98. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — उत्तरोप्ठलक्षण
उत्तरोप्ठलक्षण
मसृणो मत्तकाशिन्याश्चोत्तरोष्ठः सुभोगदः । किञ्चिन्मध्योन्नतोऽरोमा विपरीतो विरुद्धकृत्॥ ६७।। जिस स्त्री का ऊपर का ओठ चिकना हो तो महाभोगदायक कहना। बीच में कुछ ऊँचा, रोमरहित हो तो भी घने भोग देता है। जो पूर्वोक लक्षणों से विपरीत हो तो विरुद्धकारी कहना ॥ ६७ ।।