103. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — सीमन्तशिरोलक्षण
सीमन्तशिरोलक्षण
सीमन्तः सरलः शस्तो मौलिः शस्तः समुन्नतः। गजकुम्भनिभो वृत्तः सौभाग्यैश्वर्यमूचकः ॥२१॥ सामुद्रिकशास्त्स्य स्थूलमूर्धा च विधवा दीर्घशीर्पा च बन्धकी। विशालेनापि शिरसा भवेद् दौर्भाग्यभाजनम्॥ २२॥ जिसका शीश का जूड़ा सीधासा प्तीत हो तो उस स्त्री के लिये शुभदायक होता और जिसका मस्तक ऊंचासा प्रतीत हो तो भी उस स्त्री को शुभदायक होता है जिसका शीश हाथी के कुम्भ के समान होकर गोलाकार प्रतीत हो तो उस स्तरी केि सौभाग्य और ऐश्वर्य को देता है और जिसका मस्तक मोटासा प्रतीत हो तो वह विधवा (रांड़) होती है व जिसका शीश लम्बा पतीत हो तो वह स्त्री िनारि होती और जिसका शीश चौड़ासा प्रतीत हो तो वह स्त्री वुरेभागकी भाजन होती है ।।२१२