22. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — मुखलक्षण
मुखलक्षण
वैक्कं सौम्यं संवृतममलं श्लक्ष्णं समं च भूपानाम्। विपरीतं क्वेशभुजां महामुखं दुर्भगाणां च ॥ ५८॥ जिनका मुख सुशोभन, गोल, अमल व कोमल होकर समानाकार हो तो वे प्राणी राजा होते हैं और जिनका मुख पूर्वोक लक्षणों से विपरीत हो तो वे पाणणी केशभागी होते हैं और जिनका मुख बड़ाभारी हो तो वे प्राणणी बुरे भागवाले होते हैं ॥। ५=॥ स्त्रीमुखमनपत्यानां शाव्यवतां मएडलं परिज्ञेयम्। दीर्घ निर्दव्याणां भीरुमुखाः पापकर्माणः॥५६॥ जिनका मुख स्त्रीमुख के समान हो तो वे मारी सन्तानरहित होतेहैं व जिनका मुख मएडलाकृति हो तो उन मराशियों को शठ जानना चाहिये व जिनका मुख लम्बा हो तो वे प्राणी निर्धनी होते हैं और जिनका मुख डरौंधासा हो तो वे प्राणी पापकर्मकारी होते हैं॥ ५६॥ चतुरसं धूर्तानां निम्नं वक्कं च तनयरहितानाम्। कृपणानामतिइस्वं सम्पूर्णं भोगिनां कान्तम् ॥ ६० ॥ जिनका मुख चौकोनं हो तो वे प्राणी धूर्त होते हैं व जिनका मुख निचला हो तो वे प्राणी सन्तानरहित होते हैं व जिनका मुख बहुत छोटासा हो तो वे प्राणी कृपण होते हैं और जिनका मुख सम्पूर्ण मनोरम हो तो वे प्राणी भोगी होते हैं ॥ ६० ॥