102. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नेत्रलक्षण
नेत्रलक्षण
कामगृहीला नितरां गोपिङ्गाक्षी सुदुर्वृता ॥ ६॥ पारावताक्ती दुःशीला रक्ानी भर्तृघातिनी। कोटरा नयना दुष्टा गजनेत्रा न शोभना ॥१०॥ पुंश्रली वामकाणाक्षी वन्ध्या दक्षिणकाणिका। रमणी मधुपिङ्गान्ी धनधान्यसमृद्िभाक् ॥ ११॥ जिसकी आँखें मेढे या मैंसे की आँखों के समान कक्षी हो वह स्त्री शुमदायक नहीं होती। बरन् वह बड़ी कामुक होती है। जिसकी आँखें गऊ के समान, पीलीसी हों वह स्त्री बुरे चरित्रोंवाली होती है। जिसकी आँखें कबूतर के समान हों वह बुरे स्त्रभाववाली होती है। जिसकी आँखें लाल- वर्णवाली हों वह स्त्री पति विनाशती है। जिसकी आँखें वृक्षच्छिद्र (खोखल) के समान हों वह दुष्टा होती है। जिसकी आँखें हाथी के समान हों वह शुभदायक नहीं होती। जिसकी बाई आँख कानी हो वह स्त्री पुश्चली होती है। जिसको दाहनी आँख कानी हो वह चाँफ होती है। जिसकी आँखें रसीली, पीली हों वह धन, धान्य और समृद्धिशालिनी होती है।।६-११।। पच्मभिः सुघनैः स्निग्धैः कृष्णैः सूच्मैःसुभाग्यभाकू।