97. Sāmudrika Śāstra (Nawal Kishore Press) — तालुलक्षण
तालुलक्षण
स्निग्ध कोकनदाभासं प्रशस्तं तालु कोमलम् ॥ ३ ॥ सिते तालुनि वैधव्यं पीते प्रत्रजिता भवेद्। कृष्णे Sपत्यविहीनार्ता रूक्षे भूरिकुटम्बिनी॥ ४ ॥ जिसका तालु (तरुवा) चिकना तथा लालकमल के समान होकर कोमलसा प हो तो उस स्त्नीके लिये शुभदायक होता है व जिसका तालु सफ़ेद हो तो वह स्त्री वि होजाती है व जिसका तालु पीला प्रतीत हो तो वह संन्यासिनी होती है व जिस तालु काला प्रतीत हो तो वह स्त्री सन्तानरहित होकर दुखिया रहती है और जिस तालु रूखा ग्रतीत हो तो वह स्त्री बने भाई बन्धुओंवाली होकर बड़े परिवारवाली है॥ ३। ४ ।। कएठघएिट कादिलक्षएमाह- करठे स्थूला सुवृत्ता च क्रमतीक्ष्णा सुलोहिता। प्रलम्बा शुभा घराटी स्थूला कृष्णा च डुःखदा॥ ५ ॥ अलक्षितद्विजं किश्चित किश्चित्फुल्लकपोलकम्। स्मितं प्रशस्तं सुदृशामनिमीलितलोचनम् ॥ ६ ॥ जिसकी घांटी कएठ में मोटीली व गोली व क्रमसे तीखी व लाली होकर पूर्वार्धः। लम्बी नहीं प्रतीत हो तो उस स्त्री के लिये शुभदायक होती है और जिसकी घांटी मोटी होकर काली पतीत हो तो उस स्त्री को दुःखदायक होती है और सुनयनी नारियों का हँसना या मुसुक्याना कि जिसमें दांत नहीं देख पड़ते हों व गाल कुछेक फुलेसे मतीत हों व आंखैं मिची हुई न हों तो शुभदायक होता है ॥ ५। ६ ॥ नासालक्षएमाह- समवृत्तपुटा नासा लघुच्छिद्रा शुभावहा। स्थूलागा मध्यनग्रा च न पशस्ता समुनता ॥।७।। आकुश्चितारुणागा च वैधव्यक्केशदायिनी। परप्रेष्या च चिपिटा हस्वा दीर्घा कलिपिया॥-॥ जिसकी नासिका (नाक) समान गोल पुटोवाली व हलके छेढ़ोंवाली प्तीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक होती है और जिसकी नासिका अग्रभाग में मोटी व मध्यभाग में लचीसी होकर ऊंचीसी प्तीत हो तो उस स्त्री को शुभदायक नहीं होती है और जिसकी नासिका टेदी होकर अग्रभाग में लालवर्णवाली पतीत हो तो उस स्त्री के लिये विधवा- पन व दुःखोंकी देनेवाली कहाती है व जिसकी नासिका चपठी होकर छोटीसी प्रतीत हो 구3 तो वह स्त्री पराई दासी होती है और जिसकी नासिका लम्नी हो तो वह स्त्री लड़ाई लड़ती है॥ ७।८॥