101. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नुतलोचनपद्तमलक्षण
नुतलोचनपद्तमलक्षण
दीर्घायुष्कृत चुतं दीर्घं युगपद्द्वित्रिपिरिडतम्। ललनालोचने शस्ते रक्रान्ते कृष्णतारके ।। ७।। गोक्षीरवर्णविशदे सुस्निग्धे कृष्णपद्तमणी। उन्नताक्षी न दीर्घायुवृत्ताक्षी कुलटा भवेत् ॥८ ॥ जिनकी छींक बड़ी तथा एक बार में दो तीन लगातार आ जावें तो वह दीर्घायु होती है। आँखें आख़िरी में लाल या काले तिलवाली हों तो वे शुभदायक होती हैं। गऊ के दूध के समान, साफ़ चिकनी या काली पलकावाली ह तो भी शुमदायक होती हैं। जिसकी आँखें ऊँचीसी हों वह स्त्री दीर्घायु नहीं पाती। जिसकी आँखें गोल हों वह व्यमिचारिणी होती है।। ७ -= ॥ मेषाक्ी महिषाक्ी च केकरात्ी न शोभना।