Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

6. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — लिङ्गलक्षण

लिङ्गलक्षण

लिङ्गेडल्पे धनवानपत्यरहितः स्थूले विहीनो धने- मेंढे वामनते सुतार्थरहितो वक्रेन्यथा पुत्रवान्। दारिद्रयं विनते त्वघोल्पतनयो लिङ्गे शिरासन्तते स्थूलग्रन्थियुते सुखी मृदुकरोत्यन्तं प्रमेहादिभिः ॥११॥ अव लिङ्ग का लक्षण कहते हैं-कि जिसका लिह्न छोटासा होता है वह पाणणी धन् वान होता है व जिसका लिङ् मोटा सा होता है वह सन्तानों से रहित होता है व जिसक १ द्े. द्वे रोमे पसिडतानां श्रोत्रियाणां तथैव च। रोमत्रयं दरिद्वाणां रोगी निर्मासजानुक= महादारिद्रयजं दुःखं भुंक्के रोमचतुर्थके । .२ ऊरवो जानवस्तुल्या नृपस्योपचिता: स्मृताः। निर्मासजानुस्सौभाग्यमल्पं निम्ने स्निरियाः । विफटैश्च दरिद्राः स्युः समांसिराढ्य एव चेति॥ पूर्वार्थः । लिङ्ग वायें तरफ़ झुका हो तो वह मराणी धनरहित (दरिद्री) होता है व जिसका लिङ्ग टेढ़ा हो तो वह सन्तान व घनसे रहित होता है और जिसका लिङ् टेढ़ा न हो तो वह पुत्रवान् होता है व जिसका लिङ्ग नीचे तरफ़ लचा हो तो वह प्राणणी दरिद्र को भोगता है व जिसका लिङ्ग नसों से घिरा हो तो वह प्राणी थोड़े सन्तानोंवाला होता है व जिसका लिङ्ग मोटी गाँठों वाला हो तो वह पराणी सुखी रहता है और जिसका लिङ्ग ढीलासा हो तो प्रमेह, पथरी आदि घोर रोगों से उस प्राणी को विनाश करता है - यानी वह प्राणणी प्रमेहादि रोगों से पीड़ित होकर मरजाता है ॥ ११ ॥ लिङ्पणमुत्राणं लक्षएमाह- कोपनिगूदैर्भपा दीघरमग्नैश्र वित्तपारहीनाः। ऋजुवृत्तशेफसो लघुशिरालशिश्नाश्र धनवन्तः ॥१२ ॥। जलमृत्युरेकवृषणो विषमैः स्त्रीचञ्चलः समैश्च क्षितिपः । इस्वायुश्रोद्दद्ैः प्रलम्बवृषणस्य शतमायुः ॥१३॥ रक्कैराव्या मणिभिनिर्दव्या: पाएडरैश्र मलिनैश्र। सुखिनः सशव्दमूत्रा निःस्वा निःशब्दधाराश्र॥ १४ ॥ द्वित्रिचतुर्धाराभिः प्रदक्षिणावर्तवलितमूत्राभिः। पृथ्वीपतयो ज्ञेया विकीर्णमूत्राश्च धनहीनाः॥१५॥ जिनके कोप (अएडकोप) छिपे हों यानी मांस से घिरे हों तो वे प्राणी पृथ्वी के पति होते हैं और जिनके कोप दीर्घ होकर भग्न होगये हों तो वे प्राणी धन से हीन रहते हैं व जिनका लिङ्ग सीधा होकर गोलाकार हो व जिनका लिङ् छोटा सा होकर नसों से व्याप्त हो तो वे प्राणणी धनवान होते हैं। १२ ॥ जिनके एक ही वृपण (अएड- कोप) होता है वे पाणी जल में मौत को पाते हैं जिसके वृपण विषम होते हैं वह प्राणी स्त्रियों में चञ्चल रहता है व जिसके ृपण सम होते हैं वह प्राणी राजा होता है व जिसके व्रृपण ऊपर को उठे होते हैं वह प्राणणी अल्पायु होता है व जिसके वृपण बड़े लम्बे होते है वह पाखी सौ वरस की आयु को पाता है॥ १३। जिनके लिङ्ग की मणियां लाल हों तो वे पाणी धनवान् होते हैं व जिनके लिङ् की मशियां पीली होकर मैली हों तो वे प्राणी दरिद्री होते हैं व जिनके मृतने में शब्द होता है वे पाणी सूखी रहते हैं व जिनकी मूत्र- धारा में शब्द नहीं होता हो तो वे पाणी दरिद्री होते हैं॥ १४॥ व जिनके दाहिनी ओर सामुद्रिकशास्त्रस्य दो, तीन व चार धाराओं से मूत्र गिरता हो तो उन भाणियों को राजा जानना चाहिये व जिनके विकीर्णभाव से मूत्र गिरता हो तो वे पाणी धनसे हीन रहते हैं यानी दरिद्री होकर निर्वाह करते हैं ॥ १५ ॥ एकैव मूत्रधारावलिता रूपप्रधानसुतदात्री। स्निग्धोन्नतसममणयो धनवनितारत्नभोक्कारः॥१६॥ मणिभिश्र मध्यनिम्नैः कन्या पितरो भवन्ति निःस्वाश्च। बहुपशुभाजो मध्योन्नतैश्च नात्युल्वैर्घनिनः ॥१७॥ परिशुष्कवस्तिशीषैर्धनरहिता दुर्भगाश्च विज्ञेयाः। कुसुमसमगन्धशक्रा विज्ञातव्या महीपालाः॥१८॥ मधुगन्धे बहुवित्ता मत्स्यसगन्धे बहून्यपत्यानि। तनुशुकः स्त्रीजनको मांससगन्धो महाभोगी ॥ १६ ॥ मदिरागन्धे यज्वा क्षारसगन्धे च रेतसि दरिद्रः । शीघ्रं मैथुनगामी दीर्घायुरतोन्यथाल्पायुः॥२०॥ जिन माणियों के एकही मूत्रधारा चलती हो तो वह उनको रूप, पधानता व पुत्रों को देती है व जिनके लिङ्ग का अ्ग्रभाग चिकना व ऊंचा होकर समान हो तो वे पाणी धन व स्त्रीरनन के भोगने वाले होते हैं।। १६ ॥ व जिनकी मणियां बीच में गहरी हों तो वे प्राणणी कन्याओं के पिता होकर दरिद्री होते हैं व जिनकी मणियां बीच में ऊंची हों तो वे पाणी बहुतसे पशुओं को पालते हैं व जिनकी मखियां बहुत ऊंची न हों तो वे प्राणी धनवान् होते हैं।। १७ ॥ व जिनके पेडू व शिर सूखे हों तो उन पाणियों को विशेपता से दरिद्री व दौर्भाग्यशाली जानना चाहिये व जिनके बीज में फूल कीसी गन्ध आतीहो तो उन प्राखियों को राजा जानना चाहिये ॥ १८ ॥ व जिनके बीज में शहद कीसी गन्ध आत्ती हो तो वे पाणी बड़े धनवान् होते हैं व जिनके शुक्र में मछली कीसी गन्ध आती हो तो वे प्राणी बहुतसे सन्तानों को पाते हैं व जिसके थोड़ासा बीज होता है वह -- प्रागी कन्याओं को उपजाता है व जिसके बीज में मांस कीसी गन्ध आती हो तो वह प्राणी महाभोगी होता है ।। १६ । व जिसके बीज में मदिरा कीसी गन्ध आती हो तो वह यज्वा (विधि से यज्ञ करनेवाला ) होता है व जिसके बीज में क्षार कीसी गन्ध हो तो वह भाखणी दरिद्री होताहै और जिसके मैथुन करने में शीघ्रता होती हो तो वह मारणी दीर्घायु पूर्वार्धः। वाला है व जिसके मैथुन करने में बड़ीही बेर लगती हो तो वह पाणी थोड़ी उमरवाला होता है॥ २० ॥