99. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — दन्तलक्षण
दन्तलक्षण
गोक्तीरसन्निभा: स्निग्धा द्वात्रिंशद्दशंनाः शुभाः । अधस्तादुपरिष्टाच्च समास्तोकसमुन्नताः ॥ ६८ ॥ १ सुदन्ता स्नेहसौभाग्यं लभते नात्र संशयः। केशस्नेहेन सौभाग्यं नेत्रस्नेहेन वस्नता। सर्वाङ्रेन च यः स्निग्धः प्राप्रोति विपुलं धनम् ॥ पीताः श्यावाश्च दशनाः स्थूला दीर्घा द्विपङ्क्रयः । शुक्कयाकाराश्च विश्ला दुःखदौर्भाग्यदायकाः॥६६।। अधस्तादधिकैर्दन्तैर्मातरं भक्षयेत्स्फुटम्। पतिहीना च विकटैः कुलटा विरलैर्भवेत्॥ १०० ॥ गोदुग्ध समान चिकने, बत्तीस संख्यावाले, नीचे व ऊपर दाँत शुभ- दायक होने हैं। पीले या कपिल, मोटे, लम्बे, दो पाँतिवाले, सीपी के आकारवाले अथवा बिरले दाँत दौर्माग्य देते हैं। जिसके दाँत नीचे अधिक हों वह स्त्री माता को नाशती है। जिसके दाँत विकटाकार हों वह पतिहीन होती है। जिसके बिरले दाँत हों वह पुश्चली होती है॥ ६८-१०० ॥ जिड्वालक्तणण जिह्वेष्टमिष्टभोक्की स्याच्छोषा मृद्री तथा सिता। दुःखाय मध्यसंकीर्णा पुरोभागसविस्तरा॥१। सितया तोयमरणं श्यामया कलहमिया। दरिद्रिणी मांसलया लम्बयाऽमच्यमत्िणी॥ २ ॥ विशालया रसनया प्रमदातिप्रमादभाकू। जिसकी जीभ लाल, कोमल, कुछ सफ़ेदी लिये हो वह स्त्री अभिलपित पदार्थों को पाकर मीठे भोजन करती है। जिसकी जीम बीच में सकरी हो, अग्रभाग में चौड़ी हो, वह दुःखदायक है। जिसकी जीभ सफ़ेद ही हो वह जलमें डूबकर मरती है। जिसकी जीभ काली सी हो वह बहुत लढ़ाका होती है। जिसकी जीभ मांस से भरी मोटीसी हो वह दरिद्रिग्ी होती है। जिसकी बहुत ही लंबीसी जीभ हो वह अभक्य पदार्थ खानेवाली होती है। जिसकी जीभ बहुत चौड़ीसी हो वह प्रमादिनी होती है॥ १-२ ॥ तालुलक्षगा स्निग्धं कोकनदाभामं प्रशस्त तालु कोमलम्॥ ३॥ सिते तालुनि वैधव्यं पीने प्रत्रजिता भवेत्। कृष्णेऽपत्यविहीनार्ता रूक्षे भू.रेकुटुम्बिनी ॥४ ॥ जिसका तालु चिकना, लालकमल के समान, कोमल हो तो शुगदायक होता है। जिसका तालु सफ़ेद हो वह विधवा हो जाती है। जिसका तालु पीला हो वह संन्यासिनी होती है। जिसका तालु काला हो वह सन्तानरहित तथा दुखिया रहती है। जिसका तालु रूखा बडुत हो वह चन्धुओंवाली तथा परिवारदाली होती है। ३-४ ।।