23. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — रमश्चुलक्षण
रमश्चुलक्षण
अस्फुटिताग्रं स्निग्धं श्मश्रुशुभं मृदु चसन्नतं चैव। रक्कै: परुपैश्चौराः श्मश्चुभिरल्पैश्च विज्ञेयाः ॥६१॥ जिनकी दाढी मोछ अग्रभाग में विकसित न हो अथवा चिकनी व कोमल होकर सन्नत हो तो वे प्राणी शुभसम्पन्न होते हैं और जिनकी दादी मोछ लाल व कर्कश होकर होते हैं ॥ ६१ ॥ अल्प हो तो उन माणियों को चोर जानना चाहिये यानी ऐसी दाहीवाले पाी चो १ चन्द्रचिम्बोपमोवक्ो धर्मशील: सदा भवेत्।मृगमूषिकवफ्राश्च ते नरा भाग्यवर्जिता इति। पूर्वार्धः।