53. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — गतिलक्षण
गतिलक्षण
शार्दूलहंससमदद्विपगोपतीनां तुल्या भवन्ति गतिभिः शिखिनां च भूपाः। येपां च शव्दरहितं स्तिमितं च यातं तेपीश्वरा दुतपरिपुतगा दरिद्राः ॥ १६॥ जिनका गमन वाघ, हंस, मतवाला हाथी, वैल और मोर के समान हो तो वे प्राणी राजा होते हैं व जिनका गमन शब्दरहित होकर निश्चल हो तो वेभी प्राणी समर्थवान् होते हैं और जिनका गमन शीघ्रता से हो तो वे प्राी दरिद्री होते हैं ॥ १६ ॥ श्रान्तस्य यानमशनं च बुशुक्षितस्य पानं तृपा परिगतस्य भयेषु रक्षा। एतानि यस्य पुरुषस्य भवन्ति काले धन्यंवदन्ति खलुतं नरलक्षपज्ञाः।।२०।। थकेहुए को सवारी देना, भूखे को भोजन खिलाना, प्यासे को पानी पिलाना व भय में प्राप्तहुए पुरुप को अभयदान देना ये जिस पुरुप को समय पर होते हैं उस प्राखी को नरलक्षणों के ज्ञाता लोग निश्चयकर धन्यवाद देते हैं ॥ २०॥ पुरुपलक्षणमुकमिदं मया मुनिमतान्यवलोक्य समासतः। इदमधीत्य नरो नृपसंमतो भवति देवि जनस्य च वल्लभः ॥२१॥ अहो देवि ! मुनियों के मत को देखकर मैंने संक्षेप से पुरुषों के ये लक्षण कहे इनको पढकर प्ाणी राजाओं से संमत होकर सर्वजनों का प्यारा होता है॥ २१ ॥ इति बृहत्सामुद्रिके पिडतशक्किधरसंकलिते भाषाभाष्ये पुरुपलक्षणंनाम प्रथमं प्रकरणम् ॥ १ ॥ अथ स्त्रीणं लक्षणं व्याख्यायते।। अथातः संप्रवक्ष्यामि नारीणां लक्षणं प्रिये !। श्रूयतां देवदेवेशि समाधाय मनोऽमलम् ॥ १ ॥ अब इसके उपरान्त अहो परिये ! मैं नारियों के लक्षण भलीभाँति कहूंगा इसलिये हे देवदेवेशि ! अपने अ्रप्रमल मन को सावधान कर सुनिये ॥ १ ॥