Books / Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla)

104. Sāmudrika Śāstra — Parts 1 & 2 (Śukla) — भ्रुलक्षण

भ्रुलक्षण

भ्रुवौ सुवर्तुले तन्व्याः स्निग्धे कृष्णे असंहते। प्रशस्ते मृदुरोमाणौ सुभ्रुवः कार्मुकाकृती॥१३॥ खररोमा च पृथुला विकीर्णां सरला स्त्रियाः । न भ्रूः प्रशस्ता मिलिता दीर्घरोमा च पिड़गला ॥ १४ ॥ पथमखरड अगर माँहें गोल, चिकनी, काली, परस्पर न मिली हों, कोमल रोमों- वाली, और धनुपाकार हों तो शुमदायक होती हैं। बिखरे रोमोंवाली, चौड़ी, विकीर्ण, सीधी या मिली हुई तथा बड़े रोमों वाली, पीली भौंहें शुभदायक नहीं होतीं ।। १३-१४॥