स्यपुच्छनिभा बुघैः ॥ ६१॥ शङ्कातपत्रशिविकागजपझ्मोपमा नृपे। कुम्भाङ्कुशपताकाभा मृणालाभा निधीश्वरे॥ ६२॥ जिसके करतल में दो मछलियों की रेखायें प्रतीत हों तो वह पाणी मन्त्रों का मद अथवा याज्ञिक होता है व जिनके करतल में बज्राकार निशान प्रतीत हों तो वे पाणी होते हैं व जिनके करतल में मछली की पूंछ का निशान प्रतीत हो तो वे माणी पर होते हैं व जिसके करतल में शङ्क, छाता, पालकी, हाथी और पद्मका निशान प्रती तो वह माी राजा होता है व जिसके करतल में घट (घड़ा), अङ्कश, पताका (भए और कमलनाल का निशान प्रतीत हो तो वह खज़ांची होता है ॥ ६१ । ६२ ।। दामाभाश्च गवाढ्यानां स्वस्तिकाभा नृपेश्वरे। चक्रासितोमरधनुर्दन्ताभा नृपतेः करे॥ ६३॥ उदूखलाभा यज्ञाव्या वेदीभाश्चाग्निहोत्रिषि। वापिकादेवकुल्याभास्त्रिकोणाभाश्च धार्मिके॥ ६४ ॥ जिनके करतल में माला के आकार निशान प्रतीत हो तो वे माणी गोधन से होते हैं व जिसके करतल में त्रिकोणकार निशान प्रतीत हो तो वह प्रारणी राजेश्वर है व जिसके करतल में चक्र, तलवार, गुर्ज, धनुप और दन्त के आकार रेखा प्रती तो वह माणी राजा होता है व जिनके करतल में उखली के समान रेखायें प्रतीत हों माखी याज्ञिक होते हैं व जिसके करतल में वेदी के समान रेखा प्रतीत हो तो वह : अग्निहोत्री होता है और जिसके करतल में वावली, देवनदी तथा त्रिकोणकार नि प्रतीत हो तो वह पाखी धार्मिक होता है ॥ ६३ / ६४ ॥। पूर्वार्धः । =१ अङ्गछ्वेसूलगा रेखाः पुत्रदाः सुखदायिकाः। निस्स्वाश्र बहुरेखाः स्युर्निद्रव्याश्चिबुकै: कृशैः॥ ६५॥ यस्य पाणितले रेखा दीर्घाकारद्यं भवेत्। युग्मे मुखे सुजातश्च पयुग्मे जारजो ध्रुवम् ॥ ६६॥ जिसके करतल में अँगूठा की मूल में रेखायें प्रतीत हों तो उस प्रांगी के लिये पुत्रदायक होकर सुखदायक होती हैं व जिसके करतल में बहुतसी रेखायें प्रतीत हों तो वे भाणी धनहीन होते हैं व जिनकी दादी पतली पतीत हो तो वे पाणी निर्धनी होते हैं जिसके करतल में माहरेखा व पितृरेखा ये दोनों दीर्घाकार होकर आपस में जुड़ीसी परतीत हों तो वह माणी निजवश से उपजा हुआ होता है और जो दोनों रेखायें भिन्न प्रतीत हों तो वह पाणी निश्चय कर जारजात कहाता है॥ ६५ । ६६ ।। रखास्वधःस्थिता रेखा संख्या यावतिका: स्मृताः। तावांस्तु पुरुषाणान्तु पुत्रो भवति निश्चितम् ॥ ६७ ।। रेखास्वधःस्थिता रेखा संख्या यावतिका: स्मृताः। तावती पुरुषाणान्तु कन्या भवति निश्चितम् ॥ ६८ ॥। जिनके करतल में कनिष्ठा अँगुली की मूल के अधोभाग में जितनी रेखायें बड़ी व मोटी होकर प्रतीत हों उतनेही निश्चयकर उन माणियों के पुत्र होते हैं और जिनके करतल में कनिष्ठा अँगुली की मूल के निचलेभाग में जितनी छोटी छोटी रेखायें पतीत हों उतनीही उन पुरुषों की कन्यायें निश्चयकर होती हैं ॥ ६७ । ६८ ॥ करमध्यस्थितारेखा त्रयादूर्ध्वं भवेद्यदि। नृपो वा नृपतुल्यो वा चिरं ख्यातोर्थवान्भवेत्॥ ६६।। जिसके करतल में आयुरेखा, मातृरेखा और पितृरेखा की अपेक्षा एक दीर्घाकार ऊध्वरेखा पतीत हो तो वह प्राणी राजा व राजा के समान तथा बहुत कालपर्यन्त विख्यात होकर धनवान् होता है॥ ६६ ॥