Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

77. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — ऊरुलक्षण

ऊरुलक्षण

वैधव्यं रोमशैरुकं दौर्भाग्यं चिपिटैरपि। मध्यच्छिद्र्महादुःखंदारिद्रयं कठिनत्वचैः॥३२॥ जिनकी ऊरु (पतली जांघें) नसों से रहित, हाथी की सूंड के समान, चिकनी • घनी व गोल होकर लोमों से हीन हों तो वे स्तियां राजाओं की प्यारी (रानी) होती हैं जिनकी ऊरु रोमों से संयुत हों तो उन स्त्रियों के लिये वैधव्ययोग कहा है यानी स्त्रियां विधवा (रांड़ैं) होजाती हैं व जिनकी ऊरु चपठी हों तो वे ख्रि्रियां दौर्भाग्यक प्राप्त होती हैं व जिनकी ऊरुवों के बीच में नसों से गड़हा सा प्रतीत हो तो वे स्ति्रिय महादुःख को पाती हैं और जिनकी ऊरुवों की खाल कठोर सी प्रतीत हो तो वे ख्िरिय दाष्द्रिय को भोगती हैं ॥ ३१ । ३२ ।। कटिलक्षसमाह- चतुर्भिरङ्नलैः शस्ता कटिविशतिसंयुतैः। समुन्नतनितम्बाव्या चतुरस्रा मृगीदशाम्॥ ३३ ॥ हस्वा रोमयुता नार्या दुःखवैधव्यसूचिका। विनता चिपिटा दीर्घा निर्मासा संकटा कटिः॥३४॥ यदि मृगनयनी रमणियों की कमर चौबीस अंगुल की प्रतीत हो तो शुभदायक होे है व जिसकी कमर वड़े ऊंचे नितम्बोंवाली होकर चौकोण प्रतीत हो तो वह स्त्री ध वती होती है व जिसकी कमर लची, चपठी व लम्बी होकर निर्मास प्रतीत हो तो उ स्त्री को संकटदायक होती है और जिसकी कमर छोटी होकर रोमों से संयुत हो पूर्वार्धः । उस स्त्री के लिये दुःखहायक होकर त्रिधवापने को बताती है यानी वह स्त्री दुःखों को भोगती हुई विधया होजाती है। ३३। ३४।।