59. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — कर्णकेशलक्षण
कर्णकेशलक्षण
कर्णयुग्ममपि युक्कमांसलं शस्यते मृदुसमं समाहितय्। स्निगे्धनीलमृदुकुञ्चितैकजा मूर्धजाः सुखकराः समं शिरः॥ १०॥ १ स्निग्धकेशी विशालाक्षी सुस्था वीरा मृदुत्वचा। सुमुखी सुभगा कन्या तां कन्यां वरयेडुधः॥ सामुद्रिकशास्त्रस्य स्त्रियों के दोनों कान मांसल, कोमल व समान होकर अचल हों तो प्रशस्त कहाते व केश चिकने, काले, कोमल व टेढ़े होकर रोमकूपों से एक २ उपजे हों तो सुखका होते हैं और यदि शिर समान हो तो सुखदायक होता है ॥ १०॥