Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

100. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — नासालक्षण

नासालक्षण

समवृत्तपुटा नासा लघुच्छिद्रा शुभावहा। स्थूलाग्रा मध्यनम्राच न प्रशस्ता समुन्नता॥ ५॥ आकुञ्चितारुणग्रा च वैधव्यक्केशदायिनी। परपेष्या च चिपिटा हस्त्रा दीर्घा कलिप्रिया ॥ ६॥ स्त्री की सम गोल पुटोंवाली, छोटे छेदोंवाली नाक शुमदायक होती है। जिसकी नासिका अग्रभाग में मोटी व मध्यभाग में लचीसी, ऊँची हो, वह शुभदायक नहीं होती। अगर नासिका टेढी, अग्रभाग में लाल- वर्णवाली हो तो वैधव्य और दुवों की देनेवाली कहाती है। जिसकी नासिका चपटी छोटीसी हो वह दासी हाती है। जिसकी नासिका लम्बी हो वह सत्री लड़ाई लड़ती है॥ ५-६ ॥