98. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — सुतलोचनपक्ष्म्लक्षण
सुतलोचनपक्ष्म्लक्षण
दीर्घायुष्कृत् क्षुतं दीर्घ युगपद्द्वित्रिपिसिडतम्। ललनालोचने शस्ते रक्तान्ते कृष्णतारके॥ ६।। गोक्षीखर्णविशदे सुस्निग्धे कृष्णपक्ष्मणी। उन्नताक्षी न दीर्घायुर्वृताक्षी कलटा भवेत् ॥ १० ॥ जिनकी छींक दीर्घ होकर एकही काल में दो तीन लगातार आजाबें तो उस स्त्री को दीर्घायु करती है और जिनके लोचन (आंखैं) आख़िरी में लाल वर्णवाली होकर कालेतारा (तिल) वाली पतीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होते हैं और जिनकी आांखैं गऊ के दूध के समान व साफ़ व चिकनी होकर काली पलकोंवाली पतीत हों तो भी शुभदायक होती हैं और जिसकी आंखिं ऊंचीसी प्रतीत हों तो वह स्त्री दीर्घायु को नहीं पाती है और जिसकी आंखैं गोलाकार प्रतीत हों तो वह स्त्री व्यभिचारिणी (बिनारि ) होती है।। ६ । १० ।। सामुद्रिकशास्त्रस्य नेत्र लक्षएमाह- मेषाक्षी महिपाक्षी च केकराक्षी न शोभना। कामगृहीला नितरां गोपिङ्गाक्षी सुदुर्वृता॥ ११ ॥ पारावताक्षी दुःशीला रक्कोक्षी भर्तृघातिनी। कोटरा नयना दुष्टा गजनेत्रा न शोभना ॥। १२ ॥ पुंश्रली वामकाणक्षी वन्ध्या दक्षिणकाणिका। रमणी मधुपिङ्गाक्षी धनधान्यसमृद्धिभाक् ॥ १ ३ ॥ जिसकी आंखैं मेढ़ा या मैंसे के समान होकर कञ्जीसी तीत हों तो उस स्त्री शुभदायक नहीं होती हैं बरन वह स्त्री बड़ी कामुकी होती है और जिसकी आंखैं गऊ समान होकर पीलीसी प्रतीत हों तो वह स्त्री बड़े बुरे चरित्रोंवाली होती है व जिस आंखैं कबूतर के समान प्रतीत हों तो वह बुरे स्वभाववाली होती है व जिसकी शं लालवर्णवाली पतीत हों तो वह स्त्री पतिको विनाशती है व जिसकी त्र्ांखैं वृक्षच्क्व (खोखल) के समान प्रतीत हों तो वह स्त्री दुष्टा होती है और जिसकी आंखें हाथी समान पतीत हों तो शुभदायक नहीं होती है और जिसकी वाई आंख कानी प्रतीत तो वह स्त्री पुंथ्ली ( छिनारि) होती है और जिसकी दाहिनी आंख कानी प्तीत तो वह स्त्री वन्ध्या (वांझ) होती है और जिसकी आंखैं रसीली होकर पीली परब हों तो वह स्त्री धन, धान्य और समृद्धियों की सेवनेवाली होती है । ११ । १३ ।