91. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — कृकाटादिलक्षण
कृकाटादिलक्षण
सुग्नेन विनतेनापि सशिरेणापि दुःखिता। ऋज्वी कृकाटिका श्रेष्ठा समांसा च ससुन्नता ॥८७॥ शुष्का शिराला रोमाव्या विशाला कुटिलाडशुभा। मांसलो वर्तुलः करठः प्रशस्तश्रतुरहुलः ॥८८॥ जिसकी पीठ टेढी व नसों से संयुक् होकर लचीसी पतीत हो तो दुःखदायक होती है औौर जिसकी घांटी (उपजिद्ा) या घोंटा सीधी व मांसल होकर ऊचीसी प्रतीत हो तो गुभदायक होती है और जिसकी घांटी सूखी, नसों से घिरी, रोमों से संयुक् तथा चौड़ी होकर टेढीसी प्रतीत हो तो उस खत्रीके लिये अशुभदायक होती है और जिसका कएठ पांसल व गोल होकर चार अंगुलवाला प्रतीत हो तो शुभदायक होता है॥ ८७।८॥