Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

89. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — चूचकलक्षण

चूचकलक्षण

मूले स्थूलौ क्रमकृशावग्रे तीक्ष्णौ पयोधरौ। सुखदौ पूर्वकाले तु पश्चादत्यन्तदुःखदौ॥६१॥ सुदृढं चूचकयुगं शस्तं श्यामं सुचर्तुलय। अन्तर्मग्नं च दीर्घं च कृशं क्केशाय जायते॥। ६२।। जिनके स्तन मूल में मोटे व क्रम से पतले होकर अग्रभाग में तीखे प्रतीत हों तो उन स्त्रियों को पहले सुखदायक होकर पीछे बड़ेही दुःखदायक होते हैं व जिनके स्तनों के अग्रभाग बड़े मज़बूत होकर काले व बहुतही गोल प्रतीत हों तो शुभदायक होते हैं शँ जो स्तनों के अग्रभाग (ढेपुनी) भीतर छिप गये हों व दीर्घ होकर पतले हो तो केशदाय होते हैं॥ ६१ । ६२ ।। पीवराभ्यां च जन्नम्यां धनधान्यनिधिर्वधूः । श्लथास्थिभ्यां च निम्नाभ्यां विषमाभ्यां दरिद्रिणी॥। ६३ ।। अबद्धावनतौ स्कन्धावदीर्घावकृशौ शुभौ। वक्रौ स्थूलौ च रोमाव्यौ प्रेष्यवैधव्यसूचकौ॥ ६४॥ जिसकी इँसुलियां मोटीसी प्रतीत हों तो वह स्त्री धन व धान्य की निधान होती व जिसकी हँसुलियां ढीली हड्डियों वाली व गहरी होकर विपम प्रतीत हों तो वहरु दरिद्रिखी होती है व जिसके कन्धे बँधे व लचे हुए न हों तथा लम्बे व पतले न हों वे शुमदायक होने हैं और जिनके कन्धे टेढ़े व मोटे होकर रोमों से संयुत हों तो वे दास पन व विधवापन को सूचित करते हैं ॥ ६३ । ६४ ।। श्रंसलक्षयमाह- निगूढसन्धी सस्ताग्रौ शुभावंसौ सुसंहतौ। पूर्वार्धः। वैधव्यदौ समुचाग्रौ निर्मासावतिदुःखदौ॥ ६५॥ जिनके पुट्ठे छिपे हुए सन्धिवाले हों व जिनके अग्रभाग गिरे होकर मज़बूत हों तो वे शुभदायक होते हैं व जिनके पुट्टे अ्र्परग्रभाग में बड़े ऊंचे होकर निर्नास पतीत हो तो दे- वैधव्यदायक होकर अत्यन्त दुःखदायक होते हैं ॥ ६५ ॥। कक्षलक्षणनाह- कक्षे सुसूक्ष्मरोमे तु तुझ्े स्निग्धे च मांसले। शस्ते न शस्ते गम्भीर शिराले स्वेदमेदुरे॥ ६६॥ जिनकी कांखें बहुत पतले रोगोंवाली, ऊंची व चिकनी होकर मांस से भरी हों तो उन स्वियों को शुभदायक होती हैं और जिनकी कांखें गहरी व नसोंवाली होकर पसीने से चिकनी हों तो शुभदायक नहीं होती है ॥ ६६ ।।