Books / Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press)

92. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — ग्रीवालक्षण

ग्रीवालक्षण

शस्ता ग्रीवा त्रिरेखाझ्का त्वव्यक्रास्थिःसुसंहता। निर्मांसा चिपिटा दीर्घा स्थपुटा न शुभप्रदा ॥८६।। स्थूलग्रीवा च विधवा वक्रग्रीवा च किंकरी। वन्ध्या हि चिपिटग्रीवा इस्वग्रीवा च निःसुता ॥ ६० ॥। जिसकी ग्रीवा (घींच) तीन रेखाओं से अक्कित व अमकटित हड्डीवाली होकर अ- नीव मज़बूत प्रतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होती है तथा जिसकी ग्रीवा मांसरहित, चपठी व लम्बी होकर गहरी प्रतीत हो तो शुभदायक नहीं होती है और जिसकी ग्रीवा पोटीसी प्रतीत हो तो वह स्त्री विधवा होती है व जिसकी ग्रीवा टेढीसी प्रतीत हो तो" वह सत्री दासी होतीै िकी गरीवा चपठी हो तो वह स्त्री वन्ध्या (वांभ) होती है और जिसकी ग्रीवा छोटीसी प्रतीत हो यानी कोतागर्दनिया हो तो वह स्त्री संतानरहित होती है।। नह।६० ।। चिवुकलक्षणमाइ- चियुकं द्व्यङ्गलं शस्तं वृत्तं पीनं सुकोमलम्। स्थूलं. द्विधा संविभक्कमायतं रोमशं.त्यजेव॥६१.।। सामुद्रिकशास्त्रस्य हनुश्चिबुकसंलग्ना निर्लोमा सुघना शुभा। वक्रा स्थूला कृशा इस्वा रोमशा न शुभप्रदा।। ६२।। जिसकी चिवुक (दादी) गोल, मोटी व बड़ी कोमल होकर दो शंगुलवाली प्र हो तो उस स्री के लिये शुभदायक होती है व जिसकी चिबुक मोटी होकर दो भागो बँटी हो तथा चौड़ी होकर रोमोंवाली हो तो उस स्त्री को दूरसे ही त्याग देवे औरf की हनु (हुड्डी) चिवुक में लगी हुई निर्लोम होकर बड़ी मज़बूत हो तो शुभदायक हं है तथा टेढ़ी, मोटी, पतली व छोटी होकर रोमोंवाली हो तो शुभदायक नहीं है है।। ६१। ६२ ।।