61. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — मणिवन्धादिलक्षण
मणिवन्धादिलक्षण
निगूढमणिबन्धनौ तरुणपझ्मगर्भोपमौ करौ नृपतियोषितां तनुविकृष्टपर्वाङ्गलौ। न निश्नमतिनोन्नतं करतलं सुरेखान्वितं करोत्यविधवां चिरं सुतमुखार्थसंभोगिनीम् ॥१२ ॥ जिनके हांथ छिपे मशिवन्धनोवाले होकर नवीन कमलगर्भ के समान हों कि जिनयें सारी अंगलियाँ पतली होकर विरल हों तो वे स्त्रियां राजपत्नी (रानी) होती हैं और जिनका करतल गहरा व ऊंचा न होकर सुरेखाओं से संयुत हो तो उन स्त्रियों को अविधवा करता हुआ व बहुत समयतक पुत्रवती, सुखवती व धनवती रखता हु संभोगिनी बनाता है ॥ १२ ॥।